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एपिसोड 22: विक्रम का बेटा
firoj saifi · Ghost Stories · 29 मिनट
1. दरवाज़े के उस पार
“मैं तुम्हारा बेटा हूँ।”
वाक्य के बाद शर्मा निवास में ऐसी खामोशी छा गई, जैसे किसी ने पूरे घर की हवा खींच ली हो।
अर्जुन तीसरी मंज़िल के गलियारे में खड़ा था। उसके सामने आईना था और उसमें उसका दूसरा रूप दिखाई दे रहा था। भीतर खड़ा अर्जुन अपनी कलाई पकड़े हुए था। तीन काली लकीरों के बीच से खून बह रहा था, जबकि बाहर खड़े अर्जुन की कलाई पर वही निशान सिर्फ काली स्याही जैसे लग रहे थे।
मुख्य दरवाज़े के बाहर से फिर दस्तक हुई।
ठक।
“अर्जुन,” आवाज़ आई, “दरवाज़ा खोलो।”
यह विक्रम की आवाज़ थी। वही भारीपन, वही बोलने का ढंग, वही हल्की खराश जो अर्जुन को बचपन में पिता के देर रात घर लौटने पर सुनाई देती थी।
लेकिन अर्जुन को अपने पिता की आवाज़ की एक और बात याद थी।
जब विक्रम झूठ बोलते थे, तो किसी सवाल का जवाब देने से पहले अपने दाहिने हाथ की उँगलियाँ चटकाते थे।
बाहर खड़ा आदमी चुप था।
अर्जुन ने सीढ़ियों की ओर देखा। नीचे मुख्य दरवाज़े तक जाने वाली सीढ़ियों पर कोई नहीं था। फिर भी उसे साफ़ महसूस हो रहा था कि दरवाज़े के दूसरी तरफ कोई साँस ले रहा है।
“तुमने कहा कि तुम मेरे बेटे हो,” अर्जुन ने ऊँची आवाज़ में कहा। “तुम्हारा नाम क्या है?”
बाहर से जवाब आया, “विक्रम।”
अर्जुन के भीतर ठंड उतर गई।
“विक्रम कौन?”
“विक्रम शर्मा।”
“वह मेरे पिता थे।”
“हाँ।”
“तो तुम मेरे बेटे कैसे हुए?”
कुछ देर कोई जवाब नहीं आया।
फिर बाहर से आवाज़ आई, “क्योंकि जिस दिन तुम मेरे पिता बने, उस दिन तुम अभी पैदा भी नहीं हुए थे।”
आईने के भीतर खड़े अर्जुन ने अपना सिर दोनों हाथों में पकड़ लिया।
“मत सुनो!” वह चीखा। “वह तुम्हें तारीखों में उलझाएगा!”
अर्जुन ने आईने की ओर देखा।
“तुम कौन हो, जो मुझे सुनने से रोक रहे हो?”
भीतर वाला अर्जुन उसकी ओर झुका।
“मैं वह हूँ जिसने उसे पहले सुना था।”
“कब?”
“जब उसने पहली बार तुम्हें पिता कहा था।”
अर्जुन ने दरवाज़े की ओर देखा।
“तुम्हें क्या चाहिए?”
“बस दरवाज़ा खोल दो।”
“और अगर मैं नहीं खोलूँ?”
“तो तुम्हारी माँ मर जाएगी।”
अर्जुन का शरीर तन गया।
“कौन-सी माँ?”
बाहर से धीमी हँसी सुनाई दी।
“तुम्हारे घर में कितनी माँएँ हैं, अर्जुन?”
फिर किसी औरत की चीख गूँजी।
वह आवाज़ नीचे से आ रही थी।
अर्जुन सीढ़ियों की तरफ भागा। आईने के भीतर वाला अर्जुन भी उसके साथ-साथ दौड़ता दिखाई दिया, लेकिन उसका प्रतिबिंब सीढ़ियों पर नहीं था। वह आईने के भीतर ही दौड़ रहा था, जैसे किसी दूसरी हवेली में नीचे उतर रहा हो।
पहली मंज़िल पर पहुँचकर अर्जुन रुक गया।
गलियारे के अंत में उसकी माँ खड़ी थीं।
वही चेहरा। वही साड़ी। वही आँखें।
लेकिन उनकी पीठ मुख्य दरवाज़े की तरफ थी।
“माँ!”
उन्होंने सिर नहीं घुमाया।
अर्जुन उनके पास पहुँचा और कंधा छूने के लिए हाथ बढ़ाया।
“माँ, आप ठीक हैं?”
औरत ने बहुत धीरे से सिर घुमाया।
उसके चेहरे पर कोई आँखें नहीं थीं।
सिर्फ दो गहरे गड्ढे थे, जिनमें से काला पानी बह रहा था।
अर्जुन पीछे गिर पड़ा।
औरत ने उसकी माँ की आवाज़ में कहा, “दरवाज़ा खोल दो, बेटा।”
फिर उसके चेहरे पर त्वचा हिलने लगी। गड्ढों के भीतर आँखें उभरीं। नाक और होंठ बने। कुछ ही क्षणों में सामने उसकी माँ का चेहरा वापस आ गया।
लेकिन अब वह मुस्करा रही थी।
“तुम मुझे पहचान गए न?”
अर्जुन ने पीछे हटते हुए कहा, “तुम मेरी माँ नहीं हो।”
औरत की मुस्कान और चौड़ी हो गई।
“तुम्हें किसने बताया कि वह तुम्हारी माँ है?”
उसके पीछे मुख्य दरवाज़े पर फिर दस्तक हुई।
ठक।
ठक।
ठक।
औरत ने अर्जुन के कान के पास मुँह लाकर फुसफुसाया—
“तुम्हारे पिता ने तुम्हें घर में लाया था। लेकिन तुम्हें इस घर से बाहर निकालने वाला कौन था, यह तुमने कभी पूछा ही नहीं।”
अर्जुन ने उसे धक्का दिया और दरवाज़े की ओर दौड़ा।
उसने कुंडी पकड़ ली।
तभी उसके पीछे से मीरा की आवाज़ आई—
“भैया, अगर तुमने दरवाज़ा खोला, तो इस बार वह अकेला अंदर नहीं आएगा।”
अर्जुन का हाथ रुक गया।
सीढ़ियों पर मीरा खड़ी थी। उसके हाथ में चाँदी की घंटी थी। चेहरा पीला था, आँखें लाल थीं और साँसें तेज़ थीं।
“तुम कहाँ थीं?” अर्जुन ने पूछा।
“जहाँ तुमने मुझे छोड़ दिया था।”
“मैंने तुम्हें कहीं नहीं छोड़ा!”
मीरा ने उसकी ओर देखा।
“यही बात तुमने 2008 में भी कही थी।”
अर्जुन ने कुंडी छोड़ दी।
बाहर से आवाज़ आई—
“मीरा, तुम उसे सच क्यों नहीं बतातीं?”
मीरा की आँखें फैल गईं।
“तुम्हें मेरा नाम कैसे पता?”
“तुमने ही तो मुझे पहली बार नाम दिया था।”
मीरा ने घंटी उठा ली।
“तुम झूठ बोल रहे हो।”
बाहर से जवाब आया—
“तो फिर बताओ, उस रात तुमने मुझे क्या कहा था?”
मीरा के हाथ काँपने लगे।
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“मीरा?”
उसने होंठ खोले, लेकिन आवाज़ नहीं निकली।
बाहर वाला आदमी बोला—
“तुमने मुझे भाई कहा था।”
मीरा की आँखों से आँसू बह निकले।
“नहीं…”
“तुमने कहा था कि अगर मैं तुम्हारा भाई हूँ, तो तुम्हें मेरे लिए दरवाज़ा खोलना चाहिए।”
“चुप हो जाओ!”
“और तुमने दरवाज़ा खोल दिया था।”
मीरा ने घंटी बजाई।
टन्न्न…
आवाज़ घर में गूँजी।
लेकिन इस बार कोई नहीं रुका।
बाहर से आदमी ने हँसकर कहा—
“अच्छी कोशिश है, मीरा। लेकिन तुमने जो दरवाज़ा खोला था, वह इस घर का दरवाज़ा नहीं था।”
अर्जुन ने मीरा का हाथ पकड़ लिया।
“उसका मतलब क्या है?”
मीरा ने सिर झुका लिया।
“मुझे नहीं पता।”
बाहर से जवाब आया—
“तुम जानती हो। तुम्हें बस याद नहीं करना।”
### 2. विक्रम का चेहरा
अर्जुन ने आखिरकार मुख्य दरवाज़ा खोल दिया।
बाहर कोई बूढ़ा आदमी नहीं था।
न कोई बच्चा।
न कोई काली परछाईं।
दरवाज़े पर लगभग अट्ठाईस साल का एक आदमी खड़ा था। उसने सफेद कमीज़ और काली पतलून पहन रखी थी। उसके बाल छोटे थे, चेहरे पर हल्की दाढ़ी थी और दाहिनी भौंह के ऊपर एक छोटा-सा निशान था।
अर्जुन ने उसे देखते ही साँस रोक ली।
वह आदमी विक्रम शर्मा जैसा दिखता था।
लेकिन सिर्फ चेहरे से नहीं।
उसकी गर्दन का झुकाव, खड़े होने का ढंग, आँखों में देखने का तरीका—सब कुछ वैसा था।
“पापा?” अर्जुन के मुँह से निकला।
आदमी ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“तुम विक्रम हो?”
“नहीं।”
“तो फिर तुम कौन हो?”
आदमी ने अपना बैग खोला।
“मैं तुम्हें अपना नाम बताने नहीं आया। मैं तुम्हें वह नाम दिखाने आया हूँ, जो तुमसे छिपाया गया था।”
उसने एक पुराना लिफाफा निकाला। लिफाफा पीला पड़ चुका था और किनारों पर नमी के निशान थे। ऊपर नीली स्याही से लिखा था—
**डॉ. नीलकंठ के निजी अभिलेख।**
नीचे एक तारीख थी—
**12 मार्च 1948।**
अर्जुन ने लिफाफा लिया।
“यह तारीख तो विक्रम के जन्म से भी पहले की है।”
आदमी ने कहा, “इसीलिए मैं तुम्हें यह दिखाने आया हूँ।”
अर्जुन ने लिफाफा खोला।
अंदर एक प्रमाणपत्र था। उस पर अस्पताल की मुहर लगी थी और नीचे डॉ. नीलकंठ के हस्ताक्षर थे।
लेकिन दस्तावेज़ पर जो लिखा था, उसे पढ़कर अर्जुन का सिर घूमने लगा।
**जन्म प्रमाणपत्र।**
नाम: विक्रम।
पिता का नाम: दर्ज नहीं।
माता का नाम: दर्ज नहीं।
जन्म की तारीख: 12 मार्च 1948।
जन्म का समय: 3:13 AM।
स्थिति: जीवित।
प्रमाणपत्र के नीचे एक अतिरिक्त टिप्पणी थी—
“यह बच्चा जैविक जन्म से प्राप्त नहीं हुआ। इसे पुराने कक्ष में पाया गया। शरीर जीवित है। परछाईं अनुपस्थित है।”
अर्जुन ने कागज़ को दोबारा पढ़ा।
“यह नकली है।”
आदमी ने कहा, “हो सकता है।”
“यह कोई मज़ाक है।”
“हो सकता है।”
“तुम मुझे बेवकूफ बना रहे हो।”
“यह भी हो सकता है।”
अर्जुन ने गुस्से से उसकी तरफ देखा।
“तो फिर मैं इस पर भरोसा क्यों करूँ?”
आदमी ने अपनी कमीज़ की बाँह ऊपर की।
उसकी दाहिनी कलाई पर तीन काली लकीरें थीं।
“क्योंकि मेरे पास इसकी दूसरी प्रति भी है।”
उसने बैग से दूसरा कागज़ निकाला।
यह जन्म प्रमाणपत्र नहीं था। यह मृत्यु प्रमाणपत्र था।
नाम: विक्रम।
मृत्यु की तारीख: 17 जुलाई 1995।
समय: 3:13 AM।
मृत्यु का कारण: पहचान संबंधी असंगति।
चिकित्सक: डॉ. नीलकंठ।
अर्जुन ने कागज़ छीन लिया।
“एक ही आदमी 1948 में पैदा हुआ और 1995 में मर गया? फिर मेरे पिता 2013 में कैसे मरे?”
आदमी ने शांत स्वर में कहा, “क्योंकि विक्रम एक आदमी का नाम नहीं था।”
अर्जुन कुछ क्षण उसे देखता रहा।
“क्या मतलब?”
“विक्रम वह नाम था जो हर बार उस बच्चे को दिया जाता था, जिसे घर में लाया जाता था।”
मीरा ने पीछे से कहा, “यह सच नहीं है।”
आदमी ने उसकी ओर देखा।
“तुम्हें कौन-सा हिस्सा झूठ लगता है?”
मीरा चुप रही।
“तुम्हें लगता है कि विक्रम सिर्फ एक ही था। क्योंकि तुमने एक ही आदमी को पिता कहते सुना। लेकिन तुमने कभी यह नहीं पूछा कि वह आदमी हर तस्वीर में अलग उम्र का क्यों दिखता था।”
अर्जुन ने पुराने प्रमाणपत्रों की तरफ देखा।
“मेरे पिता का जन्म 1967 में हुआ था।”
“तुम्हें यही बताया गया था।”
“मैंने उनका स्कूल रिकॉर्ड देखा है।”
“वह रिकॉर्ड भी असली हो सकता है।”
“तुम पहेलियाँ क्यों बुझा रहे हो?”
आदमी ने अपनी आँखें बंद कीं।
“क्योंकि मुझे खुद नहीं पता कि मैं कौन हूँ।”
उसने जेब से एक छोटी तस्वीर निकाली।
तस्वीर में एक नवजात बच्चा था। उसे सफेद कपड़े में लपेटा गया था। पीछे डॉ. नीलकंठ खड़े थे। उनके पास एक आदमी था, जिसका चेहरा तस्वीर में धुँधला था।
तस्वीर के नीचे लिखा था—
**“पहला विक्रम — 12 मार्च 1948।”**
अर्जुन ने तस्वीर उलट दी।
पीछे दूसरी लिखावट थी—
**“जिसे पिता कहा गया, वह कभी पैदा नहीं हुआ।”**
अर्जुन के हाथ काँपने लगे।
“यह किसने लिखा?”
आदमी ने कहा, “शारदा देवी ने।”
“तुम्हें यह कहाँ मिला?”
“तुम्हारे पिता के कमरे में।”
“तुम मेरे पिता के कमरे में गए थे?”
आदमी ने जवाब नहीं दिया।
अर्जुन ने उसे ध्यान से देखा।
“तुम कल रात भी यहाँ थे?”
आदमी ने धीरे से सिर हिलाया।
“हाँ।”
“और घर के भीतर तुम्हारी लाश पड़ी थी?”
“हाँ।”
“तो तुम जीवित कैसे हो?”
आदमी ने अपनी छाती पर हाथ रखा।
“मुझे नहीं पता।”
फिर उसने बहुत धीमे से कहा—
“लेकिन मुझे यह पता है कि कल रात जो लाश वहाँ पड़ी थी, वह मेरी नहीं थी।”
अर्जुन ने पूछा, “तो किसकी थी?”
आदमी ने उसकी आँखों में देखा।
“तुम्हारी।”
### 3. 1948 का बच्चा
अर्जुन उस आदमी को घर के भीतर ले आया।
मीरा दरवाज़े के पास ही खड़ी रही। उसने घंटी नीचे नहीं रखी थी।
आदमी ने बैठक में कदम रखते ही दीवार पर लगी तस्वीरों को देखना शुरू कर दिया। एक तस्वीर के सामने वह रुक गया।
उसमें विक्रम शर्मा थे। उनके पास शारदा देवी थीं। दोनों के बीच एक बच्चा खड़ा था, जिसकी उम्र लगभग पाँच साल थी।
तस्वीर के पीछे लिखा था—
**“1953 — घर का पहला जन्मदिन।”**
आदमी ने तस्वीर उतारी।
“यह तस्वीर किसकी है?”
अर्जुन ने कहा, “मेरे पिता की।”
“नहीं।”
“तुम्हें कैसे पता?”
आदमी ने तस्वीर में बच्चे की कलाई की तरफ इशारा किया।
तीन काली लकीरें।
“यह बच्चा मैं हूँ।”
अर्जुन ने तस्वीर उसकी ओर से छीन ली।
“तुम पाँच साल के बच्चे कैसे हो सकते हो? तुम्हारा चेहरा तो मेरे पिता जैसा है।”
आदमी ने कहा, “क्योंकि मैं वह बच्चा हूँ जिसे 1948 में पाया गया था।”
“तो फिर तुम्हारी उम्र पचहत्तर साल होनी चाहिए।”
“होनी चाहिए।”
“लेकिन तुम अट्ठाईस साल के दिखते हो।”
“हाँ।”
“क्यों?”
आदमी ने सिर झुका लिया।
“क्योंकि मैं समय के साथ बड़ा नहीं होता। मैं सिर्फ उन यादों के साथ बड़ा होता हूँ, जिन्हें कोई मेरे भीतर छोड़ देता है।”
अर्जुन ने उसे घूरा।
“तुम इंसान नहीं हो?”
आदमी ने कहा, “मुझे नहीं पता।”
मीरा ने पहली बार उसकी ओर कदम बढ़ाया।
“तुम्हें अपना नाम याद है?”
आदमी ने उसे देखा।
“नहीं।”
“तुम्हें याद है कि तुम्हारी माँ कौन थी?”
“नहीं।”
“तुम्हें याद है कि तुम्हारे पिता कौन थे?”
“नहीं।”
मीरा ने धीरे से पूछा, “तो फिर तुम विक्रम क्यों कहलाते हो?”
आदमी ने तस्वीर को मेज़ पर रख दिया।
“क्योंकि जब मैं पहली बार इस घर में आया था, शारदा देवी ने मुझे यही नाम दिया था।”
अर्जुन ने पूछा, “तुम्हें इस घर में कौन लाया था?”
आदमी ने आँखें बंद कर लीं।
कुछ क्षण बाद उसने कहा, “डॉ. नीलकंठ।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
“लेकिन नीलकंठ ने तुम्हें 1948 में पाया था?” अर्जुन ने पूछा।
“हाँ।”
“तो शारदा देवी ने तुम्हें पाँच साल की उम्र में घर क्यों लाया?”
आदमी ने धीरे से कहा, “क्योंकि मैं 1948 में पैदा नहीं हुआ था।”
अर्जुन ने माथा पकड़ा।
“तुम्हारी बातों का कोई मतलब नहीं है।”
“मैं जानता हूँ।”
“तुम 1948 में मिले। 1953 की तस्वीर में हो। फिर भी कहते हो कि 1948 में पैदा नहीं हुए?”
आदमी ने सिर उठाया।
“मुझे 1948 में नहीं पाया गया था। मुझे 1948 की एक तस्वीर में पाया गया था।”
अर्जुन चुप हो गया।
“तस्वीर कहाँ थी?”
“नीलकंठ के अभिलेख में।”
“और तुम?”
“मैं 1953 में इस घर में आया।”
“तब तक तुम कहाँ थे?”
आदमी ने अपनी उँगलियों को देखा।
“मुझे याद नहीं।”
मीरा ने कहा, “तुम झूठ बोल रहे हो।”
आदमी ने उसकी तरफ देखा।
“काश।”
“तुम्हें सब याद है।”
“नहीं।”
“तुम्हें वह रात याद है, जब मैंने तुम्हें देखा था।”
आदमी के चेहरे पर पहली बार डर उभरा।
“कौन-सी रात?”
“17 जुलाई 2008।”
आदमी की आँखें फैल गईं।
मीरा ने कहा, “तुम तीसरी मंज़िल पर थे। माँ आईने के सामने खड़ी थीं। विक्रम कमरे में आया था। शारदा देवी दरवाज़ा बंद करने की कोशिश कर रही थीं।”
आदमी ने पीछे हटकर कहा, “मैं वहाँ नहीं था।”
“तुमने मुझे देखा था।”
“नहीं।”
“तुमने मुझसे कहा था कि अगर मैं तुम्हें नाम दूँगी, तो तुम मेरी माँ को वापस ला दोगे।”
आदमी के हाथ से तस्वीर गिर गई।
“यह सच नहीं है।”
मीरा की आँखों से आँसू बहने लगे।
“तुमने कहा था कि तुम विक्रम के बेटे हो।”
आदमी ने दोनों हाथ कानों पर रख लिए।
“बस करो!”
मीरा ने एक कदम और बढ़ाया।
“तुमने कहा था कि विक्रम ने तुम्हें आईने के पीछे छोड़ दिया था।”
आदमी घुटनों के बल बैठ गया।
“मुझे याद नहीं!”
उसके मुँह से अचानक एक और आवाज़ निकली।
बच्चे की आवाज़।
“मीरा, मुझे बाहर निकालो।”
मीरा पीछे हट गई।
अर्जुन ने आदमी को पकड़ने की कोशिश की, लेकिन उसके शरीर में झटके आने लगे। उसकी आँखें बंद थीं। उसके होंठ काँप रहे थे।
“मुझे बाहर निकालो…”
फिर आवाज़ बदल गई।
अब वह विक्रम की आवाज़ थी।
“माँ, दरवाज़ा बंद कर दो।”
फिर शारदा की।
“उसका नाम मत लेना।”
फिर राधा की।
“यह बच्चा मेरा नहीं है।”
और आखिर में अर्जुन की अपनी आवाज़—
“मुझे यहाँ मत छोड़ो!”
आदमी अचानक शांत हो गया।
उसने सिर उठाया।
उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।
“अब तुम्हें समझ आया?” उसने अर्जुन से पूछा।
अर्जुन पीछे हट गया।
“क्या?”
आदमी ने मुस्कराकर कहा—
“मैं विक्रम का बेटा नहीं हूँ।”
उसकी आँखों में फिर सफेदी लौट आई।
“मैं उन सभी बच्चों का बेटा हूँ, जिन्हें इस घर में पिता के बिना छोड़ दिया गया।”
### 4. नीलकंठ की तीसरी मुहर
आदमी के शांत होने के बाद अर्जुन ने उसे बैठक की कुर्सी पर बैठाया। मीरा खिड़की के पास खड़ी थी। बाहर दोपहर का उजाला था, लेकिन कमरे में अँधेरा बढ़ता जा रहा था।
अर्जुन ने पुराने दस्तावेज़ मेज़ पर फैला दिए।
“अगर ये कागज़ असली हैं, तो हमें नीलकंठ का रिकॉर्ड ढूँढ़ना होगा।”
आदमी ने सिर हिलाया।
“वह रिकॉर्ड इस घर में नहीं है।”
“कहाँ है?”
“पुराने मातृत्व केंद्र में।”
मीरा ने तुरंत कहा, “वह इमारत बंद है।”
“बंद होने का मतलब खाली होना नहीं है,” आदमी ने कहा।
अर्जुन ने पूछा, “वहाँ क्या मिलेगा?”
“नीलकंठ की तीसरी मुहर।”
“तीसरी मुहर क्या है?”
आदमी ने जेब से एक धातु का छोटा टुकड़ा निकाला। वह गोल था और उस पर तीन वृत्त बने थे। बीच में एक खाली जगह थी।
“नीलकंठ हर जन्म प्रमाणपत्र पर मुहर लगाता था। पहली मुहर उन बच्चों के लिए थी, जिन्हें उसने जीवित पाया। दूसरी उन बच्चों के लिए, जिन्हें उसने मृत घोषित किया। तीसरी मुहर उन बच्चों के लिए थी, जिनके बारे में वह यह तय नहीं कर पाता था कि वे जन्मे भी थे या नहीं।”
अर्जुन ने धातु के टुकड़े को देखा।
“और यह तीसरी मुहर है?”
“नहीं। यह उसकी चाबी है।”
“चाबी किसकी?”
“उस रजिस्टर की, जिसमें उन बच्चों के नाम हैं जिन्हें उसने कभी दर्ज नहीं किया।”
मीरा ने पूछा, “अगर उसने नाम दर्ज नहीं किए, तो रजिस्टर में क्या होगा?”
आदमी ने उसकी ओर देखा।
“नाम नहीं। गवाह।”
अर्जुन ने धातु का टुकड़ा जेब में रखा।
“हम अभी वहाँ जाएँगे।”
मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“भैया, सोचकर।”
“अब सोचने के लिए कुछ नहीं बचा।”
“तुम्हें पता भी नहीं कि यह आदमी कौन है।”
अर्जुन ने उस आदमी की तरफ देखा।
“मुझे यह भी नहीं पता कि मैं कौन हूँ। अब इससे बुरा क्या होगा?”
मीरा ने उसका हाथ छोड़ दिया।
“इस घर में हमेशा इससे बुरा कुछ होता है।”
वे तीनों हवेली से बाहर निकले।
जैसे ही अर्जुन ने फाटक पार किया, उसने पीछे मुड़कर देखा। तीसरी मंज़िल की खिड़की में कोई खड़ा था।
वह उसकी माँ थीं।
उन्होंने हाथ उठाकर उसे रोका।
अर्जुन ने कदम रोक दिए।
मीरा ने पूछा, “क्या हुआ?”
“माँ ऊपर हैं।”
मीरा ने खिड़की की तरफ देखा।
वहाँ कोई नहीं था।
“तुमने क्या देखा?”
अर्जुन ने जवाब नहीं दिया।
उसके हाथ में अचानक एक छोटा कागज़ आ गया था।
उसे पता नहीं चला कि वह कहाँ से आया।
कागज़ पर लिखा था—
**“नीलकंठ के रजिस्टर तक मत जाना। वहाँ तुम्हारे जन्म का रिकॉर्ड नहीं है। वहाँ तुम्हारी मृत्यु का गवाह है।”**
नीचे एक नाम था।
**विक्रम।**
और उसके नीचे एक तारीख—
**17 जुलाई 2013।**
### 5. पुराना मातृत्व केंद्र
देवगढ़ का पुराना मातृत्व केंद्र गाँव के बाहरी हिस्से में था। वह इमारत कई वर्षों से बंद पड़ी थी। लोहे का फाटक जंग खा चुका था, दीवारों पर काई थी और खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे।
इमारत के ऊपर लगे बोर्ड पर अब भी नाम लिखा था—
**देवगढ़ मातृत्व एवं शिशु केंद्र।**
नीचे छोटे अक्षरों में—
**प्रभारी चिकित्सक: डॉ. नीलकंठ।**
अर्जुन ने बोर्ड को देखा।
“यह जगह कितने साल से बंद है?”
मीरा ने कहा, “मेरे होश सँभालने से पहले से।”
आदमी ने कहा, “यह कभी बंद नहीं हुई।”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हारा मतलब?”
“लोग यहाँ आना बंद कर गए। लेकिन यहाँ जन्म दर्ज होते रहे।”
फाटक पर ताला लगा था। अर्जुन ने उसे धक्का दिया। ताला अपने आप खुल गया और नीचे गिर पड़ा।
भीतर घास उगी हुई थी। बरामदे में एक टूटी कुर्सी पड़ी थी। दीवार पर किसी ने कोयले से लिखा था—
**“यहाँ बच्चे पैदा नहीं होते। यहाँ तय होता है कि कौन बाहर जाएगा।”**
अर्जुन ने वाक्य पढ़ा।
“यह किसने लिखा?”
आदमी ने कहा, “मैंने।”
“कब?”
“मुझे याद नहीं।”
वे भीतर गए।
पहले कमरे में टूटी मेज़ें थीं। दूसरे में जंग लगे उपकरण। तीसरे कमरे में दीवार पर पुराने बच्चों की तस्वीरें लगी थीं।
हर तस्वीर में एक बच्चा था।
हर बच्चे की कलाई पर तीन काली लकीरें थीं।
और हर तस्वीर के नीचे एक ही वाक्य लिखा था—
**“स्थिति: अस्पष्ट।”**
अर्जुन ने एक तस्वीर उतारी।
उसमें एक बच्चा था, जिसकी शक्ल उसके बचपन जैसी थी।
तस्वीर के पीछे लिखा था—
**“जन्म से पहले देखा गया। मृत्यु के बाद भी उपस्थित।”**
अर्जुन ने तस्वीर नीचे रख दी।
“यह सब क्या है?”
आदमी ने कहा, “नीलकंठ ने अपनी पूरी जिंदगी ऐसे बच्चों को दर्ज करने में बिताई, जिन्हें कोई अस्पताल नहीं मानता था।”
“क्या वह मानसिक रूप से बीमार था?”
“शायद।”
“या यह सब सच है?”
आदमी ने जवाब नहीं दिया।
वे इमारत के पिछले हिस्से में पहुँचे। वहाँ एक छोटा कमरा था, जिसके दरवाज़े पर तीन गोल मुहरें बनी थीं। बीच में एक खाली जगह थी।
आदमी ने धातु का टुकड़ा निकाला और उसे बीच वाली जगह पर लगाया।
दरवाज़ा खुल गया।
कमरे में कोई खिड़की नहीं थी। दीवारों पर लोहे की अलमारियाँ थीं। हर अलमारी में फाइलें थीं। कुछ पर तारीखें लिखी थीं, कुछ पर नाम और कुछ पर सिर्फ काले निशान।
कमरे के बीचोंबीच एक मेज़ थी।
उस पर एक मोटा रजिस्टर रखा था।
उसके ऊपर धूल नहीं थी।
अर्जुन ने रजिस्टर खोला।
पहले पन्ने पर लिखा था—
**“वे बच्चे जिन्हें जन्म प्रमाणपत्र नहीं दिया जा सकता।”**
अगले पन्ने पर तीन प्रविष्टियाँ थीं।
पहली—
नाम: अभय शर्मा।
स्थिति: शरीर उपस्थित। पहचान अपुष्ट।
दूसरी—
नाम: अर्णव शर्मा।
स्थिति: पहचान उपस्थित। शरीर अपुष्ट।
तीसरी—
नाम: ईशान।
स्थिति: गवाह उपस्थित। जन्म दर्ज नहीं।
अर्जुन ने पन्ना पलटा।
चौथी प्रविष्टि खाली थी।
उसके सामने लिखा था—
**“नाम: अर्जुन शर्मा।”**
स्थिति वाले खाने में सिर्फ एक शब्द था—
**“गवाह।”**
अर्जुन ने रजिस्टर बंद कर दिया।
“मैं गवाह कैसे हो सकता हूँ?”
आदमी ने कहा, “क्योंकि तुमने उस रात सब देखा था।”
“मैं 1995 में पैदा हुआ था!”
“तुम्हें यही बताया गया।”
“तो फिर मैं गवाह कैसे हुआ?”
आदमी ने उसकी आँखों में देखा।
“क्योंकि तुम्हारा नाम उस रजिस्टर में 1995 में नहीं लिखा गया था।”
अर्जुन ने फिर पन्ना खोला।
नीचे तारीख लिखी थी—
**17 जुलाई 2013।**
उसके सामने हस्ताक्षर थे—
**डॉ. नीलकंठ।**
और गवाह के खाने में—
**विक्रम शर्मा।**
अर्जुन ने उँगली से नाम छुआ।
स्याही गीली थी।
जैसे किसी ने अभी-अभी लिखा हो।
### 6. वह मृत्यु जो दर्ज नहीं हुई
अर्जुन ने रजिस्टर के अगले पन्ने पलटे।
एक के बाद एक प्रविष्टियाँ थीं। कुछ में बच्चों के नाम थे, कुछ में सिर्फ तारीखें। कहीं “शरीर अनुपस्थित” लिखा था, कहीं “आवाज़ उपस्थित” और कहीं “माँ ने पहचानने से इनकार किया।”
एक पन्ने पर उसे अपने पिता का नाम दिखाई दिया।
**विक्रम शर्मा।**
जन्म: अस्पष्ट।
मृत्यु: 17 जुलाई 2013।
मृत्यु का कारण: पहचान का स्थानांतरण।
गवाह: अर्जुन शर्मा।
अर्जुन की साँस अटक गई।
“यह असंभव है।”
मीरा ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
“भैया…”
“मैंने 2013 में अपने पिता को मरते हुए नहीं देखा था। मैं उस समय घर पर नहीं था।”
आदमी ने कहा, “तुम्हें याद नहीं है।”
“बस करो!”
अर्जुन ने रजिस्टर मेज़ पर पटक दिया।
“तुम सब यही कहते हो! तुम्हें याद नहीं। तुमने देखा था। तुम्हारी याद बदल दी गई। अगर हर बात का जवाब यही है, तो फिर सच क्या है?”
कमरे में कुछ क्षण सन्नाटा रहा।
फिर पीछे की अलमारी से आवाज़ आई—
“सच वह है, जिसे तुम लिखने से डरते हो।”
तीनों ने पलटकर देखा।
अलमारी के पीछे एक दरवाज़ा था, जो पहले वहाँ नहीं था।
उसके ऊपर लिखा था—
**मृत्यु कक्ष।**
अर्जुन ने दरवाज़ा खोला।
भीतर एक छोटा कमरा था। बीच में लोहे का पलंग रखा था। उसके ऊपर सफेद चादर थी। दीवार पर घड़ी लगी थी, जो तीन बजकर तेरह मिनट पर रुकी हुई थी।
पलंग के पास एक आदमी बैठा था।
वह विक्रम शर्मा था।
उसका चेहरा पीला था। आँखों के नीचे गहरे घेरे थे और दाहिने हाथ पर तीन काली लकीरें थीं।
अर्जुन के पैर जैसे जमीन में धँस गए।
“पापा?”
विक्रम ने सिर उठाया।
“तुम आ गए।”
अर्जुन उसके पास गया।
“आप जीवित हैं?”
विक्रम ने कोई जवाब नहीं दिया।
“आपकी मृत्यु 2013 में हुई थी। मैंने आपकी चिता देखी थी।”
विक्रम ने कहा, “तुमने आग देखी थी।”
“आपकी चिता।”
“तुमने शरीर देखा था?”
अर्जुन चुप हो गया।
विक्रम ने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया।
“तुम्हें याद है, मैंने तुम्हें आखिरी बार क्या कहा था?”
अर्जुन ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“मैंने कहा था कि अगर कभी तुम्हें मेरी आवाज़ सुनाई दे, तो पहले पूछना कि मैं किसे बचाने की कोशिश कर रहा हूँ।”
अर्जुन ने उसे देखा।
“आप किसे बचाने की कोशिश कर रहे थे?”
विक्रम ने आँखें बंद कर लीं।
“तुम्हें।”
“मुझसे किससे बचा रहे थे?”
“उस बच्चे से, जिसे तुमने अपने भीतर रखा था।”
अर्जुन ने पीछे हटकर कहा, “मैंने किसी बच्चे को अपने भीतर नहीं रखा!”
विक्रम ने धीरे से सिर हिलाया।
“तुमने नहीं रखा। तुम्हें उसके लिए जगह बनाया गया।”
अर्जुन की आँखों में आँसू भर आए।
“किसने?”
विक्रम ने उसकी ओर देखा।
“मैंने।”
अर्जुन ने उसे घूरा।
“आपने?”
“मैंने दरवाज़ा बंद किया था।”
“किसके ऊपर?”
“उस बच्चे के ऊपर।”
“क्यों?”
विक्रम की आवाज़ टूट गई।
“क्योंकि उस रात दो बच्चे बाहर आने वाले थे। लेकिन इस घर में एक ही शरीर के लिए जगह थी।”
“तो आपने एक को चुन लिया?”
विक्रम ने सिर झुका लिया।
“नहीं। मैंने दोनों को बचाने की कोशिश की थी।”
“और क्या हुआ?”
विक्रम ने पलंग के नीचे देखा।
“एक बाहर आया। दूसरा भीतर रह गया।”
अर्जुन ने पूछा, “कौन बाहर आया?”
विक्रम ने बहुत धीरे से कहा—
“मुझे आज तक नहीं पता।”
कमरे में अचानक ठंडी हवा फैल गई।
विक्रम के पीछे दीवार पर एक परछाईं उभरी।
वह किसी बच्चे की थी।
उसने विक्रम के कंधे पर हाथ रखा।
विक्रम ने आँखें बंद कर लीं।
“वह आ गया,” उसने कहा।
अर्जुन ने पलटकर देखा।
कमरे के दरवाज़े पर वही आदमी खड़ा था, जो उसके साथ आया था।
लेकिन अब उसका चेहरा बदल रहा था।
पहले वह विक्रम जैसा दिखा।
फिर अर्जुन जैसा।
फिर एक बच्चे जैसा।
और आखिर में उसका चेहरा बिल्कुल खाली हो गया।
जहाँ आँखें, नाक और मुँह होने चाहिए थे, वहाँ सिर्फ चिकनी त्वचा थी।
उसने विक्रम की आवाज़ में कहा—
“पिता, अब मुझे बाहर आने दो।”
विक्रम ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
आकृति ने कहा, “आपने मुझे वादा किया था।”
“मैंने गलती की थी।”
“आपने मुझे नाम दिया था।”
“मैंने तुम्हें नाम नहीं दिया।”
“आपने मुझे विक्रम कहा था।”
विक्रम की आँखों से आँसू बह निकले।
“वह नाम तुम्हारा नहीं था।”
आकृति ने अपना सिर झुका लिया।
“तो फिर मेरा नाम क्या है?”
विक्रम ने उत्तर नहीं दिया।
आकृति ने अर्जुन की ओर देखा।
“तुम बताओ।”
अर्जुन ने पीछे हटते हुए कहा, “मुझे नहीं पता।”
“तुम्हें पता है।”
“नहीं!”
“तुमने ही तो मुझे पहली बार देखा था।”
अर्जुन की आँखों के सामने एक दृश्य चमका।
एक काला कमरा।
एक छोटा बच्चा।
विक्रम का हाथ।
और अर्जुन की अपनी आवाज़—
“तुम्हारा नाम विक्रम है।”
अर्जुन चीखकर पीछे गिर पड़ा।
विक्रम ने उसे पकड़ने की कोशिश की।
लेकिन उसी क्षण पलंग पर बैठा विक्रम गायब हो गया।
कमरे में सिर्फ अर्जुन था।
मीरा थी।
और वह चेहराविहीन आकृति थी।
आकृति ने कहा—
“अब तुम्हें याद है।”
### 7. बेटे का जन्म
अर्जुन ने खुद को सँभालकर उठाया।
“तुमने मुझे यह याद क्यों दिलाया?”
चेहराविहीन आकृति ने कहा, “क्योंकि तुमने मेरा नाम लिया था।”
“मैंने तुम्हें विक्रम कहा था।”
“हाँ।”
“तो तुम विक्रम हो?”
“नहीं।”
“फिर तुम मेरे बेटे कैसे हो?”
आकृति कुछ क्षण चुप रही।
फिर उसने कहा, “क्योंकि तुमने मुझे अपने पिता के नाम से पुकारा था। और उस दिन से मैं तुम्हारा बेटा बन गया।”
अर्जुन को लगा कि उसके पैरों के नीचे फर्श टूट रहा है।
“यह कैसे हो सकता है?”
आकृति ने कहा, “इस घर में नाम सिर्फ पहचान नहीं होते। नाम रिश्ते बनाते हैं।”
मीरा ने फुसफुसाकर कहा, “भैया, इसे नाम मत देना।”
आकृति ने उसकी ओर देखा।
“तुमने मुझे पहले ही नाम दिया था।”
“मैंने नहीं दिया!”
“तुमने मुझे भाई कहा था।”
मीरा की आँखों से आँसू बहने लगे।
“मैं बच्ची थी।”
“मैं भी।”
आकृति ने अपना चेहरा अर्जुन की ओर किया।
“तुमने मुझे विक्रम कहा। मीरा ने मुझे भाई कहा। राधा ने मुझे बेटा कहा। शारदा ने मुझे मृत घोषित किया। नीलकंठ ने मुझे गवाह लिखा।”
उसने अपनी छाती पर हाथ रखा।
“अब बताओ, मैं कौन हूँ?”
अर्जुन ने सिर हिलाया।
“मुझे नहीं पता।”
आकृति ने कहा, “इसीलिए मैं तुम्हारे पास आया हूँ।”
“तुम्हें क्या चाहिए?”
“मेरा जन्म।”
“तुम तो कह रहे थे कि तुम पैदा हो चुके हो।”
“मेरी आवाज़ पैदा हुई थी। मेरी यादें पैदा हुई थीं। मेरा नाम पैदा हुआ था।”
आकृति ने पलंग की तरफ देखा।
“लेकिन मेरा शरीर कभी बाहर नहीं आया।”
अर्जुन ने धीमे से पूछा, “तो तुम मेरे बेटे हो?”
“मैं तुम्हारा बेटा हो सकता हूँ।”
“और अगर मैं तुम्हारा पिता नहीं हुआ?”
“तो मैं तुम्हारा भाई हो सकता हूँ।”
“और अगर तुम दोनों में से कोई नहीं हुए?”
आकृति ने सिर उठाया।
“तो मैं तुम्हारी वह याद हूँ, जिसे तुमने अपने जन्म से पहले छोड़ दिया था।”
अर्जुन के गले से आवाज़ नहीं निकली।
आकृति उसके पास आई।
“तुम्हें याद है, जब तुम पहली बार देवगढ़ लौटे थे?”
अर्जुन ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
“उस रात तुमने घर में प्रवेश किया था।”
“हाँ।”
“लेकिन उससे पहले कौन घर में आया था?”
अर्जुन ने उसे देखा।
“तुम।”
आकृति ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“तो कौन?”
आकृति ने धीरे-धीरे अपना चेहरा विक्रम के चेहरे में बदल लिया।
“मैं।”
“लेकिन तुमने कहा कि तुम मेरे बेटे हो।”
“मैंने कहा था कि मैं तुम्हारा बेटा हूँ। मैंने यह नहीं कहा था कि मैं तुम्हारे बाद पैदा हुआ।”
अर्जुन की साँस रुक गई।
आकृति ने कहा, “मैं तुम्हारे जन्म से पहले भी तुम्हारा बेटा था।”
“यह असंभव है!”
“तुम्हारे लिए।”
आकृति ने उसकी कलाई पकड़ ली।
तीन काली लकीरें उभर आईं।
“लेकिन जिस समय में मैं रहता हूँ, वहाँ तुम मेरे पिता हो।”
अर्जुन ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की।
“तुम समय के बारे में क्या जानते हो?”
“मैंने समय को बाहर से देखा है।”
“कहाँ से?”
आकृति ने कमरे के कोने की ओर इशारा किया।
वहाँ एक आईना खड़ा था।
उसकी सतह पर कोई प्रतिबिंब नहीं था।
सिर्फ अँधेरा।
आकृति ने कहा, “वहाँ।”
अर्जुन ने आईने को देखा।
“उसके पीछे क्या है?”
आकृति ने जवाब दिया—
“वह दुनिया जहाँ तुम्हारे जन्म के बाद कुछ भी नहीं हुआ।”
“और यहाँ?”
“यह दुनिया जहाँ तुम्हारे जन्म से पहले सब कुछ हो चुका है।”
अर्जुन ने सिर पकड़ लिया।
“मुझे बाहर जाना है।”
आकृति ने रास्ता छोड़ दिया।
“जा सकते हो।”
अर्जुन ने दरवाज़े की ओर कदम बढ़ाया।
तभी आकृति ने कहा—
“लेकिन जाने से पहले एक सवाल का जवाब दे दो।”
अर्जुन रुका।
“क्या?”
“जब तुम पैदा हुए थे, तुम्हारी माँ ने तुम्हें पहली बार क्या कहा था?”
अर्जुन ने याद करने की कोशिश की।
उसे कोई शब्द याद नहीं आया।
बस एक स्पर्श।
एक गर्म हथेली।
और किसी औरत की रोने की आवाज़।
“मुझे नहीं पता।”
आकृति ने सिर हिलाया।
“यही वजह है कि तुम अभी तक पैदा नहीं हुए।”
अर्जुन ने पलटकर उसकी ओर देखा।
“क्या मतलब?”
आकृति ने अपना चेहरा फिर बदल लिया।
अब वह अर्जुन जैसा दिखता था।
“जिस दिन तुम्हारी माँ तुम्हें तुम्हारे असली नाम से पुकारेगी, उसी दिन तुम्हारा जन्म पूरा होगा।”
“और तब तक?”
आकृति ने उत्तर दिया—
“तब तक तुम्हारे पिता मरते रहेंगे।”
### 8. बाहर कौन गया?
अर्जुन और मीरा पुराने मातृत्व केंद्र से बाहर निकले तो शाम ढल चुकी थी।
आदमी उनके साथ नहीं था।
अर्जुन ने पीछे मुड़कर देखा। इमारत का दरवाज़ा बंद था। तीसरी खिड़की के पीछे कोई खड़ा था, लेकिन उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
“वह कहाँ गया?” अर्जुन ने पूछा।
मीरा ने कहा, “वह कभी हमारे साथ था ही नहीं।”
अर्जुन ने उसे देखा।
“तुमने उसे देखा था।”
“मैंने एक आदमी को देखा था।”
“क्या फर्क है?”
मीरा ने थकी हुई आवाज़ में कहा, “आदमी के जाने पर उसकी जगह खाली रह जाती है। लेकिन कुछ चीज़ें चली जाएँ, तो उनके जाने का पता ही नहीं चलता।”
वे हवेली लौटे।
मुख्य दरवाज़ा खुला था।
बैठक में एक नया कागज़ रखा था।
अर्जुन ने उसे उठाया।
उस पर लिखा था—
**“2013 में तीन विक्रम मरे थे। उनमें से एक तुम्हारा पिता था। एक तुम्हारा बेटा था। तीसरे को किसी ने जन्म ही नहीं दिया था।”**
नीचे तीन नाम थे।
विक्रम शर्मा।
अर्जुन शर्मा।
और तीसरी जगह खाली थी।
मीरा ने पूछा, “तीसरे का नाम क्यों नहीं है?”
अर्जुन ने जवाब दिया, “क्योंकि शायद वह नाम अब भी किसी के भीतर है।”
कागज़ के पीछे एक और वाक्य था—
**“जिस आदमी को तुम आज पुराने मातृत्व केंद्र में मिले, वह कल रात तुम्हारे घर में मरा हुआ पड़ा था।”**
अर्जुन ने कागज़ मोड़ दिया।
“तो फिर आज वह हमारे साथ कैसे था?”
मीरा ने कहा, “शायद वह मरा नहीं था।”
“या शायद वह कभी जीवित ही नहीं था।”
दोनों ने एक-दूसरे को देखा।
उसी क्षण ऊपर से कोई भारी चीज़ गिरने की आवाज़ आई।
वे सीढ़ियाँ चढ़कर तीसरी मंज़िल पर पहुँचे।
आईना बीच कमरे में खड़ा था।
उसकी सतह पर तीन आकृतियाँ थीं।
एक बच्चा।
एक जवान आदमी।
एक बूढ़ा आदमी।
लेकिन इस बार तीनों अर्जुन नहीं थे।
पहला चेहरा विक्रम का था।
दूसरा अर्जुन का।
तीसरा चेहराविहीन था।
बूढ़े विक्रम ने आईने के भीतर से कहा—
“अब तुम्हें चौथे आदमी को ढूँढ़ना होगा।”
अर्जुन ने पूछा, “कौन-सा चौथा आदमी?”
आईने में चेहराविहीन आकृति ने अपना हाथ उठाया।
उसकी कलाई पर तीन काली लकीरें थीं।
“वह आदमी, जिसने मुझे जन्म से पहले पिता कहा था।”
अर्जुन की साँस रुक गई।
“वह कौन था?”
आकृति ने जवाब दिया—
“डॉ. नीलकंठ।”
आईने की सतह पर अचानक एक पुरानी तस्वीर उभरी।
डॉ. नीलकंठ एक नवजात बच्चे को गोद में लिए खड़े थे। उनके पीछे विक्रम शर्मा था। उसके पास शारदा देवी थीं। कमरे के एक कोने में राधा खड़ी थी।
तस्वीर के नीचे लिखा था—
**“12 मार्च 1948 — पहले विक्रम का जन्म।”**
लेकिन तस्वीर के पीछे एक और तारीख लिखी थी—
**“12 मार्च 1947 — पिता का जन्म।”**
अर्जुन ने तारीख पढ़ी।
“यह कैसे संभव है?”
आईने के भीतर से नीलकंठ की आवाज़ आई—
“क्योंकि उस दिन मैं पिता नहीं बना था।”
एक पल की चुप्पी।
“उस दिन मैं बेटा बना था।”
अर्जुन ने आईने पर हाथ रखा।
काँच बर्फ जैसा ठंडा था।
नीलकंठ की आवाज़ फिर आई—
“अर्जुन, अगर तुम सच में जानना चाहते हो कि विक्रम का बेटा कौन है, तो तुम्हें मेरे घर जाना होगा।”
“तुम्हारा घर कहाँ है?”
आईने में एक पता उभरा।
देवगढ़ की पुरानी बस्ती।
गली नंबर सात।
एक ऐसा मकान, जिसे गाँव के लोग कई वर्षों से खाली समझते थे।
पते के नीचे लिखा था—
**“वहाँ मत जाना जहाँ तुम्हारे पिता पैदा हुए थे। वहाँ जाना जहाँ तुम्हारे पिता को पैदा किया गया था।”**
अर्जुन ने कागज़ को देखा।
फिर आईने में खड़े चेहराविहीन आदमी की ओर देखा।
“और अगर मैं वहाँ गया तो?”
आकृति ने कहा—
“तब तुम्हें पता चलेगा कि विक्रम शर्मा का कोई बेटा नहीं था।”
“तो तुम कौन हो?”
आईने के भीतर आकृति ने धीरे-धीरे अपना चेहरा उठाया।
इस बार उसका चेहरा साफ़ था।
वह डॉ. नीलकंठ जैसा दिखता था।
लेकिन उसकी आँखें अर्जुन की थीं।
उसने मुस्कराकर कहा—
“मैं वह बच्चा हूँ, जिसे डॉ. नीलकंठ ने अपना बेटा कहा था।”
अर्जुन ने पूछा—
“तुम्हारा नाम क्या है?”
आकृति ने जवाब नहीं दिया।
उसने सिर्फ आईने पर अपनी उँगली से एक शब्द लिखा।
**विक्रम।**
फिर उसके नीचे दूसरा शब्द उभरा।
**नीलकंठ।**
और फिर तीसरा—
**अर्जुन।**
तीनों नाम एक-दूसरे में घुलने लगे।
अंत में आईने पर सिर्फ एक वाक्य बचा—
**“पिता एक आदमी नहीं होता। पिता वह होता है, जो किसी बच्चे की पहचान अपने नाम से बाँध देता है।”**
अचानक कमरे की सारी बत्तियाँ बुझ गईं।
अँधेरे में मीरा ने अर्जुन का हाथ पकड़ा।
“भैया, नीचे चलो।”
अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
लेकिन उसे महसूस हुआ कि उसने एक हाथ नहीं, दो हाथ पकड़े हुए हैं।
एक मीरा का।
दूसरा किसी बच्चे का।
अर्जुन ने अँधेरे में पूछा, “मीरा?”
दोनों आवाज़ें एक साथ आईं—
“हाँ, भैया।”
अर्जुन का दिल धड़कना भूल गया।
फिर तीसरी आवाज़ आई।
बहुत धीमी।
बहुत पास।
“पापा?”
अर्जुन ने हाथ छोड़ दिए।
अँधेरे में किसी बच्चे की हँसी गूँजी।
और उसके बाद मुख्य दरवाज़े पर दस्तक हुई।
इस बार दस्तक देने वाला बाहर नहीं था।
वह घर के भीतर था।
वह सीढ़ियों के नीचे खड़ा था।
और वह अर्जुन की ही आवाज़ में कह रहा था—
**“दरवाज़ा खोलो। मैं घर लौट आया हूँ।”**
### एपिसोड 22 समाप्त
- Writer
- firoj saifi
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- “अंधेरे में कोई है”
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- 5762
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