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एपिसोड 21: जिस रात अर्जुन घर लौटा
firoj saifi · Ghost Stories · 31 मिनट
1. अर्जुन से एक दिन पहले
देवगढ़ में उस दिन बारिश नहीं हुई थी।
फिर भी शर्मा निवास के मुख्य दरवाज़े के सामने की मिट्टी गीली थी। हवेली की दीवारों से पानी टपक रहा था, जैसे किसी ने भीतर से उन पर पानी उड़ेला हो। बरामदे में रखे गमलों के नीचे काली मिट्टी जमा थी और पुराने लोहे के फाटक पर उँगलियों के निशान बने थे।
वे निशान बाहर से भीतर की ओर नहीं जा रहे थे।
वे भीतर से बाहर की तरफ बने थे।
जैसे कोई आदमी कई बार फाटक खोलने की कोशिश कर चुका हो, लेकिन हर बार उसे दूसरी ओर से किसी ने पकड़कर वापस खींच लिया हो।
शाम के छह बजकर चालीस मिनट हुए थे, जब एक काली टैक्सी गाँव की सड़क पर आकर रुकी।
ड्राइवर ने खिड़की से सिर बाहर निकाला।
“साहब, यही है शर्मा निवास?”
पीछली सीट पर बैठा आदमी कुछ देर हवेली को देखता रहा।
“हाँ।”
“आप यहीं उतरेंगे?”
“मुझे तो यहीं आना था।”
ड्राइवर ने शीशे में उसकी तरफ देखा। “किसी को खबर कर दूँ?”
“किसे?”
“घर में किसी को।”
आदमी मुस्कराया नहीं।
“घर में कोई नहीं है।”
ड्राइवर ने हवेली की तीसरी मंज़िल की तरफ देखा। वहाँ एक खिड़की खुली थी। पर्दा भीतर की तरफ हिल रहा था, जबकि बाहर हवा नहीं चल रही थी।
“तो फिर ऊपर कौन खड़ा है?”
आदमी ने तुरंत सिर उठाया।
खिड़की खाली थी।
“तुमने क्या देखा?”
“कुछ नहीं, साहब। शायद पर्दा होगा।”
आदमी ने पैसे दिए और उतर गया।
टैक्सी कुछ दूर जाकर रुकी। ड्राइवर ने पीछे मुड़कर देखा। वह आदमी फाटक के सामने खड़ा था। उसके हाथ में एक पुराना चमड़े का बैग था, और वह हवेली के भीतर नहीं जा रहा था।
वह किसी का इंतज़ार कर रहा था।
ड्राइवर ने गाड़ी आगे बढ़ा दी।
सड़क के अगले मोड़ पर पहुँचकर उसने रेडियो चालू किया। पुराने गाने के बीच अचानक खड़खड़ाहट हुई। फिर किसी बच्चे की आवाज़ सुनाई दी—
“उसे अंदर मत जाने देना।”
ड्राइवर ने रेडियो बंद कर दिया।
कुछ पल बाद वही आवाज़ पीछे की सीट से आई।
“वह पहले ही अंदर है।”
ड्राइवर ने ब्रेक पर पैर मारा।
गाड़ी सड़क के बीचोंबीच रुक गई।
उसने पीछे देखा।
पीछली सीट खाली थी।
लेकिन सीट के कपड़े पर गीले हाथों के निशान थे।
तीन छोटी उँगलियाँ।
तीन काली लकीरें।
और बीच में एक नाम, जिसे ड्राइवर पढ़ नहीं पाया।
उधर शर्मा निवास के सामने खड़ा आदमी आखिरकार फाटक तक पहुँचा।
उसने लोहे की सलाखों को छुआ।
उसी क्षण उसके बैग के भीतर से एक घड़ी बज उठी।
टिक।
टिक।
टिक।
आदमी ने बैग खोला। भीतर एक पुरानी जेब-घड़ी थी, जिसकी सुइयाँ तीन बजकर तेरह मिनट पर रुकी हुई थीं।
उसने घड़ी को हथेली में लिया।
“मैं आ गया हूँ,” उसने कहा।
फाटक के दूसरी तरफ से आवाज़ आई—
“कौन?”
आदमी ने आँखें बंद कर लीं।
“तुम जानते हो मैं कौन हूँ।”
“नहीं।”
“तुमने मुझे बुलाया था।”
“मैंने किसी को नहीं बुलाया।”
आदमी ने फाटक के बीच से हवेली को देखा।
“तो फिर मेरा नाम तुम्हें किसने दिया?”
इस बार भीतर से कोई जवाब नहीं आया।
लेकिन तीसरी मंज़िल की खिड़की में एक चेहरा दिखाई दिया।
वह आदमी का अपना चेहरा था।
उसी उम्र का।
उसी नाक, उसी आँखों और उसी माथे वाला।
फर्क सिर्फ इतना था कि खिड़की में खड़े आदमी की कलाई पर तीन काली लकीरें थीं।
बाहर खड़े आदमी ने पीछे हटकर अपनी कलाई देखी।
वहाँ भी तीन लकीरें थीं।
उसने बहुत धीरे से कहा—
“नहीं। तुम अभी बाहर नहीं आ सकते।”
खिड़की वाला चेहरा मुस्कराया।
“तुम मुझे बाहर छोड़कर जा चुके हो।”
“मैं तुम्हें लेने आया हूँ।”
“तुम यह बात पंद्रह साल से कहते आ रहे हो।”
“इस बार मैं तुम्हें लेकर जाऊँगा।”
खिड़की वाला चेहरा पीछे हट गया।
फिर कमरे के भीतर से किसी के गिरने की आवाज़ आई।
उसके बाद एक लंबी चीख।
आदमी ने फाटक को धक्का दिया।
वह खुल गया।
हवेली के मुख्य दरवाज़े तक पहुँचते-पहुँचते उसके जूते मिट्टी से भर चुके थे। उसने दरवाज़े पर हाथ रखा। लकड़ी गर्म थी, जैसे दूसरी ओर आग जल रही हो।
दरवाज़े के बीचोंबीच कोई खड़ा था।
आदमी को उसका चेहरा दिखाई नहीं दिया।
सिर्फ इतना दिखा कि वह व्यक्ति बिल्कुल सीधा खड़ा था और उसकी परछाईं दीवार पर उल्टी दिशा में पड़ रही थी।
“तुम कौन हो?” बाहर खड़े आदमी ने पूछा।
दरवाज़े के पीछे से जवाब आया—
“मैं अर्जुन हूँ।”
आदमी की आँखें फैल गईं।
“नहीं।”
“तुमने ही तो मुझे बुलाया था।”
“अर्जुन अभी देवगढ़ नहीं आया।”
दरवाज़े के पीछे खड़े व्यक्ति ने कहा—
“तुम्हें यही बताया गया था।”
फिर दरवाज़ा खुल गया।
भीतर अँधेरा था।
आदमी ने एक कदम भीतर रखा।
और उसी क्षण उसे फर्श पर अपनी ही लाश दिखाई दी।
### 2. घर के भीतर पड़ी लाश
लाश मुख्य दरवाज़े से लगभग दस कदम दूर पड़ी थी।
उसने वही कपड़े पहने थे जो बाहर खड़े आदमी ने पहने थे—गहरे भूरे रंग की पतलून, हल्की नीली कमीज़ और काले जूते। उसके हाथ में चमड़े का बैग था। बैग खुला पड़ा था और उसके भीतर से वही जेब-घड़ी बाहर निकली हुई थी।
लाश का चेहरा ऊपर की ओर था।
आँखें खुली थीं।
मुँह आधा खुला था।
और गले पर तीन पतली काली रेखाएँ थीं।
बाहर से आया आदमी कुछ क्षण तक उसे देखता रहा। फिर उसने अपने चेहरे को छुआ, जैसे यह सुनिश्चित करना चाहता हो कि वह अब भी जीवित है।
उसने लाश के पास घुटनों के बल बैठकर उसकी नब्ज़ देखी।
कुछ नहीं।
उसने छाती पर हाथ रखा।
ठंडी।
उसने अपनी साँस रोक ली।
लाश की कमीज़ पर नाम लिखा हुआ था।
अर्जुन शर्मा।
आदमी ने तुरंत अपना हाथ खींच लिया।
“यह कैसे हो सकता है?”
पीछे से आवाज़ आई—
“तुम्हें देर हो गई।”
वह पलटा।
सीढ़ियों के पास एक और आदमी खड़ा था। उसके बाल सफेद थे, चेहरा झुर्रियों से भरा था, लेकिन उसकी आँखें उसी की थीं।
वह बूढ़ा आदमी था।
और उसके हाथ में एक छोटी-सी लाल गेंद थी।
“तुम कौन हो?” उसने पूछा।
बूढ़े ने कहा, “तुमने मुझे कई नाम दिए हैं।”
“मुझे तुम्हारा कोई नाम याद नहीं।”
“यही तो तुम्हारी समस्या है।”
बूढ़े ने लाल गेंद को सीढ़ियों पर उछाला।
गेंद एक सीढ़ी से दूसरी पर टकराती हुई नीचे आई।
टक।
टक।
टक।
हर टक्कर के साथ घर की दीवारों पर एक नई तस्वीर उभरती गई।
पहली तस्वीर में शारदा देवी थीं।
दूसरी में विक्रम शर्मा।
तीसरी में राधा।
चौथी में मीरा।
पाँचवीं तस्वीर में एक बच्चा था, जिसका चेहरा बाहर खड़े आदमी जैसा था।
छठी तस्वीर खाली थी।
उस खाली फ्रेम के नीचे लिखा था—
**“यह वह है, जिसे किसी ने नहीं देखा।”**
आदमी ने बूढ़े को घूरा।
“यह घर क्या है?”
बूढ़े ने कहा, “एक जगह जहाँ लोग लौटते हैं।”
“किसलिए?”
“अपनी चीज़ें लेने।”
“कौन-सी चीज़ें?”
बूढ़े ने फर्श पर पड़ी लाश की तरफ देखा।
“कभी नाम। कभी चेहरा। कभी याद। कभी शरीर।”
आदमी पीछे हट गया।
“मैं यहाँ से जा रहा हूँ।”
उसने मुख्य दरवाज़े की ओर कदम बढ़ाया।
लेकिन दरवाज़े के बाहर अब फाटक नहीं था।
वहाँ एक लंबा अस्पताल का गलियारा था।
दीवारों पर पीली रोशनी थी। फर्श पर सफेद टाइलें थीं और अंत में एक लोहे का दरवाज़ा था। दरवाज़े के ऊपर लाल अक्षरों में लिखा था—
**मृतक कक्ष।**
आदमी ने आँखें बंद कीं और दोबारा दरवाज़े की ओर देखा।
हवेली का दरवाज़ा वापस आ गया था।
लेकिन बाहर जाने के बजाय उसने पीछे मुड़कर बूढ़े को देखा।
“तुम मुझे क्या दिखाना चाहते हो?”
बूढ़े ने उत्तर दिया, “तुम्हारी पहली मौत।”
“मैं कभी मरा नहीं।”
“तुम्हारी यही याद तुम्हें बचाए हुए है।”
बूढ़े ने लाल गेंद आदमी की तरफ उछाली।
आदमी ने उसे पकड़ लिया।
गेंद पर काली स्याही से लिखा था—
**17 जुलाई 1995।**
उसके हाथ में जलन हुई।
उसे एक बच्चे की आवाज़ सुनाई दी।
“भैया, मेरी गेंद वापस दो।”
आदमी ने गेंद छोड़ दी।
वह फर्श पर गिरकर लुढ़की और लाश के हाथ के पास जाकर रुक गई।
लाश की उँगलियाँ धीरे-धीरे मुड़ीं।
उसने गेंद पकड़ ली।
फिर उसकी गर्दन घूमी।
चेहरा आदमी की ओर हो गया।
और लाश ने आँखें खोलकर कहा—
“तुम मेरे घर क्यों आए हो?”
आदमी की चीख पूरे शर्मा निवास में गूँज गई।
लेकिन उस चीख का जवाब किसी इंसान ने नहीं दिया।
तीसरी मंज़िल से चौथी दस्तक सुनाई दी।
ठक।
### 3. शारदा देवी की चेतावनी
जब आदमी को होश आया, वह पहली मंज़िल के एक छोटे कमरे में पड़ा था।
कमरे में एक लकड़ी की मेज़, दो कुर्सियाँ और दीवार पर लगी घड़ी थी। घड़ी की सुइयाँ तीन बजकर तेरह मिनट पर रुकी हुई थीं।
उसके सिर के नीचे किसी ने कपड़ा रखा था।
वह उठकर बैठा तो देखा कि मेज़ पर एक लिफाफा रखा है। लिफाफे पर उसका नाम लिखा था, लेकिन नाम के ऊपर काली स्याही फेर दी गई थी।
नीचे सिर्फ एक वाक्य बचा था—
**“जिसे तुम लेने आए हो, वह तुम्हारा इंतज़ार नहीं कर रहा।”**
आदमी ने लिफाफा खोला।
अंदर एक पुराना पत्र था।
“अगर तुम यह पढ़ रहे हो, तो तुम शर्मा निवास के भीतर पहुँच चुके हो। इसका मतलब है कि मैंने तुम्हें रोकने की कोशिश में देर कर दी। तुम जिस बच्चे को लेने आए हो, वह बच्चा नहीं है। तुम जिस आदमी को खोज रहे हो, वह तुम्हारा पिता नहीं है। और जिस शरीर को तुम अपना समझते हो, वह तुम्हारे लिए नहीं बनाया गया था।”
पत्र के अंत में शारदा देवी के हस्ताक्षर थे।
आदमी ने कागज़ उलटकर देखा।
पीछे कुछ और लिखा था—
“तुम्हें अगर अपनी यादें वापस चाहिए, तो तीसरी मंज़िल पर मत जाना। तुम्हें अगर अपनी पहचान वापस चाहिए, तो आईने में मत देखना। और अगर तुम्हें अपना नाम जानना है, तो उस व्यक्ति से मत पूछना जो तुम्हें पहली बार बेटा कहेगा।”
आदमी ने पत्र मोड़कर जेब में रख लिया।
दरवाज़े के बाहर कदमों की आवाज़ आई।
धीरे-धीरे।
एक कदम।
फिर दूसरा।
फिर तीसरा।
आदमी ने दरवाज़े के पास जाकर झिरी से बाहर देखा।
एक बूढ़ी औरत गलियारे में खड़ी थी।
सफेद साड़ी, झुका हुआ शरीर और हाथ में पीतल की छोटी घंटी।
शारदा देवी।
आदमी पीछे हट गया।
“आप मर चुकी हैं।”
बाहर से आवाज़ आई, “तुमने मुझे मरते हुए देखा था?”
“आपका अंतिम संस्कार हुआ था।”
“तुमने मेरी लाश देखी थी?”
आदमी चुप रहा।
शारदा ने दरवाज़े पर हाथ रखा।
“तुम्हें भी तो यही लगता था कि तुम्हारा अंतिम संस्कार हो चुका है।”
आदमी ने दरवाज़ा खोल दिया।
शारदा देवी कमरे में आईं। उनके पैरों के नीचे कोई परछाईं नहीं थी।
उन्होंने कुर्सी पर बैठकर घंटी मेज़ पर रख दी।
“तुम यहाँ क्यों आए हो?”
आदमी ने कहा, “मुझे एक बच्चे को लेने आना था।”
“कौन-सा बच्चा?”
“वह जिसे 1995 में मृत घोषित किया गया था।”
शारदा ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हें यह किसने बताया?”
“नीलकंठ ने।”
“नीलकंठ मर चुका है।”
“उसकी आवाज़ अब भी मौजूद है।”
“आवाज़ और आदमी में फर्क होता है।”
आदमी ने गुस्से से कहा, “मुझे पहेलियाँ नहीं चाहिए। मैं जानना चाहता हूँ कि उस रात क्या हुआ था।”
शारदा देवी ने कुछ देर तक उसे देखा।
फिर बोलीं, “उस रात तीन बच्चे थे।”
“यह मुझे पता है।”
“नहीं। तुम्हें तीन नाम पता हैं। तीन बच्चों के बारे में तुमने सिर्फ कहानियाँ सुनी हैं। तुमने उनमें से किसी को अपनी आँखों से नहीं देखा।”
आदमी ने कहा, “मैंने एक बच्चे को देखा था।”
“तुमने उसकी परछाईं देखी थी।”
“वह मुझसे बात करता था।”
“तुम्हारी अपनी परछाईं भी तुमसे बात कर सकती है।”
आदमी की आवाज़ धीमी हो गई।
“तो वह असली नहीं था?”
शारदा ने सिर झुका लिया।
“असली क्या है, यह सवाल हमने बहुत देर से पूछा। हमें पूछना चाहिए था कि कौन किसकी याद में जीवित है।”
आदमी ने मेज़ पर मुट्ठी मारी।
“मुझे जवाब चाहिए!”
शारदा की आँखों में अचानक कठोरता आ गई।
“तो सुनो। 17 जुलाई 1995 की रात दो बच्चों की साँसें थीं और एक बच्चे की आवाज़। दो बच्चों के शरीर थे और एक बच्चे की परछाईं। हमने दो बच्चों के नाम लिखे और तीसरे का नाम मिटा दिया।”
“क्यों?”
“क्योंकि तीसरा बच्चा किसी का बेटा नहीं था।”
“फिर वह किसका था?”
शारदा ने बहुत धीरे से कहा—
“वह उस चीज़ का था, जिसे हमने आईने के भीतर बंद करने की कोशिश की थी।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
आदमी ने पूछा, “क्या वह परछाईं थी?”
“नहीं।”
“तो क्या था?”
शारदा ने उसकी आँखों में देखा।
“वह एक ऐसा जीवन था, जिसे पैदा होने के लिए किसी दूसरे जीवन की जगह चाहिए थी।”
आदमी को लगा कमरे की दीवारें उसके करीब आ रही हैं।
“और वह बच्चा किसकी जगह आया?”
शारदा ने उत्तर नहीं दिया।
उन्होंने सिर्फ उसकी कलाई की ओर देखा।
वहाँ तीन काली लकीरें थीं।
“तुम्हें अब जाना चाहिए।”
“मैं बिना जवाब लिए नहीं जाऊँगा।”
शारदा ने घंटी उठाई।
“तुम जवाब लेने नहीं आए थे। तुम उस बच्चे को वापस लेने आए थे।”
“कौन-सा बच्चा?”
शारदा ने दरवाज़े की तरफ देखा।
“जिसका शरीर अभी भी इस घर में है।”
उसी क्षण कमरे की घड़ी चलने लगी।
तीन बजकर चौदह मिनट।
शारदा देवी के चेहरे पर भय उतर आया।
“नहीं…”
घड़ी की सुइयाँ आगे बढ़ीं।
तीन बजकर पंद्रह मिनट।
तीन बजकर सोलह मिनट।
तीन बजकर सत्रह मिनट।
फिर घड़ी की टिक-टिक बंद हो गई।
शारदा ने फुसफुसाकर कहा—
“वह बाहर आ गया।”
### 4. वह बच्चा जो घर में नहीं था
आदमी और शारदा कमरे से बाहर निकले।
गलियारे में अँधेरा था। दूर से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आ रही थी। वह आवाज़ हवेली के किसी कमरे से नहीं, बल्कि दीवारों के भीतर से आती लग रही थी।
शारदा ने आदमी को तीसरी मंज़िल की तरफ जाने से रोक दिया।
“अगर वह तुम्हें पुकारे, तो जवाब मत देना।”
“क्यों?”
“क्योंकि वह तुम्हारी आवाज़ में तुम्हें ही बुलाएगा।”
“और अगर वह मेरा नाम जानता हो?”
“वह तुम्हारा नाम तुमसे पहले से जानता है।”
“और अगर वह मुझे पिता कहे?”
शारदा के कदम रुक गए।
उन्होंने धीरे-धीरे उसकी तरफ देखा।
“तो उसे बताना कि तुम उसके पिता नहीं हो।”
आदमी ने पूछा, “क्या मैं उसका पिता हूँ?”
शारदा ने उत्तर देने के बजाय उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम्हें याद है कि तुम पहली बार इस घर में कब आए थे?”
“आज।”
“नहीं। उससे पहले।”
आदमी ने सोचने की कोशिश की।
उसे एक पुराना कमरा याद आया। फर्श पर सफेद चादर। किसी औरत की रोने की आवाज़। एक आदमी, जो उसके सामने झुका हुआ था। और एक छोटा बच्चा, जो उसे देख रहा था।
बच्चे ने कहा था—
“पापा।”
उसके बाद कुछ नहीं।
आदमी ने सिर पकड़ लिया।
“मैं उसे जानता हूँ।”
शारदा ने कहा, “तुम उसे नहीं जानते। तुम्हें उसकी याद दी गई है।”
“किसने?”
“उसने।”
“किसने?”
शारदा ने तीसरी मंज़िल की ओर देखा।
“जिसका नाम तुम पूछ रहे हो।”
वे सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।
पहली सीढ़ी पर आदमी को अपने बचपन की आवाज़ सुनाई दी।
दूसरी पर उसे किसी औरत की हँसी सुनाई दी।
तीसरी पर किसी ने उसका नाम पुकारा।
“अभय…”
आदमी रुक गया।
शारदा ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
“मत सुनो।”
“उसने मुझे अभय कहा।”
“वह तुम्हें कोई भी नाम दे सकता है।”
“लेकिन अगर वही मेरा असली नाम हुआ तो?”
शारदा ने उसकी आँखों में देखा।
“तुम्हारा असली नाम वह नहीं है, जिसे तुम सुनकर पहचान लो। तुम्हारा असली नाम वह है, जिसे सुनते ही तुम याद करने लगो कि तुमने क्या किया था।”
आदमी ने अपना हाथ छुड़ा लिया।
“मुझे अब कुछ नहीं रोक सकता।”
वह ऊपर भागा।
शारदा उसके पीछे गईं, लेकिन जब वह तीसरी मंज़िल पर पहुँचा, तो वहाँ कोई कमरा नहीं था।
पूरा गलियारा एक अस्पताल के गलियारे में बदल चुका था।
दीवार पर सफेद टाइलें थीं। छत पर ट्यूब लाइटें थीं। दूर एक स्ट्रेचर खड़ा था। उसके ऊपर सफेद चादर पड़ी थी।
चादर के नीचे किसी आदमी की आकृति थी।
आदमी धीरे-धीरे स्ट्रेचर के पास गया।
उसने चादर हटाई।
नीचे उसकी अपनी लाश पड़ी थी।
इस बार लाश की कलाई पर तीन काली लकीरें नहीं थीं।
उसकी कलाई पर कोई निशान नहीं था।
उसने अपना चेहरा छुआ।
उसकी त्वचा पर तीन लकीरें थीं।
लाश की त्वचा पर नहीं।
वह पीछे हट गया।
दीवार पर लगी खिड़की के काँच में एक बच्चा दिखाई दिया। उसके हाथ में लाल गेंद थी। उसने काँच पर हथेली रखी।
“तुम मुझे लेने आए थे?”
आदमी ने कहा, “हाँ।”
“तो फिर तुम डर क्यों रहे हो?”
“क्योंकि मैं नहीं जानता कि तुम कौन हो।”
बच्चे ने मुस्कराकर कहा, “तुम जानते हो।”
“नहीं।”
“तुमने मुझे नाम दिया था।”
आदमी ने सिर हिलाया।
“मैंने तुम्हें कोई नाम नहीं दिया।”
“तुमने मुझे पहली बार देखा था।”
“कब?”
“जब तुम पैदा भी नहीं हुए थे।”
आदमी की साँस रुक गई।
बच्चे ने लाल गेंद काँच पर मारी।
टक।
“तुम्हें याद है, तुमने मुझे क्या कहा था?”
“नहीं।”
“तुमने कहा था—अगर तुम बाहर आ गए, तो मैं अंदर चला जाऊँगा।”
आदमी ने सिर हिलाया।
“मैंने ऐसा नहीं कहा।”
बच्चे ने गेंद फिर मारी।
टक।
“तो फिर तुम अंदर क्यों आए?”
काँच पर दरार फैल गई।
आदमी पीछे हट गया।
बच्चे ने तीसरी बार गेंद मारी।
टक।
काँच टूट गया।
लेकिन उसके टुकड़े बाहर गिरने के बजाय भीतर की ओर खिंच गए।
बच्चा खिड़की से बाहर निकला।
वह अब छोटा नहीं था। वह लगभग अट्ठाईस साल का था। उसके चेहरे पर आदमी का चेहरा था, मगर उसकी आँखों में किसी और की उम्र थी।
उसने आदमी का हाथ पकड़ लिया।
“चलो।”
“कहाँ?”
“घर।”
“यह घर ही तो है।”
“नहीं,” उसने कहा। “यह वह जगह है जहाँ तुमने मुझे छोड़ दिया था।”
आदमी ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की।
“मुझे छोड़ दो!”
दूसरे अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हें लगता है कि तुम मुझे लेने आए हो। लेकिन तुम मुझे लेने नहीं आए।”
“तो फिर क्यों आया हूँ?”
“क्योंकि तुम्हें याद दिलाना था कि तुम्हारी जगह कौन ले चुका है।”
अचानक अस्पताल का गलियारा गायब हो गया।
आदमी वापस शर्मा निवास की तीसरी मंज़िल पर खड़ा था।
उसके सामने आईना था।
आईने में एक ही चेहरा दिखाई दे रहा था।
उसका अपना।
लेकिन आईने के भीतर वाला आदमी उससे पहले मुस्करा रहा था।
### 5. असली अर्जुन की वापसी
अगली सुबह देवगढ़ की सड़क पर एक बस आकर रुकी।
बस से एक जवान आदमी उतरा। उसके कंधे पर बैग था, हाथ में फोन और चेहरे पर थकान। उसने चारों ओर देखा, जैसे पंद्रह साल बाद किसी जगह को पहचानने की कोशिश कर रहा हो।
वह अर्जुन शर्मा था।
उसने मोबाइल निकाला। स्क्रीन पर माँ की मिस्ड कॉल थी।
उसने फोन लगाया।
“माँ, मैं पहुँच गया हूँ।”
दूसरी तरफ कुछ देर सन्नाटा रहा।
फिर माँ की आवाज़ आई।
“कहाँ हो तुम?”
“देवगढ़ में।”
“तुमने घर के भीतर कदम तो नहीं रखा?”
अर्जुन ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“अभी नहीं। बस से उतरा हूँ।”
“फाटक से दूर रहो।”
“माँ, क्या हुआ है?”
“अर्जुन, मेरी बात ध्यान से सुनो। अगर तुम्हें घर के बाहर कोई आदमी खड़ा दिखाई दे, तो उससे बात मत करना।”
अर्जुन ने सड़क के दूसरी तरफ देखा।
एक आदमी खड़ा था।
उसने हल्की नीली कमीज़ पहन रखी थी। उसके हाथ में चमड़े का बैग था। वह शर्मा निवास की दिशा में देख रहा था।
अर्जुन ने फोन कान से हटाकर उस आदमी को आवाज़ दी।
“सुनिए!”
आदमी ने सिर घुमाया।
उसका चेहरा अर्जुन जैसा था।
अर्जुन के हाथ से फोन गिर गया।
दूसरी तरफ से माँ की आवाज़ सुनाई देती रही—
“अर्जुन? अर्जुन, तुम सुन रहे हो?”
सड़क पर खड़ा आदमी मुस्कराया।
“तुम देर से आए।”
अर्जुन ने पीछे हटकर कहा, “तुम कौन हो?”
“तुम्हें मेरा नाम पता है।”
“नहीं।”
“तुमने मुझे सपना समझा था।”
“मैं तुम्हें नहीं जानता।”
आदमी ने अपना बैग खोला।
उसमें एक पुरानी जेब-घड़ी थी। घड़ी की सुइयाँ तीन बजकर तेरह मिनट पर रुकी हुई थीं।
अर्जुन ने घड़ी देखते ही अपने सिर में दर्द महसूस किया।
उसके सामने एक दृश्य चमका।
एक छोटा बच्चा।
अँधेरा कमरा।
बंद दरवाज़ा।
और एक आवाज़—
“भैया, मुझे बाहर निकालो।”
अर्जुन ने दोनों हाथों से सिर पकड़ लिया।
सड़क पर खड़े आदमी ने कहा, “तुम्हें याद आने लगा है।”
“तुम कौन हो?”
“मैं वह हूँ, जिसे तुमने बचाने का वादा किया था।”
“मैंने कोई वादा नहीं किया!”
“तुमने कहा था कि तुम वापस आओगे।”
“मैं तुम्हें नहीं जानता!”
आदमी की मुस्कान गायब हो गई।
“तुम्हें नहीं जानना चाहिए था। यही तो उन्होंने तुम्हारे साथ किया।”
अर्जुन ने काँपती आवाज़ में पूछा, “किसने?”
आदमी ने हवेली की तरफ देखा।
“तुम्हारे परिवार ने।”
अर्जुन ने फोन उठाने की कोशिश की।
लेकिन फोन की स्क्रीन पर उसकी माँ का नंबर नहीं था।
वहाँ एक तस्वीर थी।
उस तस्वीर में अर्जुन, विक्रम और शारदा खड़े थे। उनके पीछे राधा थी। सामने दो बच्चे थे। एक बच्चा अर्जुन जैसा था। दूसरा भी अर्जुन जैसा था।
तस्वीर के पीछे हाथ से लिखा था—
**“17 जुलाई 1995। एक बच्चा घर आया। एक बच्चा घर में रह गया।”**
अर्जुन ने सिर उठाया।
सड़क पर खड़ा आदमी अब वहाँ नहीं था।
उसकी जगह एक छोटी लाल गेंद पड़ी थी।
अर्जुन ने गेंद उठाई।
उस पर काले अक्षरों में लिखा था—
**“भैया।”**
उसने गेंद छोड़ दी।
वह सड़क पर लुढ़कती हुई शर्मा निवास के फाटक तक पहुँची।
फाटक अपने आप खुल गया।
अर्जुन ने माँ को दोबारा फोन लगाया।
इस बार माँ ने तुरंत फोन उठाया।
“अर्जुन! तुम कहाँ हो?”
“मैं फाटक के सामने हूँ।”
“अंदर मत जाना!”
“माँ, यहाँ कोई था।”
“मैं जानती हूँ।”
“उसका चेहरा मेरे जैसा था।”
दूसरी तरफ से माँ की साँस तेज़ हो गई।
“उसने तुमसे बात की?”
“हाँ।”
“उसने तुम्हें क्या कहा?”
अर्जुन ने कुछ क्षण सोचा।
“उसने कहा कि मैं देर से आया।”
माँ रोने लगीं।
“हे भगवान…”
“माँ, वह कौन है?”
“तुम्हारा कोई नहीं।”
“उसने कहा कि मैं उसे बचाने वापस आया था।”
माँ की आवाज़ अचानक कठोर हो गई।
“उसने झूठ कहा।”
“फिर सच क्या है?”
कुछ देर तक माँ चुप रहीं।
फिर उन्होंने कहा—
“सच यह है कि जिस दिन तुम पैदा हुए थे, उसी दिन तुम घर नहीं आए थे।”
अर्जुन के पैरों के नीचे की ज़मीन जैसे खिसक गई।
“क्या मतलब?”
“शारदा देवी तुम्हें अस्पताल से लेकर आई थीं। लेकिन जिस बच्चे को वह घर लाई थीं, उसके साथ एक और बच्चा था।”
“दूसरा बच्चा कहाँ गया?”
माँ ने जवाब नहीं दिया।
अर्जुन ने फिर पूछा, “माँ, दूसरा बच्चा कहाँ गया?”
दूसरी तरफ से बहुत धीमी आवाज़ आई—
“वह कभी अस्पताल से बाहर आया ही नहीं।”
“तो फिर सड़क पर जो आदमी था, वह कौन था?”
माँ की साँस अटक गई।
फिर उन्होंने फुसफुसाकर कहा—
“अर्जुन, अगर वह तुम्हारे जैसा दिखता था, तो वह आदमी नहीं था।”
“तो क्या था?”
माँ ने कहा—
“वह तुम्हारी वह याद थी, जिसे हमने तुम्हारे शरीर से निकालकर आईने में बंद कर दिया था।”
फोन कट गया।
अर्जुन फाटक के सामने अकेला खड़ा रहा।
उसने नीचे देखा।
लाल गेंद गायब थी।
उसकी जगह मिट्टी पर दो जोड़ी पैरों के निशान थे।
एक जोड़ी फाटक से बाहर की ओर जा रही थी।
दूसरी जोड़ी भीतर की ओर।
दोनों के पैरों का आकार बिल्कुल एक जैसा था।
अर्जुन ने फाटक की तरफ देखा।
भीतर से किसी बच्चे ने कहा—
“भैया, अब आ भी जाओ।”
अर्जुन ने फाटक पार कर लिया।
उसे नहीं पता था कि वह घर लौट रहा है।
या उस जगह जा रहा है जहाँ से वह कभी बाहर आया ही नहीं था।
### 6. दो प्रवेश, एक घर
शर्मा निवास के भीतर कदम रखते ही अर्जुन को अजीब-सी ठंड महसूस हुई।
घर में सब कुछ वैसा ही था जैसा उसे बचपन से याद था—दीवार पर लगी घड़ी, बरामदे में रखा टूटा झूला, सीढ़ियों के पास की लकड़ी की अलमारी और सामने दीवार पर टँगी शारदा देवी की तस्वीर।
लेकिन तस्वीर में एक फर्क था।
शारदा देवी अकेली नहीं थीं।
उनके बगल में एक बच्चा खड़ा था।
उस बच्चे के चेहरे पर काली स्याही लगी थी।
अर्जुन ने तस्वीर उतारी।
पीछे लिखा था—
“जो बच्चा घर आया, वह अर्जुन था। जो बच्चा घर में रह गया, वह भी अर्जुन था।”
उसके नीचे दूसरी लिखावट थी—
“दोनों को अलग करने के लिए हमने एक को नाम दिया और दूसरे को मृत्यु।”
अर्जुन ने कागज़ मोड़कर जेब में रख लिया।
तभी ऊपर से कदमों की आवाज़ आई।
कोई तीसरी मंज़िल से उतर रहा था।
अर्जुन ने सिर उठाया।
सीढ़ियों पर एक आदमी दिखाई दिया। वह उसी के जैसा था। उसके हाथ में चमड़े का बैग था। उसके चेहरे पर थकान थी, और कलाई पर तीन काली लकीरें थीं।
“तुम फिर आ गए,” अर्जुन ने कहा।
आदमी ने सिर हिलाया।
“मैं गया ही कब था?”
“तुमने कल रात मुझे फाटक पर देखा था?”
“मैंने तुम्हें उससे पहले देखा था।”
“कहाँ?”
“जब तुमने पहली बार आँखें खोली थीं।”
अर्जुन ने सीढ़ियों पर चढ़ने की कोशिश की।
आदमी ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।
“एक बात बताओ।”
“क्या?”
“तुम्हें अपनी पहली याद क्या है?”
अर्जुन ने कहा, “माँ की गोद।”
“गलत।”
“विक्रम की आवाज़।”
“गलत।”
“शारदा देवी का चेहरा।”
“फिर गलत।”
अर्जुन ने गुस्से से कहा, “तो तुम बताओ!”
आदमी ने धीरे से कहा—
“तुम्हारी पहली याद एक बंद दरवाज़ा है।”
अर्जुन के भीतर कुछ काँपा।
“और दूसरी याद?”
“एक बच्चा, जो दूसरी तरफ खड़ा है।”
“तीसरी?”
आदमी ने अपनी कलाई दिखाई।
“तुम्हारे हाथ पर ये तीन लकीरें नहीं थीं।”
अर्जुन ने अपनी कलाई देखी।
वहाँ त्वचा सामान्य थी।
लेकिन जैसे ही उसने दोबारा देखा, तीन काली लकीरें उभर आईं।
वह चीखकर पीछे हट गया।
आदमी ने कहा, “तुम्हें लगता है कि तुम मुझे देखकर डर रहे हो। लेकिन मैं तुम्हें देखकर डरता हूँ।”
“क्यों?”
“क्योंकि तुम हर बार लौटते हो, और हर बार भूल जाते हो कि तुम किसे लेने आए थे।”
“मैं किसी को लेने नहीं आया!”
आदमी ने सिर झुका लिया।
“यही बात तुमने पिछली बार भी कही थी।”
उसने बैग खोला और एक कागज़ बाहर निकाला।
कागज़ पर अस्पताल का एक पुराना रिकॉर्ड था। ऊपर लिखा था—
**जन्म एवं मृत्यु रजिस्टर — देवगढ़ मातृत्व केंद्र।**
नीचे दो प्रविष्टियाँ थीं।
पहली—
नाम: अर्जुन शर्मा।
जन्म समय: 17 जुलाई 1995, 3:13 AM।
स्थिति: जीवित।
दूसरी—
नाम: अर्जुन शर्मा।
जन्म समय: दर्ज नहीं।
स्थिति: जन्म से पूर्व मृत्यु।
अर्जुन ने रिकॉर्ड छीन लिया।
“एक ही नाम दो बार क्यों है?”
आदमी ने कहा, “क्योंकि उस रात किसी ने दो बच्चों को अलग-अलग नाम देने की कोशिश की थी।”
“फिर दोनों का नाम अर्जुन क्यों रखा?”
“क्योंकि किसी ने तुम्हारा नाम सुन लिया था।”
“किसने?”
आदमी ने तीसरी मंज़िल की ओर देखा।
“जिसे तुमने दरवाज़े के पीछे छोड़ा था।”
अर्जुन ने कागज़ फाड़ने की कोशिश की।
लेकिन कागज़ नहीं फटा।
उस पर लिखे अक्षर बदलने लगे।
पहली प्रविष्टि में नाम मिट गया।
दूसरी प्रविष्टि में नाम उभरा।
**अभय शर्मा।**
फिर वह भी मिट गया।
उसकी जगह लिखा आया—
**अर्णव शर्मा।**
फिर—
**ईशान।**
और आखिर में—
**अर्जुन।**
अर्जुन ने कागज़ फेंक दिया।
“बस करो!”
आदमी ने कहा, “तुम्हें नाम नहीं चाहिए। तुम्हें यह जानना है कि तुम्हारी जगह कौन जी रहा है।”
“क्या तुम मेरी जगह जी रहे हो?”
आदमी ने उसकी तरफ देखा।
“नहीं।”
“तो कौन?”
सीढ़ियों के ऊपर से एक और आवाज़ आई।
“मैं।”
दोनों ने सिर उठाया।
तीसरी मंज़िल पर एक बच्चा खड़ा था।
उसका चेहरा अर्जुन जैसा था।
उसके पैरों के नीचे कोई परछाईं नहीं थी।
बच्चे ने कहा—
“मैं तुम्हारी जगह जी रहा हूँ।”
अर्जुन ने उसे देखा।
“तुम कौन हो?”
बच्चे ने मुस्कराकर जवाब दिया—
“मैं वह हूँ, जो तुम्हारे घर आने से पहले ही यहाँ रहता था।”
फिर उसने हाथ उठाकर अपनी कलाई दिखाई।
तीन काली लकीरें।
“और तुम वह हो, जिसे मेरे घर में भेज दिया गया था।”
### 7. रात का आखिरी कमरा
अर्जुन सीढ़ियों की ओर दौड़ा।
बच्चा पीछे नहीं हटा। वह बस वहीं खड़ा रहा, जैसे उसे पहले से पता हो कि अर्जुन क्या करने वाला है।
अर्जुन ने तीसरी मंज़िल पर पहुँचकर उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम कौन हो?”
बच्चे ने उसकी पकड़ की ओर देखा।
“तुम्हें डर लग रहा है?”
“जवाब दो!”
“तुम मुझे छू सकते हो।”
अर्जुन ने उसकी बाँह कसकर पकड़ी।
बच्चे की त्वचा गर्म थी। उसके हाथ में नब्ज़ चल रही थी।
वह जीवित था।
या कम से कम जीवित होने जैसा था।
“तुम इंसान हो?” अर्जुन ने पूछा।
बच्चे ने सिर झुकाया।
“तुम्हें क्या लगता है?”
“तुम मेरे जैसे दिखते हो।”
“तुम भी मेरे जैसे दिखते हो।”
“कौन पहले आया?”
बच्चे ने मुस्कराकर कहा—
“मैं।”
अर्जुन ने उसे झकझोर दिया।
“झूठ!”
बच्चे की आँखें काली होने लगीं।
“तुम्हें हमेशा यही लगता है कि जो तुमसे पहले था, वह झूठ बोल रहा है।”
अर्जुन ने उसका हाथ छोड़ दिया।
बच्चे ने तीसरी मंज़िल के आखिरी दरवाज़े की ओर इशारा किया।
“वहाँ चलो।”
“कहाँ?”
“जहाँ तुमने मुझे छोड़ा था।”
अर्जुन ने दरवाज़े की ओर देखा।
उस पर कोई ताला नहीं था।
बस लकड़ी पर नाखूनों से खरोंचे गए कई नाम थे।
अभय।
अर्णव।
ईशान।
विहान।
अर्जुन।
हर नाम पर गहरी रेखाएँ खींची गई थीं।
सबसे नीचे एक खाली जगह थी।
बच्चे ने कहा, “वहाँ तुम्हारा नाम लिखा था।”
“मेरा नाम अर्जुन है।”
“वह नाम जो तुम्हें दिया गया।”
“और मेरा असली नाम?”
बच्चे ने उसकी तरफ देखा।
“वह नाम जिसे तुमने किसी और से छीन लिया।”
अर्जुन ने दरवाज़ा खोल दिया।
कमरे के भीतर कोई आईना नहीं था।
कोई खिड़की नहीं थी।
कोई फर्नीचर नहीं था।
सिर्फ एक छोटा पालना था।
उसके भीतर सफेद कपड़े में लिपटा एक बच्चा सो रहा था।
अर्जुन धीरे-धीरे उसके पास गया।
बच्चे की आँखें बंद थीं। उसके चेहरे पर शांति थी। उसकी छाती बहुत धीरे-धीरे उठ रही थी।
अर्जुन ने हाथ बढ़ाकर कपड़ा हटाया।
बच्चे की कलाई पर तीन काली लकीरें थीं।
उसके चेहरे पर अर्जुन की शक्ल थी।
अर्जुन पीछे हट गया।
“यह कौन है?”
पीछे खड़े बच्चे ने कहा—
“वह, जिसे तुमने पहली बार देखा था।”
“लेकिन यह तो नवजात है।”
“हाँ।”
“मैंने इसे कब देखा?”
बच्चे ने उत्तर दिया—
“तुम पैदा होने से पहले।”
अर्जुन ने पालने की ओर देखा।
नवजात की आँखें खुल गईं।
उनमें पुतलियाँ नहीं थीं।
सिर्फ काला रंग।
बच्चे ने मुस्कराकर कहा—
“अब तुम समझे कि मैं तुम्हारी जगह क्यों चाहता हूँ?”
अर्जुन ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“क्योंकि तुमने मेरा जीवन नहीं लिया था।”
बच्चे ने पालने की ओर इशारा किया।
“तुमने मेरा जन्म ले लिया था।”
कमरे की दीवारों पर दरारें फैलने लगीं।
नीचे से मीरा की आवाज़ आई—
“अर्जुन भैया! बाहर आओ!”
अर्जुन ने दरवाज़े की ओर देखा।
बच्चा पालने से बाहर निकल आया था।
उसने अर्जुन का हाथ पकड़ा।
“मत जाओ।”
“मुझे छोड़ दो।”
“तुम फिर मुझे छोड़कर चले जाओगे।”
“मैं तुम्हें नहीं जानता!”
बच्चे की आँखों से काला पानी बहने लगा।
“तुम मुझे हर बार भूल जाते हो।”
“मैंने तुम्हारे साथ कुछ नहीं किया!”
बच्चे ने सिर उठाकर उसकी आँखों में देखा।
“तो फिर तुमने मेरी माँ को क्यों चुना?”
अर्जुन का शरीर जम गया।
“क्या?”
“तुमने उसे माँ कहा। तुमने उसकी गोद में सिर रखा। तुमने उसे अपना नाम दिया। तुमने उससे कहा कि तुम कभी उसे छोड़कर नहीं जाओगे।”
बच्चे की आवाज़ टूटने लगी।
“लेकिन वह मेरी माँ थी।”
अर्जुन के भीतर किसी ने दरवाज़ा खटखटाया।
ठक।
ठक।
ठक।
और फिर चौथी दस्तक।
अर्जुन ने अपना हाथ छुड़ाया और कमरे से बाहर भागा।
मीरा सीढ़ियों पर खड़ी थी। उसने उसे पकड़ लिया।
“भैया, जल्दी!”
“वह बच्चा…”
“मैं जानती हूँ!”
“वह कहता है कि मैंने उसकी माँ छीन ली।”
मीरा की आँखों में आँसू आ गए।
“शायद उसने सच कहा।”
अर्जुन ने उसे देखा।
“तुम भी?”
मीरा ने सिर झुका लिया।
“मुझे नहीं पता कि तुमने क्या किया था। लेकिन मैं जानती हूँ कि उस रात एक बच्चा अपनी माँ से अलग हुआ था।”
“कौन-सा बच्चा?”
मीरा ने तीसरी मंज़िल के अँधेरे की ओर देखा।
“वह बच्चा, जिसे हमने कभी नाम नहीं दिया।”
पीछे कमरे का दरवाज़ा बंद हो गया।
भीतर से बच्चे की आवाज़ आई—
“अगली बार जब लौटोगे, भैया, तो माँ मेरे साथ होगी।”
अर्जुन ने दरवाज़े की तरफ कदम बढ़ाया।
मीरा ने उसे रोक लिया।
“नहीं!”
“मुझे उसे बाहर निकालना होगा!”
“तुम उसे बाहर निकालोगे तो कोई और भीतर चला जाएगा!”
“कौन?”
मीरा ने उसके सीने पर हाथ रखा।
“तुम्हें क्या लगता है, भैया? इतने सालों से तुम्हारे भीतर कौन दस्तक दे रहा है?”
अर्जुन चुप हो गया।
उसने अपने सीने पर हाथ रखा।
दिल धड़क रहा था।
लेकिन अब हर धड़कन के बीच उसे एक बच्चे की साँस सुनाई दे रही थी।
वह साँस जो कभी शुरू नहीं हुई थी।
और फिर भी पंद्रह साल से उसके भीतर जीवित थी।
### 8. वह आदमी जो अगले दिन गायब हो गया
अगली सुबह जब शर्मा निवास का मुख्य दरवाज़ा खुला, तो घर में कोई नहीं था।
बरामदे में धूल जमी थी। सीढ़ियों पर सूखे पत्ते थे। तीसरी मंज़िल का दरवाज़ा बंद था। ऐसा लगता था जैसे हवेली कई दिनों से खाली पड़ी हो।
लेकिन मुख्य दरवाज़े के सामने एक चमड़े का बैग रखा था।
बैग के भीतर पुरानी जेब-घड़ी थी।
घड़ी की सुइयाँ अब चल रही थीं।
तीन बजकर तेरह मिनट से आगे बढ़कर वे चार बजकर सत्रह मिनट पर आकर रुकीं।
बैग के भीतर एक कागज़ भी था।
उस पर लिखा था—
“मैंने उस बच्चे को लेने की कोशिश की। लेकिन वह बच्चा नहीं था। वह मेरी याद था। और मेरी याद वह नहीं थी, जिसे मैं भूल चुका था। वह वह याद थी, जिसे किसी ने मेरे भीतर डाल दिया था।”
नीचे कोई हस्ताक्षर नहीं था।
सिर्फ तीन काली लकीरें थीं।
उस दिन दोपहर में गाँव के एक बूढ़े चौकीदार ने शर्मा निवास का फाटक बंद किया। उसने बताया कि सुबह उसने एक आदमी को हवेली से बाहर निकलते देखा था।
“कौन आदमी?” गाँव के एक दुकानदार ने पूछा।
“अर्जुन जैसा दिखता था।”
“अर्जुन तो कल ही आया है।”
चौकीदार ने सिर हिलाया।
“नहीं। वह उससे पहले आया था।”
“कितने बजे?”
“रात को।”
“कहाँ गया?”
चौकीदार ने सड़क की तरफ इशारा किया।
“पुराने कुएँ की ओर।”
दुकानदार ने पूछा, “वहाँ क्या करने?”
चौकीदार ने बहुत धीरे से कहा—
“अपनी लाश लेने।”
उस शाम गाँव के कुछ लोग पुराने कुएँ के पास पहुँचे।
कुएँ के भीतर पानी नहीं था।
नीचे कीचड़ भी नहीं थी।
सिर्फ सूखी मिट्टी थी और दीवार पर नाखूनों से खरोंचा गया एक वाक्य—
**“एक बच्चा घर लौटा था। दूसरा बच्चा घर से निकला था।”**
उसके नीचे एक तारीख लिखी थी—
**16 जुलाई 2023।**
और तारीख के नीचे एक नाम था।
वह नाम मिटाया नहीं गया था।
वह साफ़ लिखा था।
**अर्जुन शर्मा।**
लेकिन गाँव के किसी आदमी ने उसे पढ़ने के बाद स्वीकार नहीं किया कि वह नाम वहाँ लिखा था।
क्योंकि हर बार जब कोई उसे पढ़ता, उसे लगता कि वहाँ किसी और का नाम लिखा है।
किसी ऐसे आदमी का, जिसे वह बचपन से जानता था।
किसी ऐसे आदमी का, जिसे वह कभी मिला ही नहीं।
और किसी ऐसे आदमी का, जो उसके जन्म से पहले मर चुका था।
उस रात शर्मा निवास की तीसरी मंज़िल पर आईना अपने आप खुल गया।
आईने में दो अर्जुन खड़े थे।
एक बाहर।
एक भीतर।
भीतर वाला अर्जुन मुस्कराया।
“अब तुम्हें याद आने लगा है।”
बाहर वाले अर्जुन ने पूछा—
“तुम कौन हो?”
भीतर वाले ने कहा—
“मैं वह हूँ, जो कल तुम्हारे साथ देवगढ़ आया था।”
“और मैं कौन हूँ?”
आईने के भीतर वाले अर्जुन ने सिर झुका लिया।
“तुम वह हो, जो कल घर से बाहर निकलेगा।”
बाहर वाला अर्जुन पीछे हट गया।
“किसलिए?”
भीतर वाले ने अपना हाथ आईने पर रखा।
“क्योंकि कल रात तुम्हारी माँ लौटेगी।”
“मेरी माँ?”
“हाँ।”
“कौन-सी माँ?”
आईने के भीतर वाला अर्जुन मुस्कराया।
“यही तो तुम्हें पता करना है।”
उसने काँच पर उँगली से चार छोटे निशान बनाए।
पहला निशान एक पालने जैसा था।
दूसरा एक दरवाज़े जैसा।
तीसरा एक बच्चे की कलाई जैसा।
चौथा एक कब्र जैसा।
फिर उसने नीचे लिखा—
**“जिस रात अर्जुन घर लौटा, उस रात किसी और को घर से निकाल दिया गया था।”**
और कमरे में चौथी दस्तक सुनाई दी।
ठक।
इस बार आवाज़ आईने के भीतर से नहीं आई।
वह मुख्य दरवाज़े से आई थी।
किसी ने बाहर खड़े होकर कहा—
“अर्जुन बेटा, दरवाज़ा खोलो।”
वह आवाज़ विक्रम शर्मा की थी।
लेकिन विक्रम शर्मा की मृत्यु को दस साल हो चुके थे।
और घर के भीतर खड़ा अर्जुन जानता था कि इस बार आवाज़ की नकल करने वाला कोई परछाईं नहीं था।
इस बार बाहर खड़ा आदमी सचमुच विक्रम था।
या वह आदमी, जिसे 1995 में विक्रम कहा गया था।
दरवाज़े के बाहर से फिर आवाज़ आई—
“बेटा, इस बार मैं तुम्हें लेने आया हूँ।”
अर्जुन ने दरवाज़े की ओर कदम बढ़ाया।
आईने के भीतर खड़े दूसरे अर्जुन ने अचानक चीखकर कहा—
“मत खोलना!”
अर्जुन रुक गया।
“क्यों?”
भीतर वाले अर्जुन ने अपनी कलाई दिखाई।
तीन काली लकीरें अब खून से भरी थीं।
“क्योंकि बाहर जो खड़ा है, वह तुम्हारा पिता नहीं है।”
दरवाज़े के बाहर से हँसी सुनाई दी।
फिर विक्रम की आवाज़ ने कहा—
“बिल्कुल सही।”
एक पल की चुप्पी।
“मैं तुम्हारा पिता नहीं हूँ।”
अर्जुन ने साँस रोक ली।
बाहर से अगला वाक्य आया—
“मैं तुम्हारा बेटा हूँ।”
तीसरी मंज़िल की सारी दीवारों पर एक साथ दरारें फैल गईं।
आईने के भीतर खड़े दोनों अर्जुनों ने एक-दूसरे की ओर देखा।
और पहली बार दोनों के चेहरे पर एक ही डर था।
क्योंकि अगर बाहर खड़ा आदमी अर्जुन का बेटा था, तो इसका मतलब था कि कहानी अभी तक अतीत और वर्तमान के बीच नहीं चल रही थी।
कहानी भविष्य से भी शुरू हो चुकी थी।
और भविष्य में कोई ऐसा बच्चा था, जिसे जन्म देने से पहले ही मृत घोषित कर दिया गया था।
**एपिसोड 21 समाप्त।**
- Writer
- firoj saifi
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- “अंधेरे में कोई है”
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- Reading time
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- Words
- 6086
- Language
- Hindi (हिंदी)
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