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एपिसोड 20: जन्म से पहले मरने वाले बच्चे की गवाही
firoj saifi · Ghost Stories · 38 मिनट
एपिसोड 20: जन्म से पहले मरने वाले बच्चे की गवाही
1. चौथी दस्तक
“बेटा, दरवाज़ा खोलो। मैं तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ।”
आवाज़ आईने के भीतर से नहीं, अर्जुन के सीने के भीतर से आई थी।
वह तीसरी मंज़िल के बीचोंबीच खड़ा था। उसके सामने वही विशाल आईना था, जिसकी सतह कभी काली पड़ जाती थी, कभी पानी की तरह हिलने लगती थी और कभी उसमें ऐसी जगहें दिखाई देती थीं जो शर्मा निवास में कभी मौजूद ही नहीं थीं।
आईने में तीन अर्जुन खड़े थे।
पहला लगभग आठ साल का बच्चा था। उसके पैरों में मिट्टी लगी थी और दाहिनी कलाई पर तीन काली लकीरें थीं। दूसरा अर्जुन जैसा ही था—अट्ठाईस साल का, थका हुआ, आँखों के नीचे गहरे घेरे और चेहरे पर उन पंद्रह सालों का बोझ, जिन्हें वह ठीक से याद भी नहीं कर पाता था। तीसरा बहुत बूढ़ा था। उसके बाल सफेद थे, चेहरा झुर्रियों से भरा था, मगर आँखें अर्जुन की थीं।
बूढ़े अर्जुन ने कुछ देर पहले आईने पर उँगली से लिखा था—
**“उनमें से किसी को मत चुनना।”**
उसके नीचे एक और वाक्य उभरा था—
**“क्योंकि तुम्हारे पिता उन तीनों में से कोई नहीं हैं।”**
अर्जुन ने अपनी हथेली सीने पर रखी।
उसका दिल धड़क रहा था, लेकिन हर धड़कन के बीच उसे एक दूसरी आवाज़ सुनाई दे रही थी।
ठक।
ठक।
ठक।
और फिर एक लंबा अंतराल।
ठक।
चौथी दस्तक।
“कौन है?” अर्जुन के मुँह से निकला।
आईने में खड़े तीनों चेहरों ने एक साथ अपना सिर उठाया।
बच्चे ने कहा, “तुमने फिर पूछ लिया।”
जवान अर्जुन ने कहा, “अब यह तुम्हें ढूँढ़ लेगा।”
बूढ़े अर्जुन ने अपने होंठ बंद रखे। उसने सिर्फ अपना हाथ उठाया और हथेली आईने पर रख दी।
उसकी हथेली के नीचे काँच पर दरारें फैलने लगीं।
“तुम कौन हो?” अर्जुन ने पूछा।
इस बार आवाज़ उसके सीने के भीतर से आई।
“जिसे तुमने कभी देखा नहीं। जिसे तुम्हारी माँ ने जन्म देने से पहले खो दिया था। जिसे तुम्हारे पिता ने नाम देने से पहले मार दिया था।”
अर्जुन का गला सूख गया।
“मेरे पिता कौन हैं?”
कुछ क्षण तक कोई जवाब नहीं आया।
फिर आईने के भीतर का बूढ़ा अर्जुन मुस्कराया।
“यही सवाल तुम्हें हमेशा गलत दरवाज़े तक ले जाता है।”
अचानक नीचे से किसी के दौड़ने की आवाज़ आई। सीढ़ियों पर तेज़ कदम पड़े। मीरा तीसरी मंज़िल पर पहुँची तो उसकी साँस फूल रही थी। उसके हाथ में पीतल की छोटी घंटी थी, वही घंटी जो कई बार परछाईं को कुछ पल के लिए रोक चुकी थी।
“अर्जुन भैया, पीछे हटो!”
उसने घंटी बजाई।
टन्न्न…
आवाज़ कमरे में फैली, लेकिन आईने में कोई बदलाव नहीं आया। तीनों अर्जुन वहीं खड़े रहे। इस बार काली आँखों वाला बच्चा भी नहीं हिला।
मीरा ने दूसरी बार घंटी बजाई।
कुछ नहीं हुआ।
उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
“यह कैसे हो सकता है?”
“तुमने कहा था, यह घंटी उसे रोक सकती है।”
“उसे रोक सकती है,” मीरा ने काँपती आवाज़ में कहा, “लेकिन अगर वह यहाँ नहीं है तो?”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“क्या मतलब?”
मीरा ने घंटी को कसकर पकड़ लिया।
“अगर यह आवाज़ किसी परछाईं की नहीं है… अगर यह उस चीज़ की आवाज़ है जो इस घर में आने से पहले ही यहाँ थी… तो घंटी का इस पर कोई असर नहीं होगा।”
उसी क्षण कमरे के कोने में रखी पुरानी घड़ी चल पड़ी।
उसकी सुइयाँ उल्टी दिशा में घूम रही थीं।
तीन बजकर तेरह मिनट।
फिर तीन बजकर बारह मिनट।
फिर तीन बजकर ग्यारह मिनट।
और फिर घड़ी की सुइयाँ सीधे पीछे की ओर घूमते हुए एक ऐसी जगह आकर रुक गईं, जहाँ घड़ी के अंक धुँधले हो गए।
उस धुँधलेपन में एक तारीख उभरी—
**16 जुलाई 1995।**
अर्जुन ने घड़ी के पास जाकर देखा।
“सत्रह जुलाई को मेरी जन्मतिथि बताई गई थी,” उसने कहा। “लेकिन यह उससे एक दिन पहले की तारीख क्यों दिखा रही है?”
मीरा ने आईने की ओर देखा।
“क्योंकि तुम्हारी कहानी जन्म से शुरू नहीं होती, भैया।”
उसने धीरे से कहा, “यह उस रात से शुरू होती है, जब किसी ने तुम्हारे पैदा होने से पहले ही तुम्हारी मौत दर्ज कर दी थी।”
आईने में खड़े बच्चे ने पहली बार अपना मुँह खोला।
उसके दाँतों के बीच से खून नहीं, काली राख बह रही थी।
“मेरी गवाही सुनोगे?”
कमरे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।
और शर्मा निवास में मौजूद हर घड़ी एक साथ रुक गई।
तीन बजकर तेरह मिनट।
### 2. वह कमरा जहाँ कोई पैदा नहीं हुआ
आईने की सतह पर धीरे-धीरे एक सफेद दीवार उभरने लगी।
उसके बाद दूसरी।
फिर छत पर लगी ट्यूब लाइट, जिसके चारों ओर छोटे-छोटे कीड़े घूम रहे थे। दीवार के एक कोने में पुराना कैलेंडर टँगा था। उस पर जुलाई 1995 का महीना था। सोलह तारीख के नीचे लाल पेन से एक गोला बना था, और सत्रह जुलाई के खाने पर किसी ने तीन काली लकीरें खींच रखी थीं।
कमरा किसी अस्पताल जैसा था, लेकिन वहाँ दवाइयों की गंध नहीं थी।
वहाँ गीली मिट्टी, पुराने लोहे और बंद कमरे में लंबे समय तक रखे पानी जैसी गंध थी।
एक मेज़ पर कागज़ फैले थे। दीवार के पास तीन छोटे पालने रखे थे।
पहले पालने में एक बच्चा सो रहा था।
दूसरा पालना खाली था।
तीसरे पालने के ऊपर सफेद कपड़ा पड़ा था।
उस कपड़े के नीचे किसी चीज़ की आकृति दिखाई दे रही थी।
अर्जुन ने आईने की ओर कदम बढ़ाया।
“यह कहाँ है?”
“जहाँ तुम्हें कभी ले जाया नहीं गया,” मीरा ने कहा।
“लेकिन यह जगह असली है?”
“मैं अब इस सवाल का जवाब नहीं दे सकती।”
आईने के भीतर कमरे का दरवाज़ा खुला।
डॉक्टर जैसा दिखने वाला एक आदमी अंदर आया। उसके बाल पीछे की ओर कंघी किए हुए थे, मूँछें पतली थीं और आँखों पर गोल चश्मा था। उसने सफेद कोट पहन रखा था। उसके हाथ में एक फाइल थी।
अर्जुन ने उसे देखते ही पहचान लिया।
“डॉ. नीलकंठ।”
वही नाम जो विक्रम की डायरी में लिखा था। वही नाम जो कई दस्तावेज़ों में काट दिया गया था। वही आदमी जिसकी आवाज़ पुराने कुएँ के नीचे मिले रिकॉर्ड में सुनाई दी थी।
लेकिन इस बार वह जवान था।
उसने फाइल मेज़ पर रखी और घड़ी देखी।
“अभी तक नहीं आया?” उसने पूछा।
कमरे के बाहर से शारदा देवी की आवाज़ आई।
“आ जाएगा।”
“आपने कहा था कि बच्चा मर चुका है।”
“मैंने कहा था कि उसकी धड़कन बंद हो गई थी।”
“दोनों में फर्क नहीं होता, शारदा जी।”
“इस घर में होता है, डॉक्टर साहब।”
दरवाज़ा खुला।
विक्रम शर्मा अंदर आया। उसके चेहरे पर पसीना था और शर्ट की बाँह पर खून का छोटा-सा धब्बा लगा था। उसके पीछे राधा थी। वह अपने पेट पर दोनों हाथ रखे हुए थी, जैसे किसी दर्द को दबाने की कोशिश कर रही हो।
अर्जुन की साँस अटक गई।
राधा वैसी ही दिख रही थी जैसी पुरानी तस्वीरों में थी। लेकिन उसके चेहरे पर भय से अधिक अपराधबोध था।
“तुमने कहा था, सिर्फ एक बच्चा होगा,” विक्रम ने नीलकंठ से कहा।
नीलकंठ ने फाइल खोली।
“कागज़ों में एक ही बच्चा होगा।”
“मैं कागज़ों की बात नहीं कर रहा।”
“तो फिर आप किसकी बात कर रहे हैं? उस बच्चे की जो रो रहा है? उस बच्चे की जिसकी धड़कन रुक चुकी है? या उस तीसरे की, जिसे किसी ने जन्म लेते देखा ही नहीं?”
राधा ने अपना चेहरा उठा लिया।
“तीसरा बच्चा कहाँ है?”
नीलकंठ ने जवाब नहीं दिया।
उसने सिर्फ तीसरे पालने पर पड़ा कपड़ा हटाया।
पालना खाली था।
लेकिन उसकी तली पर एक छोटी-सी काली परछाईं पड़ी थी।
परछाईं किसी बच्चे की थी।
वह खाली पालने में लेटी थी, उसके छोटे हाथ छाती पर रखे थे और सिर एक तरफ झुका हुआ था।
सबसे डरावनी बात यह थी कि वह परछाईं साँस ले रही थी।
राधा एक कदम पीछे हट गई।
“यह क्या है?”
नीलकंठ ने कहा, “यह वह बच्चा है, जिसे हमने जन्म से पहले खो दिया।”
“अगर वह पैदा ही नहीं हुआ, तो उसकी परछाईं कैसे है?”
“मैं डॉक्टर हूँ, राधा जी। मैं बच्चों का जन्म दर्ज करता हूँ। परछाइयों का नहीं।”
शारदा देवी ने धीरे से कहा, “झूठ मत बोलो, नीलकंठ।”
नीलकंठ ने उनकी ओर देखा।
“आपने ही तो मुझसे कहा था कि इसका नाम किसी कागज़ पर नहीं आना चाहिए।”
“मैंने कहा था कि उसका नाम मत लिखना। यह नहीं कहा था कि उसका अस्तित्व मिटा दो।”
विक्रम ने मेज़ पर हाथ मारा।
“बस कीजिए! मुझे साफ-साफ बताइए। मेरे कितने बच्चे हैं?”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
राधा ने अपने पेट पर हाथ रखा।
“मुझे दो धड़कनें सुनाई दी थीं,” उसने कहा। “लेकिन जब मुझे होश आया, तब नीलकंठ ने कहा कि एक बच्चा ही बचा है।”
विक्रम ने उसकी तरफ देखा।
“और तुमने उसकी बात मान ली?”
“मैंने अपने बच्चे को गोद में लिया था, विक्रम। वह रो रहा था। उसकी त्वचा गर्म थी। वह मेरी उँगली पकड़ रहा था। मैं कैसे मान लेती कि वह मेरा नहीं है?”
“मैंने ऐसा कब कहा?”
“तुमने नहीं कहा। लेकिन जब तुमने उसे देखा, तुम पीछे हट गए थे।”
विक्रम चुप हो गया।
अर्जुन ने आईने के बाहर खड़े-खड़े अपने हाथों को देखा।
उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
क्योंकि उसे अचानक एक दृश्य याद आया।
कोई बहुत ठंडा कमरा।
एक आदमी की उँगली उसके छोटे हाथ से छूटती हुई।
और एक आवाज़—
**“इसे घर ले जाओ। दूसरे को यहीं रहने दो।”**
याद इतनी छोटी थी कि वह समझ नहीं पाया कि वह सचमुच उसकी थी या किसी और के मन से उठकर उसमें आ गई थी।
आईने के भीतर नीलकंठ ने फाइल से एक कागज़ निकाला।
“यहाँ एक जन्म दर्ज होगा। एक मृत्यु दर्ज होगी। तीसरे के बारे में कुछ नहीं लिखा जाएगा।”
राधा ने पूछा, “और अगर वह तीसरा बच्चा वापस आया तो?”
नीलकंठ ने पहली बार डरकर खाली पालने की तरफ देखा।
“वह वापस नहीं आएगा।”
तभी पालने के भीतर की परछाईं ने अपना सिर उठाया।
उसका चेहरा नहीं था।
फिर भी उसने नीलकंठ की तरफ देखकर कहा—
“मैं तो यहीं हूँ।”
नीलकंठ के हाथ से कागज़ गिर गया।
### 3. गवाही देने वाला बच्चा
“नहीं,” आईने में मौजूद नीलकंठ बुदबुदाया। “यह संभव नहीं है।”
परछाईं पालने से उठी।
उसका शरीर किसी नवजात बच्चे जैसा छोटा था, मगर उसकी गर्दन असामान्य रूप से लंबी हो रही थी। उसके हाथ पालने के किनारों तक पहुँच गए। फिर उसकी उँगलियाँ लकड़ी के ऊपर फैल गईं।
एक-एक करके तीन काली लकीरें उसके दाहिने हाथ पर उभरीं।
अर्जुन के अपने हाथ में जलन हुई।
उसने कलाई देखी।
वहाँ भी तीन लकीरें थीं।
“यह मेरी निशानी क्यों है?” वह चीखा।
आईने के भीतर किसी ने उसकी आवाज़ नहीं सुनी।
राधा ने बच्चे की ओर हाथ बढ़ाया।
“मेरा बच्चा…”
विक्रम ने उसे पकड़कर पीछे खींच लिया।
“उसे मत छूना!”
“वह मेरा बच्चा है!”
“तुम्हें पता भी है कि वह है क्या?”
राधा ने विक्रम के हाथ झटक दिए।
“अगर मुझे नहीं पता, तो तुम्हें कैसे पता?”
विक्रम की आँखें खाली पालने पर टिक गईं।
“क्योंकि मैंने इसे पहले भी देखा है।”
शारदा देवी का चेहरा सफेद पड़ गया।
“विक्रम!”
“मैंने इसे अपने बचपन में देखा था, माँ।”
“चुप रहो!”
“उस रात जब आप मुझे ऊपर वाले कमरे में बंद कर देती थीं, मैं दरवाज़े के नीचे से इसकी परछाईं देखता था। मुझे लगता था कि कोई बच्चा बाहर बैठा है। मैं उससे बात करता था। वह मेरी आवाज़ में जवाब देता था।”
राधा ने फुसफुसाकर पूछा, “यह तुम्हारे बचपन में भी था?”
विक्रम ने सिर हिलाया।
“मुझे लगता था कि वह मेरा छोटा भाई है।”
शारदा देवी पीछे हट गईं।
“तुम्हारा कोई छोटा भाई नहीं था।”
विक्रम ने उनकी ओर देखा।
“फिर आपने उसका नाम किसकी कब्र पर लिखा था?”
शारदा के मुँह से कोई आवाज़ नहीं निकली।
नीलकंठ ने मेज़ से कागज़ उठाया और उसे फाड़ने लगा।
“हमें यह सब बंद करना होगा। अभी।”
लेकिन कागज़ फट नहीं रहा था।
उस पर लिखी स्याही फैलने लगी और शब्द अपने आप बदल गए।
पहले लिखा था—
**जन्म: 17 जुलाई 1995।**
फिर उसके नीचे एक नया वाक्य उभरा—
**मृत्यु: जन्म से पहले।**
नीलकंठ ने कागज़ फेंक दिया।
“किसने लिखा यह?”
खाली पालने में मौजूद परछाईं ने जवाब दिया—
“जिसने मुझे देखा था।”
“तुम्हें किसने देखा?”
“तुमने।”
नीलकंठ ने अपना चश्मा उतार लिया। उसकी आँखों में आँसू थे।
“मैंने तुम्हें नहीं देखा था।”
“तुमने मेरी माँ को देखा था।”
राधा ने दोनों हाथ अपने मुँह पर रख लिए।
विक्रम की नज़र तीसरे पालने पर टिक गई।
“तुम कौन हो?”
परछाईं ने अपना सिर थोड़ा टेढ़ा किया।
“तुमने मुझे कभी नाम नहीं दिया।”
“नाम बताओ।”
“नाम देने से तुम मुझे पहचान लोगे।”
“हाँ।”
“और अगर पहचान लिया, तो मुझे मार दोगे।”
विक्रम कुछ नहीं बोला।
परछाईं ने कहा, “तुमने पहले भी यही किया था।”
अचानक कमरे में मौजूद तीनों पालने हिलने लगे।
पहले पालने में सो रहा बच्चा रोने लगा।
दूसरे, खाली पालने में किसी बच्चे की उँगलियाँ लकड़ी के नीचे से बाहर निकलीं।
तीसरे पालने की परछाईं धीरे-धीरे लंबी होती गई। वह दीवार पर चढ़ी, छत तक पहुँची और फिर नीचे उतरकर नीलकंठ के पैरों के पास फैल गई।
नीलकंठ ने भागने की कोशिश की।
दरवाज़ा नहीं खुला।
वह चीखा, “शारदा जी, दरवाज़ा खोलिए!”
शारदा देवी ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
“मैंने तुम्हें चेतावनी दी थी।”
“आपने कहा था कि यह सिर्फ एक निशान है!”
“मैंने कहा था कि यह निशान किसी को ढूँढ़ता है।”
“किसे?”
शारदा ने धीरे से अर्जुन की तरफ देखा।
ऐसा लगा जैसे आईने के भीतर से भी वह उसे देख सकती थीं।
“जिसका जन्म दर्ज किया गया था, वह बच्चा नहीं।”
फिर उन्होंने तीसरे पालने की ओर देखा।
“जिसकी मृत्यु दर्ज की गई थी, वह भी नहीं।”
उनकी आवाज़ टूट गई।
“यह उस बच्चे को ढूँढ़ता है, जिसे किसी ने जन्म लेते हुए देखा ही नहीं।”
आईने की सतह अचानक काँप उठी।
अर्जुन को लगा किसी ने उसके कंधे पकड़कर पीछे खींच लिया है। मीरा ने उसे संभाला, लेकिन उसके हाथ बर्फ जैसे ठंडे थे।
“भैया, यहाँ से हटो!”
“नहीं। मुझे यह सुनना होगा।”
“तुम नहीं समझ रहे। वह बच्चा तुम्हें देख रहा है।”
अर्जुन ने आईने की ओर देखा।
परछाईं अब कमरे के भीतर नहीं थी।
वह सीधे आईने के सामने खड़ी थी।
उसके चेहरे पर धीरे-धीरे आँखें उभर रही थीं।
पहले दो सफेद धब्बे।
फिर काली पुतलियाँ।
फिर एक नाक।
फिर होंठ।
और आखिर में अर्जुन का चेहरा।
लेकिन वह अर्जुन नहीं था।
उसके चेहरे पर वही तीन काली लकीरें थीं, जो अर्जुन की कलाई पर थीं।
उसने काँच पर हाथ रखा और कहा—
“मेरी गवाही लिखो।”
अर्जुन ने काँपते हुए पूछा, “क्या लिखूँ?”
बच्चे ने कहा—
**“मैं पैदा होने से पहले मर गया था। लेकिन मेरी मौत के बाद भी कोई मेरे नाम से जीता रहा।”**
### 4. डॉ. नीलकंठ का बयान
आईने में दृश्य अचानक बदल गया।
अब वही कमरा था, लेकिन उसमें कोई पालना नहीं था। दीवार पर घड़ी टिक-टिक कर रही थी। बाहर बारिश हो रही थी। मेज़ पर एक टेप रिकॉर्डर रखा था और उसके सामने डॉ. नीलकंठ बैठे थे।
उनके बाल बिखरे हुए थे। आँखों के नीचे काले घेरे थे। उनके हाथ में एक कागज़ था, जिस पर बार-बार कुछ लिखा और मिटाया गया था।
उन्होंने रिकॉर्डर चालू किया।
“दिनांक… मुझे तारीख याद नहीं। घड़ी चलती है, लेकिन तारीख नहीं बदलती। मुझे लगता है मैं कई दिनों से इस कमरे में हूँ।”
उन्होंने गहरी साँस ली।
“मैं डॉ. नीलकंठ, देवगढ़ के पुराने मातृत्व केंद्र का प्रभारी, यह बयान दर्ज कर रहा हूँ। अगर यह रिकॉर्ड किसी के हाथ लगे, तो इसे पुलिस के पास मत ले जाना। पुलिस उन नामों को दर्ज करेगी, जो कागज़ पर लिखे हैं। लेकिन यहाँ जो हुआ, वह कागज़ से बाहर हुआ था।”
वह रुके।
फिर बोले, “17 जुलाई 1995 की रात मेरे सामने दो नवजात बच्चे लाए गए थे। कम से कम मुझे यही बताया गया था। पहला बच्चा जीवित था। दूसरा बच्चा जन्म के समय साँस नहीं ले रहा था। मैंने जाँच की। कोई धड़कन नहीं मिली। मैंने उसे मृत घोषित कर दिया।”
उनकी उँगलियाँ काँपने लगीं।
“लेकिन जब मैंने मृत्यु प्रमाणपत्र लिखा, तब कमरे में तीसरी रोने की आवाज़ आई।”
नीलकंठ ने आँखें बंद कर लीं।
“मैंने हर तरफ देखा। कोई तीसरा बच्चा नहीं था। राधा बिस्तर पर थी। विक्रम उसके पास खड़ा था। शारदा देवी दरवाज़े पर थीं। दो पालने थे। एक बच्चा जीवित था, दूसरा मृत। फिर भी रोने की आवाज़ आती रही।”
रिकॉर्डर में हल्की खड़खड़ाहट हुई।
“मैंने सोचा, यह किसी और कमरे से आ रही होगी। लेकिन आवाज़ दीवार के भीतर से आ रही थी।”
उन्होंने कागज़ उठाया।
“मैंने दीवार की जाँच की। उसमें कोई खोखली जगह नहीं थी। फिर मैंने आईने को देखा। वह आईना उस कमरे में होना ही नहीं चाहिए था। मुझे बताया गया था कि वह स्टोर में रखा है। लेकिन वह बिस्तर के सामने खड़ा था।”
नीलकंठ ने कैमरे की तरह सीधे सामने देखा।
“आईने में तीसरा पालना दिखाई दे रहा था।”
उन्होंने कागज़ पर उँगली रखी।
“मैंने उसे देखा। मैंने उस बच्चे को देखा। और मैंने उसके जन्म का समय भी दर्ज किया।”
वह अचानक हँसने लगे।
वह हँसी खुशी की नहीं थी। वह ऐसी हँसी थी जो किसी आदमी के भीतर से तब निकलती है, जब उसका दिमाग उस सच को समझने से इनकार कर देता है जिसे उसकी आँखें देख चुकी हों।
“लेकिन समय का सवाल ही गलत था। वह बच्चा पैदा ही नहीं हुआ था। उसके लिए समय कहाँ से आता?”
उन्होंने कागज़ कैमरे के सामने उठाया।
उस पर तीन नाम लिखे थे।
**अभय।**
**अर्णव।**
**ईशान।**
तीनों नामों पर काली स्याही फेर दी गई थी।
उनके नीचे एक चौथा नाम था, जिसे काटने की कोशिश की गई थी, लेकिन अक्षर अब भी दिखाई दे रहे थे।
**विहान।**
अर्जुन ने नाम पढ़ते ही अपने कानों पर हाथ रख लिए।
उसके भीतर किसी बच्चे ने चीख मारी।
मीरा ने उसे पकड़ लिया।
“भैया!”
“यह नाम…” अर्जुन हाँफ रहा था। “मैंने यह नाम पहले सुना है।”
“कहाँ?”
“पता नहीं!”
आईने के भीतर नीलकंठ बोलते रहे।
“मुझे लगा था कि यह किसी बच्चे का नाम है। मैंने पूछा, यह कौन है? शारदा देवी ने कहा, इस नाम को भूल जाओ। विक्रम ने कहा, इस नाम का कोई बच्चा नहीं था। राधा ने मुझसे सिर्फ एक बात कही—अगर यह बच्चा तुम्हें अपना नाम बताए, तो उसे दोहराना मत।”
नीलकंठ ने रिकॉर्डर के पास झुककर कहा—
“लेकिन मैं पहले ही नाम पढ़ चुका था।”
कमरे की दीवार पर कुछ खरोंचने की आवाज़ आई।
नीलकंठ ने पीछे देखा।
उनके पीछे दीवार पर काले अक्षर उभर रहे थे।
**विहान।**
उन्होंने रिकॉर्डर बंद करने की कोशिश की, लेकिन बटन काम नहीं कर रहा था।
“यह नाम मैंने नहीं लिखा!”
अक्षर और गहरे हो गए।
**विहान।**
**विहान।**
**विहान।**
नीलकंठ कुर्सी से उठे। उन्होंने रिकॉर्डर उठाकर ज़मीन पर पटक दिया।
रिकॉर्डर टूट गया।
लेकिन आवाज़ बंद नहीं हुई।
कमरे के बाहर से किसी बच्चे ने कहा—
“डॉक्टर साहब, मेरी माँ कहाँ है?”
नीलकंठ की आँखों से आँसू बह निकले।
“मुझे नहीं पता।”
“आपने मुझे देखा था।”
“हाँ।”
“आपने मुझे दर्ज क्यों नहीं किया?”
“मुझे माफ़ कर दो।”
“आपने मेरी मौत लिखी थी।”
नीलकंठ घुटनों के बल बैठ गए।
“तुम मर चुके थे।”
बच्चे ने कहा—
“तो फिर मैं आपसे बात कैसे कर रहा हूँ?”
नीलकंठ ने अपना सिर दोनों हाथों में छिपा लिया।
और आईने के भीतर की रिकॉर्डिंग अचानक समाप्त हो गई।
### 5. वह नाम जो मिटाया नहीं जा सका
तीसरी मंज़िल पर कुछ देर तक कोई नहीं बोला।
अर्जुन ने अपने होंठों पर जीभ फेरी। उसका मुँह सूख चुका था।
“विहान,” उसने धीमे से कहा।
मीरा ने तुरंत उसका मुँह बंद कर दिया।
“नाम मत बोलो!”
उसकी उँगलियाँ अर्जुन के होंठों पर थीं। उसकी आँखों में ऐसा डर था जो अर्जुन ने पहले कभी नहीं देखा था।
“तुमने ही तो रिकॉर्डिंग में सुना,” अर्जुन ने उसका हाथ हटाते हुए कहा। “वह नाम पहले से लिखा था।”
“नाम सुनना और उसे स्वीकार करना अलग बात है।”
“नाम स्वीकार करना क्या होता है?”
मीरा ने जवाब नहीं दिया।
अर्जुन ने उसकी कलाई पकड़ी।
“तुम जानती हो, है न? तुम जानती हो कि यह बच्चा कौन है।”
मीरा ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में पानी भर आया था।
“मैंने उसे देखा था, भैया।”
“कब?”
“2008 में।”
अर्जुन का हाथ ढीला पड़ गया।
मीरा ने आगे कहा, “उस रात जब माँ तीसरी मंज़िल पर गई थीं, मैं उनके पीछे गई थी। मुझे याद है कि दरवाज़ा खुला था। अंदर आईना था। लेकिन उस आईने में हमारा कमरा नहीं दिख रहा था। उसमें एक अस्पताल था।”
“तुमने उस बच्चे को देखा?”
“हाँ।”
“विहान को?”
मीरा ने अपना चेहरा फेर लिया।
“मुझे उसका नाम नहीं पता था। वह बहुत छोटा था। उसके हाथ पर तीन काली लकीरें थीं। उसने मुझे देखकर कहा था कि वह मुझे पहले से जानता है।”
“उसने तुमसे क्या कहा?”
मीरा कुछ क्षण चुप रही।
“उसने कहा था कि मैं उसकी बहन हूँ।”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“और तुमने क्या कहा?”
“मैंने कहा कि मेरी कोई ऐसी बहन नहीं, जिसका चेहरा मुझे दिखाई नहीं देता।”
“फिर?”
“वह हँसा। उसने कहा कि मैं गलत हूँ। उसने कहा कि मेरा एक भाई है, जिसे मैंने खो दिया है, और एक भाई है, जिसे मैंने कभी पाया ही नहीं।”
मीरा की आवाज़ टूट गई।
“फिर उसने मुझसे पूछा कि क्या मैं उसे नाम दे सकती हूँ।”
“तुमने क्या कहा?”
“मैंने मना कर दिया।”
“क्यों?”
मीरा ने उसकी आँखों में देखा।
“क्योंकि माँ ने मुझे पहले ही चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि अगर कोई बच्चा आईने के पीछे से अपना नाम माँगे, तो उसे कभी नाम मत देना। नाम मिलते ही वह किसी का बच्चा बन जाता है। और अगर वह किसी का बच्चा बन गया, तो वह उस माँ को ढूँढ़ेगा जिसने उसे खोया था।”
अर्जुन ने तीसरी मंज़िल के अँधेरे को देखा।
“तो वह राधा को ढूँढ़ रहा है?”
“शायद।”
“और अगर राधा मर चुकी है?”
मीरा ने बहुत धीरे से कहा, “तब वह उस माँ को ढूँढ़ेगा, जिसने उसे अपनी जगह किसी और को दे दी।”
उसी क्षण आईने पर एक धुँधला हाथ उभरा।
उस हाथ की उँगलियों पर तीन काली लकीरें थीं।
उसने काँच पर कुछ लिखा।
**माँ झूठ बोल रही है।**
फिर दूसरा वाक्य उभरा—
**विहान मेरा नाम नहीं है।**
अर्जुन ने पढ़ते ही पीछे कदम लिया।
आईने में बच्चा फिर दिखाई दिया।
इस बार उसका चेहरा अर्जुन जैसा नहीं था। वह किसी अनजान बच्चे का चेहरा था—गोल गाल, पतली नाक, माथे पर छोटे बाल। लेकिन उसकी आँखें बहुत पुरानी थीं।
बच्चे ने कहा, “उन्होंने तुम्हें बताया कि मैं पैदा होने से पहले मर गया था।”
अर्जुन ने कुछ नहीं कहा।
“उन्होंने तुम्हें यह भी बताया कि मैं उनका बच्चा था।”
बच्चे ने सिर हिलाया।
“दोनों बातें झूठ हैं।”
मीरा ने घंटी उठा ली।
“तुम क्या चाहते हो?”
बच्चे ने उसकी ओर देखा।
“मुझे मेरी माँ चाहिए।”
“राधा?”
“तुम्हें हर माँ का नाम पहले से क्यों पता होता है?”
मीरा चुप हो गई।
बच्चे ने अर्जुन की ओर देखा।
“तुम्हें अपना नाम पता है?”
“अर्जुन।”
“यह तुम्हें किसने बताया?”
“मेरे पिता ने।”
बच्चा मुस्कराया।
“कौन-से पिता ने?”
अर्जुन का चेहरा सख्त हो गया।
“विक्रम शर्मा।”
“विक्रम शर्मा ने तुम्हें अर्जुन कहा था। शारदा ने तुम्हें अर्णव कहा। किसी ने तुम्हें अभय कहा। तुम्हारे सामने ईशान आया। अब तुमने विहान सुना।”
बच्चे ने काँच पर उँगली घुमाई।
“तुम्हें कभी यह नहीं लगा कि इतने सारे नाम एक बच्चे के लिए बहुत ज़्यादा हैं?”
अर्जुन ने दाँत भींच लिए।
“तुम्हारा असली नाम क्या है?”
बच्चे ने अपना सिर झुका लिया।
“अगर मैं तुम्हें बता दूँ, तो तुम्हें याद आ जाएगा कि तुमने मेरे साथ क्या किया था।”
“मैंने तुम्हारे साथ कुछ नहीं किया!”
बच्चे ने पहली बार गुस्से में आईने पर मुक्का मारा।
काँच में दरार उभर आई।
“तुमने मुझे चुना था!”
कमरे की हवा अचानक भारी हो गई।
“तुमने कहा था कि एक ही बच्चा बाहर जा सकता है। तुमने कहा था कि तुम वापस आओगे। तुमने वादा किया था कि मुझे अकेला नहीं छोड़ोगे।”
अर्जुन की आँखों के सामने दृश्य चमकने लगे।
एक अँधेरा कमरा।
लकड़ी का दरवाज़ा।
एक छोटा बच्चा, जो उसका हाथ पकड़े हुए है।
दूसरी तरफ कोई और खड़ा है।
फिर एक आवाज़—
**“अर्जुन, जल्दी करो। दरवाज़ा बंद होने वाला है!”**
छोटा अर्जुन पीछे मुड़कर देखता है।
दूसरा बच्चा उसका हाथ नहीं छोड़ता।
“मुझे भी ले चलो!”
लेकिन अर्जुन अपना हाथ छुड़ा लेता है।
दरवाज़ा बंद हो जाता है।
और दूसरी तरफ से एक चीख सुनाई देती है।
अर्जुन घुटनों के बल गिर पड़ा।
“नहीं…”
मीरा उसके पास झुकी।
“भैया, क्या हुआ?”
अर्जुन ने अपने कान ढँक लिए।
“मैंने उसे छोड़ा था।”
आईने के भीतर बच्चा स्थिर खड़ा रहा।
“अब याद आया?”
अर्जुन ने सिर उठाया।
“वह सपना था।”
“तुम्हारे लिए सब सपना ही है।”
“मैं आठ साल का था!”
“और मैं कितना था?”
बच्चे ने अपना चेहरा आईने से सटा दिया।
“मैं तो पैदा भी नहीं हुआ था।”
### 6. शारदा की आखिरी लिखावट
मीरा ने अर्जुन को सहारा देकर खड़ा किया। उसके हाथ अब भी काँप रहे थे, लेकिन उसने घंटी नहीं छोड़ी।
“हमें नीचे जाना होगा,” उसने कहा।
“क्यों?”
“क्योंकि शारदा देवी ने इस रात के बारे में कुछ लिखा था। अगर वह बच्चा सच कह रहा है, तो उसका बयान कहीं न कहीं दर्ज होगा।”
“तुम्हें कैसे पता?”
“क्योंकि माँ ने मुझे एक बार बताया था कि शारदा देवी ने एक ऐसी डायरी लिखी थी, जिसे पढ़ने के बाद उन्होंने खुद को तीसरी मंज़िल में बंद कर लिया था।”
“वह डायरी कहाँ है?”
मीरा ने सीढ़ियों की ओर देखा।
“उनके कमरे में।”
दोनों नीचे उतरे।
शर्मा निवास की दूसरी मंज़िल पर अँधेरा था। दीवारों पर लगी तस्वीरों में चेहरे साफ़ दिखाई नहीं दे रहे थे। हर तस्वीर में किसी न किसी की आँखों पर काली स्याही लगी थी।
अर्जुन ने एक तस्वीर के सामने रुककर देखा।
वह शारदा देवी की पुरानी तस्वीर थी। उनके पीछे विक्रम खड़ा था। तस्वीर में विक्रम की उम्र लगभग दस साल लग रही थी। उसके पास एक और बच्चा था, लेकिन उस बच्चे का चेहरा काट दिया गया था।
तस्वीर के नीचे छोटी-सी पट्टी लगी थी—
**“परिवार, 1968।”**
अर्जुन ने मीरा को बुलाया।
“यह दूसरा बच्चा कौन है?”
मीरा ने तस्वीर को देखा और तुरंत नज़रें हटा लीं।
“मुझे नहीं पता।”
“तुम झूठ बोल रही हो।”
“मैं सच कह रही हूँ। मैंने यह तस्वीर पहले कभी नहीं देखी।”
अर्जुन ने तस्वीर उतारी। उसके पीछे कागज़ चिपका था। उस पर शारदा की लिखावट में कुछ पंक्तियाँ थीं—
“विक्रम ने उसे भाई कहा। मैंने उसे बेटा नहीं कहा। क्योंकि जिस दिन मैंने उसे बेटा कहा होता, उसी दिन मुझे अपने पहले बेटे की मौत स्वीकार करनी पड़ती।”
अर्जुन ने कागज़ फिर पढ़ा।
“पहले बेटे की मौत…”
मीरा ने धीरे से कहा, “एपिसोड की शुरुआत विक्रम से नहीं हुई थी, भैया। उससे बहुत पहले से यह घर कुछ छिपा रहा था।”
वे शारदा के कमरे में पहुँचे।
कमरे में वही पुराना पलंग था, वही लकड़ी की अलमारी और वही पूजा की चौकी। शारदा देवी की मृत्यु के बाद कमरे को वैसा ही रखा गया था। खिड़की के पास एक छोटा दीपक रखा था, जिसमें तेल नहीं था। फिर भी उसकी लौ जल रही थी।
अर्जुन ने अलमारी खोली।
कपड़ों के नीचे एक लकड़ी का बक्सा था। उस पर ताला लगा था। ताले पर तीन अंक उभरे थे—
313।
मीरा ने जेब से चाबी निकाली।
“यह चाबी तुम्हें कहाँ मिली?” अर्जुन ने पूछा।
“शारदा देवी के कमरे से।”
“तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?”
“क्योंकि चाबी पर मेरा नाम लिखा था।”
उसने चाबी अर्जुन को दिखायी।
धातु पर बहुत छोटे अक्षरों में लिखा था—
**मीरा — उस बच्चे के लिए जो पैदा नहीं हुआ।**
अर्जुन ने ताला खोल दिया।
बक्से के अंदर एक डायरी, तीन कैसेट और सफेद कपड़े में लिपटा एक छोटा-सा कंगन था।
कंगन पर बच्चे का नाम नहीं था। सिर्फ तीन काली लकीरें थीं।
अर्जुन ने डायरी खोली।
पहला पन्ना खाली था।
दूसरे पर लिखा था—
**“अगर अर्जुन यह पढ़ रहा है, तो इसका मतलब है कि उसने चौथी दस्तक सुन ली है।”**
अर्जुन ने मीरा की तरफ देखा।
“शारदा देवी को कैसे पता था कि चौथी दस्तक होगी?”
मीरा ने जवाब नहीं दिया।
अर्जुन आगे पढ़ने लगा।
“मैंने कई बार सोचा कि सच लिख दूँ। लेकिन हर बार जब मैं उस बच्चे का नाम लिखने बैठती हूँ, मेरी उँगलियाँ किसी दूसरे नाम की ओर मुड़ जाती हैं। मैं अभय लिखती हूँ, तो अर्णव दिखाई देता है। अर्णव लिखती हूँ, तो ईशान। ईशान लिखती हूँ, तो एक खाली जगह बचती है। उस खाली जगह में एक ऐसा नाम है, जिसे मैं याद नहीं करना चाहती।”
अगली पंक्ति में स्याही फैली हुई थी।
“नीलकंठ ने कहा था कि बच्चा जन्म से पहले मर गया। उसने मृत्यु प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर किए। लेकिन मैं जानती हूँ कि उसने बच्चे को मरते हुए नहीं देखा था। उसने सिर्फ उस पालने को खाली देखा था।”
अर्जुन ने पन्ना पलटा।
“विक्रम ने कहा कि वह बच्चा उसका बेटा नहीं था। लेकिन मैंने उसे उस बच्चे से बात करते सुना था। वह हर रात तीसरी मंज़िल पर जाता और दरवाज़े के सामने बैठकर कहता—मैं तुम्हें लेने आऊँगा।”
“वह किसे लेने जाता था?” अर्जुन ने पूछा।
मीरा ने धीरे से कहा, “शायद उस बच्चे को।”
अर्जुन ने अगला पन्ना पढ़ा।
“17 जुलाई 1995 को हमने एक बच्चे की मृत्यु दर्ज की। उसी रात हमने एक बच्चे का जन्म दर्ज किया। लेकिन तीसरे बच्चे की गवाही उस रात से पहले की है। वह बच्चा न जन्मा था, न मरा था। फिर भी उसने हमें देखा था। उसने हमसे पूछा था कि उसकी माँ कौन है।”
अर्जुन के हाथ से डायरी गिरते-गिरते बची।
अगली पंक्ति पढ़ते ही कमरे की लौ काँपने लगी।
“मैंने उससे झूठ कहा। मैंने कहा कि उसकी माँ मर चुकी है।”
उसके नीचे दूसरी लिखावट थी, जो शारदा की नहीं थी।
**“माँ अभी भी जीवित है।”**
अर्जुन ने उँगली से उस वाक्य को छुआ।
स्याही ताज़ा थी।
उसके नीचे एक और वाक्य उभरा—
**“और वह इसी घर में है।”**
### 7. माँ का कमरा
अचानक कमरे के बाहर किसी ने तीन बार दस्तक दी।
ठक।
ठक।
ठक।
मीरा ने घंटी उठा ली।
“दरवाज़ा मत खोलना।”
अर्जुन ने दरवाज़े की ओर देखा।
“कौन है?”
बाहर से उसकी माँ की आवाज़ आई।
“अर्जुन, बेटा। दरवाज़ा खोलो।”
अर्जुन वहीं जम गया।
वह आवाज़ बिल्कुल उसकी माँ जैसी थी। वही नरमी, वही थकान, वही ढंग जिससे वह बचपन में उसे बुलाती थीं।
“बेटा, मुझे तुमसे बात करनी है।”
मीरा ने सिर हिलाया।
“मत खोलो।”
बाहर से फिर आवाज़ आई।
“अर्जुन, मुझे पता है कि तुमने उसका नाम सुन लिया है।”
अर्जुन ने डायरी को कसकर पकड़ लिया।
“माँ?”
“हाँ, बेटा।”
“आप कौन-से बच्चे की माँ हैं?”
दरवाज़े के बाहर सन्नाटा छा गया।
फिर आवाज़ आई—
“तुम्हारी।”
“किसकी?”
इस बार बाहर से कोई जवाब नहीं आया।
अर्जुन दरवाज़े के पास गया।
मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“भैया, यह वही सवाल है जो वह तुमसे पूछवाना चाहती है।”
“कौन?”
“जो भी बाहर है।”
दरवाज़े के नीचे से काला पानी भीतर आने लगा।
उसमें मिट्टी और राख मिली हुई थी। पानी धीरे-धीरे फैलकर अर्जुन के पैरों तक पहुँच गया।
फिर उस पानी में एक छोटी-सी उँगली दिखाई दी।
उसने फर्श पर अक्षर लिखने शुरू किए।
**माँ।**
फिर—
**मेरा।**
फिर—
**नाम।**
अर्जुन पीछे हट गया।
पानी के भीतर से एक बच्चे की आवाज़ आई।
“मुझे याद नहीं कि उसने मुझे क्या कहा था।”
अर्जुन ने दरवाज़े की ओर झुककर पूछा, “किसने?”
“मेरी माँ ने।”
“तुम्हारी माँ कहाँ है?”
“वह मेरे पास थी।”
“फिर?”
“फिर उसने दूसरे बच्चे को उठा लिया।”
अर्जुन की आँखों के सामने फिर वही दृश्य चमका—दो पालने, एक बच्चा रोता हुआ और दूसरा बच्चा किसी अँधेरे में अकेला।
“उसने तुम्हें छोड़ दिया?”
“नहीं।”
बच्चे की आवाज़ बहुत धीमी हो गई।
“उसने मुझे बचाया था।”
अर्जुन चौंका।
“किससे?”
“तुमसे।”
उसी पल दरवाज़े के बाहर से उसकी माँ की आवाज़ आई—
“अर्जुन, उसे मत सुनना। वह तुम्हारा भाई नहीं है।”
फर्श पर फैला काला पानी अचानक पीछे की ओर खिसकने लगा।
उसमें लिखे अक्षर मिट गए।
फिर एक नया वाक्य उभरा—
**“वह तुम्हारी माँ नहीं है।”**
मीरा ने घंटी बजाई।
टन्न्न…
दरवाज़े के बाहर किसी के चीखने की आवाज़ आई।
लेकिन वह चीख किसी औरत की नहीं थी।
वह अर्जुन की अपनी आवाज़ थी।
दरवाज़ा अपने आप खुल गया।
बाहर गलियारा खाली था।
दीवार के अंत में एक दरवाज़ा था, जिसे अर्जुन ने पहले कभी नहीं देखा था। उस पर काले रंग से लिखा था—
**माँ का कमरा।**
दरवाज़े के नीचे से पीली रोशनी आ रही थी।
अर्जुन ने धीरे से कहा, “यह कमरा यहाँ कब से है?”
मीरा ने सिर हिलाया।
“मुझे नहीं पता।”
“क्या तुम अंदर चलोगी?”
मीरा ने कुछ क्षण सोचा, फिर उसके साथ आगे बढ़ी।
दरवाज़े पर कोई ताला नहीं था।
अर्जुन ने उसे धक्का दिया।
कमरे के भीतर एक पुराना पलंग था। उसके पास लकड़ी की कुर्सी और एक छोटी मेज़ रखी थी। दीवार पर कोई तस्वीर नहीं थी। खिड़की के बाहर रात के बजाय सफेद धुंध दिखाई दे रही थी।
पलंग पर एक औरत बैठी थी।
उसका चेहरा झुका हुआ था। लंबे बाल चेहरे पर बिखरे थे। दोनों हाथों में उसने सफेद कपड़े का एक छोटा-सा टुकड़ा पकड़ रखा था।
अर्जुन के कदम रुक गए।
“राधा?”
औरत ने सिर उठाया।
वह राधा थी।
लेकिन उसके चेहरे पर उम्र का कोई असर नहीं था। वह उतनी ही जवान दिख रही थी जितनी 1995 की तस्वीर में।
उसने अर्जुन को देखा और रोने लगी।
“तुम बहुत देर से आए।”
अर्जुन उसके सामने खड़ा रहा।
“आप मेरी माँ हैं?”
राधा ने तुरंत जवाब नहीं दिया।
उसने अपनी गोद में रखा कपड़ा खोला।
उसमें एक छोटा कंगन था।
तीन काली लकीरों वाला कंगन।
अर्जुन की कलाई पर जलन होने लगी।
राधा ने कहा, “मैंने तुम्हें जन्म नहीं दिया था।”
अर्जुन के भीतर कुछ टूट गया।
“तो फिर आप कौन हैं?”
“मैं उस बच्चे की माँ थी, जिसे जन्म से पहले मरा हुआ लिख दिया गया।”
“विहान?”
राधा की आँखों में डर उतर आया।
“तुमने यह नाम कहाँ सुना?”
“नीलकंठ की गवाही में।”
राधा ने सिर झुका लिया।
“वह नाम उसका नहीं था।”
“तो उसका नाम क्या था?”
राधा ने अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।
उसकी उँगलियाँ बर्फ जैसी ठंडी थीं।
“अगर मैं तुम्हें उसका नाम बता दूँ, तो तुम्हें याद आ जाएगा कि उस रात किसने किसे छोड़ा था।”
अर्जुन ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन राधा की पकड़ मजबूत हो गई।
“मुझे सच जानना है।”
“सच जानने के लिए तुम्हें पहले यह स्वीकार करना होगा कि तुमने जो याद किया है, वह सब तुम्हारी यादें नहीं हैं।”
“मुझे बताइए!”
राधा ने उसकी कलाई पर बनी तीन काली लकीरों को छुआ।
“तुम्हारी माँ ने तुम्हें गोद में लिया था। लेकिन तुम्हें पहली बार किसने पुकारा था, अर्जुन?”
अर्जुन चुप रहा।
“विक्रम ने?”
वह जवाब नहीं दे पाया।
“शारदा ने?”
उसका गला सूख गया।
“या उस बच्चे ने, जिसे तुमने दरवाज़े के दूसरी तरफ छोड़ दिया था?”
कमरे की रोशनी बुझ गई।
अँधेरे में राधा की आवाज़ गूँजी—
“वह बच्चा तुम्हारा भाई नहीं था, अर्जुन।”
एक पल की चुप्पी।
“वह तुमसे पहले था।”
### 8. अंतिम गवाही
अँधेरे में अर्जुन को किसी के रोने की आवाज़ सुनाई दी।
उसने हाथ बढ़ाकर मीरा को ढूँढ़ना चाहा, लेकिन उसके हाथ में किसी बच्चे की उँगलियाँ आ गईं।
वे बहुत छोटी थीं।
और ठंडी।
“मीरा?”
“नहीं।”
“कौन?”
“तुम्हें याद है, तुमने कहा था कि एक ही बच्चा बाहर जा सकता है?”
अर्जुन का दिल तेजी से धड़कने लगा।
“तुम वही हो?”
“मैं वही हूँ, जिसे तुमने छोड़ा था।”
“मैंने तुम्हें नहीं छोड़ा!”
“तो फिर दरवाज़ा किसने बंद किया?”
अर्जुन के सामने अँधेरे में एक दृश्य खुला।
वह आठ साल का था। उसके सामने आईने का काला दरवाज़ा था। दूसरी तरफ एक बच्चा खड़ा था। दोनों के चेहरे एक जैसे नहीं थे, लेकिन उनकी आँखें एक जैसी थीं।
पीछे से किसी ने पुकारा—
“अर्जुन! जल्दी करो!”
उसने पीछे देखा। शारदा देवी खड़ी थीं। उनके हाथ में चाँदी की घंटी थी। विक्रम उनके पीछे था। राधा दरवाज़े के पास खड़ी रो रही थी।
बच्चे ने अर्जुन का हाथ पकड़ रखा था।
“मुझे बाहर ले चलो।”
अर्जुन ने कहा, “मैं तुम्हें लेने वापस आऊँगा।”
“कब?”
“कल।”
“सच?”
“सच।”
फिर अर्जुन ने अपना हाथ छुड़ा लिया।
वह बाहर आ गया।
दरवाज़ा बंद हो गया।
और उस बच्चे की आवाज़ अँधेरे में खो गई।
वर्तमान में अर्जुन चीखकर पीछे हट गया।
“नहीं! मैं बच्चा था! मुझे नहीं पता था कि क्या हो रहा है!”
आवाज़ ने कहा, “मैं भी बच्चा था।”
“तुम क्या चाहते हो?”
“मैं चाहता हूँ कि कोई मेरी गवाही सुने।”
“मैं सुन रहा हूँ!”
“नहीं। तुम मेरी कहानी सुन रहे हो। मेरी गवाही नहीं।”
अर्जुन ने अँधेरे में पूछा, “फर्क क्या है?”
बच्चे ने जवाब दिया—
“कहानी में तुम तय कर सकते हो कि कौन सच बोल रहा है। गवाही में तुम्हें यह भी स्वीकार करना पड़ता है कि सच तुम्हारे खिलाफ हो सकता है।”
अर्जुन के सामने एक मेज़ उभरी। उस पर कागज़ रखा था। उसके ऊपर एक कलम थी।
कागज़ के शीर्ष पर लिखा था—
**मृत्यु से पहले का बयान।**
नीचे एक खाली जगह थी।
“यह क्या है?” अर्जुन ने पूछा।
“मेरी गवाही।”
“तुम्हें मरने से पहले बयान देना था?”
“मुझे मरने से पहले किसी ने जीवित माना ही नहीं।”
अर्जुन ने कलम उठाई।
“मैं क्या लिखूँ?”
“जो तुमने देखा।”
“मैंने तुम्हें देखा था।”
“और?”
“मैंने तुम्हारा हाथ छोड़ा था।”
“और?”
अर्जुन की आँखों में आँसू भर आए।
“मैं बाहर आ गया था।”
“और?”
अर्जुन ने कलम कसकर पकड़ ली।
“मैंने दरवाज़ा बंद कर दिया था।”
अँधेरे में बच्चे की साँस सुनाई दी।
“अब मेरा नाम लिखो।”
अर्जुन ने कागज़ पर कलम रखी।
उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। उसे लगा कि वह विहान लिखने वाला है। लेकिन जैसे ही उसने पहला अक्षर बनाया, स्याही फैल गई।
विहान मिट गया।
उसकी जगह दूसरा नाम उभरा—
**अभय।**
अर्जुन ने उसे काट दिया।
फिर लिखा—
**अर्णव।**
वह भी मिट गया।
उसने ईशान लिखा।
वह नाम भी गायब हो गया।
अर्जुन ने कलम फेंक दी।
“तुम्हारा नाम है ही नहीं!”
अँधेरे में बच्चा चुप हो गया।
फिर उसने कहा, “अब तुम समझे।”
“क्या?”
“उन्होंने मेरा नाम इसलिए नहीं मिटाया कि वह कोई रहस्य था। उन्होंने मेरा नाम इसलिए मिटाया क्योंकि नाम लिखने वाला हर व्यक्ति मुझे किसी दूसरे बच्चे के रूप में याद करने लगता था।”
अर्जुन ने कागज़ को देखा।
उस पर अब सिर्फ एक वाक्य था—
**“मैं वह बच्चा हूँ, जिसे किसी ने पैदा नहीं किया, लेकिन जिसके कारण बाकी सब पैदा हुए।”**
अर्जुन की साँस रुक गई।
“यह कैसे संभव है?”
“तुम्हें यही सवाल पूछना चाहिए।”
“किससे?”
बच्चे ने उत्तर दिया—
“उस आदमी से, जिसने तुम्हें पहली बार पिता कहा था।”
अर्जुन ने सिर उठाया।
अँधेरे में एक आकृति दिखाई दी।
डॉ. नीलकंठ।
वह सफेद कोट में खड़ा था। उसका चेहरा बूढ़ा था, लेकिन उसकी आँखें वही थीं जो रिकॉर्डिंग में थीं।
“तुमने मुझे देखा था,” नीलकंठ ने कहा।
अर्जुन ने पूछा, “तुमने मुझे जन्म दिया था?”
नीलकंठ ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“तो तुम मेरे पिता हो?”
“यह भी नहीं।”
“फिर तुमने मेरा नाम क्यों लिखा?”
नीलकंठ की आँखें भर आईं।
“क्योंकि जब मैंने पहली बार तुम्हें देखा, तुमने मुझे पिता कहा था।”
अर्जुन ने सिर पकड़ लिया।
“मैं तुम्हें नहीं जानता!”
“तुम मुझे नहीं जानते। लेकिन तुम्हारे भीतर जो बच्चा है, वह मुझे जानता है।”
“मेरे भीतर कोई बच्चा नहीं है!”
नीलकंठ ने उसकी छाती की ओर देखा।
“तब यह चौथी दस्तक किसकी है?”
अर्जुन ने अपने सीने पर हाथ रखा।
ठक।
ठक।
ठक।
और फिर—
ठक।
नीलकंठ ने कहा, “मैंने उस रात दो बच्चों की मृत्यु दर्ज की थी। एक की धड़कन बंद हो गई थी। दूसरे की कभी शुरू ही नहीं हुई थी।”
“और तीसरा?”
“तीसरे को मैंने अपनी आँखों से देखा था।”
“वह कौन था?”
नीलकंठ ने अर्जुन की तरफ देखा।
“तुम।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
अर्जुन ने बहुत धीरे से पूछा, “मैं पैदा होने से पहले मर गया था?”
नीलकंठ ने सिर हिलाया।
“नहीं। तुम पैदा होने से पहले किसी और की याद में पैदा हो चुके थे।”
“इसका मतलब?”
“इसका मतलब यह कि जिस रात तुम्हें जन्मा हुआ दर्ज किया गया, उसी रात एक ऐसी पहचान को शरीर मिला जो उससे पहले सिर्फ आईने में मौजूद थी।”
अर्जुन पीछे हट गया।
“तो मैं कौन हूँ?”
नीलकंठ ने उत्तर देने के बजाय मेज़ पर पड़े बयान की ओर इशारा किया।
“तुम्हें उसकी गवाही पूरी करनी होगी।”
अर्जुन ने कागज़ उठाया।
उस पर अब एक आखिरी पंक्ति उभरी थी—
**“मेरी माँ का नाम राधा नहीं है।”**
अर्जुन ने राधा की तरफ देखा।
वह दरवाज़े के पास खड़ी थी। उसकी आँखें काली थीं, लेकिन उनमें आँसू थे।
“तो आपकी माँ कौन है?” अर्जुन ने पूछा।
राधा ने होंठ खोले।
लेकिन उससे पहले आईने के भीतर से किसी औरत की आवाज़ आई—
“मैं।”
वह आवाज़ उसकी अपनी माँ की थी।
वही औरत, जिसने उसे बचपन में सीने से लगाया था। वही, जिसने उसे देवगढ़ से दूर भेजा था। वही, जिसने कहा था कि अँधेरा होने के बाद किसी आवाज़ का जवाब मत देना।
अर्जुन ने दरवाज़े की तरफ देखा।
वहाँ कोई नहीं था।
फिर भी आवाज़ साफ़ थी।
“अर्जुन, बेटा। मुझे पहचानो।”
राधा ने सिर झुका लिया।
नीलकंठ पीछे हट गया।
मीरा कहीं दिखाई नहीं दे रही थी।
अर्जुन ने अँधेरे में कहा, “आप मेरी माँ हैं?”
आवाज़ आई—
“मैंने तुम्हें गोद में लिया था।”
“लेकिन आपने मुझे जन्म नहीं दिया?”
लंबी चुप्पी के बाद जवाब आया—
“मैंने तुम्हें जन्म दिया था।”
अर्जुन ने राहत की साँस लेने की कोशिश की, लेकिन आवाज़ ने अगला वाक्य कहा—
“उस रात नहीं।”
उसकी साँस फिर अटक गई।
“तो कब?”
“उससे पहले।”
“कैसे?”
“जब तुम मेरे बेटे नहीं थे।”
अर्जुन के पैरों के नीचे फर्श हिलने लगा।
दीवारें दूर जाने लगीं। कमरा लंबा होता गया। नीलकंठ, राधा और मेज़ धीरे-धीरे धुंध में खो गए।
अब उसके सामने सिर्फ एक दरवाज़ा था।
उस दरवाज़े पर कोई अंक नहीं था। कोई निशान नहीं था। कोई ताला नहीं था।
सिर्फ एक नाम लिखा था।
वह नाम किसी भी कागज़ पर नहीं था।
वह नाम किसी तस्वीर के पीछे नहीं छिपा था।
वह नाम न अभय था, न अर्णव, न ईशान और न विहान।
अर्जुन उसे पढ़ नहीं पाया।
क्योंकि जैसे ही उसकी आँखें अक्षरों पर टिकतीं, उसे लगता कि वह नाम पहले से उसके भीतर लिखा है।
दरवाज़े के पीछे से एक बच्चा बोला—
“अब तुमने मेरी गवाही सुन ली।”
अर्जुन ने पूछा, “क्या अब तुम बाहर आओगे?”
बच्चे ने जवाब दिया—
“मैं कभी अंदर था ही नहीं।”
“तो तुम कहाँ थे?”
“तुम्हारी पहली याद में।”
अर्जुन ने दरवाज़े को छुआ।
लकड़ी के पीछे से एक धड़कन सुनाई दी।
फिर दूसरी।
फिर तीसरी।
और चौथी दस्तक।
इस बार दरवाज़े के पीछे से किसी बच्चे की आवाज़ नहीं आई।
एक आदमी की आवाज़ आई।
गहरी, थकी हुई, मगर अर्जुन की अपनी आवाज़ जैसी।
“बेटा, दरवाज़ा मत खोलना।”
अर्जुन का हाथ रुक गया।
“कौन हो तुम?”
“वह आदमी, जो तुम्हारा पिता नहीं था।”
“विक्रम?”
“नहीं।”
“नीलकंठ?”
“नहीं।”
“फिर कौन?”
दरवाज़े के पीछे से जवाब आया—
“वह, जिसने तुम्हारी माँ को पहली बार माँ कहा था।”
अर्जुन ने अपना हाथ दरवाज़े से हटा लिया।
तभी उसके पीछे किसी ने फुसफुसाया—
“भैया…”
वह मीरा की आवाज़ थी।
अर्जुन पलटा।
गलियारे में मीरा खड़ी थी। उसके चेहरे पर आँसू थे। उसके हाथ में चाँदी की घंटी थी। लेकिन उसके पैरों के नीचे कोई परछाईं नहीं थी।
“भैया, चलो यहाँ से।”
अर्जुन ने उसे देखा।
“तुम कहाँ चली गई थीं?”
“मैं यहीं थी।”
“तुमने सब सुना?”
मीरा ने सिर हिलाया।
“तो तुम जानती हो कि मैं कौन हूँ?”
मीरा ने बहुत धीरे से कहा, “नहीं।”
अर्जुन ने उसकी आँखों में देखा।
“तुम भी नहीं जानतीं?”
“मैं इतना जानती हूँ कि तुमने उस बच्चे को नहीं छोड़ा था।”
अर्जुन की आँखों में उम्मीद जगी।
“तुम्हें याद आ गया?”
मीरा ने सिर हिलाया।
“नहीं, भैया। मुझे याद नहीं आया। मुझे किसी ने बताया।”
“किसने?”
मीरा ने पीछे देखा।
गलियारे के आखिरी छोर पर एक बूढ़ा आदमी खड़ा था।
उसका चेहरा अँधेरे में छिपा था। उसके दाहिने हाथ पर तीन काली लकीरें थीं।
वह धीरे-धीरे आगे आया।
“मैंने बताया,” उसने कहा।
अर्जुन ने उसे पहचानने की कोशिश की।
उस आदमी ने अपना चेहरा रोशनी में किया।
वह विक्रम शर्मा था।
लेकिन उसकी आँखों में वह डर था, जो अर्जुन ने कभी अपने पिता में नहीं देखा था।
विक्रम ने अर्जुन की तरफ देखा और कहा—
“तुम्हें उस बच्चे की गवाही पर भरोसा नहीं करना चाहिए।”
“क्यों?”
“क्योंकि उसने अपनी मौत की तारीख गलत बताई है।”
अर्जुन का गला सूख गया।
“उसकी मौत कब हुई थी?”
विक्रम ने उत्तर दिया—
“17 जुलाई 1995 को नहीं।”
“तो कब?”
विक्रम ने तीसरी मंज़िल की ओर देखा।
“जिस रात तुम पहली बार घर लौटे थे।”
अर्जुन का चेहरा सफेद पड़ गया।
“2023?”
विक्रम ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
वह अर्जुन के पास आया।
“उस रात, जब तुम पंद्रह साल बाद देवगढ़ लौटे थे, तुम अकेले नहीं लौटे थे।”
अर्जुन ने पीछे देखा।
गलियारे के आखिरी छोर पर एक बच्चा खड़ा था।
उसका चेहरा अर्जुन जैसा था।
उसकी कलाई पर तीन काली लकीरें थीं।
और उसके पैरों के नीचे परछाईं थी।
अर्जुन की नहीं।
विक्रम ने फुसफुसाकर कहा—
“तुम्हारे साथ वही बच्चा लौटा था, जिसकी मृत्यु मैंने 1995 में दर्ज की थी।”
बच्चे ने मुस्कराकर हाथ हिलाया।
“भैया,” उसने कहा, “अब मेरी बारी है।”
उसी पल घर की सारी बत्तियाँ बुझ गईं।
अँधेरे में अर्जुन ने मीरा का हाथ पकड़ने की कोशिश की।
लेकिन किसी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
उसकी उँगलियाँ लंबी थीं।
हथेली बर्फ जैसी ठंडी थी।
और कलाई पर तीन काली लकीरें थीं।
फिर उसके कान के पास किसी ने कहा—
**“तुमने मेरी गवाही सुन ली। अब तुम्हें मेरी जगह भी लेनी होगी।”**
अर्जुन ने चीखना चाहा।
लेकिन उसके मुँह से आवाज़ नहीं निकली।
क्योंकि उस क्षण उसे पहली बार समझ आया कि चौथी दस्तक किसी को बाहर बुलाने के लिए नहीं थी।
वह किसी को भीतर बंद करने के लिए थी।
और दरवाज़ा खुल चुका था।
एपिसोड 20 समाप्त
- Writer
- firoj saifi
- Story
- “अंधेरे में कोई है”
- Chapter
- 20 of 22
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 38 min
- Words
- 7488
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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