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एपिसोड 19: दो विक्रम, एक मौत
firoj saifi · Ghost Stories · 26 मिनट
पुराने प्रसूति गृह के सामने खड़ा आदमी मुस्करा रहा था।
उसने विक्रम शर्मा के कपड़े पहन रखे थे। वही भूरी शर्ट, वही पुरानी घड़ी, वही दाहिने हाथ की उँगली में चाँदी की अंगूठी।
उसका चेहरा भी विक्रम जैसा था।
लेकिन उसकी कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं।
अर्जुन उसे देखता रहा।
“तुमने कहा कि मैंने तुम्हें जन्म दिया है।”
आदमी ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
“तुम कौन हो?”
“तुम्हारे पिता।”
“मेरे पिता 2013 में मर गए थे।”
“तुम्हें किसने बताया?”
“मेरे परिवार ने।”
“तुम्हारे परिवार ने तुम्हें यह भी बताया होगा कि तुम 1995 में पैदा हुए थे।”
अर्जुन चुप रहा।
आदमी ने मुस्कराकर कहा, “देखा? तुम हर बात पर भरोसा कर लेते हो, जब तक वह तुम्हारे पुराने विश्वास से मेल खाती है।”
अर्जुन ने पीछे हटते हुए पूछा, “तुम असली विक्रम हो?”
आदमी ने अपनी कलाई दिखाई।
तीन काली रेखाएँ हल्की-हल्की चमक रही थीं।
“अगर मैं असली नहीं हूँ, तो तुम्हें यह निशान कैसे पता है?”
“मुझे नहीं पता।”
“झूठ। तुम्हें सब पता है। बस तुम्हें याद नहीं।”
अर्जुन ने जेब से पहचान-पट्टी निकाली।
“तुम्हारा नाम इस पर नहीं है।”
आदमी ने पट्टी को देखा।
उसकी मुस्कान गायब हो गई।
“यह तुम्हें कहाँ मिली?”
“पुराने प्रसूति गृह में।”
“किसने दी?”
“मुझे नहीं पता।”
आदमी ने हाथ बढ़ाया।
“मुझे दे दो।”
अर्जुन ने पट्टी पीछे खींच ली।
“पहले बताओ, इसमें किसका नाम लिखा है।”
आदमी ने उसकी आँखों में देखा।
“जिस बच्चे का नाम इस पर लिखा है, वह कभी पैदा नहीं हुआ था।”
“लेकिन पट्टी पर राधा का नाम है।”
“राधा ने उसे जन्म दिया था।”
“आपने कहा था कि आपने मुझे जन्म दिया।”
आदमी ने सिर झुकाया।
“मैंने तुम्हें नहीं, तुम्हारी पहचान को जन्म दिया था।”
अर्जुन के सिर में दर्द उठने लगा।
“यह सब क्या है? आप हर बार नई बात क्यों कहते हैं?”
आदमी ने उसकी तरफ कदम बढ़ाया।
“क्योंकि हर बार तुम नया सवाल पूछते हो।”
“मुझे सीधे जवाब चाहिए।”
“तो सीधा जवाब सुनो। 2013 में जो मरा था, वह मेरा बेटा था। लेकिन वह अर्जुन नहीं था।”
अर्जुन की साँस रुक गई।
“उसका नाम क्या था?”
आदमी ने कहा—
“वह नाम तुम्हारे पास है।”
अर्जुन ने अपनी छाती पर हाथ रख लिया।
उसके भीतर तीन दस्तकें सुनाई दीं।
टक।
टक।
टक।
आदमी ने धीरे से कहा, “अब घर जाओ। तुम्हारी माँ इंतज़ार कर रही है।”
“आपने अभी कहा था कि मुझे घर नहीं जाना चाहिए।”
“मैंने ऐसा कब कहा?”
अर्जुन ने उसकी आँखों में देखा।
आदमी की आँखें अब भूरी नहीं थीं।
वे काली थीं।
अर्जुन समझ गया कि सामने खड़ा आदमी वही नहीं था, जिससे उसने कुछ क्षण पहले बात की थी।
या फिर दोनों एक ही थे।
उसने पीछे हटते हुए पूछा, “आपका नाम क्या है?”
आदमी ने अपना सिर तिरछा किया।
“विक्रम।”
“पूरा नाम?”
“विक्रम शर्मा।”
“आपकी मृत्यु कब हुई?”
आदमी की मुस्कान लौट आई।
“जिस दिन तुमने मुझे पिता कहना बंद कर दिया।”
अचानक प्रसूति गृह की सारी खिड़कियाँ एक साथ खुल गईं।
अंदर से बच्चों के रोने की आवाज़ आई।
आदमी ने दरवाज़े की तरफ देखा।
फिर अर्जुन से कहा—
“अगर तुम जानना चाहते हो कि 2013 में क्या हुआ था, तो तुम्हें घर के उस कमरे में जाना होगा, जिसे शारदा ने कभी बंद नहीं किया था।”
“कौन-सा कमरा?”
आदमी ने उत्तर दिया—
“तुम्हारे पिता का कमरा।”
अगले ही पल वह गायब हो गया।
सड़क पर केवल अर्जुन खड़ा था।
उसके पैरों के नीचे दो परछाइयाँ थीं।
एक उसकी थी।
दूसरी ने विक्रम का चेहरा बना रखा था।
***
शर्मा निवास पहुँचते-पहुँचते सुबह हो चुकी थी।
आसमान पर धूप निकल आई थी, मगर घर के आँगन में अँधेरा था। बरामदे के खंभों पर काई जमी थी। मुख्य दरवाज़ा खुला हुआ था।
अर्जुन भीतर दाखिल हुआ।
हॉल में माँ बैठी थीं।
उनके सामने चाय का कप रखा था। कप से भाप नहीं उठ रही थी। उनके पास वाली कुर्सी पर कोई आदमी बैठा था।
विक्रम शर्मा।
वही चेहरा।
वही कपड़े।
वही घड़ी।
अर्जुन दरवाज़े पर रुक गया।
माँ ने उसे देखा।
“तुम आ गए।”
अर्जुन ने विक्रम से नज़र नहीं हटाई।
“यह कौन है?”
माँ ने चौंककर कहा, “तुम्हारे पिता।”
“पापा मर चुके हैं।”
माँ ने धीरे से सिर हिलाया।
“तुमने भी यही कहा था, जब वह पहली बार लौटे थे।”
अर्जुन के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
“पहली बार?”
विक्रम ने कुर्सी से उठकर उसकी तरफ हाथ बढ़ाया।
“बेटा।”
अर्जुन पीछे हट गया।
“मुझे मत छूना।”
विक्रम रुक गया।
“तुम्हें डर लग रहा है?”
“आप असली नहीं हैं।”
विक्रम ने माँ की तरफ देखा।
“तुमने इसे क्या बताया?”
माँ ने जवाब नहीं दिया।
अर्जुन ने पूछा, “आप 2013 में मरे थे?”
विक्रम ने कहा, “हाँ।”
“तो आप यहाँ कैसे बैठे हैं?”
“मुझे नहीं पता।”
“आपने अपनी मौत देखी थी?”
“हाँ।”
“तो आपका अंतिम संस्कार किसने किया?”
विक्रम चुप हो गया।
अर्जुन ने माँ की तरफ देखा।
“आपने इनका अंतिम संस्कार किया था?”
माँ ने धीरे से सिर हिलाया।
“मैंने चिता देखी थी।”
“शव देखा था?”
माँ की आँखें झुक गईं।
“नहीं।”
“चेहरा देखा था?”
“नहीं।”
“तो फिर आपने कैसे माना कि यह पापा थे?”
माँ की आँखों में आँसू भर आए।
“क्योंकि उनकी आवाज़ थी।”
अर्जुन ने विक्रम की तरफ देखा।
वह आदमी चुपचाप उसे देख रहा था।
“आपकी आवाज़,” अर्जुन ने कहा, “किसी की भी हो सकती है।”
विक्रम ने धीरे से सिर हिलाया।
“हाँ।”
उसके इस जवाब ने अर्जुन को और डरा दिया।
“आप यह मान रहे हैं?”
“मैं यह मान रहा हूँ कि तुम सही हो।”
“तो फिर साबित कीजिए कि आप मेरे पिता हैं।”
विक्रम ने कुछ देर सोचा।
फिर बोला, “जब तुम आठ साल के थे, तुमने आँगन में रखे पुराने कुएँ में झाँकने की कोशिश की थी। तुम्हारा पैर फिसल गया था। मैंने तुम्हें खींचकर बाहर निकाला था।”
अर्जुन ने कहा, “यह बात घर के हर आदमी को पता है।”
“जब तुम दस साल के थे, तुमने मेरी घड़ी तोड़ दी थी। तुमने कहा था कि बिल्ली ने उसे गिरा दिया।”
“यह भी मुझे याद है।”
“नहीं,” विक्रम ने कहा। “तुम्हें यह याद है कि तुमने झूठ बोला था। तुम्हें यह याद नहीं कि मैंने तुम्हें सज़ा देने के बजाय अपनी घड़ी तुम्हें दे दी थी। तुमने वह घड़ी तकिए के नीचे रखी थी। तीन रात बाद तुमने मुझसे कहा था कि घड़ी के भीतर कोई रो रहा है।”
अर्जुन का चेहरा बदल गया।
यह बात उसने कभी किसी को नहीं बताई थी।
विक्रम ने आगे कहा, “तुमने मुझसे पूछा था कि क्या घड़ियों में भी आत्माएँ होती हैं। मैंने कहा था, नहीं। फिर तुमने कहा था कि अगर आत्माएँ नहीं होतीं, तो घड़ी के भीतर से तुम्हारा नाम कौन ले रहा था।”
अर्जुन की आँखों में बचपन का एक धुँधला दृश्य उभरा।
रात।
तकिया।
घड़ी के भीतर से आती आवाज़।
*अर्जुन… अर्जुन…*
उसने सिर झटक दिया।
“यह याद भी बनाई जा सकती है।”
विक्रम ने कहा, “हाँ।”
अर्जुन ने गुस्से से पूछा, “तो मैं आप पर भरोसा कैसे करूँ?”
विक्रम ने धीरे से उत्तर दिया—
“मत करो।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
विक्रम ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा, “अगर तुम मुझ पर भरोसा कर लोगे, तो तुम वही गलती करोगे, जो मैंने 1995 में की थी।”
“कौन-सी गलती?”
विक्रम ने अपनी हथेलियाँ देखीं।
“मैंने उस बच्चे को अपना बेटा मान लिया था, जिसने सबसे पहले मुझे पिता कहा।”
***
अर्जुन अपने पिता के पुराने कमरे की तरफ चला गया।
कमरा पहली मंज़िल के उस हिस्से में था, जहाँ वह बचपन में बहुत कम जाता था। दरवाज़े पर पुराना ताला लगा था, लेकिन चाबी उसी गुच्छे में थी, जो शारदा देवी की चीज़ों के साथ मिला था।
ताले में चाबी घुमाते ही भीतर से धातु के घिसने की आवाज़ आई।
दरवाज़ा खुल गया।
कमरे में धूल जमी थी। खिड़कियों पर मोटे पर्दे थे। दीवार पर विक्रम और शारदा देवी की तस्वीर टँगी थी। मेज़ पर पुरानी डायरी, एक टेप रिकॉर्डर और कुछ सरकारी दस्तावेज़ रखे थे।
अर्जुन ने पर्दे हटाए।
धूप भीतर आई।
कमरे में किसी के बैठे होने के निशान थे। कुर्सी पर धूल नहीं थी। मेज़ पर रखे गिलास में पानी भरा हुआ था।
अर्जुन ने गिलास उठाया।
पानी में उसका चेहरा दिखाई दिया।
लेकिन उसके प्रतिबिंब की आँखें बंद थीं।
अर्जुन ने गिलास नीचे रख दिया।
उसने मेज़ की दराज़ खोली।
पहली दराज़ में पुराने पत्र थे। दूसरी में अस्पताल की पर्चियाँ। तीसरी में एक छोटा लकड़ी का डिब्बा रखा था।
डिब्बे पर तीन काली रेखाएँ बनी थीं।
अर्जुन ने उसे खोला।
अंदर एक पुरानी घड़ी थी।
वही घड़ी, जिसका ज़िक्र विक्रम ने किया था।
घड़ी के पीछे छोटे अक्षरों में लिखा था—
**“जिस दिन अर्जुन घर लौटे, इसे उसे दे देना।”**
उसके नीचे दूसरी लिखावट थी—
**“अगर वह लौटे, तो यह घड़ी मत देना।”**
दोनों लिखावटें एक ही हाथ की थीं।
अर्जुन ने घड़ी कान के पास लगाई।
उसके भीतर टिक-टिक नहीं हो रही थी।
वहाँ किसी बच्चे की धीमी साँसें सुनाई दे रही थीं।
फिर एक फुसफुसाहट आई—
“भैया…”
अर्जुन ने घड़ी मेज़ पर रख दी।
उसके भीतर से आवाज़ आई—
“मुझे बाहर निकालो।”
अर्जुन ने घड़ी का ढक्कन खोला।
अंदर मशीनरी की जगह एक छोटी काली जगह थी, जैसे घड़ी के भीतर कोई गहरा कुआँ हो।
उस कुएँ में एक बच्चा बैठा था।
उसने सिर उठाया।
“तुम फिर आ गए।”
अर्जुन ने ढक्कन बंद कर दिया।
कमरे में तीन दस्तकें गूँजीं।
टक।
टक।
टक।
फिर दरवाज़े के बाहर से विक्रम की आवाज़ आई—
“बेटा, क्या तुमने उसे खोल दिया?”
अर्जुन ने जवाब नहीं दिया।
“अर्जुन?”
वह चुप रहा।
“मुझे पता है तुम अंदर हो।”
अर्जुन ने दरवाज़े के पास जाकर झिरी से बाहर देखा।
विक्रम खड़ा था।
लेकिन उसकी परछाईं दरवाज़े से उलटी दिशा में फैली हुई थी।
अर्जुन ने पूछा, “आपको इस घड़ी के बारे में पता है?”
विक्रम ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
“इसके अंदर क्या है?”
“तुम्हारी पहली याद।”
“मेरी पहली याद क्या है?”
विक्रम ने धीरे से कहा—
“तुम्हारी मौत।”
***
अर्जुन ने दरवाज़ा खोल दिया।
विक्रम भीतर आया और घड़ी को देखते ही रुक गया।
“तुमने इसे खोल लिया?”
“नहीं। मैंने बस ढक्कन उठाया था।”
विक्रम ने घड़ी उठा ली।
“तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था।”
“क्यों?”
“क्योंकि अब इसे पता चल गया है कि तुम लौट आए हो।”
“किसे?”
विक्रम ने घड़ी वापस डिब्बे में रख दी।
“जिसने तुम्हें पहली बार देखा था।”
अर्जुन ने पूछा, “क्या वह ईशान है?”
“नहीं।”
“अभय?”
“नहीं।”
“तो फिर कौन?”
विक्रम ने कुछ देर तक उसे देखा।
“तुमने कभी सोचा कि शारदा देवी ने तीसरी मंज़िल को बंद क्यों किया था?”
“आईने में मौजूद परछाईं को रोकने के लिए।”
“यह आधा सच है।”
“बाकी आधा?”
“तीसरी मंज़िल पर केवल आईना नहीं था। वहाँ एक कमरा था, जिसमें आईना कभी लगाया ही नहीं गया।”
अर्जुन को पुराने प्रसूति गृह की बात याद आई।
“जिस कमरे में मेरा जन्म नहीं हुआ?”
विक्रम ने सिर हिलाया।
“उस कमरे में कोई आईना नहीं था, क्योंकि वहाँ मौजूद हर चीज़ खुद प्रतिबिंब थी।”
अर्जुन चुप रहा।
विक्रम ने आगे कहा, “1995 में जब दो बच्चे पैदा हुए, शारदा ने एक बच्चे को घर लाने का फैसला किया। दूसरे को अस्पताल में मृत घोषित कर दिया गया। लेकिन वह दूसरा बच्चा वहाँ से गायब हो गया।”
“आईने के भीतर?”
“शायद।”
“और तीसरा बच्चा?”
विक्रम की आँखें बदल गईं।
“तीसरे का जन्म कभी हुआ ही नहीं।”
“लेकिन उसका नाम दर्ज है।”
“नाम दर्ज होने से जन्म साबित नहीं होता।”
अर्जुन ने पूछा, “तो 2013 में क्या हुआ?”
विक्रम ने लंबी साँस ली।
“2013 में वह बच्चा घर लौटा, जिसे हम मृत समझते थे।”
“कौन-सा बच्चा?”
“वही, जो अस्पताल से गायब हुआ था।”
“उसने किसका चेहरा लिया?”
विक्रम ने अर्जुन की तरफ देखा।
“तुम्हारा।”
अर्जुन ने कहा, “तो मैं कौन हूँ?”
विक्रम ने तुरंत जवाब नहीं दिया।
फिर बोला—
“तुम वह हो, जिसे मैंने घर लाया था।”
“और दूसरा अर्जुन?”
“वह भी वही है।”
अर्जुन ने माथा पकड़ लिया।
“आप कह रहे हैं कि हम दोनों एक ही हैं?”
“नहीं।”
“तो फिर?”
विक्रम ने कहा, “तुम दोनों अलग हो। लेकिन तुम्हारी शुरुआत एक ही जगह से हुई थी।”
“हम दोनों में से असली कौन है?”
विक्रम ने खिड़की की तरफ देखा।
“यह सवाल शारदा ने मुझसे भी पूछा था।”
“आपने क्या जवाब दिया?”
“मैंने कहा था कि जो बच्चा मेरे साथ घर जाएगा, वही मेरा बेटा होगा।”
“फिर?”
विक्रम की आवाज़ टूट गई।
“शारदा ने पूछा—और जो बच्चा पीछे रह जाएगा, वह किसका बेटा होगा?”
अर्जुन चुप हो गया।
विक्रम ने कहा, “मैंने उस सवाल का जवाब नहीं दिया। यही मेरी सबसे बड़ी गलती थी।”
***
मेज़ पर रखे टेप रिकॉर्डर की लाल बत्ती अपने आप जल उठी।
अर्जुन और विक्रम दोनों ने उसकी तरफ देखा।
रिकॉर्डर से खड़खड़ाहट आई।
फिर एक औरत की आवाज़ सुनाई दी।
“17 जुलाई 2013। रात 2:47।”
अर्जुन ने रिकॉर्डर उठा लिया।
आवाज़ शारदा देवी की थी।
“अगर यह रिकॉर्डिंग कोई सुन रहा है, तो इसका मतलब है कि विक्रम ने फिर से अपने बेटे को घर लाने की कोशिश की है। मुझे नहीं पता कि वह किसे लाएगा। मुझे यह भी नहीं पता कि इस बार कौन बाहर रहेगा।”
रिकॉर्डिंग में कुछ गिरने की आवाज़ आई।
फिर शारदा बोलीं—
“रात 3:13 पर दरवाज़ा खुलेगा। उसके बाद घर में दो विक्रम होंगे। दोनों का चेहरा एक होगा। दोनों की आवाज़ एक होगी। दोनों को अर्जुन की हर याद पता होगी। लेकिन एक बात उन्हें अलग करेगी।”
अर्जुन ने रिकॉर्डर के करीब जाकर सुना।
शारदा की आवाज़ बहुत धीमी हो गई।
“एक विक्रम अपनी मौत याद रखेगा। दूसरा अपनी मौत का कारण भूल चुका होगा।”
रिकॉर्डिंग कुछ पल के लिए रुक गई।
फिर शारदा बोलीं—
“अगर तुम पहचानना चाहो कि कौन असली है, तो उनसे यह मत पूछना कि वे कब मरे। उनसे पूछना कि उन्होंने आखिरी बार किसे बचाने की कोशिश की थी।”
अर्जुन ने रिकॉर्डर रोक दिया।
उसने विक्रम की तरफ देखा।
“आपने आखिरी बार किसे बचाने की कोशिश की थी?”
विक्रम ने कहा, “तुम्हें।”
“और दूसरे विक्रम ने?”
“वह भी यही कहेगा।”
“तो फिर पहचान कैसे होगी?”
विक्रम ने जवाब नहीं दिया।
अर्जुन ने रिकॉर्डर फिर चालू किया।
शारदा की आवाज़ वापस आई।
“एक और बात। दोनों विक्रमों की परछाईं नहीं होगी। लेकिन उनमें से एक की परछाईं किसी दूसरे व्यक्ति की होगी।”
रिकॉर्डिंग में तेज खड़खड़ाहट हुई।
“अगर वह परछाईं तुम्हारी तरफ देखे, तो समझ जाना कि तुमने गलत विक्रम को चुन लिया है।”
टेप अचानक बंद हो गया।
अर्जुन ने सिर उठाया।
कमरे के दरवाज़े पर विक्रम खड़ा था।
लेकिन उसके पास पहले से खड़ा विक्रम भी वहीं था।
दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे।
दोनों की कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं।
और दोनों के नीचे कोई परछाईं नहीं थी।
***
“तुम कौन हो?” अर्जुन ने पूछा।
दोनों विक्रमों ने एक साथ जवाब दिया—
“मैं तुम्हारा पिता हूँ।”
अर्जुन ने दोनों को ध्यान से देखा।
पहला विक्रम मेज़ के पास खड़ा था।
दूसरा दरवाज़े के पास।
पहले ने कहा, “उससे दूर रहो। वह तुम्हें धोखा देगा।”
दूसरे ने कहा, “उसकी बात मत सुनना। वह तुम्हें वापस आईने में भेजना चाहता है।”
अर्जुन ने पूछा, “आप दोनों में से किसने 2013 में मृत्यु प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर किए थे?”
पहले विक्रम ने कहा, “मैंने।”
दूसरे ने भी कहा, “मैंने।”
“किसके?”
पहला बोला, “अर्जुन शर्मा के।”
दूसरा बोला, “ईशान शर्मा के।”
अर्जुन ने फाइल निकाली।
“इसमें दोनों नाम हैं।”
पहले विक्रम ने कहा, “क्योंकि उस रात दो शव थे।”
दूसरे ने सिर हिलाया।
“नहीं। उस रात कोई शव नहीं था।”
पहले विक्रम ने उसकी तरफ देखा।
“तुम झूठ बोल रहे हो।”
“तुम्हें याद नहीं है कि तुमने किसका अंतिम संस्कार किया था?”
“मुझे अपने बेटे का चेहरा याद है।”
दूसरे विक्रम ने धीरे से पूछा—
“किस बेटे का?”
पहला विक्रम चुप हो गया।
अर्जुन ने दूसरे से पूछा, “आपको याद है?”
दूसरे विक्रम ने कहा, “मुझे याद है कि मैंने एक बच्चे को गोद में उठाया था। वह साँस नहीं ले रहा था। मैंने उसे छाती से लगाया। मैंने उसे पुकारा। फिर उसने आँखें खोल दीं।”
“उसका नाम क्या था?”
“मुझे याद नहीं।”
“तो फिर आपको कैसे पता कि वह आपका बेटा था?”
दूसरे विक्रम की आँखों में आँसू भर आए।
“क्योंकि उसने मुझे पिता कहा था।”
अर्जुन के हाथ ठंडे पड़ गए।
शारदा की रिकॉर्डिंग में कहा गया था कि असली विक्रम अपनी मौत याद रखेगा, जबकि दूसरा अपनी मौत का कारण भूल चुका होगा।
अर्जुन ने पहले विक्रम की तरफ देखा।
“आपकी मौत कैसे हुई थी?”
पहले विक्रम ने कहा, “2013 में मैं तीसरी मंज़िल पर गया था। आईना टूट गया था। मैं अपने बेटे को बचाने के लिए भीतर गया। फिर मुझे कुछ याद नहीं।”
दूसरे विक्रम ने कहा, “मैं 2013 में मरा नहीं था।”
अर्जुन ने पूछा, “तो आप कहाँ थे?”
दूसरे ने उत्तर दिया, “मैं आईने के भीतर था।”
दोनों एक-दूसरे को घूरने लगे।
पहले विक्रम ने कहा, “वह झूठ बोल रहा है।”
दूसरे ने कहा, “वह भी आईने के भीतर था।”
अर्जुन ने पूछा, “तो फिर बाहर कौन आया?”
दोनों ने एक साथ उसकी तरफ देखा।
और एक साथ कहा—
**“तुम।”**
***
अर्जुन पीछे हट गया।
कमरे की दीवारें जैसे दूर जाने लगीं। छत ऊँची होती गई। खिड़की के बाहर का दृश्य बदल गया।
अब वहाँ बारिश हो रही थी।
कमरे की घड़ी 3:13 पर रुक गई।
पहला विक्रम अर्जुन की तरफ बढ़ा।
“बेटा, मेरी बात सुनो।”
दूसरे ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“उसकी बात मत सुनना।”
दोनों में झगड़ा होने लगा।
एक ने दूसरे को धक्का दिया।
दूसरा दीवार से टकराया।
लेकिन दीवार पर कोई निशान नहीं पड़ा।
अर्जुन ने देखा कि दोनों के शरीर के आर-पार दीवार की छाया दिखाई दे रही थी।
जैसे दोनों पूरी तरह ठोस न हों।
पहले विक्रम ने कहा, “तुम्हें याद है, मैंने तुम्हें क्या सिखाया था? अँधेरे में कभी किसी आवाज़ पर भरोसा मत करना।”
दूसरे ने तुरंत कहा, “नहीं, मैंने तुम्हें यह सिखाया था।”
अर्जुन ने दोनों की तरफ देखा।
“यह बात मुझे माँ ने सिखाई थी।”
दोनों विक्रम चुप हो गए।
अर्जुन ने आगे कहा, “आप दोनों मेरे पिता होने का दावा करते हैं। लेकिन मेरे पिता ने मुझे कभी नहीं बताया कि अँधेरे में आवाज़ पर भरोसा नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा था—अगर कोई तुम्हें अँधेरे में बुलाए, तो पहले देखना कि तुम्हारी परछाईं किस तरफ है।”
पहला विक्रम मुस्कराया।
“तुम्हें याद आ गया।”
दूसरे विक्रम ने भी मुस्कराकर कहा—
“आखिरकार।”
अर्जुन का दिल बैठ गया।
दोनों को वही याद थी।
दोनों ने वही जवाब दिया था।
तभी कमरे के कोने में रखी घड़ी की सुइयाँ उलटी घूमने लगीं।
3:13।
3:12।
3:11।
फिर एकदम रुक गईं।
अर्जुन ने फर्श पर देखा।
दोनों विक्रमों की परछाइयाँ उभर आई थीं।
पहले की परछाईं लंबी थी और उसका सिर झुका हुआ था।
दूसरे की परछाईं छोटी थी और वह सीधी खड़ी थी।
फिर पहली परछाईं ने अपना सिर उठाया।
उसका चेहरा अर्जुन जैसा था।
दूसरी परछाईं ने अपना सिर उठाया।
उसका चेहरा मीरा जैसा था।
अर्जुन पीछे हट गया।
दोनों विक्रमों ने एक साथ कहा—
“अब चुनो।”
“किसे?”
पहले विक्रम ने कहा, “मुझे चुनोगे, तो तुम्हें तुम्हारी माँ मिल जाएगी।”
दूसरे ने कहा, “मुझे चुनोगे, तो तुम्हें तुम्हारा नाम मिल जाएगा।”
अर्जुन ने पूछा, “अगर मैं किसी को नहीं चुनूँ?”
दोनों ने एक साथ जवाब दिया—
“तो तुम्हारी जगह कोई और चुन लेगा।”
दरवाज़े के बाहर से माँ की आवाज़ आई।
“अर्जुन!”
वह उनकी तरफ दौड़ने लगा।
लेकिन दोनों विक्रमों ने उसका रास्ता रोक लिया।
पहले ने कहा, “वह तुम्हारी माँ नहीं है।”
दूसरे ने कहा, “वह तुम्हारी माँ है, लेकिन तुम्हें पहचानती नहीं।”
अर्जुन ने पूछा, “आप दोनों में से किसने 2013 में मेरा अंतिम संस्कार किया था?”
पहले विक्रम ने कहा, “मैंने।”
दूसरे ने कहा, “मैंने।”
अर्जुन ने चिल्लाकर पूछा, “किसका?”
दोनों चुप हो गए।
फिर दरवाज़े के बाहर से माँ की आवाज़ आई—
“अर्जुन, उनमें से किसी को मत चुनना!”
अर्जुन ने दरवाज़े की तरफ देखा।
माँ वहाँ खड़ी थीं।
उनके पीछे तीसरी आकृति थी।
एक आदमी, जिसका चेहरा नहीं था।
माँ ने कहा, “तुम्हारे पिता दोनों नहीं हैं।”
दोनों विक्रम एक साथ उसकी तरफ मुड़े।
“चुप रहो!” पहले ने कहा।
“तुम्हें यहाँ नहीं होना चाहिए!” दूसरे ने कहा।
माँ ने अर्जुन की तरफ हाथ बढ़ाया।
“मेरे पास आओ।”
अर्जुन एक कदम आगे बढ़ा।
तभी उसे शारदा की रिकॉर्डिंग याद आई।
*अगर परछाईं तुम्हारी तरफ देखे, तो समझ जाना कि तुमने गलत विक्रम को चुन लिया है।*
उसने फर्श पर देखा।
पहले विक्रम की परछाईं अब अर्जुन की तरफ देख रही थी।
दूसरे की परछाईं भी।
माँ की परछाईं सीधी खड़ी थी।
लेकिन उसके पीछे खड़े बिना चेहरे वाले आदमी की परछाईं माँ से अलग दिशा में देख रही थी।
वह अर्जुन को नहीं देख रही थी।
वह कमरे के कोने में रखे लकड़ी के डिब्बे को देख रही थी।
अर्जुन धीरे-धीरे उस डिब्बे की तरफ गया।
दोनों विक्रम उसे रोकने के लिए आगे बढ़े।
लेकिन जैसे ही अर्जुन ने डिब्बे को छुआ, दोनों वहीं रुक गए।
डिब्बे के भीतर से बच्चे की आवाज़ आई—
“भैया, मुझे बाहर निकालो।”
अर्जुन ने ढक्कन खोला।
अंदर वही घड़ी थी।
लेकिन इस बार घड़ी के भीतर कोई बच्चा नहीं था।
वहाँ एक छोटी चाबी थी।
उस पर लिखा था—
**2013।**
***
चाबी हाथ में आते ही कमरा बदल गया।
अर्जुन अब शर्मा निवास में नहीं था।
वह तीसरी मंज़िल पर खड़ा था।
बाहर बारिश हो रही थी। घड़ी में 3:13 बज रहे थे। दीवारों पर वही निशान थे, जिन्हें शारदा देवी ने कभी छिपाने की कोशिश की थी।
कमरे के बीच बड़ा आईना था।
उसके सामने विक्रम खड़ा था।
वह अकेला था।
उसने अपने हाथ में एक कागज़ पकड़ा हुआ था।
कागज़ पर लिखा था—
**“मृतक: अर्जुन शर्मा।”**
विक्रम ने कागज़ को आग लगा दी।
फिर उसने आईने में देखा।
“मैंने उसे बचा लिया,” उसने कहा।
आईने के भीतर से आवाज़ आई—
“किसे?”
विक्रम ने जवाब दिया, “अपने बेटे को।”
“कौन-सा बेटा?”
विक्रम चुप हो गया।
आईने की सतह पर एक बच्चे का चेहरा उभरा।
वह अर्जुन जैसा था।
“क्या तुम मुझे पहचानते हो, पापा?”
विक्रम ने सिर झुका लिया।
“हाँ।”
“तो मेरा नाम बताओ।”
विक्रम ने होंठ खोले।
लेकिन कोई आवाज़ नहीं निकली।
बच्चे ने पूछा, “आपने मेरा नाम क्यों बदल दिया?”
विक्रम रोने लगा।
“मैंने तुम्हारा नाम नहीं बदला।”
“तो फिर मैं अर्जुन क्यों हूँ?”
विक्रम ने दोनों हाथों से चेहरा ढक लिया।
“मुझे माफ़ कर दो।”
बच्चे ने आईने पर हाथ रखा।
“आपने मुझे बचाया नहीं था। आपने मुझे उस जगह रखा था, जहाँ कोई मुझे पहचान नहीं सकता।”
विक्रम ने सिर उठाया।
“मैंने तुम्हें बाहर लाने की कोशिश की थी।”
“लेकिन आप दूसरे बच्चे को बाहर ले आए।”
विक्रम ने कहा, “मैंने सोचा था कि वह तुम हो।”
बच्चे की आँखों में आँसू आ गए।
“तो फिर आपने उसे अपना बेटा क्यों कहा?”
विक्रम ने जवाब दिया—
“क्योंकि उसने मुझे पिता कहा था।”
बच्चा कुछ देर चुप रहा।
फिर बोला—
“आपने मुझे कभी पिता कहने का मौका ही नहीं दिया।”
आईने में दरार उभर आई।
उस दरार से एक हाथ बाहर निकला।
उसने विक्रम की कलाई पकड़ ली।
विक्रम ने छूटने की कोशिश की।
“नहीं! मैंने तुम्हें बचाने की कोशिश की थी!”
बच्चे ने कहा—
“आपने मुझे बचाने की नहीं, अपनी याद बचाने की कोशिश की थी।”
दरार फैल गई।
आईने से दूसरा विक्रम बाहर निकला।
उसने वही कपड़े पहने थे।
वही चेहरा।
वही घड़ी।
उसने पहले विक्रम की तरफ देखा और कहा—
“अब तुम्हारी बारी है।”
फिर उसने उसे आईने के भीतर धकेल दिया।
अर्जुन चीख पड़ा।
दृश्य टूट गया।
वह वापस तीसरी मंज़िल पर था।
उसके हाथ में अब भी 2013 वाली चाबी थी।
आईने के भीतर दो विक्रम खड़े थे।
एक चुपचाप रो रहा था।
दूसरा मुस्करा रहा था।
मुस्कराने वाले विक्रम ने काँच पर उँगली से लिखा—
**“अब तुम समझ गए कि बाहर कौन आया था।”**
अर्जुन ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
आईने वाले विक्रम ने लिखा—
**“तो फिर अपनी माँ से पूछो कि उसने किसे घर ले जाने के लिए चुना था।”**
***
अर्जुन नीचे भागा।
हॉल में माँ अकेली बैठी थीं। उनके सामने तीन कप रखे थे।
एक कप खाली था।
दूसरे में चाय थी।
तीसरे कप में काली मिट्टी भरी हुई थी।
अर्जुन ने पूछा, “आपने 2013 में किसे घर लाया था?”
माँ ने सिर उठाया।
“क्या?”
“दो विक्रम थे। दो अर्जुन थे। आप उनमें से किसी एक को घर लेकर आई थीं। किसे?”
माँ ने चाय का कप नीचे रख दिया।
“मैंने किसी को घर नहीं लाया।”
“तो फिर मैं घर कैसे पहुँचा?”
माँ की आँखों में आँसू भर आए।
“तुम्हें शारदा देवी लेकर आई थीं।”
“और आपने मुझे अपना बेटा मान लिया?”
माँ ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
“क्यों?”
माँ ने बहुत देर बाद कहा—
“क्योंकि तुमने मुझे माँ कहा था।”
अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।
“यही जवाब सब देते हैं।”
माँ ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की।
“अर्जुन…”
उसने हाथ पीछे खींच लिया।
“आपने कभी मेरा चेहरा ध्यान से देखा था?”
माँ ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
“मेरी आँखों में देखा था?”
“हाँ।”
“मेरी परछाईं देखी थी?”
माँ चुप हो गईं।
अर्जुन ने धीरे से पूछा—
“जब शारदा देवी मुझे घर लाई थीं, तब मेरी परछाईं थी?”
माँ ने जवाब देने के लिए मुँह खोला।
लेकिन तभी मुख्य दरवाज़े पर दस्तक हुई।
तीन बार।
टक।
टक।
टक।
माँ का चेहरा सफेद पड़ गया।
“वह आ गया।”
अर्जुन ने पूछा, “कौन?”
माँ ने उसकी तरफ देखा।
“जिसे मैंने घर लाने से मना कर दिया था।”
दरवाज़े के बाहर से बच्चे की आवाज़ आई।
“माँ?”
माँ की आँखों से आँसू बह निकले।
“नहीं…”
बच्चे ने फिर पुकारा—
“माँ, दरवाज़ा खोलो।”
अर्जुन ने दरवाज़े की तरफ कदम बढ़ाया।
माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मत खोलना!”
“क्यों?”
“क्योंकि वह मेरा बेटा है।”
अर्जुन जम गया।
“आपने कहा था कि वह आपका बेटा नहीं है।”
माँ ने सिर हिलाया।
“मैंने झूठ बोला था।”
“कौन है वह?”
माँ रोने लगीं।
“वह बच्चा, जिसे मैंने 1995 में खो दिया था।”
अर्जुन ने दरवाज़े की तरफ देखा।
बाहर से फिर आवाज़ आई—
“माँ, मुझे याद है। आपने मुझे गोद में उठाया था। आपने कहा था कि मेरा नाम अर्जुन होगा।”
अर्जुन के भीतर जैसे कोई चीज़ टूट गई।
“आपने उसे अर्जुन नाम दिया था?”
माँ ने सिर झुका लिया।
“हाँ।”
“तो फिर मैं कौन हूँ?”
माँ ने उसकी तरफ देखा।
उनके होंठ काँप रहे थे।
“तुम वह बच्चा हो, जिसे मैं घर लेकर आई थी।”
“और बाहर कौन है?”
माँ ने फुसफुसाकर कहा—
“वह बच्चा, जिसे मैंने वापस छोड़ दिया था।”
दरवाज़े पर दस्तक बंद हो गई।
फिर बाहर से एक औरत की आवाज़ आई।
राधा की आवाज़।
“दरवाज़ा खोलो।”
माँ ने आँखें बंद कर लीं।
“अब वह अकेला नहीं है।”
अर्जुन ने पूछा, “कौन उसके साथ है?”
माँ ने जवाब दिया—
“वह आदमी, जिसने 2013 में विक्रम का अंतिम संस्कार किया था।”
अर्जुन ने दरवाज़े की झिरी से बाहर देखा।
आँगन में एक चिता जल रही थी।
उसके सामने दो आदमी खड़े थे।
दोनों विक्रम जैसे दिखते थे।
लेकिन इस बार उनके बीच एक तीसरा आदमी था।
उसका चेहरा अर्जुन जैसा था।
उसने सिर उठाकर दरवाज़े की तरफ देखा।
और मुस्कराते हुए कहा—
**“भैया, इस बार मैं तुम्हारी जगह नहीं लेने आया हूँ।”**
वह थोड़ा रुका।
फिर बोला—
**“मैं तुम्हें तुम्हारी जगह दिखाने आया हूँ।”**
***
अर्जुन दरवाज़े से पीछे हट गया।
माँ ने उसे अपने पास बुलाया।
“तुम्हें अब जाना होगा।”
“कहाँ?”
“शारदा के कमरे में।”
“वह तो खाली है।”
माँ ने सिर हिलाया।
“वह कमरा कभी खाली नहीं था।”
“उसमें क्या है?”
माँ ने उसकी आँखों में देखा।
“वह सच, जिसे शारदा ने अपनी मौत से पहले भी नहीं बताया।”
अर्जुन ने पूछा, “वह सच क्या है?”
माँ ने काँपते हुए कहा—
“2013 में जब विक्रम की चिता जली थी, तब घर में मौजूद दोनों विक्रम जीवित थे।”
अर्जुन ने साँस रोक ली।
“तो फिर चिता पर कौन था?”
माँ ने जवाब दिया—
“तीसरा विक्रम।”
“तीसरा?”
“हाँ।”
“वह कहाँ से आया था?”
माँ ने दरवाज़े की तरफ देखा।
बाहर खड़े तीनों आदमी अब एक-दूसरे के चेहरे पहनने लगे थे।
पहले का चेहरा दूसरे जैसा हो जाता।
दूसरे का तीसरे जैसा।
तीसरे का पहले जैसा।
माँ ने फुसफुसाकर कहा—
“उसका जन्म कभी नहीं हुआ था।”
अर्जुन की उँगलियाँ सुन्न पड़ गईं।
“तो वह कौन था?”
माँ ने उसकी तरफ देखा।
“वह विक्रम था, जिसे तुमने अपने बचपन में आईने के भीतर छोड़ दिया था।”
अर्जुन के कानों में वही पुरानी आवाज़ गूँजी—
*भैया, मुझे बाहर निकालो।*
माँ ने उसका चेहरा अपने हाथों में ले लिया।
“तुम्हें शारदा के कमरे में जाना होगा। वहाँ एक डायरी है। उसमें तुम्हारे पिता ने लिखा था कि तीन विक्रमों में से एक ही असली था। लेकिन उसने यह भी लिखा था कि असली विक्रम को पहचानने का तरीका किसी को नहीं पता।”
“तो मैं कैसे पहचानूँ?”
माँ ने उसके माथे को चूमा।
“तुम्हें पहचानना नहीं है।”
“फिर?”
माँ ने कहा—
“तुम्हें यह याद करना है कि तुम्हारे पिता ने किसे मरने के लिए चुना था।”
अर्जुन सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।
ऊपर पहुँचते ही उसने देखा कि शारदा देवी के कमरे का दरवाज़ा खुला था।
कमरे के भीतर मेज़ पर एक डायरी रखी थी।
उसके ऊपर धूल नहीं थी।
अर्जुन ने डायरी खोली।
पहले पन्ने पर शारदा देवी की लिखावट थी—
*17 जुलाई 2013।*
*आज मैंने अपने बेटे को तीन बार मरते देखा।*
*पहली बार वह आईने के भीतर मरा।*
*दूसरी बार वह अस्पताल के कमरे में मरा।*
*तीसरी बार उसे मेरे सामने जला दिया गया।*
*लेकिन हर बार जब मैंने उसकी आँखें बंद कीं, उसने फिर आँखें खोल दीं।*
अर्जुन ने अगला पन्ना पलटा।
*मैंने तीनों में से किसी को अपना बेटा नहीं कहा। क्योंकि मैं जानती थी कि उनमें से एक भी मेरा बेटा नहीं था।*
अगली पंक्ति पढ़ते ही अर्जुन की साँस रुक गई।
*मेरा असली बेटा तो 1995 में ही मर चुका था।*
नीचे एक नाम लिखा था।
**विक्रम।**
अर्जुन ने पन्ना पलटा।
उस पर लिखा था—
*अगर अर्जुन यह पढ़ रहा है, तो उसे बता देना कि विक्रम शर्मा उसका पिता नहीं था।*
अर्जुन की आँखों के सामने अँधेरा छा गया।
डायरी के आखिरी पन्ने पर एक और वाक्य था—
*लेकिन यह मत बताना कि उसका असली पिता कौन था।*
उसके नीचे किसी और की लिखावट में एक नाम लिखा था।
**डॉ. नीलकंठ।**
अर्जुन ने डायरी बंद कर दी।
कमरे के बाहर किसी के कदमों की आवाज़ आई।
वह पलटा।
दरवाज़े पर विक्रम खड़ा था।
उसके पीछे दूसरा विक्रम था।
और उनके पीछे तीसरा।
तीनों ने एक साथ कहा—
“बेटा, अब समय आ गया है।”
अर्जुन ने पूछा, “किस बात का?”
तीनों ने एक साथ जवाब दिया—
**“अपने पिता को पहचानने का।”**
फिर कमरे की घड़ी 3:13 पर रुक गई।
आईना अपने आप दीवार पर उभर आया।
उसमें अर्जुन का प्रतिबिंब दिखाई दिया।
लेकिन इस बार उसके पीछे तीन विक्रम नहीं थे।
उसके पीछे तीन अर्जुन खड़े थे।
एक बच्चा।
एक जवान आदमी।
और एक बूढ़ा।
बूढ़े अर्जुन ने काँच पर हाथ रखा और लिखा—
**“उनमें से किसी को मत चुनना।”**
फिर उसने दूसरी पंक्ति लिखी—
**“क्योंकि तुम्हारे पिता उन तीनों में से कोई नहीं हैं।”**
अचानक आईने की सतह काली हो गई।
उसके भीतर से एक ऐसी आवाज़ आई, जिसे अर्जुन ने पहले कभी नहीं सुना था।
वह आवाज़ न विक्रम की थी, न राधा की, न शारदा की।
वह आवाज़ अर्जुन के अपने दिल के भीतर से आई—
**“बेटा, दरवाज़ा खोलो। मैं तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ।”**
अर्जुन ने अपनी छाती पर हाथ रखा।
तीन दस्तकें सुनाई दीं।
टक।
टक।
टक।
फिर एक चौथी दस्तक हुई।
इस बार आवाज़ उसके दिल से नहीं आई।
वह आईने के भीतर से आई थी।
और आईने के उस पार कोई धीरे-धीरे दरवाज़ा खोल रहा था।
**एपिसोड 19 समाप्त।**
- Writer
- firoj saifi
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- “अंधेरे में कोई है”
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