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एपिसोड 18: जिस कमरे में मेरा जन्म नहीं हुआ

firoj saifi · Ghost Stories · 31 मिनट

घड़ी में 3:14 बज रहे थे।
शर्मा निवास के हॉल में अर्जुन अकेला खड़ा था। उसके हाथ में पुरानी अस्पताल की पहचान-पट्टी थी। उस पर राधा का नाम लिखा था, लेकिन बच्चे के नाम वाली जगह काली स्याही से ढकी हुई थी।

उसने कई बार स्याही को नाखून से खुरचने की कोशिश की थी। हर बार स्याही के नीचे से कोई अक्षर उभरता, लेकिन जैसे ही वह उसे पढ़ने के लिए झुकता, अक्षर बदल जाता।

कभी उसे ‘अ’ दिखाई देता।

कभी ‘ई’।

और एक बार उसे साफ-साफ ‘म’ दिखाई दिया था।

उसके बाद पट्टी इतनी ठंडी हो गई कि उसे हाथ से छोड़ना पड़ा।

वह वस्तु अब मेज़ पर रखी थी।

अर्जुन ने नीचे देखा।

उसकी परछाईं गायब थी।

कमरे में पीली रोशनी थी। दीवार पर लगी घड़ी की सुइयाँ चल रही थीं। खिड़की के बाहर पेड़ों की शाखाएँ हवा में हिल रही थीं। मेज़, कुर्सी, दरवाज़ा—हर चीज़ की परछाईं फर्श पर मौजूद थी।

सिर्फ अर्जुन की नहीं।

उसने अपना हाथ उठाया।

फर्श पर कोई हाथ नहीं उठा।

उसने सिर झुकाया।

फर्श खाली रहा।

अर्जुन ने अपनी छाती पर हथेली रखी। दिल धड़क रहा था। साँस चल रही थी। शरीर गर्म था। वह जीवित था।

फिर उसकी परछाईं कहाँ गई?

पीछे से माँ की आवाज़ आई।

“उसे ढूँढ़ने की कोशिश मत करना।”

अर्जुन पलटा।

माँ सीढ़ियों के पास खड़ी थीं। उनकी आँखें लाल थीं और चेहरे पर रातभर जागने की थकान थी।

“आपने देखा?” अर्जुन ने पूछा।

“क्या?”

“मेरी परछाईं नहीं है।”

माँ कुछ देर उसे देखती रहीं।

“हाँ।”

“आपको पता है वह कहाँ गई?”

“मुझे इतना पता है कि वह तुम्हारे साथ थी, लेकिन तुम्हारी नहीं थी।”

अर्जुन ने कड़वाहट से हँसने की कोशिश की।

“अब तो हर चीज़ का यही जवाब है। मेरा चेहरा मेरा नहीं। मेरा नाम मेरा नहीं। मेरी यादें मेरी नहीं। अब परछाईं भी मेरी नहीं।”

माँ उसके पास आईं।

“तुम्हारा शरीर तुम्हारा है।”

“आपको कैसे पता?”

वह चुप हो गईं।

अर्जुन ने उनकी आँखों में देखा।

“आपने कहा था कि आपने मुझे पाला। फिर कहा कि आपने मुझे जन्म लेते नहीं देखा। फिर आपने कहा कि राधा मेरी माँ थी। अब एक औरत आकर कहती है कि उसने राधा को जन्म दिया था। आप हर बार कुछ न कुछ जानती हैं, लेकिन पूरा सच नहीं बतातीं।”

माँ ने सिर झुका लिया।

“क्योंकि मुझे भी पूरा सच नहीं पता।”

“तो जो पता है, वह बताइए।”

माँ ने मेज़ पर रखी पहचान-पट्टी उठाई।

उसे देखते ही उनके हाथ काँपने लगे।

“यह तुम्हारे जन्म की नहीं है।”

अर्जुन ने कहा, “इस पर राधा का नाम है।”

“नाम होने से यह जन्म की पहचान नहीं बन जाती।”

“तो यह किसकी है?”

माँ ने पट्टी पलटी।

पीछे लिखी तारीख पर उनकी नज़र टिक गई।

17 जुलाई 1995।

उन्होंने आँखें बंद कर लीं।

“यह उस बच्चे की पहचान-पट्टी है, जिसे अस्पताल में भर्ती करने से पहले ही मृत घोषित कर दिया गया था।”

अर्जुन ने तुरंत पूछा, “फिर उसे अस्पताल क्यों लाया गया?”

“क्योंकि किसी ने कहा था कि वह अभी जीवित है।”

“किसने?”

माँ ने उत्तर नहीं दिया।

“राधा ने?”

“शायद।”

“विक्रम ने?”

“शायद।”

“शारदा देवी ने?”

माँ ने उसकी तरफ देखा।

“या फिर उस बच्चे ने खुद।”

अर्जुन कुछ पल चुप रहा।

“मृत बच्चा खुद कैसे कह सकता है कि वह जीवित है?”

माँ ने पट्टी मेज़ पर रख दी।

“यही पता लगाने के लिए तुम्हें पुराने प्रसूति गृह जाना होगा।”

“आप मेरे साथ चलेंगी?”

माँ ने तुरंत सिर हिलाया।

“नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि वहाँ मेरा चेहरा पहचान लिया जाएगा।”

“किसका चेहरा?”

माँ ने जवाब नहीं दिया।

उसी समय घर के बाहर किसी वाहन के रुकने की आवाज़ आई।

दोनों ने दरवाज़े की तरफ देखा।

किसी ने दरवाज़े के नीचे से एक सफेद लिफाफा भीतर सरका दिया।

लिफाफा फर्श पर कुछ दूर तक फिसलता हुआ आया और अर्जुन के पैरों के पास रुक गया।

उस पर सिर्फ एक पंक्ति लिखी थी—

**“कमरा नंबर तीन में मत जाना।”**

अर्जुन ने लिफाफा उठाया।

उसके भीतर एक पुरानी तस्वीर थी।

तस्वीर में देवगढ़ का पुराना प्रसूति गृह दिखाई दे रहा था। सामने टूटी हुई सीढ़ियाँ थीं। खिड़कियों पर जंग लगी सलाखें थीं। मुख्य दरवाज़े के ऊपर अस्पताल का नाम मिट चुका था।

तस्वीर के पीछे तारीख थी—

**18 जुलाई 2013।**

और नीचे किसी ने लिखा था—

**“कमरा नंबर तीन में अर्जुन की लाश मिली थी।”**

अर्जुन ने तस्वीर माँ के सामने रख दी।

“अब भी कहेंगी कि मुझे वहाँ नहीं जाना चाहिए?”

माँ ने तस्वीर देखते ही मुँह पर हाथ रख लिया।

“हे भगवान…”

“आप इस जगह को जानती हैं?”

माँ ने धीरे से सिर हिलाया।

“मैं वहाँ गई थी।”

“कब?”

“18 जुलाई 2013 की रात।”

“किसके साथ?”

माँ की आँखों से आँसू बहने लगे।

“तुम्हारे पिता के साथ।”

अर्जुन ने उनका हाथ पकड़ लिया।

“उस रात क्या हुआ था?”

माँ ने जवाब देने के लिए मुँह खोला।

लेकिन उससे पहले ऊपर की मंज़िल से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आई।

एक बार।

फिर दूसरी बार।

फिर अचानक आवाज़ बंद हो गई।

माँ ने अर्जुन का हाथ कसकर पकड़ लिया।

“तुम अकेले वहाँ नहीं जाओगे।”

“आपने अभी कहा कि आप नहीं चलेंगी।”

“मैं तुम्हारे साथ नहीं जाऊँगी।”

“तो फिर?”

माँ ने ऊपर देखा।

“वह तुम्हारे साथ जाएगा।”

सीढ़ियों के अँधेरे में एक छोटा बच्चा खड़ा था।

उसके हाथ में लाल गेंद थी।

और उसके पैरों के नीचे दो परछाइयाँ थीं।

***

पुराना प्रसूति गृह देवगढ़ के बाहरी हिस्से में था। वर्षों पहले वहाँ नया जिला अस्पताल बन गया था और पुरानी इमारत को बंद कर दिया गया था।

गाँव के लोग कहते थे कि रात में वहाँ बच्चों के रोने की आवाज़ आती है। किसी ने कई बार खिड़कियों में औरतों की आकृतियाँ देखी थीं। कुछ लोग दावा करते थे कि इमारत के भीतर घड़ी अब भी चलती है, जबकि बिजली का कनेक्शन दशकों पहले काट दिया गया था।

अर्जुन ने ऐसी बातों पर कभी विश्वास नहीं किया था।

अब उसे लगने लगा था कि देवगढ़ में लोग जितना जानते हैं, उससे कहीं अधिक छिपाते हैं।

वह सुबह होने से पहले घर से निकला।

आसमान में बादल थे। सड़क पर धुँध की हल्की परत थी। उसकी जेब में पहचान-पट्टी, मृत्यु प्रमाणपत्र की प्रति और शारदा देवी की पुरानी चाबी थी।

लाल गेंद वाला बच्चा उसके साथ नहीं आया था।

लेकिन जब अर्जुन मुख्य दरवाज़े से बाहर निकला, उसने सीढ़ियों पर एक छोटा गीला पदचिह्न देखा।

उसके पास दूसरा पदचिह्न था।

फिर तीसरा।

वे निशान उसके साथ-साथ चलते हुए आँगन तक गए और अचानक गायब हो गए।

अर्जुन ने नीचे झुककर मिट्टी छुई।

मिट्टी सूखी थी।

निशान गीले थे।

उसने सिर उठाया।

सामने सड़क के उस पार एक बूढ़ा आदमी खड़ा था।

वह सफेद कुर्ता पहने हुए था। उसके दाहिने गाल पर लंबा निशान था।

डॉ. हरिनारायण।

अर्जुन के मुँह से अपने आप निकला, “आप?”

बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया।

उसने अपनी उँगली होंठों पर रखी और धीरे से सड़क के मोड़ की तरफ इशारा किया।

अर्जुन ने एक पल के लिए आँखें झपकाईं।

बूढ़ा गायब था।

लेकिन सड़क के मोड़ पर एक पुरानी साइकिल खड़ी थी।

उसके हैंडल पर अस्पताल का बैग लटका था।

बैग के ऊपर एक पर्ची रखी थी।

उस पर लिखा था—

**“अगर सच चाहिए, तो कमरे के दरवाज़े मत खोलना। पहले खिड़की से देखना कि अंदर कौन लेटा है।”**

अर्जुन ने पर्ची जेब में रख ली और आगे बढ़ गया।

***

पुराने प्रसूति गृह का मुख्य दरवाज़ा आधा खुला था।

अंदर घुसते ही उसे सीलन और दवाइयों की मिली-जुली गंध आई। दीवारों पर सफेद रंग उखड़ चुका था। फर्श पर सूखे पत्ते पड़े थे। छत से लटकता पंखा जंग खाकर एक तरफ झुका हुआ था।

रिसेप्शन के पीछे लकड़ी का बोर्ड लगा था।

उस पर अस्पताल का नाम मिट चुका था, लेकिन नीचे कुछ अक्षर अब भी पढ़े जा सकते थे—

**मातृ एवं शिशु चिकित्सा केंद्र।**

अर्जुन ने टॉर्च जलाई।

रिसेप्शन की मेज़ पर एक रजिस्टर पड़ा था। उसके पन्ने नमी से फूल गए थे। उसने रजिस्टर खोला।

पहले पन्ने पर पुराने मरीजों के नाम थे। फिर डॉक्टरों की सूची। फिर प्रसव के रिकॉर्ड।

17 जुलाई 1995 का पन्ना आधा फटा हुआ था।

उस पर तीन प्रविष्टियाँ थीं।

पहली प्रविष्टि के आगे लिखा था—

**माता: राधा।**

**बच्चा: जीवित।**

दूसरी प्रविष्टि के आगे—

**माता: नाम दर्ज नहीं।**

**बच्चा: मृत घोषित।**

तीसरी प्रविष्टि के आगे केवल एक निशान था।

तीन काली रेखाएँ।

अर्जुन ने पन्ना पलटा।

पीछे की तरफ किसी ने लाल पेंसिल से लिखा था—

**“तीसरी प्रविष्टि को जन्म न माना जाए।”**

उसके नीचे दूसरी लिखावट थी—

**“क्योंकि माँ कमरे में मौजूद नहीं थी।”**

अर्जुन ने रजिस्टर बंद कर दिया।

उसे लगा जैसे कोई उसके ठीक पीछे खड़ा है।

वह तुरंत पलटा।

गलियारा खाली था।

लेकिन फर्श पर गीले पदचिह्न थे।

वे एक छोटे बच्चे के थे।

निशान गलियारे के अंत तक जाते थे, जहाँ तीन दरवाज़े थे।

कमरा नंबर एक।

कमरा नंबर दो।

कमरा नंबर तीन।

तीसरे दरवाज़े पर मोटी जंजीर लिपटी थी।

उसके बीच लाल धागा बँधा था।

अर्जुन को माँ की बात याद आई।

कमरा नंबर तीन में उसकी लाश मिली थी।

उसने कमरे की तरफ कदम बढ़ाया।

फिर रुक गया।

दरवाज़े के नीचे से हल्की रोशनी आ रही थी।

अंदर किसी ने धीमे स्वर में कहा—

“अर्जुन?”

आवाज़ विक्रम की थी।

“बेटा, दरवाज़ा खोलो।”

अर्जुन की उँगलियाँ जंजीर तक पहुँच गईं।

फिर उसे पर्ची याद आई।

*पहले खिड़की से देखना कि अंदर कौन लेटा है।*

उसने टॉर्च उठाई और दरवाज़े के बगल वाली छोटी खिड़की से भीतर झाँका।

कमरे में एक अस्पताल का पलंग था।

उस पर एक आदमी लेटा था।

उसका चेहरा कपड़े से ढका हुआ था।

पलंग के पास एक औरत खड़ी थी।

उसके हाथ में नवजात बच्चा था।

औरत ने सिर उठाया।

वह राधा थी।

लेकिन उसकी आँखें बंद थीं।

वह आँखें बंद किए हुए ही कमरे में मौजूद हर चीज़ को देख रही थी।

उसने बच्चे को पलंग पर रखा।

फिर कपड़ा हटाया।

अर्जुन का दिल जैसे रुक गया।

पलंग पर लेटे आदमी का चेहरा उसका अपना था।

लेकिन वह चेहरा जवान नहीं था।

वह लगभग तेरह साल का बच्चा था।

उसके माथे पर चोट का निशान था।

उसकी कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं।

अर्जुन ने पीछे हटना चाहा।

तभी भीतर लेटे बच्चे ने आँखें खोल दीं।

वह सीधे खिड़की की तरफ देखने लगा।

उसने होंठ हिलाए।

“तुम देर से आए।”

अर्जुन के पैरों के नीचे की ज़मीन हिलने लगी।

बच्चे ने कहा—

“इस बार मुझे मरने मत देना।”

***

अर्जुन खिड़की से हट गया।

उसने अपनी साँसें सँभालने की कोशिश की। वह जानता था कि जो कुछ उसने देखा, वह वास्तविक भी हो सकता था और आईने की कोई चाल भी।

लेकिन अगर वह केवल भ्रम था, तो कमरे के भीतर से आती आवाज़ इतनी साफ क्यों थी?

उसने जंजीर छुई।

धातु गर्म थी।

लाल धागा उसकी उँगलियों से चिपक गया।

अचानक पीछे से किसी ने कहा—

“मैंने मना किया था।”

अर्जुन घूम गया।

गलियारे में एक नर्स खड़ी थी।

उसने पुरानी सफेद वर्दी पहन रखी थी। बाल कसकर बँधे थे। गले में पहचान-पत्र लटका था, लेकिन उस पर नाम की जगह खाली सफेद पट्टी थी।

उसके चेहरे पर उम्र का कोई अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता था।

वह तीस साल की भी लगती थी और साठ साल की भी।

“आप कौन हैं?” अर्जुन ने पूछा।

नर्स ने जवाब दिया, “तुम यहाँ क्यों आए हो?”

“मुझे अपने जन्म के बारे में जानना है।”

“तुम्हारा जन्म यहाँ नहीं हुआ था।”

“लेकिन रिकॉर्ड में राधा का नाम है।”

“रिकॉर्ड में बहुत कुछ लिखा है।”

“कमरा नंबर तीन में क्या हुआ था?”

नर्स की आँखें दरवाज़े पर टिक गईं।

“वहाँ किसी की मृत्यु नहीं हुई थी।”

अर्जुन ने कहा, “मृत्यु प्रमाणपत्र में लिखा है कि मेरा शव वहीं मिला था।”

नर्स ने उसकी तरफ देखा।

“शव मिला था। लेकिन वह तुम्हारा नहीं था।”

अर्जुन ने धीरे से पूछा, “तो किसका था?”

नर्स ने अपना पहचान-पत्र उतारकर उसकी तरफ बढ़ाया।

उस पर एक पुरानी तस्वीर थी।

तस्वीर में वही नर्स थी, लेकिन उसके साथ एक छोटा बच्चा खड़ा था।

बच्चे का चेहरा अर्जुन जैसा था।

तस्वीर के पीछे लिखा था—

**“रोगी 313। पहचान सुरक्षित नहीं।”**

अर्जुन ने पूछा, “यह बच्चा कौन है?”

नर्स ने कहा, “वह बच्चा, जिसकी मृत्यु दर्ज की गई थी।”

“ईशान?”

“वह नाम उसका नहीं था।”

“अभय?”

“वह नाम भी उसका नहीं था।”

“अर्णव?”

नर्स की आँखें सिकुड़ गईं।

“तुम्हें किसने यह नाम बताया?”

अर्जुन ने जवाब नहीं दिया।

नर्स ने पहचान-पत्र वापस ले लिया।

“ये नाम उस बच्चे के शरीर पर लिखे गए थे, उसके जन्म पर नहीं।”

“नाम शरीर पर लिखे गए थे?”

“जब किसी बच्चे की पहचान नहीं होती, तो लोग उसे कोई नाम देते हैं। लेकिन इस बच्चे के साथ समस्या यह थी कि हर बार जब कोई उसका नाम लेता, अस्पताल के रिकॉर्ड में किसी दूसरे बच्चे का नाम बदल जाता।”

अर्जुन ने पूछा, “तो उसका असली नाम क्या था?”

नर्स ने धीरे से कहा—

“मुझे नहीं पता।”

“आप उस रात मौजूद थीं?”

“मैं उस रात पैदा हुई थी।”

अर्जुन चौंका।

नर्स ने बिना मुस्कराए कहा, “इसी अस्पताल में। 17 जुलाई 1995। रात 3:13 पर।”

“आपकी उम्र क्या है?”

“इस सवाल का जवाब देने से कुछ नहीं बदलेगा।”

“आपने मुझे पहले क्यों नहीं देखा?”

नर्स ने उसकी तरफ देखा।

“क्योंकि तुम यहाँ पहले भी आ चुके हो।”

“कब?”

“18 जुलाई 2013 को।”

अर्जुन का गला सूख गया।

“मैं उस रात मर गया था?”

नर्स ने सिर हिलाया।

“नहीं। तुम उस रात यहाँ आए थे। लेकिन जो बच्चा यहाँ से बाहर गया, वह तुम नहीं थे।”

“तो कौन था?”

नर्स ने तीसरे कमरे की तरफ देखा।

“वही, जो अभी तुम्हें अंदर बुला रहा है।”

***

अर्जुन ने दरवाज़े की तरफ देखा।

अंदर से फिर दस्तक हुई।

टक।

टक।

टक।

नर्स ने कहा, “तुम्हें कमरा नंबर तीन में नहीं जाना चाहिए।”

“आप सब यही क्यों कहते हैं?”

“क्योंकि जो भी उस कमरे में जाता है, उसे वहाँ अपनी कोई न कोई चीज़ मिलती है।”

“कौन-सी चीज़?”

“किसी को अपनी यादें मिलती हैं। किसी को अपना चेहरा। किसी को अपना नाम।”

“और मुझे क्या मिलेगा?”

नर्स ने उसकी तरफ देखा।

“तुम्हें अपनी मृत्यु मिलेगी।”

अर्जुन कुछ देर चुप रहा।

फिर उसने पूछा, “अगर मैं अंदर नहीं गया, तो?”

“तब वह बाहर आ जाएगा।”

अर्जुन ने जंजीर की तरफ देखा।

“क्या वह बच्चा मेरे जैसा है?”

नर्स ने कहा, “वह तुमसे पहले था।”

“कैसे?”

“तुम्हारे नाम से पहले। तुम्हारी पहचान से पहले। शायद तुम्हारे जन्म से भी पहले।”

अर्जुन ने दीवार का सहारा लिया।

“मैं यह सब नहीं समझ पा रहा।”

नर्स ने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया।

“तुम्हें समझना नहीं है। तुम्हें बस याद करना है।”

“क्या?”

“उस रात तुमने क्या चुना था।”

अर्जुन की आँखों के सामने अचानक अस्पताल का दृश्य चमका।

कमरा नंबर तीन।

राधा की चीख।

विक्रम की आवाज़।

शारदा देवी हाथ में घंटी लिए खड़ी थीं।

दो बच्चे पलंग पर थे।

एक रो रहा था।

दूसरा बिल्कुल शांत था।

फिर तीसरा बच्चा कमरे के दरवाज़े पर दिखाई दिया।

उसके हाथ में लाल गेंद थी।

वह अर्जुन की तरफ देखकर बोला—

“अगर तुम मुझे अपना नाम दोगे, तो मैं तुम्हारी जगह जी सकता हूँ।”

छोटे अर्जुन ने पूछा—

“और अगर मैं तुम्हें नाम नहीं दूँ?”

बच्चे ने जवाब दिया—

“तो हम दोनों मर जाएँगे।”

दृश्य अचानक टूट गया।

अर्जुन लड़खड़ाकर दीवार से टकराया।

नर्स ने उसे सँभाल लिया।

“तुम्हें याद आने लगा है।”

अर्जुन ने उसका हाथ झटक दिया।

“यह मेरी याद नहीं है!”

“फिर किसकी है?”

“मुझे नहीं पता!”

नर्स ने शांत स्वर में कहा, “यही तो तुम्हारी सबसे बड़ी समस्या है। तुम हर उस चीज़ को झूठ कहते हो, जो तुम्हारी पहचान बदल सकती है।”

अर्जुन ने दरवाज़े की तरफ देखा।

“मैं अंदर जाऊँगा।”

नर्स ने रास्ता रोक लिया।

“तो पहले यह बताओ—अगर अंदर तुम्हारा ही शव पड़ा है, तो तुम किसे बचाने आए हो?”

अर्जुन ने उत्तर नहीं दिया।

नर्स ने कहा, “तुम अपने भाई को बचाने नहीं आए। तुम अपनी जगह बचाने आए हो।”

“वह मेरा भाई नहीं है।”

“तो फिर तुम्हें उससे इतना डर क्यों लगता है?”

अर्जुन चुप हो गया।

नर्स ने अपनी जेब से एक छोटी चाबी निकाली।

उस पर 313 खुदा था।

“दरवाज़ा खोलने से पहले एक बात याद रखना। अंदर जो भी तुम्हें माँ कहे, उससे यह मत पूछना कि उसने तुम्हें जन्म दिया था या नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि वह तुम्हें सच बताएगी।”

“और?”

नर्स ने चाबी उसकी हथेली पर रख दी।

“वह सच तुम्हें मार देगा।”

***

जंजीर खुलते ही दरवाज़े के पीछे से ठंडी हवा का झोंका आया।

कमरे की रोशनी एक पल के लिए बुझी और फिर जल उठी।

अर्जुन ने टॉर्च भीतर डाली।

कमरा खाली था।

पलंग पर कोई शव नहीं था।

राधा नहीं थी।

बच्चा नहीं था।

केवल एक लोहे की मेज़ थी, जिस पर तीन काँच की शीशियाँ रखी थीं। हर शीशी के भीतर एक छोटी-सी काली वस्तु तैर रही थी।

पहली शीशी पर लिखा था—**नाम।**

दूसरी पर—**याद।**

तीसरी पर—**मृत्यु।**

दीवार पर एक बड़ा आईना लगा था।

उसके सामने लकड़ी की कुर्सी रखी थी।

कुर्सी पर एक पुराना रिकॉर्डर रखा था।

अर्जुन कमरे में दाखिल हुआ।

नर्स दरवाज़े पर ही खड़ी रही।

“मैं अंदर नहीं आ सकती,” उसने कहा।

“क्यों?”

“क्योंकि इस कमरे में मेरा जन्म नहीं हुआ था।”

अर्जुन ने पूछा, “लेकिन आपने कहा था कि आप इसी अस्पताल में पैदा हुई थीं।”

नर्स ने उसकी तरफ देखा।

“मैं पैदा हुई थी। लेकिन उस रात यहाँ मौजूद औरत ने जिस बच्चे को जन्म दिया था, वह मैं नहीं थी।”

“तो फिर आप कौन हैं?”

नर्स ने जवाब देने के बजाय दरवाज़ा बंद कर दिया।

अर्जुन ने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।

दरवाज़े के उस पार नर्स की कोई परछाईं नहीं थी।

वह अकेला रह गया।

उसने रिकॉर्डर उठाया।

उसके ऊपर तारीख लिखी थी—

**18 जुलाई 2013।**

रिकॉर्डर चालू करते ही खड़खड़ाहट सुनाई दी।

फिर विक्रम की आवाज़ आई।

“अगर यह रिकॉर्डिंग अर्जुन तक पहुँची है, तो इसका मतलब है कि मैं उसे रोक नहीं पाया।”

कुछ देर सन्नाटा रहा।

फिर विक्रम ने कहा—

“मुझे नहीं पता कि तुम यह रिकॉर्डिंग किस रूप में सुन रहे हो। शायद तुम जीवित हो। शायद तुम्हारा शरीर अब भी उसी कमरे में पड़ा है। शायद तुम वह बच्चा हो, जिसे मैंने घर ले जाकर अर्जुन नाम दिया था।”

अर्जुन की उँगलियाँ रिकॉर्डर पर कस गईं।

विक्रम की आवाज़ काँप रही थी।

“मैंने तुम्हें बचाने की कोशिश की थी। लेकिन मुझे नहीं पता था कि बचाने के लिए किसे चुनना होगा। शारदा ने कहा था कि एक ही बच्चा घर लौट सकता है। राधा ने कहा था कि किसी बच्चे को छोड़ा नहीं जाएगा। और डॉक्टर ने कहा था कि अगर हमने तीसरे बच्चे को नाम दे दिया, तो बाकी दोनों की पहचान बदल जाएगी।”

रिकॉर्डिंग में किसी के रोने की आवाज़ आई।

विक्रम कुछ देर चुप रहे।

फिर बोले—

“मैंने एक नाम चुना था। उस नाम को मैंने अपनी डायरी में लिखा, फिर काट दिया। मैंने उसे कागज़ पर लिखा, फिर जला दिया। मैंने उसे किसी के सामने नहीं लिया। लेकिन बच्चा उसे सुन चुका था।”

अर्जुन ने फुसफुसाकर कहा, “कौन-सा नाम?”

रिकॉर्डिंग में अचानक तेज आवाज़ आई।

जैसे किसी ने माइक्रोफोन पर हाथ मार दिया हो।

फिर एक बच्चे की आवाज़ सुनाई दी—

“पापा, मेरा नाम क्या है?”

विक्रम रो पड़े।

“मुझे माफ़ कर दो।”

“पापा, आपने मुझे क्यों छोड़ दिया?”

“मैंने तुम्हें नहीं छोड़ा।”

“तो फिर आपने दूसरे बच्चे को घर क्यों ले गए?”

रिकॉर्डिंग में लंबा सन्नाटा छा गया।

फिर विक्रम की आवाज़ आई—

“क्योंकि वह बच्चा साँस ले रहा था।”

बच्चे ने पूछा, “और मैं?”

विक्रम ने उत्तर दिया—

“तुम भी साँस ले रहे थे।”

“तो फिर?”

विक्रम की आवाज़ टूट गई।

“तुम्हारी साँस आईने के अंदर से आ रही थी।”

अर्जुन ने रिकॉर्डर बंद कर दिया।

कमरे में अब उसे अपनी साँसों के अलावा कुछ सुनाई नहीं दे रहा था।

फिर आईने के पीछे से दस्तक हुई।

टक।

टक।

टक।

अर्जुन ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

आईने में वह खुद दिखाई दे रहा था।

लेकिन उसके पीछे एक बच्चा खड़ा था।

वही चेहरा।

वही माथे का निशान।

वही आँखें।

बच्चे ने कहा—

“अब मेरी बात सुनो।”

***

अर्जुन आईने के सामने खड़ा हो गया।

“तुम कौन हो?”

बच्चे ने कहा, “तुमने पहले भी पूछा था।”

“मैं तुम्हें नहीं जानता।”

“तुम मुझे भूल चुके हो।”

“तुम्हारा नाम क्या है?”

बच्चे ने मुस्कराकर कहा, “तुम्हें लगता है कि नाम ही पहचान है?”

“कम से कम तुम्हारी पहचान तो होगी।”

“मेरी पहचान तुम्हारे पास है।”

अर्जुन ने आईने को छुआ।

काँच बर्फ जैसा ठंडा था।

“तुम अंदर क्यों हो?”

बच्चे ने अपनी कलाई दिखाई।

तीन काली लकीरें थीं।

“क्योंकि बाहर कोई और है।”

“कौन?”

“तुम।”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“मैं बाहर हूँ।”

“तुम्हारा शरीर बाहर है।”

“और तुम?”

“मैं वह हूँ, जो तुम्हारे शरीर में पहले था।”

अर्जुन पीछे हट गया।

बच्चे ने कहा, “जब तुम पैदा हुए थे, तुम्हारे भीतर दो धड़कनें थीं।”

“यह झूठ है।”

“डॉक्टर ने पहली धड़कन सुनी। फिर दूसरी। जब उसने तीसरी धड़कन सुनने की कोशिश की, तो कमरे में कोई बच्चा नहीं था।”

“तुम तीसरी धड़कन हो?”

बच्चे ने सिर हिलाया।

“मैं वह धड़कन हूँ, जिसे किसी ने अपना नहीं माना।”

अर्जुन ने आईने से नज़र नहीं हटाई।

“अगर तुम मेरे भीतर थे, तो तुम बाहर कैसे आए?”

“तुमने मुझे नाम दिया।”

“कब?”

“17 जुलाई 2008।”

अर्जुन की साँस अटक गई।

“मैं तेरह साल का था।”

“हाँ।”

“मैंने तुम्हें क्या नाम दिया?”

बच्चे ने आँखें बंद कर लीं।

“तुमने कहा था—मीरा।”

अर्जुन का शरीर सुन्न पड़ गया।

“नहीं…”

“तुमने मुझे देखा था। तुम डर गए थे। तुमने सोचा कि अगर तुम मुझे नाम दे दोगे, तो मैं तुम्हारा पीछा करना बंद कर दूँगा।”

“मैंने ऐसा नहीं किया।”

“तुमने मुझे मीरा कहा। फिर मैं मीरा बन गई।”

“मीरा पहले से थी!”

“हाँ,” बच्चे ने कहा। “इसीलिए वह नाम मेरे लिए इतना आसान था।”

अर्जुन की आँखों के सामने मीरा का चेहरा उभरा।

बचपन की मीरा।

तीसरी मंज़िल पर खड़ी मीरा।

आईने में दिखाई देने वाली मीरा।

दो मीरा।

फिर तीन।

हर चेहरा उसकी तरफ देख रहा था।

बच्चे ने कहा, “मैंने उसका चेहरा नहीं चुराया था। मैंने तुम्हारे दिए हुए नाम का चेहरा पहना था।”

“तो असली मीरा कहाँ है?”

बच्चे ने सिर झुका लिया।

“मैं नहीं जानता।”

“झूठ!”

“मैं सच कह रहा हूँ। जब तुमने मुझे नाम दिया, तो मेरे पास चेहरा नहीं था। लेकिन उस नाम के साथ एक याद आई। एक घर आया। एक माँ आई। एक लड़की आई, जो मुझे भैया कहती थी।”

अर्जुन की आँखों से आँसू बह निकले।

“तुमने उसकी ज़िंदगी छीन ली।”

बच्चे ने सिर उठाया।

“नहीं। मैंने उसकी यादें पहनीं। लेकिन वह यादें मेरी नहीं थीं। शायद इसी वजह से मैं कभी पूरी तरह मीरा नहीं बन पाया।”

अर्जुन ने पूछा, “और 2013 में क्या हुआ?”

बच्चे ने आईने के भीतर पलंग की तरफ इशारा किया।

“तुम यहाँ आए थे।”

“मैं?”

“तुम्हारे जैसा एक बच्चा। उसने कहा कि वह अपना नाम वापस चाहता है। विक्रम ने उसे रोकने की कोशिश की। डॉक्टर ने दरवाज़ा बंद किया। शारदा ने घंटी बजाई। और तुम्हारी माँ ने…”

बच्चा चुप हो गया।

“मेरी माँ ने क्या किया?”

“उसने एक बच्चे को अपनी गोद में उठा लिया।”

“किस बच्चे को?”

बच्चे ने जवाब नहीं दिया।

अर्जुन ने आईने पर हाथ मारा।

“बताओ!”

काँच में दरार उभर आई।

बच्चे का चेहरा बदल गया।

अब वह अर्जुन नहीं था।

वह मीरा था।

लेकिन उसकी आँखें काली थीं।

“तुम हमेशा गलत सवाल पूछते हो, भैया।”

अर्जुन पीछे हट गया।

“मीरा?”

उसने सिर हिलाया।

“अगर तुम सच जानना चाहते हो, तो यह पूछो कि 2013 में किसने तुम्हारा नाम लिया था।”

आईने की दरार फैलने लगी।

मीरा ने अपनी हथेली काँच पर रखी।

“क्योंकि जिसने तुम्हारा नाम लिया था, वही तुम्हें बाहर ले गया था।”

अर्जुन ने पूछा, “कौन?”

मीरा ने जवाब दिया—

“तुम्हारी माँ।”

***

अचानक कमरे का दरवाज़ा खुल गया।

बाहर नर्स खड़ी थी।

“बस! अब रिकॉर्डर बंद कर दो।”

अर्जुन ने पीछे मुड़कर देखा।

“आप यहाँ कैसे आईं?”

“क्योंकि उसने तुम्हें वह सब बता दिया, जो उसे नहीं बताना चाहिए था।”

“क्या वह झूठ बोल रहा था?”

नर्स ने कहा, “आईने में कोई पूरा सच नहीं बोलता।”

“तो सच कहाँ है?”

“कमरा नंबर दो में।”

अर्जुन ने पूछा, “वहाँ क्या है?”

नर्स ने जवाब दिया, “तुम्हारी माँ।”

अर्जुन ने दरवाज़े से बाहर कदम रखा।

“आपने कहा था कि मेरी माँ कमरा नंबर तीन में है।”

“मैंने ऐसा नहीं कहा।”

“आपने मुझे कमरा नंबर तीन में जाने से रोका।”

“क्योंकि तुम वहाँ अपना शव ढूँढ़ रहे थे।”

नर्स ने दूसरे दरवाज़े की तरफ इशारा किया।

“कमरा नंबर दो में तुम्हारी माँ जीवित है।”

अर्जुन का दिल तेज़ धड़कने लगा।

“राधा?”

नर्स ने कहा, “अगर वह राधा है, तो वह तुम्हारी माँ नहीं है।”

“और अगर वह मेरी माँ है?”

“तो वह राधा नहीं है।”

अर्जुन कुछ देर उसे देखता रहा।

फिर उसने कमरा नंबर दो का दरवाज़ा खोला।

अंदर वही कमरा था, जो उसने बचपन में अपने सपनों में कई बार देखा था।

खिड़की के पास एक औरत बैठी थी।

उसके बाल खुले थे। उसने सफेद साड़ी पहन रखी थी। उसकी गोद में एक बच्चा था।

औरत ने सिर उठाया।

वह अर्जुन की माँ थी।

वही चेहरा।

वही आँखें।

वही माथे की छोटी बिंदी।

“अर्जुन,” उसने कहा।

अर्जुन की आँखें भर आईं।

“माँ…”

वह उसकी तरफ बढ़ा।

औरत ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।

“पास मत आना।”

अर्जुन रुक गया।

“आप मुझे पहचानती हैं?”

“हाँ।”

“तो फिर आप यहाँ क्यों हैं?”

औरत ने गोद में सोए बच्चे की तरफ देखा।

“क्योंकि मैं इसे छोड़कर नहीं जा सकती।”

अर्जुन ने बच्चे को देखने की कोशिश की।

उसका चेहरा कपड़े से ढका था।

“यह कौन है?”

औरत ने कहा, “तुम्हारा भाई।”

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

“अभय?”

औरत ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

“ईशान?”

“नहीं।”

“तो कौन?”

औरत ने बच्चे का चेहरा खोल दिया।

अर्जुन की साँस रुक गई।

बच्चा बिल्कुल उसके जैसा था।

लेकिन उसके माथे पर कोई निशान नहीं था।

और उसकी कलाई पर तीन नहीं, चार काली रेखाएँ थीं।

औरत ने कहा—

“यह वह बच्चा है, जिसे तुमने अभी तक जन्म लेने नहीं दिया।”

अर्जुन पीछे हट गया।

“यह कैसे संभव है?”

औरत ने उसकी आँखों में देखा।

“क्योंकि तुम्हारा जन्म अभी पूरा नहीं हुआ।”

अर्जुन के कानों में भनभनाहट होने लगी।

“मैं अट्ठाईस साल का हूँ।”

“तुम्हारी उम्र अट्ठाईस साल है।”

“तो फिर मेरा जन्म पूरा कैसे नहीं हुआ?”

औरत ने बच्चे को अपनी गोद में सँभाला।

“क्योंकि तुम्हारे शरीर ने जन्म लिया था। तुम्हारे नाम ने नहीं।”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“मैं यह नहीं समझता।”

“तुम्हें समझना भी नहीं चाहिए।”

“आप मेरी माँ हैं?”

औरत की आँखों में आँसू भर आए।

“मैंने तुम्हें जन्म दिया था।”

“तो फिर आप राधा हैं?”

औरत ने कुछ देर तक उसे देखा।

फिर बोली—

“मैंने तुम्हें जन्म दिया था, लेकिन मैंने तुम्हें नाम नहीं दिया।”

अर्जुन ने फुसफुसाकर पूछा, “तो किसने दिया?”

औरत ने कमरे के कोने की तरफ देखा।

वहाँ एक लंबी काली आकृति खड़ी थी।

उसका चेहरा नहीं था।

लेकिन उसके हाथ में एक अस्पताल की पहचान-पट्टी थी।

उसने पट्टी अर्जुन की तरफ बढ़ाई।

उस पर लिखा था—

**“माँ का नाम: अज्ञात।”**

और नीचे बच्चे के नाम वाली जगह पर एक शब्द उभर रहा था।

**अर्जुन।**

आकृति ने कहा—

“तुम्हारा नाम तुम्हारी माँ ने नहीं रखा था।”

फिर उसने अपना सिर झुकाया।

“तुम्हारा नाम मैंने रखा था।”

***

अर्जुन ने उस आकृति की तरफ देखा।

“तुम कौन हो?”

उसने जवाब दिया, “तुम्हें यह सवाल पहले भी पूछना चाहिए था।”

“क्या तुमने मुझे जन्म दिया?”

“नहीं।”

“तो फिर मेरा नाम क्यों रखा?”

“क्योंकि तुम्हें किसी नाम की ज़रूरत थी।”

“तुमने मुझे किससे बचाया?”

आकृति ने अपना हाथ नीचे किया।

“उस बच्चे से, जिसे तुमने अपना नाम दिया था।”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“मैंने किसी को नाम नहीं दिया।”

आकृति ने कहा, “तुम्हें याद नहीं है। लेकिन तुम्हारी माँ को याद है।”

औरत ने बच्चे को कसकर पकड़ लिया।

“मैंने उसे रोकने की कोशिश की थी।”

अर्जुन उसकी तरफ मुड़ा।

“आपने किसे रोकने की कोशिश की थी?”

“तुम्हें।”

“मुझे?”

“तुम्हें उस रात आईने के सामने नहीं जाना चाहिए था।”

अर्जुन ने कहा, “मैं 1995 में पैदा हुआ था। 2008 में तेरह साल का था। मैं वहाँ कैसे हो सकता था?”

औरत ने उसकी तरफ देखा।

“क्योंकि तुम 1995 में पैदा हुए थे। लेकिन तुम्हारा जन्म 1995 में नहीं हुआ था।”

अर्जुन ने माथा पकड़ लिया।

“यह कैसी बात है?”

औरत ने कहा, “तुम्हारा शरीर उस रात पैदा हुआ था। तुम्हारी पहचान बाद में आई।”

“कब?”

“17 जुलाई 2008।”

“उस रात क्या हुआ था?”

औरत ने बच्चे की तरफ देखा।

“तुम्हें अपना नाम दिया गया। और तुम्हारे भाई का नाम तुमसे छीन लिया गया।”

अर्जुन ने पूछा, “तो मेरा असली नाम क्या है?”

औरत ने जवाब देने के लिए मुँह खोला।

लेकिन कमरे के बाहर से घंटी की आवाज़ आई।

टन्न्न…

औरत का चेहरा बदल गया।

उसने बच्चे को अपनी गोद से नीचे उतारकर पलंग पर लिटा दिया।

“तुम्हें जाना होगा।”

“मुझे मेरा नाम बताइए!”

“अब देर हो चुकी है।”

“माँ!”

औरत ने उसकी तरफ देखा।

उसकी आँखों में ऐसी पीड़ा थी, जैसे वह अपने ही बच्चे को दूसरी बार खो रही हो।

“तुम्हारा नाम वही है, जो तुम्हारे मरने के बाद बचा था।”

कमरे की रोशनी बुझ गई।

अर्जुन ने अँधेरे में माँ का हाथ पकड़ने की कोशिश की।

उसकी उँगलियाँ किसी ठंडी चीज़ से टकराईं।

फिर एक आवाज़ आई—

“तुमने मुझे माँ कहा।”

अर्जुन ने हाथ पीछे खींच लिया।

आवाज़ फिर आई—

“अब मैं तुम्हारी माँ हूँ।”

रोशनी वापस जली।

कमरा खाली था।

पलंग पर बच्चा नहीं था।

खिड़की खुली थी।

और दीवार पर खून जैसे लाल रंग से लिखा था—

**“2013 में जो मरा था, वह अर्जुन नहीं था।”**

उसके नीचे एक दूसरी पंक्ति उभरी—

**“2013 में अर्जुन को जन्म दिया गया था।”**

***

अर्जुन भागकर गलियारे में आया।

नर्स वहाँ नहीं थी।

कमरा नंबर तीन का दरवाज़ा खुला था। जंजीर फर्श पर पड़ी थी। भीतर का आईना टूट चुका था।

कमरा नंबर दो के बाहर एक पुराना रजिस्टर रखा था।

अर्जुन ने उसे उठाया।

उसके पहले पन्ने पर लिखा था—

**रोगी का नाम: अर्जुन शर्मा।**

**प्रवेश की तारीख: 17 जुलाई 2013।**

**समय: 3:13 AM।**

**स्थिति: मृत।**

अगले पन्ने पर—

**रोगी का नाम: अर्जुन शर्मा।**

**प्रवेश की तारीख: 18 जुलाई 2013।**

**समय: 3:13 AM।**

**स्थिति: जीवित।**

अर्जुन ने पन्ना पलटा।

तीसरी प्रविष्टि भी उसी नाम की थी।

**प्रवेश की तारीख: 19 जुलाई 2013।**

**समय: 3:13 AM।**

**स्थिति: पहचान अस्थिर।**

चौथी प्रविष्टि—

**प्रवेश की तारीख: 20 जुलाई 2013।**

**समय: 3:13 AM।**

**स्थिति: रोगी ने अपना नाम बदलने का प्रयास किया।**

पाँचवीं प्रविष्टि—

**प्रवेश की तारीख: 21 जुलाई 2013।**

**समय: 3:13 AM।**

**स्थिति: रोगी ने अपनी माँ को पहचानने से इनकार किया।**

अर्जुन के हाथ काँपने लगे।

आखिरी पन्ने पर आज की तारीख लिखी थी।

14 अक्टूबर 2026।

**रोगी का नाम: अर्जुन शर्मा।**

**प्रवेश की तारीख: 14 अक्टूबर 2026।**

**समय: 3:13 AM।**

**स्थिति: अभी तक जन्म नहीं हुआ।**

अर्जुन ने पन्ना फाड़ने की कोशिश की।

लेकिन कागज़ उसके हाथ से चिपक गया।

उस पर स्याही फैलने लगी।

फिर एक नया वाक्य उभरा—

**“रोगी की माँ अभी कमरे के बाहर खड़ी है।”**

अर्जुन ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

गलियारे के अंत में एक औरत खड़ी थी।

उसका चेहरा माँ जैसा था।

लेकिन उसके पीछे एक दूसरी औरत खड़ी थी।

वह राधा थी।

और राधा के पीछे तीसरी औरत।

जिसका चेहरा नहीं था।

तीनों एक साथ उसकी तरफ बढ़ने लगीं।

पहली औरत ने कहा, “बेटा, घर चलो।”

दूसरी ने कहा, “अर्जुन, मेरी बात सुनो।”

तीसरी ने कोई आवाज़ नहीं निकाली।

लेकिन उसकी परछाईं ने होंठ हिलाए—

**“अभय।”**

अर्जुन पीछे हटने लगा।

तीनों औरतें रुक गईं।

फिर एक साथ मुस्कराईं।

पहली ने कहा, “मैं तुम्हारी माँ हूँ।”

दूसरी ने कहा, “मैं तुम्हारी माँ हूँ।”

तीसरी ने कहा, “तुमने मुझे माँ कहा था।”

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

उसे शारदा देवी की चेतावनी याद आई।

*अगर कोई आवाज़ अँधेरे में तुम्हें पुकारे, तो जवाब मत देना।*

लेकिन यहाँ कोई आवाज़ अँधेरे से नहीं आ रही थी।

यहाँ तीनों चेहरे रोशनी में थे।

उसने आँखें खोलीं।

गलियारा खाली था।

तीनों औरतें गायब थीं।

उसके सामने फर्श पर एक छोटा-सा कागज़ पड़ा था।

उसने उठाकर देखा।

उस पर लिखा था—

**“अगली बार जब तुम्हारी माँ तुम्हें पुकारे, तो यह मत देखना कि उसका चेहरा किसका है। यह देखना कि उसकी परछाईं किसकी है।”**

कागज़ के नीचे एक छोटा निशान था।

तीन काली रेखाएँ।

और उनके नीचे एक नाम—

**नीलकंठ।**

***

अर्जुन सुबह होने तक पुराने प्रसूति गृह से बाहर नहीं निकल पाया।

मुख्य दरवाज़ा खुला था, लेकिन हर बार जब वह बाहर जाने की कोशिश करता, उसे वही गलियारा दिखाई देता। कभी कमरा नंबर एक सामने आता, कभी कमरा नंबर दो, कभी कमरा नंबर तीन।

आखिरकार उसने पीछे के रास्ते से निकलने की कोशिश की।

वहाँ एक पुराना दरवाज़ा था, जिस पर जंग लगी प्लेट टँगी थी।

उस पर लिखा था—

**मुर्दाघर।**

दरवाज़ा खुला था।

अंदर लोहे की छह मेज़ें थीं। पाँच खाली थीं। छठी मेज़ पर सफेद चादर पड़ी थी।

चादर के नीचे किसी का शरीर था।

अर्जुन ने पास जाकर चादर हटाई।

वह खुद था।

उसका वही चेहरा।

वही माथे का निशान।

वही उम्र।

उसकी कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं।

अर्जुन ने पीछे हटना चाहा, लेकिन उसके पैर जम गए।

शव की आँखें बंद थीं।

उसके होंठों पर एक छोटी मुस्कान थी।

अर्जुन ने काँपते हाथ से उसकी गर्दन छुई।

बर्फ जैसी ठंडी।

फिर उसने शव की कलाई पकड़ी।

नब्ज़ नहीं थी।

अचानक शव की आँखें खुल गईं।

“तुम आ गए,” उसने कहा।

अर्जुन चीख पड़ा।

शव उठकर बैठ गया।

“मुझे घर ले चलो।”

“तुम कौन हो?”

“तुम्हें पता है।”

“तुम मर चुके हो!”

शव ने अपनी कलाई दिखाई।

“मुझे मरे हुए तेरह साल हो गए।”

“तो फिर मैं कौन हूँ?”

शव ने अर्जुन के चेहरे को ध्यान से देखा।

“तुम वह हो, जिसे मेरे मरने के बाद बनाया गया था।”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

“तुम्हें 2013 में घर ले जाया गया था।”

“मैं 1995 में पैदा हुआ था!”

शव ने कहा, “तुम्हारा शरीर 1995 में पैदा हुआ था। लेकिन तुम 2013 में घर लौटे थे।”

“मैं हमेशा से अर्जुन था।”

शव की मुस्कान गहरी हो गई।

“तो फिर मेरी कलाई पर तुम्हारा नाम क्यों लिखा है?”

अर्जुन ने उसकी कलाई देखी।

तीन काली रेखाओं के बीच अब एक नाम उभर रहा था।

**अर्जुन।**

शव ने पूछा, “अगर हम दोनों अर्जुन हैं, तो घर किसे जाना चाहिए?”

अर्जुन ने जवाब नहीं दिया।

शव ने फिर पूछा—

“अगर एक ही अर्जुन घर लौट सकता है, तो किसे बाहर रहना चाहिए?”

अर्जुन ने पीछे हटते हुए कहा, “मैं तुम्हें बाहर नहीं निकालूँगा।”

शव की मुस्कान गायब हो गई।

“तो फिर मैं तुम्हें बाहर नहीं जाने दूँगा।”

उसने अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।

उसकी पकड़ लोहे जैसी मजबूत थी।

मुर्दाघर की सभी मेज़ों पर एक साथ चादरें हिलने लगीं।

पहली मेज़ से एक बच्चा उठकर बैठ गया।

दूसरी मेज़ से एक और।

तीसरी मेज़ पर मीरा की आकृति दिखाई दी।

चौथी पर विक्रम।

पाँचवीं पर शारदा देवी।

छठी पर अब भी अर्जुन का शव बैठा था।

सभी ने एक साथ सिर उठाया।

और एक साथ पूछा—

**“हममें से असली अर्जुन कौन है?”**

अर्जुन ने अपनी पूरी ताकत लगाकर हाथ छुड़ाया और दरवाज़े की तरफ दौड़ा।

पीछे से आवाज़ें आती रहीं।

“अर्जुन!”

“अभय!”

“अर्णव!”

“ईशान!”

हर नाम के साथ गलियारे की रोशनी बुझती गई।

आखिरी नाम सुनते ही सब अँधेरा हो गया।

फिर एक घंटी बजी।

टन्न्न…

अर्जुन ने आँखें खोलीं।

वह प्रसूति गृह के बाहर सड़क पर पड़ा था।

सुबह हो चुकी थी।

उसके हाथ में एक कागज़ था।

उस पर लिखा था—

**“2013 में एक अर्जुन मरा था।”**

**“दूसरा अर्जुन पैदा हुआ था।”**

**“तीसरा अर्जुन कभी पैदा नहीं हुआ।”**

और सबसे नीचे—

**“तुम इनमें से कौन हो, यह जानने के लिए अपनी माँ से पूछो कि उसने तुम्हें पहली बार कब देखा था।”**

अर्जुन धीरे-धीरे उठकर खड़ा हुआ।

उसने अपने पैरों की तरफ देखा।

उसकी परछाईं वापस आ गई थी।

लेकिन उसके साथ एक दूसरी परछाईं भी थी।

वह दूसरी परछाईं उससे अलग दिशा में देख रही थी।

अर्जुन ने अपना हाथ उठाया।

पहली परछाईं ने हाथ उठाया।

दूसरी परछाईं ने अपना सिर घुमाकर उसकी तरफ देखा।

फिर उसने फर्श पर उँगली से लिखा—

**“घर मत जाना।”**

अर्जुन ने ऊपर देखा।

सड़क के उस पार शर्मा निवास की दिशा से धुआँ उठ रहा था।

उसका फोन बजा।

स्क्रीन पर माँ का नाम था।

उसने फोन उठाया।

दूसरी तरफ माँ रो रही थीं।

“अर्जुन, जल्दी घर आओ!”

“क्या हुआ?”

“वह वापस आ गया है।”

“कौन?”

माँ ने काँपते हुए कहा—

“तुम्हारे पिता।”

अर्जुन का गला सूख गया।

“पापा तो मर चुके हैं।”

दूसरी तरफ कुछ देर सन्नाटा रहा।

फिर माँ ने धीमे स्वर में कहा—

“नहीं, बेटा। 2013 में जो मरा था, वह तुम्हारे पिता नहीं थे।”

फोन पर किसी ने माँ से फोन छीन लिया।

फिर विक्रम की आवाज़ आई।

“अर्जुन, घर मत आना।”

“पापा?”

“मेरी बात ध्यान से सुनो। तुम्हारी माँ के पास जो आदमी बैठा है, वह मैं नहीं हूँ।”

अर्जुन के हाथ से फोन गिरते-गिरते बचा।

“लेकिन आप अभी फोन पर—”

“मैंने फोन नहीं किया।”

दूसरी तरफ से विक्रम की आवाज़ टूटने लगी।

“मैं पुराने प्रसूति गृह में हूँ। मुर्दाघर के पीछे। मेरे सामने एक आदमी पड़ा है, जिसके चेहरे पर मेरा चेहरा है।”

अर्जुन की साँसें तेज हो गईं।

“आप वहाँ कैसे पहुँचे?”

“मुझे नहीं पता।”

फिर विक्रम ने फुसफुसाकर कहा—

“अर्जुन, अगर तुमने अपनी माँ को देख लिया है, तो उसके पीछे मत देखना।”

“क्यों?”

“क्योंकि उसके पीछे खड़ा आदमी तुम्हें पहचानता है।”

“कौन आदमी?”

विक्रम ने जवाब दिया—

“वह आदमी, जिसने तुम्हें 1995 में नाम दिया था।”

फोन कट गया।

अर्जुन ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

उसके सामने पुराने प्रसूति गृह का दरवाज़ा फिर खुल रहा था।

अंदर से एक आदमी बाहर आया।

उसने विक्रम के कपड़े पहन रखे थे।

उसका चेहरा विक्रम जैसा था।

लेकिन उसकी कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं।

वह अर्जुन की तरफ देखकर मुस्कराया।

“बेटा,” उसने कहा, “तुम्हें घर नहीं जाना चाहिए।”

अर्जुन पीछे हट गया।

आदमी ने आगे बढ़ते हुए कहा—

“क्योंकि इस बार तुम्हारी माँ ने मुझे नहीं बुलाया।”

वह कुछ पल रुका।

फिर बोला—

**“इस बार तुमने मुझे जन्म दिया है।”**

Writer
firoj saifi
Story
“अंधेरे में कोई है”
Chapter
18 of 22
Category
Ghost Stories
Reading time
31 min
Words
6193
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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