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एपिसोड 17: जिस दिन अर्जुन मर गया

firoj saifi · Ghost Stories · 29 मिनट

आईने के नीचे लिखा वाक्य धीरे-धीरे धुँधला पड़ने लगा।

**“2013 में मरा हुआ आदमी आज रात घर लौटेगा।”**

अर्जुन तीसरी मंज़िल पर खड़ा था। उसके सामने आईना था और उसमें उसका प्रतिबिंब।

उसने अपनी कलाई देखी।

वहाँ कोई नाम नहीं लिखा था।

लेकिन आईने में दिखाई दे रही कलाई पर अब भी एक शब्द चमक रहा था—

**विक्रम।**

अर्जुन ने अपना हाथ उठाया। आईने वाले अर्जुन ने भी हाथ उठाया, मगर उसकी हरकत में एक पल की देरी थी।

अर्जुन ने हाथ नीचे कर लिया।

प्रतिबिंब का हाथ कुछ देर हवा में उठा रहा।

फिर उसने धीरे-धीरे अपनी उँगलियाँ मोड़ीं और काँच पर तीन बार दस्तक दी।

टक।

टक।

टक।

अर्जुन पीछे हट गया।

“कौन है?”

आईने के भीतर खड़े चेहरे ने होंठ हिलाए।

आवाज़ बाहर से नहीं, अर्जुन के सिर के भीतर से आई।

“तुम्हें अभी भी लगता है कि तुम बाहर खड़े हो?”

अर्जुन ने पास पड़ी पीतल की छोटी घंटी उठा ली। वह घंटी शारदा देवी हमेशा अपने पास रखती थीं। मीरा ने पहले बताया था कि उसकी आवाज़ कुछ समय के लिए परछाईं की नकल करने की शक्ति रोक सकती है।

उसने घंटी बजाई।

टन्न्न…

आईने के भीतर का चेहरा काँप गया। उसकी आँखों में एक पल के लिए इंसानी डर दिखाई दिया।

फिर वह मुस्कराया।

“तुम्हें लगता है यह घंटी तुम्हें बचा लेगी?”

अर्जुन ने घंटी फिर बजाई।

इस बार आवाज़ बहुत धीमी निकली।

जैसे किसी ने घंटी के भीतर कपड़ा ठूँस दिया हो।

आईने वाले अर्जुन ने अपनी हथेली काँच पर रखी।

“नीचे जाओ। तुम्हारा इंतज़ार हो रहा है।”

“किसका?”

“उस आदमी का, जिसने तुम्हारी मौत पर हस्ताक्षर किए थे।”

“वह मर चुका है।”

“तुम्हें ऐसा बताया गया है।”

“उसकी मौत 1995 में हुई थी।”

आईने वाले अर्जुन ने सिर झुकाया।

“तो फिर उससे पूछ लेना कि उसने तुम्हारी मौत की गवाही देने के लिए अट्ठाईस साल इंतज़ार क्यों किया।”

अचानक आईने की सतह पर काली दरार उभरी।

उस दरार से एक ठंडी हवा निकली।

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

जब उसने दोबारा आँखें खोलीं, आईने में वह अकेला नहीं था।

उसके पीछे एक बूढ़ा आदमी खड़ा था।

सफेद बाल। झुकी हुई पीठ। दाहिने गाल पर पुराना निशान। सफेद कुर्ता, जिसकी बाँह पर भूरा धब्बा लगा था।

अर्जुन ने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।

कमरा खाली था।

आईने में बूढ़ा अब भी खड़ा था।

उसने अपनी उँगली होंठों पर रखी।

फिर काँच पर लिखा—

**“नीचे मत जाना।”**

उसी पल नीचे से माँ की चीख सुनाई दी।

“अर्जुन! जल्दी आओ!”

आईने में बूढ़े ने आँखें बंद कर लीं।

और उसके होंठों से निकला—

“अब बहुत देर हो चुकी है।”

***

अर्जुन सीढ़ियाँ उतरकर हॉल में पहुँचा।

मुख्य दरवाज़ा खुला था। बाहर रात का अँधेरा फैला हुआ था। बारिश हो रही थी, मगर आँगन की मिट्टी पर पानी की एक बूँद भी नहीं गिर रही थी।

माँ हॉल के बीच खड़ी थीं।

उनके सामने लकड़ी की मेज़ पर एक पुरानी फाइल रखी थी।

“यह कहाँ से आई?” अर्जुन ने पूछा।

माँ ने जवाब नहीं दिया।

उन्होंने फाइल की तरफ इशारा किया।

उस पर सरकारी मुहर लगी थी। किनारे पीले पड़ चुके थे। ऊपर लाल स्याही में लिखा था—

**मृत्यु अभिलेख — 17 जुलाई 2013।**

अर्जुन ने फाइल खोली।

पहले पन्ने पर अस्पताल का नाम था—देवगढ़ जिला चिकित्सालय।

दूसरे पन्ने पर एक धुँधली तस्वीर लगी थी।

तस्वीर देखकर अर्जुन की साँस अटक गई।

वह उसी का चेहरा था।

वही आँखें। वही नाक। वही माथे पर बचपन की चोट का निशान।

लेकिन तस्वीर में वह बच्चा था।

लगभग तेरह साल का।

उसके नीचे लिखा था—

**मृतक का नाम: अर्जुन शर्मा।**

**जन्मतिथि: 17 जुलाई 1995।**

**मृत्यु की तारीख: 17 जुलाई 2013।**

**मृत्यु का समय: 3:13 AM।**

अर्जुन ने पन्ना पलट दिया।

अगले पन्ने पर मृत्यु का कारण लिखा था—

*पहचान अज्ञात। शरीर पर बाहरी चोट के स्पष्ट निशान नहीं। हृदय की धड़कन बंद। मृत्यु से पहले रोगी ने बार-बार कहा—“मुझे बाहर मत निकालना।”*

अर्जुन के हाथ काँपने लगे।

“यह झूठ है।”

माँ ने धीमे स्वर में कहा, “मैंने भी यही कहा था।”

“यह मेरा प्रमाणपत्र नहीं हो सकता। मैं 2013 में ज़िंदा था।”

“मुझे पता है।”

“तो फिर यह किसका है?”

माँ ने फाइल का आखिरी पन्ना खोला।

वहाँ डॉक्टर के हस्ताक्षर थे।

**डॉ. नीलकंठ प्रसाद।**

उनके नीचे गवाह के हस्ताक्षर थे।

**विक्रम शर्मा।**

अर्जुन ने पन्ना छीनकर देखा।

“पापा ने इस पर हस्ताक्षर किए?”

माँ ने सिर हिलाया।

“हाँ।”

“लेकिन पापा तो 2013 में मर गए थे!”

“मैंने कहा था कि उनकी मौत के बारे में हम जो जानते हैं, वह पूरा सच नहीं है।”

अर्जुन ने गवाह के हस्ताक्षर के नीचे लिखी तारीख देखी।

18 जुलाई 2013।

उसके नीचे एक और नाम लिखा था—

**दूसरा गवाह: डॉ. हरिनारायण मिश्र।**

अर्जुन ने नाम पढ़ा।

फिर उसकी नज़र नीचे लिखे छोटे अक्षरों पर गई।

**स्थिति: मृत।**

**मृत्यु की तारीख: 17 जुलाई 1995।**

अर्जुन कुछ देर तक पन्ने को देखता रहा।

“यह आदमी 1995 में मर गया था।”

माँ ने कहा, “हाँ।”

“लेकिन इसने 2013 में मेरी मौत की गवाही दी?”

माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।

अर्जुन ने प्रमाणपत्र मेज़ पर पटक दिया।

“यह कैसे संभव है?”

माँ ने दरवाज़े की तरफ देखा।

“क्योंकि वह आदमी कभी अस्पताल से बाहर नहीं निकला था।”

“क्या मतलब?”

“डॉ. हरिनारायण मिश्र देवगढ़ के पुराने प्रसूति गृह में काम करते थे। तुम्हारे जन्म की रात वही ड्यूटी पर थे। 17 जुलाई 1995 की सुबह उनकी मौत दर्ज हुई थी।”

“तो 2013 में उनके हस्ताक्षर किसने किए?”

माँ ने फुसफुसाकर कहा—

“वही आदमी, जो पिछले पंद्रह साल से इस घर में रहता है।”

अर्जुन ने सिर उठाया।

“हमारे घर में कोई ऐसा आदमी नहीं रहता।”

माँ ने उसकी आँखों में देखा।

“तुम उसे रोज़ देखते आए हो।”

अर्जुन के भीतर कुछ टूटने लगा।

उसे घर के पुराने हिस्से याद आए। एक बूढ़ा नौकर, जो हमेशा पीछे के बरामदे में बैठता था। एक आदमी, जिसे शारदा देवी कभी नाम से नहीं बुलाती थीं। जो परिवार के साथ भोजन नहीं करता था। जो रात में घर के दरवाज़े बंद करता और सुबह होने से पहले गायब हो जाता।

अर्जुन ने धीरे से पूछा—

“वह बूढ़ा आदमी?”

माँ ने सिर झुका लिया।

“हम उसे हरिनारायण कहते थे।”

***

अर्जुन को अचानक याद आया कि उसने उस बूढ़े को आखिरी बार शारदा देवी के अंतिम संस्कार से एक दिन पहले देखा था।

वह पुराने कुएँ के पास खड़ा था।

उसने अर्जुन को देखकर कहा था—

“बड़े हो गए हो, बाबू।”

अर्जुन ने उससे पूछा था कि वह कौन है।

बूढ़े ने जवाब दिया था—

“जिसने तुम्हें पहली बार रोते हुए सुना था।”

उस समय अर्जुन ने उसे घर का कोई पुराना कर्मचारी समझा था।

अब उसे वह वाक्य याद आया तो उसकी रीढ़ में ठंड उतर गई।

*जिसने तुम्हें पहली बार रोते हुए सुना था।*

अगर वह 1995 में मर चुका था, तो उसने अर्जुन का रोना कैसे सुना?

और अगर उसने अर्जुन का रोना सुना था, तो क्या वह सचमुच अर्जुन का जन्म देख रहा था?

“वह कहाँ है?” अर्जुन ने पूछा।

माँ ने कहा, “पीछे वाले बरामदे में।”

अर्जुन ने फाइल उठा ली।

“मैं उससे बात करूँगा।”

माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“उससे यह मत पूछना कि तुम कौन हो।”

“क्यों?”

“क्योंकि वह तुम्हें वही नाम बताएगा, जिसे तुम सुनने के लिए सबसे ज़्यादा तैयार हो।”

“मुझे अपना नाम पता है।”

माँ की आँखें भर आईं।

“नहीं, बेटा। तुम्हें केवल वह नाम पता है, जिससे लोग तुम्हें बुलाते हैं।”

अर्जुन ने उनका हाथ छुड़ाया।

“मैं अब और झूठ नहीं सुन सकता।”

वह पीछे के बरामदे की तरफ चला गया।

माँ ने उसके पीछे पुकारा—

“अर्जुन, अगर वह तुम्हें पहचानने से इनकार करे, तो उसके सामने अपना चेहरा मत दिखाना!”

अर्जुन रुक गया।

“क्या?”

माँ की आवाज़ काँप रही थी।

“उसके लिए चेहरे पहचानना आसान नहीं है। वह लोगों को उनकी परछाईं से पहचानता है। अगर उसने तुम्हारी परछाईं नहीं देखी, तो वह तुम्हें अपना मृत बच्चा समझेगा।”

अर्जुन ने धीरे से पीछे मुड़कर पूछा—

“और अगर उसने मेरी परछाईं देख ली?”

माँ ने उत्तर दिया—

“तो वह तुम्हें वह बच्चा समझेगा, जिसे उसने मरते हुए देखा था।”

***

पीछे का बरामदा अँधेरे में डूबा था।

एक कोने में पुरानी चारपाई पड़ी थी। पास मिट्टी का घड़ा रखा था, जिसके ऊपर पीतल का गिलास उलटा रखा था।

बरामदे के आखिरी सिरे पर एक दरवाज़ा था, जो हमेशा बंद रहता था।

अर्जुन को याद था कि शारदा देवी ने उसे बचपन में उस दरवाज़े के पास जाने से मना किया था।

उन्होंने कहा था कि वहाँ पुराने सामान रखे हैं।

लेकिन दरवाज़े के नीचे से हमेशा हल्की पीली रोशनी आती थी।

आज वह रोशनी लाल थी।

अर्जुन ने दरवाज़े पर दस्तक दी।

कोई जवाब नहीं आया।

उसने दूसरी बार दस्तक दी।

अंदर से किसी ने तीन बार खाँसा।

फिर एक आवाज़ आई—

“कौन है?”

“अर्जुन।”

अंदर सन्नाटा छा गया।

कुछ देर बाद आवाज़ आई—

“कौन-सा अर्जुन?”

अर्जुन ने फाइल कसकर पकड़ ली।

“विक्रम शर्मा का बेटा।”

दरवाज़े के पीछे किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।

फिर बूढ़े ने कहा—

“यहाँ ऐसा कोई नहीं रहता।”

अर्जुन ने दरवाज़े की कुंडी पकड़ ली।

“मुझे आपसे बात करनी है, डॉ. हरिनारायण।”

दरवाज़े के पीछे से धीमी हँसी सुनाई दी।

“डॉक्टर?”

“आपने 1995 में दो बच्चों का जन्म देखा था।”

“मैंने कोई जन्म नहीं देखा।”

“आपने 2013 में मेरी मौत की गवाही दी थी।”

“तुम्हारी मौत नहीं हुई थी।”

अर्जुन का हाथ कुंडी पर जम गया।

“तो प्रमाणपत्र पर किसकी मौत लिखी है?”

बूढ़े ने बहुत धीरे से जवाब दिया—

“उस बच्चे की, जो तुम्हारा चेहरा लेकर पैदा हुआ था।”

अर्जुन ने दरवाज़ा धक्का देकर खोल दिया।

कमरे में एक छोटी मेज़ थी। उस पर पुराने कागज़, काँच की शीशियाँ और जंग लगा स्टेथोस्कोप रखा था। दीवार पर एक घड़ी टँगी थी, जिसकी सुइयाँ उलटी दिशा में चल रही थीं।

कमरे के बीच बूढ़ा आदमी बैठा था।

उसकी आँखें धुँधली थीं। चेहरे पर गहरी झुर्रियाँ थीं। दाहिने गाल का निशान वैसा ही था, जैसा अर्जुन ने आईने में देखा था।

लेकिन बूढ़े की परछाईं नहीं थी।

अर्जुन ने अपनी नज़र नीचे कर ली।

“आप डॉ. हरिनारायण हैं?”

बूढ़े ने सिर उठाया।

“कभी था।”

“आपकी मौत 1995 में हुई थी।”

“हाँ।”

“तो आप यहाँ कैसे हैं?”

बूढ़े ने मुस्कराकर कहा—

“तुम्हारी तरह।”

अर्जुन का गला सूख गया।

“आपका मतलब?”

“तुम्हारी तरह ही मुझे भी किसी ने बाहर निकाला था।”

“किसने?”

बूढ़े ने जवाब देने के बजाय मेज़ पर रखी एक पुरानी तस्वीर उसकी तरफ खिसका दी।

तस्वीर में अस्पताल का कमरा था। तीन पलंग थे। एक पर नवजात बच्चा रो रहा था। दूसरे पर एक बच्चा सफेद कपड़े में लिपटा हुआ था। तीसरा पलंग खाली था।

कमरे के पीछे डॉ. हरिनारायण खड़े थे।

उनके बगल में शारदा देवी थीं।

विक्रम शर्मा उनके सामने खड़े थे।

और उनके हाथ में एक बच्चा था।

अर्जुन ने तस्वीर को ध्यान से देखा।

बच्चे के चेहरे पर कपड़ा था, लेकिन उसके पैर के पास एक छोटी काली परछाईं दिखाई दे रही थी।

उस परछाईं के तीन हाथ थे।

“यह तस्वीर किसने ली?”

बूढ़े ने कहा, “उस आदमी ने, जो उस कमरे में मौजूद नहीं था।”

“कौन आदमी?”

बूढ़े ने अपनी धुँधली आँखें उठाईं।

“तुम्हारा पिता।”

अर्जुन ने तस्वीर पलटी।

पीछे लिखा था—

**“17 जुलाई 1995। पहला बच्चा रोया। दूसरा बच्चा नहीं रोया। तीसरे की आवाज़ कमरे के बाहर से आई।”**

अर्जुन ने पूछा, “तीसरा बच्चा कौन था?”

बूढ़े ने कहा—

“वही, जिसने सबसे पहले तुम्हारा नाम लिया था।”

***

“मुझे पूरी बात बताइए,” अर्जुन ने कहा।

डॉ. हरिनारायण ने अपना हाथ मेज़ पर रखा।

उनकी उँगलियाँ बहुत पतली थीं। नाखूनों के नीचे काली मिट्टी भरी हुई थी।

“17 जुलाई 1995 की रात देवगढ़ में भयंकर बारिश हुई थी। अस्पताल की बिजली बार-बार जा रही थी। तुम्हारे पिता विक्रम शर्मा अपनी पत्नी को लेकर आए थे।”

“राधा?”

बूढ़े ने सिर हिलाया।

“नहीं। उस रात राधा अस्पताल में नहीं थी।”

अर्जुन ने उसे घूरकर देखा।

“लेकिन मेरी माँ—”

“तुम्हारी माँ कौन है?”

अर्जुन चुप हो गया।

बूढ़े ने कहा, “विक्रम अपनी पत्नी को लेकर आया था। वह औरत बहुत दर्द में थी। उसके साथ शारदा देवी थीं। मैंने उन्हें प्रसूति कक्ष में पहुँचाया। कुछ देर बाद एक बच्चा पैदा हुआ।”

“कौन-सा बच्चा?”

“वह रोया था।”

“उसका नाम?”

“अभय।”

अर्जुन ने साँस छोड़ी।

“तो अभय सच में था।”

बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।

“नाम था। बच्चा था या नहीं, यह मैं आज भी नहीं कह सकता।”

“आपने उसे अपनी आँखों से देखा था?”

“हाँ।”

“उसका चेहरा कैसा था?”

बूढ़े ने आँखें बंद कर लीं।

“तुम्हारे जैसा।”

अर्जुन के हाथ से तस्वीर लगभग छूट गई।

“और दूसरा बच्चा?”

“कुछ देर बाद दूसरा बच्चा पैदा हुआ। वह रोया नहीं। उसकी साँसें नहीं चल रही थीं। मैंने उसकी नब्ज़ देखी। कुछ नहीं था।”

“वह मर चुका था?”

“उस समय मुझे यही लगा।”

“तो फिर तीसरा बच्चा?”

बूढ़े ने कमरे के बंद दरवाज़े की तरफ देखा।

“तीसरा बच्चा पैदा नहीं हुआ था।”

“लेकिन तस्वीर में लिखा है कि उसकी आवाज़ बाहर से आई।”

“हाँ।”

बूढ़े की आवाज़ काँपने लगी।

“हमने बाहर से बच्चे के रोने की आवाज़ सुनी। पहले मुझे लगा कि कोई दूसरी माँ अस्पताल में आई होगी। मैं बाहर गया। गलियारा खाली था। खिड़कियाँ बंद थीं। दरवाज़े पर कोई नहीं था। लेकिन रोने की आवाज़ प्रसूति कक्ष के भीतर से आ रही थी।”

“फिर?”

“मैं वापस आया। मृत बच्चा पलंग पर नहीं था।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“क्या?”

“वह गायब था।”

“किसने लिया?”

“किसी ने नहीं।”

“तो वह गया कहाँ?”

बूढ़े ने धीमे स्वर में कहा—

“आईने के पीछे।”

अर्जुन को तीसरी मंज़िल का आईना याद आया।

“अस्पताल में आईना था?”

“हर प्रसूति कक्ष में नहीं होता। लेकिन उस कमरे में था।”

“क्यों?”

बूढ़े ने जवाब नहीं दिया।

अर्जुन ने पूछा, “उस रात आप मर गए थे?”

“सुबह होने से पहले।”

“कैसे?”

बूढ़े ने अपनी छाती पर हाथ रखा।

“मेरी धड़कन बंद हो गई थी। लेकिन मैं मरने से पहले तीसरे बच्चे को देख चुका था।”

“कहाँ?”

“दरवाज़े के पास।”

अर्जुन ने आगे झुककर पूछा, “वह कैसा दिखता था?”

बूढ़े ने आँखें खोलीं।

“वह तुम्हारे जैसा दिखता था।”

***

अर्जुन ने मेज़ पर दोनों हाथ रख दिए।

“आप मुझे उलझा रहे हैं। आप कह रहे हैं कि तीन बच्चे थे, लेकिन एक ही पैदा हुआ। एक मर गया। तीसरा पैदा ही नहीं हुआ। फिर भी तीनों का चेहरा मेरा था?”

“मैंने ऐसा नहीं कहा कि तीनों का चेहरा तुम्हारा था।”

“अभी आपने कहा।”

“मैंने कहा, तीसरा बच्चा तुम्हारे जैसा दिखता था।”

“और पहला?”

“पहला बच्चा भी तुम्हारे जैसा था।”

“दूसरा?”

बूढ़े ने सिर झुका लिया।

“उसका चेहरा मैंने नहीं देखा।”

“क्यों?”

“क्योंकि जब मैंने कपड़ा हटाया, उसके चेहरे पर मेरा चेहरा था।”

कमरे में अचानक ठंड बढ़ गई।

अर्जुन ने दरवाज़े की तरफ देखा।

वह खुला हुआ था, लेकिन बाहर बरामदा दिखाई नहीं दे रहा था। वहाँ अब एक लंबा अस्पताल का गलियारा था।

उस गलियारे के अंत में एक छोटा बच्चा खड़ा था।

उसने सफेद कपड़े पहन रखे थे।

उसकी कलाई पर तीन काली लकीरें थीं।

बच्चे ने अर्जुन की तरफ देखा और मुस्कराया।

फिर उसने हाथ हिलाया।

अर्जुन ने पलक झपकाई।

बच्चा गायब हो गया।

“आपने यह देखा?” अर्जुन ने पूछा।

डॉ. हरिनारायण ने कोई जवाब नहीं दिया।

उनकी आँखें दरवाज़े पर टिकी थीं।

“वह आ गया,” उन्होंने फुसफुसाकर कहा।

“कौन?”

“वही, जो हर बार तीसरे बच्चे का नाम पूछता है।”

“उसका नाम क्या है?”

बूढ़े ने अर्जुन की तरफ देखा।

“तुम्हें यह सवाल नहीं पूछना चाहिए था।”

कमरे की घड़ी रुक गई।

सुइयाँ 3:13 पर आकर ठहर गईं।

बूढ़े ने अचानक अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।

“सुनो! जब वह अंदर आए, तो उसे अपना चेहरा मत दिखाना। अगर वह तुम्हें देख लेगा, तो उसे याद आ जाएगा कि उसने तुम्हें किस नाम से बुलाया था।”

अर्जुन ने पूछा, “कौन-सा नाम?”

बूढ़े ने होंठ खोले।

लेकिन आवाज़ किसी और की निकली।

“ईशान।”

अर्जुन ने हाथ खींच लिया।

“ईशान?”

बूढ़ा काँपने लगा।

“नहीं… मैंने यह नाम नहीं लिया।”

“आपने अभी कहा!”

“मैंने नहीं कहा!”

उसने अपना सिर दोनों हाथों में पकड़ लिया।

“वह मेरी आवाज़ में बोल रहा है।”

कमरे के बाहर से एक बच्चे की हँसी सुनाई दी।

फिर वही आवाज़ आई—

“डॉक्टर साहब, आपने मेरा नाम क्यों छिपाया?”

डॉ. हरिनारायण रोने लगे।

“मैंने तुम्हारा नाम नहीं छिपाया।”

“तो फिर मेरी मौत के प्रमाणपत्र पर दूसरे बच्चे का नाम क्यों लिखा?”

“मैंने नहीं लिखा!”

“आपने हस्ताक्षर किए थे।”

बूढ़े ने अर्जुन की तरफ देखा।

“मैंने किसी कागज़ पर हस्ताक्षर नहीं किए। मेरी मौत 1995 में हुई थी। 2013 में जो गवाह बना, वह मैं नहीं था।”

अर्जुन ने फाइल की तरफ देखा।

“लेकिन हस्ताक्षर बिल्कुल आपके हैं।”

“क्योंकि वह मेरी उँगलियों से लिखे गए थे।”

“किसने लिखे?”

बूढ़े ने दरवाज़े की तरफ देखा।

“उस बच्चे ने, जो पैदा होने से पहले मर गया था।”

***

दरवाज़े के बाहर खड़ा बच्चा अब कमरे के भीतर आ चुका था।

उसके पैरों की आवाज़ नहीं थी। वह धीरे-धीरे चलता हुआ मेज़ के पास आया।

उसका चेहरा अर्जुन जैसा था, मगर उसकी आँखें बहुत पुरानी लगती थीं। जैसे उनमें कई जन्मों की थकान जमा हो।

उसने डॉ. हरिनारायण की तरफ देखा।

“आपने मुझे पहली बार कब देखा था?”

बूढ़े ने सिर हिलाया।

“मैंने तुम्हें नहीं देखा था।”

बच्चे ने मुस्कराकर पूछा, “तो फिर आपने मेरी मौत कैसे लिखी?”

“मैंने तुम्हारी मौत नहीं लिखी।”

“लेकिन मेरे नाम के आगे आपने मृत लिखा था।”

बूढ़ा काँपने लगा।

“मैंने वह नाम नहीं लिखा!”

बच्चे ने अर्जुन की तरफ देखा।

“भैया, आप बताइए। अगर किसी बच्चे का जन्म ही न हुआ हो, तो उसकी मौत कैसे हो सकती है?”

अर्जुन चुप रहा।

“अगर वह बच्चा कभी पैदा ही नहीं हुआ, तो क्या वह मर सकता है?”

अर्जुन ने धीमे स्वर में कहा, “नहीं।”

बच्चे की मुस्कान गहरी हो गई।

“तो फिर 1995 में किसकी मौत हुई थी?”

अर्जुन ने उसकी आँखों में देखा।

“उस बच्चे की, जो पैदा हुआ था।”

बच्चे ने सिर हिलाया।

“और वह कौन था?”

अर्जुन ने जवाब नहीं दिया।

बच्चे ने अपनी कलाई आगे की।

तीन काली लकीरें चमक उठीं।

“मैं तुम्हारी जगह पैदा हुआ था। तुम मेरी जगह मर गए। फिर किसी ने हमें अलग कर दिया।”

अर्जुन ने कहा, “तुम झूठ बोल रहे हो।”

“तो मुझे छूकर देखो।”

बच्चे ने हाथ आगे बढ़ाया।

अर्जुन पीछे हट गया।

“डरो मत, भैया।”

“मैं तुम्हारा भाई नहीं हूँ।”

बच्चे की मुस्कान गायब हो गई।

“तुमने यह बात पहले भी कही थी।”

“मैं तुम्हें नहीं जानता।”

“लेकिन मैंने तुम्हें जाना है।”

बच्चे की आँखों में आँसू आ गए।

“तुम्हें याद नहीं कि 2008 में तुमने मेरा हाथ पकड़ा था? तुमने कहा था कि हम दोनों एक ही नाम रखेंगे। तुमने कहा था कि अगर कोई एक मर गया, तो दूसरा उसकी जगह जीएगा।”

अर्जुन के सिर में तेज दर्द उठा।

एक दृश्य चमका।

तीसरी मंज़िल।

काला आईना।

दो बच्चे आमने-सामने खड़े थे।

एक ने अर्जुन का हाथ पकड़ा हुआ था।

दूसरा रो रहा था।

“अगर मैं मर गया, तो तुम मेरा नाम रख लेना,” एक बच्चे ने कहा था।

दूसरे ने जवाब दिया था—

“और अगर मैं मर गया, तो तुम मेरी जगह जीना।”

फिर किसी ने घंटी बजाई।

दृश्य गायब हो गया।

अर्जुन घुटनों के बल बैठ गया।

“यह याद… यह मेरी नहीं है।”

बच्चे ने उसके सिर पर हाथ रखा।

“हर याद तुम्हारी नहीं होती, भैया। लेकिन हर याद झूठ भी नहीं होती।”

डॉ. हरिनारायण अचानक खड़े हो गए।

“बस!”

उनकी आवाज़ कमरे में गूँज उठी।

“तुम इसे फिर से भ्रमित नहीं कर सकते।”

बच्चे ने उनकी तरफ देखा।

“आपने तो पहले ही इसे भ्रमित कर दिया था।”

“मैंने इसे बचाया था।”

“किससे?”

बूढ़े ने उत्तर नहीं दिया।

बच्चा धीरे-धीरे उसके पास गया।

“डॉक्टर साहब, आपने 1995 में किस बच्चे को बचाया था?”

बूढ़े के होंठ काँपने लगे।

“मैंने किसी को नहीं बचाया।”

“तो फिर आपने किस बच्चे की कलाई पर नाम बाँधा था?”

बूढ़े ने आँखें बंद कर लीं।

बच्चे ने उसके कान के पास फुसफुसाया—

“आपको याद है। आपने ही मेरे हाथ पर लाल धागा बाँधा था।”

बूढ़ा अचानक चीख पड़ा।

“क्योंकि तुम साँस नहीं ले रहे थे!”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

बच्चे ने अपनी मुस्कान वापस पा ली।

“तो आप मानते हैं कि मैं था।”

बूढ़ा रोने लगा।

“हाँ।”

“और आपने मुझे मृत घोषित किया था?”

“हाँ।”

“फिर आपने मेरी जगह किसे घर भेजा?”

डॉ. हरिनारायण ने अर्जुन की तरफ देखा।

उनकी आँखों में पछतावा था।

“इसे।”

अर्जुन का दिल जैसे रुक गया।

बच्चे ने धीरे-धीरे सिर हिलाया।

“अब बात समझ में आई?”

उसने अर्जुन के सामने हाथ बढ़ाया।

“मेरा नाम वापस कर दो।”

***

अर्जुन ने बच्चे का हाथ नहीं पकड़ा।

“अगर तुम वह बच्चा हो, जिसे मृत घोषित किया गया था, तो तुम्हारा नाम क्या था?”

बच्चे ने उसकी तरफ देखा।

“तुम जानते हो।”

“नहीं।”

“तुमने ही मुझे वह नाम दिया था।”

“मैंने तुम्हें कोई नाम नहीं दिया।”

बच्चे ने सिर झुका लिया।

“तुम्हें सब कुछ याद नहीं है।”

उसने मेज़ पर रखी फाइल खोली और एक कागज़ निकाला। यह वही मृत्यु प्रमाणपत्र था, लेकिन अब उसमें बदलाव हो चुका था।

मृतक का नाम अर्जुन शर्मा नहीं था।

उसकी जगह लिखा था—

**ईशान शर्मा।**

अर्जुन ने पन्ना छीन लिया।

“यह कैसे बदल गया?”

बच्चे ने कहा, “नाम हमेशा से यही था।”

“लेकिन यह मेरा मृत्यु प्रमाणपत्र है।”

“नहीं, भैया। यह मेरा है।”

“फिर उस पर मेरी तस्वीर क्यों है?”

बच्चे ने अपनी उँगली तस्वीर पर रखी।

तस्वीर का चेहरा धीरे-धीरे बदलने लगा।

पहले अर्जुन का चेहरा दिखाई दिया।

फिर एक छोटा बच्चा।

फिर एक ऐसा चेहरा, जिसमें अर्जुन और ईशान दोनों की आँखें थीं।

और अंत में तस्वीर पूरी तरह खाली हो गई।

“क्योंकि उस रात डॉक्टर ने चेहरा नहीं देखा था,” बच्चे ने कहा। “उसने केवल नाम देखा था।”

अर्जुन ने बूढ़े की तरफ देखा।

“क्या यह सच है?”

डॉ. हरिनारायण ने बहुत देर बाद सिर हिलाया।

“मैंने चेहरे नहीं देखे थे। मैंने केवल नाम लिखे थे। शारदा देवी ने मुझे बताया था कि कौन-सा बच्चा कौन है।”

“तो आपने उनके कहने पर एक बच्चे को मृत घोषित कर दिया?”

“हाँ।”

“क्यों?”

बूढ़े ने आँखें बंद कर लीं।

“क्योंकि वह बच्चा मर चुका था।”

“और फिर वह आईने में कैसे गया?”

“मुझे नहीं पता।”

बच्चे ने धीरे से कहा, “आपको पता है।”

बूढ़े ने सिर हिलाया।

“मैंने देखा था कि जब शारदा ने मृत बच्चे को आईने के सामने रखा, तो उसकी परछाईं उठकर खड़ी हो गई।”

अर्जुन की साँसें तेज हो गईं।

“परछाईं?”

“उसने बच्चे का चेहरा पहना हुआ था। वह आईने से बाहर निकल आई। फिर उसने दूसरे बच्चे की तरफ देखा।”

“फिर?”

“उसने उस बच्चे का नाम ले लिया।”

अर्जुन ने पूछा, “कौन-सा नाम?”

बूढ़े ने फुसफुसाकर कहा—

“अर्जुन।”

बच्चे ने आँखें बंद कर लीं।

“और उसी पल दूसरा बच्चा रोने लगा।”

अर्जुन ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

“तो मैं वही दूसरा बच्चा हूँ?”

डॉ. हरिनारायण ने उत्तर देने से पहले लंबी साँस ली।

“मैं नहीं जानता।”

बच्चा मुस्कराया।

“वह जानता है।”

उसने अर्जुन की तरफ इशारा किया।

“तुम्हें याद है, भैया। तुमने ही मुझे अपना नाम दिया था।”

अर्जुन के भीतर कुछ खुलने लगा।

उसे अस्पताल की सफेद दीवारें दिखाई दीं।

शारदा देवी की आवाज़ सुनाई दी।

विक्रम का चेहरा दिखा।

और एक महिला—जिसका चेहरा साफ नहीं था—दो बच्चों को अपनी गोद में लिए रो रही थी।

उस महिला ने कहा—

“मेरे दोनों बच्चों को बचा लो।”

किसी ने जवाब दिया—

“दोनों को नहीं बचाया जा सकता।”

फिर एक बच्चे की रोने की आवाज़ बंद हो गई।

दूसरे बच्चे ने आँखें खोल दीं।

उसकी आँखों में आईने की परछाईं थी।

अर्जुन चीखकर वर्तमान में लौट आया।

बच्चा अब उसके बिल्कुल सामने था।

“तुम्हें याद आ गया?”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

“तो फिर अगली बार याद आ जाएगा।”

बच्चे ने पीछे हटते हुए कहा—

“जब घड़ी 3:13 पर रुकेगी, तुम्हें चुनना होगा।”

“क्या चुनना होगा?”

बच्चे ने जवाब दिया—

“तुम्हारा नाम या मेरा।”

फिर उसकी आँखें काली हो गईं।

“लेकिन इस बार, भैया, तुम किसी और की जगह नहीं ले पाओगे।”

***

अचानक कमरे की घड़ी ने एक बार घंटी बजाई।

3:14।

डॉ. हरिनारायण ने सिर उठाया।

उनका चेहरा बदलने लगा था। झुर्रियाँ मिट रही थीं। सफेद बाल काले होने लगे थे। उनकी पीठ सीधी हो गई।

कुछ ही पलों में वह बूढ़े नहीं रहे।

वह लगभग तीस साल के आदमी की तरह दिखने लगे।

अर्जुन पीछे हट गया।

“आपके साथ क्या हो रहा है?”

आदमी ने अपनी हथेलियाँ देखीं।

“यह फिर शुरू हो गया।”

“क्या?”

“मेरा शरीर लौट रहा है।”

“लेकिन आप तो 1995 में मर गए थे।”

आदमी ने कहा, “मेरा शरीर मरा था। मेरा चेहरा नहीं।”

उसने मेज़ पर रखा स्टेथोस्कोप उठाया और अपनी छाती पर रखा।

फिर उसे अर्जुन की तरफ बढ़ा दिया।

“सुनो।”

अर्जुन ने स्टेथोस्कोप अपने कानों में लगाया और दूसरा सिरा आदमी की छाती पर रखा।

कुछ सुनाई नहीं दिया।

न धड़कन।

न साँसों की आवाज़।

सिर्फ एक धीमी दस्तक।

टक।

टक।

टक।

अर्जुन ने स्टेथोस्कोप हटा लिया।

“यह क्या है?”

आदमी ने कहा—

“तुम्हारा दिल।”

अर्जुन ने अपनी छाती पर हाथ रख दिया।

उसका दिल धड़क रहा था।

लेकिन उसी लय में, उसके भीतर कहीं गहराई में तीन दस्तकें सुनाई दे रही थीं।

टक।

टक।

टक।

डॉ. हरिनारायण ने कहा, “तुम्हें यहाँ से जाना होगा।”

“आपने कहा था कि मुझे सब सच बताना है।”

“मैंने गलत किया।”

“आपने मेरी मौत की गवाही क्यों दी?”

“क्योंकि वह बच्चा मुझे मजबूर कर रहा था।”

“कौन-सा बच्चा?”

डॉक्टर ने दरवाज़े की तरफ देखा।

वहाँ अब एक छोटी लड़की खड़ी थी।

उसने लाल रंग की फ्रॉक पहन रखी थी।

उसका चेहरा मीरा जैसा था।

लेकिन उसकी आँखें बंद थीं।

वह बिना आँखें खोले मुस्करा रही थी।

“डॉक्टर साहब,” लड़की ने कहा, “आपने मेरा नाम क्यों नहीं लिखा?”

डॉक्टर ने पीछे हटते हुए कहा, “तुम्हारा नाम था ही नहीं।”

लड़की ने सिर तिरछा किया।

“हर बच्चे का नाम होता है।”

“तुम बच्ची नहीं हो।”

“तो फिर मैं क्या हूँ?”

डॉक्टर चुप रहे।

लड़की ने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं।

उनकी जगह दो छोटे आईने थे।

उन आईनों में अर्जुन दिखाई दे रहा था।

“मैं वह हूँ, जिसने अर्जुन को पहली बार रोते हुए सुना था।”

अर्जुन ने पूछा, “तुम कौन हो?”

लड़की ने उसकी तरफ देखा।

“मैं वह आवाज़ हूँ, जो तुम्हारे जन्म से पहले तुम्हें बुलाती थी।”

“तुम्हारा नाम क्या है?”

लड़की मुस्कराई।

“तुम्हें याद है।”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

लड़की उसके करीब आई।

“तुमने ही मुझे नाम दिया था।”

अर्जुन की आँखों के सामने एक और दृश्य उभरा।

अस्पताल का कमरा।

काँच की दीवार।

एक नवजात बच्चा।

और कमरे के बाहर एक महिला की आवाज़—

“अगर वह बच्चा बच गया, तो दूसरा कभी घर नहीं लौट पाएगा।”

फिर एक बच्चे की आवाज़—

“मेरा नाम क्या है?”

अर्जुन के होंठ अपने आप हिले।

“मीरा…”

लड़की की मुस्कान गायब हो गई।

डॉ. हरिनारायण ने चीखकर कहा—

“नहीं! वह नाम मत लो!”

लेकिन देर हो चुकी थी।

लड़की के चेहरे पर दरारें पड़ने लगीं।

उसके भीतर से कई आवाज़ें निकलने लगीं—मीरा की, राधा की, शारदा की, विक्रम की और खुद अर्जुन की।

फिर लड़की का चेहरा पूरी तरह टूट गया।

उसके पीछे कोई चेहरा नहीं था।

सिर्फ अँधेरा।

अँधेरे से एक हाथ बाहर आया और उसने डॉ. हरिनारायण की कलाई पकड़ ली।

डॉक्टर ने अर्जुन की तरफ हाथ बढ़ाया।

“भागो!”

अर्जुन दरवाज़े की तरफ दौड़ा।

उसके पीछे डॉक्टर की चीख सुनाई दी।

फिर एक आवाज़ आई—

“गवाह अब मर चुका है।”

अर्जुन ने पीछे मुड़कर देखा।

कमरे में कोई नहीं था।

मेज़ पर मृत्यु प्रमाणपत्र रखा था।

उस पर अब तीन नाम लिखे थे—

**अर्जुन शर्मा।**

**ईशान शर्मा।**

**डॉ. हरिनारायण मिश्र।**

तीनों के सामने एक ही तारीख थी।

**17 जुलाई 2013।**

और तीनों के सामने एक ही समय—

**3:13 AM।**

***

अर्जुन फाइल लेकर हॉल में लौटा।

माँ दरवाज़े के पास खड़ी थीं। उनके चेहरे पर ऐसा डर था, जैसे उन्हें पहले से पता हो कि पीछे वाले कमरे में क्या होने वाला है।

“तुम उससे मिले?” उन्होंने पूछा।

“हाँ।”

“उसने क्या कहा?”

अर्जुन ने फाइल उनकी तरफ बढ़ा दी।

“उसने कहा कि मैं पैदा ही नहीं हुआ था।”

माँ ने आँखें बंद कर लीं।

“और?”

“उसने कहा कि मैंने ही ईशान को अपना नाम दिया था।”

माँ ने फाइल खोलकर देखा।

उनका चेहरा सफेद पड़ गया।

“यह प्रमाणपत्र पहले ऐसा नहीं था।”

“अब इसमें तीन नाम हैं।”

माँ ने काँपते हुए पन्ने पलटे।

“नहीं…”

“क्या हुआ?”

उन्होंने एक पन्ना बाहर निकाला।

उस पर मृत्यु का कारण लिखा था—

*मृतक ने अपनी पहचान स्वयं बदलने का प्रयास किया। गवाह ने मृतक को पहचानने से इनकार किया। शव की छाया अनुपस्थित थी।*

नीचे एक टिप्पणी थी—

*शरीर की पहचान संभव नहीं। परिवार ने शव लेने से इनकार किया।*

अर्जुन ने पूछा, “अगर परिवार ने शव लेने से इनकार किया, तो अंतिम संस्कार किसने किया?”

माँ ने धीरे से कहा, “विक्रम ने।”

“किसका?”

“वह नहीं जानती थीं कि किसका।”

अर्जुन ने माँ की तरफ देखा।

“आपको नहीं पता?”

“विक्रम ने एक शव का अंतिम संस्कार किया था। उन्होंने कहा था कि वह उनका बेटा था।”

“कौन-सा बेटा?”

माँ रोने लगीं।

“उन्होंने नाम नहीं बताया।”

अर्जुन ने फाइल बंद कर दी।

“और आपने उनसे पूछा नहीं?”

माँ ने सिर उठाया।

“मैंने पूछा था।”

“उन्होंने क्या कहा?”

माँ ने जवाब दिया—

“उन्होंने कहा, अगर मैं उसका नाम लूँगी, तो वह फिर से पैदा हो जाएगा।”

हॉल की खिड़की पर अचानक किसी ने दस्तक दी।

अर्जुन ने पलटकर देखा।

बाहर एक बच्चा खड़ा था।

उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था। उसने सिर झुकाया हुआ था। उसके हाथ में लाल गेंद थी।

बच्चे ने काँच पर उँगली से कुछ लिखा।

**“भैया, आपने मुझे फिर अकेला छोड़ दिया।”**

अर्जुन खिड़की के पास गया।

“तुम ईशान हो?”

बच्चे ने सिर उठाया।

उसका चेहरा अर्जुन जैसा था।

“नहीं।”

“अभय?”

“नहीं।”

“तो कौन?”

बच्चे ने गेंद को ज़मीन पर गिरा दिया।

गेंद लुढ़कती हुई खिड़की से दूर चली गई।

“मैं वह हूँ, जिसकी मौत पर आपने हस्ताक्षर किए थे।”

अर्जुन ने काँच पर हाथ रखा।

“मैंने तुम्हारी मौत पर हस्ताक्षर नहीं किए।”

बच्चे ने कहा—

“तुम्हारे हाथ से नहीं। तुम्हारे नाम से।”

फिर उसने अपनी कलाई दिखाई।

तीन काली लकीरें।

“जब तुमने अपना नाम लिया, मेरा नाम मिट गया।”

अर्जुन ने पूछा, “तो अब मुझे क्या करना चाहिए?”

बच्चे ने खिड़की के पार से उसकी आँखों में देखा।

“मुझे मेरा नाम वापस दे दो।”

“तुम्हारा असली नाम क्या है?”

बच्चे की आँखों में आँसू आ गए।

“यही तो तुम्हें याद करना है।”

उसने धीरे-धीरे अपना चेहरा काँच के पास लाया।

“लेकिन सावधान रहना, भैया। जिस दिन तुम्हें मेरा असली नाम याद आ जाएगा, उस दिन तुम्हें अपनी माँ का चेहरा भी याद आ जाएगा।”

“मैं अपनी माँ का चेहरा जानता हूँ।”

बच्चे ने सिर हिलाया।

“नहीं। तुमने उनका चेहरा कभी देखा ही नहीं।”

फिर वह अँधेरे में पीछे हट गया।

अर्जुन ने खिड़की खोली।

बाहर कोई नहीं था।

केवल लाल गेंद पड़ी थी।

उसने गेंद उठाई।

उसके नीचे एक मुड़ा हुआ कागज़ दबा था।

कागज़ पर डॉ. हरिनारायण की लिखावट थी—

*अगर अर्जुन यह पढ़ रहा है, तो गवाह मर चुका है।*

*अब उसके पास केवल एक रास्ता है।*

*उसे उस कमरे में जाना होगा जहाँ उसका जन्म नहीं हुआ था।*

*वहाँ उसे अपनी माँ मिलेगी।*

*लेकिन उस माँ को देखकर उसे पहचानना होगा कि वह किसकी माँ है।*

कागज़ के सबसे नीचे एक पता लिखा था—

**पुराना प्रसूति गृह, देवगढ़।**

और उसके नीचे एक आखिरी पंक्ति—

**“कमरे में तीन पलंग हैं। इस बार किसी बच्चे को मत चुनना।”**

अर्जुन ने कागज़ मोड़ा।

उसके पीछे माँ खड़ी थीं।

“तुम वहाँ नहीं जाओगे,” उन्होंने कहा।

“मुझे जाना होगा।”

“वहाँ कोई माँ नहीं है।”

“तो फिर किसने मुझे जन्म दिया?”

माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“अर्जुन, मेरी बात सुनो। उस जगह जो भी दिखाई दे, उससे अपना नाम मत बताना।”

“क्यों?”

माँ की आँखों से आँसू बहने लगे।

“क्योंकि वहाँ हर बच्चा अपना नाम किसी और से उधार लेता है।”

अर्जुन ने पूछा, “और मेरा नाम किससे उधार लिया गया था?”

माँ ने उत्तर दिया—

“उस बच्चे से, जिसे विक्रम ने दफना दिया था।”

अचानक मुख्य दरवाज़े पर तीन दस्तकें हुईं।

टक।

टक।

टक।

माँ ने अर्जुन को अपने पीछे कर लिया।

बाहर से विक्रम की आवाज़ आई—

“दरवाज़ा खोलो।”

अर्जुन ने साँस रोक ली।

माँ ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

बाहर से फिर आवाज़ आई—

“मैं हूँ, राधा।”

अर्जुन जम गया।

यह विक्रम की आवाज़ नहीं थी।

यह राधा की आवाज़ थी।

माँ ने दरवाज़े की तरफ देखा।

उनके चेहरे पर पहचान का भाव उभरा।

फिर उन्होंने बहुत धीरे से कहा—

“राधा मर चुकी है।”

बाहर से जवाब आया—

“नहीं। तुम मर चुकी हो।”

माँ पीछे हट गईं।

दरवाज़े की कुंडी अपने आप घूमने लगी।

अर्जुन ने माँ का हाथ पकड़ लिया।

“कौन है बाहर?”

माँ ने उसके कान में फुसफुसाया—

“जिसने तुम्हें जन्म दिया था।”

दरवाज़ा खुल गया।

बाहर कोई नहीं था।

केवल एक बूढ़ी औरत खड़ी थी, जिसकी परछाईं तीन दिशाओं में फैली हुई थी।

उसने अर्जुन को देखकर मुस्कराया।

“बेटा,” उसने कहा, “इतने साल बाद भी तुम मुझे पहचान नहीं पाए?”

अर्जुन की आँखें फैल गईं।

उसने उस चेहरे को पहले भी देखा था।

शारदा देवी की तस्वीरों में।

पुराने कुएँ के पास।

आईने के भीतर।

और अपनी बचपन की उन यादों में, जिन्हें वह कभी ठीक से समझ नहीं पाया था।

वह औरत उसके करीब आई।

“मैं तुम्हारी माँ नहीं हूँ,” उसने कहा।

“तो आप कौन हैं?”

औरत ने उसकी कलाई पकड़ी।

तीन काली लकीरें उसकी त्वचा पर उभर आईं।

“मैं वह हूँ, जिसने तुम्हारी माँ को जन्म दिया था।”

अर्जुन का दिल धड़कना भूल गया।

औरत ने उसके माथे को चूमा।

“और जिस बच्चे का नाम तुमने चुरा लिया था, वह मेरा बेटा था।”

फिर उसने अपनी मुट्ठी खोली।

उसकी हथेली में एक पुरानी अस्पताल की पहचान-पट्टी थी।

उस पर लिखा था—

**बच्चे का नाम: ______**

**माँ का नाम: राधा।**

**पिता का नाम: विक्रम शर्मा।**

लेकिन नाम वाली खाली जगह में धीरे-धीरे काली स्याही भरने लगी।

एक अक्षर।

फिर दूसरा।

फिर तीसरा।

अर्जुन ने नीचे झुककर पढ़ने की कोशिश की।

नाम पूरा होने से ठीक पहले बूढ़ी औरत ने पहचान-पट्टी बंद कर दी।

“अगली बार,” उसने कहा, “जब तुम अपना नाम बोलोगे, तो देखना कि कौन जवाब देता है।”

फिर वह अँधेरे में चली गई।

दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

अर्जुन के हाथ में पहचान-पट्टी रह गई थी।

उसने उसे पलटकर देखा।

पीछे एक वाक्य लिखा था—

**“इस बच्चे की मृत्यु 1995 में नहीं हुई थी। उसकी मृत्यु 2013 में भी नहीं हुई थी।”**

नीचे किसी ने लाल स्याही से एक तीसरी तारीख लिखी थी—

**17 जुलाई 2023।**

और उसके आगे लिखा था—

**“मृत्यु अभी बाकी है।”**

अर्जुन ने घड़ी की तरफ देखा।

समय 3:13 था।

लेकिन इस बार घड़ी की सुइयाँ रुकी नहीं थीं।

वे आगे बढ़ रही थीं।

हर टिक के साथ अर्जुन की परछाईं थोड़ी छोटी हो रही थी।

और जब घड़ी ने 3:14 बजाए, उसकी परछाईं पूरी तरह गायब हो गई।

अँधेरे में किसी बच्चे ने हँसकर कहा—

“अब हम दोनों एक ही नाम से पुकारे जाएँगे, भैया।”

**एपिसोड 17 समाप्त।**

Writer
firoj saifi
Story
“अंधेरे में कोई है”
Chapter
17 of 17
Category
Ghost Stories
Reading time
29 min
Words
5672
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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