Pretika › Ghost Stories › “अंधेरे में कोई है”

एपिसोड 16: माँ के चेहरे के पीछे

firoj saifi · Ghost Stories · 35 मिनट

तीसरी मंज़िल की घड़ी 3:13 पर रुक गई थी।

अर्जुन आईने के सामने खड़ा था। उसके बाईं तरफ मीरा जैसी दिखने वाली लड़की फर्श पर बैठी थी। उसके दाईं तरफ आईने में एक दूसरी मीरा खड़ी थी, जिसकी उँगलियाँ काँच के भीतर से बाहर निकलने की कोशिश कर रही थीं।

दोनों रो रही थीं।

दोनों उसे भैया कह रही थीं।

और दोनों की आवाज़ में वही दर्द था, जिसे सुनकर अर्जुन बचपन से हर बार अपनी सारी नाराज़गी भूल जाता था।

“भैया, मुझे बाहर निकालो।”

आईने के भीतर की मीरा ने फिर कहा।

बाहर खड़ी मीरा ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

“उसकी बात मत सुनिए। वह चाहती है कि आप मुझे छोड़ दें।”

अर्जुन ने दोनों को देखा।

“अगर तुम असली हो, तो मुझे एक ऐसी बात बताओ जो सिर्फ हम दोनों जानते हैं।”

बाहर वाली मीरा ने बिना देर किए जवाब दिया, “जब मैं छोटी थी, तो मुझे अँधेरे से डर लगता था। आप रात में मेरे कमरे के बाहर बैठकर कहानी सुनाते थे। आपने कहा था कि अगर कभी कोई मेरे कमरे के बाहर मेरा नाम लेकर बुलाए, तो मैं दरवाज़ा नहीं खोलूँगी।”

अर्जुन का चेहरा नरम पड़ गया।

यह याद सही थी।

लेकिन आईने वाली मीरा भी मुस्कराई।

“और आपने मुझे यह भी बताया था कि डर लगने पर अपने हाथ की छोटी उँगली को दूसरी उँगली से पकड़ लेना। आपने कहा था कि इससे डर भाग जाएगा।”

अर्जुन का दिल धड़कना भूल गया।

वह बात भी सही थी।

यह बात उसने किसी को नहीं बताई थी। यह उस रात की याद थी जब छोटी मीरा बुखार में तप रही थी और उसे लगा था कि कमरे की खिड़की पर कोई खड़ा है। अर्जुन ने उसे शांत करने के लिए यह तरकीब बताई थी।

“तुम दोनों को यह कैसे पता है?” उसने पूछा।

आईने वाली मीरा ने जवाब दिया, “क्योंकि मैं वहाँ थी।”

बाहर वाली मीरा ने कहा, “क्योंकि मैं वहाँ थी।”

दोनों ने एक साथ अर्जुन की तरफ हाथ बढ़ाया।

“भैया, मुझे चुनो।”

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

उसके पीछे दरवाज़े पर दस्तक हुई।

एक।

दो।

तीन।

फिर विक्रम की आवाज़ आई।

“अर्जुन, तुमने हमेशा गलत बच्चे को बचाया है।”

अर्जुन ने आँखें खोलीं।

“आप कौन हैं?”

“तुम्हारे पिता।”

“मेरे पिता 2013 में मर गए थे।”

“तुम्हें किसने बताया?”

“उनकी मृत्यु का प्रमाणपत्र है।”

दरवाज़े के बाहर से हल्की हँसी सुनाई दी।

“उस पर तुम्हारे हस्ताक्षर हैं?”

अर्जुन चुप हो गया।

“तुमने अपने पिता की मौत की गवाही दी थी, बेटा। लेकिन तुम वहाँ थे ही नहीं। तुमने उस आदमी की पहचान की थी, जिसका चेहरा तुम्हारे पिता जैसा था।”

“तो असली पापा कहाँ हैं?”

“जहाँ तुमने उन्हें छोड़ा था।”

“कहाँ?”

“उस रात।”

अर्जुन ने दरवाज़े की तरफ कदम बढ़ाया।

मीरा ने उसे रोक लिया।

“नहीं, भैया!”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“तुम्हें सच जानना है या नहीं?”

“हाँ।”

“तो मुझे बाहर जाने दो।”

“वह आपके पिता नहीं हैं!”

“तुम्हें कैसे पता?”

मीरा ने मुँह खोला, लेकिन कोई जवाब नहीं निकला।

दरवाज़े के बाहर की आवाज़ अब बहुत धीमी थी।

“बेटा, अगर तुमने दरवाज़ा खोला, तो मैं तुम्हें वह सब दिखा दूँगा जो तुम्हारी माँ ने छिपाया। मैं तुम्हें 2013 की रात ले जाऊँगा। तुम अपनी आँखों से देखोगे कि तुम्हारे पिता की जगह किसे दफनाया गया था।”

अर्जुन ने दरवाज़े की कुंडी पकड़ ली।

तभी आईने के भीतर से मीरा की आवाज़ आई—

“भैया, अगर वह पापा हैं, तो उनसे पूछिए कि 17 जुलाई 2008 की रात उन्होंने मुझे कहाँ छिपाया था।”

अर्जुन ठिठक गया।

उसने दरवाज़े की तरफ देखा।

“पापा! 2008 की रात आपने मीरा को कहाँ छिपाया था?”

बाहर सन्नाटा छा गया।

कुछ पल बाद आवाज़ आई—

“मैंने उसे कहीं नहीं छिपाया।”

आईने के भीतर की मीरा ने सिर झुका लिया।

बाहर खड़ी मीरा की आँखें काली होने लगीं।

और दरवाज़े के दूसरी तरफ किसी ने धीरे से कहा—

“क्योंकि उस रात मीरा मेरे साथ थी ही नहीं।”

अर्जुन ने कुंडी छोड़ दी।

उसे पहली बार लगा कि शायद वह जिस सवाल का जवाब ढूँढ़ रहा है, वह सवाल ही गलत है।

शायद 2008 में मीरा को किसी ने छिपाया नहीं था।

शायद वह कभी वहाँ थी ही नहीं।

या शायद वह वहाँ थी, लेकिन उस लड़की के रूप में नहीं जिसे अर्जुन याद करता था।

***

“हमें माँ को ढूँढ़ना होगा,” अर्जुन ने कहा।

उसने कमरे में चारों तरफ देखा। दोनों मीराएँ अब गायब थीं। आईने की सतह पर केवल एक धुँधला निशान बचा था, जैसे किसी ने भीतर से हथेली रखकर काँच पर साँस छोड़ी हो।

मीरा दरवाज़े के पास खड़ी थी।

“माँ नीचे होंगी।”

“तुम्हारी माँ या मेरी?”

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

“क्या फर्क है?”

“बहुत फर्क है।”

“भैया, अगर मैं सच में वह नहीं हूँ जो आप समझते हैं, तो क्या इससे हमारे बीच की यादें बदल जाएँगी?”

अर्जुन ने जवाब देने में देर की।

“मुझे नहीं पता।”

मीरा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “कम से कम इस बार आपने झूठ नहीं बोला।”

वे सीढ़ियों से नीचे उतरे।

मुख्य हॉल में अर्जुन की माँ बैठी थीं। उनके सामने शारदा देवी की पुरानी डायरी खुली थी। वह एक पन्ने पर उँगली रखे उसे बार-बार पढ़ रही थीं।

अर्जुन ने पूछा, “आप क्या पढ़ रही हैं?”

माँ ने डायरी बंद कर दी।

“कुछ नहीं।”

“2013 की रात क्या हुआ था?”

उनका चेहरा सख्त हो गया।

“मैंने कहा था, उस बारे में मत पूछना।”

“आपने यह भी कहा था कि मेरे पिता की मौत एक दुर्घटना थी। लेकिन रिकॉर्ड कहता है कि शव की पहचान नहीं हो सकी थी।”

“तुम्हें वह फाइल कहाँ मिली?”

“अभिलेखागार में।”

माँ ने आँखें बंद कर लीं।

“तुम वहाँ क्यों गए?”

“क्योंकि आपने मुझे सच नहीं बताया।”

“सच जानने के लिए तुम तैयार नहीं हो।”

“यह बात मैं बचपन से सुन रहा हूँ। अब मैं अट्ठाईस साल का हूँ। मैं जानना चाहता हूँ कि मेरे पिता के साथ क्या हुआ था।”

माँ ने उसकी तरफ देखा।

“तुम्हारे पिता ने अपनी जान बचाने की कोशिश नहीं की थी।”

“किससे?”

“तुमसे।”

अर्जुन के चेहरे पर अविश्वास फैल गया।

“मैंने उन्हें मार दिया?”

“नहीं।”

“तो फिर?”

माँ ने डायरी का पन्ना खोला।

“2013 में तुम्हारे पिता ने किसी ऐसे व्यक्ति को घर के भीतर आने दिया, जिसे वह तुम्हारा भाई समझते थे।”

अर्जुन ने पूछा, “अभय?”

माँ ने सिर हिलाया।

“उन्होंने उसका नाम नहीं लिया था।”

“तो किसे समझते थे?”

माँ ने धीमे स्वर में कहा—

“एक बच्चे को, जिसे वह 1995 से ढूँढ़ रहे थे।”

मीरा ने पास आकर पूछा, “वह बच्चा कौन था?”

माँ ने उसे देखा।

उनकी आँखों में एक पल के लिए ऐसा भाव आया, जैसे वह मीरा को पहचानती ही न हों।

फिर उन्होंने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।

“तुम यहाँ से चली जाओ।”

मीरा वहीं खड़ी रही।

“माँ, मुझे बताइए।”

“मैं तुम्हारी माँ नहीं हूँ।”

ये शब्द कमरे में पत्थर की तरह गिरे।

मीरा ने एक कदम पीछे लिया।

अर्जुन ने माँ की तरफ देखा।

“आपने अभी क्या कहा?”

माँ की आँखों में आँसू थे।

“मैंने कहा, मैं उसकी माँ नहीं हूँ।”

मीरा के होंठ काँपने लगे।

“लेकिन आपने मुझे पाला। आपने मुझे कहानियाँ सुनाईं। आपने मुझे बीमारी में गोद में उठाया। आपने ही मुझे बताया कि मेरी माँ राधा थी।”

“मैंने तुम्हें पाला नहीं।”

माँ ने सिर झुका लिया।

“मैंने सिर्फ तुम्हें अपने पास रखा।”

मीरा ने आँसुओं के बीच पूछा, “क्यों?”

माँ ने डायरी का एक पन्ना उसकी तरफ बढ़ाया।

“क्योंकि तुम्हारी असली माँ ने मरने से पहले मुझसे वादा लिया था कि मैं तुम्हें किसी भी हालत में आईने के पास नहीं जाने दूँगी।”

मीरा ने काँपते हाथों से पन्ना लिया।

उस पर तारीख थी—

**17 जुलाई 2013।**

नीचे लिखा था—

*आज वह बच्ची फिर लौट आई है।*

*वह कहती है कि उसे अपनी माँ चाहिए। वह कहती है कि उसकी माँ तीसरी मंज़िल पर है।*

*मैंने उससे कहा कि उसकी माँ मर चुकी है।*

*उसने जवाब दिया—माँ नहीं मरी। माँ को मैंने मरते हुए देखा था।*

*मैंने पूछा, किसे मरते हुए देखा था?*

*उसने कहा—मुझे।*

मीरा के हाथ से डायरी गिर गई।

“यह क्या है?”

माँ ने उसकी तरफ देखा।

“2013 में तुम हमारे घर आई थीं।”

“लेकिन मैं तो यहीं रहती थी।”

“नहीं।”

माँ की आवाज़ भर्रा गई।

“तुम 2008 के बाद इस घर में नहीं थीं। तुम गायब हो गई थीं। तुम्हारी माँ राधा भी गायब हो गई थी। तुम्हारे पिता का नाम हमें कभी पता नहीं चला। और 2013 में, जब विक्रम की मौत हुई, उसी रात तुम वापस आईं।”

अर्जुन ने कहा, “यह असंभव है। मीरा तो बचपन से मेरे साथ रही है।”

माँ ने उसकी तरफ देखा।

“तुम्हें ऐसा याद है।”

“मुझे याद है!”

“तो बताओ, 2009 में मीरा का जन्मदिन हमने कहाँ मनाया था?”

अर्जुन ने जवाब देने के लिए मुँह खोला।

लेकिन कोई जगह याद नहीं आई।

“2010 में उसने कौन-सा स्कूल शुरू किया था?”

अर्जुन चुप रहा।

“2011 में उसका हाथ टूटा था। किस अस्पताल में ले गए थे?”

अर्जुन के सिर में दर्द उठने लगा।

उसे मीरा के साथ बिताए अनगिनत पल याद थे—आँगन में खेलना, बरसात में भीगना, रात को कहानियाँ सुनना, त्योहारों पर मिठाइयाँ बाँटना।

लेकिन हर याद का चेहरा धुँधला था।

हर दृश्य में मीरा थी, पर आसपास के लोग साफ नहीं थे।

उसे याद था कि वे साथ हँसे थे।

लेकिन उसे याद नहीं था कि वह किस दिन हँसे थे।

उसे याद था कि उसने मीरा को रोते हुए देखा था।

लेकिन उसे याद नहीं था कि उसने उसे किस बात पर चुप कराया था।

“ये सब सच था,” अर्जुन ने धीमे स्वर में कहा।

माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“हो सकता है। लेकिन यह भी हो सकता है कि ये यादें तुम्हारे दिमाग में बाद में रखी गई हों।”

मीरा पीछे हटती गई।

“तो मैं कौन हूँ?”

माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।

मीरा की आँखों में काला रंग फैलने लगा।

“आपने मुझे क्यों रखा?”

माँ ने रोते हुए कहा, “क्योंकि तुम्हारी माँ ने कहा था कि अगर मैं तुम्हें अकेला छोड़ दूँगी, तो वह बच्चा तुम्हें ढूँढ़ लेगा।”

“कौन-सा बच्चा?”

माँ ने तीसरी मंज़िल की तरफ देखा।

“वही, जो 2013 में तुम्हारी जगह मर गया था।”

***

रात गहरी होने लगी।

अर्जुन ने मीरा को हॉल में बैठाया और माँ के साथ शारदा देवी के कमरे में गया। कमरे में अब भी उनकी दवाइयों की गंध थी। बिस्तर के पास पुरानी लकड़ी की मेज़ रखी थी, जिस पर कुछ कागज़, एक चश्मा और एक छोटी घड़ी पड़ी थी।

माँ ने मेज़ की दराज़ खोली।

अंदर एक नीला लिफाफा था।

उस पर लिखा था—

**“2013 — आखिरी गवाही।”**

अर्जुन ने लिफाफा खोला।

उसमें कई पन्ने थे, लेकिन सबसे ऊपर एक छोटी-सी ऑडियो कैसेट रखी थी। कैसेट पर तारीख लिखी थी—

**18 जुलाई 2013, रात 3:13।**

“यह किसकी रिकॉर्डिंग है?” अर्जुन ने पूछा।

माँ ने कहा, “तुम्हारे पिता की।”

“आपने इसे पहले क्यों नहीं दिखाया?”

“क्योंकि तुम्हारे पिता ने कहा था कि इसे तब तक मत सुनना, जब तक तुम खुद अपनी पहचान पर शक न करने लगो।”

अर्जुन ने कैसेट को हाथ में घुमाया।

“मैं कैसेट प्लेयर कहाँ से लाऊँ?”

माँ ने कमरे की अलमारी से एक छोटा पुराना प्लेयर निकाल लिया।

उसने उसे मेज़ पर रखा। कैसेट भीतर डाली। बटन दबाते ही पहले खरखराहट सुनाई दी, फिर विक्रम की आवाज़ उभरी।

“अगर यह रिकॉर्डिंग अर्जुन तक पहुँची है, तो शायद मैं अब घर लौटकर नहीं आऊँगा।”

अर्जुन की आँखें भर आईं।

उसने वर्षों से अपने पिता की आवाज़ नहीं सुनी थी। वह आवाज़, जो कभी उसे साइकिल चलाना सिखाती थी। जो उसे गिरने पर उठाती थी। जो उसे कहती थी कि डर लगना बुरी बात नहीं, डर के सामने हार मान लेना बुरी बात है।

रिकॉर्डिंग में विक्रम कुछ देर चुप रहे।

फिर बोले—

“आज 17 जुलाई 2013 है। इस घर में फिर वही रात लौट आई है। मैंने सोचा था कि शारदा के मरने से पहले हम उस दरवाज़े को हमेशा के लिए बंद कर देंगे। लेकिन दरवाज़ा बंद नहीं हुआ। वह अब हमारे भीतर खुल गया है।”

एक खाँसी सुनाई दी।

“राधा को मैंने आखिरी बार 2008 में देखा था। वह तीसरी मंज़िल पर गई थी। उसके बाद घर में जो मीरा लौटी, मैं उसे अपनी बेटी नहीं कह पाया। लेकिन मैंने उसे दूर भी नहीं किया। क्योंकि उसके भीतर कुछ ऐसा था, जो मुझे हर रात अपनी बच्ची की आवाज़ सुनाता था।”

अर्जुन ने माँ की तरफ देखा।

माँ रो रही थीं।

रिकॉर्डिंग जारी रही।

“आज रात वह बच्चा वापस आया है। वह कहता है कि उसका नाम अभय है। वह कहता है कि मैं उसका पिता हूँ। वह कहता है कि मैंने उसे 1995 में छोड़ दिया था।”

विक्रम की साँसें तेज हो गईं।

“लेकिन मैं जानता हूँ कि वह अभय नहीं है। क्योंकि अभय को मैंने कभी देखा ही नहीं।”

अर्जुन के हाथ काँपने लगे।

“तो फिर वह कौन है?” उसने फुसफुसाया।

कैसेट में विक्रम ने जैसे उसका सवाल सुन लिया।

“मुझे नहीं पता कि वह कौन है। लेकिन उसने मुझे एक ऐसी बात बताई, जिसे केवल मेरा बेटा जान सकता था।”

कुछ पल चुप्पी रही।

फिर विक्रम ने कहा—

“उसने बताया कि 2008 की रात अर्जुन तीसरी मंज़िल पर आया था। उसने आईने के सामने खड़े बच्चे को देखा था। और जब मैंने अर्जुन को वहाँ से बाहर निकाला, तो मेरे हाथ में दो बच्चे थे।”

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

“एक मेरा बेटा था। दूसरा उसका प्रतिबिंब।”

कैसेट में अचानक तेज आवाज़ हुई, जैसे कोई दरवाज़ा बंद हुआ हो।

विक्रम ने जल्दी-जल्दी कहा—

“अगर तुम यह सुन रहे हो, अर्जुन, तो याद रखना। तुम्हारे बचपन की कुछ यादें तुम्हारी अपनी नहीं हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तुम झूठे हो। तुमने जो प्यार महसूस किया, वह सच था। तुमने जिन लोगों को खोया, उनका दुख सच था। सिर्फ उन यादों के पीछे छिपे चेहरे बदल दिए गए थे।”

अर्जुन की आँखों से आँसू बहने लगे।

विक्रम ने आगे कहा—

“मुझे माफ कर देना, बेटा। मैंने तुम्हें बचाने के लिए तुम्हें खुद से दूर भेज दिया। मैंने तुम्हारी माँ को भी यह नहीं बताया कि मैंने किस बच्चे को बाहर निकाला था।”

माँ ने मुँह पर हाथ रख लिया।

“विक्रम…”

कैसेट में उनकी आवाज़ सुनाई दी।

जैसे वह उसी कमरे में मौजूद हों।

“मैं जानता हूँ कि तुम यह सुनोगी। तुम हमेशा सच जानना चाहती थीं। लेकिन इस बार मुझे झूठ बोलना पड़ा।”

फिर एक लंबा सन्नाटा।

और उसके बाद विक्रम की आवाज़ आई—

“2013 की रात मैंने मीरा को मरते हुए देखा था।”

अर्जुन ने कैसेट रोक दी।

कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया।

“उन्होंने अभी कहा कि मीरा मर गई थी।”

माँ ने सिर झुका लिया।

“हाँ।”

“तो वह हमारे साथ कौन है?”

माँ ने उत्तर नहीं दिया।

अर्जुन ने प्लेयर दोबारा चालू कर दिया।

विक्रम की आवाज़ फिर सुनाई दी।

“मीरा मर गई थी। मैंने उसकी साँसें रुकते हुए देखीं। मैंने उसकी आँखें बंद कीं। मैंने उसका हाथ पकड़ा, जब तक वह ठंडा नहीं हो गया।”

कुछ पल बाद उन्होंने कहा—

“लेकिन जब मैं कमरे से बाहर निकला, वह फिर मेरे पीछे खड़ी थी।”

अर्जुन ने प्लेयर की तरफ झुककर सुना।

“वह रो रही थी। उसने कहा कि उसे अपनी माँ चाहिए। उसने कहा कि उसे अपने भाई से मिलना है। मैंने उससे पूछा कि उसका भाई कौन है। उसने कहा—अर्जुन।”

विक्रम की आवाज़ काँपने लगी।

“मैंने उसे घर के भीतर आने दिया। मुझे लगा कि शायद वह वापस आ गई है। लेकिन जब उसने मुझे गले लगाया, मुझे उसके शरीर में धड़कता हुआ दिल महसूस नहीं हुआ।”

अर्जुन ने माँ की तरफ देखा।

माँ ने अपना चेहरा हाथों में छिपा लिया।

“मैंने उसे दूर धकेला,” विक्रम बोले। “उसकी आँखें काली हो गईं। उसने पूछा कि मैं उसे क्यों नहीं पहचानता। फिर उसने कहा कि अगर मैं उसे अपनी बेटी नहीं मानूँगा, तो वह अर्जुन को अपना भाई बना लेगी।”

कैसेट में अचानक धातु के टकराने की आवाज़ आई।

फिर विक्रम चीखे—

“नहीं! अर्जुन को हाथ मत लगाना!”

कुछ पल बाद आवाज़ धीमी हो गई।

“मैंने उसे रोकने की कोशिश की। लेकिन उसने मेरा चेहरा बदल दिया। उसने मुझे आईने में दिखाया कि मैं मर चुका हूँ। उसने मुझे अपनी ही लाश दिखाई।”

विक्रम ने गहरी साँस ली।

“और फिर मुझे समझ आया कि वह मुझे मारने नहीं आई थी। वह चाहती थी कि मैं उसकी मौत की गवाही दूँ।”

अर्जुन ने पूछा, “किसके सामने?”

कैसेट में विक्रम ने कहा—

“उसके सामने, जो उसे वापस लाने वाला था।”

फिर एक और आवाज़ सुनाई दी।

वह अर्जुन की माँ की आवाज़ थी।

“विक्रम, दरवाज़ा मत खोलना!”

विक्रम ने कहा, “तुम यहाँ क्यों आई हो?”

माँ की आवाज़ ने जवाब दिया—

“क्योंकि तुमने गलत बच्चे को बाहर निकाल दिया।”

कैसेट में कुछ टूटने की आवाज़ आई।

फिर विक्रम ने बहुत धीमे स्वर में कहा—

“अगर तुम यह सुन रही हो, तो शायद अब तुम्हें सच बताना होगा। तुमने मीरा को 2013 में मरते हुए देखा था। लेकिन तुमने यह नहीं देखा कि उसे किसने मारा।”

रिकॉर्डिंग में माँ की आवाज़ आई—

“मैंने उसे मरते हुए देखा था, विक्रम। मैंने अपनी आँखों से देखा था।”

“तुमने किसे मरते हुए देखा था?”

कुछ पल की चुप्पी।

फिर माँ ने कहा—

“मीरा को।”

विक्रम ने पूछा—

“कौन-सी मीरा को?”

कैसेट अचानक बंद हो गई।

***

अर्जुन ने प्लेयर का बटन कई बार दबाया, लेकिन कैसेट आगे नहीं चली।

उसने कैसेट निकालकर देखा। टेप बीच से टूटी हुई थी।

“बस इतना ही है?”

माँ ने सिर हिलाया।

“शारदा ने कहा था कि बाकी हिस्सा गायब है।”

“आपने यह रिकॉर्डिंग पहले सुनी थी?”

“हाँ।”

“तो आपको पता था कि मीरा मर गई थी?”

माँ ने धीरे से कहा, “मुझे पता था कि एक मीरा मर गई थी।”

अर्जुन ने पूछा, “एक?”

माँ ने उसकी तरफ देखा।

“2013 में मेरे सामने दो मीराएँ थीं।”

उसने काँपते हाथों से मेज़ का किनारा पकड़ लिया।

“एक वह, जिसे मैंने बचपन से देखा था। दूसरी वह, जिसे विक्रम घर लेकर आया था। दोनों एक जैसी दिखती थीं। दोनों मुझे माँ कहती थीं। दोनों को मेरे बारे में ऐसी बातें पता थीं, जिन्हें कोई बाहरी व्यक्ति नहीं जान सकता था।”

“फिर आपने कैसे पहचाना कि कौन असली है?”

माँ ने सिर झुका लिया।

“मैं पहचान नहीं पाई।”

अर्जुन चुप रहा।

“विक्रम ने कहा कि एक को चुनना होगा। उसने कहा कि अगर हमने गलत को बाहर रखा, तो दूसरी आईने में हमेशा के लिए कैद हो जाएगी।”

“तो आपने किसे चुना?”

माँ की आँखों से आँसू गिरने लगे।

“मैंने किसी को नहीं चुना।”

“फिर?”

“विक्रम ने एक मीरा का हाथ पकड़ा और उसे आईने के सामने ले गया। दूसरी मीरा पीछे खड़ी रो रही थी। उसने मुझसे कहा कि मैं उसे बचा लूँ।”

माँ ने अपने दोनों हाथ कसकर पकड़ लिए।

“मैंने उसकी तरफ कदम बढ़ाया। लेकिन तभी आईने के भीतर से एक हाथ निकला और उसने मेरी कलाई पकड़ ली।”

अर्जुन ने पूछा, “किसका हाथ?”

“मुझे नहीं पता।”

“फिर क्या हुआ?”

माँ ने आँखें बंद कर लीं।

“जब मैंने आँखें खोलीं, एक मीरा फर्श पर पड़ी थी। उसकी साँसें बंद थीं। दूसरी मीरा गायब थी। विक्रम तीसरी मंज़िल की सीढ़ियों पर खड़ा था। उसके कपड़ों पर खून था।”

“किसका खून?”

“वह नहीं बता पाया।”

“और आपने पुलिस को क्या बताया?”

“कि विक्रम की मौत हो गई थी।”

अर्जुन ने मेज़ पर हाथ मारा।

“लेकिन वह ज़िंदा था!”

“मैं जानती हूँ।”

“तो आपने झूठ क्यों बोला?”

माँ ने उसकी तरफ देखा।

“क्योंकि अगले दिन विक्रम ने खुद मुझे बताया कि वह मर चुका है।”

अर्जुन का चेहरा सुन्न पड़ गया।

“यह कैसे संभव है?”

माँ ने धीरे से कहा—

“वह मेरे सामने खड़ा था। उसकी साँस चल रही थी। उसका दिल धड़क रहा था। लेकिन जब मैंने उसकी परछाईं देखी, तो वह वहाँ नहीं थी।”

उसने अर्जुन का हाथ पकड़ा।

“उसने कहा कि 2013 में उसका एक हिस्सा मर गया था। जो हिस्सा बचा था, वह केवल तुम्हें बचाने के लिए यहाँ रुका था।”

“उसका दूसरा हिस्सा कहाँ गया?”

माँ ने तीसरी मंज़िल की तरफ देखा।

“आईने में।”

***

रात के करीब ग्यारह बजे अर्जुन अकेला तीसरी मंज़िल पर गया।

उसने माँ से कहा था कि वह थोड़ी देर आराम करना चाहता है। मीरा हॉल में बैठी थी, लेकिन उसने उसकी तरफ देखा तक नहीं। वह अपनी कलाई को बार-बार ढक रही थी।

अर्जुन के हाथ में विक्रम की कैसेट थी।

वह आईने के सामने खड़ा हुआ और धीरे से बोला—

“पापा, अगर आप मुझे सुन सकते हैं, तो मुझे बताइए कि 2013 में क्या हुआ था।”

आईना शांत रहा।

“मैं जानना चाहता हूँ कि आपने किसे बाहर निकाला था।”

कुछ पल बाद काँच पर धुंध फैलने लगी।

उसमें एक कमरा दिखाई दिया।

कमरे की दीवार पर कैलेंडर टँगा था।

तारीख थी—

**17 जुलाई 2013।**

विक्रम शर्मा कमरे के बीचोंबीच खड़े थे। उनके सामने एक छोटी लड़की थी। लड़की का चेहरा मीरा जैसा था। वह रो रही थी।

“मुझे घर जाना है,” वह कह रही थी।

विक्रम ने कहा, “तुम घर जा चुकी हो।”

“नहीं। वह घर नहीं है।”

“तो कौन-सा घर है?”

लड़की ने आईने की तरफ इशारा किया।

“वह घर।”

विक्रम ने पीछे मुड़कर देखा।

आईने में एक और लड़की खड़ी थी।

दोनों मीराएँ एक-दूसरे को देख रही थीं।

फिर आईने वाली लड़की ने अपना हाथ काँच पर रखा।

“पापा, मुझे बाहर निकालो।”

विक्रम की आँखों में आँसू आ गए।

“मैं तुम्हें बाहर नहीं निकाल सकता।”

“क्यों?”

“क्योंकि तुम बाहर आईं, तो कोई और अंदर चला जाएगा।”

आईने वाली लड़की ने सिर झुका लिया।

फर्श पर खड़ी लड़की अचानक हँसने लगी।

“आपको अब भी लगता है कि हम दो हैं?”

विक्रम ने उसकी तरफ देखा।

“तुम क्या कहना चाहती हो?”

लड़की ने अपना चेहरा ऊपर उठाया।

उसकी आँखें काली थीं।

“मैं वह हूँ, जिसे आपने बचाया।”

फिर उसने आईने की तरफ इशारा किया।

“और वह वह है, जिसे आपने मरने के लिए छोड़ दिया।”

विक्रम पीछे हट गए।

“नहीं।”

“आपने खुद चुना था।”

“मैंने किसी को नहीं चुना!”

लड़की ने सिर हिलाया।

“हर बार आप यही कहते हैं।”

अचानक कमरे की रोशनी लाल हो गई।

विक्रम के पीछे एक आदमी खड़ा हो गया।

उसका चेहरा अर्जुन जैसा था।

लेकिन वह अर्जुन नहीं था।

उसने विक्रम के कंधे पर हाथ रखा।

“अब आपको फैसला करना होगा।”

विक्रम ने उसकी तरफ देखा।

“तुम कौन हो?”

आदमी मुस्कराया।

“आपके बेटे का वह हिस्सा, जिसे आपने कभी गोद में नहीं उठाया।”

विक्रम ने सिर हिलाया।

“अभय?”

आदमी की मुस्कान गायब हो गई।

“नहीं।”

“अर्णव?”

“नहीं।”

“तो कौन?”

आदमी ने अपना चेहरा आईने की तरफ कर लिया।

“वह नाम, जिसे आपने 1995 में दफना दिया था।”

विक्रम ने उसकी तरफ हाथ बढ़ाया।

लेकिन आदमी ने अपना हाथ पीछे खींच लिया।

“मुझे छूना मत। आप पहले ही एक बार मुझे मार चुके हैं।”

विक्रम की आँखें फैल गईं।

“मैंने तुम्हें नहीं मारा!”

आदमी ने कहा—

“आपने मेरी मौत पर हस्ताक्षर किए थे।”

आईने में दृश्य बदल गया।

अब वहाँ एक अस्पताल का कमरा था। तीन पलंग थे। एक पर बच्चा रो रहा था। दूसरे पर बच्चा बिल्कुल शांत था। तीसरा पलंग खाली था।

लेकिन उसके नीचे एक परछाईं खड़ी थी।

उस परछाईं ने अपना चेहरा ऊपर उठाया।

और पहली बार अर्जुन ने उसका चेहरा साफ देखा।

वह उसका अपना चेहरा था।

***

अर्जुन पीछे हट गया।

आईने का दृश्य बदल गया। अब उसमें केवल उसका प्रतिबिंब था। वह खुद को देख रहा था, लेकिन उसकी आँखें लाल थीं और होंठों पर खून लगा था।

उसने हाथ से अपना चेहरा छुआ।

उसके हाथ पर खून नहीं था।

आईने में खड़े अर्जुन ने मुस्कराकर कहा—

“तुमने देख लिया?”

अर्जुन ने पूछा, “क्या?”

“तुम्हारे पिता ने किसे मारा था।”

“उन्होंने किसी को नहीं मारा!”

“तो फिर तुम्हारे पिता की मौत की गवाही किसने दी?”

अर्जुन चुप रहा।

आईने वाला अर्जुन आगे झुका।

“2013 में जो आदमी मरा, वह तुम्हारा पिता नहीं था। वह मैं था।”

“तुम कौन हो?”

“तुम्हारा वह हिस्सा, जिसे तुमने 2008 में छोड़ दिया था।”

“मैंने किसी को नहीं छोड़ा!”

“तुमने मुझे आईने के सामने अकेला छोड़ दिया था। तुम भाग गए थे। तुमने पीछे मुड़कर नहीं देखा।”

अर्जुन के भीतर दर्द की एक लहर उठी।

उसे धुँधली याद आने लगी।

2008 की रात।

तीसरी मंज़िल।

लाल रोशनी।

एक बच्चा उसके सामने खड़ा था।

उस बच्चे ने उसका हाथ पकड़कर कहा था—

“मुझे अकेला मत छोड़ना।”

लेकिन अर्जुन ने हाथ छुड़ा लिया था।

क्यों?

उसे याद नहीं था।

आईने वाला अर्जुन बोला—

“तुम्हारे पिता ने मुझे बाहर निकालने की कोशिश की। लेकिन जब वह मेरे पास आए, मैंने उन्हें तुम्हारी आवाज़ में पुकारा।”

“क्यों?”

“क्योंकि मैं जानता था कि वह तुम्हारी आवाज़ पर आएँगे।”

“फिर क्या हुआ?”

“उन्होंने दरवाज़ा खोला।”

आईने के भीतर का दृश्य फिर बदल गया।

विक्रम एक अँधेरे कमरे में खड़े थे। उनके सामने अर्जुन जैसा बच्चा था। उसके पीछे एक और बच्चा खड़ा था, जिसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था।

विक्रम ने पहले बच्चे को उठाया।

दूसरा बच्चा चुपचाप देखता रहा।

फिर उसने पूछा—

“पापा, मुझे क्यों नहीं?”

विक्रम ने पलटकर देखा।

लेकिन वह बच्चा गायब हो चुका था।

उसकी जगह एक काली परछाईं खड़ी थी।

विक्रम ने बच्चे को उठाकर कमरे से बाहर भागने की कोशिश की।

तभी आईने की सतह पर हाथों के निशान उभर आए।

किसी ने भीतर से दरवाज़ा पीटना शुरू कर दिया।

धड़ाम।

धड़ाम।

धड़ाम।

विक्रम ने बच्चे को नीचे रखा और आईने की तरफ दौड़े।

लेकिन जब उन्होंने काँच को छुआ, उनकी उँगलियाँ उसमें धँस गईं।

आईने के भीतर से एक आवाज़ आई—

“तुमने गलत बच्चे को चुना।”

विक्रम ने चिल्लाकर कहा—

“मैंने किसी को नहीं चुना!”

आवाज़ ने जवाब दिया—

“तो फिर बाहर किसे लेकर जा रहे हो?”

विक्रम ने नीचे देखा।

उनकी बाँहों में बच्चा नहीं था।

उनकी बाँहों में एक आईना था।

और उस आईने में अर्जुन का चेहरा था।

विक्रम चीख उठे।

दृश्य टूट गया।

अर्जुन ने अपने कानों पर हाथ रख लिए।

“बस करो!”

आईने में खड़ा उसका प्रतिबिंब शांत था।

“तुम्हें सच चाहिए था।”

“यह सच नहीं है!”

“तो अपना सच बताओ।”

अर्जुन ने आईने की तरफ हाथ बढ़ाया।

“मैं अर्जुन शर्मा हूँ।”

आईने वाला अर्जुन मुस्कराया।

“यह नाम तुम्हें किसने दिया?”

“मेरे पिता ने।”

“तुम्हारे पिता का नाम क्या था?”

“विक्रम शर्मा।”

“वह तुम्हारे पिता थे?”

“हाँ!”

“तो 1995 में अस्पताल के रिकॉर्ड में उनका नाम किसके पिता के रूप में लिखा गया था?”

अर्जुन का हाथ रुक गया।

आईने वाला अर्जुन आगे बोला—

“अगर तुम उनके बेटे थे, तो उन्होंने तुम्हें बचाने के लिए तुम्हारी पहचान क्यों बदल दी?”

अर्जुन के पास कोई जवाब नहीं था।

आईने पर एक नई पंक्ति उभरी—

**“2013 में मरने वाला बच्चा वह था, जिसे विक्रम ने अपने बेटे का नाम दिया था।”**

उसके नीचे एक और पंक्ति लिखी गई—

**“लेकिन उस बच्चे का असली नाम अर्जुन नहीं था।”**

अर्जुन ने आईने पर मुक्का मार दिया।

काँच में दरार फैल गई।

लेकिन वह टूटा नहीं।

दरारों के बीच से एक बच्चे की आँखें दिखाई दीं।

वह बच्चा मुस्करा रहा था।

“अब समझे, भैया?”

अर्जुन ने काँपते हुए पूछा, “तुम कौन हो?”

बच्चे ने जवाब दिया—

“मैं वह हूँ, जिसे तुम्हारी माँ ने अपनी गोद में लिया था।”

“तुम्हारी माँ कौन है?”

बच्चा चुप हो गया।

फिर उसने बहुत धीरे से कहा—

“वही, जो अभी नीचे बैठी है।”

***

अर्जुन सीढ़ियों से नीचे भागा।

हॉल खाली था।

माँ वहाँ नहीं थीं।

मीरा भी नहीं थी।

मुख्य दरवाज़ा खुला था। बाहर की हवा के साथ धूल भीतर आ रही थी।

अर्जुन ने आवाज़ लगाई—

“माँ!”

कोई जवाब नहीं आया।

वह रसोई में गया। वहाँ बर्तन अपनी जगह रखे थे। पूजा के कमरे में दीपक बुझ चुका था। आँगन में पानी भरा था, जबकि बारिश नहीं हुई थी।

फिर उसे पीछे के कमरे से आवाज़ सुनाई दी।

किसी के रोने की।

वह दौड़कर वहाँ पहुँचा।

माँ फर्श पर बैठी थीं। उनके सामने एक पुरानी तस्वीर रखी थी। तस्वीर में वह एक नवजात बच्चे को गोद में लिए हुए थीं। उनके बगल में विक्रम खड़े थे।

लेकिन तस्वीर में माँ के चेहरे पर मुस्कान नहीं थी।

वह रो रही थीं।

अर्जुन उनके पास बैठ गया।

“माँ, मीरा कहाँ है?”

माँ ने जवाब नहीं दिया।

“माँ, मुझे बताइए!”

उन्होंने तस्वीर उसकी तरफ बढ़ाई।

“यह बच्चा कौन है?”

अर्जुन ने तस्वीर देखी।

बच्चा उसकी तरह दिखता था।

उसके हाथ में लाल धागा बँधा था। कलाई पर तीन काली लकीरें थीं।

तस्वीर के पीछे लिखा था—

**“जिसे हमने बचाया।”**

अर्जुन ने पूछा, “यह मैं हूँ?”

माँ ने सिर हिलाया।

“मुझे नहीं पता।”

अर्जुन ने तस्वीर नीचे रख दी।

“आपको कैसे नहीं पता?”

माँ ने उसकी तरफ देखा।

“क्योंकि मैंने तुम्हें जन्म लेते नहीं देखा था।”

अर्जुन चुप हो गया।

“तुम्हारे पिता तुम्हें घर लेकर आए थे। उन्होंने कहा था कि तुम्हारी माँ मर गई है। उन्होंने कहा कि मुझे तुम्हें पालना होगा। मैंने तुम्हें अपनी गोद में लिया और तुमने मेरी उँगली पकड़ ली।”

माँ की आँखों में आँसू भर आए।

“उस दिन से तुम मेरे बेटे थे।”

अर्जुन ने धीमे स्वर में पूछा, “तो मेरी असली माँ कौन थी?”

माँ ने सिर झुका लिया।

“राधा।”

“और मीरा की?”

माँ ने बहुत देर तक जवाब नहीं दिया।

फिर उन्होंने कहा—

“राधा।”

अर्जुन ने उनका हाथ पकड़ लिया।

“लेकिन अभी आपने कहा कि आप मीरा की माँ नहीं हैं।”

माँ ने उसकी तरफ देखा।

“मैंने यह नहीं कहा कि राधा उसकी माँ नहीं थी।”

“तो फिर?”

माँ की आवाज़ फुसफुसाहट में बदल गई।

“राधा ने मीरा को जन्म दिया था। लेकिन जिस मीरा को तुम जानते हो, वह उस बच्ची का शरीर नहीं है।”

अर्जुन पीछे हट गया।

“क्या मतलब?”

“2013 में जब मीरा मरी, तब उसका शरीर यहीं था। मैंने उसे अपनी आँखों से देखा। लेकिन उसके जाने के बाद एक दूसरी मीरा हमारे घर आई।”

“कहाँ से?”

माँ ने तीसरी मंज़िल की तरफ देखा।

“आईने से।”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“नहीं। नहीं, यह नहीं हो सकता।”

माँ ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया।

“बेटा, मैं जानती हूँ कि तुम उसे प्यार करते हो। लेकिन तुम्हें समझना होगा कि प्यार और पहचान एक ही चीज़ नहीं हैं।”

“वह मीरा है!”

“हो सकता है।”

“वह मेरी बहन जैसी है!”

“हो सकता है।”

“तो आप उसे अपना नहीं सकतीं?”

माँ की आँखें भर आईं।

“मैंने उसे अपने पास रखा, क्योंकि मैं उसे खोना नहीं चाहती थी। लेकिन हर रात वह मेरे कमरे में आती थी और मुझसे एक ही सवाल पूछती थी।”

“क्या सवाल?”

माँ ने आँखें बंद कर लीं।

“वह पूछती थी—माँ, अगर मैं सच में मीरा हूँ, तो मेरी परछाईं कहाँ है?”

अर्जुन का शरीर सुन्न पड़ गया।

माँ ने आगे कहा—

“मैंने उसे कभी जवाब नहीं दिया। क्योंकि हर बार जब वह सवाल पूछती, उसके पीछे आईने में एक दूसरी बच्ची दिखाई देती थी।”

“वह दूसरी बच्ची कौन थी?”

माँ ने धीरे से कहा—

“वही मीरा, जिसे मैंने 2013 में मरते हुए देखा था।”

***

अर्जुन ने माँ से कहा कि वह कहीं नहीं जाएँगी। उसने मुख्य दरवाज़ा बंद किया और सभी खिड़कियों की कुंडियाँ लगा दीं। फिर वह मीरा को ढूँढ़ने निकला।

घर में उसका कोई निशान नहीं था।

न कमरे में।

न रसोई में।

न आँगन में।

न उस छोटे कमरे में, जहाँ राधा के कागज़ रखे थे।

लेकिन तीसरी मंज़िल की सीढ़ियों पर उसे एक लाल धागा मिला।

वही धागा, जो अस्पताल की तस्वीर में बच्चे की कलाई पर बँधा था।

अर्जुन ने उसे उठाया।

उसके भीतर से मीरा की आवाज़ आई—

“भैया, अगर आप मुझे ढूँढ़ रहे हैं, तो आईने के पीछे देखिए।”

अर्जुन ने धागा छोड़ दिया।

वह सीधे तीसरी मंज़िल पर गया।

आईना अब पहले से अधिक धुँधला था। उसकी सतह पर कई छोटे-छोटे चेहरे दिखाई दे रहे थे। कुछ बच्चों के, कुछ बूढ़ों के, कुछ ऐसे लोगों के जिन्हें अर्जुन ने कभी नहीं देखा था।

उसने काँच पर हाथ रखा।

“मीरा!”

आईने के भीतर से कोई उत्तर नहीं आया।

“मीरा, अगर तुम सुन सकती हो, तो मुझे बताओ कि तुम कहाँ हो।”

धीरे-धीरे एक चेहरा उभरा।

मीरा का।

लेकिन इस बार उसकी आँखें सामान्य थीं।

वह काँच के दूसरी तरफ खड़ी थी। उसके पीछे एक लंबा गलियारा था, जिसकी दीवारों पर पुराने दरवाज़े बने थे।

“भैया,” उसने कहा, “आपको यहाँ नहीं आना चाहिए।”

“तुम वहाँ कैसे पहुँची?”

“मैं हमेशा से यहीं थी।”

“तुमने कहा था कि 2013 में तुम्हारी मौत हुई।”

मीरा ने सिर झुका लिया।

“मुझे नहीं पता कि मैं मरी थी या नहीं।”

“तुम्हें अपनी माँ याद है?”

“हाँ।”

“उसका नाम?”

“राधा।”

“और पिता?”

मीरा की आँखों में दर्द उतर आया।

“मैंने उन्हें कभी नहीं देखा।”

अर्जुन ने पूछा, “तो फिर तुमने 2013 में किसे मरते हुए देखा?”

मीरा ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

“मैंने खुद को मरते हुए देखा था।”

अर्जुन चुप रहा।

“लेकिन वह मैं नहीं थी,” मीरा ने कहा। “वह कोई दूसरी बच्ची थी, जो मेरे जैसी दिखती थी। उसने मुझे अपने पास बुलाया। उसने कहा कि अगर मैं उसके साथ चली गई, तो मुझे अपनी माँ मिल जाएगी।”

“फिर तुमने क्या किया?”

“मैं उसके पास चली गई।”

“और उसके बाद?”

मीरा ने काँच पर हाथ रखा।

“मैंने अपनी माँ को देखा।”

“राधा को?”

मीरा ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

अर्जुन ने महसूस किया कि उसका दिल तेजी से धड़क रहा है।

“तो किसे?”

मीरा ने उत्तर दिया—

“आपकी माँ को।”

अर्जुन पीछे हट गया।

आईने में मीरा ने जल्दी से कहा—

“भैया, मेरी बात सुनिए। आपकी माँ ने मुझे 2013 में मरते हुए देखा था। लेकिन उन्होंने जिस बच्ची को मरते देखा, वह मैं नहीं थी। वह आपकी माँ की बेटी थी।”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“यह कैसे संभव है?”

मीरा ने आँखें बंद कर लीं।

“क्योंकि 2013 में मैं आपकी माँ की बेटी बन गई थी।”

अर्जुन ने धीरे से पूछा, “और तुम पहले किसकी बेटी थी?”

मीरा ने जवाब देने के लिए होंठ खोले।

लेकिन उसके पीछे गलियारे में एक आदमी दिखाई दिया।

उसने विक्रम के कपड़े पहने थे।

उसका चेहरा अर्जुन जैसा था।

उसने मीरा के कंधे पर हाथ रखा।

मीरा चीख पड़ी।

“भैया, दरवाज़ा बंद कर दीजिए!”

अर्जुन ने आईने से हाथ हटाने की कोशिश की, लेकिन उसकी हथेली काँच से चिपक गई थी।

विक्रम जैसा दिखने वाला आदमी आगे आया।

“अर्जुन,” उसने कहा, “तुम्हें आखिरकार सच जानना होगा।”

“तुम कौन हो?”

“तुम्हारे पिता।”

“मेरे पिता तो 2013 में मर गए थे!”

आदमी ने सिर हिलाया।

“वह आदमी मर गया था, जिसे तुम पिता कहते थे।”

“तो तुम कौन हो?”

उसने अपनी कलाई दिखाई।

तीन काली लकीरें।

“मैं वह हूँ, जिसने तुम्हें जन्म से पहले चुना था।”

अर्जुन ने हाथ झटका।

इस बार उसकी हथेली आईने से छूट गई।

वह फर्श पर गिर पड़ा।

आईने के भीतर मीरा चीख रही थी।

“भैया, मेरी बात सुनिए! वह आपका पिता नहीं है!”

आदमी ने मीरा के मुँह पर हाथ रख दिया।

फिर उसने अर्जुन की तरफ देखा।

“अगर तुम जानना चाहते हो कि 2013 में कौन मरा था, तो अपनी माँ से एक आखिरी सवाल पूछना।”

“कौन-सा सवाल?”

आदमी मुस्कराया।

“उससे पूछना कि तुम्हारा जन्म किसने देखा था।”

आईने की सतह पर दरार उभर आई।

उस दरार के भीतर से एक बच्चा बाहर झाँकने लगा।

उसका चेहरा अर्जुन जैसा था।

उसने काँच पर अपनी उँगली से लिखा—

**“तुम्हारी माँ ने तुम्हें जन्म लेते नहीं देखा था।”**

फिर वह बच्चा धीरे-धीरे पीछे हट गया।

आईना फिर शांत हो गया।

अर्जुन बहुत देर तक फर्श पर बैठा रहा।

उसके कानों में केवल एक ही वाक्य गूँज रहा था—

*तुम्हारा जन्म किसने देखा था?*

***

सुबह होने से कुछ देर पहले अर्जुन माँ के कमरे में पहुँचा।

वह जाग रही थीं। उनके सामने वही तस्वीर रखी थी, जिसमें वह एक नवजात बच्चे को गोद में लिए थीं।

अर्जुन उनके सामने बैठ गया।

“माँ, मुझे एक सवाल का जवाब चाहिए।”

माँ ने तस्वीर पर हाथ रख दिया।

“क्या?”

“मेरा जन्म किसने देखा था?”

उनका चेहरा सफेद पड़ गया।

“तुम्हारा जन्म अस्पताल में हुआ था।”

“यह जवाब नहीं है।”

“डॉ. नीलकंठ ने तुम्हें जन्म लेते देखा था।”

“वह उस रात अस्पताल में नहीं थे।”

माँ ने सिर झुका लिया।

अर्जुन ने आगे कहा—

“आपने मुझे जन्म लेते नहीं देखा। पापा ने मुझे जन्म लेते नहीं देखा। नीलकंठ ने भी नहीं देखा। फिर मेरा जन्म किसने देखा था?”

माँ के हाथ काँपने लगे।

उन्होंने तस्वीर उठाई।

उसमें नवजात बच्चे की आँखें खुली थीं।

माँ ने धीमे स्वर में कहा—

“तुम्हें किसी ने जन्म लेते नहीं देखा था, अर्जुन।”

अर्जुन के भीतर सब कुछ शांत हो गया।

“तो फिर?”

माँ ने तस्वीर उसके सामने रख दी।

“तुम्हें कमरे में पाया गया था।”

“किस कमरे में?”

“अस्पताल के कमरे में।”

“किसने पाया?”

माँ ने जवाब देने से पहले दरवाज़े की तरफ देखा।

वहाँ कोई नहीं था।

लेकिन उनके चेहरे पर ऐसा डर था, जैसे कोई ठीक उनके पीछे खड़ा हो।

“शारदा ने,” उन्होंने कहा। “वह तुम्हें लेकर आई थीं।”

अर्जुन ने पूछा, “कहाँ से?”

माँ ने आँखें बंद कर लीं।

“आईने के पीछे से।”

अर्जुन ने महसूस किया कि उसके भीतर कोई पुराना ताला खुल गया है।

“तो मेरा जन्म नहीं हुआ था?”

माँ ने धीरे से सिर हिलाया।

“मुझे नहीं पता।”

“मैं किसका बेटा हूँ?”

माँ ने उसकी तरफ देखा।

उनकी आँखों में ऐसी ममता थी, जिसे कोई परछाईं आसानी से नकल नहीं कर सकती थी।

“तुम मेरे बेटे हो।”

अर्जुन की आँखों से आँसू बह निकले।

“लेकिन मैं पैदा कैसे हुआ?”

माँ ने उसे गले लगा लिया।

“मुझे नहीं पता, बेटा।”

कुछ देर बाद उन्होंने उसके कान के पास फुसफुसाकर कहा—

“लेकिन एक बात मैं जानती हूँ।”

“क्या?”

“2013 में जब विक्रम की मौत हुई, तो उसने मरने से पहले मुझसे कहा था कि अगर कभी अर्जुन अपने जन्म के बारे में पूछे, तो उसे यह मत बताना कि उसे किसने पैदा किया।”

अर्जुन ने सिर उठाया।

“क्यों?”

माँ ने उसकी आँखों में देखा।

“क्योंकि जिसने तुम्हें पैदा किया, वह तुम्हारा पिता नहीं था।”

अर्जुन का चेहरा सुन्न पड़ गया।

“तो कौन था?”

माँ ने बहुत धीरे से कहा—

“वह बच्चा, जो तुम्हारे जन्म से पहले मर गया था।”

कमरे की घड़ी ने 3:13 बजाए।

अर्जुन ने पलटकर देखा।

घड़ी की सुइयाँ पीछे घूम रही थीं।

माँ के पीछे दीवार पर एक परछाईं उभरी।

वह परछाईं किसी औरत की थी।

उसने अपने हाथ में एक नवजात बच्चा उठा रखा था।

फिर उसने धीरे-धीरे अपना चेहरा अर्जुन की तरफ घुमाया।

वह राधा थी।

लेकिन उसकी गोद में बच्चा नहीं था।

उसकी गोद में एक छोटा आईना था।

और उस आईने के भीतर अर्जुन का चेहरा दिखाई दे रहा था।

राधा ने होंठ हिलाए।

आवाज़ कमरे में गूँज उठी—

“अर्जुन, तुम्हें जन्म देने वाला बच्चा अब भी ज़िंदा है।”

अर्जुन ने पीछे हटते हुए पूछा—

“कहाँ?”

राधा की परछाईं मुस्कराई।

“तुम्हारे भीतर।”

फिर उसने अपना हाथ उठाया।

उसकी उँगलियों पर तीन काली लकीरें थीं।

“और अब वह बाहर आना चाहता है।”

***

अर्जुन के कमरे का दरवाज़ा अचानक खुल गया।

मीरा वहाँ खड़ी थी।

उसकी आँखें सामान्य थीं। कलाई पर कोई निशान नहीं था। उसके कपड़े साफ थे, जैसे वह कहीं गई ही न हो।

“भैया,” उसने कहा, “मुझे आपसे कुछ कहना है।”

अर्जुन उसकी तरफ बढ़ा।

“तुम कहाँ थीं?”

“मैं यहीं थी।”

“नहीं, तुम आईने में थीं।”

मीरा ने उलझन से उसे देखा।

“कौन-सा आईना?”

अर्जुन ने माँ की तरफ देखा।

माँ अब बिस्तर पर बैठी थीं। उनके चेहरे पर भय था।

मीरा ने धीरे से पूछा, “क्या हुआ?”

अर्जुन ने उसे सब बताने की कोशिश की, लेकिन शब्द उसके गले में अटक गए।

मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“भैया, आप ठीक नहीं लग रहे।”

अर्जुन ने उसकी कलाई देखी।

साफ।

कोई काली लकीर नहीं।

“तुम्हें याद है, 2013 में क्या हुआ था?”

मीरा ने माथे पर बल डाला।

“2013?”

“हाँ। जब पापा की मौत हुई थी।”

मीरा की आँखें भर आईं।

“भैया, पापा की मौत तो 2013 में नहीं हुई थी।”

अर्जुन जम गया।

“क्या?”

मीरा ने सिर हिलाया।

“पापा की मौत 2008 में हुई थी।”

माँ ने बिस्तर से उठने की कोशिश की।

“नहीं, मीरा…”

मीरा ने उनकी तरफ देखा।

“माँ, आप क्या कह रही हैं? आप ही तो हमें बताती थीं कि पापा 2013 में मरे थे।”

अर्जुन के कानों में भनभनाहट होने लगी।

“तुम किस पापा की बात कर रही हो?”

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

“विक्रम शर्मा की।”

“और 2013 में कौन मरा था?”

मीरा की आँखें अचानक काली हो गईं।

उसने मुस्कराकर कहा—

“आप।”

अर्जुन पीछे हट गया।

मीरा ने धीरे-धीरे अपना हाथ आगे बढ़ाया।

“भैया, आप 2013 में मर गए थे।”

माँ चीख उठीं।

लेकिन मीरा की आवाज़ नहीं बदली।

“और जो अर्जुन अभी इस घर में खड़ा है, वह वह बच्चा है जिसे 1995 में आईने के पीछे पाया गया था।”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

मीरा ने कहा—

“आपने अपनी मौत की गवाही खुद दी थी।”

“नहीं!”

“आपने अपने पिता के हस्ताक्षर किए थे।”

“चुप हो जाओ!”

मीरा की मुस्कान और चौड़ी हो गई।

“और जब आपने अपनी जगह छोड़ी, तब मैंने आपका नाम लिया।”

अर्जुन ने उसे धक्का देकर पीछे हटाया।

“तुम मीरा नहीं हो!”

मीरा अचानक रोने लगी।

“भैया, मैं तो हमेशा से यही थी।”

उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

लेकिन उसके पैरों के नीचे कोई परछाईं नहीं थी।

अर्जुन ने माँ का हाथ पकड़ा और कमरे से बाहर भागा।

वे मुख्य हॉल तक पहुँचे।

वहाँ दीवार पर लगी बड़ी तस्वीर में विक्रम शर्मा खड़े थे। उनके बगल में अर्जुन की माँ थीं। उनके बीच एक बच्चा था।

तस्वीर के नीचे एक नई तारीख लिखी थी—

**17 जुलाई 2013।**

और उसके नीचे एक वाक्य—

**“इस परिवार में उस रात कोई मरा नहीं था।”**

अर्जुन ने तस्वीर को देखा।

तभी तस्वीर के भीतर विक्रम ने सिर घुमाया।

उन्होंने सीधे अर्जुन की तरफ देखा और होंठ हिलाए—

“बेटा, अब तुम्हें सच पता चल गया।”

अर्जुन ने फुसफुसाकर पूछा—

“कौन-सा सच?”

तस्वीर में विक्रम मुस्कराए।

“कि तुम कभी पैदा ही नहीं हुए थे।”

फिर तस्वीर के भीतर का बच्चा उठकर खड़ा हो गया।

उसने अपनी कलाई दिखाई।

तीन काली लकीरें।

और उसने कहा—

**“मैंने तुम्हारी जगह ली थी, अर्जुन। अब मेरी जगह वापस करो।”**

घर की सारी रोशनियाँ बुझ गईं।

अँधेरे में माँ की चीख सुनाई दी।

फिर किसी ने अर्जुन के कान के पास आकर फुसफुसाया—

“अगली बार जब तुम अपनी माँ को देखो, तो यह मत मानना कि वह तुम्हें पहचानती है।”

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

जब उसने दोबारा आँखें खोलीं, वह तीसरी मंज़िल के आईने के सामने खड़ा था।

उसके सामने केवल एक चेहरा था।

उसका अपना।

लेकिन आईने में खड़े अर्जुन की कलाई पर तीन काली लकीरें नहीं थीं।

उसकी कलाई पर एक नाम लिखा था—

**विक्रम।**

और आईने के नीचे किसी ने खून से लिखा था—

**“2013 में मरा हुआ आदमी आज रात घर लौटेगा।”**

**एपिसोड 16 समाप्त।**

Writer
firoj saifi
Story
“अंधेरे में कोई है”
Chapter
16 of 17
Category
Ghost Stories
Reading time
35 min
Words
6918
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

← पिछला भाग  ·  अगला भाग →

“अंधेरे में कोई है” · सभी भाग →

और कहानियाँ · More stories