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एपिसोड 15: मीरा की असली माँ

firoj saifi · Ghost Stories · 33 मिनट

“तो पहले यह पता लगाओ कि मीरा का असली पिता कौन था।”

सीढ़ियों के नीचे खड़ा आदमी इतना कहकर अँधेरे में पीछे हट गया।

अर्जुन ने तुरंत उसका पीछा करना चाहा, लेकिन उसके पैर जैसे पत्थर के हो गए थे। घर का मुख्य दरवाज़ा खुला था। बाहर वही अँधेरा फैला था, जो उसे तीसरी मंज़िल के आईने में दिखाई देता था। हवा के साथ मिट्टी की गंध भीतर आ रही थी।

“कौन हो तुम?” अर्जुन ने आवाज़ लगाई।

कोई जवाब नहीं आया।

“तुमने कहा मीरा के पिता की मौत हुई थी। कौन था वह?”

अँधेरे में किसी ने धीरे से हँस दिया।

“तुम्हें सच में लगता है कि पिता वही होता है, जिसके नाम से बच्चा जाना जाता है?”

अर्जुन ने सीढ़ियों से नीचे उतरने की कोशिश की।

तभी पीछे से किसी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“भैया!”

वह मीरा थी।

उसकी आँखें लाल थीं, जैसे वह बहुत देर से रो रही हो। उसके बाल बिखरे हुए थे और दाहिने हाथ की कलाई पर तीन काली लकीरें पहले से अधिक गहरी दिखाई दे रही थीं।

“आप यहाँ क्या कर रहे हैं?” उसने पूछा।

अर्जुन ने दरवाज़े की तरफ इशारा किया।

“अभी कोई आदमी यहाँ खड़ा था।”

“कौन आदमी?”

“उसने कहा कि तुम्हारे पिता की मौत 2013 में हुई थी।”

मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया।

“उसने तुम्हें क्या बताया?”

“उसने कहा कि मुझे तुम्हारे असली पिता का नाम पता करना होगा।”

मीरा ने उसका हाथ छोड़ दिया।

कुछ देर तक वह सीढ़ियों को देखती रही। फिर धीरे से बोली, “आपको उसकी बात नहीं सुननी चाहिए थी।”

“तुम उसे जानती हो?”

“नहीं।”

“तो फिर तुम डरी क्यों हुई हो?”

मीरा ने कोई जवाब नहीं दिया।

अर्जुन उसके सामने आ खड़ा हुआ।

“मीरा, अब बहुत हो गया। मेरे पिता, मेरी माँ, शारदा दादी, राधा, अभय, अर्णव, ईशान—हर किसी की कहानी में तुम्हारा नाम आता है। अब तुम्हारी बारी है। मुझे बताओ कि तुम कौन हो।”

मीरा ने सिर उठाया।

“मैं मीरा हूँ।”

“यह नाम तुम्हें किसने दिया?”

उसकी आँखें भर आईं।

“मेरी माँ ने।”

“तुम्हारी माँ का नाम?”

“राधा।”

“और पिता का?”

मीरा चुप रही।

अर्जुन ने फिर पूछा, “तुम्हारे पिता का नाम क्या था?”

मीरा ने होंठ भींच लिए।

“मुझे नहीं पता।”

“क्या तुमने उन्हें कभी देखा था?”

“मुझे याद नहीं।”

“क्या वह 2008 में मर गए थे?”

मीरा ने अचानक उसकी तरफ देखा।

“आपको किसने बताया कि मेरे पिता 2008 में मरे थे?”

“किसी ने नहीं। मैं पूछ रहा हूँ।”

“तो मत पूछिए।”

“क्यों?”

मीरा की आवाज़ टूट गई।

“क्योंकि जब भी मैं उनके बारे में सोचती हूँ, मुझे एक चेहरा दिखाई देता है। और जब मैं उस चेहरे को याद करने की कोशिश करती हूँ, तो मुझे आपका चेहरा दिखाई देने लगता है।”

अर्जुन के भीतर ठंड उतर गई।

“मेरा चेहरा?”

मीरा ने सिर हिलाया।

“कभी-कभी लगता है कि मेरे पिता आप हैं। कभी लगता है कि वह आपके पिता हैं। और कभी लगता है कि वह कोई ऐसा आदमी है जिसे मैंने कभी देखा ही नहीं।”

उसने अपनी कलाई ढक ली।

“मैंने यह बात माँ से पूछी थी। उन्होंने कहा था कि अगर मुझे कभी अपना पिता याद आने लगे, तो मुझे तीसरी मंज़िल पर नहीं जाना चाहिए।”

अर्जुन ने धीमे स्वर में पूछा, “तुमने उनसे कब पूछा था?”

“17 जुलाई 2008 को।”

उस रात का नाम सुनते ही घर की सारी घड़ियाँ एक साथ बज उठीं।

अर्जुन और मीरा ने ऊपर देखा।

तीसरी मंज़िल से किसी बच्चे की आवाज़ आई—

“माँ, मुझे मेरा नाम बता दो।”

फिर एक और आवाज़ आई।

इस बार वह राधा की थी।

“तुम्हारा कोई नाम नहीं है।”

अर्जुन ने मीरा का हाथ पकड़ लिया।

“हमें राधा के पुराने कागज़ ढूँढ़ने होंगे।”

मीरा ने सिर हिलाया।

“माँ के कमरे में कुछ है।”

“तुम्हारी माँ का कमरा कहाँ है?”

मीरा ने घर के पिछले हिस्से की तरफ देखा।

“जहाँ मुझे कभी जाने नहीं दिया गया।”

***

शर्मा निवास के पिछले हिस्से में एक संकरा गलियारा था, जिसके बारे में अर्जुन को बचपन से बहुत कम याद था। वहाँ की दीवारें बाकी घर से अलग थीं। उन पर चूना नहीं, बल्कि किसी पुराने गहरे रंग का लेप था। जगह-जगह काले धब्बे थे, जैसे किसी ने दीवारों को जलाया हो और फिर राख को छिपाने के लिए उन पर रंग कर दिया हो।

गलियारे के अंत में लकड़ी का एक छोटा दरवाज़ा था।

उस पर कोई ताला नहीं था।

बस दरवाज़े के बीचोंबीच एक पीतल की पट्टी लगी थी, जिस पर खरोंचकर लिखा गया था—

**राधा।**

मीरा उसके सामने खड़ी रही।

“मैंने यह दरवाज़ा पहले कभी नहीं देखा।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“तुमने कहा था कि तुम्हारी माँ इसी घर में रहती थीं।”

“हाँ। लेकिन वह मेरे साथ मुख्य हिस्से में रहती थीं। मुझे कभी इस तरफ नहीं आने दिया गया।”

“तो तुम्हें कैसे पता कि यह उनकी जगह है?”

मीरा ने पट्टी पर उँगलियाँ फेरीं।

“क्योंकि बचपन में जब भी मैं उनसे छिपती थी, मुझे इस दरवाज़े के पीछे से उनकी आवाज़ सुनाई देती थी।”

“क्या कहती थीं?”

“मेरा नाम।”

अर्जुन ने दरवाज़े को धक्का दिया।

वह बिना आवाज़ के खुल गया।

अंदर एक छोटा कमरा था। दीवारों पर कपड़े की पुरानी झालरें थीं। एक कोने में लकड़ी का पलंग रखा था। खिड़की पर मोटे पर्दे पड़े थे। कमरे में किसी के रहने के निशान नहीं थे, लेकिन धूल की परत के बीच फर्श पर छोटे पैरों के निशान बने हुए थे।

वे निशान पलंग से शुरू होकर एक पुरानी अलमारी तक जाते थे।

अर्जुन ने अलमारी खोली।

अंदर कपड़ों की जगह दर्जनों कागज़ रखे थे। जन्म प्रमाणपत्र, अस्पताल की पर्चियाँ, पुराने पत्र और कुछ तस्वीरें। सभी पर नमी के दाग थे।

सबसे ऊपर एक लिफाफा रखा था।

उस पर लिखा था—

**“मेरी बेटी मीरा के लिए। केवल तब खोलना, जब वह अपने पिता का नाम पूछे।”**

मीरा ने लिफाफा देखते ही पीछे कदम बढ़ा लिया।

“मैं इसे नहीं खोलूँगी।”

“क्यों?”

“क्योंकि माँ ने मुझे कभी इसे छूने नहीं दिया।”

“तुम्हारी माँ ने इसे तुम्हारे लिए रखा था।”

“अगर वह चाहती थीं कि मैं इसे पढ़ूँ, तो मुझे पहले क्यों नहीं दिया?”

अर्जुन ने लिफाफा उसकी तरफ बढ़ाया।

“शायद वह चाहती थीं कि तुम उस समय इसे पढ़ो जब तुम सच सुनने के लिए तैयार हो।”

मीरा ने कड़वी हँसी हँसी।

“और अगर मैं कभी तैयार ही न होती?”

अर्जुन ने जवाब नहीं दिया।

कुछ देर बाद मीरा ने लिफाफा लिया और उसे खोल दिया।

अंदर एक पत्र था।

कागज़ पर राधा की लिखावट थी।

*मेरी प्यारी मीरा,*

*अगर तुम यह पत्र पढ़ रही हो, तो इसका मतलब है कि मैंने तुम्हें वह सच नहीं बताया, जिसे बताने का वादा मैंने खुद से किया था। मैं चाहती थी कि तुम एक सामान्य बच्ची की तरह बड़ी हो। तुम्हें स्कूल जाते देखूँ, तुम्हें बुखार में रात भर गोद में उठाए रखूँ, तुम्हारे बाल बनाऊँ और तुम्हारे हर डर को अपनी बाँहों में छिपा लूँ।*

*लेकिन तुम्हारा जन्म उस तरह नहीं हुआ था, जिस तरह दुनिया के बाकी बच्चों का होता है।*

*तुम्हारे जन्म के रिकॉर्ड में तुम्हारी माँ का नाम राधा लिखा है। यह सच है। लेकिन यह पूरा सच नहीं है।*

*तुम्हारे पिता का नाम मैंने जानबूझकर खाली छोड़ा था। क्योंकि उस जगह पर किसी जीवित आदमी का नाम लिखना तुम्हारे लिए खतरा बन जाता।*

*जिस आदमी को तुम अपना पिता समझ सकती थीं, वह तुम्हारा पिता नहीं था। और जिस आदमी को तुम कभी याद नहीं कर पाईं, वह तुम्हारे जन्म से पहले ही मर चुका था।*

*अगर तुम यह जानना चाहती हो कि तुम्हारे पिता कौन थे, तो अस्पताल के रजिस्टर में 17 जुलाई 1995 की प्रविष्टि पढ़ना। वहाँ तुम्हें उनका नाम नहीं मिलेगा। लेकिन तुम्हें उस व्यक्ति का नाम मिलेगा, जिसने तुम्हें जन्म दिया था।*

*हाँ, मीरा। तुम्हें जन्म देने वाली मैं नहीं थी।*

*मैंने तुम्हें अपने भीतर से नहीं, आईने के भीतर से पाया था।*

*मुझे माफ कर देना।*

*—तुम्हारी माँ, राधा।*

पत्र मीरा के हाथ से छूटकर फर्श पर गिर गया।

कमरे में ऐसी खामोशी छा गई, जिसमें बाहर की हवा भी सुनाई देना बंद हो गई।

अर्जुन ने धीरे से कहा, “यह सच नहीं हो सकता।”

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

“तो फिर मेरी माँ ने यह क्यों लिखा?”

“किसी ने उनकी लिखावट की नकल की होगी।”

“आपको हर बात में झूठ ही क्यों दिखाई देता है, भैया?”

“क्योंकि यह घर हमारी यादों से खेल रहा है!”

मीरा ने पत्र उठा लिया।

“और अगर यह झूठ नहीं हुआ तो?”

अर्जुन के पास जवाब नहीं था।

मीरा ने दूसरा कागज़ निकाला। यह अस्पताल का जन्म-रिकॉर्ड था। उसके ऊपरी हिस्से पर तारीख लिखी थी—

**17 जुलाई 1998।**

नाम: मीरा।

माता: राधा।

पिता: अज्ञात।

जन्म स्थान: देवगढ़ मातृत्व केंद्र।

जन्म का समय: 3:13 AM।

अर्जुन ने रिकॉर्ड पढ़ा और तुरंत कहा, “यह भी गलत है।”

“क्यों?”

“तुम्हारा जन्म 1998 में हुआ था। तुम्हारी उम्र मुझसे तीन साल कम है। लेकिन तुमने कहा था कि तुम 2008 की रात तीसरी मंज़िल पर थीं और तुम्हें सब याद है।”

“तो?”

“तब तुम दस साल की थीं। तुमने कहा था कि तुम्हें बचपन की कुछ बातें याद नहीं हैं, लेकिन तुम्हें पता था कि राधा और पापा तीसरी मंज़िल पर गए थे।”

मीरा ने रिकॉर्ड को गौर से देखा।

“यह मेरा जन्म-रिकॉर्ड है।”

“तुम्हारे जन्म का समय भी 3:13 है।”

मीरा ने धीरे से सिर उठाया।

“भैया, क्या आपने कभी सोचा कि हमारे जन्म के रिकॉर्ड में एक ही समय क्यों लिखा है?”

अर्जुन का दिल तेजी से धड़कने लगा।

“तुम कहना क्या चाहती हो?”

“मैं यह नहीं कह रही कि हम एक ही दिन पैदा हुए थे। मैं बस कह रही हूँ कि शायद इस घर में 3:13 समय नहीं है। शायद यह एक जगह है।”

उसने कागज़ पलटा।

पीछे एक अतिरिक्त टिप्पणी थी, जो सामान्य जन्म प्रमाणपत्र पर नहीं होनी चाहिए थी।

**“शिशु की पहचान की पुष्टि नहीं की जा सकी। माँ ने बच्चे को अपने पास रखने पर ज़ोर दिया। पिता के हस्ताक्षर अनुपस्थित।”**

नीचे डॉक्टर के हस्ताक्षर थे।

**डॉ. नीलकंठ त्रिवेदी।**

अर्जुन ने रिकॉर्ड को मेज़ पर रख दिया।

“हमें पुराने अस्पताल जाना होगा।”

मीरा ने कहा, “वह अस्पताल बंद हो चुका है।”

“फिर भी वहाँ कुछ होगा।”

“वहाँ अब कोई नहीं रहता।”

“तो हम देखेंगे कि वहाँ कौन नहीं रहता।”

मीरा ने पत्र मोड़कर अपने कपड़ों के भीतर रख लिया।

“और अगर वहाँ मुझे पता चला कि मैं राधा की बेटी नहीं हूँ?”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“तो भी तुम मीरा रहोगी।”

“और अगर मैं मीरा भी नहीं हुई?”

अर्जुन कुछ देर चुप रहा।

फिर उसने कहा, “तो हम उस नाम को ढूँढ़ेंगे, जिसे तुमने खो दिया है।”

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो अर्जुन पहचान नहीं पाया।

शायद राहत।

शायद डर।

या शायद यह जानने की इच्छा कि क्या वह सच में किसी का हिस्सा थी, या केवल किसी आईने में बची हुई याद।

अचानक कमरे की अलमारी के भीतर से तीन दस्तकें सुनाई दीं।

ठक।

ठक।

ठक।

दोनों ने एक साथ मुड़कर देखा।

अलमारी का दरवाज़ा अपने आप खुल गया।

अंदर कपड़ों के पीछे एक और छोटा लिफाफा रखा था।

उस पर लिखा था—

**“अर्जुन के लिए। इसे मीरा के सामने मत खोलना।”**

मीरा ने तुरंत कहा, “इसे मत खोलिए।”

अर्जुन ने लिफाफा उठा लिया।

“क्यों?”

“क्योंकि उस पर आपका नाम है।”

“तो?”

मीरा ने काँपते हुए कहा—

“माँ ने अपने पत्र में मेरा नाम लिखा। लेकिन उन्होंने आपके लिए जो पत्र रखा है, वह इस कमरे में कैसे आया?”

अर्जुन ने लिफाफे को पलटा।

उस पर तारीख लिखी थी—

**17 जुलाई 2013।**

और नीचे हस्ताक्षर—

**विक्रम शर्मा।**

उसने लिफाफा खोलने के लिए उँगलियाँ बढ़ाईं।

मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“भैया, अगर इस घर में कोई हमें हमारे नाम से बुला रहा है, तो हो सकता है वह हमें एक-दूसरे से अलग करना चाहता हो।”

अर्जुन ने धीरे से अपना हाथ छुड़ाया।

“अगर मेरे पिता ने यह पत्र लिखा है, तो मुझे इसे पढ़ना होगा।”

उसने लिफाफा खोला।

अंदर एक छोटी-सी तस्वीर थी।

तस्वीर में विक्रम शर्मा अस्पताल के एक कमरे में खड़े थे। उनके सामने एक महिला बैठी थी। महिला का चेहरा कैमरे से दूसरी तरफ था। उसकी गोद में एक नवजात बच्चा था।

तस्वीर के पीछे लिखा था—

**“यह बच्चा मीरा नहीं है।”**

उसके नीचे दूसरी पंक्ति थी—

**“और यह महिला राधा नहीं है।”**

***

पुराना देवगढ़ मातृत्व केंद्र गाँव के उत्तरी छोर पर था। कई साल पहले वहाँ की इमारत को असुरक्षित घोषित कर दिया गया था। नई सड़क बनने के बाद अस्पताल तक जाने वाला रास्ता भी बंद कर दिया गया था। अब वहाँ तक पहुँचने के लिए सूखे खेतों के बीच से होकर जाना पड़ता था।

शाम के पाँच बज चुके थे, लेकिन आसमान पर बादल छाए थे। दूर खेतों के ऊपर धुंध की एक पतली परत तैर रही थी।

अर्जुन ने मोटरसाइकिल एक टूटी दीवार के पास रोक दी।

अस्पताल की इमारत सामने थी।

उसकी छत का एक हिस्सा गिर चुका था। खिड़कियों में शीशे नहीं थे। दीवार पर कभी नीले रंग से लिखा गया नाम अब काई और धूल के नीचे छिप गया था।

फाटक पर जंग लगा बोर्ड टेढ़ा लटक रहा था—

**देवगढ़ मातृत्व केंद्र।**

नीचे किसी ने लाल रंग से लिखा था—

**“यहाँ जन्मे बच्चों को वापस मत लाना।”**

मीरा ने बोर्ड पढ़ा।

“यह किसने लिखा होगा?”

अर्जुन ने कहा, “जिसने यहाँ कुछ ऐसा देखा होगा, जिसे वह दोबारा नहीं देखना चाहता।”

वे भीतर चले गए।

अस्पताल के मुख्य हॉल में पुराने स्ट्रेचर पड़े थे। दीवारों पर टूटे पोस्टर लटक रहे थे। फर्श पर सूखे पत्ते बिखरे थे। कहीं-कहीं पानी जमा था, जबकि छत से बारिश नहीं टपक रही थी।

रिसेप्शन के पीछे एक पुराना रजिस्टर रखा था।

अर्जुन ने उसे खोला।

अधिकांश पन्ने खाली थे। कुछ पन्नों पर नाम धुँधले हो चुके थे। कुछ पर तारीखें थीं, लेकिन उनके सामने लिखे नाम खुरच दिए गए थे।

फिर उसे 17 जुलाई 1995 की प्रविष्टि मिली।

समय: 3:13 AM।

मरीज: राधा।

साथ आए व्यक्ति: विक्रम शर्मा।

डॉक्टर: नीलकंठ त्रिवेदी।

जन्मे शिशु: दो।

स्थिति: एक जीवित, एक मृत।

अर्जुन ने पन्ने पर उँगली रखी।

“यह वही रिकॉर्ड है।”

मीरा उसके कंधे के पास आ गई।

“नीचे पढ़िए।”

प्रविष्टि के नीचे छोटे अक्षरों में एक और टिप्पणी लिखी थी—

**“तीसरे शिशु की पहचान विवादित। जन्म की पुष्टि नहीं। माँ ने तीन बच्चों के होने का दावा किया।”**

अर्जुन ने मीरा की तरफ देखा।

“तीन बच्चे?”

मीरा ने सिर हिलाया।

“शायद यही वजह है कि दादी तीन बच्चों की बात करती थीं।”

“लेकिन यहाँ दो शिशुओं का रिकॉर्ड है। तीसरे के जन्म की पुष्टि नहीं।”

मीरा ने पन्ना पलटा।

पीछे एक और टिप्पणी थी—

**“मरीज राधा ने दावा किया कि तीसरा बच्चा जन्म से पहले ही कमरे में मौजूद था। उसे अस्पताल के किसी कर्मचारी ने नहीं देखा।”**

अर्जुन ने कागज़ को कसकर पकड़ लिया।

“जन्म से पहले कोई बच्चा कमरे में कैसे मौजूद हो सकता है?”

मीरा ने धीरे से कहा, “आईने में।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

मीरा की आँखें कमरे के दूसरे छोर पर टिक गई थीं।

वहाँ एक पुराना प्रसूति कक्ष था। उसके दरवाज़े पर सफेद रंग से 313 लिखा हुआ था।

दरवाज़े के नीचे से हल्की लाल रोशनी बाहर आ रही थी।

“भैया,” मीरा ने फुसफुसाकर कहा, “मुझे यह जगह याद है।”

“तुम यहाँ पहले आई हो?”

“मुझे नहीं पता।”

वह धीरे-धीरे दरवाज़े की तरफ बढ़ी।

अर्जुन उसके पीछे गया।

जैसे ही मीरा ने हैंडल छुआ, कमरे के भीतर से किसी महिला की आवाज़ आई—

“मीरा, भीतर मत आना।”

मीरा जम गई।

वह आवाज़ राधा की थी।

“माँ?” मीरा के मुँह से निकला।

अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“जवाब मत दो।”

भीतर से फिर आवाज़ आई—

“मीरा, मेरी बच्ची। मैं तुम्हारा इंतज़ार कर रही हूँ।”

मीरा की आँखों में आँसू आ गए।

“यह माँ ही हैं।”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“तुम्हें कैसे पता?”

“क्योंकि वह मुझे इसी आवाज़ में बुलाती थीं।”

“परछाईं भी आवाज़ की नकल कर सकती है।”

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

“तो क्या अब मैं अपनी माँ की आवाज़ पर भी भरोसा नहीं कर सकती?”

अर्जुन ने कोई उत्तर नहीं दिया।

दरवाज़े के भीतर से तीसरी दस्तक हुई।

इस बार आवाज़ लकड़ी से नहीं, किसी धातु के भीतर से आई थी।

मीरा ने हैंडल छोड़ दिया।

अर्जुन ने अपने बैग से चाँदी की घंटी निकाली।

“हम साथ में अंदर जाएँगे।”

मीरा ने धीरे से सिर हिलाया।

अर्जुन ने दरवाज़ा खोला।

कमरा खाली था।

बीच में तीन लोहे के पलंग थे।

पहले पलंग पर एक सफेद चादर पड़ी थी।

दूसरे पलंग पर जंग लगा नाम-पट्ट था—

**अभय शर्मा।**

तीसरे पलंग के पास एक टूटा हुआ आईना रखा था।

उस आईने में कमरे का प्रतिबिंब नहीं दिख रहा था।

उसमें शर्मा निवास की तीसरी मंज़िल दिखाई दे रही थी।

और वहाँ एक महिला खड़ी थी।

उसका चेहरा राधा जैसा था।

लेकिन उसके हाथों में एक बच्चा नहीं, दो बच्चे थे।

एक बच्चा रो रहा था।

दूसरा बिल्कुल शांत था।

आईने में खड़ी महिला ने अर्जुन की तरफ देखा।

फिर उसके होंठ हिले।

“तुम गलत बच्चे को घर ले आए।”

अर्जुन ने घंटी बजाई।

आईने की सतह काँप गई।

महिला का चेहरा टूटने लगा। उसके पीछे एक लंबा काला आकार उभरा। वह आकार किसी इंसान जैसा था, लेकिन उसके हाथ बहुत लंबे थे। उसकी उँगलियाँ जमीन तक पहुँच रही थीं।

उसने आईने पर हथेली रखी।

काँच के दूसरी तरफ से तीन काली लकीरें उभरीं।

फिर एक आवाज़ आई—

“मीरा को उससे दूर रखो।”

अर्जुन ने पूछा, “तुम कौन हो?”

आवाज़ ने जवाब दिया—

“जिसे उसने जन्म दिया था।”

मीरा पीछे हट गई।

“माँ ने मुझे जन्म दिया था।”

आईने के भीतर का आकार हँसा।

“तुम्हारी माँ ने तुम्हें पाया था।”

“नहीं!”

“तुम्हें आईने के भीतर से उठाकर अपनी गोद में रखा था।”

मीरा ने दोनों कान बंद कर लिए।

अर्जुन ने घंटी दोबारा बजाई।

इस बार आईने में लाल रोशनी फैल गई। महिला और काला आकार गायब हो गए। उसकी जगह अस्पताल का वही कमरा दिखाई देने लगा, लेकिन इस बार उसमें कोई महिला नहीं थी।

सिर्फ तीन पलंग थे।

पहले पर कोई बच्चा नहीं था।

दूसरे पर अर्जुन जैसा बच्चा लेटा था।

तीसरे पर मीरा जैसी बच्ची बैठी थी।

दोनों बच्चों ने एक साथ सिर उठाया।

और कहा—

“हममें से एक को चुना गया था।”

फिर आईने में अँधेरा छा गया।

***

अस्पताल के रिकॉर्ड रूम में उन्हें एक लोहे की अलमारी मिली, जिस पर ताला लगा था। ताले पर तीन काली लकीरें बनी थीं। अर्जुन ने पुरानी पीतल की चाबी आजमाई, लेकिन ताला नहीं खुला।

मीरा ने अपने गले से एक पतली चाँदी की चेन निकाली।

उसमें एक छोटी चाबी लगी थी।

“यह तुम्हारे पास कहाँ से आई?” अर्जुन ने पूछा।

“माँ ने दी थी।”

“कब?”

“जब मैं बहुत छोटी थी। उन्होंने कहा था कि इसे कभी मत खोना। लेकिन मुझे नहीं पता था कि यह किसकी चाबी है।”

चाबी ताले में आसानी से घूम गई।

अलमारी खुली तो भीतर पुराने रजिस्टर, एक टेप रिकॉर्डर और कपड़े में लिपटी फाइल रखी थी।

फाइल पर लिखा था—

**“राधा — निजी मामला। डॉक्टर नीलकंठ के अतिरिक्त किसी को न दिखाया जाए।”**

अर्जुन ने फाइल खोली।

पहले पन्ने पर राधा का बयान था।

*मैंने तीन बच्चों को देखा था। लेकिन डॉक्टर कहता है कि केवल दो पैदा हुए। विक्रम कहता है कि एक बच्चा मर गया। शारदा कहती है कि तीसरा बच्चा कभी था ही नहीं।*

*लेकिन मैंने उसे देखा था।*

*मैंने उसकी आवाज़ सुनी थी।*

*और जब मैंने उसे गोद में लेने की कोशिश की, तो उसने मेरा नाम नहीं लिया। उसने मुझे माँ कहा।*

*मैंने उसे अपने पास रख लिया।*

*अब वह मेरे बिना नहीं रह सकता। और मैं उसके बिना जीवित नहीं रह सकती।*

अर्जुन ने अगला पन्ना पलटा।

वहाँ डॉ. नीलकंठ की टिप्पणी थी—

*रोगी राधा का मानसिक संतुलन अस्थिर है। वह तीसरे शिशु के अस्तित्व पर अड़ी हुई है। कमरे में मौजूद आईने के कारण उसे दृश्य भ्रम हो सकता है। मैंने आईना हटाने का आदेश दिया है।*

उसके नीचे लाल स्याही से एक और वाक्य लिखा था—

*आईना हटाने के बाद भी बच्चे की आवाज़ बंद नहीं हुई।*

अर्जुन ने पन्ना मीरा को दिया।

“तुम्हारी माँ ने तीसरे बच्चे के होने का दावा किया था।”

मीरा ने पन्ना पढ़ा।

“यह भी हो सकता है कि वह बच्चा सच में रहा हो।”

“लेकिन डॉक्टर ने कहा कि ऐसा कोई बच्चा नहीं था।”

“डॉक्टर ने यह भी कहा था कि आईना हटाने के बाद आवाज़ बंद हो जाएगी। लेकिन आवाज़ बंद नहीं हुई।”

मीरा ने फाइल का अगला पन्ना खोला।

उस पर केवल एक नाम था—

**माया।**

नाम के नीचे लिखा था—

**मृत्यु: 17 जुलाई 1995।**

और उसके नीचे—

**मृत्यु का कारण: अज्ञात।**

अर्जुन ने पूछा, “माया कौन थी?”

मीरा ने सिर हिलाया।

“मुझे नहीं पता।”

फाइल के पिछले हिस्से में एक पुरानी तस्वीर चिपकी थी। तस्वीर में राधा एक महिला के साथ खड़ी थी। महिला की उम्र लगभग राधा जितनी थी। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। दोनों के बीच एक बच्चा था, जिसके चेहरे पर सफेद कपड़ा बँधा था।

तस्वीर के पीछे लिखा था—

**“माया और राधा। दो माँएँ। एक बच्चा।”**

अर्जुन ने तस्वीर को रोशनी की तरफ उठाया।

तभी उसने देखा कि तस्वीर में राधा की परछाईं जमीन पर थी।

माया की परछाईं नहीं थी।

और बच्चे की परछाईं माया के पैरों के पास खड़ी थी।

जैसे बच्चा उसकी गोद में नहीं, उसके पीछे खड़ा हो।

अर्जुन ने तस्वीर उलट दी।

पीछे अब एक और वाक्य उभर आया था—

**“माया की मृत्यु के बाद राधा ने उसकी बेटी को अपना नाम दिया।”**

मीरा ने तस्वीर छीनकर देखी।

“माया की बेटी?”

अर्जुन ने धीमे से कहा, “शायद तुम।”

मीरा ने सिर हिला दिया।

“नहीं। अगर मेरी माँ राधा थीं, तो यह कैसे संभव है?”

“राधा ने तुम्हें पाला हो सकता है।”

“लेकिन उन्होंने मुझे जन्म दिया था।”

“तुम्हारे रिकॉर्ड में पिता का नाम खाली है। माँ के पत्र में लिखा है कि उन्होंने तुम्हें आईने के भीतर से पाया था। यहाँ लिखा है कि माया की बेटी को राधा ने अपना नाम दिया।”

मीरा की साँसें तेज होने लगीं।

“तो क्या माया मेरी असली माँ थी?”

अर्जुन ने उत्तर देने से पहले तस्वीर को फिर देखा।

तस्वीर में माया की आँखें अब खुली हुई थीं।

वह कैमरे की तरफ नहीं, मीरा की तरफ देख रही थी।

फिर तस्वीर की सतह पर नमी फैलने लगी।

माया के होंठ हिले।

आवाज़ तस्वीर से बाहर आई—

“नहीं, बेटी।”

मीरा ने तस्वीर गिरा दी।

“कौन बोल रहा है?”

तस्वीर से फिर आवाज़ आई—

“मैं तुम्हारी माँ नहीं हूँ।”

अर्जुन ने तस्वीर पर पैर रख दिया।

लेकिन आवाज़ बंद नहीं हुई।

“मैंने तुम्हें जन्म नहीं दिया था।”

मीरा पीछे हटती गई।

“तो फिर आप कौन हैं?”

तस्वीर में माया का चेहरा बदलने लगा।

उसकी आँखों के नीचे काले धब्बे फैल गए। उसका मुँह खुला, लेकिन आवाज़ किसी बच्चे की आई—

“मैं वह हूँ, जिसने तुम्हें जन्म लेने से रोका था।”

अचानक टेप रिकॉर्डर अपने आप चलने लगा।

पहले उसमें खरखराहट सुनाई दी।

फिर डॉ. नीलकंठ की आवाज़ आई।

“17 जुलाई 1995। रात तीन बजकर तेरह मिनट। मरीज राधा की हालत स्थिर है। पहला शिशु जीवित है। दूसरा शिशु मृत घोषित किया गया है। तीसरे शिशु की उपस्थिति की पुष्टि नहीं हुई है।”

कुछ पल की खामोशी।

फिर नीलकंठ की आवाज़ काँपी।

“सुधार। तीसरे शिशु की उपस्थिति की पुष्टि हो गई है। लेकिन उसका शरीर मौजूद नहीं है।”

अर्जुन और मीरा एक-दूसरे को देखने लगे।

टेप आगे चला।

“वह आईने में दिखाई दे रहा है। वह माँ को पहचानता है। वह पिता को पहचानता है। वह डॉक्टर को पहचानता है। लेकिन वह अपने नाम को नहीं पहचानता।”

फिर एक और आवाज़ आई।

विक्रम शर्मा की।

“इसे बंद करो, नीलकंठ।”

“मैं नहीं कर सकता।”

“आईना ढक दो!”

“वह आईने में नहीं है, विक्रम।”

“तो कहाँ है?”

नीलकंठ ने बहुत धीमे स्वर में कहा—

“वह हमारे बीच है।”

टेप में अचानक चीख सुनाई दी।

फिर किसी चीज़ के टूटने की आवाज़ आई।

और उसके बाद एक बच्चे की आवाज़—

“माँ, मुझे बाहर निकालो।”

रिकॉर्डिंग बंद हो गई।

मीरा फर्श पर बैठ गई।

“भैया, मुझे कुछ याद आ रहा है।”

अर्जुन उसके पास घुटनों के बल बैठ गया।

“क्या?”

“माँ मुझे कभी-कभी एक नाम से बुलाती थीं। जब उन्हें लगता था कि मैं सो रही हूँ।”

“कौन-सा नाम?”

मीरा ने आँखें बंद कर लीं।

“माया।”

अर्जुन का दिल जोर से धड़का।

“क्या?”

“वह मेरे माथे पर हाथ रखती थीं और कहती थीं—माया, तुम वापस नहीं आ सकतीं। तुम्हें जाना होगा।”

मीरा ने आँखें खोलीं।

“मैंने कभी नहीं समझा कि वह किससे बात कर रही थीं। मुझे लगता था कि वह किसी दूसरी औरत को याद कर रही हैं।”

अर्जुन ने उसका हाथ थाम लिया।

“तुमने यह बात पहले क्यों नहीं बताई?”

“क्योंकि मुझे यह याद ही नहीं था। अभी टेप सुनने के बाद याद आया।”

उसने धीरे से पूछा—

“भैया, क्या हो सकता है कि मेरा नाम मीरा होने से पहले कुछ और था?”

अर्जुन ने उसकी आँखों में देखा।

“हाँ।”

“और अगर मेरा पहला नाम माया था?”

“तो हम उसका सच ढूँढ़ेंगे।”

मीरा ने सिर हिलाया।

“नहीं, भैया। आप समझ नहीं रहे।”

उसकी आवाज़ काँप रही थी।

“अगर मेरा नाम पहले माया था, तो शायद मैं वही बच्ची हूँ जिसे राधा ने आईने के भीतर से पाया था।”

अर्जुन ने कुछ कहना चाहा, लेकिन तभी रिकॉर्ड रूम का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

टेप रिकॉर्डर फिर चलने लगा।

इस बार आवाज़ डॉ. नीलकंठ की नहीं थी।

वह राधा की थी।

“मीरा, अगर तुम यह सुन रही हो, तो शायद तुमने माया का नाम याद कर लिया है।”

मीरा ने साँस रोक ली।

“लेकिन याद रखना, बेटी। माया एक औरत का नाम था। और वह बच्चा, जिसे मैंने आईने से उठाया था, माया नहीं था।”

रिकॉर्डिंग में कुछ खड़खड़ाहट हुई।

फिर राधा ने कहा—

“तुम्हारा नाम मीरा मैंने इसलिए रखा था, क्योंकि उस बच्चे ने सबसे पहले यही नाम बोला था।”

अर्जुन ने पूछा, “किस बच्चे ने?”

टेप में राधा की आवाज़ टूट गई।

“उसने मेरे सामने खड़े होकर कहा था—माँ, मुझे मीरा बुलाओ।”

फिर एक बच्चे की आवाज़ आई—

“लेकिन मेरा नाम मीरा नहीं है।”

राधा ने घबराकर पूछा, “तो तुम्हारा नाम क्या है?”

बच्चे ने जवाब दिया—

“जो अर्जुन ने मुझे दिया था।”

अर्जुन का चेहरा सफेद पड़ गया।

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

“भैया, क्या आपने मुझे कभी कोई नाम दिया था?”

अर्जुन को याद नहीं था।

लेकिन उसके भीतर एक पुरानी याद खुलने लगी।

वह छोटा था। आँगन में बारिश हो रही थी। तीसरी मंज़िल की खिड़की से लाल रोशनी बाहर आ रही थी। उसके सामने एक बच्चा खड़ा था, जिसका चेहरा मीरा जैसा था, लेकिन आँखें काली थीं।

बच्चे ने पूछा था—

“अगर मेरा कोई नाम नहीं है, तो तुम मुझे क्या बुलाओगे?”

और अर्जुन ने जवाब दिया था—

“मीरा।”

याद इतनी स्पष्ट थी कि अर्जुन को लगा वह फिर उसी आँगन में खड़ा है।

फिर उसे दूसरी आवाज़ सुनाई दी।

एक बच्चे की, जो उसके पीछे खड़ा था।

“तुमने मुझे भी नाम दिया था।”

अर्जुन ने पलटकर देखा।

रिकॉर्ड रूम के दरवाज़े के पास वही काली आँखों वाला बच्चा खड़ा था, जिसके हाथ में लाल गेंद रहती थी।

उसने कहा—

“लेकिन तुमने मेरा नाम किसी को नहीं बताया।”

अर्जुन ने पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है?”

बच्चा मुस्कराया।

“यही तो तुमसे पूछने आया हूँ।”

***

अस्पताल से बाहर निकलते समय शाम ढल चुकी थी।

अर्जुन ने सभी कागज़ बैग में रख लिए। मीरा चुप थी। वह लगातार अपनी कलाई को देख रही थी, जहाँ तीन काली लकीरें अब लगभग एक-दूसरे से मिल गई थीं।

मुख्य फाटक के पास पहुँचते ही उन्हें एक बूढ़ी औरत दिखाई दी।

वह सड़क के किनारे बैठी थी। उसके सामने मिट्टी का छोटा दिया जल रहा था। उसकी पीठ झुकी हुई थी और सफेद बाल सिर पर कसकर बँधे थे।

जैसे ही दोनों उसके पास से गुज़रे, उसने कहा—

“राधा की बेटी।”

मीरा रुक गई।

“आप मुझे जानती हैं?”

बूढ़ी औरत ने सिर उठाया।

उसकी एक आँख सफेद थी। दूसरी में काला धब्बा था।

“मैंने तुम्हें उस दिन देखा था, जब तुम्हें अस्पताल से बाहर लाया गया था।”

मीरा उसके सामने बैठ गई।

“क्या आप मेरी माँ को जानती थीं?”

“राधा को सब जानते थे।”

“माया को जानती थीं?”

बूढ़ी औरत की आँख अचानक चमक उठी।

“तुम्हें माया का नाम किसने बताया?”

मीरा ने अर्जुन की तरफ देखा।

“हमें अस्पताल के रिकॉर्ड में मिला।”

बूढ़ी औरत ने अपना दिया उठाया और उसके भीतर झाँकने लगी।

“तो अब वह नाम जाग गया है।”

अर्जुन ने पूछा, “माया कौन थी?”

बूढ़ी औरत ने उसकी तरफ देखा।

“तुम्हें यह सवाल नहीं पूछना चाहिए।”

“क्यों?”

“क्योंकि माया की मृत्यु के दिन तुम पैदा हुए थे।”

“मैं 17 जुलाई 1995 को पैदा हुआ था।”

बूढ़ी औरत हँसी।

“तुम्हें किसने बताया?”

“मेरे जन्म प्रमाणपत्र में लिखा है।”

“और उस प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर किसके हैं?”

“डॉ. नीलकंठ त्रिवेदी के।”

बूढ़ी औरत ने दिया बुझा दिया।

“नीलकंठ ने तुम्हें जन्म लेते नहीं देखा था।”

अर्जुन ने महसूस किया कि उसका गला सूख रहा है।

“आपको कैसे पता?”

“क्योंकि उस रात नीलकंठ अस्पताल में था ही नहीं।”

मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“लेकिन रिकॉर्ड में उसका नाम है।”

“रिकॉर्ड में बहुत नाम हैं, बेटी। उनमें से कितने लोगों ने सच में उस रात साँस ली थी?”

बूढ़ी औरत धीरे-धीरे खड़ी हुई।

“माया एक औरत थी। उसे बच्चा नहीं हो सकता था। उसने राधा से मदद माँगी थी। राधा ने वादा किया कि वह उसकी मदद करेगी।”

“किस तरह की मदद?” अर्जुन ने पूछा।

“बच्चा पैदा करने में।”

“लेकिन माया की मौत 1995 में दर्ज है।”

बूढ़ी औरत ने सिर हिलाया।

“माया की मौत उस रात नहीं हुई थी।”

“तो कब हुई?”

“उस रात उसकी जगह किसी और ने मौत स्वीकार की थी।”

अर्जुन और मीरा दोनों चुप हो गए।

बूढ़ी औरत ने आगे कहा—

“माया की एक बेटी थी। लेकिन वह बेटी अस्पताल में पैदा नहीं हुई थी। वह वहाँ लाई गई थी।”

मीरा के होंठ काँपे।

“क्या वह मैं थी?”

बूढ़ी औरत ने उसकी तरफ देखा।

“तुम्हें क्या लगता है?”

“मुझे सच जानना है।”

“सच जानने की कीमत होती है।”

“मैं चुकाने के लिए तैयार हूँ।”

बूढ़ी औरत ने अपना हाथ मीरा के माथे पर रखा।

“तुम्हारी माँ ने तुम्हें एक नाम दिया। तुम्हारे पिता ने तुम्हें एक चेहरा दिया। और उस घर ने तुम्हें एक परछाईं दी।”

मीरा की आँखों से आँसू बहने लगे।

“मेरे पिता कौन थे?”

बूढ़ी औरत ने अर्जुन की तरफ देखा।

“वह आदमी, जिसने 2013 में मरने से इनकार कर दिया था।”

अर्जुन के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

“विक्रम शर्मा?”

बूढ़ी औरत ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

उसने मीरा की तरफ देखा।

“तुम्हारे पिता विक्रम नहीं थे।”

“तो कौन थे?”

बूढ़ी औरत ने अपना चेहरा उसके करीब किया।

“तुम्हारे पिता वह आदमी थे, जिसकी आवाज़ तुम्हारे जन्म के बाद पहली बार आई थी।”

मीरा ने फुसफुसाकर पूछा—

“वह आवाज़ किसकी थी?”

बूढ़ी औरत ने उत्तर दिया—

“अर्जुन की।”

***

शर्मा निवास लौटते समय किसी ने बात नहीं की।

अर्जुन के मन में सवालों का तूफान था। अगर मीरा का पिता वह आदमी था जिसकी आवाज़ उसके जन्म के बाद आई, तो क्या वह आदमी अर्जुन था? या अर्जुन की परछाईं? क्या मीरा को आईने के भीतर से पाया गया था? क्या उसका जन्म वास्तव में 1998 में हुआ था, या वह तारीख भी किसी ने बाद में लिखी थी?

और माया?

अगर माया की मौत 1995 में नहीं हुई थी, तो मृत्यु प्रमाणपत्र में किसकी मौत दर्ज थी?

घर पहुँचते ही अर्जुन सीधे तीसरी मंज़िल की तरफ गया।

मीरा ने उसे रोकने की कोशिश की।

“भैया, अभी नहीं।”

“मुझे आईने से पूछना है।”

“आईना जवाब नहीं देता।”

“तो फिर वह हमसे नाम क्यों माँगता है?”

मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“क्योंकि वह चाहता है कि हम उसे पहचान दें।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“और अगर हमने पहचान दी तो?”

“तो शायद वह बाहर आ सकेगा।”

अर्जुन ने धीरे से अपना हाथ छुड़ाया।

“मुझे सच जानना है, मीरा।”

“मुझे भी।”

दोनों तीसरी मंज़िल पर पहुँचे।

कमरे के बीचोंबीच वही बड़ा आईना खड़ा था। उसके चारों तरफ राख का घेरा बना था। दीवार पर 313 का निशान लाल रंग में चमक रहा था।

आईने के सामने एक कुर्सी रखी थी।

उस पर कोई बैठा था।

एक औरत।

उसने सफेद साड़ी पहनी थी। उसके बाल लंबे थे और चेहरा झुका हुआ था।

अर्जुन ने धीरे से कहा, “राधा?”

औरत ने सिर उठाया।

वह राधा थी।

या राधा जैसी दिखने वाली कोई चीज़।

उसकी आँखों में थकान थी। चेहरे पर उम्र के निशान थे। लेकिन उसके पीछे आईने में एक दूसरी राधा खड़ी थी—जवान, बिना किसी झुर्री के, और उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

दोनों ने एक साथ कहा—

“मीरा को यहाँ नहीं आना चाहिए था।”

मीरा आगे बढ़ी।

“माँ, क्या आप मेरी माँ हैं?”

सामने बैठी राधा ने सिर झुका लिया।

आईने में खड़ी राधा मुस्कराई।

“नहीं।”

मीरा का चेहरा टूट गया।

“तो फिर आप कौन हैं?”

सामने बैठी औरत ने धीरे से कहा—

“मैं वह हूँ, जिसने तुम्हें पाला।”

आईने वाली राधा बोली—

“और मैं वह हूँ, जिसने तुम्हें जन्म दिया।”

अर्जुन ने पूछा, “आप दोनों में से सच कौन बोल रहा है?”

दोनों ने एक साथ उसकी तरफ देखा।

सामने बैठी राधा ने कहा, “मैंने मीरा को अपनी बेटी बनाया।”

आईने वाली राधा ने कहा, “मैंने उसे अपने शरीर से अलग किया।”

“लेकिन अस्पताल के रिकॉर्ड में लिखा है कि माया उसकी माँ थी!”

दोनों राधाएँ एक पल के लिए चुप हो गईं।

फिर आईने वाली राधा ने सिर झुका लिया।

“माया का नाम मत लो।”

“क्यों?”

“क्योंकि माया मर चुकी है।”

“आपने अभी कहा था कि आपने मीरा को जन्म दिया!”

“मैंने कहा था कि मैंने उसे अपने शरीर से अलग किया। मैंने यह नहीं कहा कि वह मेरे भीतर थी।”

अर्जुन को लगा कि उसके पैरों के नीचे से जमीन खिसक रही है।

मीरा धीरे-धीरे आईने के करीब गई।

“माँ, मेरे पिता कौन थे?”

आईने वाली राधा की आँखों से काला पानी बहने लगा।

“तुम्हारे पिता ने तुम्हें कभी गोद में नहीं उठाया।”

“क्या वह मर गए थे?”

“नहीं।”

“तो कहाँ हैं?”

राधा ने आईने के भीतर हाथ उठाया और पीछे की तरफ इशारा किया।

वहाँ अँधेरे में एक आदमी खड़ा था।

उसका चेहरा अर्जुन जैसा था।

लेकिन उसकी आँखें मीरा जैसी थीं।

वह आदमी धीरे-धीरे आगे आया।

उसने आईने पर हाथ रखा।

काँच के दूसरी तरफ से एक आवाज़ आई—

“मीरा।”

मीरा की आँखें फैल गईं।

“पापा?”

आदमी ने सिर हिलाया।

“नहीं, बेटी।”

उसने अर्जुन की तरफ देखा।

“मैं उसका पिता नहीं हूँ।”

फिर उसने अपना हाथ आईने से हटाया।

“मैं वह हूँ, जिसने उसे अपना नाम दिया था।”

अर्जुन ने काँपते हुए पूछा, “तुम कौन हो?”

आदमी ने उत्तर दिया—

“तुम्हारा वह हिस्सा, जो 1995 में पैदा होने से पहले मर गया था।”

कमरे की सारी मोमबत्तियाँ बुझ गईं।

आईने में केवल तीन चेहरे दिखाई दे रहे थे।

अर्जुन का।

मीरा का।

और उस आदमी का, जिसका चेहरा दोनों जैसा था।

फिर आईने पर एक नाम उभरा—

**माया।**

उसके नीचे दूसरा नाम—

**विक्रम।**

और सबसे नीचे तीसरा नाम—

**नीलकंठ।**

तीनों नामों के बीच लाल रेखाएँ खिंच गईं।

फिर किसी ने आईने के भीतर से उँगली फेरकर एक वाक्य लिखा—

**“मीरा की माँ राधा नहीं थी।”**

अर्जुन ने मीरा का हाथ पकड़ लिया।

“यह झूठ है।”

लेकिन मीरा आईने को देख रही थी।

उसकी आँखों में अब आँसू नहीं थे।

उसने धीरे से कहा—

“नहीं, भैया। यह झूठ नहीं है।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“तुम्हें कैसे पता?”

मीरा ने अपनी कलाई आगे की।

तीन काली लकीरें अब उसकी त्वचा से गायब हो चुकी थीं।

उनकी जगह एक नया निशान था।

एक छोटा-सा नाम।

**माया।**

मीरा ने आईने में खड़े आदमी की तरफ देखा।

“मैं आपको पहचानती हूँ।”

आदमी ने सिर झुका लिया।

“मुझे पता है।”

“मैंने आपको पहले भी देखा है।”

“हाँ।”

“आप मेरे पिता नहीं हैं।”

आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया।

मीरा की आवाज़ काँपने लगी।

“आप मेरी माँ हैं।”

आईने के भीतर का आदमी धीरे-धीरे मुस्कराया।

उसका चेहरा बदलने लगा।

जब बदलाव पूरा हुआ, तो आईने में एक औरत खड़ी थी।

वह माया थी।

वही औरत जिसकी तस्वीर अर्जुन ने अस्पताल के रिकॉर्ड रूम में देखी थी।

माया ने काँच पर हाथ रखा।

“मेरी बच्ची,” उसने कहा, “अब तुम्हें याद आ गया।”

मीरा ने अपना हाथ आईने पर रख दिया।

अर्जुन ने उसे रोकना चाहा, लेकिन वह देर कर चुका था।

आईने की सतह पानी की तरह काँपी।

मीरा की उँगलियाँ उसमें धँसने लगीं।

“मीरा!” अर्जुन चिल्लाया।

मीरा ने पीछे मुड़कर देखा।

“भैया, मुझे जाने दीजिए।”

“नहीं!”

“मुझे अपनी माँ से मिलना है।”

“वह तुम्हारी माँ नहीं है!”

मीरा की आँखों में दर्द उतर आया।

“तो फिर मेरी माँ कौन है?”

अर्जुन के पास कोई जवाब नहीं था।

आईने के भीतर से माया की आवाज़ आई—

“उसे आने दो, अर्जुन।”

“नहीं!”

“अगर तुमने उसे रोका, तो तुम्हें कभी पता नहीं चलेगा कि 2013 में किसकी मौत हुई थी।”

अर्जुन ठिठक गया।

माया ने आगे कहा—

“तुम्हारे पिता की मौत का सच और मीरा के जन्म का सच एक ही है।”

“क्या संबंध है दोनों का?”

माया ने आईने के भीतर से अपना चेहरा काँच के करीब किया।

“क्योंकि 2013 में विक्रम शर्मा ने जिस बच्चे को बचाने की कोशिश की थी, वह तुम नहीं थे।”

अर्जुन की पकड़ ढीली पड़ गई।

मीरा की आधी बाँह आईने के भीतर जा चुकी थी।

माया ने कहा—

“वह बच्चा मीरा था।”

अर्जुन ने चीखकर मीरा का हाथ खींच लिया।

आईने में तेज रोशनी चमकी।

माया का चेहरा टूटकर कई टुकड़ों में बिखर गया।

कमरे के भीतर हवा का तूफान उठ गया। दीवारों पर लिखे निशान चमकने लगे। आईने के भीतर से एक बच्चे की चीख आई।

फिर सब शांत हो गया।

मीरा फर्श पर गिर पड़ी।

अर्जुन उसके पास घुटनों के बल बैठ गया।

“मीरा! मेरी बात सुनो। तुम ठीक हो?”

मीरा ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।

उसकी कलाई पर तीन काली लकीरें फिर से उभर आई थीं।

उसने अर्जुन की तरफ देखा।

“भैया, मैंने उसे देख लिया।”

“किसे?”

“अपनी माँ को।”

“वह माया थी?”

मीरा ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

मीरा ने फुसफुसाकर कहा—

“माया मेरी माँ नहीं थी। वह भी किसी और की जगह खड़ी थी।”

अर्जुन कुछ बोल पाता, उससे पहले कमरे के बाहर से एक आवाज़ आई।

वह विक्रम की आवाज़ थी।

“अर्जुन, दरवाज़ा खोलो।”

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

फिर आवाज़ दोबारा आई—

“बेटा, इस बार मैं सच बोलूँगा।”

मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“मत खोलिए।”

अर्जुन ने पूछा, “क्यों?”

मीरा ने काँपते हुए कहा—

“क्योंकि मैंने अभी अपनी माँ को देखा है।”

“तो?”

“और उसने मुझे बताया कि मेरे पिता कौन हैं।”

“कौन?”

मीरा की आँखों से आँसू बहने लगे।

“वह आदमी, जो इस समय दरवाज़े के बाहर खड़ा है।”

दरवाज़े पर तीन दस्तकें हुईं।

एक।

दो।

तीन।

फिर बाहर से विक्रम की आवाज़ आई—

“मीरा, बेटी। अपने भाई को बता दो कि 2013 में किसकी मौत हुई थी।”

मीरा ने सिर झुका लिया।

“भैया…”

अर्जुन ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

“क्या?”

मीरा ने धीरे से कहा—

“2013 में मेरे पिता की मौत नहीं हुई थी।”

“तो किसकी हुई थी?”

मीरा ने दरवाज़े की तरफ देखा।

“मेरी।”

अर्जुन का दिल रुक-सा गया।

“क्या?”

“उस रात मैं मर गई थी, भैया।”

दरवाज़े के बाहर खड़ा आदमी हँसने लगा।

मीरा ने अपनी कलाई दिखाई।

तीन काली लकीरें अब लाल हो चुकी थीं।

“और जो आपके साथ इतने सालों से रही है…”

उसने अपनी आँखें उठाईं।

उनकी पुतलियाँ पूरी तरह काली थीं।

“वह मीरा नहीं है।”

आईने के भीतर से एक छोटी लड़की की आवाज़ आई—

“भैया, अब मुझे बाहर निकालो।”

अर्जुन ने एक तरफ मीरा को देखा।

फिर आईने में खड़ी बच्ची को।

दोनों के चेहरे एक जैसे थे।

दोनों रो रही थीं।

दोनों ने एक साथ कहा—

“मैं असली हूँ।”

और उसी पल, तीसरी मंज़िल की घड़ी ने 3:13 बजा दिए।

**एपिसोड 15 समाप्त।**

Writer
firoj saifi
Story
“अंधेरे में कोई है”
Chapter
15 of 17
Category
Ghost Stories
Reading time
33 min
Words
6477
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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