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एपिसोड 14: 2013 की आखिरी गवाही
firoj saifi · Ghost Stories · 36 मिनट
तीनों साये एक-दूसरे के सामने खड़े थे।
कमरे में कोई हवा नहीं चल रही थी, फिर भी दीवार पर टँगी पुरानी तस्वीरें धीरे-धीरे हिल रही थीं। छत से लटकता पीला बल्ब बुझने और जलने के बीच काँप रहा था। आईने के भीतर खड़ा अर्जुन अपने दाहिने हाथ को उठाए हुए था। बाहर खड़ा अर्जुन भी ठीक उसी तरह खड़ा था।
दोनों की कलाई पर तीन काली लकीरें थीं।
और उनके पीछे खड़ा तीसरा साया अपनी जगह से हिल नहीं रहा था।
“मुझे या खुद को?” उसने फिर पूछा।
उसकी आवाज़ किसी बच्चे जैसी नहीं थी। उसमें एक साथ कई आवाज़ें थीं—एक बूढ़े आदमी की, किसी औरत की, किसी नवजात बच्चे की और एक ऐसे आदमी की, जिसकी साँसें मिट्टी के नीचे दब गई हों।
अर्जुन ने अपनी माँ की तरफ देखा।
“आपने कहा था कि अभय उस रात पैदा ही नहीं हुआ था। फिर आप यह भी कह रही हैं कि वह नाम किसी बच्चे का नहीं था। आखिर सच क्या है?”
माँ ने जवाब नहीं दिया।
उनकी आँखें आईने में खड़े दोनों अर्जुनों पर थीं। वह जैसे दोनों के चेहरों में कुछ ढूँढ़ रही थीं। कोई ऐसा अंतर, जो किसी और को दिखाई नहीं दे रहा था।
“माँ,” अर्जुन ने इस बार ज़ोर से कहा, “मैं आपसे पूछ रहा हूँ।”
माँ के होंठ हिले।
“तुम दोनों में से कोई भी सवाल पूछने की स्थिति में नहीं है।”
आईने वाला अर्जुन मुस्कराया।
“सुना? माँ हमेशा ऐसा ही करती है। जब उसे जवाब नहीं देना होता, तो वह सवाल पूछने वाले को ही गलत साबित कर देती है।”
“चुप रहो!” माँ चीखीं।
उनकी आवाज़ के साथ ही कमरे की सारी तस्वीरें एक साथ दीवार की तरफ घूम गईं। उनकी पीठ पर चिपके कागज़ दिखाई देने लगे। हर कागज़ पर एक ही तारीख लिखी थी—
**17 जुलाई 2013।**
अर्जुन की नज़र एक तस्वीर पर ठहर गई।
उसमें उसके पिता विक्रम शर्मा खड़े थे। पीछे शर्मा निवास की तीसरी मंज़िल का दरवाज़ा था। विक्रम का चेहरा कैमरे की तरफ नहीं था। वह किसी ऐसे व्यक्ति को देख रहे थे जो तस्वीर में मौजूद नहीं था।
तस्वीर के नीचे लाल स्याही में लिखा था—
**“जिस दिन वह मरा, उस दिन वह घर में नहीं था।”**
अर्जुन ने तस्वीर उतारने के लिए हाथ बढ़ाया।
“उसे मत छूना!” माँ ने कहा।
लेकिन देर हो चुकी थी।
जैसे ही अर्जुन की उँगलियाँ तस्वीर से लगीं, कमरे की रोशनी बुझ गई।
अँधेरे में किसी ने उसके कान के पास आकर फुसफुसाया—
“अपने पिता की मौत की जाँच मत करना, अर्जुन।”
वह आवाज़ विक्रम की थी।
“क्योंकि उस रात मुझे मारने वाला कोई दूसरा नहीं था।”
अर्जुन का गला सूख गया।
“तो किसने मारा था?”
कुछ पल तक केवल साँसों की आवाज़ सुनाई देती रही।
फिर वही आवाज़ बोली—
“तुमने।”
***
जब रोशनी वापस आई, आईने के सामने केवल एक अर्जुन खड़ा था।
दूसरा गायब था।
माँ फर्श पर बैठी थीं। मीरा दरवाज़े के पास खड़ी थी और उसके हाथ में वही छोटी चाँदी की घंटी थी, जिसकी आवाज़ कभी-कभी परछाईं को रोक सकती थी।
लेकिन इस बार घंटी शांत थी।
“भैया,” मीरा ने धीरे से कहा, “आपने क्या देखा?”
अर्जुन ने तस्वीर अपने हाथ में कस ली।
“पापा की मौत का दिन।”
“तस्वीर में?”
“नहीं। उसके पीछे।”
उसने तस्वीर पलट दी।
पीछे एक नया वाक्य उभर आया था। लिखावट विक्रम की थी। अर्जुन उसे पहचानता था, क्योंकि बचपन में उसके पिता उसे इसी लिखावट में जन्मदिन के कार्ड दिया करते थे।
**“अगर तुम मेरी मौत का सच जानना चाहते हो, तो देवगढ़ के पुराने जिला अभिलेखागार में जाओ। कमरा नंबर सात। फाइल 2013/313।**
**लेकिन गवाही पढ़ने से पहले यह याद रखना—गवाह मर चुका है। और उसने तुम्हें पैदा होते हुए देखा था।”**
मीरा ने कागज़ पढ़ा।
उसके चेहरे से रंग उतर गया।
“यह नहीं हो सकता।”
“क्यों?”
“क्योंकि जिस गवाह का नाम इस पर लिखा है, उसकी मौत 1995 में हुई थी।”
अर्जुन ने तस्वीर से नज़र उठाई।
“तुम्हें उसका नाम कैसे पता?”
मीरा ने जवाब देने के बजाय अपनी कलाई आगे कर दी।
उसकी त्वचा पर तीन हल्की काली लकीरें उभर रही थीं।
“क्योंकि मैंने यह नाम पहले भी देखा है,” उसने कहा। “तुम्हारे पिता की डायरी में।”
“कौन-सा नाम?”
मीरा ने होंठ खोले, लेकिन आवाज़ नहीं निकली।
उसके पीछे दीवार पर लगी घड़ी अचानक चलने लगी।
टिक।
टिक।
टिक।
फिर उसकी सुइयाँ उलटी दिशा में घूमने लगीं।
और घड़ी के काँच पर अपने आप तीन शब्द लिखे गए—
**डॉक्टर नीलकंठ नहीं।**
**विक्रम नहीं।**
**तीसरा गवाह।**
अर्जुन ने माँ की तरफ देखा।
वह अब खड़ी हो चुकी थीं। उनके चेहरे पर डर था, लेकिन वह डर किसी अनजान रहस्य का नहीं था।
वह किसी पहचाने हुए आदमी का डर था।
“तुम दोनों कहीं नहीं जाओगे,” उन्होंने कहा।
अर्जुन ने तस्वीर मोड़कर अपनी जेब में रख ली।
“इस बार मैं आपकी बात नहीं मानूँगा।”
“अर्जुन, तुम समझ नहीं रहे। वह फाइल तुम्हारे पिता की मौत का रिकॉर्ड नहीं है। वह एक दरवाज़ा है।”
“तो उसे खोलना पड़ेगा।”
माँ उसके सामने आ गईं।
“अगर तुमने वह गवाही पढ़ ली, तो तुम्हें यह भी पता चल जाएगा कि 2013 में मरा कौन था।”
अर्जुन ठिठक गया।
“आप कहना क्या चाहती हैं? पापा नहीं मरे थे?”
माँ की आँखें भर आईं।
“मैंने यह नहीं कहा।”
“लेकिन आपने यह भी नहीं कहा कि वह मरे थे।”
मीरा ने धीरे से अर्जुन का हाथ पकड़ा।
“भैया, हमें जाना चाहिए।”
“तुमने अभी कहा था कि गवाह 1995 में मर गया था।”
“हाँ।”
“तो वह मेरे जन्म के बारे में गवाही कैसे दे सकता है?”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
“शायद इसीलिए वह गवाही इतने सालों से बंद रखी गई है।”
उसी क्षण ऊपर तीसरी मंज़िल से दस्तक हुई।
एक।
दो।
तीन।
फिर घर के हर दरवाज़े पर एक साथ दस्तक होने लगी।
मुख्य दरवाज़ा।
रसोई का दरवाज़ा।
बंद कमरे का दरवाज़ा।
यहाँ तक कि उस दीवार पर भी, जिसके पीछे कोई कमरा नहीं था।
धड़ाम।
धड़ाम।
धड़ाम।
माँ ने दोनों कानों पर हाथ रख लिए।
“वह जान गया,” वह बुदबुदाईं।
“कौन?” अर्जुन ने पूछा।
माँ ने उसकी तरफ देखा।
“जिसे तुम मरा हुआ समझते हो।”
और फिर तीसरी मंज़िल से विक्रम शर्मा की आवाज़ आई—
“अर्जुन, बेटा। देर हो रही है। इस बार मुझे अकेले मत छोड़ना।”
***
देवगढ़ का पुराना जिला अभिलेखागार मुख्य बाज़ार से लगभग दो किलोमीटर दूर था। कभी वहाँ तहसील का काम होता था, लेकिन नई इमारत बनने के बाद पुरानी बिल्डिंग बंद कर दी गई थी। अब उसका इस्तेमाल पुराने मुकदमों, जमीन के कागज़ों और उन सरकारी फाइलों को रखने के लिए होता था, जिन्हें कोई देखना नहीं चाहता था।
सूरज निकल चुका था, लेकिन अर्जुन को ऐसा लग रहा था जैसे रात अब भी उसके साथ चल रही हो।
मीरा मोटरसाइकिल चला रही थी। अर्जुन पीछे बैठा था। रास्ते में कई बार उसने पीछे मुड़कर देखा।
हर बार सड़क खाली मिलती।
लेकिन मोटरसाइकिल की धूल में दो परछाइयाँ बनतीं—एक उसकी, दूसरी मीरा की।
तीसरी परछाईं हर मोड़ पर दिखाई देती।
वह कभी सड़क के किनारे खड़ी होती, कभी किसी बिजली के खंभे के पीछे। कभी वह उनसे आगे निकल जाती, लेकिन जब अर्जुन उसकी तरफ देखता, वहाँ कोई नहीं होता।
“मीरा,” उसने कहा, “क्या तुम्हें भी वह दिखाई दे रहा है?”
“कौन?”
“हमारे पीछे चलने वाला आदमी।”
मीरा ने गति धीमी नहीं की।
“पीछे मत देखना।”
“तुम्हें पता है वह कौन है?”
“नहीं।”
“झूठ मत बोलो।”
मीरा ने बाइक सड़क के किनारे रोक दी।
कुछ पल दोनों चुप रहे।
फिर उसने हेलमेट उतारा।
“भैया, मैं यह नहीं जानती कि वह कौन है। लेकिन मुझे यह पता है कि वह जब भी दिखाई देता है, उसके बाद किसी की याद बदल जाती है।”
“किसकी?”
“जिसने उसे देखा हो।”
अर्जुन ने अपने माथे पर हाथ फेरा।
“तो मैं उसे क्यों देख रहा हूँ?”
मीरा ने उसकी आँखों में देखा।
“शायद क्योंकि इस बार वह तुम्हारी याद बदलना नहीं चाहता।”
“फिर क्या चाहता है?”
“शायद वह चाहता है कि तुम उसे याद करो।”
अर्जुन ने कुछ कहना चाहा, लेकिन उसी समय उसके फोन पर एक संदेश आया।
अनजान नंबर से।
संदेश में केवल एक तस्वीर थी।
तस्वीर किसी पुराने अस्पताल के कमरे की थी। कमरे में तीन लोहे के पलंग थे। पहले पलंग पर सफेद चादर पड़ी थी। दूसरे पर एक नवजात बच्चा लेटा था। तीसरे पलंग के पास एक आदमी खड़ा था, जिसका चेहरा तस्वीर में धुँधला था।
तस्वीर के नीचे लिखा था—
**“पहली गवाही: मैंने उस बच्चे को जन्म लेते नहीं देखा। मैंने उसे पहले से वहाँ पाया था।”**
अर्जुन ने संदेश मीरा को दिखाया।
मीरा ने तस्वीर देखते ही फोन उसके हाथ से लगभग गिरा दिया।
“यह वही कमरा है।”
“कौन-सा कमरा?”
“पुराने मातृत्व अस्पताल का। जहाँ तुम्हारी माँ को ले जाया गया था।”
“तुमने कहा था कि तुम्हें 1995 की कोई याद नहीं।”
“मुझे याद नहीं थी।”
“और अब?”
मीरा ने तस्वीर से नज़र नहीं हटाई।
“अब मुझे याद आ रहा है कि मैं वहाँ थी।”
अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम उस वक्त पैदा भी नहीं हुई थीं।”
मीरा ने धीरे से सिर उठाया।
“भैया, यही तो बात है।”
उसकी आँखों में आँसू थे।
“मैं उस कमरे में थी। लेकिन वहाँ कोई बच्चा मुझे देख नहीं सकता था।”
***
अभिलेखागार का मुख्य दरवाज़ा जंग से भरा था। उस पर लगी तख्ती का आधा हिस्सा टूट चुका था। बचे हुए अक्षरों से केवल इतना पढ़ा जा सकता था—
**जिला अभिलेखागार, देवगढ़।**
दरवाज़ा धक्का देने पर खुल गया।
अंदर पुराने कागज़ों, सीलन और चूहे मारने की दवा की मिली-जुली गंध थी। लंबा गलियारा दोनों तरफ से लोहे की अलमारियों से घिरा था। ऊपर लगे पंखे बंद थे। फिर भी किसी अदृश्य हवा के कारण कागज़ों के कोने हिल रहे थे।
काउंटर के पीछे एक बूढ़ा आदमी बैठा था। उसके सामने खुली रजिस्टर-बुक थी, लेकिन वह उसमें कुछ लिख नहीं रहा था।
अर्जुन ने पूछा, “कमरा नंबर सात कहाँ है?”
बूढ़े ने सिर उठाया।
“किस काम से?”
“पुरानी फाइल देखनी है।”
“किस साल की?”
“2013।”
बूढ़े ने कलम रख दी।
“2013 में बहुत लोग मरे थे।”
“मुझे एक खास रिकॉर्ड चाहिए।”
“नाम?”
अर्जुन कुछ पल रुका।
“विक्रम शर्मा।”
बूढ़े के चेहरे पर कोई बदलाव नहीं आया। उसने बस अपनी कुर्सी पीछे खिसकाई।
“कमरा सात में जाओ। दरवाज़ा खुला होगा।”
मीरा ने अर्जुन की तरफ देखा। बूढ़े ने उनसे कोई पहचान-पत्र नहीं माँगा था, न फाइल नंबर, न कोई आवेदन। वह जैसे पहले से जानता था कि वे किसलिए आए हैं।
अर्जुन ने पूछा, “आपको पता है हम कौन हैं?”
बूढ़े ने अपनी ऐनक उतारी और कपड़े से साफ करने लगा।
“बेटा, इस इमारत में आने वाले लोगों को मैं उनके नाम से नहीं पहचानता।”
“तो किससे?”
“उनकी परछाईं से।”
उसने ऐनक वापस पहन ली।
“तुम्हारी परछाईं तुम्हारे साथ नहीं आई।”
अर्जुन ने तुरंत फर्श की तरफ देखा।
उसकी परछाईं उसके पैरों के पास थी।
लेकिन बूढ़ा सही कह रहा था।
परछाईं की गर्दन मुड़ी हुई थी। उसका चेहरा अर्जुन की तरफ नहीं, पीछे के गलियारे की तरफ था।
जैसे वह किसी को देख रही हो।
अर्जुन ने पलटकर देखा।
गलियारा खाली था।
जब उसने फिर नीचे देखा, उसकी परछाईं सीधी खड़ी थी।
बूढ़े ने रजिस्टर बंद कर दिया।
“कमरा सात में जो पढ़ोगे, उसे वहीं छोड़कर आना।”
“क्यों?”
“क्योंकि कुछ रिकॉर्ड कागज़ पर नहीं लिखे जाते। कागज़ सिर्फ उन्हें कुछ देर के लिए रोककर रखते हैं।”
“आपको इस फाइल के बारे में पता है?”
बूढ़े ने उत्तर नहीं दिया।
उसने काउंटर के नीचे से एक छोटी-सी पीतल की चाबी निकाली और अर्जुन की ओर बढ़ा दी।
चाबी पर तीन काली रेखाएँ बनी थीं।
“दरवाज़ा बंद मत करना,” बूढ़े ने कहा। “अगर अंदर कोई तुम्हें तुम्हारे नाम से बुलाए, तो जवाब मत देना।”
मीरा ने चाबी लेने से पहले पूछा, “और अगर वह हमारे पिता की आवाज़ में बुलाए?”
बूढ़े ने पहली बार उसे ध्यान से देखा।
“तो समझ लेना कि वह अब तक तुम्हारे पिता की आवाज़ भूल नहीं पाया।”
उसने फिर रजिस्टर खोल लिया।
“जाओ। तुम्हारे पास ज़्यादा समय नहीं है।”
***
कमरा नंबर सात गलियारे के आखिरी छोर पर था।
दरवाज़े के ऊपर लगी प्लेट पर किसी ने नाखून या किसी नुकीली चीज़ से बार-बार खरोंचकर नंबर मिटाने की कोशिश की थी। उसके नीचे छोटे अक्षरों में लिखा था—
**मृत्यु अभिलेख — विशेष गवाही।**
अर्जुन ने पीतल की चाबी ताले में डाली।
ताला खुल गया।
कमरे में प्रवेश करते ही उसे ठंड महसूस हुई। बाहर की गर्मी के बावजूद भीतर साँस से हल्का धुआँ निकलता दिखाई दे रहा था। दीवारों पर लोहे की अलमारियाँ थीं। बीच में एक मेज़ और दो कुर्सियाँ रखी थीं। मेज़ पर काली जिल्द वाली एक मोटी फाइल रखी थी।
उस पर लिखा था—
**फाइल 2013/313।**
नीचे लाल मुहर थी।
**केवल संबंधित व्यक्ति की उपस्थिति में खोली जाए।**
“संबंधित व्यक्ति कौन है?” मीरा ने पूछा।
अर्जुन ने फाइल खोल दी।
पहले पन्ने पर मृत्यु प्रमाणपत्र की प्रति थी।
नाम: विक्रम शर्मा।
मृत्यु की तारीख: 17 जुलाई 2013।
मृत्यु का स्थान: शर्मा निवास, देवगढ़।
कारण: ऊपरी मंज़िल से गिरने के कारण गंभीर चोटें।
शव की पहचान करने वाला: अर्जुन शर्मा।
अर्जुन ने पन्ना दोबारा पढ़ा।
“यह गलत है।”
मीरा ने पूछा, “क्या?”
“मैंने पापा का शव कभी नहीं पहचाना। मैं उस समय देवगढ़ में था ही नहीं।”
फाइल में आगे लिखा था कि मृत्यु के समय अर्जुन की उम्र अठारह वर्ष थी और उसने अपने पिता की पहचान की पुष्टि की थी।
“2013 में मेरी उम्र अठारह नहीं थी,” अर्जुन ने कहा। “मैं सत्रह का था।”
मीरा ने तारीखों की गणना की।
“तुम्हारा जन्मदिन 17 जुलाई है। अगर यह घटना उसी दिन हुई थी, तो रिकॉर्ड के हिसाब से तुम अठारह के हो गए थे।”
“लेकिन मैं वहाँ था ही नहीं!”
“तो किसी ने तुम्हारी तरफ से हस्ताक्षर किए।”
अर्जुन ने अगले पन्ने पर नज़र डाली।
वहाँ हस्ताक्षर थे—
**अर्जुन शर्मा।**
हस्ताक्षर उसकी लिखावट जैसे थे।
बिल्कुल वैसे, जैसे वह आज अपना नाम लिखता था।
लेकिन नीचे लगी अंगूठे की छाप किसी वयस्क आदमी की नहीं, किसी छोटे बच्चे की थी।
अर्जुन का सिर घूमने लगा।
“यह मेरे हस्ताक्षर नहीं हैं।”
“मुझे पता है।”
“तुम कैसे कह सकती हो?”
मीरा ने पन्ने पर झुककर देखा।
“क्योंकि इसमें तुम्हारे नाम का आखिरी अक्षर गलत है।”
अर्जुन ने ध्यान से देखा।
हस्ताक्षर में ‘शर्मा’ का आखिरी अक्षर थोड़ा अलग था। जैसे लिखने वाले को नाम तो पता था, लेकिन उसने उसे कभी ठीक से लिखा नहीं था।
अगले पन्ने पर पुलिस रिपोर्ट थी।
रिपोर्ट के अनुसार, विक्रम शर्मा 17 जुलाई 2013 की रात अपने घर की तीसरी मंज़िल से नीचे गिरे थे। घर के भीतर संघर्ष के निशान मिले थे। कमरे में एक बड़ा आईना टूटा हुआ था। मृतक के दाहिने हाथ में काँच का एक टुकड़ा मिला था, जिस पर खून के साथ तीन काली लकीरें दिखाई दी थीं।
लेकिन शव परीक्षण की रिपोर्ट में एक अजीब बात लिखी थी—
**“मृतक के शरीर पर किसी ऊँचाई से गिरने के अनुरूप चोटें नहीं मिलीं।”**
उसके ठीक नीचे दूसरी पंक्ति थी—
**“मृतक की मृत्यु का समय अनुमानित नहीं किया जा सकता।”**
और तीसरी पंक्ति को काली स्याही से ढक दिया गया था।
अर्जुन ने पन्ना रोशनी की तरफ उठाया।
स्याही के पीछे कुछ अक्षर दिखाई दिए।
“यहाँ क्या लिखा है?” उसने पूछा।
मीरा ने कागज़ को मेज़ पर रखा और फोन की रोशनी उस पर डाली।
धीरे-धीरे अक्षर उभरे—
**“शव की आयु मृतक की आयु से मेल नहीं खाती।”**
अर्जुन के हाथ ठंडे पड़ गए।
“मतलब?”
मीरा ने कुछ नहीं कहा।
फाइल के अगले हिस्से में गवाहों की सूची थी।
पहला गवाह—पड़ोसी, जिसने रात में चीख सुनी थी।
दूसरा गवाह—घर का पुराना नौकर, जिसने दावा किया था कि उसने विक्रम को तीसरी मंज़िल की खिड़की से गिरते देखा।
तीसरा गवाह—
नाम की जगह केवल तीन काली लकीरें बनी थीं।
पते के स्थान पर लिखा था—
**पुराना मातृत्व अस्पताल, कमरा 313।**
उम्र—शून्य।
मृत्यु की तारीख—17 जुलाई 1995।
गवाही की तारीख—17 जुलाई 2013।
अर्जुन ने पन्ना मीरा की तरफ बढ़ाया।
“यह कैसे संभव है?”
मीरा ने जवाब देने से पहले कमरे के दरवाज़े की तरफ देखा।
दरवाज़ा अब बंद था।
हालाँकि अर्जुन ने उसे बंद नहीं किया था।
“गवाह की मौत 1995 में हुई,” उसने कहा, “लेकिन उसने 2013 में गवाही दी।”
“और उसका पता अस्पताल का वह कमरा है, जहाँ मेरी माँ को ले जाया गया था।”
“हाँ।”
“उसका नाम कहाँ है?”
मीरा ने कागज़ के खाली हिस्से पर उँगली रखी।
“शायद यही जानने के लिए हमें आखिरी पन्ना पढ़ना होगा।”
***
फाइल का आखिरी पन्ना बाकी सभी पन्नों से अलग था।
वह सफेद नहीं, हल्का पीला था। किनारों पर नमी के धब्बे थे, जैसे उसे कई वर्षों तक पानी में रखा गया हो। उस पर किसी सरकारी अधिकारी की मुहर नहीं थी। केवल एक वाक्य लिखा था—
**“गवाही दर्ज करने से पहले गवाह से उसका नाम दोबारा पूछा गया।”**
उसके नीचे प्रश्न और उत्तर थे।
**प्रश्न:** तुम्हारा नाम क्या है?
**उत्तर:** जो नाम मुझे दिया गया, वह मेरा नहीं था।
**प्रश्न:** तुम्हारी उम्र क्या है?
**उत्तर:** जिस दिन मेरी मृत्यु हुई, मैं पैदा नहीं हुआ था।
**प्रश्न:** क्या तुम विक्रम शर्मा को जानते थे?
**उत्तर:** मैं उसे जानता था, इससे पहले कि वह मुझे देख सके।
**प्रश्न:** क्या तुमने 17 जुलाई 2013 की रात विक्रम शर्मा को मरते हुए देखा?
**उत्तर:** नहीं।
**प्रश्न:** फिर तुम गवाही कैसे दे रहे हो?
**उत्तर:** क्योंकि उस रात मरा हुआ आदमी विक्रम शर्मा नहीं था।
अर्जुन ने पन्ना मेज़ पर पटक दिया।
“बस! यह कोई मज़ाक है।”
मीरा ने पन्ना उठाने की कोशिश की, लेकिन अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“यह फाइल किसी ने जानबूझकर बनाई है। इसमें झूठे रिकॉर्ड हैं, झूठे हस्ताक्षर हैं, और एक ऐसा गवाह है जो पैदा ही नहीं हुआ था।”
“भैया, शांत हो जाइए।”
“कैसे शांत रहूँ? हर जगह मेरा नाम है। हर जगह कोई मुझे बता रहा है कि मैं पैदा नहीं हुआ, या किसी और की जगह आया, या किसी दूसरे बच्चे की मौत पर ज़िंदा हूँ! अब मेरे पिता की मौत के रिकॉर्ड में भी वही बात है!”
उसकी आवाज़ कमरे में गूँज गई।
फिर मेज़ के नीचे से एक हल्की दस्तक सुनाई दी।
ठक।
दोनों चुप हो गए।
ठक।
मीरा पीछे हट गई।
तीसरी दस्तक के साथ मेज़ के नीचे से एक बच्चे की आवाज़ आई—
“भैया, तुम फिर देर से आए।”
अर्जुन धीरे-धीरे झुका।
मेज़ के नीचे अँधेरा था। वहाँ कोई बच्चा नहीं था। लेकिन अँधेरे में एक छोटी लाल गेंद पड़ी थी।
वही लाल गेंद।
वही, जो उसे तीसरी मंज़िल पर दिखाई दी थी।
अर्जुन ने उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ाया।
“मत छूना!” मीरा चिल्लाई।
लेकिन गेंद अपने आप लुढ़ककर उसके हाथ से टकरा गई।
उसकी सतह पर छोटे-छोटे अक्षर उभर आए।
**अभय।**
अर्जुन ने गेंद को फर्श पर फेंक दिया।
वह लुढ़कती हुई दरवाज़े तक गई और वहीं रुक गई।
फिर दरवाज़े के दूसरी तरफ से एक बच्चे ने कहा—
“गवाह आ गया है।”
दरवाज़े का हैंडल अपने आप घूमने लगा।
मीरा ने घंटी बजाई।
चाँदी की आवाज़ कमरे में फैल गई।
कुछ क्षण तक सब शांत रहा।
फिर दरवाज़ा खुल गया।
बाहर गलियारे में कोई नहीं था।
लेकिन फाइल के आखिरी पन्ने पर एक नया उत्तर उभर आया था।
**प्रश्न:** क्या तुमने अर्जुन शर्मा को पैदा होते देखा?
**उत्तर:** नहीं। वह बच्चा उस रात अस्पताल में पैदा नहीं हुआ था।
अर्जुन के भीतर कुछ टूट गया।
“यह झूठ है,” उसने फुसफुसाया।
मीरा ने उसका कंधा पकड़ा।
“भैया…”
“मैं अस्पताल में पैदा हुआ था। माँ ने बताया था। मेरे पास जन्म प्रमाणपत्र है।”
“जन्म प्रमाणपत्र किसने बनाया था?”
अर्जुन उसकी तरफ मुड़ा।
मीरा की आँखें भीगी हुई थीं।
“आपके पास जो प्रमाणपत्र है, उसमें डॉक्टर का नाम क्या है?”
अर्जुन को याद आया।
उसके पुराने दस्तावेज़ों में डॉक्टर का नाम **नीलकंठ त्रिवेदी** लिखा था।
वही नीलकंठ, जिसका नाम तीसरी मंज़िल के आईने में उभरा था।
वही नीलकंठ, जिसके बेटे ने कहा था कि अभय 1995 में नहीं मरा था।
और वही नीलकंठ, जिसके बारे में शारदा की डायरी में लिखा था कि वह मर चुका है।
अर्जुन ने फाइल के पन्ने पर फिर नज़र डाली।
आखिरी पंक्ति के नीचे अब एक हस्ताक्षर उभर रहा था।
**डॉ. नीलकंठ त्रिवेदी।**
उसके नीचे तारीख लिखी थी—
**17 जुलाई 1995।**
और उसके नीचे एक वाक्य—
**“मैंने बच्चे को जन्म लेते नहीं देखा। मैंने उसे कमरे में पहले से मौजूद पाया था।”**
***
अर्जुन ने फाइल बंद कर दी।
उसे लगा कि अगर उसने एक और पंक्ति पढ़ी, तो शायद उसका अपना नाम भी बदल जाएगा।
“हमें यहाँ से निकलना होगा,” उसने कहा।
मीरा ने सिर हिलाया।
लेकिन जब अर्जुन ने दरवाज़ा खोला, तो बाहर वही बूढ़ा आदमी खड़ा था जो काउंटर पर बैठा था।
उसके हाथ में एक छोटी-सी फाइल थी।
“तुमने गवाही पढ़ ली?”
अर्जुन ने पूछा, “आप कौन हैं?”
“मैं इस अभिलेखागार का रखवाला हूँ।”
“आपका नाम?”
बूढ़े ने मुस्कराकर कहा, “नाम बहुत खतरनाक चीज़ है, बेटा।”
“मुझे आपका नाम चाहिए।”
“क्यों?”
“क्योंकि आप जानते हैं कि इस फाइल में क्या लिखा है।”
बूढ़े की मुस्कान गायब हो गई।
“मैंने इसे नहीं लिखा।”
“लेकिन आप इसे इतने सालों से संभाल रहे हैं।”
“किसी को तो संभालना था।”
“गवाह कौन है?”
बूढ़े ने मीरा की तरफ देखा।
“तुम इसे पहचानती हो।”
मीरा ने सिर हिला दिया।
“नहीं।”
“पहचानती हो। तुमने इसे बचपन में देखा था।”
“मैं उस रात अस्पताल में नहीं थी।”
बूढ़ा धीरे-धीरे उसके पास आया।
“तुम अस्पताल में नहीं थीं। तुम अस्पताल के कमरे के बाहर थीं।”
मीरा पीछे हट गई।
“चुप रहिए।”
“तुमने दरवाज़े के नीचे से तीन परछाइयाँ देखी थीं। एक तुम्हारी माँ की। एक विक्रम की। और तीसरी उस बच्चे की, जिसका नाम किसी ने नहीं लिया।”
मीरा ने दोनों हाथ कानों पर रख लिए।
“मैंने कुछ नहीं देखा!”
“तुमने उस बच्चे की आवाज़ सुनी थी।”
“नहीं!”
“उसने तुम्हें क्या कहा था, मीरा?”
मीरा का शरीर काँपने लगा।
अर्जुन ने उसे अपने पीछे कर लिया।
“बस कीजिए।”
बूढ़े ने अर्जुन की तरफ देखा।
उसकी आँखें अब काली हो चुकी थीं।
“तुम हमेशा उसे बचाते हो। लेकिन तुम्हें पता भी है कि तुम किसे बचा रहे हो?”
“वह मेरी बहन जैसी है।”
“नहीं।”
बूढ़े ने सिर हिलाया।
“वह उस गवाह की आखिरी याद है।”
“आप क्या बकवास कर रहे हैं?”
बूढ़े ने अपनी मुट्ठी खोली।
उसकी हथेली पर तीन काली लकीरें थीं।
“जिस बच्चे ने जन्म नहीं लिया, उसने अपनी आखिरी साँस किसी शरीर में छोड़ी थी। वह शरीर तुम्हारा नहीं था। और जिस लड़की को तुम मीरा कहते हो, उसने उस रात उस बच्चे की आवाज़ अपने भीतर रख ली थी।”
अर्जुन ने मीरा की तरफ देखा।
उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था।
“भैया…” वह फुसफुसाई। “मुझे यहाँ से ले चलो।”
बूढ़ा हँसा।
उसकी हँसी धीरे-धीरे कई आवाज़ों में बदल गई।
“ले जाओ। लेकिन इस बार यह मत भूलना कि दरवाज़े के बाहर कौन खड़ा है।”
अचानक गलियारे की सारी लाइटें बुझ गईं।
अँधेरे में अर्जुन ने मीरा का हाथ पकड़ लिया और दौड़ पड़ा।
उन्हें नहीं पता था कि वे किस दिशा में भाग रहे हैं। गलियारा जितना आगे बढ़ता, उतना लंबा होता जाता। दोनों तरफ की अलमारियों पर रखी फाइलें अपने आप खुल रही थीं।
हर फाइल में एक ही नाम था—
अर्जुन शर्मा।
किसी में वह पाँच साल का था।
किसी में तेरह साल का।
किसी में अठारह साल का।
किसी में एक बूढ़ा आदमी।
और एक फाइल में वह अस्पताल के कमरे में लेटा था, जबकि उसके ऊपर मृत्यु की तारीख लिखी थी—
**17 जुलाई 1995।**
अर्जुन रुक गया।
तस्वीर में बच्चा उसकी तरह दिखता था, लेकिन उसकी आँखें खुली थीं।
वह कैमरे की तरफ नहीं देख रहा था।
वह तस्वीर के बाहर खड़े अर्जुन को देख रहा था।
तस्वीर के नीचे लिखा था—
**“यह वह बच्चा है जिसे 1995 में मृत घोषित किया गया था।”**
उसके आगे एक दूसरा वाक्य था—
**“लेकिन इसका शव कभी नहीं मिला।”**
अर्जुन ने फाइल बंद कर दी।
तभी पीछे से मीरा की आवाज़ आई—
“भैया, जल्दी चलिए!”
वह आगे दौड़ रही थी।
अर्जुन उसके पीछे भागा।
लेकिन अगले मोड़ पर पहुँचते ही उसने देखा कि मीरा दो दिशाओं में खड़ी थी।
एक मीरा गलियारे के बाईं तरफ।
दूसरी दाईं तरफ।
दोनों के कपड़े एक जैसे थे। दोनों की आँखों में आँसू थे।
दोनों ने एक साथ कहा—
“भैया, मेरे साथ चलिए।”
अर्जुन वहीं रुक गया।
बाईं तरफ वाली मीरा ने अपनी कलाई दिखाई।
तीन काली लकीरें।
दाईं तरफ वाली मीरा की कलाई साफ थी।
“मेरे साथ चलिए,” काली लकीरों वाली मीरा ने कहा। “दूसरी मैं नहीं हूँ।”
दूसरी मीरा ने सिर हिलाया।
“भैया, उसकी बात मत सुनिए। वह आपकी यादों से बनी है।”
अर्जुन ने चाँदी की घंटी निकालने की कोशिश की।
लेकिन घंटी उसके हाथ में नहीं थी।
उसे याद आया कि वह घंटी मीरा के पास थी।
दोनों मीरा एक साथ मुस्कराईं।
“भैया,” उन्होंने कहा, “अब आपको चुनना होगा।”
अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।
उसे शारदा की आवाज़ याद आई—
**“जब दो चेहरे एक जैसे दिखें, तो यह मत पूछना कि उनमें से असली कौन है। पूछना कि उनमें से कौन तुम्हें तुम्हारी याद लौटाना चाहता है।”**
उसने आँखें खोलीं।
“तुम दोनों में से किसी एक को मेरे बचपन की सबसे पहली याद बतानी होगी।”
दोनों चुप हो गईं।
अर्जुन ने पूछा, “मैंने पहली बार मीरा को कहाँ देखा था?”
काली लकीरों वाली मीरा ने तुरंत कहा, “शर्मा निवास के आँगन में। मैं लाल फ्रॉक पहने थी। तुमने मेरी गेंद छिपा दी थी।”
दूसरी मीरा ने कहा, “तुमने मुझे पहली बार तीसरी मंज़िल पर देखा था।”
अर्जुन की साँस अटक गई।
“क्या?”
“तुम्हारी याद गलत है, भैया। तुमने मुझे आँगन में कभी नहीं देखा था। तुमने मुझे पहली बार आईने में देखा था।”
काली लकीरों वाली मीरा ने चीखकर कहा, “झूठ!”
दोनों के चेहरे बदलने लगे।
एक का चेहरा बूढ़ा होने लगा। दूसरी की आँखें काली हो गईं।
अर्जुन ने बिना कुछ सोचे दाईं तरफ वाली मीरा का हाथ पकड़ लिया।
दोनों दौड़ने लगे।
पीछे से दूसरी मीरा की आवाज़ आई—
“भैया! तुमने फिर गलत को चुन लिया!”
***
कुछ देर बाद वे मुख्य काउंटर के पास पहुँचे।
बूढ़ा वहाँ नहीं था।
दरवाज़ा खुला था। बाहर दिन की रोशनी दिखाई दे रही थी।
अर्जुन और मीरा बाहर निकल आए।
सड़क पर लोग चल रहे थे। चाय की दुकान खुली थी। दूर किसी मंदिर की घंटी बज रही थी। दुनिया सामान्य थी।
लेकिन अर्जुन के हाथ में मीरा की कलाई अब भी थी।
उस पर तीन काली लकीरें थीं।
उसने धीरे से हाथ छोड़ दिया।
“तुम सच में मीरा हो?”
मीरा ने उसे देखा।
“आप क्या पूछ रहे हैं, भैया?”
“जो मैंने पूछा।”
उसने जवाब नहीं दिया।
अर्जुन ने उसकी कलाई की तरफ इशारा किया।
“ये लकीरें पहले नहीं थीं।”
मीरा ने अपनी कलाई देखी।
“मुझे नहीं पता।”
“अभी-अभी तुमने कहा कि तुमने मुझे पहली बार आईने में देखा था।”
“मैंने ऐसा नहीं कहा।”
“मैंने अपने कानों से सुना।”
मीरा की आँखों में उलझन फैल गई।
“भैया, मैं आपके साथ बाहर आई ही नहीं।”
अर्जुन का दिल जैसे रुक गया।
“क्या मतलब?”
मीरा ने सड़क की तरफ देखा।
“आप मुझे अभिलेखागार के अंदर छोड़कर भाग गए थे। मैं आपके पीछे आई, लेकिन गलियारे में आप गायब हो गए। फिर मैं बाहर निकली। आप यहाँ खड़े थे।”
उसने कुछ पल रुककर पूछा—
“आपके साथ कौन बाहर आया?”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
उसके पास कोई जवाब नहीं था।
क्योंकि वह मीरा अभी भी उसके सामने खड़ी थी।
वही चेहरा।
वही आवाज़।
वही आँखें।
लेकिन उसके पैरों के नीचे कोई परछाईं नहीं थी।
अर्जुन एक कदम पीछे हट गया।
मीरा ने भी पीछे हटते हुए कहा, “भैया, मुझे डर लग रहा है।”
अर्जुन ने जेब से पिता की तस्वीर निकाली।
तस्वीर के पीछे का संदेश बदल चुका था।
अब लिखा था—
**“तुमने गवाही पढ़ ली। अब गवाह को पहचानो।”**
उसके नीचे एक नया नाम उभरा।
**मीरा शर्मा।**
अर्जुन ने तस्वीर गिरा दी।
मीरा ने उसे उठाने के लिए झुकना चाहा, लेकिन अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मत छूना।”
“क्यों?”
“क्योंकि अब मुझे नहीं पता कि तुम कौन हो।”
मीरा की आँखों में आँसू आ गए।
“भैया, मैं वही हूँ जिसे आपने बचपन में वादा किया था कि कभी अकेला नहीं छोड़ेंगे।”
अर्जुन की आँखें भर आईं।
यह बात सही थी।
उसे याद था।
एक बरसाती दोपहर, आँगन में बैठी छोटी मीरा रो रही थी। उसने अर्जुन से कहा था कि अगर उसकी माँ कभी वापस नहीं आई, तो वह अकेली रह जाएगी। अर्जुन ने उसका हाथ पकड़कर कहा था—
“मैं हूँ न। मैं तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा।”
लेकिन वह याद भी अब बदल रही थी।
उस दिन आँगन में मीरा के साथ कोई दूसरा बच्चा भी था।
उस बच्चे ने अर्जुन से कहा था—
“मुझे भी वादा करो।”
अर्जुन ने उस चेहरे को याद करने की कोशिश की।
उसे केवल काली आँखें याद आईं।
और तीन काली लकीरें।
***
वे शर्मा निवास लौटे तो शाम होने लगी थी।
मुख्य दरवाज़े पर माँ खड़ी थीं। जैसे उन्हें पहले से पता था कि अर्जुन लौटने वाला है।
“तुम लोग कहाँ थे?” उन्होंने पूछा।
अर्जुन ने जवाब देने से पहले मीरा की तरफ देखा।
माँ की नज़र भी उसी पर गई।
फिर अचानक उनका चेहरा बदल गया।
“तुम्हारे साथ कौन है?”
मीरा ने कहा, “माँ, मैं हूँ।”
माँ ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
उन्होंने दरवाज़ा बंद करने की कोशिश की।
मीरा ने हाथ बढ़ाकर दरवाज़ा पकड़ लिया।
“माँ, क्या कर रही हैं?”
माँ पीछे हट गईं।
“तुम्हें मैंने उस रात देखा था। जब तुम्हारी माँ गायब हुई थी। तुम तीसरी मंज़िल पर थीं।”
मीरा की आँखें फैल गईं।
“मैं बच्ची थी।”
“नहीं,” माँ ने कहा। “तुम बच्ची नहीं थीं।”
अर्जुन ने बीच में आकर पूछा, “आप क्या कहना चाहती हैं?”
माँ की आवाज़ काँप रही थी।
“जिस मीरा को तुम जानते हो, वह 2008 में गायब हुई थी। मैंने उसे वापस आते नहीं देखा।”
अर्जुन ने मीरा की तरफ देखा।
वह रो रही थी।
“माँ, आप मुझे पहचानती हैं।”
माँ ने उसकी तरफ देखा, लेकिन उनकी आँखों में पहचान नहीं थी।
“मैं तुम्हें पहचानती हूँ। लेकिन मैं यह नहीं जानती कि तुम्हारे भीतर कौन है।”
अचानक ऊपर तीसरी मंज़िल से एक बच्चे की हँसी सुनाई दी।
तीनों ने ऊपर देखा।
सीढ़ियों के सबसे ऊपर एक छोटा बच्चा खड़ा था। उसके हाथ में लाल गेंद थी। उसकी कलाई पर तीन काली लकीरें थीं।
उसने अर्जुन की तरफ देखकर कहा—
“भैया, आप गलत गवाह को घर ले आए।”
अर्जुन ने माँ की तरफ देखा।
“यह कौन है?”
माँ ने धीरे से कहा—
“वह बच्चा, जिसकी मौत का प्रमाणपत्र 1995 में बनाया गया था।”
बच्चा सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा।
हर कदम पर उसके पीछे एक नई परछाईं बनती।
पहली परछाईं विक्रम शर्मा की थी।
दूसरी शारदा देवी की।
तीसरी एक ऐसी औरत की, जिसका चेहरा माँ जैसा था।
और चौथी अर्जुन की।
लेकिन चौथी परछाईं बाकी सबसे अलग थी।
वह अर्जुन के पीछे नहीं चल रही थी।
वह उसके सामने चल रही थी।
बच्चा नीचे आकर रुक गया।
“अब आपको समझ आया?” उसने पूछा। “आपके पिता की मौत की गवाही देने वाला मैं था।”
अर्जुन ने धीरे से कहा, “तुम पैदा ही नहीं हुए थे।”
बच्चे ने मुस्कराकर जवाब दिया—
“इसीलिए तो मेरी गवाही सबसे सच्ची है।”
उसने लाल गेंद अर्जुन की तरफ उछाल दी।
अर्जुन ने उसे पकड़ लिया।
गेंद के भीतर से टिक-टिक की आवाज़ आने लगी।
जैसे कोई घड़ी उसके भीतर चल रही हो।
फिर गेंद पर तारीख उभर आई—
**17 जुलाई 2013।**
और उसके नीचे एक समय—
**3:13 AM।**
अर्जुन ने गेंद छोड़ दी।
वह फर्श पर गिरी, लेकिन टूटी नहीं।
उसके भीतर से एक छोटी-सी आवाज़ आई—
“पापा, दरवाज़ा खोलो।”
यह अर्जुन की बचपन की आवाज़ थी।
उसकी अपनी आवाज़।
माँ ने मुँह पर हाथ रख लिया।
बच्चे ने अर्जुन के पास आकर धीरे से कहा—
“तुम्हारे पिता उस रात मुझे बचाने आए थे।”
“तुम कौन हो?”
बच्चे ने अपना चेहरा ऊपर उठाया।
उसकी आँखें अब काली नहीं थीं।
वे अर्जुन जैसी थीं।
“मैं वह हूँ जिसे तुमने मरने के लिए छोड़ दिया था।”
अर्जुन ने काँपती आवाज़ में पूछा, “क्या तुम अभय हो?”
बच्चा कुछ पल उसे देखता रहा।
फिर उसने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“अर्णव?”
“नहीं।”
“ईशान?”
बच्चा हँस पड़ा।
“तुम्हें अब भी लगता है कि नाम से तुम किसी को पहचान लोगे?”
उसने अर्जुन की छाती पर उँगली रखी।
“जिस दिन तुम्हारे पिता मरे, उस दिन उन्होंने मुझे बाहर निकालने की कोशिश की थी। लेकिन दरवाज़ा खुलने से पहले उन्हें एक आवाज़ सुनाई दी।”
“किसकी आवाज़?”
बच्चे ने अर्जुन के पीछे देखा।
“तुम्हारी।”
अर्जुन ने पलटकर देखा।
मुख्य दरवाज़े के पास एक आदमी खड़ा था।
उसने विक्रम शर्मा के कपड़े पहने हुए थे। चेहरा धुँधला था, लेकिन उसकी चाल, उसके कंधों का झुकाव और हाथ में पकड़ी पुरानी घड़ी बिल्कुल विक्रम जैसी थी।
आदमी ने अर्जुन की तरफ देखा।
“बेटा,” उसने कहा, “तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था।”
अर्जुन के होंठ काँपे।
“पापा?”
माँ ने चीखकर कहा, “जवाब मत देना!”
लेकिन अर्जुन पहले ही बोल चुका था।
“पापा, क्या आपने मुझे बचाने के लिए अपनी जान दी थी?”
विक्रम जैसे दिखने वाले आदमी ने सिर झुका लिया।
“मैंने तुम्हें बचाने की कोशिश की थी।”
“किससे?”
उसने धीरे-धीरे चेहरा ऊपर उठाया।
“उस बच्चे से, जो तुम्हारी जगह पैदा हुआ था।”
अर्जुन की साँस अटक गई।
“लेकिन आपने कहा था कि मैं…”
“मैंने तुम्हें कभी कुछ नहीं कहा, बेटा।”
वह आदमी एक कदम आगे बढ़ा।
“मैं 2013 में मर गया था।”
उसने अपनी कलाई दिखाई।
वहाँ तीन काली लकीरें थीं।
“लेकिन जो आदमी मरा, वह मैं नहीं था।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
अर्जुन ने काँपते हुए पूछा, “तो फिर कौन मरा था?”
विक्रम ने उसकी आँखों में देखा।
“वही आदमी, जिसने तुम्हारी पहचान की पुष्टि की थी।”
अर्जुन पीछे हट गया।
“मेरी तरफ से हस्ताक्षर किसने किए?”
विक्रम ने कहा—
“तुमने।”
“लेकिन मैं वहाँ था ही नहीं!”
“तुम वहाँ नहीं थे,” विक्रम ने स्वीकार किया। “लेकिन तुम्हारी परछाईं थी।”
अर्जुन के पैरों के नीचे की परछाईं अचानक लंबी होने लगी।
वह दीवार तक फैल गई।
फिर दीवार से अलग होकर खड़ी हो गई।
उसने अर्जुन की तरफ देखा।
और पहली बार उसकी आवाज़ स्पष्ट थी।
“पापा झूठ बोल रहे हैं, भैया।”
अर्जुन ने अपनी ही परछाईं को देखा।
वह मुस्करा रही थी।
“2013 में जो मरा था, वह पापा नहीं थे।”
परछाईं ने सिर थोड़ा तिरछा किया।
“वह मैं था।”
अर्जुन के मुँह से आवाज़ नहीं निकली।
परछाईं ने आगे कहा—
“और तुम उस रात मेरे मरने की गवाही देने आए थे।”
***
रात के ठीक 3:13 बजे शर्मा निवास की सारी घड़ियाँ रुक गईं।
माँ गायब थीं।
मीरा तीसरी मंज़िल की सीढ़ियों पर खड़ी थी।
लाल गेंद फर्श पर पड़ी थी।
और अर्जुन अपने कमरे के बीचोंबीच बैठा था, हाथ में वह फाइल लिए जो उसे अभिलेखागार से मिली थी।
फाइल का आखिरी पन्ना अब खाली था।
उसने पन्ने को पलटा।
पीछे किसी ने एक नया प्रश्न लिखा था।
**प्रश्न: 17 जुलाई 2013 की रात वास्तव में किसकी मृत्यु हुई थी?**
उसके नीचे उत्तर लिखने के लिए जगह खाली थी।
अर्जुन ने कलम उठाई।
उसने लिखना शुरू किया—
**विक्रम शर्मा।**
स्याही फैल गई।
नाम मिट गया।
उसने फिर लिखा—
**अभय शर्मा।**
कागज़ पर तीन काली लकीरें उभर आईं।
उसने तीसरी बार लिखा—
**अर्जुन शर्मा।**
इस बार कागज़ पर कुछ नहीं बदला।
लेकिन कमरे के बाहर किसी ने धीरे से कहा—
“गलत।”
अर्जुन ने सिर उठाया।
दरवाज़े के नीचे से काली परछाईं भीतर आ रही थी।
वह फर्श पर रेंगती हुई उसके पैरों तक पहुँची और फिर दीवार पर चढ़ गई।
दीवार पर उसका आकार एक आदमी जैसा बन गया।
आदमी ने अपना चेहरा अर्जुन की तरफ घुमाया।
वह विक्रम था।
उसके पीछे एक और आकृति खड़ी थी।
वह शारदा देवी थीं।
और उनके पीछे तीसरा आदमी था, जिसका चेहरा पूरी तरह गायब था।
तीनों ने एक साथ कहा—
“2013 में तीन लोगों की मौत हुई थी।”
अर्जुन ने काँपते हुए पूछा, “कौन-कौन?”
शारदा की आकृति ने जवाब दिया—
“एक आदमी की।”
विक्रम की आकृति बोली—
“एक बच्चे की।”
तीसरी आकृति ने कहा—
“और एक नाम की।”
अर्जुन ने पूछा, “नाम कौन-सा?”
तीनों आकृतियाँ एक साथ मुस्कराईं।
फिर कमरे की दीवार पर खून जैसी लाल स्याही से शब्द उभरने लगे—
**अभय नहीं।**
**अर्णव नहीं।**
**ईशान नहीं।**
**अर्जुन भी नहीं।**
उसके नीचे एक आखिरी पंक्ति लिखी गई—
**“जिसका नाम तुमने कभी नहीं सुना, उसी ने तुम्हारे पिता की मौत पर हस्ताक्षर किए थे।”**
अर्जुन ने पन्ना फाड़ने की कोशिश की।
लेकिन कागज़ उसके हाथ से चिपक गया।
उसी समय दरवाज़े पर दस्तक हुई।
एक।
दो।
तीन।
फिर बाहर से मीरा की आवाज़ आई—
“भैया, दरवाज़ा खोलिए। मैं हूँ।”
अर्जुन दरवाज़े की तरफ बढ़ा।
फिर रुक गया।
उसे बूढ़े अभिलेखागार रक्षक की चेतावनी याद आई—
*अगर अंदर कोई तुम्हें तुम्हारे नाम से बुलाए, तो जवाब मत देना।*
लेकिन मीरा तो बाहर थी।
उसने धीरे से पूछा, “तुम सच में मीरा हो?”
कुछ पल सन्नाटा रहा।
फिर बाहर से आवाज़ आई—
“आपने मुझसे वादा किया था कि कभी अकेला नहीं छोड़ेंगे।”
अर्जुन की आँखों में आँसू आ गए।
उसने कुंडी पर हाथ रखा।
तभी उसके पीछे से एक दूसरी आवाज़ आई—
“भैया, दरवाज़ा मत खोलना।”
अर्जुन ने पलटकर देखा।
कमरे के कोने में एक छोटी लड़की खड़ी थी।
उसने लाल फ्रॉक पहनी थी।
उसके बाल गीले थे।
उसकी आँखें सामान्य थीं।
और उसके पैरों के नीचे एक छोटी-सी परछाईं थी।
वह बिल्कुल वैसी ही दिख रही थी, जैसी अर्जुन को बचपन की तस्वीरों में मीरा याद थी।
लड़की ने काँपते हुए कहा—
“मैं मीरा हूँ।”
दरवाज़े के बाहर खड़ी आवाज़ फिर बोली—
“नहीं, भैया। मैं मीरा हूँ।”
कमरे में खड़ी बच्ची ने सिर हिलाया।
“वह झूठ बोल रही है।”
“तुम दोनों में से असली कौन है?” अर्जुन ने पूछा।
दोनों एक साथ बोलीं—
“मैं।”
फिर कमरे की घड़ी अपने आप चलने लगी।
3:13 से 3:14।
अर्जुन ने पहली बार महसूस किया कि इस बार समय आगे बढ़ा था।
लेकिन उसके साथ कुछ और भी बदल गया था।
दरवाज़े के बाहर खड़ी आवाज़ अचानक बंद हो गई।
कमरे में खड़ी बच्ची भी गायब हो गई।
फर्श पर केवल लाल गेंद बची थी।
अर्जुन ने उसे उठाया।
गेंद के भीतर से किसी आदमी की आवाज़ आई—
“गवाही पूरी हो गई।”
“कौन बोल रहा है?”
“वही, जिसने तुम्हें मरते हुए देखा था।”
“तुम कौन हो?”
कुछ पल तक केवल साँसों की आवाज़ आती रही।
फिर जवाब मिला—
“मैं डॉ. नीलकंठ त्रिवेदी हूँ।”
अर्जुन ने गेंद कसकर पकड़ ली।
“आप तो मर चुके हैं।”
आवाज़ हँसी।
“हाँ। 1995 में।”
“तो आप 2013 की गवाही कैसे दे रहे थे?”
“क्योंकि मैं उस रात वहाँ था।”
“कहाँ?”
“शर्मा निवास में।”
अर्जुन ने साँस रोक ली।
“आपने पापा को मरते हुए देखा था?”
“नहीं।”
“फिर किसे?”
गेंद के भीतर की आवाज़ बहुत धीमी हो गई।
“मैंने तुम्हें देखा था, अर्जुन।”
“मुझे?”
“हाँ। मैंने तुम्हें अपने पिता की लाश के पास खड़े देखा था।”
अर्जुन की आँखें फैल गईं।
“लेकिन मैं वहाँ नहीं था!”
आवाज़ ने कहा—
“मैं जानता हूँ।”
“तो आपने ऐसा क्यों कहा?”
“क्योंकि तुम्हारे चेहरे वाला बच्चा वहाँ खड़ा था।”
कमरे में ठंड फैल गई।
“वह कौन था?”
नीलकंठ की आवाज़ काँपने लगी।
“मैंने उसका नाम पूछा था।”
“उसने क्या कहा?”
लंबी चुप्पी।
फिर गेंद के भीतर से तीन बार दस्तक सुनाई दी।
ठक।
ठक।
ठक।
और आवाज़ आई—
“उसने कहा था—मेरा नाम वही है, जो तुम्हारा था।”
अर्जुन ने गेंद गिरा दी।
वह फर्श पर लुढ़कती हुई आईने के सामने जा रुकी।
आईने में अर्जुन का प्रतिबिंब दिखाई नहीं दे रहा था।
उसकी जगह विक्रम शर्मा खड़े थे।
उनके पीछे डॉ. नीलकंठ।
उनके पीछे शारदा देवी।
और उन तीनों के बीच एक खाली जगह थी।
वह जगह धीरे-धीरे किसी बच्चे के आकार में भरने लगी।
बच्चे ने अपना चेहरा ऊपर उठाया।
वह अर्जुन जैसा दिखता था।
लेकिन उसकी आँखों में कोई डर नहीं था।
उसने आईने के भीतर से अपना हाथ उठाया और काँच पर तीन काली लकीरें खींच दीं।
फिर अपने होंठ हिलाए।
अर्जुन ने आवाज़ नहीं सुनी।
लेकिन वह शब्द पढ़ सकता था—
**“अब मेरी गवाही सुनो।”**
आईने के नीचे अपने आप एक तारीख लिखी गई।
**17 जुलाई 1995।**
और उसके ठीक नीचे—
**“मैं उस रात पैदा नहीं हुआ था।”**
अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।
जब उसने दोबारा आँखें खोलीं, आईने में बच्चा नहीं था।
उसकी जगह एक बूढ़ा आदमी खड़ा था।
वही बूढ़ा आदमी, जो अभिलेखागार के काउंटर पर बैठा था।
उसने काँच के भीतर से मुस्कराकर कहा—
“अर्जुन शर्मा, तुम्हारे पिता की मौत की जाँच अभी शुरू भी नहीं हुई।”
फिर उसने अपनी जेब से एक कागज़ निकाला।
कागज़ पर हस्ताक्षर थे।
**अर्जुन शर्मा।**
और उसके नीचे एक वाक्य—
**“मैंने 17 जुलाई 2013 को अपने पिता की हत्या की गवाही दी थी।”**
अर्जुन ने पीछे हटना चाहा।
लेकिन उसके पैर नहीं हिले।
आईने के भीतर बूढ़ा आदमी आगे झुका।
“अब मुझे बताओ, बेटा…”
उसकी आवाज़ बदलने लगी।
पहले वह विक्रम की आवाज़ बनी।
फिर शारदा की।
फिर मीरा की।
और अंत में अर्जुन की अपनी आवाज़ में बोली—
“अगर तुम वहाँ नहीं थे, तो तुम्हारे हस्ताक्षर किसने किए?”
आईने के भीतर का कमरा अँधेरे से भर गया।
अर्जुन को लगा कि किसी ने पीछे से उसका कंधा पकड़ लिया है।
उसने पलटकर देखा।
वहाँ कोई नहीं था।
लेकिन उसके कंधे पर तीन गीली काली लकीरें थीं।
और कमरे के दरवाज़े के नीचे से एक नया कागज़ भीतर सरक आया।
उस पर केवल एक पंक्ति लिखी थी—
**“अगली गवाही देने वाला व्यक्ति अभी जीवित है।”**
नीचे नाम था—
**मीरा राधा शर्मा।**
अर्जुन ने कागज़ को घूरा।
मीरा का पूरा नाम मीरा राधा शर्मा नहीं था। राधा उसकी माँ का नाम था, लेकिन यह नाम उसके किसी दस्तावेज़ में कभी नहीं लिखा गया था।
फिर भी लिखावट साफ थी।
और उसके नीचे किसी ने लाल स्याही से जोड़ दिया था—
**“वह जानती है कि 2013 में कौन मरा था। उससे पूछना कि उसने अपने पिता को आखिरी बार कब देखा।”**
अर्जुन ने धीरे से दरवाज़ा खोला।
गलियारा खाली था।
लेकिन सीढ़ियों से नीचे जाते हुए उसे किसी के रोने की आवाज़ सुनाई दी।
वह आवाज़ मीरा की थी।
और वह कह रही थी—
“माँ, मैंने उसे नहीं चुना था।”
फिर दूसरी आवाज़ आई।
राधा की।
“लेकिन तुमने उसे नाम दिया था।”
मीरा ने रोते हुए पूछा—
“तो अब मैं क्या करूँ?”
राधा की आवाज़ ने जवाब दिया—
“अब उसे सच बताओ।”
एक लंबा सन्नाटा छा गया।
फिर राधा ने आखिरी वाक्य कहा—
**“उसे बता दो कि 2013 में मरने वाला विक्रम नहीं था। उस रात मीरा का पिता मरा था।”**
अर्जुन सीढ़ियों पर जम गया।
मीरा का पिता?
राधा का पति?
या कोई तीसरा आदमी, जिसे सबने विक्रम समझ लिया था?
उसने नीचे झाँका।
सीढ़ियों के आखिरी पायदान पर एक आदमी खड़ा था।
उसका चेहरा अँधेरे में छिपा था।
लेकिन उसकी कलाई पर तीन काली लकीरें थीं।
आदमी ने सिर उठाया।
“अर्जुन,” उसने कहा, “तुम्हें अपने पिता की मौत का सच चाहिए न?”
वह एक कदम आगे आया।
“तो पहले यह पता लगाओ कि मीरा का असली पिता कौन था।”
उसके पीछे घर का मुख्य दरवाज़ा अपने आप खुल गया।
बाहर घना अँधेरा था।
और उस अँधेरे से एक बच्चे की आवाज़ आई—
“भैया, इस बार मैं तुम्हें बचाने नहीं आया।”
फिर तीन दस्तकें सुनाई दीं।
पहली दरवाज़े पर।
दूसरी आईने के भीतर।
और तीसरी अर्जुन के सीने के अंदर।
**एपिसोड 14 समाप्त।**
- Writer
- firoj saifi
- Story
- “अंधेरे में कोई है”
- Chapter
- 14 of 14
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 36 min
- Words
- 7018
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
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