Pretika › Ghost Stories › “अंधेरे में कोई है”
एपिसोड 13: आईने में कैद तीसरा बच्चा
firoj saifi · Ghost Stories · 27 मिनट
1. जब परछाईं ने हाथ बढ़ाया
तीसरी मंज़िल पर घड़ी की सुइयाँ 3:13 पर रुक गई थीं।
कमरे में अर्जुन अकेला खड़ा था।
कम-से-कम उसे ऐसा ही लग रहा था।
उसकी माँ दरवाज़े के पास थीं। उनके हाथ में वह पुरानी तस्वीर थी, जिसमें तीन पालनों के सामने एक ऐसा आदमी खड़ा था, जिसका चेहरा अर्जुन जैसा था। आईने के भीतर एक बच्चा था। फर्श पर लाल गेंद पड़ी थी। और अर्जुन की परछाईं, जो कुछ देर पहले तक उसके पैरों के नीचे थी, अब आईने के भीतर खड़ी थी।
वह परछाईं अर्जुन की तरह साँस नहीं ले रही थी।
उसकी छाती स्थिर थी।
फिर भी आईने की सतह पर भाप जम रही थी, जैसे भीतर कोई बहुत देर से दौड़कर आया हो।
परछाईं ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
आईने की सतह पर एक गोल लहर उठी।
अर्जुन ने अनायास अपना हाथ पीछे खींच लिया।
“इसे मत छूना,” माँ ने कहा।
“लेकिन यह मेरी परछाईं है!”
“नहीं, बेटा।”
माँ की आवाज़ में ऐसा भय था कि अर्जुन उनकी तरफ मुड़ गया।
“आपने अभी कहा था कि यह मेरे अंदर है। अब कह रही हैं कि यह मेरी परछाईं नहीं है। आखिर सच क्या है?”
माँ ने जवाब देने से पहले दरवाज़े की तरफ देखा।
“सच हमेशा एक ही नहीं होता, अर्जुन। कभी-कभी सच वह होता है, जिसे हम देख सकते हैं। कभी वह, जिसे हम याद रखते हैं। और कभी वह, जिसे हम याद रखने से डरते हैं।”
“मुझे पहेलियाँ नहीं चाहिएँ!”
अर्जुन की आवाज़ कमरे में गूँज गई।
“मैं जानना चाहता हूँ कि मैं कौन हूँ। मेरा जन्म कैसे हुआ। अभय कौन था। अर्णव कौन था। और यह तीसरा बच्चा कौन है, जो हर जगह मेरा चेहरा लेकर खड़ा रहता है!”
आईने के भीतर बच्चा मुस्कराया।
“तुम्हें लगता है कि तुम तीनों अलग-अलग हो?”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“क्या मतलब है तुम्हारा?”
बच्चे ने अपनी हथेली आईने पर रखी।
“अगर मैं तुमसे कहूँ कि हम तीन नहीं हैं, तो?”
“तो मैं कहूँगा कि तुम झूठ बोल रहे हो।”
“और अगर मैं कहूँ कि हम एक ही हैं?”
अर्जुन चुप हो गया।
बच्चे की आँखें धीरे-धीरे काली होने लगीं।
“तब तुम किसे झूठा कहोगे, भैया?”
माँ अचानक आईने के सामने आ गईं।
“चुप रहो!”
बच्चे की मुस्कान गायब हो गई।
“तुम अब भी मुझे पहचानती हो?”
माँ ने काँपते हुए कहा, “मैं तुम्हें पहचानना नहीं चाहती।”
“लेकिन तुमने मुझे गोद में लिया था।”
“मैंने तुम्हें नहीं उठाया था।”
“तुमने मुझे अपना दूध पिलाया था।”
“नहीं!”
“तुमने मुझे अपना नाम दिया था।”
माँ की आँखों से आँसू बहने लगे।
“मैंने तुम्हें कोई नाम नहीं दिया!”
बच्चे ने अपना चेहरा आईने के बिल्कुल करीब कर लिया।
“तो फिर तुम्हारी गोद में कौन था?”
माँ के होंठ काँपने लगे।
वह कुछ कहना चाहती थीं, मगर उनके मुँह से आवाज़ नहीं निकली।
अर्जुन ने उनका कंधा पकड़ा।
“माँ, मेरी तरफ देखिए।”
उन्होंने उसकी तरफ देखा।
“उसकी बात मत सुनना,” वह फुसफुसाईं। “वह हर सच को ऐसे बताता है कि अंत में तुम्हें अपने ही ऊपर शक होने लगे।”
“तो आप सच बताइए।”
माँ ने सिर झुका लिया।
“मैं नहीं बता सकती।”
अर्जुन ने उनका हाथ छोड़ दिया।
“या आप बताना नहीं चाहतीं?”
उसी क्षण आईने के भीतर खड़ी परछाईं ने अपनी उँगलियाँ मोड़ीं।
काँच पर पाँच लंबी दरारें उभर आईं।
अर्जुन ने पीछे हटते हुए देखा कि दरारों के बीच से एक काला हाथ बाहर निकल रहा था।
उस हाथ की कलाई पर तीन रेखाएँ थीं।
माँ ने अर्जुन को खींचकर पीछे कर लिया।
“नीचे चलो!”
लेकिन देर हो चुकी थी।
आईने के भीतर से आवाज़ आई—
“अर्णव!”
कमरे की सारी बत्तियाँ बुझ गईं।
अर्जुन को लगा जैसे किसी ने उसके सीने के भीतर हाथ डालकर उसकी धड़कन पकड़ ली हो।
फिर अँधेरे में दूसरी आवाज़ गूँजी।
वह आवाज़ उसकी अपनी थी।
“अभय!”
अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।
और तीसरी आवाज़ आई—
“ईशान!”
अगले ही पल घड़ी की सुइयाँ चलने लगीं।
3:14।
3:15।
3:16।
आईने की दरारें गायब थीं।
काला हाथ गायब था।
बच्चा गायब था।
लेकिन अर्जुन की परछाईं अब भी आईने के भीतर खड़ी थी।
और इस बार उसके हाथ में लाल गेंद थी।
उसने गेंद उठाई, अर्जुन की तरफ देखा और बिना आवाज़ के होंठ हिलाए।
**एक नाम अभी बाकी है।**
***
### 2. वह तस्वीर जिसमें माँ नहीं थीं
अर्जुन अपनी माँ के पीछे-पीछे तीसरी मंज़िल से नीचे उतरा।
माँ बार-बार पीछे मुड़कर देख रही थीं। उनके हाथ में पकड़ी तस्वीर काँप रही थी। सीढ़ियों पर पहुँचते ही उन्होंने तस्वीर अपने सीने से लगा ली।
“आपने मुझे उस कमरे में क्यों ले गईं?” अर्जुन ने पूछा।
“मैंने तुम्हें वहाँ नहीं ले जाना चाहा था।”
“लेकिन आप मेरे साथ थीं।”
“क्योंकि मुझे डर था कि अगर तुम वहाँ अकेले गए, तो वह तुम्हें बाहर नहीं आने देगा।”
अर्जुन रुक गया।
“कौन?”
माँ ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हारी परछाईं।”
अर्जुन ने कड़वी हँसी हँसी।
“वह मेरी परछाईं है या कोई दूसरा बच्चा? हर बार कहानी बदल जाती है।”
माँ ने जवाब नहीं दिया।
वे बैठक में पहुँचे। बाहर का आकाश धूसर था। सुबह की धूप जाने कहाँ गायब हो चुकी थी, जबकि घड़ी के अनुसार अभी साढ़े नौ ही बजे थे।
माँ ने मेज पर तस्वीर रख दी।
“तुम्हें याद है, बचपन में तुम्हारी कोई तस्वीर तीसरी मंज़िल पर नहीं लगाई जाती थी?”
अर्जुन ने सोचा।
“दादी कहती थीं कि पुराने फोटो खराब हो जाते हैं।”
“वह झूठ था।”
“फिर असली वजह क्या थी?”
माँ ने तस्वीर उसकी तरफ सरका दी।
“तुम्हारे पिता को डर था कि कोई तस्वीर तुम्हारी परछाईं को पूरी तरह पहचान देगी।”
अर्जुन ने तस्वीर उठाई।
वह अस्पताल के कमरे की तस्वीर थी। तीन पालने, एक मेज और दीवार पर लटका आईना। सामने विक्रम शर्मा खड़े थे। उनके हाथ में एक नवजात बच्चा था।
लेकिन तस्वीर में एक अजीब बात थी।
विक्रम के हाथ में बच्चा था, फिर भी बच्चे की कोई परछाईं नहीं थी।
कमरे में मौजूद बाकी सभी चीज़ों की परछाइयाँ थीं। मेज की, कुर्सी की, खिड़की की। यहाँ तक कि विक्रम के हाथ की भी।
लेकिन बच्चे की नहीं।
“यह कौन है?” अर्जुन ने पूछा।
माँ ने तस्वीर को ध्यान से देखा।
“मुझे नहीं पता।”
“आपने कहा था कि आप अस्पताल में थीं।”
“मैं थी।”
“आपको याद नहीं कि विक्रम किस बच्चे को घर लाए थे?”
माँ ने बहुत धीरे से सिर हिलाया।
“मुझे याद है कि मैंने बच्चे को देखा था। लेकिन मुझे उसका चेहरा याद नहीं।”
अर्जुन ने तस्वीर पलटी।
पीछे पेंसिल से लिखा था—
**पहली तस्वीर — माँ के बिना।**
उसने माँ की तरफ देखा।
“इसका क्या मतलब है?”
माँ ने तस्वीर अपने हाथ में ली।
उनकी आँखों में अचानक ऐसा भाव उभरा, जैसे कोई पुराना घाव फिर से खुल गया हो।
“तुम्हारे पिता ने यह तस्वीर मुझे दिखाई थी। उन्होंने कहा था कि यह उस रात की पहली तस्वीर है।”
“और दूसरी?”
माँ ने तस्वीर को रोशनी की तरफ उठाया।
“दूसरी तस्वीर में मैं थी।”
“वह कहाँ है?”
माँ कुछ क्षण चुप रहीं।
फिर उन्होंने अपने ब्लाउज़ के भीतर से एक छोटी चाबी निकाली।
“तुम्हारे पिता ने दूसरी तस्वीर को अपने कमरे में छिपाया था। उनकी मृत्यु के बाद मैंने वह कमरा कभी नहीं खोला।”
अर्जुन ने चाबी ले ली।
“कहाँ है वह कमरा?”
“पुरानी बैठक के पीछे। जहाँ तुम्हारे पिता की किताबें रखी हैं।”
अर्जुन तुरंत उठ खड़ा हुआ।
“आप मेरे साथ चलेंगी?”
माँ ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“क्यों?”
उन्होंने उसकी तरफ देखा।
“क्योंकि उस कमरे में जो कुछ है, उसे देखकर शायद तुम्हें मुझसे नफरत हो जाए।”
अर्जुन कुछ देर उन्हें देखता रहा।
“माँ, अगर आप सच बता देंगी, तो शायद नफरत नहीं होगी।”
माँ ने आँखें बंद कर लीं।
“बेटा, कुछ सच ऐसे होते हैं, जिन्हें बताने से पहले इंसान को खुद यकीन करना पड़ता है कि वह सच हैं।”
अर्जुन ने चाबी उठाई और पुराने कमरे की तरफ चला गया।
पीछे से माँ की आवाज़ आई—
“और अर्जुन?”
वह रुका।
“अगर तस्वीर में तुम्हें दो बच्चे दिखाई दें, तो तीसरे को मत ढूँढ़ना।”
अर्जुन ने पलटकर देखा।
माँ की आँखों में आँसू थे।
“क्योंकि तीसरा बच्चा तस्वीर में कभी था ही नहीं।”
***
### 3. विक्रम का बंद कमरा
पुरानी बैठक के पीछे एक छोटा कमरा था, जहाँ कभी विक्रम शर्मा किताबें पढ़ते थे।
कमरे का दरवाज़ा वर्षों से बंद था। लकड़ी पर धूल जम चुकी थी और नीचे की दरार से मकड़ी के जाले बाहर निकले हुए थे।
अर्जुन ने चाबी ताले में लगाई।
ताला पहली कोशिश में नहीं खुला।
दूसरी कोशिश में उसने हल्का-सा घूमकर आवाज़ की।
तीसरी कोशिश में ताला खुल गया।
दरवाज़ा खोलते ही बासी हवा का झोंका बाहर आया।
कमरे में लकड़ी की अलमारियाँ थीं। दीवार पर पुराने नक्शे लगे थे। मेज पर किताबें रखी थीं, जिनके पन्ने नमी से फूल गए थे। एक कोने में लोहे की छोटी तिजोरी थी।
अर्जुन ने सबसे पहले मेज की दराज़ें देखीं।
पहली में पुराने बिल थे।
दूसरी में कुछ खत।
तीसरी में अस्पताल की रसीदें।
हर रसीद पर 1995 की तारीख थी।
लेकिन एक रसीद पर 2008 लिखा था।
**17 जुलाई 2008।**
वस्तु: चाँदी का दर्पण-फ्रेम।
भुगतानकर्ता: विक्रम शर्मा।
नीचे एक वाक्य था—
**पुराने फ्रेम को दोबारा जोड़ने के लिए।**
अर्जुन ने रसीद मोड़कर जेब में रख ली।
फिर वह तिजोरी के पास गया।
उस पर कोई ताला नहीं था। केवल एक छोटा गोल छेद था, जिसके चारों ओर तीन रेखाएँ बनी थीं।
अर्जुन ने 313 वाली चाबी लगाने की कोशिश की।
चाबी अंदर चली गई, लेकिन घूमी नहीं।
तभी उसके पीछे से आवाज़ आई—
“तुम्हें यह नहीं खोलना चाहिए।”
अर्जुन पलटा।
कमरे के दरवाज़े पर एक लड़का खड़ा था।
वह लगभग तेरह साल का दिखाई देता था। उसके कपड़े पुराने थे, जैसे 2008 में बच्चे पहनते थे। उसके बाल माथे पर बिखरे हुए थे और आँखों के नीचे काले निशान थे।
अर्जुन उसे पहचानता था।
उसने उस बच्चे को कई बार आईने में देखा था।
“तुम फिर आ गए,” अर्जुन ने कहा।
बच्चे ने जवाब दिया, “मैं कहीं गया ही नहीं था।”
“तुम कौन हो?”
“तुम्हें मेरा नाम पता है।”
“अभय?”
बच्चे ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“अर्णव?”
फिर सिर हिलाया।
“नहीं।”
अर्जुन ने दाँत भींच लिए।
“तो फिर अपना नाम बताओ!”
बच्चे ने अपनी हथेली खोली।
उस पर तीन काली रेखाएँ थीं।
“नाम कोई बताता नहीं, अर्जुन। नाम किसी को दिया जाता है।”
“किसने तुम्हें नाम दिया?”
बच्चा मुस्कराया।
“तुमने।”
अर्जुन का सिर दर्द से फटने लगा।
उसके सामने कुछ दृश्य चमकने लगे।
एक अँधेरा कमरा।
छोटा-सा बच्चा।
दीवार पर आईना।
तेरह साल का अर्जुन, जो घुटनों के बल बैठा था।
बच्चा रो रहा था।
“तुम्हारा नाम क्या है?” अर्जुन पूछ रहा था।
बच्चे ने सिर हिलाया।
“मुझे नाम नहीं दिया गया।”
“तो मैं तुम्हें नाम दूँगा।”
“कौन-सा?”
अर्जुन ने कुछ कहा।
लेकिन जैसे ही वह शब्द उसके होंठों तक पहुँचा, दृश्य टूट गया।
वर्तमान में लौटकर अर्जुन ने दीवार पकड़ ली।
बच्चा अब भी उसके सामने खड़ा था।
“याद आया?”
अर्जुन ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“तुम्हें याद आएगा।”
“तुम मुझसे क्या चाहते हो?”
बच्चे ने तिजोरी की तरफ देखा।
“उसके अंदर मेरी पहली तस्वीर है।”
“तुम्हारी?”
“नहीं। तुम्हारी।”
अर्जुन ने तिजोरी की तरफ देखा।
“तुम मेरी तस्वीर अंदर क्यों रखवाना चाहते हो?”
बच्चे ने कहा, “क्योंकि तस्वीर में तुम्हारा चेहरा है। लेकिन शरीर मेरा है।”
अर्जुन ने चाबी घुमाने की कोशिश की।
इस बार तिजोरी का ताला खुल गया।
अंदर एक पुराना लिफाफा था, एक काला कपड़ा और लकड़ी का छोटा डिब्बा।
अर्जुन ने लिफाफा खोला।
उसमें एक तस्वीर थी।
तस्वीर में दो बच्चे एक साथ खड़े थे।
दोनों के चेहरे बिल्कुल एक जैसे थे।
एक बच्चा रो रहा था।
दूसरा मुस्करा रहा था।
उनके पीछे राधा खड़ी थीं।
लेकिन राधा की गोद खाली थी।
तस्वीर के पीछे लिखा था—
**जुड़वाँ नहीं। एक बच्चा और उसका प्रतिबिंब।**
अर्जुन के हाथ काँपने लगे।
उसने तस्वीर बच्चे की तरफ उठाई।
“यह तुम हो?”
बच्चे ने कहा, “यह हम हैं।”
“तुम और मैं?”
“तुम्हें अब भी लगता है कि हम अलग हैं?”
अर्जुन ने तस्वीर को पलटकर फिर देखा।
दोनों बच्चों की कलाई पर तीन-तीन काली रेखाएँ थीं।
फिर उसने ध्यान दिया कि तस्वीर के पीछे तारीख लिखी थी—
**17 जुलाई 1995।**
और सबसे नीचे एक नाम था, जिसे किसी ने खरोंचकर मिटा दिया था।
अर्जुन ने उँगली से कागज़ छुआ।
नाम के नीचे दबाव से बने अक्षर अब भी महसूस हो रहे थे।
वह नाम पढ़ने की कोशिश कर रहा था, तभी कमरे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।
बच्चे ने कहा—
“अब तुम्हें वह तस्वीर देखनी चाहिए, जिसमें माँ भी थीं।”
***
### 4. दूसरी तस्वीर
अर्जुन ने मेज पर रखा काला कपड़ा हटाया।
उसके नीचे एक पुराना फोटो-फ्रेम था।
काँच टूट चुका था। फ्रेम के किनारों पर चाँदी जैसी धातु जमी थी। पीछे की लकड़ी पर छोटे-छोटे निशान थे, जैसे किसी ने नाखूनों से उसे खुरचा हो।
अर्जुन ने फ्रेम खोला।
अंदर दूसरी तस्वीर थी।
इस बार कमरे में राधा थीं।
विक्रम शर्मा भी थे।
शारदा देवी उनके पीछे खड़ी थीं।
तीन पालने सामने रखे थे।
पहले पालने में एक बच्चा था।
दूसरे में भी एक बच्चा था।
तीसरा पालना खाली था।
लेकिन तस्वीर की सबसे अजीब बात यह थी कि खाली पालने के सामने एक औरत खड़ी थी।
उसका चेहरा तस्वीर में दिखाई नहीं दे रहा था।
वह कैमरे की तरफ पीठ करके खड़ी थी।
उसके पैरों के नीचे कोई परछाईं नहीं थी।
अर्जुन ने तस्वीर को रोशनी में किया।
“यह औरत कौन है?”
पीछे खड़े बच्चे ने जवाब दिया, “वह तुम्हारी माँ नहीं है।”
“तो फिर कौन है?”
“वह माँ है, जिसने तीसरे बच्चे को जन्म दिया।”
अर्जुन ने फिर तस्वीर देखी।
“लेकिन उसका चेहरा क्यों नहीं है?”
“क्योंकि उस समय तक किसी ने उसे पहचान नहीं दी थी।”
“क्या मतलब?”
बच्चा धीरे-धीरे उसके करीब आया।
“तुम्हें लगता है कि चेहरा पहचान का सबूत होता है। लेकिन आईने के पीछे चेहरा बदलना सबसे आसान चीज़ है। नाम बदलना मुश्किल है। और किसी की जगह लेना उससे भी मुश्किल।”
अर्जुन ने तस्वीर रख दी।
“तुम मुझे सच क्यों नहीं बता देते?”
बच्चे ने उसकी तरफ देखा।
“क्योंकि अगर मैं तुम्हें सब बता दूँगा, तो तुम वह गलती फिर करोगे, जो तुमने 2008 में की थी।”
“मैंने क्या गलती की थी?”
“तुमने दरवाज़ा खोला था।”
“किसका दरवाज़ा?”
“मेरे लिए।”
अर्जुन ने गुस्से से कहा, “मैं तेरह साल का था! मुझे कुछ पता नहीं था!”
“तुम्हें इतना पता था कि कोई तुम्हें बुला रहा है।”
“किसने बुलाया था?”
बच्चा कुछ पल चुप रहा।
फिर उसने कहा, “तुम्हारी माँ ने।”
अर्जुन का चेहरा बदल गया।
“मेरी माँ ने?”
“उस औरत ने, जिसे तुम माँ कहते हो।”
“तुम झूठ बोल रहे हो!”
बच्चे ने सिर झुका लिया।
“शायद।”
“शायद?”
“मुझे भी नहीं पता कि उस रात वह तुम्हारी माँ थीं या किसी और की माँ।”
अर्जुन ने तस्वीर उठाई और उसे दीवार पर दे मारा।
काँच टूट गया।
तस्वीर फर्श पर गिर गई।
बच्चे ने आँखें बंद कर लीं।
“तुमने फिर वही किया।”
“क्या?”
“तस्वीर तोड़ दी।”
अर्जुन ने नीचे देखा।
तस्वीर के काँच के टुकड़े फर्श पर बिखरे थे।
लेकिन तस्वीर नहीं टूटी थी।
उसमें खड़े तीनों लोग गायब हो चुके थे।
अब तस्वीर में केवल अर्जुन था।
वह तेरह साल का था और तीसरी मंज़िल के आईने के सामने खड़ा था।
उसके पीछे एक बच्चा था, जिसकी आँखें काली थीं।
तस्वीर के नीचे लिखा था—
**17 जुलाई 2008।**
और उसके पीछे एक वाक्य—
**उस रात अर्जुन ने दरवाज़ा नहीं खोला था।**
**दरवाज़े ने अर्जुन को खोला था।**
अर्जुन ने तस्वीर छोड़ दी।
बच्चे ने धीरे से कहा, “अब तुम्हें समझ में आया?”
अर्जुन की आवाज़ काँप रही थी।
“नहीं।”
“तुम्हारे पास अभी भी समय है।”
“किसलिए?”
बच्चे ने दरवाज़े की तरफ देखा।
“तिजोरी के नीचे एक और दराज़ है।”
अर्जुन ने झुककर देखा।
तिजोरी के निचले हिस्से में लकड़ी की एक पतली पट्टी थी। उसने उसे खींचा।
एक गुप्त दराज़ बाहर आ गई।
उसके भीतर एक छोटी कैसेट और एक कागज़ रखा था।
कागज़ पर शारदा देवी की लिखावट थी।
**अगर यह रिकॉर्डिंग अर्जुन सुने, तो उसे अकेले मत सुनने देना।**
अर्जुन ने कैसेट उठाई।
उसके हाथ काँप रहे थे।
“इसे कहाँ चलाऊँ?”
बच्चे ने कमरे के कोने में रखे पुराने टेप रिकॉर्डर की तरफ इशारा किया।
“वहीं।”
अर्जुन ने कैसेट डाल दी।
कुछ क्षण खरखराहट सुनाई दी।
फिर शारदा देवी की आवाज़ उभरी।
“17 जुलाई 1995। रात के तीन बजकर तेरह मिनट।”
एक लंबी साँस।
“अगर कोई यह रिकॉर्डिंग सुन रहा है, तो इसका मतलब है कि हम तीसरे बच्चे को रोक नहीं पाए।”
फिर विक्रम की आवाज़ आई।
“माँ, रिकॉर्डिंग बंद कर दीजिए।”
शारदा देवी ने जवाब दिया, “नहीं। किसी को तो सच जानना होगा।”
रिकॉर्डिंग में कुछ गिरने की आवाज़ आई।
फिर एक बच्चे का रोना।
शारदा देवी ने कहा—
“पहला बच्चा साँस ले रहा है।”
विक्रम ने कहा, “दूसरे की धड़कन नहीं है।”
“और तीसरा?”
कुछ सेकंड चुप्पी रही।
फिर शारदा देवी की आवाज़ काँपी।
“तीसरा बच्चा अभी पैदा नहीं हुआ।”
विक्रम ने कहा, “तो यह रो कौन रहा है?”
रिकॉर्डिंग में बच्चे का रोना तेज हो गया।
फिर एक औरत की आवाज़ सुनाई दी।
“मेरा बच्चा मुझे दे दो।”
शारदा देवी ने पूछा, “तुम कौन हो?”
औरत ने जवाब दिया—
“मैं उसकी माँ हूँ।”
अगले ही पल रिकॉर्डिंग में किसी के चीखने की आवाज़ आई।
टेप अचानक बंद हो गया।
अर्जुन ने कैसेट बाहर निकाली।
उसके पीछे एक छोटा कागज़ चिपका हुआ था।
उस पर लिखा था—
**राधा की आवाज़ नहीं थी।**
अर्जुन ने पीछे खड़े बच्चे की तरफ देखा।
“तो फिर किसकी थी?”
बच्चे ने जवाब दिया—
“जिसे तुम्हारी माँ ने कभी देखा ही नहीं।”
### 5. वह कमरा जो घर में नहीं था
अर्जुन कमरे से बाहर निकलने लगा, लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला।
उसने कुंडी घुमाई।
दरवाज़ा बंद था।
“खोलो!”
बच्चा चुपचाप खड़ा रहा।
अर्जुन ने दरवाज़े पर मुक्का मारा।
“दरवाज़ा खोलो!”
पीछे से आवाज़ आई, “तुम्हें अभी जाना नहीं चाहिए।”
अर्जुन पलटा।
बच्चा अब कमरे के बीचोंबीच खड़ा था।
“तुम कौन हो?” अर्जुन ने पूछा।
“तुम्हें मेरा नाम याद नहीं है?”
“नहीं!”
“तो अपनी यादें देखो।”
बच्चे ने हाथ उठाया।
कमरे की दीवारें काँपने लगीं।
अलमारियाँ लंबी होती चली गईं। मेज पीछे खिसक गई। खिड़की की जगह एक दूसरा दरवाज़ा दिखाई देने लगा।
उस दरवाज़े पर सफेद अक्षरों में लिखा था—
**कमरा 313।**
अर्जुन ने पीछे हटते हुए पूछा, “यह क्या है?”
बच्चे ने कहा, “वह कमरा, जिसमें तुम्हारा जन्म नहीं हुआ था।”
“लेकिन मेरे जन्म का समय 3:13 है!”
“समय तुम्हारा हो सकता है। जन्म नहीं।”
अर्जुन ने दरवाज़े की तरफ देखा।
उसके नीचे से लाल रोशनी निकल रही थी।
वही लाल रोशनी, जो बचपन में तीसरी मंज़िल के कमरे के नीचे से दिखाई देती थी।
“इसके पीछे क्या है?”
बच्चे ने कहा, “वह रात, जिसे तुम्हारी दादी ने यादों से मिटा दिया था।”
अर्जुन ने दरवाज़े का हैंडल पकड़ा।
वह बर्फ जैसा ठंडा था।
उसने दरवाज़ा खोला।
अंदर एक अस्पताल का कमरा था।
दीवारें सफेद थीं। छत से एक पीली रोशनी लटक रही थी। कमरे के बीचोंबीच तीन पालने रखे थे।
एक पालने में बच्चा सो रहा था।
दूसरे में बच्चा रो रहा था।
तीसरा खाली था।
अर्जुन धीरे-धीरे कमरे में दाखिल हुआ।
उसे दीवार पर लगा कैलेंडर दिखाई दिया।
जुलाई 1995।
17 तारीख पर लाल गोला बना था।
पास में एक घड़ी थी।
3:13.
अर्जुन ने पहले पालने में झाँका।
उसमें एक नवजात शिशु था।
उसकी आँखें बंद थीं। उसके सीने पर सफेद कपड़ा रखा था।
दूसरे पालने में एक बच्चा रो रहा था।
उसकी कलाई पर अस्पताल की पट्टी थी।
**अभय शर्मा।**
अर्जुन ने तीसरे पालने की तरफ देखा।
वह खाली था।
लेकिन उसके भीतर एक परछाईं हिल रही थी।
अर्जुन पीछे हट गया।
परछाईं धीरे-धीरे उठी।
पहले उसका सिर दिखाई दिया।
फिर कंधे।
फिर हाथ।
वह किसी बच्चे की आकृति थी।
उसके चेहरे की जगह अँधेरा था।
अर्जुन ने फुसफुसाकर पूछा, “तुम कौन हो?”
परछाईं ने जवाब दिया—
“मैं वह हूँ, जिसे किसी ने जन्म देने से पहले ही खो दिया था।”
“तुम्हारी माँ कौन है?”
“जिसने मुझे चाहा था।”
“और तुम्हारे पिता?”
परछाईं चुप रही।
फिर उसने दूसरे पालने की तरफ इशारा किया।
“वह।”
अर्जुन ने अभय वाले पालने की तरफ देखा।
बच्चा अब रो नहीं रहा था।
वह आँखें खोलकर अर्जुन को देख रहा था।
अर्जुन ने धीरे से कहा, “अभय?”
बच्चे ने मुस्कराकर हाथ बढ़ाया।
जैसे वह अर्जुन को पहचानता हो।
जैसे वह बरसों से उसका इंतज़ार कर रहा हो।
लेकिन तभी पीछे से एक औरत की आवाज़ आई।
“उसके पास मत जाना।”
अर्जुन पलटा।
दरवाज़े पर उसकी माँ खड़ी थीं।
लेकिन वह वैसी नहीं दिख रही थीं, जैसी अब थीं।
उनका चेहरा जवान था। बाल खुले थे। उन्होंने सफेद साड़ी पहन रखी थी।
वह 1995 की उसकी माँ थीं।
“बेटा,” उन्होंने कहा, “उस पालने में जो बच्चा है, वह तुम्हारा भाई नहीं है।”
अर्जुन ने पूछा, “तो फिर कौन है?”
औरत ने खाली पालने की तरफ देखा।
“वह तुम्हारी जगह लेने आया था।”
अर्जुन ने कहा, “और मैं कौन हूँ?”
औरत की आँखों में आँसू आ गए।
“तुम वह बच्चा हो, जिसे मैंने बचाने की कोशिश की थी।”
अर्जुन ने आगे बढ़कर उनका हाथ पकड़ना चाहा।
लेकिन उसका हाथ उनके शरीर से आर-पार निकल गया।
वह एक स्मृति थी।
एक पुरानी छवि।
या कोई ऐसी चीज़, जो स्मृति का रूप लेकर उसे बुला रही थी।
औरत ने कहा, “अगर तुम सच जानना चाहते हो, तो उस बच्चे से पूछो कि उसने पहली बार आँखें कब खोली थीं।”
अर्जुन ने खाली पालने की तरफ देखा।
परछाईं गायब हो चुकी थी।
अब पालने में एक बच्चा लेटा था।
उसके चेहरे पर अर्जुन की शक्ल थी।
बच्चे ने आँखें खोलीं।
उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।
“जब तुमने मुझे देखा था,” उसने कहा।
फिर कमरे की सारी बत्तियाँ बुझ गईं।
अर्जुन ने महसूस किया कि कोई उसे पीछे से खींच रहा है।
उसने हाथ बढ़ाकर पालने को पकड़ना चाहा।
लेकिन पालना दूर खिसक गया।
अँधेरे में बच्चे की आवाज़ गूँजी—
“तुम्हारा जन्म तब हुआ था, जब मैंने पहली बार तुम्हारी आँखों से दुनिया देखी थी।”
***
### 6. दादी का तीसरा नाम
अर्जुन की आँखें खुलीं तो वह विक्रम के बंद कमरे में फर्श पर पड़ा था।
टेप रिकॉर्डर बंद था।
कैसेट मेज पर रखी थी।
तिजोरी खुली थी।
और कमरा फिर वैसा ही था, जैसा कुछ मिनट पहले था।
उसके माथे पर पसीना था। हाथ काँप रहे थे।
वह तुरंत दरवाज़े की तरफ भागा।
इस बार दरवाज़ा आसानी से खुल गया।
बाहर बैठक में मीरा खड़ी थी।
“भैया!”
उसने अर्जुन को संभाला।
“तुम यहाँ क्या कर रहे थे? मैं तुम्हें पूरे घर में ढूँढ़ रही थी!”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“तुम यहाँ कब आईं?”
“अभी। कुछ मिनट पहले।”
“तुमने मुझे कमरे में जाते देखा था?”
“नहीं।”
अर्जुन ने अपनी जेब टटोली।
तस्वीर थी।
कैसेट थी।
और वह कागज़ भी था, जिस पर लिखा था—
**राधा की आवाज़ नहीं थी।**
उसने सब कुछ मीरा को दिखाया।
मीरा ने कैसेट का लेबल देखा।
“यह रिकॉर्डिंग तुमने सुनी?”
“हाँ।”
“और तुमने तीन पालने देखे?”
अर्जुन ने सिर हिलाया।
मीरा की आँखें भर आईं।
“मैंने भी तीन पालने देखे थे।”
“कहाँ?”
“2008 में।”
अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मुझे सब बताओ।”
मीरा ने कहा, “उस रात जब मैं तीसरी मंज़िल पर गई थी, मुझे एक छोटा कमरा दिखाई दिया था। वहाँ तीन पालने थे। पहले में कोई बच्चा नहीं था। दूसरे में तुम थे। तीसरे में एक बच्चा था, जिसका चेहरा नहीं था।”
“तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?”
“क्योंकि मुझे लगा था कि वह सपना था।”
“फिर?”
“फिर उस बच्चे ने मुझसे कहा कि अगर मैंने उसका नाम किसी को बताया, तो वह मेरी माँ को वापस ले जाएगा।”
अर्जुन ने पूछा, “तुमने उसका नाम बताया?”
मीरा ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“तो फिर राधा कहाँ गईं?”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
“मुझे नहीं पता।”
अर्जुन ने कहा, “लेकिन उस बच्चे ने तुम्हारी माँ को ले जाने की धमकी दी थी।”
“हाँ।”
“और अब तुम मेरे साथ हो।”
मीरा ने उसका हाथ छोड़ दिया।
“तुम कहना क्या चाहते हो?”
अर्जुन कुछ पल चुप रहा।
“मुझे नहीं पता कि तुम सच में मीरा हो या नहीं।”
मीरा का चेहरा उतर गया।
“भैया...”
“मुझे माफ करना। लेकिन मुझे यह जानना होगा।”
मीरा की आँखों से आँसू बहने लगे।
“तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हारी जगह लेने आई हूँ?”
“मुझे नहीं पता।”
“मैंने तुम्हें बचाने के लिए सब कुछ किया।”
“क्या तुमने 2008 में मुझे बचाया था?”
मीरा चुप हो गई।
“क्या तुम मुझे उसी रात से जानती हो, या 2023 में वापस आईं?”
मीरा ने सिर झुका लिया।
“मुझे याद नहीं।”
अर्जुन ने थकी हुई आवाज़ में कहा, “तुम्हें कभी कुछ याद क्यों नहीं रहता?”
मीरा ने धीरे से जवाब दिया—
“क्योंकि शायद मेरी यादें मेरी नहीं हैं।”
दोनों के बीच सन्नाटा फैल गया।
फिर मीरा ने अपने कपड़ों के भीतर से एक पुरानी डायरी निकाली।
“यह मुझे दादी ने दी थी।”
अर्जुन ने डायरी उठाई।
उसके पहले पन्ने पर शारदा देवी की लिखावट थी।
**तीन बच्चों की कहानी में तीन जन्म नहीं हुए थे। एक जन्म हुआ था, एक मृत्यु हुई थी और एक को चुना गया था।**
अर्जुन ने पन्ना पलटा।
अगले पन्ने पर तीन नाम लिखे थे।
अभय।
अर्णव।
ईशान।
तीनों नामों पर लाल रेखाएँ खींची हुई थीं।
नीचे लिखा था—
**इनमें से कोई भी उसका असली नाम नहीं है।**
अर्जुन ने आखिरी पंक्ति पढ़ी।
**जिस बच्चे का नाम किसी ने नहीं लिया, वही सबसे पहले पैदा हुआ था।**
उसके हाथ से डायरी लगभग गिर गई।
“यह कैसे हो सकता है?”
मीरा ने कहा, “शायद नाम और जन्म का रिश्ता वैसा नहीं है, जैसा हम समझते हैं।”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“क्या तुम जानती हो कि उस बच्चे का नाम क्या था?”
मीरा ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
फिर उसने डायरी के आखिरी पन्ने की तरफ इशारा किया।
वहाँ एक छोटा-सा चित्र बना था।
तीन पालने।
उनके ऊपर एक आईना।
और आईने के पीछे एक आदमी।
उस आदमी की कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं।
चित्र के नीचे लिखा था—
**जिसने तीसरे बच्चे को चुना, उसका नाम किसी रिकॉर्ड में नहीं मिलेगा।**
अर्जुन ने फुसफुसाकर कहा, “वह आदमी कौन था?”
मीरा ने जवाब नहीं दिया।
क्योंकि उसी समय कमरे के बाहर से किसी ने दस्तक दी।
ठक।
ठक।
ठक।
दोनों ने दरवाज़े की तरफ देखा।
फिर बाहर से विक्रम शर्मा की आवाज़ आई—
“अर्जुन, दरवाज़ा खोलो।”
अर्जुन के चेहरे पर भय उतर आया।
“यह संभव नहीं है।”
मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मत खोलना।”
बाहर से आवाज़ आई—
“बेटा, मैं हूँ।”
अर्जुन ने काँपते हुए कहा, “मेरे पिता मर चुके हैं।”
आवाज़ ने जवाब दिया—
“हाँ। लेकिन तुमने अभी तक यह नहीं पूछा कि मेरी जगह कौन मरा था।”
अर्जुन की साँस रुक गई।
दरवाज़े के नीचे से एक पुरानी तस्वीर भीतर सरकाई गई।
अर्जुन ने उसे उठाया।
तस्वीर में विक्रम शर्मा खड़े थे।
उनके पीछे शारदा देवी थीं।
और उनके सामने एक बच्चा था।
बच्चे का चेहरा अर्जुन जैसा था।
लेकिन तस्वीर के पीछे लिखा था—
**विक्रम शर्मा की मृत्यु: 2013।**
उसके नीचे दूसरी पंक्ति थी—
**शरीर की पहचान: अपुष्ट।**
और सबसे नीचे एक आखिरी वाक्य—
**दाह संस्कार में जिस शरीर को जलाया गया, वह विक्रम का नहीं था।**
अर्जुन ने दरवाज़े की तरफ देखा।
बाहर से आवाज़ फिर आई।
“बेटा, मुझे अंदर आने दो।”
मीरा ने अर्जुन को पीछे खींचा।
“वह विक्रम नहीं है।”
अर्जुन ने पूछा, “तो फिर कौन है?”
दरवाज़े के दूसरी तरफ से आवाज़ आई—
“वह आदमी, जिसने तुम्हें पहली बार गोद में उठाया था।”
अर्जुन की आँखें फैल गईं।
“पापा?”
“हाँ, बेटा।”
“आपने मुझे कौन-सा नाम दिया था?”
दरवाज़े के बाहर कुछ क्षण सन्नाटा रहा।
फिर आवाज़ ने बहुत धीरे से कहा—
“मैंने तुम्हें कोई नाम नहीं दिया था।”
अर्जुन के हाथ से तस्वीर गिर गई।
बाहर से आवाज़ आई—
“क्योंकि जब मैंने तुम्हें उठाया था, तुम पहले से किसी और के नाम से पुकारे जा रहे थे।”
दरवाज़े का हैंडल धीरे-धीरे घूमने लगा।
मीरा ने अर्जुन को अपने पीछे कर लिया।
लेकिन अर्जुन की नज़र तस्वीर पर थी।
उसमें खड़े बच्चे के पैरों के नीचे कोई परछाईं नहीं थी।
और तस्वीर में खड़े विक्रम के पैरों के नीचे दो परछाइयाँ थीं।
एक उनकी अपनी।
दूसरी बच्चे की।
अर्जुन ने सिर उठाया।
दरवाज़ा खुल गया।
बाहर कोई नहीं था।
केवल फर्श पर गीले पैरों के निशान थे।
वे निशान कमरे के बाहर से अंदर आए थे।
और फिर सीधे आईने की तरफ चले गए थे।
अर्जुन और मीरा ने धीरे-धीरे सिर घुमाया।
बैठक की दीवार पर लगा आईना अब काला था।
उसके भीतर एक आदमी खड़ा था।
उसने विक्रम शर्मा के कपड़े पहन रखे थे।
उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
लेकिन उसकी कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं।
उसने अपना हाथ उठाया।
और आईने पर उँगली से एक नाम लिखा।
**नीलकंठ।**
अर्जुन ने फुसफुसाकर कहा, “डॉक्टर?”
आईने के भीतर खड़े आदमी ने सिर हिलाया।
फिर उसने दूसरा नाम लिखा।
**विक्रम।**
फिर तीसरा।
**शारदा।**
तीनों नामों के नीचे उसने एक लंबी रेखा खींची।
और उसके नीचे लिखा—
**हम तीनों ने एक ही बच्चे को बचाया था।**
अर्जुन ने आईने के करीब जाकर पूछा, “कौन-सा बच्चा?”
आईने के भीतर खड़े आदमी ने अपना चेहरा उठाया।
उसका चेहरा धीरे-धीरे साफ होने लगा।
पहले आँखें।
फिर नाक।
फिर होंठ।
वह अर्जुन का चेहरा था।
लेकिन उम्र में उससे लगभग बीस साल बड़ा।
उसने होंठ हिलाए।
“जिस बच्चे को तुम आज तक ढूँढ़ रहे हो।”
अर्जुन ने काँपते हुए पूछा, “वह कहाँ है?”
बड़े अर्जुन ने आईने पर अपना हाथ रखा।
“वह बाहर है।”
अर्जुन ने पीछे देखा।
कमरे में वह, मीरा और उसकी माँ के अलावा कोई नहीं था।
जब उसने दोबारा आईने की तरफ देखा, बड़े अर्जुन के चेहरे पर मुस्कान थी।
“तुम्हें अभी तक समझ नहीं आया?”
आईने के भीतर से एक आवाज़ आई।
“तुम मुझे ढूँढ़ रहे हो, जबकि मैं तुम्हारे सामने खड़ा हूँ।”
अर्जुन ने अपनी छाती पर हाथ रखा।
उसका दिल तेजी से धड़क रहा था।
आईने के भीतर खड़े बड़े अर्जुन ने कहा—
“मैं तुम्हारा भविष्य नहीं हूँ।”
फिर वह धीरे-धीरे आईने की सतह से बाहर आने लगा।
“मैं तुम्हारा अतीत भी नहीं हूँ।”
उसकी उँगलियाँ काँच से बाहर निकल आईं।
“मैं वह हूँ, जो तुम्हारे जन्म से पहले था।”
कमरे की सारी बत्तियाँ एक साथ बुझ गईं।
अँधेरे में अर्जुन ने मीरा की चीख सुनी।
फिर माँ की आवाज़ आई—
“अर्जुन, आँखें बंद कर लो!”
लेकिन अर्जुन ने आँखें बंद नहीं कीं।
वह देखना चाहता था कि आईने से बाहर कौन आ रहा है।
उसे एक लंबा हाथ दिखाई दिया।
फिर कंधा।
फिर चेहरा।
और आखिर में वह आदमी पूरी तरह कमरे के भीतर खड़ा था।
उसके चेहरे पर अर्जुन की शक्ल थी।
उसकी आँखें काली थीं।
और उसके पैरों के नीचे तीन परछाइयाँ थीं।
उसने अर्जुन की तरफ देखकर कहा—
“अब मुझे मेरा नाम वापस दो।”
अर्जुन ने काँपते हुए पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है?”
आदमी मुस्कराया।
“वही नाम, जिसे तुम्हारी दादी ने सबसे पहले मिटाया था।”
फिर उसने अर्जुन के कान के पास झुककर एक शब्द कहा।
अर्जुन का चेहरा सफेद पड़ गया।
क्योंकि वह नाम था—
**अभय।**
लेकिन उसी क्षण अर्जुन की अपनी आवाज़ उसके भीतर से उठी—
“झूठ!”
आईने के भीतर से एक और चेहरा दिखाई दिया।
वह भी अर्जुन का था।
उसने काँच के पीछे से चिल्लाकर कहा—
“उसकी बात मत मानना!”
अर्जुन अब कमरे में खड़े दो एक जैसे चेहरों को देख रहा था।
एक आईने के बाहर।
एक आईने के भीतर।
दोनों का दावा था कि वही असली है।
और तभी उसकी माँ ने एक ऐसी बात कही, जिसने दोनों को चुप करा दिया।
“तुम दोनों में से कोई भी अभय नहीं है।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
बाहर खड़े आदमी ने धीरे-धीरे सिर घुमाया।
आईने के भीतर खड़े चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।
माँ ने काँपते हुए कहा—
“क्योंकि अभय तो उस रात पैदा ही नहीं हुआ था।”
अर्जुन ने उनकी तरफ देखा।
“तो फिर अभय कौन था?”
माँ ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
“वह नाम किसी बच्चे का नहीं था।”
आईने के भीतर से अचानक तीन तेज दस्तकें हुईं।
ठक।
ठक।
ठक।
फिर एक आवाज़ आई।
वह किसी बच्चे की नहीं थी।
वह किसी आदमी की भी नहीं थी।
वह आवाज़ एक साथ कमरे के हर कोने से आ रही थी।
**“अभय मेरा नाम था।”**
माँ ने पीछे हटते हुए कहा—
“नहीं... तुम नहीं!”
आईने के बाहर खड़े आदमी की आँखें फैल गईं।
आईने के भीतर खड़ा अर्जुन का चेहरा चीखने लगा।
और कमरे के बीचोंबीच खड़ी अर्जुन की परछाईं ने पहली बार अपना असली आकार दिखाया।
वह अर्जुन जैसी नहीं थी।
वह एक तीसरे आदमी की परछाईं थी।
उसकी कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं।
उसने अपना हाथ उठाया और अर्जुन के सीने की तरफ इशारा किया।
फिर बोला—
**“अब फैसला तुम्हें करना है, अर्जुन। किसे बाहर रखोगे—मुझे या खुद को?”**
**एपिसोड 13 समाप्त।**
- Writer
- firoj saifi
- Story
- “अंधेरे में कोई है”
- Chapter
- 13 of 14
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 27 min
- Words
- 5322
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
“अंधेरे में कोई है” · सभी भाग →
और कहानियाँ · More stories
- THE HAUNTING OF BLACKWELL MANOR · firoj saifi
- 🪞 behind the mirror · firoj saifi
- जिस रात मौत जागी · firoj saifi
- जवाब मत देना · Piyashi Atma