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एपिसोड 12: वह परछाईं जो पहले चलती थी

firoj saifi · Ghost Stories · 32 मिनट

1. सुबह जो रात से अलग नहीं थी

अर्जुन ने अपनी आँखें खोलीं तो कमरे में धूप फैली हुई थी।

खिड़की के पर्दों से छनकर आती रोशनी फर्श पर लंबी धारियाँ बना रही थी। बाहर किसी सब्ज़ीवाले की आवाज़ सुनाई दे रही थी। दूर मंदिर की घंटी बजी। किसी घर में प्रेशर कुकर की सीटी निकली।

सब कुछ सामान्य था।

सिवाय उस चीज़ के, जो दीवार पर खड़ी थी।

अर्जुन की परछाईं।

वह खिड़की के पास खड़ी थी, जबकि अर्जुन बिस्तर पर लेटा हुआ था। उसकी आकृति बिल्कुल अर्जुन जैसी थी। वही कंधे, वही सिर, वही झुके हुए बाल। मगर उसके सिर का झुकाव ऐसा था, जैसे वह किसी अदृश्य व्यक्ति की बात ध्यान से सुन रही हो।

अर्जुन ने धीरे से अपना दायाँ हाथ उठाया।

दीवार पर खड़ी परछाईं ने हाथ नहीं उठाया।

उसने अपना सिर उसकी तरफ घुमाया।

अर्जुन का गला सूख गया।

“तुम... मेरी परछाईं हो?”

परछाईं ने कोई आवाज़ नहीं निकाली।

उसने दीवार पर अपना हाथ उठाया और उँगली से कुछ लिखने लगी।

पहले एक सीधी रेखा।

फिर दूसरी।

फिर तीसरी।

तीन काली रेखाएँ।

अर्जुन के दिमाग में पुराने कुएँ की मुंडेर उभर आई। वही तीन रेखाएँ, जो अभय और अर्णव के नामों के बीच खुदी हुई थीं। वही निशान, जो तस्वीर में दिखाई देने वाले अजनबी आदमी की कलाई पर था।

उसने बिस्तर से उतरने की कोशिश की।

परछाईं उससे पहले चल पड़ी।

अर्जुन ने एक कदम आगे बढ़ाया।

परछाईं दीवार से उतरकर फर्श पर आ गई।

फिर वह दरवाज़े की तरफ चलने लगी।

अर्जुन वहीं जम गया।

दीवार पर परछाईं का होना सामान्य था। फर्श पर उसकी आकृति बनना भी सामान्य था। लेकिन किसी इंसान की परछाईं का अपनी मर्जी से दीवार से उतरकर चलना...

यह सामान्य नहीं था।

“रुको!” अर्जुन चिल्लाया।

परछाईं रुक गई।

उसने धीरे-धीरे अपना सिर पीछे घुमाया।

फिर पहली बार उसकी आवाज़ सुनाई दी।

“तुम मुझे आदेश नहीं दे सकते।”

अर्जुन के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

आवाज़ उसकी अपनी थी।

बिल्कुल वही आवाज़, जो वह रोज़ आईने में अपना चेहरा देखते हुए सुनता था।

लेकिन उस आवाज़ में एक अजीब गहराई थी। जैसे एक ही गले से कई लोग बोल रहे हों।

“तुम कौन हो?” अर्जुन ने पूछा।

परछाईं ने कहा, “यह सवाल तुम्हें मुझसे नहीं, खुद से पूछना चाहिए।”

“तुम मेरी परछाईं हो।”

“तुम्हें ऐसा किसने बताया?”

“हर इंसान की परछाईं होती है।”

“हर इंसान की होती है।”

परछाईं एक पल के लिए चुप हुई।

“लेकिन हर परछाईं किसी इंसान की नहीं होती।”

अर्जुन पीछे हट गया।

परछाईं ने अपना हाथ आगे बढ़ाया। उसकी उँगलियाँ फर्श पर लंबी होती चली गईं। कुछ ही पलों में वे अर्जुन के पैरों तक पहुँच गईं।

“मुझे तुम्हारी मदद चाहिए,” उसने कहा।

“तुम्हें मेरी मदद क्यों चाहिए?”

“क्योंकि तुमने दरवाज़ा खोल दिया है।”

“कौन-सा दरवाज़ा?”

परछाईं ने अपनी उँगली अर्जुन के सीने की तरफ उठाई।

“वह, जो तुम्हारे अंदर बंद था।”

अर्जुन के सीने में अचानक दर्द उठा। उसने अपनी शर्ट पकड़ ली। कुछ क्षणों तक उसे साँस लेने में कठिनाई हुई।

फिर कमरे के बाहर से मीरा की आवाज़ आई।

“भैया!”

परछाईं तुरंत पीछे हट गई।

“उससे मेरी बात मत करना,” उसने फुसफुसाकर कहा।

अर्जुन ने दरवाज़े की तरफ देखा।

“क्यों?”

“क्योंकि वह तुम्हें पहचानती नहीं है।”

दरवाज़ा खुला।

मीरा अंदर आई।

उसने अर्जुन को देखा, फिर दीवार की तरफ देखा।

दीवार खाली थी।

परछाईं वापस उसके पैरों के नीचे आ चुकी थी।

मीरा ने पूछा, “तुम किससे बात कर रहे थे?”

अर्जुन कुछ क्षण चुप रहा।

फिर बोला, “अपनी परछाईं से।”

मीरा के चेहरे से रंग उड़ गया।

“उसने तुमसे बात की?”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

मीरा ने तुरंत दरवाज़ा बंद किया और कुंडी लगा दी।

“उसने क्या कहा?”

“कि मैंने अपने अंदर कोई दरवाज़ा खोल दिया है।”

मीरा की आँखें भर आईं।

“भैया, हमें आज ही पुराने प्रसूति गृह जाना होगा।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“तुम्हें कैसे पता कि हमें वहाँ जाना है?”

मीरा ने जवाब देने से पहले खिड़की की तरफ देखा।

धूप के बावजूद उसके चेहरे पर अँधेरे जैसी थकान थी।

“क्योंकि रात को मुझे एक सपना आया था।”

“कैसा सपना?”

“मैंने तुम्हें एक कमरे में देखा। तुम बिस्तर पर लेटे थे। तुम्हारी परछाईं कमरे से बाहर जा रही थी।”

अर्जुन का दिल तेजी से धड़कने लगा।

मीरा ने काँपते हुए कहा, “और तुम्हारे जाने के बाद बिस्तर पर जो शरीर बचा था, वह तुम्हारा नहीं था।”

### 2. माँ की अलमारी

नीचे बैठक में अर्जुन की माँ खिड़की के पास बैठी थीं।

उनके सामने चाय का कप रखा था, लेकिन चाय ठंडी हो चुकी थी। रात की घटना के बाद से उन्होंने एक बार भी अर्जुन की तरफ ठीक से नहीं देखा था।

अर्जुन उनके सामने बैठ गया।

“माँ, हमें पुराने प्रसूति गृह जाना है।”

माँ ने कप उठाने की कोशिश की, मगर उनके हाथ काँप गए।

“वहाँ जाने की जरूरत नहीं है।”

“क्यों?”

“वहाँ कुछ नहीं बचा।”

“डॉ. नीलकंठ का बेटा वहाँ है।”

माँ का हाथ रुक गया।

“तुम उससे मिले?”

“कल रात।”

“उसने तुम्हें क्या दिया?”

“जन्म प्रमाणपत्र। दो बच्चों के नाम थे। अभय शर्मा और अर्णव शर्मा।”

माँ ने आँखें बंद कर लीं।

अर्जुन आगे झुका।

“और एक तीसरा रिकॉर्ड भी था।”

माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।

“उस पर लिखा था कि तीसरा बच्चा पैदा ही नहीं हुआ था, लेकिन वह पहले से वहाँ मौजूद था। इसका क्या मतलब है?”

माँ की आँखों से आँसू निकल आए।

“मुझे नहीं पता।”

अर्जुन ने गहरी साँस ली।

“आप हर बार यही कहती हैं।”

“क्योंकि उस रात की कुछ बातें मुझे सच में याद नहीं हैं!”

उनकी आवाज़ अचानक तेज हो गई।

“मैंने तुम्हें जन्म दिया था। मुझे इतना याद है। मुझे तुम्हारा रोना याद है। मुझे अस्पताल की सफेद दीवारें याद हैं। मुझे तुम्हारे पिता का चेहरा याद है। लेकिन जब मैंने तुम्हें दोबारा देखा, तो तुम्हारी आँखें खुली थीं और तुम मुझे ऐसे देख रहे थे जैसे मुझे पहले से जानते हो।”

अर्जुन चुप रहा।

माँ ने अपने आँसू पोंछे।

“तुम्हारे जन्म के बाद मुझे तीन दिन तक होश नहीं आया था। जब मैं जागी, तो शारदा ने कहा कि सब ठीक है। बच्चा स्वस्थ है। विक्रम उसे घर ले गया है।”

“लेकिन आप अस्पताल में थीं।”

“हाँ।”

“और आप मुझे घर पर देख रही थीं?”

माँ ने धीरे से सिर हिलाया।

“जब मैं शर्मा निवास पहुँची, तो तुम मेरे कमरे में सो रहे थे। तुम्हारे पिता ने कहा कि डॉक्टर ने तुम्हें पहले ही छुट्टी दे दी थी।”

अर्जुन ने उनकी तरफ देखा।

“तो फिर अस्पताल में आपने किसे जन्म दिया था?”

माँ ने मुँह पर हाथ रख लिया।

“यही सवाल मैंने विक्रम से पूछा था।”

“उन्होंने क्या कहा?”

“उन्होंने कहा कि कुछ सवालों के जवाब मिलने से जिंदगी नहीं बचती, सिर्फ डर बढ़ता है।”

“और आपने उनकी बात मान ली?”

“मैंने कोशिश की कि मान लूँ।”

माँ उठीं और कमरे के कोने में रखी पुरानी अलमारी के पास गईं। उन्होंने नीचे वाला दराज़ खोला। अंदर कपड़ों के नीचे एक लकड़ी का छोटा डिब्बा रखा था।

उस पर धूल जमी थी।

माँ ने डिब्बा अर्जुन के सामने रख दिया।

“यह तुम्हारे पिता ने मुझे दिया था। उन्होंने कहा था कि इसे तब खोलना, जब तुम अपने जन्म के बारे में पूछो।”

“आपने पहले क्यों नहीं दिया?”

“क्योंकि उन्होंने यह भी कहा था कि अगर तुम खुद पूछने से पहले इसे खोलोगे, तो तुम वह चीज़ देख लोगे, जिसे देखने के लिए अभी तैयार नहीं हो।”

अर्जुन ने डिब्बे का ढक्कन खोला।

अंदर एक चाँदी की पायल, एक पुराना अस्पताल का कागज़ और एक छोटी काली पट्टी रखी थी।

पायल पर तीन छोटे घुँघरू थे।

अस्पताल के कागज़ पर सिर्फ इतना लिखा था—

**मरीज: राधा।**

**दिनांक: 17 जुलाई 1995।**

**प्रसूति कक्ष: 3।**

नीचे डॉक्टर के हस्ताक्षर थे।

डॉ. नीलकंठ।

अर्जुन ने काली पट्टी उठाई।

वह बच्चों के हाथ में बाँधने वाली अस्पताल की पहचान-पट्टी जैसी थी।

उस पर सफेद अक्षरों में लिखा था—

**शिशु 03 — माँ की पहचान अपुष्ट।**

अर्जुन ने माँ की तरफ देखा।

“तीन बच्चे?”

माँ ने धीरे से कहा, “मुझे नहीं पता कि तीसरा बच्चा किसका था।”

“लेकिन यह राधा का रिकॉर्ड है।”

“हाँ।”

“राधा तो मीरा की माँ थीं।”

माँ ने सिर हिलाया।

“और वह उस रात अस्पताल में क्यों थीं?”

माँ ने उत्तर देने की कोशिश की, लेकिन शब्द उनके गले में अटक गए।

तभी डिब्बे के भीतर से एक हल्की खनक सुनाई दी।

चाँदी की पायल अपने आप हिल रही थी।

उसके तीनों घुँघरू एक साथ बजे।

छन।

छन।

छन।

फिर डिब्बे के भीतर से एक बच्चे की आवाज़ आई—

“माँ, मुझे वापस ले चलो।”

अर्जुन ने डिब्बा बंद कर दिया।

आवाज़ बंद नहीं हुई।

वह अब कमरे के कोने से आ रही थी।

“माँ...”

माँ ने कान बंद कर लिए।

“नहीं। अब नहीं।”

अर्जुन ने उनकी तरफ देखा।

“आप इस आवाज़ को पहचानती हैं?”

माँ ने आँखें बंद रखीं।

“मैंने इसे पहली बार उस रात सुना था।”

“किसकी आवाज़ है?”

माँ ने बहुत धीरे से कहा—

“उस बच्चे की, जिसे मैंने जन्म नहीं दिया था।”

### 3. प्रसूति गृह का रास्ता

पुराना प्रसूति गृह देवगढ़ के उत्तरी छोर पर था। गाँव से बाहर निकलकर एक सूखी नदी पार करनी पड़ती थी। उसके बाद कच्ची सड़क एक ऐसे जंगल में जाती थी, जहाँ दिन में भी सूरज की रोशनी मुश्किल से पहुँचती थी।

कहा जाता था कि वहाँ कभी छोटा अस्पताल हुआ करता था। आसपास के गाँवों की औरतें वहीं बच्चों को जन्म देने आती थीं।

फिर 1995 की एक रात अस्पताल में आग लग गई।

आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार आग बिजली के शॉर्ट सर्किट से लगी थी। तीन लोग मारे गए थे और अस्पताल बंद कर दिया गया था।

लेकिन देवगढ़ के बुजुर्ग कुछ और कहते थे।

वे कहते थे कि आग अस्पताल में नहीं लगी थी।

आग एक कमरे में लगी थी, जहाँ कोई आग थी ही नहीं।

उस कमरे की दीवारें अंदर से काली हो गई थीं, लेकिन खिड़कियों के पर्दे नहीं जले थे। लोहे का बिस्तर पिघल गया था, मगर उसके पास रखी लकड़ी की कुर्सी सही-सलामत थी।

और उस कमरे में लगे आईने पर एक भी दरार नहीं आई थी।

अर्जुन ने अपनी माँ का दिया हुआ कागज़ जेब में रखा और मीरा के साथ निकल पड़ा।

वे सुबह नौ बजे घर से निकले थे, लेकिन पुराने रास्ते पर पहुँचते-पहुँचते ऐसा लगने लगा जैसे शाम होने वाली हो।

पेड़ों के बीच हवा नहीं चल रही थी।

फिर भी सूखे पत्ते उनके पैरों के आगे-आगे उड़ रहे थे।

मीरा ने चलते हुए पूछा, “तुम्हें वह आदमी याद है?”

“कौन-सा आदमी?”

“जो कल रात तुम्हारे घर आया था। डॉ. नीलकंठ का बेटा।”

“हाँ।”

“क्या उसने अपना नाम बताया था?”

अर्जुन कुछ देर सोचता रहा।

“नहीं। उसने कहा था कि उसका कोई नाम नहीं है।”

मीरा रुक गई।

“उसने ठीक यही कहा था?”

“हाँ।”

मीरा ने अपना माथा पकड़ लिया।

“तो वह उसका बेटा नहीं हो सकता।”

“क्यों?”

“क्योंकि डॉ. नीलकंठ का कोई बेटा था ही नहीं।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“तुम्हें यह कैसे पता?”

“मेरी माँ ने मुझे बताया था।”

“तुम्हारी माँ को डॉ. नीलकंठ के परिवार के बारे में कैसे पता था?”

मीरा चुप हो गई।

अर्जुन ने पूछा, “मीरा?”

उसने उसकी तरफ देखा।

“मेरी माँ उस अस्पताल में काम करती थीं।”

“क्या?”

“वह डॉक्टर नहीं थीं। लेकिन वह वहाँ मरीजों की देखभाल करती थीं। अस्पताल में उनकी एक छोटी-सी नौकरी थी।”

अर्जुन के दिमाग में माँ का बताया हुआ रिकॉर्ड घूम गया।

मरीज: राधा।

दिनांक: 17 जुलाई 1995।

प्रसूति कक्ष: 3।

“तुम्हारी माँ ने मुझे कभी यह क्यों नहीं बताया?”

मीरा की आँखों में एक अजीब खालीपन उतर आया।

“क्योंकि मेरी माँ ने मुझे भी यह बात कभी नहीं बताई थी।”

“फिर तुम्हें कैसे पता?”

“मुझे यह बात अपने बचपन की एक याद से पता चली।”

“कौन-सी याद?”

मीरा ने सड़क के किनारे खड़े पेड़ की तरफ देखा।

“मैंने एक बार माँ को नींद में बोलते सुना था। वह बार-बार कह रही थीं कि अस्पताल का तीसरा पालना खाली मत छोड़ना।”

अर्जुन ने धीमे स्वर में कहा, “तीन पालने।”

मीरा ने सिर हिलाया।

“और जब मैंने उनसे पूछा कि तीसरा पालना किसके लिए था, तो उन्होंने मुझे थप्पड़ मार दिया।”

अर्जुन रुक गया।

“तुम्हारी माँ ने तुम्हें थप्पड़ मारा?”

“उसके बाद उन्होंने मुझे सीने से लगा लिया और बहुत देर तक रोती रहीं। फिर कहा कि अगर कभी कोई मुझे उस रात के बारे में बताए, तो उसकी बात पर तुरंत विश्वास मत करना।”

“उन्होंने यह भी कहा था कि आईने के पीछे जो बच्चा है, उसे कभी अपना नाम मत बताना?”

मीरा का चेहरा बदल गया।

“तुम्हें यह किसने बताया?”

“दादी की डायरी में कुछ ऐसा ही लिखा था।”

मीरा ने सिर हिलाया।

“नहीं। यह बात मेरी माँ ने कही थी। लेकिन उन्होंने मुझे यह भी बताया था कि नाम देने से सिर्फ आईने के भीतर का बच्चा बाहर नहीं आता।”

“तो क्या होता है?”

मीरा ने अर्जुन की तरफ देखा।

“जिसने नाम दिया होता है, वह खुद अंदर जाने लगता है।”

वे कुछ देर तक चुपचाप चलते रहे।

फिर अर्जुन ने पूछा, “तुमने कभी किसी को नाम दिया था?”

मीरा ने तुरंत जवाब नहीं दिया।

उसने अपनी कलाई पर बने हल्के निशान को छुआ।

“हाँ।”

“किसे?”

मीरा की आँखें भर आईं।

“मुझे याद नहीं।”

### 4. वह इमारत जो जलकर भी बची रही

जंगल के बीच अचानक सड़क खत्म हो गई।

सामने लोहे का एक पुराना फाटक था। उसकी एक पट्टी जमीन पर गिरी हुई थी। ऊपर जंग लगे अक्षरों में लिखा था—

**देवगढ़ मातृ एवं शिशु केंद्र।**

फाटक के पीछे एक लंबी इमारत खड़ी थी।

उसकी दीवारें काली थीं। छत के कुछ हिस्से टूट चुके थे। खिड़कियों पर जंग लगे लोहे के जाल थे और बरामदे में सूखे पत्तों का ढेर जमा था।

लेकिन इमारत के बीचोंबीच एक खिड़की साफ थी।

उसके काँच पर धूल नहीं थी।

अर्जुन ने ध्यान से देखा।

खिड़की के पीछे कोई खड़ा था।

एक औरत।

उसने सफेद कपड़े पहन रखे थे और उसकी गोद में एक बच्चा था।

अर्जुन ने पलक झपकी।

औरत गायब हो गई।

“तुमने देखा?” उसने पूछा।

मीरा ने कहा, “क्या?”

“खिड़की के पीछे एक औरत थी।”

मीरा ने इमारत की तरफ देखा।

“मुझे कुछ नहीं दिखा।”

वे फाटक के भीतर गए।

बरामदे की दीवार पर एक पुरानी पट्टिका लगी थी। उस पर अस्पताल की स्थापना की तारीख और डॉक्टरों के नाम लिखे थे।

डॉ. नीलकंठ का नाम सबसे नीचे था।

उसके नीचे किसी ने नुकीली चीज़ से तीन रेखाएँ खींच रखी थीं।

अर्जुन ने उँगली से उन निशानों को छुआ।

दीवार के भीतर से एक धीमी धड़कन सुनाई दी।

धक।

धक।

धक।

उसने हाथ हटा लिया।

“यह जगह जिंदा है,” वह फुसफुसाया।

मीरा ने कहा, “नहीं। यह जगह मर चुकी है।”

वह दरवाज़े की तरफ बढ़ी।

“लेकिन जो यहाँ मरा था, वह अब भी इसके भीतर है।”

मुख्य दरवाज़ा खुला हुआ था।

अंदर जाते ही उन्हें जली हुई दवाइयों और गीले कपड़े की गंध आई। रिसेप्शन की मेज पर एक रजिस्टर पड़ा था। उसकी जिल्द आधी जल चुकी थी।

अर्जुन ने उसे खोला।

पहले कई पन्नों पर मरीजों के नाम थे। कुछ के आगे तारीखें थीं, कुछ के आगे डॉक्टरों के हस्ताक्षर।

फिर एक पन्ने पर उसे अपना नाम दिखाई दिया।

**अर्णव शर्मा।**

जन्म: 17 जुलाई 1995।

मरीज का क्रमांक: 313।

लेकिन पन्ने के नीचे किसी ने लाल स्याही से लिखा था—

**यह बच्चा इस अस्पताल से बाहर नहीं गया।**

अर्जुन के हाथ से रजिस्टर गिर गया।

“यह झूठ है।”

मीरा ने पन्ना उठाया।

उसने लिखा हुआ वाक्य पढ़ा और तुरंत उसे बंद कर दिया।

“हमें दूसरे रिकॉर्ड देखने होंगे।”

“क्यों?”

“क्योंकि यह पन्ना किसी ने बाद में लिखा है।”

“तुम्हें कैसे पता?”

मीरा ने लाल स्याही की तरफ इशारा किया।

“बाकी सारे पन्ने पानी और आग से खराब हुए हैं। लेकिन यह लिखावट बिल्कुल नई है।”

अर्जुन ने उँगली से उसे छुआ।

स्याही गीली थी।

उसी क्षण रिसेप्शन के पीछे का दरवाज़ा अपने आप खुल गया।

अंदर से एक घंटी बजी।

फिर किसी औरत की आवाज़ आई—

“अगला बच्चा।”

अर्जुन और मीरा ने एक-दूसरे को देखा।

अस्पताल में कोई नहीं था।

फिर भी आवाज़ दोबारा आई।

“अगला बच्चा तैयार करो।”

मीरा ने अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।

“हमें यहाँ से निकलना चाहिए।”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“नहीं। हम इतने दूर आए हैं। हमें पता लगाना होगा कि यहाँ क्या हुआ था।”

वह दरवाज़े की तरफ बढ़ा।

मीरा ने उसका हाथ छोड़ दिया।

“ठीक है। लेकिन एक बात याद रखना।”

“क्या?”

“अगर कोई तुम्हें तुम्हारा जन्म याद दिलाने की कोशिश करे, तो उसकी बात मत मानना।”

“क्यों?”

मीरा ने उसकी आँखों में देखा।

“क्योंकि यादें तुम्हारी हो सकती हैं, लेकिन उन्हें दिखाने वाला हमेशा तुम्हारा भला नहीं चाहता।”

### 5. तीसरा प्रसूति कक्ष

दरवाज़े के पीछे लंबा गलियारा था।

दीवारों पर पुराने पोस्टर लगे थे, जिन पर गर्भवती महिलाओं की देखभाल और नवजात शिशुओं की सुरक्षा के बारे में लिखा था। कुछ पोस्टरों के चेहरे खरोंचकर मिटा दिए गए थे।

गलियारे के आखिर में तीन दरवाज़े थे।

पहले पर लिखा था—**प्रसूति कक्ष 1।**

दूसरे पर—**प्रसूति कक्ष 2।**

तीसरे पर कोई नाम नहीं था।

उसके ऊपर केवल तीन काली रेखाएँ बनी थीं।

अर्जुन ने तीसरे दरवाज़े के सामने कदम रोके।

“यही होगा।”

मीरा ने सिर हिलाया।

दरवाज़े पर ताला लगा था। उसके नीचे फर्श पर पुराने खून जैसे गहरे भूरे धब्बे थे।

अर्जुन ने जेब से 313 वाली चाबी निकाली।

वह चाबी ताले में फिट नहीं हुई।

उसने दूसरी तरफ घुमाने की कोशिश की।

तभी पीछे से किसी ने कहा, “यह ताला चाबी से नहीं खुलता।”

दोनों पलटे।

गलियारे के दूसरे छोर पर एक बूढ़ा आदमी खड़ा था। उसने सफेद कोट पहन रखा था। उसके बाल सफेद थे और दायाँ हाथ काली पट्टी से बँधा हुआ था।

अर्जुन उसे देखते ही पीछे हट गया।

“आप?”

बूढ़े ने कहा, “तुम मुझे पहचानते हो?”

“आप कल रात मेरे घर आए थे।”

“मैं तुम्हारे घर कभी नहीं आया।”

“आपने मुझे जन्म प्रमाणपत्र दिया था!”

बूढ़े ने कुछ पल अर्जुन को देखा।

फिर उसके चेहरे पर दुखभरी मुस्कान आ गई।

“तो उसने आखिरकार मेरा चेहरा भी चुरा लिया।”

मीरा ने अर्जुन को अपने पीछे कर लिया।

“आप कौन हैं?”

बूढ़े ने जवाब दिया, “मेरा नाम डॉ. नीलकंठ था।”

“था?” अर्जुन ने पूछा।

“मैं 1995 में मर गया था।”

अर्जुन की साँस अटक गई।

बूढ़े ने अपनी कलाई पर बँधी पट्टी खोली।

उसकी त्वचा पर तीन काली रेखाएँ थीं।

“उस रात मैंने तीन बच्चों का रिकॉर्ड बनाया था। लेकिन सुबह तक रिकॉर्ड में केवल दो बच्चे बचे थे।”

अर्जुन ने पूछा, “तीसरा बच्चा कौन था?”

डॉक्टर ने सिर हिलाया।

“मुझे नहीं पता।”

“आप डॉक्टर थे!”

“मैं शरीरों को पहचान सकता था। लेकिन उस रात जो चीज़ तीसरे पालने में थी, उसका शरीर हर बार बदल जाता था।”

मीरा ने धीमे स्वर में पूछा, “क्या वह बच्चा रोता था?”

डॉक्टर ने उसकी तरफ देखा।

“हाँ।”

“क्या उसकी परछाईं थी?”

“नहीं।”

मीरा की आँखों में आँसू आ गए।

“क्या उसने कभी किसी को माँ कहा?”

डॉक्टर ने कुछ क्षण सोचा।

“उसने एक बार मुझे माँ कहा था।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“आपको?”

“हाँ। उस रात जब मैं उसे कमरे से बाहर ले जाने लगा, उसने मेरा हाथ पकड़कर कहा था—माँ, मुझे छोड़कर मत जाना।”

डॉक्टर की आवाज़ भारी हो गई।

“मैंने उसे उठाया। वह एक नवजात शिशु जैसा था। लेकिन उसकी आँखें खुली हुई थीं। वह मुझे ऐसे देख रहा था जैसे उसे पता हो कि मैं अगले दिन मरने वाला हूँ।”

अर्जुन ने तीसरे दरवाज़े की तरफ देखा।

“उसके बाद क्या हुआ?”

डॉक्टर ने कहा, “मैंने उसे इस कमरे में बंद कर दिया।”

“क्यों?”

“क्योंकि उसने अपना नाम बताया था।”

“क्या नाम था?”

डॉक्टर चुप हो गया।

“बताइए!”

“मैं नहीं बता सकता।”

“क्यों?”

डॉक्टर ने अपनी छाती पर हाथ रखा।

“क्योंकि जब भी मैं वह नाम बोलने की कोशिश करता हूँ, मेरी धड़कन रुक जाती है।”

उसने गहरी साँस ली।

“लेकिन तुम यह दरवाज़ा खोल सकते हो।”

“कैसे?”

डॉक्टर ने अर्जुन के सीने की तरफ इशारा किया।

“अपनी परछाईं को बुलाओ।”

अर्जुन ने अनायास पीछे देखा।

उसके पैरों के नीचे कोई परछाईं नहीं थी।

मीरा ने भी नीचे देखा।

फर्श पर केवल दोनों के पैरों के निशान थे।

अर्जुन का दिल जोर से धड़कने लगा।

“मेरी परछाईं कहाँ गई?”

डॉक्टर ने कहा, “वह कमरे के अंदर है।”

दरवाज़े के पीछे से तीन दस्तकें सुनाई दीं।

ठक।

ठक।

ठक।

फिर अर्जुन की अपनी आवाज़ आई—

“दरवाज़ा खोलो।”

### 6. बंद कमरे की आवाज़

अर्जुन ने दरवाज़े पर हाथ रखा।

लकड़ी ठंडी थी, लेकिन उसके नीचे कुछ धड़क रहा था। जैसे दरवाज़े के दूसरी तरफ किसी जीवित शरीर का दिल हो।

“अर्जुन, पीछे हटो,” मीरा ने कहा।

लेकिन अर्जुन उसकी आवाज़ नहीं सुन पा रहा था।

दरवाज़े के भीतर से उसकी माँ की आवाज़ आई।

“बेटा, मुझे बाहर निकालो।”

उसका हाथ काँप गया।

“माँ?”

“हाँ, बेटा। मैं अंदर हूँ।”

मीरा ने उसका कंधा पकड़ लिया।

“तुम्हारी माँ घर पर हैं।”

दरवाज़े के भीतर से रोने की आवाज़ आई।

“अर्जुन, मुझे यहाँ बहुत डर लग रहा है।”

अर्जुन की आँखों के सामने बचपन का दृश्य उभरा। वह बुखार में तप रहा था और माँ उसके सिर पर ठंडा कपड़ा रख रही थीं। वह रात को डरकर जागा था और माँ ने उसे सीने से लगाकर कहा था कि जब तक वह उसके साथ हैं, उसे कोई नुकसान नहीं पहुँचा सकता।

दरवाज़े के भीतर से वही शब्द आए।

“जब तक मैं तुम्हारे साथ हूँ, तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचा सकता।”

अर्जुन की आँखों में आँसू आ गए।

मीरा ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

“भैया, यह तुम्हारी यादों से बोल रहा है।”

“लेकिन उसे ये बातें कैसे पता हैं?”

“क्योंकि यह तुम्हारे दिमाग में नहीं, तुम्हारी यादों के बीच रहता है।”

डॉक्टर ने कहा, “वह तुम्हें खोलने के लिए मजबूर कर रहा है।”

अर्जुन ने हाथ हटा लिया।

अंदर से अचानक गुस्से भरी आवाज़ आई।

“तुम मुझे फिर छोड़ दोगे?”

दरवाज़ा हिलने लगा।

“तुमने एक बार मुझे मरने दिया था!”

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

“मैंने तुम्हें नहीं मारा।”

“तुमने मेरा नाम लिया था!”

“मुझे कुछ याद नहीं!”

“तुमने मुझे नाम दिया, अर्जुन। नाम देकर तुमने मुझे इस दुनिया में बाँध दिया। फिर जब उन्होंने तुम्हें बाहर ले जाना चाहा, तुमने मुझे अंदर छोड़ दिया।”

दरवाज़े के नीचे से काला धुआँ निकलने लगा।

मीरा पीछे हट गई।

डॉक्टर ने अपनी जेब से एक छोटी शीशी निकाली और उसका ढक्कन खोल दिया। उसमें से तीखी गंध निकली।

“जब तक यह गंध है, वह दरवाज़े से बाहर नहीं आ सकता,” उसने कहा।

अर्जुन ने पूछा, “यह क्या है?”

“जली हुई चाँदी और नीम की राख।”

“इससे उसे कैसे रोका जा सकता है?”

“क्योंकि वह चीज़ नहीं, उसकी सीमा है।”

डॉक्टर ने शीशी का तरल दरवाज़े के नीचे डाल दिया।

काला धुआँ वापस भीतर खिंच गया।

कुछ क्षणों तक सब शांत रहा।

फिर दरवाज़े के भीतर से एक नई आवाज़ आई।

वह आवाज़ मीरा की थी।

“भैया, मेरी बात सुनो।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

मीरा उसके ठीक बगल में खड़ी थी।

फिर भी दरवाज़े के भीतर से वही आवाज़ आती रही।

“मैं तुम्हें एक बात बताना चाहती हूँ। उस रात जब मैं गायब हुई थी, मैं अकेली नहीं थी।”

अर्जुन का चेहरा बदल गया।

“किसके साथ थीं?”

दरवाज़े के भीतर से आवाज़ आई, “तुम्हारे साथ।”

अर्जुन ने मीरा की तरफ देखा।

उसकी आँखें अब सामान्य थीं, लेकिन चेहरा पीला पड़ चुका था।

“क्या यह सच है?” उसने पूछा।

मीरा ने सिर हिलाया।

“मुझे याद नहीं।”

दरवाज़े के भीतर से हँसी आई।

“उसे सच में याद नहीं।”

फिर आवाज़ ने कहा—

“क्योंकि उस रात तुम दोनों में से एक ही वापस आया था।”

अर्जुन ने दरवाज़े को धक्का दिया।

“झूठ!”

दरवाज़ा एक पल के लिए खुला।

भीतर एक छोटा कमरा था। बीच में लोहे का पालना रखा था। दीवार पर बड़ा आईना था, और आईने के सामने अर्जुन की परछाईं खड़ी थी।

लेकिन परछाईं अकेली नहीं थी।

उसके पीछे एक बच्चा था।

उस बच्चे के हाथ में लाल गेंद थी।

और उसके चेहरे पर अर्जुन की ही शक्ल थी।

अर्जुन ने एक कदम आगे बढ़ाया।

बच्चे ने कहा, “अब तुम मुझे देख सकते हो।”

फिर उसने अपनी हथेली खोली।

उस पर तीन काली रेखाएँ थीं।

“अब तुम मुझे याद भी कर सकते हो।”

दरवाज़ा अचानक बंद हो गया।

अर्जुन पीछे गिर पड़ा।

जब उसने सिर उठाया, डॉक्टर गायब था।

गलियारे में सिर्फ वह और मीरा थे।

और दरवाज़े के ऊपर अब नया नाम लिखा था—

**अभय शर्मा।**

### 7. डॉक्टर का रिकॉर्ड

मीरा ने अर्जुन को उठाया।

“हमें यहाँ से निकलना होगा।”

“नहीं,” अर्जुन ने कहा। “डॉक्टर कहाँ गया?”

“कौन-सा डॉक्टर?”

“डॉ. नीलकंठ!”

मीरा ने खाली गलियारे की तरफ देखा।

“यहाँ कोई डॉक्टर नहीं था।”

अर्जुन ने उसकी तरफ घूरकर देखा।

“तुमने भी उसे देखा था!”

“मैंने एक आदमी देखा था। लेकिन जब तुम उससे बात कर रहे थे, मैंने उसके पैर नहीं देखे।”

अर्जुन चुप हो गया।

“उसके पैर फर्श को छू नहीं रहे थे,” मीरा ने कहा। “वह हवा में खड़ा था।”

अर्जुन को पिछली रात का वह आदमी याद आया, जिसने उसे जन्म प्रमाणपत्र दिया था। क्या वह भी यही था? क्या डॉ. नीलकंठ का बेटा कभी अस्तित्व में था ही नहीं?

वे रिसेप्शन पर लौटे।

वहाँ का रजिस्टर अब मेज पर खुला पड़ा था।

अर्जुन ने उसे उठाया।

पहले वाला पन्ना बदल चुका था।

अब उस पर तीन नाम लिखे थे।

अर्णव शर्मा।

अभय शर्मा।

और तीसरा नाम, जिस पर किसी ने इतनी बार स्याही फेर दी थी कि कागज़ फट गया था।

अर्जुन ने पन्ने को रोशनी के सामने किया।

नीचे बहुत हल्के अक्षरों में लिखा था—

**ईशान शर्मा।**

मीरा के हाथ से टॉर्च गिर गई।

“नहीं...”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“तुम ईशान को जानती हो?”

मीरा ने सिर हिलाया, लेकिन उसके चेहरे पर साफ था कि वह कुछ छिपा रही थी।

“तुमने कहा था कि ईशान तुम्हारी माँ का बेटा था।”

“मैंने कहा था कि उसने मुझे ऐसा बताया था।”

“और अब उसका नाम यहाँ लिखा है।”

मीरा पीछे हट गई।

“यह संभव नहीं है।”

“क्यों?”

“क्योंकि मेरी माँ ने मुझे बताया था कि ईशान का जन्म मुझसे पहले हुआ था।”

अर्जुन ने पूछा, “तुम्हारा जन्म कब हुआ था?”

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

“1998 में।”

“तो ईशान 1995 में पैदा हुआ?”

“मुझे यही बताया गया था।”

अर्जुन ने रिकॉर्ड की तरफ देखा।

“लेकिन यहाँ तीनों नाम एक ही तारीख के सामने लिखे हैं।”

मीरा ने पन्ना उसके हाथ से छीन लिया।

“हमें इसे लेकर जाना होगा।”

जैसे ही उसने पन्ना फाड़कर निकाला, अस्पताल की सारी खिड़कियाँ एक साथ बंद हो गईं।

धड़ाम!

दरवाज़े अपने आप खुलने लगे।

गलियारे के अंत से बच्चों के रोने की आवाज़ आने लगी।

एक आवाज़ नहीं।

तीन आवाज़ें।

पहली आवाज़ कह रही थी, “माँ।”

दूसरी कह रही थी, “भैया।”

तीसरी कुछ नहीं कह रही थी।

वह केवल रो रही थी।

अर्जुन और मीरा बाहर की तरफ दौड़े।

रिसेप्शन के दरवाज़े पर पहुँचकर अर्जुन ने पीछे देखा।

गलियारे के आखिर में एक औरत खड़ी थी।

उसने सफेद साड़ी पहन रखी थी।

उसकी गोद में बच्चा था।

अर्जुन ने उसे पहचान लिया।

वह राधा थी।

मीरा की माँ।

औरत ने अर्जुन की तरफ देखा।

उसकी आँखों में आँसू थे।

उसने अपने होंठ हिलाए।

**“मुझे माफ कर देना।”**

अगले ही पल उसके पीछे खड़ा आईना चमक उठा।

औरत का चेहरा बदलने लगा।

राधा का चेहरा गायब हो गया।

उसकी जगह अर्जुन की माँ का चेहरा आ गया।

फिर शारदा देवी का।

फिर मीरा का।

और आखिर में अर्जुन का अपना चेहरा।

उस चेहरे ने मुस्कराकर कहा—

“अब तुम्हें पता है कि मैं किसका बच्चा हूँ।”

अर्जुन बाहर भागा।

मीरा उसके पीछे थी।

जैसे ही वे फाटक से बाहर निकले, इमारत के भीतर से आग की लपटें उठने लगीं।

कुछ ही सेकंड में पूरा प्रसूति गृह आग से घिर गया।

लेकिन आग का रंग सामान्य नहीं था।

वह लाल नहीं थी।

वह काली थी।

काले धुएँ के बीच तीन छोटे आकार खिड़की के पीछे खड़े दिखाई दिए।

एक ने हाथ हिलाया।

दूसरे ने दरवाज़े पर दस्तक दी।

तीसरे ने अपना चेहरा काँच से लगा दिया।

फिर पूरी इमारत गायब हो गई।

न आग बची।

न धुआँ।

न कोई इमारत।

जहाँ कुछ क्षण पहले अस्पताल खड़ा था, वहाँ अब सिर्फ खाली जमीन थी।

अर्जुन के हाथ में रजिस्टर का फटा हुआ पन्ना था।

उस पर तीनों नाम अब भी लिखे थे।

लेकिन तीसरे नाम के नीचे एक नई पंक्ति उभर रही थी।

**इनमें से दो बच्चे पैदा हुए थे।**

कुछ पल बाद दूसरी पंक्ति दिखाई दी।

**तीसरे बच्चे को किसी ने चुना था।**

और फिर तीसरी पंक्ति—

**चुनने वाला बच्चा नहीं था।**

### 8. घर में किसे वापस लाए?

देवगढ़ लौटते समय दोनों में से किसी ने बात नहीं की।

सूरज ढलने लगा था। सड़क के दोनों ओर फैले पेड़ों की परछाइयाँ रास्ते पर लंबी होती जा रही थीं।

अर्जुन बार-बार अपने पैरों की तरफ देख रहा था।

उसकी परछाईं वापस आ गई थी।

लेकिन हर बार जब वह कोई कदम आगे बढ़ाता, परछाईं आधा कदम पहले बढ़ जाती।

जैसे उसे रास्ता मालूम हो।

जैसे वह अर्जुन को कहीं ले जा रही हो।

“मीरा,” अर्जुन ने आखिर पूछा, “क्या तुमने कभी अपनी परछाईं को अलग चलते देखा है?”

मीरा ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

“क्या तुम्हें यकीन है कि तुम्हारी परछाईं तुम्हारे साथ है?”

वह रुक गई।

अर्जुन भी रुक गया।

दोनों ने जमीन की तरफ देखा।

सूरज की रोशनी में उनकी परछाइयाँ साफ थीं।

अर्जुन की परछाईं उसके पैरों के पास थी।

मीरा की परछाईं उसके पैरों से थोड़ी दूर खड़ी थी।

लेकिन उसकी दिशा गलत थी।

सूरज पश्चिम में था।

दोनों की परछाइयाँ पूर्व की तरफ पड़नी चाहिए थीं।

अर्जुन की परछाईं पूर्व की ओर थी।

मीरा की परछाईं उत्तर की तरफ थी।

मीरा ने उसे देखा।

फिर धीरे-धीरे अपना पैर आगे बढ़ाया।

उसकी परछाईं ने पैर नहीं बढ़ाया।

उसने अपना सिर उठाया।

और अर्जुन की तरफ देखा।

मीरा ने काँपते हुए कहा, “भैया...”

परछाईं ने जमीन पर अपना हाथ रखा और रेंगने लगी।

वह सड़क के किनारे झाड़ियों की तरफ बढ़ी।

मीरा पीछे हट गई।

“यह मेरी परछाईं नहीं है।”

अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“भागो!”

दोनों सड़क पर दौड़ने लगे।

पीछे से किसी के नाखूनों के जमीन पर घिसटने की आवाज़ आती रही।

जब वे मुख्य सड़क तक पहुँचे, तो वह आवाज़ अचानक बंद हो गई।

अर्जुन ने पीछे देखा।

झाड़ियों के पास एक छोटी लाल गेंद पड़ी थी।

उसके ऊपर एक कागज़ रखा था।

अर्जुन वापस जाने लगा।

मीरा ने उसे रोकना चाहा, लेकिन वह सुन नहीं रहा था।

उसने कागज़ उठाया।

उस पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

**मीरा को घर मत ले जाना।**

अर्जुन ने सिर उठाया।

मीरा उसके सामने खड़ी थी।

उसके चेहरे पर आँसू थे।

“तुम मुझ पर शक कर रहे हो?” उसने पूछा।

“नहीं।”

“तो फिर उस कागज़ को क्यों देख रहे हो?”

अर्जुन चुप रहा।

मीरा उसके करीब आई।

“भैया, तुम जानते हो कि मैं तुम्हें कभी नुकसान नहीं पहुँचाऊँगी।”

अर्जुन ने उसकी आँखों में देखा।

उसे बचपन की मीरा याद आई। वह लड़की जो बारिश में उसके साथ दौड़ती थी। वह जो उसे चोट लगने पर अपनी माँ के पास ले जाती थी। वह जो हर बार उसे भैया कहकर बुलाती थी।

लेकिन उसे तीसरी मंज़िल का वह आईना भी याद आया, जिसमें मीरा की परछाईं नहीं थी।

उसे 2008 की वह रात याद आई, जब मीरा गायब हुई थी।

उसे वह बच्चा याद आया, जिसने कहा था कि उस रात केवल एक ही बच्चा वापस आया था।

“मीरा,” उसने धीमे से पूछा, “तुम 17 जुलाई 2008 की रात कहाँ थीं?”

मीरा की आँखें फैल गईं।

“तुम यह सवाल क्यों पूछ रहे हो?”

“बस जवाब दो।”

“मैं तीसरी मंज़िल पर थी।”

“और उसके बाद?”

“मुझे कुछ याद नहीं।”

अर्जुन ने पूछा, “क्या तुम मेरे साथ कुएँ में गई थीं?”

मीरा चुप हो गई।

“क्या तुम अस्पताल आई थीं?”

उसने सिर झुका लिया।

“क्या तुमने उस तीसरे बच्चे को देखा था?”

मीरा ने अचानक अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।

“भैया, घर चलो। अभी।”

“पहले जवाब दो।”

उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

“अगर मैं तुम्हें जवाब दूँगी, तो तुम मुझ पर विश्वास नहीं करोगे।”

“फिर भी बताओ।”

मीरा ने बहुत धीमे स्वर में कहा—

“2008 की रात मैं तुम्हारे साथ नहीं लौटी थी।”

अर्जुन के कानों में सन्नाटा भर गया।

“क्या?”

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

“मैं तो तुम्हारे साथ 2023 में वापस आई थी।”

अर्जुन ने उसका हाथ छोड़ दिया।

“तुम क्या कह रही हो?”

मीरा ने सिर झुका लिया।

“मुझे खुद नहीं पता कि मैं इन पंद्रह सालों में कहाँ थी। मुझे बस इतना याद है कि मैं तीसरी मंज़िल के कमरे में गई थी। मैंने आईने में किसी बच्चे को देखा था। उसने मुझे मेरा नाम बताया था। फिर उसने कहा था कि जब अर्जुन वापस आए, तो उसे अकेला मत छोड़ना।”

“किसने कहा था?”

मीरा ने काँपते हुए जवाब दिया—

“उस बच्चे ने, जिसका नाम तुमने रखा था।”

अर्जुन पीछे हट गया।

“तुम्हें उसका नाम याद है?”

मीरा ने होंठ खोले।

लेकिन शब्द बाहर नहीं आया।

उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।

“नहीं।”

फिर अचानक उसकी आवाज़ बदल गई।

“लेकिन उसे तुम्हारा नाम याद है।”

अर्जुन ने उसे देखा।

मीरा की आँखें धीरे-धीरे काली होने लगी थीं।

वह मुस्कराई।

“और अब वह तुम्हें लेने आ रहा है।”

### 9. तीसरी मंज़िल का खुला दरवाज़ा

जब अर्जुन शर्मा निवास पहुँचा, तब रात हो चुकी थी।

मुख्य दरवाज़ा खुला था।

बैठक में कोई रोशनी नहीं थी।

उसने मीरा की तरफ देखा।

वह उसके पीछे खड़ी थी, बिल्कुल शांत।

“तुम अंदर नहीं आओगी?” अर्जुन ने पूछा।

मीरा ने सिर हिलाया।

“तुम पहले जाओ।”

“क्यों?”

“क्योंकि घर में कोई हमारा इंतज़ार कर रहा है।”

अर्जुन ने दरवाज़े के भीतर झाँका।

सीढ़ियों के ऊपर एक बच्चा खड़ा था।

उसके हाथ में लाल गेंद थी।

वह अर्जुन को देखकर मुस्कराया।

“भैया।”

अर्जुन ने पीछे मुड़कर मीरा को देखा।

वह अब वहाँ नहीं थी।

उसकी जगह केवल एक लंबी परछाईं खड़ी थी।

अर्जुन ने दरवाज़ा बंद करने की कोशिश की।

लेकिन परछाईं ने अपना हाथ बढ़ाकर दरवाज़ा रोक लिया।

“तुम उसे घर ले आए,” उसने कहा।

अर्जुन ने पूछा, “तुम कौन हो?”

परछाईं ने जवाब दिया, “मैं वह हूँ, जिसे तुम हर बार छोड़ आते हो।”

अर्जुन ने दरवाज़ा जोर से बंद कर दिया।

वह बैठक में दौड़ा और सारी बत्तियाँ जला दीं।

ऊपर सीढ़ियों पर खड़ा बच्चा अब दिखाई नहीं दे रहा था।

लेकिन तीसरी मंज़िल की तरफ जाने वाला दरवाज़ा खुला था।

वह दरवाज़ा, जिसे शारदा देवी ने सील किया था।

वह दरवाज़ा, जिसकी चाबी किसी के पास नहीं होनी चाहिए थी।

और उस दरवाज़े के नीचे से लाल रोशनी बाहर आ रही थी।

अर्जुन सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।

हर सीढ़ी पर एक आवाज़ सुनाई देती।

पहली सीढ़ी पर माँ की आवाज़।

दूसरी पर पिता की।

तीसरी पर दादी की।

चौथी पर मीरा की।

पाँचवीं पर एक बच्चे की।

छठी पर उसकी अपनी आवाज़।

सातवीं सीढ़ी पर पहुँचते ही सारी आवाज़ें एक साथ बोलने लगीं—

“वापस जाओ।”

अर्जुन रुका नहीं।

वह तीसरी मंज़िल तक पहुँचा।

कमरे का दरवाज़ा खुला था।

अंदर आईना रखा था।

उस पर काला कपड़ा नहीं था।

आईने के सामने एक कुर्सी रखी थी।

कुर्सी पर एक आदमी बैठा था।

उसने अर्जुन के कपड़े पहन रखे थे।

उसका चेहरा अर्जुन जैसा था।

लेकिन उसके बाल सफेद थे और आँखों के नीचे गहरे काले निशान थे।

वह अर्जुन को देखकर मुस्कराया।

“आ गए?”

अर्जुन ने पूछा, “तुम कौन हो?”

आदमी ने कहा, “तुम्हारा इंतज़ार करते-करते पंद्रह साल बूढ़ा हो गया।”

“तुम अभय हो?”

आदमी ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

“अर्णव?”

“नहीं।”

“तो फिर कौन?”

आदमी ने अपनी कलाई उठाई।

उस पर तीन काली रेखाएँ थीं।

“मैं वह हूँ, जिसे तुम्हारे पिता ने 2008 में आईने के पीछे छोड़ दिया था।”

अर्जुन की साँस रुक गई।

“तुम मेरे जैसे क्यों दिखते हो?”

आदमी ने हँसकर कहा, “क्योंकि तुम मेरे जैसे दिखते हो।”

“यह कैसे संभव है?”

आदमी ने आईने की तरफ इशारा किया।

“क्योंकि तुम बाहर खड़े हो, और मैं अंदर।”

अर्जुन ने आईने में देखा।

उसमें कमरे का प्रतिबिंब दिखाई दे रहा था।

लेकिन एक फर्क था।

आईने में कुर्सी खाली थी।

आदमी वहाँ नहीं था।

अर्जुन ने पीछे मुड़कर देखा।

कुर्सी भी खाली थी।

वह फिर आईने की तरफ मुड़ा।

अब आईने के भीतर एक बच्चा खड़ा था।

उसके हाथ में लाल गेंद थी।

बच्चे ने धीरे से कहा—

“भैया, तुम्हें अब सच जानना ही होगा।”

अर्जुन ने पूछा, “कौन-सा सच?”

बच्चे ने आईने पर अपना हाथ रखा।

“जिस रात तुम पैदा हुए थे, उस रात तुम्हारी माँ ने तीन बच्चों को जन्म नहीं दिया था।”

अर्जुन ने राहत की साँस लेने की कोशिश की।

लेकिन बच्चे ने अगला वाक्य कहा—

“उस रात तुम्हारी माँ ने किसी बच्चे को जन्म ही नहीं दिया था।”

अर्जुन की दुनिया जैसे रुक गई।

“यह झूठ है।”

बच्चे ने सिर हिलाया।

“तुम्हें जो याद है, वह तुम्हारी याद नहीं है।”

“तो फिर मैं कौन हूँ?”

बच्चे की आँखों से काला पानी बहने लगा।

“तुम वह हो, जिसे किसी ने किसी और की जगह रख दिया था।”

अर्जुन ने आईने पर हाथ रखा।

“और असली बच्चा?”

बच्चे ने अपना सिर झुका लिया।

“वह तुम्हारे सामने खड़ा है।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“तुम?”

बच्चे ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

उसने अर्जुन के पीछे इशारा किया।

अर्जुन धीरे-धीरे पलटा।

कमरे के दरवाज़े पर उसकी माँ खड़ी थीं।

उनके हाथ में एक पुरानी तस्वीर थी।

तस्वीर में अस्पताल का वही कमरा था।

तीन पालने थे।

पहले पालने में एक बच्चा था।

दूसरे में कोई बच्चा नहीं था।

तीसरे के सामने एक आदमी खड़ा था, जिसके चेहरे पर सफेद कपड़ा बँधा था।

माँ ने तस्वीर अर्जुन को दी।

“अब तुम्हें जानना होगा कि तुम कौन हो।”

अर्जुन ने तस्वीर को देखा।

उस आदमी की कलाई पर तीन काली रेखाएँ थीं।

उसने तस्वीर पलटी।

पीछे लिखा था—

**17 जुलाई 1995।**

**तीसरा बच्चा पैदा नहीं हुआ था।**

**वह पहले से मौजूद था।**

अर्जुन ने सिर उठाया।

“माँ, यह आदमी कौन है?”

माँ की आँखों में आँसू भर आए।

उन्होंने बहुत धीरे से कहा—

“वह तुम्हारे पिता नहीं थे।”

अर्जुन ने तस्वीर फिर देखी।

उस आदमी का चेहरा अब बदल रहा था।

सफेद कपड़ा हट गया।

उसकी जगह अर्जुन का चेहरा दिखाई दिया।

लेकिन उसकी आँखें काली थीं।

माँ ने अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।

“बेटा, तुम्हें यहाँ से निकलना होगा।”

“क्यों?”

माँ ने आईने की तरफ देखा।

“क्योंकि अब तक तुम जिस चीज़ से डरते रहे, वह तुम्हारे पीछे नहीं थी।”

अर्जुन की साँस थम गई।

“तो फिर कहाँ थी?”

माँ ने काँपते हुए उसके सीने पर हाथ रखा।

“वह हमेशा तुम्हारे अंदर थी।”

अचानक कमरे की घड़ी ने तीन बार घंटी बजाई।

तीन बजकर तेरह मिनट।

आईने में खड़ा बच्चा मुस्कराया।

उसने अपनी लाल गेंद फर्श पर गिरा दी।

गेंद लुढ़कती हुई अर्जुन के पैरों तक आई।

अर्जुन ने नीचे देखा।

उसकी परछाईं अब उसके पैरों के नीचे नहीं थी।

वह आईने के भीतर खड़ी थी।

और आईने के भीतर खड़ी उसकी परछाईं ने धीरे-धीरे अपना हाथ उठाया।

फिर उसने अपने होंठ हिलाए।

**“अब मेरी बारी है बाहर आने की।”**

कमरे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

आईने में एक दरार पड़ी।

और उस दरार के पीछे से किसी ने अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।

**एपिसोड 12 समाप्त।**

Writer
firoj saifi
Story
“अंधेरे में कोई है”
Chapter
12 of 14
Category
Ghost Stories
Reading time
32 min
Words
6359
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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