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एपिसोड 11: पुराने कुएँ का रहस्य

firoj saifi · Ghost Stories · 33 मिनट

1. आईने के सामने खड़ा कौन था?
रात के ठीक 3 बजकर 13 मिनट हुए थे।
शर्मा निवास की तीसरी मंज़िल पर अर्जुन आईने के सामने खड़ा था। उसकी साँसें तेज चल रही थीं। कमरे की दीवारों पर लगी पुरानी तस्वीरें हवा के बिना हिल रही थीं, जबकि खिड़कियाँ बंद थीं। आईने की सतह पर हल्की-हल्की लहरें उठ रही थीं, जैसे उसके पीछे कोई गहरा तालाब हो और उस तालाब में किसी ने अभी-अभी पत्थर फेंका हो।
आईने के भीतर एक बच्चा खड़ा था।
उसके हाथ में लाल गेंद थी। उसके कपड़े मिट्टी से सने हुए थे। चेहरा अर्जुन के बचपन जैसा था, लेकिन आँखें किसी बूढ़े आदमी की तरह थकी हुई थीं।
अर्जुन ने काँपते हुए पूछा, “तुम कौन हो?”
बच्चे ने जवाब नहीं दिया।
उसने बस अपना दायाँ हाथ उठाया और आईने के भीतर की दीवार पर तीन बार दस्तक दी।

ठक।

ठक।

ठक।

कमरे के बाहर भी वैसी ही तीन दस्तकें सुनाई दीं।

अर्जुन पलटा।

दरवाज़े के पास कोई नहीं था।

जब उसने फिर आईने की ओर देखा, बच्चा गायब हो चुका था। उसकी जगह अर्जुन का अपना प्रतिबिंब खड़ा था। लेकिन प्रतिबिंब की एक बात गलत थी।

अर्जुन का दायाँ हाथ नीचे था।

आईने में उसका दायाँ हाथ उठा हुआ था।

“तुम मेरे साथ ऐसा क्यों कर रहे हो?” अर्जुन फुसफुसाया।

प्रतिबिंब ने होंठ हिलाए।

आवाज़ नहीं निकली, लेकिन अर्जुन शब्द पढ़ सकता था।

**पुराने कुएँ पर जाओ।**

अगले ही पल कमरे के कोने से एक भारी आवाज़ आई।

“वहाँ मत जाना।”

अर्जुन ने तुरंत मुड़कर देखा।

उसके पीछे कोई नहीं था।

“कौन है?”

“जिसकी बात तुमने बहुत पहले नहीं सुनी थी।”

आवाज़ बूढ़े आदमी की थी। अर्जुन ने उसे पहले भी सुना था। उसी रात, जब आईने में विक्रम शर्मा का चेहरा दिखाई दिया था। उसी रात, जब उसने अपने पिता को मरने के दस साल बाद बोलते सुना था।

“पापा?”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

फिर आवाज़ आई, “मैं तुम्हारा पिता नहीं हूँ।”

अर्जुन की रीढ़ में ठंड उतर गई।

“तो फिर तुम कौन हो?”

“वह आदमी, जिसने तुम्हें मरने से बचाने की कोशिश की थी।”

अर्जुन ने आईने की तरफ देखा।

उसकी सतह पर अब एक पुराना दृश्य दिखाई दे रहा था। बरगद का पेड़, उसके नीचे पत्थर का कुआँ और उसके सामने खड़ा एक आदमी, जिसके हाथ में लोहे का डिब्बा था।

वह आदमी विक्रम था।

लेकिन उसके पीछे एक दूसरी परछाईं खड़ी थी।

बहुत लंबी।

बहुत पतली।

और उसका सिर इंसान की तरह नहीं, किसी मुड़े हुए पेड़ की शाखा की तरह था।

विक्रम ने कुएँ में कुछ गिराया। फिर उसने दोनों हाथ जोड़कर कहा, “मैंने अपना वादा पूरा कर दिया। अब उसे वापस मत बुलाना।”

परछाईं ने सिर झुकाया।

फिर उसने विक्रम की ही आवाज़ में कहा, “तुमने वादा पूरा नहीं किया। तुमने सिर्फ समय खरीदा है।”

दृश्य टूट गया।

अर्जुन ने दीवार पकड़ ली।

उसके कानों में एक साथ कई आवाज़ें गूँज रही थीं।

राधा की आवाज़।

शारदा देवी की आवाज़।

विक्रम की आवाज़।

और एक बच्चे की आवाज़, जो बार-बार एक ही बात कह रहा था—

“भैया, मुझे बाहर निकालो।”

दरवाज़ा खुला और मीरा कमरे में आ गई।

“भैया!”

उसने अर्जुन को संभाला।

“तुम ठीक हो?”

अर्जुन ने उसकी कलाई पकड़ ली।

“हमें पुराने कुएँ पर जाना होगा।”

मीरा के चेहरे पर डर उभर आया।

“तुमने उसे देख लिया?”

“किसे?”

“उस आदमी को, जो तुम्हारे पिता के पीछे खड़ा था?”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

मीरा ने आँखें बंद कर लीं।

“तो अब वह भी जान गया है कि तुम उसे पहचानने लगे हो।”

“मीरा, वह कौन है?”

“मुझे नहीं पता।”

“तुम हर बार यही क्यों कहती हो?”

“क्योंकि हर बार जब मुझे लगता है कि मैं उसे पहचान गई हूँ, वह अपना चेहरा बदल लेता है।”

अर्जुन ने आईने की तरफ देखा।

“वह कुएँ पर है।”

मीरा ने धीमे स्वर में कहा, “हाँ। और अगर वहाँ जाने से पहले हमें सूरज की पहली किरण नहीं मिलती, तो हो सकता है हम वापस लौट ही न सकें।”

“तुम मेरे साथ चलोगी?”

मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“मैं तुम्हारे साथ चलूँगी, भैया। लेकिन एक बात याद रखना।”

“क्या?”

“कुएँ के अंदर तुम्हें अपनी माँ की आवाज़ सुनाई दे, तो भी जवाब मत देना।”

अर्जुन ने पूछा, “क्यों?”

मीरा ने उसकी आँखों में देखा।

“क्योंकि तुम्हारी माँ उस कुएँ में कभी गई ही नहीं थीं।”

वह कुछ पल रुकी।

“कम-से-कम, वह माँ नहीं गई थीं जिन्हें तुम अपनी माँ समझते हो।”

***

### 2. देवगढ़ की बंद गलियाँ

शर्मा निवास से निकलते समय अर्जुन ने पीछे मुड़कर घर को देखा।

तीन मंज़िलों वाली वह पुरानी हवेली अँधेरे में किसी विशाल जानवर की तरह खड़ी थी। उसकी ऊपरी खिड़की में लाल रोशनी जल रही थी।

वह तीसरी मंज़िल का कमरा था।

अर्जुन को याद आया कि बचपन में उसे उस मंज़िल पर जाने से रोका जाता था। शारदा देवी कहती थीं कि वहाँ पुराने सामान के अलावा कुछ नहीं है। लेकिन हर बार जब वह सीढ़ियों के पास जाता, ऊपर से किसी बच्चे के चलने की आवाज़ आती।

उस समय उसने कभी नहीं सोचा था कि उन आवाज़ों का संबंध उसके अपने जन्म से हो सकता है।

“चलो,” मीरा ने कहा।

दोनों मुख्य रास्ते की जगह पीछे की गली से निकले।

देवगढ़ रात के इस पहर अजीब तरह से शांत था। दूर मंदिर के पास जलता हुआ दीपक हवा में काँप रहा था। एक कुत्ता सड़क के बीच बैठा था, लेकिन उनके पास आते ही वह भागने के बजाय उलटा पीछे हटने लगा।

फिर वह बैठ गया और कुएँ की दिशा में देखने लगा।

उसके मुँह से धीमी कराह निकली।

अर्जुन ने पूछा, “यह ऐसे क्यों कर रहा है?”

मीरा ने कहा, “जानवर कभी-कभी वह देख लेते हैं, जिसे इंसान देखने से इनकार करता है।”

“तुम्हें सच में लगता है कि वह कोई आत्मा है?”

“नहीं।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“तो फिर क्या है?”

मीरा कुछ देर चुप रही।

“आत्मा किसी इंसान की होती है। लेकिन जो चीज़ आईने में है, वह जरूरी नहीं कि कभी इंसान रही हो।”

वे आगे बढ़े।

गली के आखिरी मकान की खिड़की खुली थी। उसके अंदर एक बूढ़ा आदमी बैठा था। उसने सफेद धोती पहन रखी थी और उसके सामने मिट्टी का दीया जल रहा था।

अर्जुन ने उसे पहचानने की कोशिश की।

वह देवगढ़ के पुराने डाकिए रामलाल जैसा दिखता था, जो कई साल पहले मर चुका था।

“अर्जुन बाबू,” बूढ़े ने आवाज़ लगाई।

अर्जुन रुक गया।

मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“मत रुकना।”

बूढ़ा आदमी खिड़की से बाहर झुका।

“तुम्हारे पिता ने मुझे एक चिट्ठी दी थी।”

अर्जुन के कदम धीमे हो गए।

“किस बारे में?”

“तुम्हारे जन्म के बारे में।”

मीरा ने दाँत भींच लिए।

“वह झूठ बोल रहा है।”

बूढ़े आदमी ने उसकी तरफ देखा।

“राधा की बेटी, तुम अब भी हर किसी को झूठा कहती हो?”

मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया।

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“यह तुम्हें कैसे जानता है?”

बूढ़ा आदमी हँसा।

“मैंने तुम्हारी माँ को भी देखा था। उसी रात, जब दो बच्चों को एक ही नाम दिया गया था।”

अर्जुन उसके करीब जाने लगा।

मीरा ने उसका हाथ खींचा।

“भैया, उसकी बात मत सुनो।”

बूढ़े ने जेब से एक पुराना लिफाफा निकाला।

“तुम्हारे पिता ने कहा था, अगर अर्जुन लौटे, तो यह उसे दे देना।”

“तो दे दीजिए,” अर्जुन ने कहा।

बूढ़े ने लिफाफा खिड़की से बाहर गिरा दिया।

लिफाफा जमीन पर गिरते ही खुल गया।

उसके भीतर से एक पुरानी तस्वीर निकली।

अर्जुन ने तस्वीर उठाई।

तस्वीर में विक्रम शर्मा खड़े थे। उनके साथ एक डॉक्टर था। पीछे एक अस्पताल का कमरा दिखाई दे रहा था।

तस्वीर के नीचे तारीख लिखी थी—

**18 जुलाई 1995।**

लेकिन तस्वीर में विक्रम अकेले नहीं थे।

उनके हाथ में एक छोटा बच्चा था।

और उनके पीछे अस्पताल के बिस्तर पर दूसरा बच्चा पड़ा था।

उसके चेहरे पर सफेद कपड़ा ढका हुआ था।

तस्वीर के पीछे लिखा था—

**एक बच्चे को घर ले गए। दूसरे को वापस लाने का वादा किया।**

अर्जुन ने बूढ़े आदमी की तरफ देखा।

“दूसरे बच्चे को कहाँ ले गए?”

बूढ़े ने अपना सिर धीरे-धीरे खिड़की से बाहर निकाला।

उसकी गर्दन अस्वाभाविक रूप से लंबी होने लगी।

“कुएँ में।”

मीरा ने अर्जुन को खींचा।

“भागो!”

वे दौड़ पड़े।

पीछे से बूढ़े की हँसी गूँजती रही।

लेकिन कुछ ही कदम बाद अर्जुन ने महसूस किया कि उसके हाथ में पकड़ी तस्वीर बदल गई है।

उसने दौड़ते-दौड़ते उसे देखा।

अब तस्वीर में विक्रम नहीं थे।

डॉक्टर नहीं था।

अस्पताल नहीं था।

उसमें सिर्फ अर्जुन खड़ा था।

उसके बगल में एक खाली जगह थी।

और तस्वीर के पीछे नया वाक्य लिखा था—

**तुम अकेले पैदा नहीं हुए थे।**

***

### 3. बरगद के नीचे

जब वे पुराने बाग तक पहुँचे, तब रात और गहरी हो चुकी थी।

बरगद का पेड़ दूर से ही दिखाई दे रहा था। उसकी शाखाएँ आकाश में फैली हुई थीं और जड़ें जमीन के भीतर जाने के बजाय पत्थर की मुंडेर के चारों ओर लिपटी थीं।

कुएँ के पास पहुँचते ही अर्जुन को एक अजीब गंध महसूस हुई।

गीली मिट्टी।

पुराना लोहे का सामान।

और अस्पताल में इस्तेमाल होने वाली दवाइयों जैसी तीखी गंध।

“यह जगह कभी अस्पताल थी?” उसने पूछा।

मीरा ने कहा, “नहीं। लेकिन किसी ने यहाँ अस्पताल जैसा कमरा बनाया था।”

“किसने?”

“शायद तुम्हारे पिता ने।”

कुएँ की मुंडेर पर कई नाम खुदे हुए थे। उनमें विक्रम शर्मा, शारदा देवी और राधा का नाम साफ पढ़ा जा सकता था।

लेकिन सबसे नीचे एक नाम था, जिसे किसी ने बार-बार मिटाने की कोशिश की थी।

**अभय।**

उसके नीचे दूसरा नाम था।

**अर्णव।**

और दोनों नामों के बीच तीन गहरी रेखाएँ थीं।

अर्जुन ने उँगली से उन रेखाओं को छुआ।

अचानक कुएँ के भीतर से किसी बच्चे की चीख सुनाई दी।

वह पीछे हट गया।

“यह आवाज़ पहले भी सुनी है।”

मीरा ने पूछा, “कहाँ?”

“मुझे नहीं पता। शायद सपने में।”

कुएँ के भीतर से आवाज़ आई—

“भैया!”

अर्जुन की साँस रुक गई।

“कौन है?”

मीरा ने तुरंत उसका मुँह ढक दिया।

“तुम्हें जवाब नहीं देना था!”

अँधेरे में कोई हँसा।

“बहुत देर हो गई, मीरा।”

कुएँ के भीतर से दो छोटी-छोटी हथेलियाँ ऊपर आईं। वे पत्थर की मुंडेर पकड़कर धीरे-धीरे ऊपर चढ़ने लगीं।

पहले उँगलियाँ दिखाई दीं।

फिर कलाई।

फिर एक बच्चे का सिर।

उसका चेहरा अर्जुन जैसा था।

लेकिन उसकी त्वचा पर मिट्टी की मोटी परत जमी हुई थी और आँखें बंद थीं।

वह बच्चा कुएँ से बाहर निकला और मुंडेर पर बैठ गया।

“भैया,” उसने कहा, “तुम मुझे लेने आए हो?”

अर्जुन ने पीछे हटते हुए पूछा, “तुम कौन हो?”

बच्चे ने आँखें खोल दीं।

वे बिल्कुल सफेद थीं।

“तुमने मुझे नाम दिया था।”

“मैंने तुम्हें कोई नाम नहीं दिया!”

“तुमने कहा था कि मेरा नाम अभय है।”

“तुम अभय हो?”

बच्चे ने सिर झुका लिया।

“मुझे नहीं पता।”

उसकी आवाज़ में ऐसा दर्द था कि अर्जुन का दिल पसीज गया।

“तुम्हें क्या हुआ था?”

बच्चे ने अपनी छाती पर हाथ रखा।

“मैं रोया था।”

“कब?”

“जब मुझे पता चला कि कोई मुझे लेने नहीं आएगा।”

मीरा की आँखों से आँसू बहने लगे।

“तुम्हें यहाँ नहीं होना चाहिए।”

बच्चे ने उसकी तरफ देखा।

“तुम्हें भी तो नहीं होना चाहिए था, दीदी।”

मीरा पीछे हट गई।

अर्जुन ने उसे देखा।

“यह तुम्हें दीदी क्यों कह रहा है?”

मीरा ने काँपते हुए कहा, “मुझे नहीं पता।”

बच्चा मुस्कराया।

“तुम्हें बहुत कुछ नहीं पता, मीरा। लेकिन मुझे सब याद है।”

उसने कुएँ के भीतर इशारा किया।

“वह नीचे इंतज़ार कर रहा है।”

“कौन?” अर्जुन ने पूछा।

बच्चे ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।

“वह, जो हम दोनों में से किसी एक का पिता है।”

***

### 4. कुएँ का दरवाज़ा

अर्जुन ने कुएँ में झाँकने की कोशिश की, लेकिन अंदर केवल अँधेरा था।

मीरा ने टॉर्च जलाई।

रोशनी नीचे तक गई, पर पानी दिखाई नहीं दिया। कुएँ की दीवारों पर लोहे की सीढ़ियाँ लगी थीं, जो बहुत नीचे उतर रही थीं।

“यह कुआँ इतना गहरा नहीं था,” अर्जुन ने कहा।

“यह हमेशा इतना ही गहरा था,” मीरा ने जवाब दिया।

“तुम यहाँ पहले आई हो?”

मीरा ने धीरे से सिर हिलाया।

“कब?”

“17 जुलाई 2008 की रात।”

अर्जुन उसे घूरता रह गया।

“तुमने कहा था कि तुम तीसरी मंज़िल से गायब हुई थीं।”

“मैं गायब हुई थी।”

“तो फिर यहाँ कैसे आईं?”

मीरा ने अपनी हथेली खोली।

उसमें एक छोटी चाबी थी। चाबी पर तीन अंक खुदे हुए थे।

313.

“यह मुझे माँ ने दी थी,” उसने कहा। “उन्होंने कहा था कि अगर कभी कुएँ का दरवाज़ा खुले, तो इस चाबी को उस ताले में लगाना जो पानी के नीचे नहीं डूबता।”

“पानी तो है ही नहीं।”

“इसलिए तो यह दरवाज़ा खुला है।”

मीरा ने कुएँ की दीवार पर टॉर्च घुमाई। लगभग दस फुट नीचे एक छोटा लोहे का दरवाज़ा दिखाई दिया।

उसके बीच में ताला लगा था।

अर्जुन ने पूछा, “हम नीचे कैसे जाएँगे?”

मीरा ने सीढ़ियों की तरफ इशारा किया।

“एक-एक करके।”

वे कुएँ में उतरने लगे।

जैसे-जैसे वे नीचे जाते, ऊपर की दुनिया की आवाज़ें गायब होती जातीं। हवा ठंडी होती गई और दीवारों पर नमी बढ़ने लगी।

कुछ देर बाद अर्जुन को लगा कि कोई उसके पीछे उतर रहा है।

उसने पीछे देखा।

ऊपर कोई नहीं था।

लेकिन सीढ़ियों पर गीले पैरों के निशान बनते जा रहे थे।

एक।

दो।

तीन।

फिर वे निशान अर्जुन के पैरों के पास आकर रुक गए।

उसने नीचे देखा।

उसके जूतों के पास एक छोटी लाल गेंद पड़ी थी।

अर्जुन ने गेंद उठाई नहीं।

वह बस उसे देखता रहा।

गेंद अपने आप लुढ़कने लगी और लोहे के दरवाज़े के सामने जाकर रुक गई।

मीरा ने चाबी ताले में लगाई।

ताला खुल गया।

दरवाज़े के पीछे एक संकरा गलियारा था।

दीवारों पर पुरानी तस्वीरें लगी थीं। हर तस्वीर में एक बच्चा था। किसी में नवजात शिशु, किसी में पाँच साल का बच्चा, किसी में दस साल का।

हर तस्वीर के नीचे तारीख लिखी थी।

17 जुलाई 1995।

17 जुलाई 2000।

17 जुलाई 2005।

17 जुलाई 2008।

17 जुलाई 2013।

17 जुलाई 2023।

अर्जुन की आँखें 2008 की तस्वीर पर ठहर गईं।

उसमें वह तेरह साल का था।

उसके पास मीरा खड़ी थी।

और उनके बीच एक तीसरा बच्चा था, जिसका चेहरा पूरी तरह काला कर दिया गया था।

तस्वीर के नीचे लिखा था—

**इस रात तीन बच्चे आए थे। सुबह केवल दो की गिनती की गई।**

अर्जुन ने मीरा की तरफ देखा।

“तीसरा बच्चा कौन था?”

मीरा ने सिर हिलाया।

“मुझे नहीं पता।”

गलियारे के आखिर में एक कमरा था। दरवाज़े पर सफेद रंग से लिखा था—

**जन्म कक्ष।**

अर्जुन ने दरवाज़ा खोला।

अंदर तीन लोहे के पालने रखे थे।

दो खाली थे।

तीसरे में एक पुरानी गुड़िया पड़ी थी।

गुड़िया के गले में एक पट्टी बँधी थी।

उस पर लिखा था—

**ईशान।**

अर्जुन का चेहरा बदल गया।

“ईशान यहाँ था?”

मीरा ने गुड़िया की ओर देखा।

“यह कमरा 1995 में बंद कर दिया गया था।”

“लेकिन ईशान तो...”

वह रुक गया।

उसे याद आया कि ईशान ने खुद को राधा का बेटा बताया था। कभी वह आईने के भीतर दिखाई देता, कभी कमरे में, कभी उसकी अपनी यादों में।

अर्जुन ने गुड़िया उठा ली।

गुड़िया की आँखें अचानक खुल गईं।

“मुझे यहाँ से बाहर ले चलो,” उसने कहा।

अर्जुन ने उसे गिरा दिया।

गुड़िया फर्श पर पड़ी रही।

लेकिन उसकी आवाज़ कमरे में गूँजती रही।

“भैया...”

फिर एक दूसरी आवाज़ आई।

“उसे मत उठाना।”

यह विक्रम की आवाज़ थी।

कमरे के दरवाज़े पर अर्जुन के पिता खड़े थे।

इस बार उनका चेहरा साफ था।

और उनकी आँखों में भय था।

“पापा,” अर्जुन ने कहा, “मुझे सच बता दीजिए।”

विक्रम ने सिर झुका लिया।

“मैंने बहुत देर कर दी, बेटा।”

“क्या मैं अभय हूँ?”

विक्रम ने जवाब नहीं दिया।

“क्या मैं अर्णव हूँ?”

फिर भी चुप्पी।

“क्या मैं आपका बेटा हूँ?”

विक्रम की आँखों से आँसू बहने लगे।

“तुम मेरे बेटे हो।”

“तो फिर मेरे जन्म के समय क्या हुआ था?”

विक्रम ने कमरे के तीसरे पालने की तरफ देखा।

“उस रात दो नहीं, तीन बच्चे थे।”

अर्जुन के पैरों के नीचे से जैसे जमीन खिसक गई।

“तीन?”

“एक बच्चा पैदा हुआ। दूसरा बच्चा साँस नहीं ले रहा था। और तीसरा...”

विक्रम की आवाज़ टूट गई।

“तीसरा बच्चा पैदा ही नहीं हुआ था।”

***

### 5. वह बच्चा जो पैदा नहीं हुआ

अर्जुन ने विक्रम को घूरा।

“यह कैसी बात है? कोई बच्चा पैदा ही नहीं हुआ और फिर भी वह यहाँ था?”

विक्रम ने कहा, “मैं जानता हूँ कि यह सुनने में असंभव लगता है।”

“यह असंभव नहीं है, पापा। यह पागलपन है!”

“मैं भी यही सोचता था।”

विक्रम ने धीरे-धीरे कमरे के भीतर कदम रखा।

“1995 में तुम्हारी माँ को प्रसव के दौरान बहुत परेशानी हुई थी। डॉक्टर नीलकंठ ने कहा था कि दो बच्चे हो सकते हैं। लेकिन जब पहला बच्चा पैदा हुआ, तो उसकी धड़कन बहुत कमजोर थी। दूसरे की धड़कन नहीं मिली।”

“और तीसरा?”

विक्रम ने पालने की तरफ देखा।

“तीसरे की धड़कन आईने के पीछे से आई थी।”

अर्जुन चुप हो गया।

“उस रात अस्पताल में एक पुराना आईना था,” विक्रम ने बताया। “वह आईना किसी ने शर्मा निवास से लाकर वहाँ रखा था। शारदा माँ ने कहा था कि उसे वहाँ रखना जरूरी है।”

“क्यों?”

“क्योंकि उन्हें डर था कि अगर आईना घर में रहा, तो वह बच्चे तक पहुँच जाएगा।”

“कौन?”

विक्रम ने उत्तर देने से पहले आँखें बंद कीं।

“वही परछाईं।”

कमरे की हवा ठंडी हो गई।

“तुम्हारी दादी ने सोचा था कि आईने को घर से दूर रखकर वह उस चीज़ को रोक लेंगी। लेकिन जब पहला बच्चा पैदा हुआ, तो आईने में किसी तीसरे बच्चे की आकृति दिखाई दी।”

“वह कौन था?”

“उसने अपना नाम नहीं बताया।”

“तो आपने उसे ईशान कहा?”

विक्रम ने सिर हिलाया।

“नहीं। ईशान का नाम बहुत बाद में सामने आया।”

अर्जुन ने पूछा, “फिर क्या हुआ?”

विक्रम की आवाज़ धीमी हो गई।

“उस रात आईने में दिखने वाला बच्चा रोने लगा। और उसी समय अस्पताल में पड़ा वह बच्चा, जिसकी धड़कन नहीं थी, अचानक साँस लेने लगा।”

अर्जुन की साँस अटक गई।

“तो फिर?”

“डॉक्टर ने कहा कि यह चमत्कार है।”

“लेकिन आप जानते थे कि यह चमत्कार नहीं था।”

विक्रम ने उसकी ओर देखा।

“हाँ।”

“आपने क्या किया?”

“मैंने तुम्हें गोद में उठाया।”

“मुझे?”

“या शायद उस बच्चे को, जिसे मैं तुम समझता था।”

अर्जुन पीछे हट गया।

“आपको खुद नहीं पता कि आपने किसे उठाया था?”

विक्रम ने सिर झुका लिया।

“उस रात के बाद बहुत कुछ बदल गया था। अस्पताल के रिकॉर्ड बदल दिए गए। तुम्हारी दादी ने नाम बदल दिए। राधा गायब हो गई। और आईने में दिखने वाला बच्चा हमारे साथ घर लौट आया।”

“ईशान?”

“मुझे नहीं पता।”

“फिर आपने क्या किया?”

“मैंने उस बच्चे को तीसरी मंज़िल पर बंद कर दिया।”

अर्जुन के दिमाग में सारे दृश्य एक साथ घूमने लगे।

तीसरी मंज़िल।

लाल रोशनी।

बंद कमरा।

आईना।

दादी की डायरी।

वह आवाज़ जो उसका नाम लेती थी।

“तो क्या वह बच्चा अभय था?”

विक्रम ने धीरे से कहा, “कभी-कभी मुझे लगता था कि वह अभय है। कभी लगता था कि वह अर्णव है। और कभी मुझे लगता था कि वह किसी भी बच्चे की शक्ल पहन सकता है।”

“आपने मुझे क्यों नहीं बताया?”

विक्रम की आँखों में दर्द था।

“क्योंकि तुम्हें बचाने के लिए मुझे यह मानना पड़ा कि तुम वही बच्चा हो, जिसे हमने घर लाया था।”

अर्जुन ने गुस्से से कहा, “और अगर मैं वह बच्चा नहीं था?”

विक्रम ने उसकी तरफ देखा।

“तो फिर वह बच्चा कहाँ गया, यह सवाल मैंने कभी पूछने की हिम्मत नहीं की।”

कमरे में अचानक घंटी की आवाज़ गूँजी।

लेकिन मीरा के पास अब घंटी नहीं थी। वह टूट चुकी थी।

विक्रम ने दरवाज़े की तरफ देखा।

“हमें यहाँ से जाना होगा।”

“क्यों?”

“क्योंकि वह जान गया है कि मैंने तुम्हें सच का एक हिस्सा बता दिया है।”

“वह कौन है?”

विक्रम ने अर्जुन के कंधे पर हाथ रखा।

“तीसरी परछाईं।”

अचानक कमरे की सारी बत्तियाँ बुझ गईं।

अँधेरे में एक बच्चे की आवाज़ आई—

“पापा, आपने फिर झूठ बोला।”

विक्रम ने अर्जुन को अपने पीछे कर लिया।

“मैंने झूठ नहीं बोला।”

“तो फिर उसे बताओ कि तीसरा बच्चा कौन था।”

विक्रम चुप रहा।

आवाज़ फिर आई।

“उसे बताओ कि उस रात कौन मरा था।”

कमरे के बीचोंबीच रखे पालने से खड़खड़ाहट की आवाज़ आई।

अर्जुन ने टॉर्च जलाई।

पालने में अब गुड़िया नहीं थी।

उसकी जगह एक बच्चा लेटा था।

उसकी आँखें खुली थीं।

वह अर्जुन को देखकर मुस्कराया।

“भैया,” उसने कहा, “क्या तुम्हें अब भी याद नहीं कि तुमने मुझे किस नाम से पुकारा था?”

अर्जुन के मुँह से निकला—

“अभय...”

बच्चे की मुस्कान गायब हो गई।

“गलत।”

उसने अपना हाथ उठाया।

उसकी हथेली पर तीन काली रेखाएँ थीं।

“मेरा नाम था...”

उससे पहले कि वह अपना नाम बोल पाता, विक्रम ने अर्जुन को धक्का देकर दरवाज़े से बाहर कर दिया।

“भागो!”

अर्जुन और मीरा गलियारे में दौड़ पड़े।

पीछे से विक्रम की चीख सुनाई दी।

फिर तीन तेज दस्तकें।

और फिर ऐसी आवाज़, जैसे किसी ने भारी लोहे का दरवाज़ा बंद कर दिया हो।

***

### 6. पिता की आखिरी चेतावनी

अर्जुन और मीरा सीढ़ियाँ चढ़कर कुएँ के बाहर आ गए।

सुबह की पहली रोशनी फैलने लगी थी, लेकिन बरगद के नीचे अब भी अँधेरा था।

अर्जुन ने पीछे मुड़कर देखा।

कुएँ के भीतर से कोई बाहर नहीं आया।

लेकिन उसकी दीवारों पर तीन परछाइयाँ दिखाई दे रही थीं।

एक बच्चे की।

एक आदमी की।

और एक ऐसी, जिसकी आकृति लगातार बदल रही थी।

“पापा अंदर रह गए,” अर्जुन ने कहा।

मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“वह तुम्हारे पिता नहीं थे।”

“उन्होंने मुझे बचाया!”

“वह तुम्हें सच से दूर भी रख रहे थे।”

“अगर वह सच नहीं बोल रहे थे, तो उन्होंने मुझे तीसरे बच्चे के बारे में क्यों बताया?”

मीरा के पास जवाब नहीं था।

अर्जुन कुएँ की ओर बढ़ा, लेकिन अचानक उसके फोन की घंटी बज उठी।

स्क्रीन पर एक अज्ञात नंबर था।

उसने फोन उठाया।

दूसरी तरफ कुछ सेकंड तक सिर्फ साँसों की आवाज़ आती रही।

फिर विक्रम की आवाज़ सुनाई दी।

“अर्जुन?”

“पापा!”

“ध्यान से सुनो। तुम्हारे पास ज्यादा समय नहीं है।”

“आप कहाँ हैं?”

“जहाँ मुझे होना चाहिए था।”

“मैं आपको लेने आ रहा हूँ!”

“नहीं। मेरी बात सुनो। कुएँ के नीचे जो तुमने देखा, वह सब सच नहीं था।”

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

“मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।”

“यही वह चाहता है।”

“कौन?”

“जो तुम्हारे पीछे खड़ा था।”

अर्जुन ने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।

बरगद के नीचे कोई नहीं था।

लेकिन उसके कंधे पर फिर वही ठंडा हाथ महसूस हुआ।

विक्रम की आवाज़ फोन पर काँपने लगी।

“अर्जुन, तुम्हारी माँ के बारे में जो कुछ तुम जानते हो, वह अधूरा है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह तुम्हारी माँ नहीं हैं।”

“तो फिर कौन है वह औरत, जिसे मैंने कुएँ के अंदर देखा?”

“वह राधा थी।”

अर्जुन का दिल तेजी से धड़कने लगा।

“राधा? मीरा की माँ?”

“हाँ।”

“लेकिन उसका चेहरा मेरी माँ जैसा था!”

विक्रम चुप हो गया।

फिर बोला, “क्योंकि उस रात आईने में पहली बार राधा ने तुम्हारी माँ का चेहरा पहना था।”

अर्जुन का हाथ काँपने लगा।

“क्यों?”

“क्योंकि वह तुम्हें बाहर बुलाना चाहती थी।”

“किससे बाहर?”

“आईने से।”

फोन पर अचानक तेज खरखराहट हुई।

फिर विक्रम की आवाज़ बदल गई।

अब वह किसी बच्चे की आवाज़ थी।

“भैया, फोन रख दो।”

अर्जुन ने फोन दूर कर लिया।

“तुम कौन हो?”

“तुम मुझे जानते हो।”

“तुम अभय हो?”

बच्चा हँसा।

“तुम हर बार गलत नाम लेते हो।”

“तो सही नाम बताओ!”

कुछ क्षण सन्नाटा रहा।

फिर आवाज़ ने फुसफुसाकर कहा—

“मेरा नाम वही है, जिसे तुम्हारी दादी ने मरने से पहले मिटाया था।”

फोन कट गया।

अर्जुन ने स्क्रीन देखी।

समय 3:13 दिखा रहा था।

लेकिन सुबह हो चुकी थी।

मीरा ने पूछा, “क्या कहा उसने?”

अर्जुन ने जवाब नहीं दिया।

वह धीरे-धीरे कुएँ की तरफ बढ़ा।

मुंडेर पर अब एक नया निशान था।

तीन काली रेखाएँ।

उनके नीचे लिखा था—

**17 जुलाई 2038।**

और उसके नीचे एक वाक्य—

**उस दिन तुममें से केवल एक घर लौटेगा।**

***

### 7. घर लौटने वाला कौन था?

शर्मा निवास लौटते समय अर्जुन ने एक शब्द भी नहीं कहा।

मीरा उसके साथ चल रही थी, लेकिन वह भी चुप थी। दोनों जानते थे कि कुएँ में जो कुछ हुआ, उसके बाद उनकी जिंदगी पहले जैसी नहीं रह सकती।

मुख्य दरवाज़े पर पहुँचकर अर्जुन रुक गया।

दरवाज़े के ऊपर लगी पुरानी घड़ी चल रही थी।

3:14.

फिर 3:15.

समय आगे बढ़ रहा था।

अर्जुन ने राहत की साँस ली।

“कम-से-कम अब समय तो सामान्य है।”

मीरा ने घड़ी की तरफ देखा।

“समय कभी सामान्य नहीं था, भैया। बस हमें ऐसा लगता था।”

अंदर बैठक में उसकी माँ बैठी थीं।

उनके सामने एक पुराना रजिस्टर खुला था।

अर्जुन को देखते ही उन्होंने उसे बंद कर दिया।

“तुम कहाँ थे?”

“पुराने कुएँ पर।”

माँ का चेहरा पीला पड़ गया।

“तुम वहाँ क्यों गए?”

“क्योंकि आपने मुझे सच नहीं बताया।”

माँ ने सिर झुका लिया।

“मैंने तुम्हें बचाने की कोशिश की।”

“किससे?”

“तुम्हारी यादों से।”

अर्जुन उनके सामने बैठ गया।

“माँ, क्या मेरे जन्म के समय दो बच्चे थे?”

उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।

“क्या उनमें से एक की मृत्यु हो गई थी?”

उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

“हाँ।”

“कौन?”

माँ ने काँपते हुए कहा, “मुझे नहीं पता।”

अर्जुन ने गुस्से से मेज पर हाथ मारा।

“आपको नहीं पता? आप वहाँ थीं!”

“मैं वहाँ थी, अर्जुन। लेकिन उस रात जो बच्चा मेरे सामने रखा गया था, उसका चेहरा मैंने नहीं देखा था।”

“क्यों?”

“क्योंकि डॉक्टर ने कहा था कि बच्चे को तुरंत दूसरी जगह ले जाना होगा। जब वह वापस आया, तब तक शारदा तुम्हें गोद में लेकर जा चुकी थीं।”

“मुझे कहाँ ले गई थीं?”

माँ ने उसकी आँखों में देखा।

“शर्मा निवास।”

“और दूसरा बच्चा?”

उनकी आवाज़ टूट गई।

“वह हमारे साथ नहीं आया।”

अर्जुन ने पूछा, “क्या उसका नाम अभय था?”

माँ ने सिर हिलाया।

“शायद।”

“शायद?”

“उस रात रजिस्टर में दो नाम लिखे गए थे। लेकिन जब मैंने अगली सुबह उन्हें देखा, तो एक नाम मिटा दिया गया था।”

“किसने?”

माँ ने धीरे से कहा, “तुम्हारे पिता ने।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

“पापा ने?”

“विक्रम ने कहा था कि अगर वह नाम किसी ने पढ़ लिया, तो बच्चा वापस आ जाएगा।”

अर्जुन की साँस रुक गई।

“कौन-सा बच्चा?”

माँ ने जवाब देने के बजाय अपनी साड़ी के पल्लू में बँधी चाबी निकाली।

वह एक छोटी पीतल की चाबी थी।

उस पर 313 खुदा हुआ था।

“यह तुम्हारे पिता ने मुझे दी थी,” उन्होंने कहा। “उन्होंने कहा था कि इसे उस दिन इस्तेमाल करना, जब अर्जुन अपने जन्म के बारे में पूछे।”

अर्जुन ने चाबी ली।

“यह किस दरवाज़े की है?”

माँ ने ऊपर की मंज़िल की तरफ देखा।

“तीसरी मंज़िल के उस कमरे की, जहाँ आईना रखा है।”

मीरा तुरंत खड़ी हो गई।

“नहीं!”

माँ ने उसकी ओर देखा।

“अब इसे रोकना संभव नहीं है।”

“अगर वह दरवाज़ा खुला, तो सब खत्म हो जाएगा!”

“नहीं,” माँ ने कहा, “अगर वह दरवाज़ा नहीं खुला, तो सब हमेशा के लिए अधूरा रह जाएगा।”

अर्जुन ने चाबी मुट्ठी में बंद कर ली।

“मैं आज रात उस कमरे का दरवाज़ा खोलूँगा।”

माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“तुम्हें एक बात समझनी होगी।”

“क्या?”

“तुम्हारे पिता ने आईने को बंद नहीं किया था।”

“तो फिर?”

माँ की आँखें भर आईं।

“उन्होंने किसी को उसके अंदर बंद किया था।”

अर्जुन ने पूछा, “किसे?”

माँ ने जवाब दिया—

“अपने बेटे को।”

***

### 8. आईने के पीछे लिखा नाम

रात होने तक अर्जुन ने किसी से बात नहीं की।

वह अपने कमरे में बैठा रहा और 1995 के रजिस्टर की प्रतिलिपि पढ़ता रहा। उसने जन्म की तारीख, समय और दोनों नामों को कई बार लिखा।

अभय।

अर्णव।

फिर उसने तीसरा नाम लिखने की कोशिश की।

लेकिन हर बार उसकी उँगलियाँ रुक जातीं।

उसे ऐसा लगता जैसे उसके दिमाग में कोई खाली जगह है, जिसमें शब्द होना चाहिए, लेकिन वह शब्द वहाँ से निकाल लिया गया है।

रात के 11 बजे मीरा उसके कमरे में आई।

“तुम सोए नहीं?”

“नींद नहीं आ रही।”

“तुम्हें डर लग रहा है?”

अर्जुन ने हल्का-सा सिर हिलाया।

“मुझे डर इस बात का नहीं कि आईने में क्या है। मुझे डर इस बात का है कि अगर वह सच बोल रहा है, तो मेरी पूरी जिंदगी झूठ पर बनी है।”

मीरा उसके पास बैठ गई।

“तुम्हारी जिंदगी झूठ नहीं है, भैया। तुम्हारी यादें अधूरी हो सकती हैं, तुम्हारा जन्म रहस्य हो सकता है, लेकिन तुमने जो प्यार किया, जो दर्द महसूस किया, वह झूठ नहीं था।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“और तुम?”

मीरा चुप रही।

“तुम्हारी जिंदगी का क्या? तुम सच में कौन हो?”

उसकी आँखें भर आईं।

“मैं बस मीरा होना चाहती हूँ।”

अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“तो मेरे लिए तुम मीरा ही हो।”

मीरा मुस्कराने की कोशिश करने लगी, लेकिन तभी कमरे की खिड़की पर किसी ने दस्तक दी।

ठक।

दोनों ने खिड़की की तरफ देखा।

बाहर कोई नहीं था।

फिर दूसरी दस्तक हुई।

ठक।

इस बार आवाज़ खिड़की के भीतर से आई।

तीसरी दस्तक हुई।

ठक।

और अर्जुन के कमरे का आईना अपने आप धुँधला हो गया।

उस पर शब्द उभरने लगे—

**अभय मर गया था।**

फिर नीचे दूसरी पंक्ति—

**अर्णव पैदा हुआ था।**

तीसरी पंक्ति—

**लेकिन तीसरा बच्चा अब भी जीवित है।**

अर्जुन ने आईने को छूने के लिए हाथ बढ़ाया।

मीरा ने उसे रोक लिया।

“इसे मत छूना।”

“मुझे नाम जानना है।”

“अगर नाम याद आ गया, तो वह तुम्हें पहचान लेगा।”

“कौन?”

मीरा ने काँपते हुए कहा, “वही बच्चा, जिसे तुम्हारी दादी ने आईने के पीछे छिपाया था।”

आईने पर नई पंक्ति उभरी—

**मेरा नाम तुम्हारी साँसों में है।**

फिर अक्षर बदलने लगे।

पहले एक नाम उभरा।

**अभय।**

फिर वह मिट गया।

दूसरा नाम उभरा।

**अर्णव।**

वह भी मिट गया।

तीसरा नाम उभरने लगा।

अर्जुन ने आँखें सिकोड़कर उसे पढ़ने की कोशिश की।

लेकिन नाम पूरा होने से पहले आईना काले धुएँ से भर गया।

उसके भीतर से एक हाथ बाहर निकला।

उस हाथ की उँगलियाँ अर्जुन की उँगलियों जैसी थीं।

हाथ ने उसकी कलाई पकड़ ली।

मीरा ने उसे पीछे खींचा।

“अर्जुन!”

अर्जुन ने पूरी ताकत से हाथ छुड़ाने की कोशिश की।

आईने के भीतर से आवाज़ आई—

“भैया, इस बार मुझे मत छोड़ना।”

अर्जुन ने जवाब दिया, “मैं तुम्हें नहीं छोड़ूँगा!”

जैसे ही उसके मुँह से ये शब्द निकले, आईने की सतह पर एक तेज दरार पड़ी।

कमरे की दीवारें काँपने लगीं।

और उसी क्षण अर्जुन को याद आया—

एक छोटा कमरा।

तीन पालने।

एक बच्चा रो रहा था।

दूसरा बच्चा शांत पड़ा था।

तीसरा बच्चा आईने के भीतर से उसे देख रहा था।

और एक औरत की आवाज़ कह रही थी—

“इनमें से एक को बाहर रखना होगा।”

अर्जुन चीखकर पीछे गिर पड़ा।

आईना फिर शांत हो गया।

मीरा उसके पास बैठी।

“तुमने क्या देखा?”

अर्जुन ने काँपते हुए कहा, “मैंने उस रात को देखा।”

“क्या याद आया?”

“तीन बच्चे थे।”

“और?”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

उसकी आँखों में ऐसा डर था, जो मीरा ने पहले कभी नहीं देखा था।

“तीसरे बच्चे ने मेरा नाम नहीं लिया था।”

“तो क्या कहा था?”

अर्जुन ने धीरे से जवाब दिया—

“उसने कहा था—मुझे अपना नाम दे दो।”

***

### 9. आखिरी पन्ना

अगली सुबह अर्जुन दादी की डायरी लेकर बैठा।

उसने पहली बार डायरी के हर पन्ने को ध्यान से पढ़ने का फैसला किया। अब तक वह उन पन्नों पर ध्यान देता रहा था, जिनमें तीसरी मंज़िल, राधा और आईने का जिक्र था।

लेकिन इस बार उसने उन पन्नों को भी पढ़ा, जिन पर साधारण घरेलू बातें लिखी थीं।

राशन का हिसाब।

दवाइयों के नाम।

गाँव के लोगों के आने-जाने की तारीखें।

और एक पन्ने पर लिखा था—

**17 जुलाई 1995।**

उसके नीचे शारदा देवी ने लिखा था—

*आज घर में एक बच्चा आया। विक्रम कहता है कि वह हमारा बेटा है। राधा कहती है कि उसे बचाना होगा। लेकिन मैंने उसकी आँखों में जो देखा, वह किसी नवजात बच्चे की आँखों में नहीं होना चाहिए।*

अर्जुन ने पन्ना पलटा।

अगले पन्ने पर लिखा था—

*रात 3:13 पर आईना पहली बार खुला। भीतर से किसी बच्चे ने रोने की आवाज़ निकाली। मैंने दरवाज़ा बंद कर दिया। लेकिन दरवाज़ा बंद करने से पहले उसने मुझे मेरा पुराना नाम लेकर पुकारा।*

अर्जुन का हाथ रुक गया।

दादी का पुराना नाम?

उसने आगे पढ़ा।

*मैंने उसे जवाब नहीं दिया। अगर मैंने जवाब दिया होता, तो शायद वह मुझे भी अपने भीतर खींच लेता।*

अगले पन्ने पर तारीख थी—

**18 जुलाई 1995।**

*विक्रम ने कहा है कि वह बच्चे को घर ले जाएगा। मैंने उसे रोकने की कोशिश की। लेकिन वह कहता है कि अब पीछे लौटना संभव नहीं है।*

*राधा ने मुझसे एक वादा लिया है। उसने कहा कि अगर कभी अर्जुन को अपने जन्म के बारे में पता चले, तो मैं उसे तीसरी मंज़िल पर अकेला न जाने दूँ।*

*मैंने उससे पूछा कि अर्जुन कौन है।*

*उसने जवाब नहीं दिया।*

अर्जुन ने पन्ना पलटा।

इसके बाद कई पन्ने फटे हुए थे।

लेकिन आखिरी पन्ने पर कुछ लिखा था।

*अगर अर्जुन यह डायरी पढ़ रहा है, तो शायद मैं मर चुकी हूँ। शायद विक्रम भी नहीं रहा। शायद राधा अब भी आईने के पीछे है।*

*मैंने जिंदगी भर एक बच्चे को बचाने की कोशिश की। लेकिन मुझे अब समझ आया है कि मैंने किसे बचाया था, यह मैं कभी जान ही नहीं पाई।*

*कुएँ के नीचे वह चीज़ रखी है, जो सबूत दे सकती है। लेकिन याद रखना—सबूत भी झूठ बोल सकता है, अगर उसे किसी गलत हाथ ने लिखा हो।*

*डॉ. नीलकंठ के बेटे को ढूँढ़ना। उससे पूछना कि उस रात कितने बच्चे पैदा हुए थे।*

*और अगर वह तीन कहे, तो उससे यह मत पूछना कि तीसरा बच्चा कौन था।*

*बस उससे पूछना—*

वाक्य वहीं खत्म हो गया था।

अर्जुन ने पन्ने को रोशनी के सामने किया।

नीचे बहुत हल्की स्याही में एक और पंक्ति लिखी थी।

**उसका नाम वह बच्चा खुद चुनेगा।**

अर्जुन ने डायरी बंद कर दी।

अब उसे पुराने प्रसूति गृह जाना था।

उसे डॉ. नीलकंठ के बेटे को ढूँढ़ना था।

और सबसे जरूरी बात—

उसे यह पता लगाना था कि वह तीसरा बच्चा आखिर कौन था।

***

### 10. कुएँ से आया फोन

शाम को अर्जुन ने पुराने प्रसूति गृह का पता खोजने की कोशिश की। गाँव के कई लोगों से पूछने पर किसी ने उस जगह के बारे में बात नहीं की।

कुछ लोगों ने कहा कि वह इमारत वर्षों पहले गिर गई थी।

कुछ ने कहा कि वहाँ अब जंगल है।

और एक बूढ़े दुकानदार ने उसका नाम सुनते ही दुकान बंद कर दी।

“उस जगह मत जाना,” उसने कहा।

“क्यों?”

“क्योंकि वहाँ से लौटने वाले लोग अपनी आवाज़ साथ नहीं लाते।”

अर्जुन ने पूछा, “इसका क्या मतलब है?”

बूढ़े ने जवाब नहीं दिया।

उसने बस दुकान का शटर गिरा दिया।

रात को अर्जुन घर लौटा तो उसकी माँ बैठक में बैठी थीं। उनके सामने एक पुराना टेलीफोन रखा था।

वह टेलीफोन कई सालों से खराब था।

लेकिन उस रात उसकी घंटी बज रही थी।

ट्रिन...

ट्रिन...

ट्रिन...

माँ ने अर्जुन की तरफ देखा।

“इसे उठाना मत।”

“क्यों?”

“क्योंकि इस नंबर पर आखिरी बार तुम्हारे पिता ने फोन किया था।”

“कब?”

“जिस रात उनकी मृत्यु हुई थी।”

अर्जुन का दिल तेजी से धड़कने लगा।

फोन फिर बजा।

ट्रिन...

ट्रिन...

अर्जुन ने रिसीवर उठा लिया।

“हैलो?”

दूसरी तरफ से कुछ देर तक केवल साँसों की आवाज़ आती रही।

फिर एक बच्चा बोला—

“भैया?”

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

“तुम कौन हो?”

“तुमने मुझे कुएँ में छोड़ दिया।”

“मैंने तुम्हें नहीं छोड़ा!”

“तो फिर तुम घर क्यों लौट आए?”

अर्जुन ने रिसीवर कसकर पकड़ लिया।

“तुम अभय हो?”

बच्चा हँसा।

“तुम्हें अब भी नाम चाहिए?”

“हाँ!”

“तो सुनो।”

कुछ क्षण के लिए पूरी लाइन शांत हो गई।

फिर बच्चे ने कहा—

“मेरा नाम...”

आवाज़ कट गई।

अर्जुन ने फोन हिलाया।

“हैलो? बोलो!”

दूसरी तरफ से एक आदमी की आवाज़ आई।

“अर्जुन?”

वह डॉ. नीलकंठ की आवाज़ थी।

“तुम्हें सच जानना है?”

अर्जुन की साँस अटक गई।

“हाँ। आप कहाँ हैं?”

“पुराने प्रसूति गृह में।”

“मैं अभी आता हूँ।”

“नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि मैं वहाँ नहीं हूँ।”

अर्जुन चुप हो गया।

आवाज़ ने कहा, “मैं तुम्हारे घर में हूँ।”

अर्जुन ने धीरे-धीरे रिसीवर नीचे किया।

बैठक के दरवाज़े पर एक बूढ़ा आदमी खड़ा था।

उसने सफेद कोट पहन रखा था। हाथ में काला बैग था और चेहरे पर गहरी झुर्रियाँ थीं।

उसकी आँखें अर्जुन पर टिकी थीं।

“डॉक्टर?” अर्जुन ने पूछा।

बूढ़े ने सिर हिलाया।

“डॉ. नीलकंठ का बेटा।”

“आपने कहा था कि आप पुराने प्रसूति गृह में हैं।”

“मैंने यह नहीं कहा था कि मैं वहाँ शरीर लेकर बैठा हूँ।”

अर्जुन पीछे हट गया।

बूढ़े ने अपना बैग मेज पर रखा।

“तुम्हारे पिता ने मुझे यह तुम्हें देने के लिए कहा था।”

उसने बैग खोला।

अंदर एक जन्म प्रमाणपत्र था।

कागज़ पीला पड़ चुका था, लेकिन लिखावट साफ थी।

नाम: अर्णव शर्मा।

जन्मतिथि: 17 जुलाई 1995।

समय: 3:13 AM.

माता: राधा।

पिता: विक्रम शर्मा।

अर्जुन ने प्रमाणपत्र को घूरा।

“यह गलत है।”

बूढ़े ने दूसरा कागज़ निकाला।

नाम: अभय शर्मा।

माता: राधा।

पिता: विक्रम शर्मा।

स्थिति: मृत घोषित।

समय: 3:13 AM.

फिर उसने तीसरा कागज़ निकाला।

उस पर केवल एक पंक्ति लिखी थी—

**जन्म लेने वाला तीसरा बच्चा: नाम अज्ञात।**

अर्जुन की उँगलियाँ काँपने लगीं।

“तीसरा बच्चा कौन था?”

बूढ़े ने उसकी आँखों में देखा।

“तुम्हें यह सवाल नहीं पूछना चाहिए।”

“क्यों?”

“क्योंकि उस रात तीसरा बच्चा पैदा नहीं हुआ था।”

अर्जुन का चेहरा सफेद पड़ गया।

“लेकिन रिकॉर्ड में लिखा है!”

“हाँ।”

“तो फिर?”

बूढ़े ने तीसरे कागज़ को मोड़ा।

“वह पैदा नहीं हुआ था, अर्जुन। वह पहले से वहाँ था।”

कमरे की बत्तियाँ बुझ गईं।

अँधेरे में माँ की चीख सुनाई दी।

फिर एक भारी आवाज़ गूँजी—

“नीलकंठ के बेटे, तुमने अपना वादा तोड़ दिया।”

बूढ़े ने अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।

“अब भागो!”

“कहाँ?”

“जहाँ तुम्हारी परछाईं तुमसे पहले पहुँच चुकी है!”

मुख्य दरवाज़ा अपने आप खुल गया।

बाहर बरगद का पेड़ दिखाई दे रहा था।

उसके नीचे पुराना कुआँ था।

और कुएँ की मुंडेर पर एक बच्चा बैठा था।

उसके हाथ में लाल गेंद थी।

वह अर्जुन को देखकर मुस्कराया।

“भैया,” उसने कहा, “अब तुम्हें मेरा नाम याद आ गया?”

अर्जुन के भीतर अचानक एक याद चमकी।

एक छोटा कमरा।

तीन पालने।

राधा की गोद में एक बच्चा।

विक्रम के हाथ में दूसरा बच्चा।

और आईने के भीतर तीसरा बच्चा, जो उसे देखकर रो रहा था।

उस रात अर्जुन ने उसे एक नाम दिया था।

वह नाम उसकी जीभ पर आ गया।

लेकिन जैसे ही वह उसे बोलने लगा, बूढ़े ने उसका मुँह बंद कर दिया।

“नहीं!”

बूढ़े की आँखों में भय था।

“उसका नाम मत लेना!”

कुएँ के पास बैठा बच्चा हँसने लगा।

उसकी आँखें पूरी तरह काली हो गईं।

“बहुत देर हो गई,” उसने कहा।

“उसने मुझे याद कर लिया है।”

कुएँ के भीतर से एक तेज आवाज़ आई।

जैसे कोई भारी दरवाज़ा खुल रहा हो।

और फिर अँधेरे से तीन परछाइयाँ बाहर निकलीं।

पहली परछाईं अर्जुन की थी।

दूसरी मीरा की।

और तीसरी...

तीसरी परछाईं की कोई शक्ल नहीं थी।

वह सीधे अर्जुन की ओर बढ़ी।

उसने अपना हाथ अर्जुन के सीने पर रखा।

और एक आवाज़ उसके भीतर गूँजी—

**“अब मुझे अपना शरीर वापस चाहिए।”**

अर्जुन चीख पड़ा।

उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया।

जब उसने दोबारा आँखें खोलीं, वह अपने कमरे में था।

सुबह हो चुकी थी।

मेज पर कोई जन्म प्रमाणपत्र नहीं था।

डॉ. नीलकंठ का बेटा गायब था।

और उसकी माँ बैठक में बैठी रो रही थीं।

अर्जुन ने नीचे देखा।

उसकी परछाईं वापस आ गई थी।

लेकिन वह उसके साथ नहीं हिल रही थी।

अर्जुन ने दायाँ हाथ उठाया।

परछाईं ने बायाँ हाथ उठाया।

अर्जुन ने कदम पीछे किया।

परछाईं आगे बढ़ गई।

फिर दीवार पर उसकी परछाईं ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।

उसके चेहरे पर अर्जुन की शक्ल थी।

लेकिन वह मुस्करा रही थी।

अर्जुन नहीं।

परछाईं ने अपने होंठ हिलाए।

इस बार अर्जुन ने उसके शब्द साफ पढ़ लिए।
“एपिसोड 12 में मिलते हैं, भैया।”

Writer
firoj saifi
Story
“अंधेरे में कोई है”
Chapter
11 of 14
Category
Ghost Stories
Reading time
33 min
Words
6506
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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