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एपिसोड 10: माँ के पीछे कौन था

firoj saifi · Ghost Stories · 18 मिनट

Writer
firoj saifi
Story
“अंधेरे में कोई है”
Chapter
10 of 10
Category
Ghost Stories
Reading time
18 min
Words
3503
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

“चलो भैया… माँ तुम्हारा इंतज़ार कर रही है।”

सीढ़ियों के आखिरी पायदान पर खड़ा बच्चा मुस्कुरा रहा था।

उसके हाथ में लाल गेंद थी।

वही लाल गेंद।

जो अर्जुन ने कुछ मिनट पहले भूमिगत कमरे में अपने हाथ में पकड़ी थी।

लेकिन अब वह गेंद बिल्कुल साफ़ थी।

उस पर खून की एक बूंद भी नहीं थी।

बच्चे ने गेंद अर्जुन की तरफ बढ़ाई।

“लो।”

अर्जुन ने हाथ आगे नहीं किया।

वह सिर्फ उसे देखता रहा।

बच्चे की आँखें काली थीं।

पूरी तरह काली।

उसकी उम्र लगभग दस साल थी।

बाल थोड़े बिखरे हुए।

चेहरा…

अर्जुन जैसा।

लेकिन अर्जुन के मन में अब एक और सवाल उठ रहा था।

अगर यह अभय था…

तो फिर वह बच्चा कौन था जिसे उसने अभी-अभी आईने के अंदर देखा था?

और अगर अभय सचमुच आईने में बंद था…

तो यह यहाँ कैसे था?

मीरा ने अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।

“मत लेना।”

बच्चे ने मुस्कुराकर उसकी तरफ देखा।

“दीदी…”

मीरा पीछे हट गई।

बच्चे ने सिर थोड़ा टेढ़ा किया।

“तुम मुझे पहचानती हो।”

मीरा की आँखों में आँसू आ गए।

“तुम अभय नहीं हो।”

बच्चा हँसा।

“तुमने मुझे आखिरी बार कब देखा था?”

मीरा चुप रही।

“बताओ।”

मीरा ने होंठ भींच लिए।

“2008।”

बच्चे की मुस्कान थोड़ी और फैल गई।

“गलत।”

मीरा ने उसे देखा।

“क्या?”

“तुमने मुझे 2008 में आखिरी बार नहीं देखा था।”

बच्चे ने धीरे से कहा—

“तुमने मुझे 2008 के बाद भी देखा था।”

अर्जुन ने मीरा की तरफ देखा।

“मीरा?”

मीरा के चेहरे पर ऐसा डर था जैसा अर्जुन ने पहले कभी नहीं देखा था।

“मुझे… याद नहीं।”

बच्चा धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरकर नीचे आया।

एक कदम।

दूसरा।

तीसरा।

वह अर्जुन के सामने आकर रुक गया।

“तुम्हें भी याद नहीं।”

अर्जुन ने पूछा,

“क्या?”

बच्चे ने उसकी छाती पर बने 313 के निशान की तरफ देखा।

“वो रात।”

“कौन-सी?”

“जब हम दोनों आखिरी बार एक साथ थे।”

अर्जुन की साँस रुक गई।

“हम दोनों?”

बच्चे ने सिर हिलाया।

“तुम और मैं।”

फिर उसने बहुत धीमे कहा—

“और माँ।”

1. माँ

अर्जुन ने तुरंत आईने की तरफ देखा।

आईने में उसकी माँ अब भी खड़ी थी।

लेकिन इस बार वह अकेली नहीं थी।

उसके पीछे एक और आकृति थी।

बहुत लंबी।

बहुत पतली।

इतनी पतली कि उसकी बाँहें इंसान की तुलना में दोगुनी लंबी लग रही थीं।

चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

सिर्फ दो सफेद आँखें।

अर्जुन ने फुसफुसाकर कहा—

“माँ…”

आईने में खड़ी औरत ने हाथ उठाया।

उसकी हथेली आईने से चिपक गई।

“अर्जुन…”

उसकी आवाज़ बहुत कमजोर थी।

“मेरी बात सुनो।”

अर्जुन आगे बढ़ा।

मीरा ने उसे पकड़ लिया।

“नहीं।”

“वो मेरी माँ है।”

“हो सकती है।”

अर्जुन ने उसे देखा।

“क्या मतलब?”

मीरा ने आईने की तरफ इशारा किया।

“इस घर में चेहरा किसी चीज़ का सबूत नहीं है।”

अर्जुन चुप हो गया।

आईने में उसकी माँ रो रही थी।

“बेटा…”

अर्जुन का दिल भर आया।

“माँ, आप वहाँ कैसे पहुँचीं?”

उसने जवाब नहीं दिया।

उसके पीछे खड़ी लंबी आकृति अचानक उसके बहुत करीब आ गई।

अर्जुन ने चिल्लाकर कहा—

“माँ! पीछे हटिए!”

उसकी माँ ने पीछे नहीं देखा।

जैसे वह उस आकृति को देख ही नहीं सकती थी।

अर्जुन ने पूछा—

“आपको वो दिखाई नहीं दे रहा?”

माँ ने सिर हिलाया।

“कौन?”

“आपके पीछे।”

“अर्जुन, मेरे पीछे कोई नहीं है।”

अर्जुन की रीढ़ में ठंड उतर गई।

वह आकृति अब उसकी माँ के बिल्कुल पीछे खड़ी थी।

उसने धीरे-धीरे अपना सिर झुकाया।

और आईने के भीतर से अर्जुन की तरफ देखा।

फिर उसने मुस्कुराया।

उसके होंठ हिले।

आवाज़ नहीं निकली।

लेकिन अर्जुन समझ गया।

वह कह रही थी—

“तुमने मुझे बुलाया।”

अर्जुन पीछे हट गया।

“नहीं…”

मीरा ने पूछा,

“क्या कहा उसने?”

“वो…”

अर्जुन बोल नहीं पाया।

तभी राधा आगे बढ़ीं।

उन्होंने आईने की तरफ देखा।

उनकी काली आँखें कुछ सेकंड के लिए काँप उठीं।

“नहीं।”

अर्जुन ने पूछा,

“क्या हुआ?”

राधा ने कहा—

“वो यहाँ नहीं होना चाहिए था।”

“कौन?”

राधा ने जवाब नहीं दिया।

बच्चा हँस पड़ा।

“आपको पता है।”

राधा ने उसे देखा।

“तुम चुप रहो।”

बच्चे ने कहा—

“आपने इसे बनाया।”

राधा का चेहरा कठोर हो गया।

“मैंने नहीं।”

“झूठ।”

“मैंने नहीं।”

“तो फिर किसने?”

राधा चुप।

बच्चे ने अर्जुन की तरफ देखा।

“तुम्हें पता है।”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“मुझे कुछ नहीं पता।”

बच्चा मुस्कुराया।

“तुम्हें सब याद है।”

और उसी क्षण अर्जुन की आँखों के सामने एक और स्मृति चमकी।

2. 1995

बारिश हो रही थी।

बहुत तेज़।

शर्मा निवास की खिड़कियों पर पानी लगातार टकरा रहा था।

घर के अंदर एक बच्चा रो रहा था।

राधा उसे गोद में लेकर कमरे में चक्कर लगा रही थीं।

विक्रम सामने खड़ा था।

उसके चेहरे पर डर था।

“राधा, हमें जाना होगा।”

“कहाँ?”

“देवगढ़ से बाहर।”

“और माँ?”

“उन्हें छोड़ना पड़ेगा।”

राधा ने सिर हिलाया।

“वो हमें जाने नहीं देंगी।”

“तो फिर उन्हें बताना होगा।”

“क्या?”

विक्रम ने बच्चे की तरफ देखा।

“कि ये अभय नहीं है।”

राधा के हाथ काँप गए।

“धीरे बोलो।”

“क्यों?”

“क्योंकि अगर उसने सुन लिया…”

“किसने?”

राधा ने कमरे के दरवाज़े की तरफ देखा।

“आईने ने।”

विक्रम ने आँखें बंद कर लीं।

“राधा…”

“तुम जानते हो वो क्या चाहता है।”

“हाँ।”

“तो फिर?”

“वो बच्चा चाहता है।”

राधा ने बच्चे को और कसकर पकड़ लिया।

“मेरा बच्चा नहीं मिलेगा।”

विक्रम ने धीरे से कहा—

“वो तुम्हारा बच्चा है ही नहीं।”

राधा जम गईं।

कुछ सेकंड तक सिर्फ बारिश की आवाज़ सुनाई देती रही।

फिर उन्होंने बच्चे के चेहरे को देखा।

बच्चा रोना बंद कर चुका था।

वह सीधे राधा को देख रहा था।

उसकी आँखें सामान्य थीं।

लेकिन उसके होंठों पर हल्की मुस्कान थी।

विक्रम ने फुसफुसाकर कहा—

“देखा?”

राधा ने बच्चे को पलटकर देखा।

उसकी परछाईं फर्श पर नहीं थी।

राधा की साँस अटक गई।

“नहीं…”

विक्रम ने कहा,

“यही वजह है कि शारदा माँ इसे नीचे ले जाना चाहती हैं।”

राधा ने सिर हिलाया।

“मैं नहीं दूँगी।”

“राधा…”

“मैं नहीं दूँगी!”

अचानक दरवाज़े पर दस्तक हुई।

ठक।

दोनों चुप हो गए।

फिर दूसरी दस्तक।

ठक।

फिर तीसरी।

ठक।

राधा ने बच्चे को सीने से लगा लिया।

विक्रम ने धीरे से पूछा,

“कौन है?”

बाहर से आवाज़ आई—

“मैं हूँ।”

विक्रम का चेहरा बदल गया।

“माँ?”

शारदा की आवाज़ थी।

“दरवाज़ा खोलो।”

राधा ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

विक्रम ने पूछा,

“क्यों?”

राधा ने फुसफुसाकर कहा—

“क्योंकि माँ बाहर नहीं हैं।”

“क्या?”

“वो तीसरी मंज़िल पर हैं।”

विक्रम ने दरवाज़े की तरफ देखा।

बाहर से फिर आवाज़ आई—

“विक्रम…”

इस बार आवाज़ बदल चुकी थी।

वह राधा की आवाज़ थी।

“दरवाज़ा खोलो।”

विक्रम पीछे हट गया।

फिर आवाज़ आई—

“बेटा…”

अब आवाज़ उसकी माँ की थी।

“दरवाज़ा खोलो।”

राधा ने बच्चे के कान ढक दिए।

“मत सुनो।”

लेकिन बच्चे ने खुद ही सिर उठाया।

और पहली बार बोला—

“माँ।”

राधा जम गईं।

बच्चे ने दरवाज़े की तरफ देखा।

फिर कहा—

“वो आ गई।”

3. वर्तमान

अर्जुन ने झटके से आँखें खोलीं।

वह फर्श पर बैठा था।

मीरा उसके पास थी।

“अर्जुन!”

अर्जुन ने उसे देखा।

“1995…”

“क्या?”

“मैंने देखा।”

मीरा ने पूछा,

“क्या?”

अर्जुन ने धीरे से कहा—

“मुझे उस रात की कुछ याद आई।”

ईशान आगे आया।

“क्या?”

“राधा आंटी…”

राधा की आँखें अर्जुन पर थीं।

“उन्होंने एक बच्चे को पकड़ा हुआ था।”

ईशान का चेहरा बदल गया।

“कौन?”

“मुझे नहीं पता।”

अर्जुन ने कहा,

“लेकिन उसकी परछाईं नहीं थी।”

ईशान ने धीरे से पूछा—

“और उसने क्या कहा?”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“माँ।”

ईशान पीछे हट गया।

“नहीं।”

मीरा ने पूछा,

“क्या हुआ?”

ईशान ने कहा,

“अगर उसने पहली बार ‘माँ’ कहा था…”

वह रुक गया।

“तो इसका मतलब…”

अर्जुन ने पूछा,

“क्या?”

ईशान ने जवाब दिया—

“वो इंसान नहीं था।”

राधा अचानक चिल्लाईं—

“बस!”

सभी उनकी तरफ देखने लगे।

राधा की आँखें अब सामान्य थीं।

काली नहीं।

उनके चेहरे पर आँसू थे।

“तुम लोग जितना जान रहे हो…”

उन्होंने कहा,

“उतना ही खतरा बढ़ रहा है।”

अर्जुन ने पूछा,

“आपको मुझसे क्या छिपाना है?”

“बहुत कुछ।”

“तो बताइए।”

“नहीं।”

“क्यों?”

राधा ने उसकी तरफ देखा।

“क्योंकि अगर तुमने सच सुन लिया…”

“तो?”

“तुम खुद को बचाना बंद कर दोगे।”

अर्जुन ने कुछ नहीं कहा।

राधा ने धीमे स्वर में कहा—

“तुम्हें लगता है तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन परछाईं है।”

उन्होंने सिर हिलाया।

“नहीं।”

“फिर?”

“तुम्हारी सबसे बड़ी दुश्मन तुम्हारी यादें हैं।”

4. दूसरी याद

अर्जुन ने आँखें बंद कीं।

इस बार उसने खुद को रोकने की कोशिश नहीं की।

उसे जानना था।

सब कुछ।

उसने खुद को फिर देखा।

लेकिन इस बार वह 2008 में नहीं था।

वह 1995 में था।

एक नवजात बच्चा।

एक पालना।

और उसके पास दूसरा पालना।

पहले पालने में बच्चा रो रहा था।

दूसरे में बच्चा सो रहा था।

राधा दोनों के बीच खड़ी थीं।

विक्रम उनके पीछे।

शारदा कमरे के कोने में।

शारदा ने कहा—

“एक को चुनो।”

राधा रोते हुए बोलीं—

“मैं दोनों को बचाऊँगी।”

“संभव नहीं।”

“तो फिर कोई और रास्ता होगा।”

शारदा ने कहा—

“है।”

विक्रम ने पूछा,

“क्या?”

शारदा ने आईने की तरफ देखा।

“एक को आईना रख लेगा।”

राधा ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

“और दूसरे को…”

शारदा रुकीं।

“हम बाहर रखेंगे।”

विक्रम ने पूछा,

“कौन बाहर जाएगा?”

शारदा ने दोनों बच्चों को देखा।

फिर एक बच्चे को उठाया।

वह बच्चा शांत था।

शारदा ने उसे राधा की तरफ बढ़ाया।

“ये।”

राधा ने बच्चे को लिया।

“अभय?”

शारदा ने कहा—

“नहीं।”

राधा ने देखा।

“तो?”

शारदा ने कहा—

“इसका नाम अभी मत रखना।”

विक्रम ने पूछा,

“क्यों?”

शारदा ने कहा—

“क्योंकि नाम पहचान बनाता है।”

फिर उन्होंने दूसरे बच्चे की तरफ देखा।

“और दूसरा…”

कमरे में अचानक हवा तेज़ हो गई।

आईने की सतह काँपने लगी।

शारदा ने कहा—

“वो खुद अपना नाम चुनेगा।”

राधा ने डरते हुए पूछा,

“कैसे?”

आईने के अंदर से आवाज़ आई—

“अभय…”

राधा के हाथ से बच्चा लगभग छूट गया।

विक्रम ने कहा,

“किसने कहा?”

फिर आईने से वही आवाज़ आई—

“अभय…”

शारदा पीछे हट गईं।

“नहीं।”

विक्रम ने पूछा,

“क्या हुआ?”

शारदा की आँखों में भय था।

“उसने नाम चुन लिया।”

राधा ने बच्चे को देखा।

फिर दूसरे बच्चे को।

और तभी…

दोनों बच्चों ने एक साथ रोना शुरू कर दिया।

शारदा ने घंटी बजाई।

टनननन…

आईने में काली आकृति दिखाई दी।

वह धीरे-धीरे एक बच्चे का चेहरा बना रही थी।

पहले आँखें।

फिर नाक।

फिर होंठ।

फिर पूरा चेहरा।

अर्जुन ने उस चेहरे को देखा।

वह…

उसका अपना चेहरा था।

लेकिन उम्र दस साल।

फिर तेरह साल।

फिर अट्ठाईस।

एक ही चेहरे के तीन रूप।

शारदा ने काँपते हुए कहा—

“इसने समय भी सीख लिया।”

राधा ने पूछा,

“अब क्या होगा?”

शारदा ने कहा—

“अब ये बच्चा नहीं रहेगा।”

अचानक आईने से आवाज़ आई—

“मैं अर्जुन हूँ।”

राधा पीछे हट गईं।

“अर्जुन?”

विक्रम ने कहा—

“ये नाम किसने दिया?”

आईने में बच्चा मुस्कुराया।

“उसने।”

उसने कमरे में पड़े एक छोटे लड़के की तरफ देखा।

तेरह साल का अर्जुन।

वर्तमान नहीं।

भविष्य का अर्जुन।

राधा ने डरकर पूछा—

“वो यहाँ कैसे है?”

शारदा ने उत्तर दिया—

“समय टूट गया है।”

अर्जुन ने झटके से आँखें खोल दीं।

उसके कानों में तेज़ घंटी बज रही थी।

मीरा उसके सामने खड़ी थी।

“अर्जुन!”

अर्जुन ने उसे देखा।

“मैंने देखा…”

“क्या?”

“मैंने अपना चेहरा देखा।”

“कहाँ?”

“आईने में।”

“क्या उसने कुछ कहा?”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“हाँ।”

“क्या?”

अर्जुन की आवाज़ काँप गई।

“उसने कहा…”

वह रुका।

“‘मैं अर्जुन हूँ।’”

मीरा ने कुछ नहीं कहा।

ईशान ने धीरे से पूछा—

“किसने?”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“वही बच्चा।”

ईशान ने आँखें बंद कर लीं।

“तो सब शुरू हो चुका है।”

5. राधा का सच

अर्जुन ने राधा की तरफ देखा।

“अब मुझे सब बताइए।”

राधा चुप थीं।

“अभय कौन था?”

चुप।

“दूसरा बच्चा कौन था?”

चुप।

“मुझे किसने बनाया?”

राधा की आँखों से आँसू बह निकले।

“मैंने।”

अर्जुन पीछे हट गया।

“आपने?”

राधा ने सिर हिलाया।

“लेकिन मैं अकेली नहीं थी।”

“किसके साथ?”

राधा ने विक्रम की तरफ देखा।

विक्रम का चेहरा झुक गया।

“तुम्हारे पिता।”

अर्जुन की आवाज़ टूट गई।

“पापा?”

विक्रम ने कहा—

“हमें लगा था कि हम तुम्हें बचा रहे हैं।”

“किससे?”

“आईने से।”

“लेकिन आपने मुझे बनाया?”

“हाँ।”

“कैसे?”

विक्रम चुप रहा।

राधा ने कहा—

“तुम्हारे पास जो शरीर था…”

वह रुक गईं।

“वो तुम्हारा अपना नहीं था।”

अर्जुन की आँखें फैल गईं।

“तो किसका?”

राधा ने जवाब नहीं दिया।

अर्जुन ने चिल्लाकर पूछा—

“किसका?”

राधा रोने लगीं।

“अभय का।”

कमरे में जैसे सब कुछ रुक गया।

अर्जुन ने अपने हाथों को देखा।

फिर अपने चेहरे को छुआ।

“नहीं…”

राधा ने कहा—

“अभय का शरीर बच गया था।”

“लेकिन…”

“उसकी परछाईं आईने में चली गई।”

“तो मेरा शरीर…”

राधा ने धीरे से कहा—

“अभय का था।”

अर्जुन पीछे हट गया।

“नहीं।”

मीरा की आँखों में भी आँसू थे।

“भैया…”

अर्जुन ने उसे देखा।

“मत कहो मुझे भैया।”

मीरा रुक गई।

अर्जुन ने सिर पकड़ लिया।

“अगर मेरा शरीर अभय का है…”

उसकी आवाज़ टूट गई।

“तो मैं कौन हूँ?”

राधा ने कुछ नहीं कहा।

तभी पीछे से एक आवाज़ आई।

“यही सवाल तो उसे चाहिए था।”

सबने पलटकर देखा।

विक्रम की आकृति खड़ी थी।

लेकिन अब उसका चेहरा बदल रहा था।

एक पल विक्रम।

दूसरे पल शारदा।

फिर राधा।

फिर अर्जुन।

फिर एक अजनबी आदमी।

फिर…

एक बच्चा।

ईशान ने पीछे हटते हुए कहा—

“नहीं…”

अर्जुन ने पूछा,

“क्या हुआ?”

ईशान काँप रहा था।

“ये विक्रम नहीं है।”

वह आकृति मुस्कुराई।

“बहुत देर से पहचाना।”

राधा ने चिल्लाकर कहा—

“अर्जुन! इससे दूर रहो!”

आकृति ने राधा की तरफ देखा।

“तुमने मुझे इतने सालों तक आईने में बंद रखा।”

राधा ने कहा,

“मैंने तुम्हें नहीं बनाया।”

“लेकिन तुमने मुझे नाम दिया।”

राधा चुप हो गईं।

आकृति ने अर्जुन की तरफ देखा।

“और उसने मुझे चेहरा दिया।”

अर्जुन के चेहरे पर डर उतर आया।

“कौन?”

आकृति ने उसकी तरफ उंगली उठाई।

“तुम।”

6. चेहरा

आकृति अचानक गायब हो गई।

कमरे में अंधेरा छा गया।

फिर एक-एक करके सभी आईने जलने लगे।

हर आईने में अलग दृश्य था।

एक में 1995।

दूसरे में 2008।

तीसरे में 2013।

चौथे में 2023।

पाँचवें में…

एक ऐसी तारीख जो अर्जुन ने कभी नहीं देखी थी।

17 जुलाई 2038।

अर्जुन का दिल धड़कना भूल गया।

“2038?”

आईने में एक बूढ़ा अर्जुन खड़ा था।

उसके बाल सफेद थे।

चेहरा थका हुआ।

वह आईने के दूसरी तरफ खड़ा होकर कुछ लिख रहा था।

अर्जुन ने ध्यान से देखा।

वह दीवार पर लिख रहा था—

“अगर तुम ये पढ़ रहे हो…”

फिर वह रुका।

पीछे देखा।

जैसे किसी को महसूस कर लिया हो।

उसने जल्दी से बाकी शब्द लिखे—

“…तो उसे अभी तक मत बताना कि तुम कौन हो।”

अर्जुन ने पूछा,

“किसे?”

बूढ़े अर्जुन ने आईने में सीधे उसकी तरफ देखा।

जैसे वह वर्तमान अर्जुन को देख सकता हो।

फिर उसने होंठ हिलाए—

“ईशान से।”

अर्जुन ने पलटकर ईशान को देखा।

ईशान वहाँ नहीं था।

“ईशान?”

कोई जवाब नहीं।

मीरा भी घबरा गई।

“वो कहाँ गया?”

राधा ने अचानक कहा—

“भागो।”

“कहाँ?”

“ऊपर।”

“क्यों?”

“क्योंकि नीचे…”

उन्होंने फर्श की तरफ देखा।

“अब वो अकेला नहीं है।”

अचानक भूमिगत कमरे के दूसरे छोर से कदमों की आवाज़ आई।

एक।

दो।

तीन।

फिर किसी बच्चे की हँसी।

ईशान की आवाज़ आई—

“भैया…”

अर्जुन ने चौंककर आवाज़ की दिशा में देखा।

“ईशान?”

फिर वही आवाज़—

“भैया…”

लेकिन इस बार आवाज़ दो तरफ से आई।

एक बाईं तरफ।

एक दाईं तरफ।

फिर सामने से।

फिर पीछे से।

चार ईशान।

चार आवाज़ें।

चार दिशाएँ।

मीरा ने अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।

“मत जवाब देना।”

अर्जुन ने पूछा,

“क्यों?”

मीरा ने कहा—

“क्योंकि उनमें से कोई भी ईशान नहीं है।”

अचानक सामने वाला ईशान दिखाई दिया।

वह मुस्कुराया।

“दीदी…”

मीरा पीछे हट गई।

दूसरा ईशान बाईं दीवार से निकला।

“दीदी…”

तीसरा छत से उल्टा लटक रहा था।

“दीदी…”

चौथा अर्जुन के ठीक पीछे खड़ा था।

“भैया…”

अर्जुन ने धीरे से पीछे देखा।

वहाँ ईशान था।

उसकी आँखें सामान्य थीं।

“अर्जुन…”

उसने कहा,

“मुझे बचाओ।”

अर्जुन आगे बढ़ा।

मीरा ने उसे पकड़ लिया।

“रुको!”

“ये असली है!”

“कैसे पता?”

अर्जुन चुप।

ईशान ने कहा—

“क्योंकि…”

वह अचानक रोने लगा।

“तुम्हें याद है…”

अर्जुन ने पूछा,

“क्या?”

ईशान ने कहा—

“तुमने मुझे पहली बार कहाँ देखा था?”

अर्जुन कुछ सोच नहीं पाया।

“कहाँ?”

ईशान ने कहा—

“आईने में।”

अर्जुन पीछे हट गया।

ईशान मुस्कुराया।

“गलत जवाब।”

उसकी आँखें काली हो गईं।

“तुमने मुझे पहली बार…”

उसका चेहरा बदलने लगा।

पहले राधा।

फिर विक्रम।

फिर शारदा।

फिर मीरा।

और अंत में…

अर्जुन।

“अपने अंदर देखा था।”

मीरा चीख उठी।

“भागो!”

7. आखिरी दरवाज़ा

तीनों सीढ़ियों की तरफ भागे।

पीछे से आवाज़ें आती रहीं।

“अर्जुन…”

“भैया…”

“अभय…”

“अर्णव…”

“अर्जुन…”

हर आवाज़ उसका नाम बदल रही थी।

सीढ़ियाँ चढ़ते हुए अर्जुन ने महसूस किया कि उसकी छाती का 313 निशान अब जल नहीं रहा था।

वह ठंडा हो गया था।

बहुत ठंडा।

जैसे बर्फ।

मीरा ने पूछा,

“क्या हुआ?”

अर्जुन ने कहा,

“निशान…”

“क्या?”

“अब दर्द नहीं हो रहा।”

मीरा रुक गई।

“ये अच्छा नहीं है।”

“क्यों?”

“क्योंकि अभी तक वो तुम्हें महसूस कर रहा था।”

“और अब?”

मीरा ने पीछे देखा।

“अब शायद…”

वह रुक गई।

“वो तुम्हारे अंदर है।”

अर्जुन ने अपना सीना छुआ।

कुछ नहीं।

फिर…

उसके अंदर से किसी बच्चे की हँसी सुनाई दी।

बहुत धीमी।

बहुत पास।

अर्जुन जम गया।

“तुमने सुना?”

मीरा ने कहा,

“क्या?”

अर्जुन ने अपनी छाती पर हाथ रखा।

फिर भीतर से आवाज़ आई—

“भैया…”

अर्जुन की आँखों से आँसू निकल आए।

“अभय…”

आवाज़ फिर आई—

“मुझे बाहर निकालो।”

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

“मैं कैसे?”

अंदर से जवाब आया—

“आईना तोड़ दो।”

अर्जुन ने आँखें खोलीं।

उसके सामने तीसरी मंज़िल का वही कमरा था।

वही पुराना आईना।

वही काला कपड़ा।

वही दीवार पर 313 का निशान।

लेकिन इस बार आईने पर एक दरार थी।

अर्जुन धीरे-धीरे उसके पास गया।

उसने कपड़ा हटाया।

आईने में वह खुद दिखाई दिया।

लेकिन उसके पीछे…

अभय खड़ा था।

अर्जुन ने धीरे से पूछा—

“क्या तुम्हें बाहर आना है?”

अभय ने सिर हिलाया।

“हाँ।”

“अगर मैं आईना तोड़ दूँ?”

अभय ने मुस्कुराकर कहा—

“मैं बाहर आ जाऊँगा।”

“और फिर?”

अभय कुछ नहीं बोला।

“फिर क्या होगा?”

अभय ने अपना हाथ आईने पर रखा।

“फिर तुम अंदर चले जाओगे।”

अर्जुन का चेहरा सफेद पड़ गया।

“नहीं…”

अभय ने कहा—

“हर दरवाज़े की एक कीमत होती है, भैया।”

अचानक पीछे से मीरा की आवाज़ आई—

“अर्जुन!”

वह पलटा।

मीरा दरवाज़े पर खड़ी थी।

लेकिन उसके पीछे…

उसकी माँ खड़ी थीं।

अर्जुन की असली माँ।

आईने वाली नहीं।

वही चेहरा।

वही कपड़े।

वही आँखें।

वह रो रही थीं।

“बेटा…”

अर्जुन कुछ बोल नहीं पाया।

माँ ने हाथ बढ़ाया।

“मेरे साथ चलो।”

अर्जुन आगे बढ़ा।

एक कदम।

दूसरा।

तीसरा।

फिर वह रुक गया।

उसे कुछ याद आया।

उसकी माँ ने फोन पर कहा था—

“अंधेरा होने के बाद अगर कोई आवाज़ दे… जवाब मत देना।”

अर्जुन ने माँ को देखा।

“आपने मुझे ये बात कब बताई थी?”

माँ चुप।

“कब?”

वह धीरे-धीरे मुस्कुराईं।

अर्जुन पीछे हट गया।

“आप मेरी माँ नहीं हैं।”

मीरा ने राहत की साँस ली।

लेकिन तभी…

दरवाज़े के पीछे से असली माँ की आवाज़ आई—

“अर्जुन?”

अर्जुन जम गया।

दरवाज़े पर खड़ी माँ ने भी कहा—

“अर्जुन?”

दो आवाज़ें।

एक कमरे के अंदर।

एक बाहर।

एक असली।

एक परछाईं।

लेकिन…

कौन?

अर्जुन ने दोनों को देखा।

एक माँ ने कहा—

“मेरे पास आओ।”

दूसरी ने कहा—

“नहीं।”

फिर दोनों एक साथ बोलीं—

“अर्जुन, पहचानो मुझे।”

कमरे की सारी बत्तियाँ बुझ गईं।

और अंधेरे में…

अर्जुन ने पहली बार महसूस किया कि उसके दोनों हाथ किसी ने पकड़ रखे हैं।

एक हाथ उसकी माँ का था।

दूसरा…

अभय का।

और उसके कान में दो आवाज़ें एक साथ आईं—

“अब चुनो।”

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

उसके सामने 1995 की रात थी।

फिर 2008।

फिर 2013।

फिर 2023।

चारों साल एक-दूसरे में घुलने लगे।

और उन सबके बीच…

एक पाँचवाँ साल दिखाई दिया।

2038।

उसमें वही बूढ़ा अर्जुन खड़ा था।

उसने हाथ उठाया।

और दूर से चिल्लाया—

“किसी को मत चुनना!”

अर्जुन ने आँखें खोल दीं।

लेकिन तब तक…

कमरे में कोई नहीं था।

न माँ।

न मीरा।

न अभय।

न आईना।

सिर्फ फर्श पर एक कागज़ पड़ा था।

अर्जुन ने उसे उठाया।

उस पर उसकी अपनी लिखावट थी।

सिर्फ एक वाक्य—

“17 जुलाई 1995 को मैं पैदा नहीं हुआ था।”

नीचे दूसरी पंक्ति थी।

स्याही अभी गीली थी।

“उस दिन मैंने किसी और की जगह ली थी।”

अर्जुन के हाथ काँपने लगे।

फिर तीसरी पंक्ति अपने आप उभरने लगी।

धीरे-धीरे।

जैसे कोई अदृश्य हाथ लिख रहा हो।

“और अब वो अपनी जगह वापस लेने आ रहा है।”

अर्जुन ने कागज़ गिरा दिया।

पीछे से आवाज़ आई—

“भैया…”

अर्जुन पलटा।

कमरे के दरवाज़े पर अभय खड़ा था।

लेकिन इस बार उसकी आँखें काली नहीं थीं।

वे बिल्कुल सामान्य थीं।

वह रो रहा था।

उसने हाथ आगे बढ़ाया।

“मुझे बचा लो।”

अर्जुन उसकी तरफ बढ़ा।

फिर अभय ने अचानक मुस्कुराकर कहा—

“लेकिन पहले मुझे बताओ…”

वह रुक गया।

उसका चेहरा धीरे-धीरे बदलने लगा।

“तुम्हारी माँ कौन है?”

अर्जुन के पैरों तले जमीन खिसक गई।

क्योंकि उसके पीछे…

एक और आवाज़ आई—

“और तुम्हारा पिता कौन है?”

फिर तीसरी आवाज़—

“और तुम खुद… कौन हो?”

अर्जुन ने पीछे देखा।

दीवार पर तीन परछाइयाँ थीं।

एक उसकी।

एक अभय की।

और तीसरी…

एक ऐसे आदमी की, जिसे अर्जुन ने कभी नहीं देखा था।

लेकिन वह तीसरी परछाईं…

अर्जुन के कंधे पर हाथ रखे हुए थी।

और उसके कान में फुसफुसा रही थी—

“अब असली खेल शुरू होगा।”

दूर कहीं घड़ी ने घंटा बजाया।

चार बजे।

3:13 का चक्र खत्म हो चुका था।

लेकिन अर्जुन समझ चुका था—

अंधेरा अभी खत्म नहीं हुआ था।

बल्कि…

अब पहली बार वह घर से बाहर निकलने वाला था।

जारी रहेगा…

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