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एपिसोड 9: पहली मौत

firoj saifi · Ghost Stories · 16 मिनट

Writer
firoj saifi
Story
“अंधेरे में कोई है”
Chapter
9 of 10
Category
Ghost Stories
Reading time
16 min
Words
3090
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

**3:14।**

घड़ी की सुई आगे बढ़ चुकी थी।

लेकिन अर्जुन की दुनिया वहीं रुक गई थी।

उसकी छाती पर बना **313** का निशान जल रहा था।

ऐसा लग रहा था जैसे त्वचा के नीचे किसी ने अंगारा रख दिया हो।

अर्जुन ने दोनों हाथों से अपनी छाती दबाई।

“आह…”

मीरा उसके पास आ गई।

“अर्जुन!”

“इसे… निकालो…”

“क्या?”

“ये निशान…”

मीरा ने उसकी शर्ट खींचकर नीचे देखा।

निशान लाल नहीं था।

वह काला था।

लेकिन उसके चारों तरफ त्वचा लाल होकर सूज रही थी।

ईशान कुछ कदम दूर खड़ा था।

उसके चेहरे से सारी मुस्कान गायब हो चुकी थी।

वह फर्श के नीचे खुले दरवाज़े को घूर रहा था।

अर्जुन ने उसे देखा।

“ईशान…”

ईशान ने कोई जवाब नहीं दिया।

“तुमने कहा था कि अभय मर चुका है।”

ईशान धीरे से बोला,

“हाँ।”

“फिर नीचे कौन है?”

ईशान की आँखें नीचे के अंधेरे पर टिकी थीं।

“अभय।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“तुमने अभी कहा था कि वो मर चुका है।”

“मर चुका है।”

“तो फिर—”

ईशान ने बीच में ही कहा,

“मर जाना और खत्म हो जाना एक चीज़ नहीं है।”

कमरे में ठंडी हवा भर गई।

मीरा ने धीरे से पूछा,

“अभय यहाँ कितने समय से है?”

ईशान ने कहा,

“जब से तुम पैदा हुए हो।”

अर्जुन के चेहरे पर सवाल उभरा।

“लेकिन…”

ईशान ने उसकी तरफ देखा।

“यही तो समस्या है।”

“क्या?”

“तुम्हारा जन्म अभय की मौत के बाद नहीं हुआ था।”

अर्जुन ने कुछ सेकंड तक उसे देखा।

फिर धीरे से बोला,

“तो?”

ईशान ने फुसफुसाया—

“तुम दोनों एक ही रात पैदा हुए थे।”

---

### 1

अर्जुन कुछ बोल नहीं पाया।

मीरा ने ईशान की तरफ देखा।

“तुम्हें यकीन है?”

“हाँ।”

“तुमने देखा था?”

ईशान ने सिर हिलाया।

“मैं वहाँ था।”

“1995 में?”

“हाँ।”

मीरा पीछे हट गई।

“तुम तब कितने साल के थे?”

ईशान चुप रहा।

फिर उसने कहा,

“उम्र से इस जगह को मत समझो।”

अर्जुन ने पूछा,

“तुम्हारा जन्म कब हुआ?”

ईशान ने उसकी आँखों में देखा।

“यही तो मुझे नहीं पता।”

“तो तुम्हें कैसे पता कि तुम 1995 में थे?”

ईशान ने फर्श पर बने खुले दरवाज़े की तरफ देखा।

“क्योंकि मुझे याद है।”

“क्या?”

“एक औरत रो रही थी।”

“कौन?”

“राधा।”

अर्जुन का दिल जोर से धड़का।

ईशान ने आगे कहा—

“एक आदमी चिल्ला रहा था।”

“विक्रम?”

“हाँ।”

“और शारदा?”

“वो घंटी बजा रही थीं।”

अर्जुन ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

वही घंटी।

वही आवाज़।

वही घर।

वही रात।

लेकिन एक बात उसके दिमाग में अटक गई।

“17 जुलाई 1995…”

उसने धीरे से कहा,

“वो मेरी जन्मतिथि है।”

ईशान ने सिर हिलाया।

“लेकिन उसी तारीख को…”

उसने वाक्य अधूरा छोड़ दिया।

अर्जुन ने पूछा,

“क्या हुआ था?”

ईशान ने नीचे अंधेरे की तरफ इशारा किया।

“तुम्हें खुद देखना होगा।”

मीरा ने तुरंत कहा,

“नहीं।”

ईशान ने उसकी तरफ देखा।

“अगर वो नीचे नहीं गया…”

“तो?”

“तो अभय ऊपर आ जाएगा।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

अर्जुन ने धीरे से पूछा,

“और अगर मैं नीचे चला गया?”

ईशान ने जवाब दिया—

“तो शायद तुम वापस नहीं आओगे।”

---

### 2

अर्जुन ने नीचे देखा।

फर्श के अंदर बना दरवाज़ा अब पूरी तरह खुल चुका था।

नीचे जाने के लिए पत्थर की सीढ़ियाँ थीं।

लेकिन वे सीढ़ियाँ उस घर की नहीं लग रही थीं।

पत्थर पुराने थे।

बहुत पुराने।

दीवारों पर नमी नहीं थी।

बल्कि ऐसा लग रहा था जैसे दीवारें साँस ले रही हों।

हर कुछ सेकंड में उन पर हल्की धड़कन दिखाई देती।

जैसे पत्थर के अंदर कोई दिल धड़क रहा हो।

मीरा ने अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।

“मैं तुम्हारे साथ चलूँगी।”

“नहीं।”

“भैया—”

“तुम ऊपर रहो।”

“क्यों?”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“क्योंकि अगर मैं वापस नहीं आया…”

मीरा ने तुरंत उसका हाथ और कस लिया।

“ऐसा मत बोलो।”

अर्जुन कुछ नहीं बोला।

ईशान आगे बढ़ा।

“मैं रास्ता दिखाऊँगा।”

तीनों सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे।

पहली सीढ़ी।

दूसरी।

तीसरी।

हर सीढ़ी पर तापमान गिरता जा रहा था।

चौथी।

पाँचवीं।

छठी।

अर्जुन ने पीछे देखा।

ऊपर का दरवाज़ा अब बहुत दूर दिखाई दे रहा था।

सातवीं।

आठवीं।

नौवीं।

दीवार पर अचानक एक तारीख दिखाई दी।

**17 जुलाई 1995**

अर्जुन रुक गया।

“यही है।”

ईशान ने सिर हिलाया।

“हाँ।”

“यह तारीख यहाँ क्यों लिखी है?”

“क्योंकि यही पहली रात थी।”

“किसकी?”

ईशान ने कहा—

“तुम्हारी।”

---

### 3

सीढ़ियाँ खत्म हुईं।

सामने एक लंबा कमरा था।

कमरे के बीचोंबीच एक पुराना लकड़ी का पालना रखा था।

उसके ऊपर काली चादर पड़ी थी।

चारों तरफ मोमबत्तियाँ थीं।

लेकिन सभी मोमबत्तियाँ उल्टी लगी थीं।

उनकी लौ नीचे की तरफ जल रही थी।

अर्जुन ने धीरे से कहा,

“ये जगह…”

उसे ऐसा लगा जैसे वह पहले भी यहाँ आ चुका है।

मीरा ने पूछा,

“क्या याद आ रहा है?”

“कुछ नहीं।”

ईशान ने कहा,

“याद आएगा।”

अर्जुन पालने के पास गया।

काली चादर धीरे-धीरे हिल रही थी।

“इसके अंदर क्या है?”

ईशान ने कहा,

“मत छूना।”

अर्जुन ने हाथ पीछे कर लिया।

“क्यों?”

“क्योंकि जो अंदर है…”

ईशान रुका।

“वो सो रहा है।”

अर्जुन ने धीरे से पूछा,

“कौन?”

ईशान ने कहा—

“तुम्हारा पहला चेहरा।”

अर्जुन ने चौंककर उसकी तरफ देखा।

“मेरा चेहरा?”

ईशान ने कोई जवाब नहीं दिया।

तभी पीछे से आवाज़ आई—

“अर्जुन…”

मीरा की आवाज़।

अर्जुन ने पलटकर देखा।

मीरा वहीं थी।

लेकिन दूसरी आवाज़ फिर आई।

“अर्जुन…”

इस बार आवाज़ पालने के अंदर से आई थी।

अर्जुन के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“मेरी आवाज़ पर भरोसा मत करना।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“क्यों?”

मीरा ने फुसफुसाकर कहा,

“क्योंकि अभी जो आवाज़ आई…”

वह काँप रही थी।

“वो मेरी नहीं थी।”

---

### 4

पालने की चादर हिलने लगी।

धीरे-धीरे।

फिर तेज़।

अर्जुन पीछे हट गया।

ईशान ने तुरंत जेब से कुछ निकाला।

एक छोटी-सी चाँदी की घंटी।

अर्जुन ने उसे देखते ही पूछा,

“ये तुम्हारे पास कैसे?”

ईशान ने कहा,

“ये मेरी नहीं है।”

“फिर?”

“अभय की है।”

अर्जुन का चेहरा बदल गया।

“अभय की?”

ईशान ने घंटी अर्जुन की तरफ बढ़ा दी।

“इसे बजाना।”

अर्जुन ने घंटी पकड़ ली।

“कब?”

“जब वो बाहर आए।”

“और अगर नहीं बजाई?”

ईशान ने पालने की तरफ देखा।

“तो जो बाहर आएगा…”

वह रुक गया।

“वो तुम्हारा भाई नहीं होगा।”

चादर अचानक स्थिर हो गई।

कमरे में खामोशी छा गई।

फिर…

पालने के अंदर से बहुत धीमी आवाज़ आई।

“भैया…”

अर्जुन की आँखों में आँसू आ गए।

“अभय?”

मीरा ने कहा,

“अर्जुन, मत जाना।”

लेकिन अर्जुन आगे बढ़ गया।

उसने चादर का किनारा पकड़ लिया।

ईशान ने रोकने की कोशिश नहीं की।

अर्जुन ने धीरे से चादर उठाई।

पालना खाली था।

अंदर केवल एक पुरानी लाल गेंद थी।

अर्जुन का हाथ काँप गया।

वही गेंद।

जिसे उसने कुछ देर पहले सीढ़ियों के नीचे देखा था।

उसने गेंद उठा ली।

और जैसे ही उसकी उँगलियाँ गेंद पर पड़ीं…

पूरा कमरा बदल गया।

---

### 5

अब वहाँ कोई अंधेरा कमरा नहीं था।

एक अस्पताल जैसा कमरा था।

सफेद दीवारें।

पीली रोशनी।

बाहर बारिश।

बिस्तर पर राधा लेटी थीं।

उनके चेहरे पर थकान थी।

पास शारदा खड़ी थीं।

विक्रम कमरे में आगे-पीछे घूम रहा था।

और एक नर्स जैसी आकृति बच्चे को लेकर खड़ी थी।

अर्जुन ने ध्यान से देखा।

दो बच्चे।

एक के बाद एक।

दो छोटे-छोटे शरीर।

राधा ने कमजोर आवाज़ में पूछा,

“दोनों ठीक हैं?”

नर्स ने सिर हिलाया।

“एक बिल्कुल ठीक है।”

“दूसरा?”

नर्स चुप रही।

विक्रम ने पूछा,

“क्या हुआ?”

“उसकी साँस बहुत कमजोर है।”

राधा ने हाथ बढ़ाया।

“मुझे दो।”

नर्स ने बच्चे को राधा की बाँहों में रखा।

राधा ने उसे सीने से लगा लिया।

“अभय…”

विक्रम ने पूछा,

“और दूसरा?”

नर्स ने दूसरे बच्चे की तरफ देखा।

“दूसरा बच्चा…”

वह रुक गई।

“उसकी धड़कन नहीं है।”

राधा ने तुरंत कहा,

“नहीं।”

विक्रम ने उसकी तरफ देखा।

“राधा…”

“नहीं!”

राधा ने दोनों बच्चों को अपने पास खींच लिया।

“दोनों जिंदा हैं।”

शारदा ने धीरे से कहा,

“एक नहीं है।”

राधा ने उनकी तरफ देखा।

“आप ऐसा मत कहिए।”

शारदा ने बच्चे की तरफ देखा।

“सच को छिपाने से वह बदलता नहीं।”

विक्रम ने पूछा,

“तो अब?”

शारदा ने कहा,

“अब एक ही रास्ता है।”

राधा का चेहरा डर से सफेद हो गया।

“नहीं।”

“अगर तुमने ये नहीं किया…”

“मैं नहीं करूँगी।”

“तो दूसरा बच्चा भी मर जाएगा।”

राधा रो पड़ीं।

“मैं अपने बच्चों को नहीं खो सकती।”

शारदा ने कहा,

“तुम्हें एक चुनना होगा।”

राधा ने दोनों बच्चों को देखा।

एक बच्चा रो रहा था।

दूसरा बिल्कुल शांत था।

राधा ने शांत बच्चे के चेहरे को छुआ।

फिर उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे।

“इसे बचा लो।”

विक्रम ने पूछा,

“किसे?”

राधा ने कुछ नहीं कहा।

शारदा ने धीरे से शांत बच्चे को उठाया।

और तभी…

कमरे की सारी लाइटें बुझ गईं।

---

### 6

अर्जुन ने दृश्य बदलते देखा।

अब कमरा पूरी तरह अंधेरे में था।

सिर्फ एक आईना चमक रहा था।

उस आईने के सामने शारदा खड़ी थीं।

उनकी गोद में वही बच्चा था।

अभय।

लेकिन उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था।

शारदा ने बच्चे को आईने के सामने रखा।

राधा पीछे से चिल्लाईं—

“माँ! नहीं!”

विक्रम ने राधा को पकड़ रखा था।

“उसे रोकिए!”

शारदा ने घंटी उठाई।

“अगर इसे अभी नहीं बाँधा…”

आईने के अंदर से काली धुंध बाहर निकलने लगी।

“तो यह घर कभी सुरक्षित नहीं रहेगा।”

राधा चिल्लाईं—

“वो बच्चा है!”

शारदा बोलीं,

“नहीं।”

उनकी आवाज़ कठोर हो गई।

“वो अब सिर्फ बच्चा नहीं है।”

आईने के अंदर से किसी ने फुसफुसाया—

“अभय…”

बच्चे ने आँखें खोल दीं।

काली।

पूरी तरह काली।

राधा चीखीं।

“अभय!”

बच्चे ने आईने में देखा।

और मुस्कुराया।

शारदा ने घंटी बजाई।

**टनननन…**

कमरा काँप उठा।

आईने में काली आकृति बच्चे के पीछे आ गई।

फिर…

अचानक बच्चे की परछाईं उसके शरीर से अलग हो गई।

वह परछाईं आईने में चली गई।

लेकिन बच्चा वहीं रह गया।

शारदा ने राहत की साँस ली।

“हो गया।”

विक्रम ने पूछा,

“क्या हो गया?”

शारदा ने कहा,

“अब इसके अंदर की चीज़ आईने में है।”

राधा ने बच्चे को उठाया।

“तो अभय सुरक्षित है?”

शारदा ने उनकी तरफ देखा।

कुछ नहीं कहा।

राधा समझ गईं।

“नहीं…”

उन्होंने बच्चे को कसकर पकड़ लिया।

“आपने क्या किया?”

शारदा ने कहा—

“मैंने सिर्फ उसका शरीर बचाया है।”

“और उसकी आत्मा?”

“वो…”

शारदा ने आईने की तरफ देखा।

“अब अकेली नहीं है।”

---

अचानक दृश्य टूट गया।

अर्जुन वर्तमान में लौट आया।

वह फर्श पर घुटनों के बल बैठा था।

उसके हाथ में लाल गेंद थी।

मीरा उसके सामने थी।

ईशान उसके पीछे।

अर्जुन ने काँपते हुए पूछा,

“अभय की मौत नहीं हुई थी।”

ईशान ने कहा,

“नहीं।”

“उसकी परछाईं आईने में गई थी।”

“हाँ।”

“तो वो अब भी जिंदा है?”

ईशान ने कहा,

“शरीर नहीं।”

अर्जुन ने आँखें बंद कीं।

“फिर मैं कौन हूँ?”

ईशान चुप रहा।

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“मैं कौन हूँ?”

ईशान ने धीरे से कहा—

“जिस बच्चे को बचाया गया…”

वह रुका।

“वो अभय था।”

अर्जुन का चेहरा सफेद हो गया।

“और मैं?”

ईशान ने उत्तर नहीं दिया।

अर्जुन चीख पड़ा—

“मैं कौन हूँ?”

अचानक पूरे कमरे में वही आवाज़ गूँज उठी।

**“तुम…”**

आवाज़ चारों तरफ से आ रही थी।

**“तुम वो हो जो बचा था।”**

अर्जुन ने चारों तरफ देखा।

आईना सामने चमकने लगा।

उसमें एक बच्चा दिखाई दिया।

अभय।

फिर दूसरा बच्चा।

अर्जुन।

दोनों एक-दूसरे के सामने खड़े थे।

लेकिन धीरे-धीरे…

अभय का चेहरा बदलने लगा।

वह अर्जुन जैसा हो गया।

और अर्जुन का चेहरा…

अभय जैसा।

मीरा ने चीखकर कहा—

“आईने से दूर हटो!”

लेकिन देर हो चुकी थी।

आईने के अंदर से एक हाथ बाहर आया।

उसने अर्जुन की गर्दन पकड़ ली।

अर्जुन हवा में उठ गया।

“आह!”

मीरा दौड़ी।

“अर्जुन!”

ईशान ने घंटी बजाई।

**टनननन!**

हाथ पीछे हट गया।

अर्जुन जमीन पर गिरा।

उसने तेजी से साँस ली।

ईशान ने घंटी को देखा।

उसमें एक दरार पड़ चुकी थी।

“अब ये ज्यादा देर नहीं चलेगी।”

मीरा ने पूछा,

“फिर?”

ईशान ने कहा,

“फिर हमें असली आईना ढूँढ़ना होगा।”

अर्जुन ने पूछा,

“ये क्या है?”

ईशान ने सिर हिलाया।

“ये उसकी परछाईं है।”

“असली आईना कहाँ है?”

ईशान ने नीचे देखा।

“शर्मा निवास में नहीं।”

“तो?”

“जहाँ तुम्हारा जन्म हुआ था।”

अर्जुन ने कहा,

“यहाँ?”

ईशान ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

“फिर कहाँ?”

ईशान ने धीरे से कहा—

“देवगढ़ से बाहर।”

मीरा ने पूछा,

“कहाँ?”

ईशान ने जवाब दिया—

“पुराने कुएँ के नीचे।”

अर्जुन को अचानक कुछ याद आया।

बचपन।

एक कुआँ।

वह और मीरा वहाँ खेलते थे।

लेकिन दादी हमेशा उन्हें वहाँ जाने से रोकती थीं।

अर्जुन ने कहा,

“वहाँ तो कुआँ सूख गया था।”

ईशान ने उसकी तरफ देखा।

“कुआँ सूखा नहीं था।”

“तो?”

“उसे बंद किया गया था।”

“किसने?”

ईशान ने कहा—

“तुम्हारे पिता ने।”

---

### 7

तीनों ऊपर लौटने लगे।

लेकिन इस बार सीढ़ियाँ बदल चुकी थीं।

जहाँ पहले पत्थर थे, वहाँ अब दीवारों पर पुराने फोटो लगे थे।

एक फोटो।

दो बच्चे।

अर्जुन और मीरा।

दूसरा फोटो।

अर्जुन और विक्रम।

तीसरा फोटो।

राधा और मीरा।

चौथा फोटो।

राधा और एक बच्चा।

चेहरा काला कर दिया गया था।

पाँचवाँ फोटो…

अभय।

लेकिन उसके चेहरे पर किसी ने लाल स्याही से एक क्रॉस बना दिया था।

अर्जुन रुक गया।

फोटो के नीचे तारीख लिखी थी—

**17 जुलाई 1995**

उसने फोटो को छुआ।

पीछे से आवाज़ आई—

“उसे मत छूना।”

अर्जुन पलटा।

विक्रम खड़ा था।

लेकिन इस बार वह पहले से ज्यादा स्पष्ट था।

“पापा…”

विक्रम ने कहा,

“तुम्हें यह सब नहीं जानना चाहिए था।”

अर्जुन ने गुस्से में कहा,

“आपने मुझसे झूठ बोला!”

विक्रम चुप रहा।

“अभय कौन था?”

विक्रम ने आँखें झुका लीं।

“मेरा बेटा।”

अर्जुन के चेहरे पर दर्द उभरा।

“और मैं?”

विक्रम ने उसकी तरफ देखा।

कुछ सेकंड तक कुछ नहीं कहा।

फिर बोला—

“तुम भी।”

“तो हम दोनों भाई थे?”

विक्रम ने सिर हिलाया।

“हाँ।”

“फिर आपने मुझे क्यों नहीं बताया?”

“क्योंकि…”

विक्रम रुक गया।

“क्योंकि तुम अभय नहीं थे।”

अर्जुन की आँखें फैल गईं।

“तो मैं कौन था?”

विक्रम ने जवाब दिया—

“तुम्हें हमने बचाया नहीं था।”

अर्जुन का दिल बैठ गया।

“क्या?”

“तुम्हें…”

विक्रम की आवाज़ टूट गई।

“हमने चुना था।”

“किसलिए?”

विक्रम ने अर्जुन की आँखों में देखा।

“आईने के लिए।”

सन्नाटा।

मीरा ने धीरे से पूछा,

“विक्रम जी…”

विक्रम ने उसकी तरफ देखा।

“उस रात दो बच्चे थे।”

“हाँ।”

“एक का शरीर जीवित था।”

“हाँ।”

“दूसरे की परछाईं जीवित थी।”

मीरा ने कहा,

“अभय।”

विक्रम ने सिर हिलाया।

“और आईने को दोनों चाहिए थे।”

अर्जुन ने फुसफुसाकर पूछा,

“तो मुझे क्यों चुना?”

विक्रम की आँखों में आँसू आ गए।

“क्योंकि…”

वह रुक गया।

फिर बोला—

“क्योंकि तुम्हारी परछाईं पहले से आईने के साथ जुड़ी हुई थी।”

अर्जुन ने नीचे देखा।

उसकी परछाईं सामान्य थी।

लेकिन अगले ही पल…

उसने देखा कि उसकी परछाईं उसके साथ नहीं चल रही थी।

वह वहीं खड़ी थी।

अकेली।

अर्जुन जम गया।

“पापा…”

विक्रम ने उसकी तरफ देखा।

उसके चेहरे पर डर लौट आया।

“पीछे मत देखना।”

अर्जुन ने धीरे से पूछा,

“क्यों?”

विक्रम ने फुसफुसाया—

“क्योंकि इस बार…”

वह काँप गया।

“जो तुम्हारे पीछे खड़ा है…”

एक पल।

“वो तुम्हारी परछाईं नहीं है।”

अर्जुन ने फिर भी पीछे देखा।

गलियारा खाली था।

फिर उसकी नजर फर्श पर गई।

उसकी परछाईं…

दो थीं।

एक अर्जुन की।

और दूसरी…

एक बच्चे की।

बच्चे की परछाईं ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।

और फर्श पर ही एक शब्द लिखा—

**अभय**

अर्जुन के होंठ काँपे।

“अभय…”

तभी बच्चे की परछाईं ने दूसरा शब्द लिखा।

**भागो।**

अर्जुन समझ नहीं पाया।

“किससे?”

परछाईं ने तीसरा शब्द लिखा।

**राधा।**

अर्जुन ने चौंककर ऊपर देखा।

मीरा ने पूछा,

“क्या हुआ?”

अर्जुन ने काँपते हुए कहा—

“अभय कह रहा है… राधा से भागो।”

मीरा का चेहरा सफेद हो गया।

“नहीं…”

“क्या?”

“अभय राधा से कभी नहीं डरता था।”

“तो?”

मीरा ने धीरे से कहा—

“फिर ये अभय नहीं है।”

अचानक पीछे से राधा की आवाज़ आई—

“सही कहा।”

तीनों पलटे।

राधा सामने खड़ी थीं।

लेकिन इस बार…

वह आईने के अंदर नहीं थीं।

वह वास्तविक कमरे में थीं।

उनके कपड़े भीगे हुए थे।

बाल चेहरे से चिपके हुए।

और उनकी आँखें…

पूरी तरह काली थीं।

मीरा पीछे हट गई।

“माँ…”

राधा मुस्कुराईं।

“मीरा…”

उनकी आवाज़ बहुत नरम थी।

“तुमने मुझे बहुत देर तक आईने में बंद रखा।”

मीरा की आँखों में आँसू आ गए।

“माँ, आप…”

राधा ने अर्जुन की तरफ देखा।

“और तुम।”

अर्जुन पीछे हट गया।

राधा ने कहा—

“तुम्हें आखिरकार याद आ गया।”

“क्या?”

राधा ने धीरे-धीरे अपना हाथ उठाया।

उनकी हथेली पर वही निशान था—

**313**

“कि तुम पैदा नहीं हुए थे।”

अर्जुन की साँस रुक गई।

राधा उसके बिल्कुल करीब आईं।

और उसके कान में फुसफुसाईं—

**“तुम्हें बनाया गया था।”**

उसी क्षण पीछे की सारी घड़ियाँ टूट गईं।

काँच के टुकड़े फर्श पर गिरे।

और हर टूटे हुए काँच में…

एक ही चेहरा दिखाई दे रहा था।

**अभय का।**

फिर उन सभी चेहरों ने एक साथ आँखें खोलीं।

और एक ही आवाज़ में कहा—

**“भैया… मुझे मेरा शरीर वापस चाहिए।”**

अर्जुन चीख पड़ा।

मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

ईशान ने घंटी उठाई।

लेकिन घंटी अब पूरी तरह टूट चुकी थी।

राधा मुस्कुराईं।

“अब कोई घंटी तुम्हें नहीं बचा सकती।”

अर्जुन ने काँपते हुए पूछा—

“तो कौन बचाएगा?”

राधा ने उसकी तरफ देखा।

उनकी काली आँखों में पहली बार आँसू आए।

और उन्होंने बहुत धीमे कहा—

“तुम्हारी माँ।”

अर्जुन की साँस रुक गई।

“मेरी माँ?”

राधा पीछे हटने लगीं।

“हाँ।”

“वो कहाँ है?”

राधा मुस्कुराईं।

“आईने के दूसरी तरफ।”

अर्जुन ने आईने की तरफ देखा।

उसमें एक औरत खड़ी थी।

चेहरा धुंधला था।

लेकिन वह अर्जुन की तरफ हाथ बढ़ा रही थी।

अर्जुन ने उस चेहरे को पहचानने की कोशिश की।

और फिर…

उस औरत ने अपना चेहरा ऊपर उठाया।

अर्जुन के होंठ काँप गए।

क्योंकि वह चेहरा…

उसकी माँ का था।

लेकिन उसकी माँ…

इस समय दिल्ली में थी।

आईने के अंदर खड़ी औरत ने होंठ हिलाए—

**“अर्जुन… घर मत लौटना।”**

और उसी क्षण…

आईने के पीछे से किसी ने उसका गला पकड़ लिया।

औरत चीख उठी।

आईना काला हो गया।

राधा ने आँखें बंद कर लीं।

“अब उसे भी पता चल गया है कि तुम वापस आ गए हो।”

अर्जुन ने पूछा—

“कौन?”

राधा ने उसकी तरफ देखा।

और पहली बार उनकी आवाज़ में डर साफ़ था।

**“वही… जिसने तुम्हें बनाया था।”**

अचानक ऊपर से भारी कदमों की आवाज़ आई।

एक।

दो।

तीन।

फिर…

चौथी दस्तक।

**ठक।**

ईशान ने काँपते हुए कहा—

“वो नीचे नहीं है।”

मीरा ने पूछा—

“तो?”

ईशान ने ऊपर देखा।

उसका चेहरा पीला पड़ चुका था।

“वो ऊपर आ चुका है।”

और उसी क्षण…

तीसरी मंज़िल से अर्जुन की अपनी आवाज़ गूँजी—

**“भैया…”**

मीरा ने अर्जुन की तरफ देखा।

अर्जुन उसके सामने ही खड़ा था।

फिर ऊपर से वही आवाज़ दोबारा आई—

**“मीरा…”**

और उसके बाद…

एक बच्चा सीढ़ियों से उतरता दिखाई दिया।

उसके हाथ में लाल गेंद थी।

उसने नीचे आकर गेंद अर्जुन की तरफ बढ़ाई।

और मुस्कुराकर कहा—

**“चलो भैया… माँ तुम्हारा इंतज़ार कर रही है।”**

अर्जुन ने उसकी आँखों में देखा।

काली आँखें।

पूरी तरह काली।

और फिर उसे समझ आया—

**अभय आईने में नहीं था।**

**अभय अब घर में था।**

**जारी रहेगा…**

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