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एपिसोड 8: दूसरा अर्जुन
firoj saifi · Ghost Stories · 21 मिनट
- Writer
- firoj saifi
- Story
- “अंधेरे में कोई है”
- Chapter
- 8 of 8
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 21 min
- Words
- 4156
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
कमरे में अंधेरा था।
इतना गहरा कि अर्जुन को अपनी उँगलियाँ भी दिखाई नहीं दे रही थीं।
लेकिन उसे पता था कि वह अकेला नहीं था।
उसके सामने कोई बच्चा खड़ा था।
और उसके पीछे…
कोई और।
अर्जुन ने धीरे-धीरे गर्दन घुमाई।
अंधेरे में एक आकृति दिखाई दे रही थी।
वही कद।
वही चेहरा।
वही कपड़े।
वही आँखें।
वही अर्जुन।
बस एक फर्क था।
उसकी आँखों में सफेदी नहीं थी।
दो बिल्कुल काले गोल घेरे।
और उसके पैरों के नीचे कोई परछाईं नहीं थी।
अर्जुन का गला सूख गया।
“तुम…”
दूसरे अर्जुन ने मुस्कुराकर सिर झुका दिया।
“इतने साल बाद भी पहचान नहीं पाए?”
अर्जुन पीछे हट गया।
“तुम कौन हो?”
दूसरे अर्जुन ने वही सवाल दोहराया—
“तुम कौन हो?”
अर्जुन चुप रहा।
“अर्णव?”
दूसरा अर्जुन एक कदम आगे आया।
“अभय?”
एक और कदम।
“अर्जुन?”
अर्जुन ने पीछे हटना जारी रखा।
उसकी पीठ दीवार से लग गई।
दूसरा अर्जुन अब उसके बिल्कुल सामने था।
उसने अपना चेहरा अर्जुन के चेहरे के करीब लाकर फुसफुसाया—
“इनमें से कोई भी नहीं।”
अचानक कमरे में हल्की लाल रोशनी जल उठी।
अर्जुन ने चारों तरफ देखा।
दीवारों पर पुराने निशान बने थे।
कुछ जगहों पर बच्चों की ऊँचाई पर हाथों के निशान थे।
फर्श पर राख बिखरी हुई थी।
और सामने एक बड़ा आईना था।
आईने के सामने एक कुर्सी रखी थी।
उस कुर्सी पर…
राधा बैठी थीं।
अर्जुन की साँस रुक गई।
“राधा आंटी?”
राधा ने उसकी तरफ देखा।
उनका चेहरा थका हुआ था।
आँखों के नीचे काले घेरे।
बाल बिखरे हुए।
लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि उनके दोनों हाथ आईने के अंदर से बाहर निकल रहे थे।
जैसे उनका शरीर आईने के पीछे फँसा हो।
उन्होंने धीरे से कहा,
“अर्जुन… मेरी बात ध्यान से सुनो।”
अर्जुन आगे बढ़ा।
“आप यहाँ कैसे—”
“वो तुम्हें जो दिखा रहा है, उस पर विश्वास मत करना।”
दूसरा अर्जुन हँस पड़ा।
“फिर वही बात।”
राधा ने उसकी तरफ देखा।
“तुम चुप रहो।”
दूसरा अर्जुन मुस्कुराया।
“आपने मुझे ही तो बनाया था।”
राधा का चेहरा बदल गया।
अर्जुन ने उनकी तरफ देखा।
“क्या?”
राधा ने कुछ नहीं कहा।
अर्जुन ने दोबारा पूछा—
“आपने इसे बनाया था?”
कमरे में कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।
फिर राधा ने धीरे से सिर झुका लिया।
“नहीं।”
उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
“मैंने उसे बनाया नहीं था।”
दूसरा अर्जुन धीरे-धीरे हँसा।
“तो फिर बताओ उन्हें।”
राधा ने अर्जुन की तरफ देखा।
“मैंने सिर्फ उसे आने दिया था।”
---
### 1
अर्जुन का सिर घूमने लगा।
“किसे?”
राधा ने जवाब नहीं दिया।
अचानक कमरे की दीवार पर लगी एक पुरानी घड़ी दिखाई दी।
उसकी सुइयाँ उल्टी दिशा में घूम रही थीं।
3:13…
3:12…
3:11…
फिर 3:10…
अर्जुन ने घड़ी को घूरते हुए पूछा,
“समय पीछे क्यों जा रहा है?”
राधा बोलीं,
“क्योंकि यह कमरा समय के अंदर नहीं है।”
“फिर कहाँ है?”
“जहाँ यादें मरती हैं।”
अर्जुन की आँखें सिकुड़ गईं।
“मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।”
राधा ने कहा,
“समझने की कोशिश मत करो।”
“तो क्या करूँ?”
“याद करो।”
अर्जुन ने सिर पकड़ लिया।
“क्या?”
राधा की आवाज़ बहुत धीमी हो गई।
“17 जुलाई 2008।”
कमरे की दीवार अचानक काँपने लगी।
और अर्जुन की आँखों के सामने एक दृश्य उभर आया।
बारिश।
काली रात।
शर्मा निवास।
तीसरी मंज़िल।
और एक छोटा लड़का…
तेरह साल का अर्जुन।
वह गलियारे में खड़ा था।
उसके हाथ में लाल रंग की गेंद थी।
सामने राधा खड़ी थीं।
उनकी बाँहों में एक बच्चा था।
लेकिन इस बार अर्जुन ने बच्चे को ध्यान से देखा।
वह बच्चा ईशान नहीं था।
वह…
अर्जुन था।
तेरह साल का नहीं।
बहुत छोटा।
शायद कुछ महीने का।
अर्जुन ने खुद को ही राधा की बाँहों में देखा।
उसके सिर में तेज़ दर्द उठा।
“ये…”
राधा ने कहा,
“यही वो रात है जिसे तुम्हारे दिमाग से मिटाया गया था।”
“लेकिन मैं तो उस रात तेरह साल का था।”
“हाँ।”
“फिर ये बच्चा कौन है?”
राधा ने कुछ नहीं कहा।
अचानक दृश्य बदल गया।
अब कमरे में विक्रम भी था।
उसके चेहरे पर घबराहट थी।
वह राधा से कह रहा था—
“हमें इसे नीचे ले जाना होगा।”
राधा ने सिर हिलाया।
“अब बहुत देर हो चुकी है।”
“राधा!”
“विक्रम, तुम नहीं समझ रहे।”
“तो समझाओ!”
राधा ने बच्चे की तरफ देखा।
बच्चा सो रहा था।
लेकिन उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।
विक्रम ने काँपते हुए पूछा,
“ये कौन है?”
राधा ने कहा—
“ये वही है जो आईने में था।”
विक्रम पीछे हट गया।
“नहीं।”
“मैंने इसे जन्म नहीं दिया।”
“तो फिर?”
राधा की आँखों में आँसू आ गए।
“मुझे नहीं पता।”
तभी आईने के अंदर से किसी बच्चे की हँसी सुनाई दी।
विक्रम ने तुरंत आईने की तरफ देखा।
आईने में कमरे का दृश्य दिखाई दे रहा था।
राधा।
विक्रम।
बच्चा।
लेकिन अर्जुन…
आईने में नहीं था।
विक्रम ने घबराकर पूछा,
“अर्जुन कहाँ है?”
राधा ने पीछे मुड़कर देखा।
तेरह साल का अर्जुन कमरे के दरवाज़े पर खड़ा था।
उसकी आँखें खुली थीं।
वह सब देख रहा था।
विक्रम ने चिल्लाकर कहा—
“अर्जुन! नीचे जाओ!”
अर्जुन ने पूछा,
“पापा… ये बच्चा कौन है?”
विक्रम दौड़कर उसकी तरफ गया।
लेकिन तभी…
आईने से एक हाथ बाहर आया।
काला।
लंबा।
असामान्य रूप से पतला।
उस हाथ ने अर्जुन की परछाईं पकड़ ली।
अर्जुन चीख पड़ा।
---
अचानक वर्तमान में सब कुछ लौट आया।
अर्जुन फर्श पर गिरा पड़ा था।
उसका सिर घूम रहा था।
मीरा उसके पास झुकी हुई थी।
“अर्जुन!”
अर्जुन ने आँखें खोलीं।
“मीरा?”
“हाँ।”
“तुम बाहर थी…”
मीरा ने उसकी बात काट दी।
“मैं अंदर आ गई।”
अर्जुन ने चारों तरफ देखा।
वही कमरा।
वही लाल रोशनी।
लेकिन दूसरा अर्जुन गायब था।
“वो कहाँ गया?”
मीरा ने धीरे से पूछा,
“कौन?”
“वही… जो मेरे जैसा था।”
मीरा का चेहरा उतर गया।
“तुमने उसे देख लिया?”
“हाँ।”
“फिर उसने तुम्हें देखा भी?”
अर्जुन ने सिर हिलाया।
मीरा ने आँखें बंद कर लीं।
“अब वो जान गया कि तुम यहाँ हो।”
“वो पहले से जानता था।”
“नहीं।”
मीरा ने धीरे से कहा,
“वो तुम्हें पहले महसूस करता था।”
“और अब?”
“अब वो तुम्हें देख सकता है।”
---
### 2
अर्जुन उठने लगा।
“हमें यहाँ से निकलना होगा।”
मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि बाहर भी वही है।”
अर्जुन रुक गया।
“क्या?”
मीरा ने आईने की तरफ देखा।
“जब दरवाज़ा बंद हुआ था, मैं बाहर थी।”
“हाँ।”
“लेकिन बाहर कोई दरवाज़ा था ही नहीं।”
अर्जुन ने उसे देखा।
“क्या मतलब?”
“जिस कमरे में तुम अंदर गए, उसका दरवाज़ा सिर्फ तुम्हारे लिए खुला था।”
अर्जुन की साँस धीमी हो गई।
“तो तुम अंदर कैसे आई?”
मीरा ने कोई जवाब नहीं दिया।
अर्जुन ने उसका हाथ देखा।
फिर उसकी आँखों में देखा।
“मीरा…”
“क्या?”
“तुम्हारी परछाईं कहाँ है?”
मीरा स्थिर हो गई।
दोनों ने नीचे देखा।
फर्श पर अर्जुन की परछाईं थी।
लेकिन मीरा की…
नहीं थी।
अर्जुन धीरे-धीरे उससे दूर हट गया।
“तुम…”
मीरा ने तुरंत कहा,
“अर्जुन, मेरी बात सुनो।”
“तुम्हारी परछाईं नहीं है।”
“मुझे पता है।”
“तो तुम कौन हो?”
मीरा की आँखों में आँसू आ गए।
“मुझे खुद नहीं पता।”
अर्जुन ने कुछ नहीं कहा।
मीरा ने काँपते हुए हाथ आगे बढ़ाया।
“भैया…”
अर्जुन वहीं रुक गया।
यह वही शब्द था।
वही आवाज़।
वही मीरा।
लेकिन उसके दिमाग में विक्रम की आवाज़ गूँज रही थी—
**“अपनी परछाईं को अपने पास मत आने देना।”**
अर्जुन ने पीछे कदम रखा।
मीरा का चेहरा टूट गया।
“तुम मुझसे डर रहे हो?”
“मुझे नहीं पता कि तुम कौन हो।”
“मैं मीरा हूँ।”
“कैसे मान लूँ?”
“क्योंकि…”
मीरा रुक गई।
फिर उसने कहा,
“क्योंकि तुम्हें 2008 की एक बात याद नहीं है।”
अर्जुन ने उसे देखा।
“क्या?”
“तुमने मुझे एक बार बचाने के लिए खुद को आईने के सामने खड़ा किया था।”
“क्या?”
“तुम्हें याद नहीं?”
“नहीं।”
“क्योंकि उस याद को भी मिटा दिया गया था।”
अर्जुन ने धीरे से पूछा,
“तब क्या हुआ था?”
मीरा ने आईने की तरफ देखा।
“तुमने मुझे बचाया था।”
“किससे?”
मीरा ने फुसफुसाकर कहा—
“अपने ही चेहरे से।”
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### 3
अचानक आईने की सतह पर लहरें उठने लगीं।
जैसे काँच नहीं, पानी हो।
एक चेहरा उभरा।
विक्रम का।
“अर्जुन…”
अर्जुन तुरंत आगे बढ़ा।
“पापा!”
मीरा ने उसे रोक लिया।
“रुको।”
आईने में विक्रम ने कहा,
“मैं सच बता सकता हूँ।”
मीरा चिल्लाई,
“आप सच नहीं हैं!”
विक्रम ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हें कैसे पता?”
मीरा ने कहा,
“क्योंकि असली विक्रम शर्मा कभी अपनी बेटी को इस तरह नहीं देखते थे।”
आईने में विक्रम मुस्कुराया।
“बेटी?”
मीरा पीछे हट गई।
“क्या?”
विक्रम ने धीरे से कहा,
“तुम्हें लगता है तुम राधा की बेटी हो?”
मीरा के चेहरे से खून उतर गया।
“मैं हूँ।”
“तुम्हें किसने बताया?”
“मेरी माँ ने।”
“और तुम्हारी माँ कौन है?”
मीरा चुप।
विक्रम ने कहा,
“राधा?”
मीरा ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
“फिर उसे आईने से बाहर क्यों नहीं निकालती?”
मीरा के होंठ काँपे।
“मैंने कोशिश की।”
“कितनी बार?”
“बहुत बार।”
“और हर बार?”
मीरा की आँखों से आँसू निकल आए।
“हर बार… वो किसी और के चेहरे में बदल गई।”
अर्जुन ने पूछा,
“किसके?”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हारे।”
अर्जुन सन्न रह गया।
“मेरे?”
“हाँ।”
मीरा ने कहा,
“जब भी मैं राधा को बाहर निकालने की कोशिश करती, आईना तुम्हारा चेहरा बना देता।”
विक्रम की आवाज़ आई—
“क्योंकि राधा तुम्हें पहचानती थी।”
अर्जुन ने आईने की तरफ देखा।
“क्यों?”
“क्योंकि तुम ही कारण थे।”
“किस चीज़ के?”
विक्रम ने कहा—
“17 जुलाई 2008 की रात के।”
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### 4
कमरे की लाल रोशनी बुझ गई।
पूर्ण अंधकार।
फिर…
किसी बच्चे के रोने की आवाज़।
अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।
“ये फिर वही बच्चा है…”
मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मत सुनो।”
रोने की आवाज़ तेज़ हो गई।
“भैया…”
अर्जुन का दिल बैठ गया।
“ये…”
“मत सुनो!”
“ये मीरा की आवाज़ है।”
“नहीं!”
“लेकिन—”
“ये वही है जो तुम्हें बुला रहा है!”
अचानक रोना बंद हो गया।
और एक छोटी-सी आवाज़ आई—
“भैया…”
फिर दूसरी आवाज़।
“भैया…”
फिर तीसरी।
“भैया…”
फिर चौथी।
पूरा कमरा बच्चों की आवाज़ों से भर गया।
सैकड़ों आवाज़ें।
सब एक साथ।
**“भैया…”**
अर्जुन ने कान बंद कर लिए।
मीरा चीखती रही—
“अर्जुन! आँखें मत खोलना!”
लेकिन तभी उसके कान के बिल्कुल पास किसी ने कहा—
“तुमने मेरा नाम रखा था।”
अर्जुन की आँखें खुल गईं।
सामने वही बच्चा खड़ा था।
दस साल का।
चेहरा अर्जुन का।
काली आँखें।
वह मुस्कुराया।
“याद आया?”
अर्जुन ने काँपते हुए कहा,
“तुम… कौन हो?”
बच्चा बोला—
“मैं वही हूँ जिसे तुमने आईने में छोड़ दिया था।”
“मैंने तुम्हें नहीं छोड़ा।”
“झूठ।”
“मैंने नहीं!”
बच्चा आगे आया।
“तुम डर गए थे।”
अर्जुन चुप।
“तुमने मुझे देखा।”
एक कदम।
“फिर तुमने अपना नाम बताया।”
दूसरा कदम।
“फिर मैंने तुम्हारा चेहरा ले लिया।”
अर्जुन की साँस तेज़ हो गई।
“तुम परछाईं हो?”
बच्चा मुस्कुराया।
“नहीं।”
“तो कौन?”
बच्चे ने अपनी छाती पर हाथ रखा।
“मैं तुम्हारा बचा हुआ हिस्सा हूँ।”
अर्जुन ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“तुम्हारे अंदर जितना डर था…”
बच्चा बोला,
“उतना ही हिस्सा उस रात आईने में रह गया।”
“और तुम वही हो?”
“हाँ।”
“फिर तुम मुझे क्यों चाहते हो?”
बच्चा पहली बार गंभीर हुआ।
“क्योंकि मैं अकेला हूँ।”
“तुम्हें अकेले रहने दो।”
“नहीं।”
उसकी आँखों से काली रेखाएँ नीचे बहने लगीं।
“मैंने पंद्रह साल तुम्हारा इंतज़ार किया है।”
अर्जुन पीछे हट गया।
“पंद्रह साल?”
“हाँ।”
“लेकिन मैं तो घर से चला गया था।”
“तुम चले गए।”
बच्चे ने कहा,
“मैं नहीं जा सका।”
“क्यों?”
“क्योंकि किसी ने दरवाज़ा बंद कर दिया था।”
अर्जुन ने पूछा,
“किसने?”
बच्चे ने धीरे-धीरे पीछे देखा।
कमरे के दूसरे छोर पर राधा खड़ी थीं।
आईने के अंदर।
उन्होंने आँखें बंद कर रखी थीं।
बच्चे ने कहा—
“उसने।”
अर्जुन ने राधा की तरफ देखा।
“राधा आंटी ने?”
बच्चे ने सिर हिलाया।
“उसने मुझे बंद किया।”
अर्जुन ने आईने की तरफ देखा।
“क्यों?”
राधा ने आँखें खोल दीं।
उनकी आँखों में आँसू थे।
“क्योंकि अगर मैं ऐसा नहीं करती…”
वह रुक गईं।
“तो वो बाहर आ जाता।”
अर्जुन ने पूछा,
“कौन?”
राधा ने सीधे अर्जुन की तरफ देखा।
“तुम।”
अर्जुन के पैरों के नीचे से जैसे जमीन खिसक गई।
“मैं?”
“हाँ।”
“मैं तो बाहर था।”
राधा ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
उनकी आवाज़ काँप रही थी।
“तुम्हारा शरीर बाहर था।”
अर्जुन ने सांस रोक ली।
राधा ने कहा—
“लेकिन उस रात तुम्हारा एक हिस्सा यहीं रह गया था।”
---
### 5
अचानक कमरे का दरवाज़ा खुला।
बाहर लंबा गलियारा था।
गलियारे में सैकड़ों आईने लगे थे।
हर आईने में अर्जुन दिखाई दे रहा था।
लेकिन हर आईने में उसका चेहरा अलग था।
एक में वह बच्चा था।
दूसरे में बूढ़ा।
तीसरे में उसका चेहरा काला पड़ा था।
चौथे में वह रो रहा था।
पाँचवें में…
वह मुस्कुरा रहा था।
और छठे में…
वह बिल्कुल खाली था।
मीरा ने फुसफुसाकर कहा,
“हमें इस गलियारे से निकलना होगा।”
अर्जुन ने पूछा,
“कहाँ?”
“नीचे।”
“नीचे कहाँ?”
“उस जगह जहाँ तीसरी मंज़िल का आईना पहली बार बनाया गया था।”
“कहाँ?”
मीरा ने कहा—
“पुरानी हवेली के नीचे।”
अर्जुन को Episode 3 की underground जगह याद आई।
313 वाला पत्थर।
तीन दस्तक।
वह दरवाज़ा।
“वहीं?”
“हाँ।”
“लेकिन वो दरवाज़ा तो बंद था।”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
“वो कभी बंद था ही नहीं।”
दोनों आगे बढ़े।
गलियारे में पहला आईना पार किया।
फिर दूसरा।
तीसरा।
चौथा।
हर आईने में उनकी अलग तस्वीर बन रही थी।
अचानक एक आईने में अर्जुन रुक गया।
उसमें 2008 दिखाई दे रहा था।
छोटा अर्जुन सीढ़ियों पर खड़ा था।
उसके सामने राधा।
और राधा के पीछे…
शारदा।
शारदा के हाथ में एक चाँदी की घंटी थी।
वह राधा से कह रही थीं—
“इसे अभी रोको।”
राधा ने कहा,
“अगर इसे रोका तो बच्चा मर जाएगा।”
शारदा ने जवाब दिया—
“अगर नहीं रोका तो दो बच्चे होंगे।”
अर्जुन की आँखें फैल गईं।
“दो बच्चे?”
आईने में विक्रम भी दिखाई दिया।
वह चिल्लाया—
“शारदा माँ! आप क्या कर रही हैं?”
शारदा ने कहा—
“मैं वही कर रही हूँ जो तुम दोनों नहीं कर पाए।”
उन्होंने घंटी बजाई।
**टनननन…**
आईने में सब कुछ रुक गया।
बारिश रुक गई।
राधा रुक गईं।
विक्रम रुक गया।
छोटा अर्जुन भी।
लेकिन आईने के अंदर एक चीज़ नहीं रुकी।
एक परछाईं।
वह धीरे-धीरे आगे बढ़ी।
शारदा के पीछे पहुँची।
और उसके कान में कुछ कहा।
शारदा का चेहरा सफेद पड़ गया।
फिर उन्होंने धीरे से कहा—
“तो यही है…”
अर्जुन ने आईने के पास जाकर पूछा,
“क्या?”
मीरा ने उसे रोकना चाहा।
लेकिन अर्जुन पहले ही आईने को छू चुका था।
आईना अचानक गर्म हो गया।
उसकी हथेली पर काला निशान उभर आया।
**313**
और उसी क्षण…
आईने के अंदर शारदा ने सिर उठाया।
सीधे अर्जुन की तरफ देखा।
जैसे वह उसे देख सकती हों।
उन्होंने होंठ हिलाए।
अर्जुन ने पढ़ा—
**“वो बच्चा अर्जुन नहीं था।”**
अर्जुन पीछे हट गया।
“क्या?”
मीरा ने पूछा,
“क्या हुआ?”
अर्जुन ने कुछ नहीं कहा।
आईने के अंदर दृश्य बदल चुका था।
अब वहाँ एक और बच्चा था।
छोटा।
बहुत छोटा।
राधा की गोद में।
उसकी आँखें बंद थीं।
उसके चेहरे पर एक छोटा काला निशान था।
313।
फिर राधा ने उस बच्चे को अर्जुन के पास रखा।
तेरह साल का अर्जुन उस बच्चे को देखकर पीछे हट गया।
और तभी…
बच्चे ने आँखें खोल दीं।
उसकी आँखें काली थीं।
अर्जुन ने काँपते हुए कहा—
“ये मैं नहीं था।”
मीरा ने पूछा,
“तो कौन था?”
अर्जुन ने जवाब नहीं दिया।
क्योंकि आईने में वह बच्चा धीरे-धीरे मुस्कुराने लगा था।
और उसके होंठ हिले—
**“मैं।”**
---
### 6
अचानक पीछे से किसी ने अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।
वह पलटा।
कोई नहीं था।
फिर हाथ दोबारा उसकी कलाई पर कस गया।
इस बार अर्जुन ने नीचे देखा।
उसकी अपनी परछाईं…
फर्श से बाहर निकल रही थी।
वह परछाईं अब उसके पैरों से जुड़ी नहीं थी।
उसने अर्जुन की कलाई पकड़ रखी थी।
अर्जुन चीखा—
“मीरा!”
मीरा ने उसकी तरफ दौड़ लगाई।
लेकिन परछाईं ने अर्जुन को अपनी तरफ खींचना शुरू कर दिया।
“मुझे छोड़ो!”
परछाईं ने कोई आवाज़ नहीं की।
अचानक उसके चेहरे की जगह आँखें बन गईं।
फिर नाक।
फिर होंठ।
और कुछ ही सेकंड में…
उसका चेहरा अर्जुन जैसा हो गया।
दूसरा अर्जुन।
वही।
वह हँस रहा था।
“तुम मुझे बाहर नहीं निकाल सकते।”
अर्जुन ने पूरी ताकत से हाथ छुड़ाया।
“तू है कौन?”
दूसरा अर्जुन बोला—
“जिसे तुम हर बार नया नाम देते हो।”
“क्या मतलब?”
“कभी अभय।”
एक कदम।
“कभी अर्णव।”
दूसरा कदम।
“कभी अर्जुन।”
तीसरा कदम।
“और कभी…”
वह मीरा की तरफ देखने लगा।
“मीरा।”
मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया।
“नहीं…”
अर्जुन ने चौंककर उसे देखा।
“मीरा?”
वह पीछे हट गई।
“मैंने उसका नाम नहीं रखा था।”
दूसरा अर्जुन हँसा।
“तुमने नहीं।”
उसने अर्जुन की तरफ देखा।
“इसने रखा था।”
अर्जुन के दिमाग में जैसे बिजली कौंधी।
वही पुरानी स्मृति।
2008।
आईना।
एक काली आकृति।
अर्जुन की आवाज़—
**“तुम कौन हो?”**
और उस आकृति ने पूछा था—
**“मुझे नाम दो।”**
अर्जुन ने डरते हुए कहा था—
“मीरा।”
फिर…
काली आकृति ने मीरा का चेहरा ले लिया था।
अर्जुन का सिर घूम गया।
“नहीं…”
मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“भैया…”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“क्या मैंने…?”
मीरा की आँखों से आँसू बह रहे थे।
“हाँ।”
“मैंने तुम्हारा नाम उसे दिया था?”
मीरा ने सिर झुका लिया।
“शायद।”
“शायद?”
“क्योंकि मुझे खुद नहीं पता कि उस रात मैं सच में वहाँ थी या नहीं।”
अर्जुन ने उसका हाथ छोड़ दिया।
“तो तुम भी…”
मीरा ने कहा,
“मैं भी शायद उसकी बनाई हुई याद हूँ।”
दोनों कुछ नहीं बोले।
तभी पीछे से आवाज़ आई—
“नहीं।”
राधा थीं।
आईने के अंदर।
उन्होंने पहली बार तेज़ आवाज़ में कहा—
“मीरा सच है।”
अर्जुन ने उनकी तरफ देखा।
“तो बाकी क्या है?”
राधा ने जवाब दिया—
“बाकी सब आधा सच है।”
“मेरा नाम?”
“आधा सच।”
“मेरी यादें?”
“आधा सच।”
“ईशान?”
राधा चुप हो गईं।
“ईशान कौन है?”
कुछ सेकंड तक राधा की आँखें बंद रहीं।
फिर उन्होंने कहा—
“वो इस कहानी का पहला बच्चा नहीं है।”
अर्जुन ने पूछा,
“तो पहला बच्चा कौन था?”
राधा ने आईने की तरफ देखा।
“तुम।”
“मैं?”
“हाँ।”
“लेकिन आपने कहा था—”
“मैंने कभी नहीं कहा कि तुम पहले पैदा हुए थे।”
अर्जुन का चेहरा जम गया।
“तो?”
राधा ने बहुत धीमे कहा—
“तुमसे पहले एक बच्चा था।”
“कौन?”
राधा ने जवाब दिया—
**“अभय।”**
अर्जुन की साँस रुक गई।
“लेकिन अभय तो मेरा नाम था।”
राधा ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“तो?”
राधा ने कहा—
“अभय तुम्हारा नाम नहीं था।”
एक लंबी खामोशी।
फिर उन्होंने कहा—
“अभय… तुम्हारा भाई था।”
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### 7
अर्जुन की आँखें फैल गईं।
“मेरा… भाई?”
मीरा भी स्तब्ध थी।
“माँ…”
राधा ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हें यह जानना नहीं था।”
मीरा की आवाज़ काँप रही थी।
“तो ईशान?”
राधा ने आँखें बंद कर लीं।
“ईशान भी…”
वह रुक गईं।
“ईशान को बीच में मत लाओ।”
“क्यों?”
“क्योंकि अगर उसने तुम्हारा नाम सुन लिया…”
राधा की आवाज़ टूट गई।
“तो वो जाग जाएगा।”
अर्जुन ने पूछा—
“कौन?”
राधा ने जवाब नहीं दिया।
अचानक पूरा गलियारा काँपने लगा।
सभी आईनों में दरारें पड़ने लगीं।
एक साथ।
**चटाक!**
**चटाक!**
**चटाक!**
मीरा ने अर्जुन को पकड़ लिया।
“चलो!”
दोनों भागे।
गलियारे के अंत में सीढ़ियाँ दिखाई दीं।
नीचे अंधेरा था।
लेकिन उसी अंधेरे से किसी बच्चे की हँसी आ रही थी।
अर्जुन सीढ़ियाँ उतरने लगा।
एक।
दो।
तीन।
चार।
हर सीढ़ी के साथ आवाज़ साफ़ होती गई।
“भैया…”
पाँच।
“भैया…”
छह।
“मुझे पहचानो।”
सात।
अर्जुन रुक गया।
“ये आवाज़…”
मीरा ने पूछा,
“किसकी?”
अर्जुन ने धीरे से कहा—
“अभय की।”
सीढ़ियों के नीचे एक बच्चा खड़ा था।
उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।
उसने सफेद कपड़े पहन रखे थे।
हाथ में लाल गेंद थी।
अर्जुन ने उसे देखते ही पहचान लिया।
वही लाल गेंद।
जो उसने 17 जुलाई 2008 को पकड़ी थी।
बच्चे ने गेंद उसकी तरफ बढ़ाई।
“ये तुम्हारी है।”
अर्जुन ने हाथ आगे किया।
जैसे ही उसकी उँगलियाँ गेंद से छुईं…
पूरा घर हिल गया।
और उसके दिमाग में आखिरी याद खुल गई।
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### 8
17 जुलाई 2008।
रात 3:13।
तीसरी मंज़िल।
तेरह साल का अर्जुन आईने के सामने खड़ा था।
राधा चिल्ला रही थीं—
“अर्जुन! पीछे हटो!”
विक्रम उसे खींचने की कोशिश कर रहा था।
शारदा घंटी बजा रही थीं।
मीरा दरवाज़े के पास रो रही थी।
और आईने के अंदर…
एक बच्चा खड़ा था।
वह अर्जुन जैसा दिखता था।
अर्जुन ने पूछा—
“तुम कौन हो?”
बच्चे ने कहा—
“तुम।”
“नहीं।”
“हाँ।”
“मेरा नाम क्या है?”
बच्चा मुस्कुराया।
“तुम बताओ।”
अर्जुन डर गया।
बच्चे ने कहा—
“मुझे कोई नाम दो।”
अर्जुन ने पीछे देखा।
मीरा रो रही थी।
उसने सोचा…
और कहा—
“मीरा।”
आईने में बच्चा बदल गया।
उसका चेहरा मीरा का हो गया।
मीरा चीख उठी।
“भैया!”
राधा ने घंटी बजाई।
**टनननन…**
आईना काँप गया।
काली परछाईं पीछे हट गई।
लेकिन उसी समय कमरे के दूसरे कोने से एक बच्चे की आवाज़ आई—
“अर्जुन…”
अर्जुन ने पलटकर देखा।
वहाँ एक और बच्चा खड़ा था।
उसके हाथ में लाल गेंद थी।
“तुम कौन हो?”
बच्चे ने कहा—
“अभय।”
अर्जुन ने उसे देखा।
“तुम मेरे जैसे क्यों दिखते हो?”
अभय ने मुस्कुराकर कहा—
“क्योंकि मैं तुमसे पहले आया था।”
अर्जुन कुछ समझ नहीं पाया।
तभी विक्रम ने चिल्लाकर कहा—
“राधा! दरवाज़ा बंद करो!”
राधा ने कहा—
“दोनों बच्चों को बाहर नहीं निकाला जा सकता।”
शारदा ने घंटी बजाई।
कमरे में तेज़ हवा चली।
आईना काला हो गया।
अर्जुन ने अभय की तरफ हाथ बढ़ाया।
“चलो!”
अभय ने उसका हाथ पकड़ लिया।
लेकिन अगले ही पल…
अभय का हाथ अर्जुन के हाथ से निकल गया।
जैसे वह धुएँ से बना हो।
अर्जुन चीख पड़ा।
“अभय!”
अभय पीछे हटता गया।
आईने की तरफ।
राधा चिल्लाईं—
“अर्जुन! उसे मत छुओ!”
लेकिन अर्जुन ने सुनना बंद कर दिया था।
वह आईने की तरफ दौड़ा।
अभय आईने के अंदर चला गया।
अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की।
और उसी क्षण…
आईने में अर्जुन की परछाईं अलग हो गई।
दो आकृतियाँ बन गईं।
एक अर्जुन के साथ।
दूसरी…
अभय के साथ।
शारदा चीखीं—
“अब दो हो गए!”
विक्रम ने अर्जुन को पकड़ लिया।
राधा ने दरवाज़ा बंद कर दिया।
और आईने के अंदर से अभय की आवाज़ आई—
“अर्जुन…”
“भैया…”
“मुझे यहाँ अकेला मत छोड़ना।”
फिर शारदा ने चाँदी की घंटी बजाई।
आईना बंद हो गया।
और उसी रात…
अर्जुन की यादों का एक हिस्सा हमेशा के लिए मिटा दिया गया।
---
अर्जुन ने आँखें खोल दीं।
उसके हाथ में अभी भी लाल गेंद थी।
मीरा उसके सामने खड़ी थी।
“अब समझे?”
अर्जुन की आँखों में आँसू थे।
“अभय…”
मीरा ने धीरे से कहा,
“तुम्हारा भाई।”
अर्जुन ने सिर उठाया।
“तो उसे आईने में क्यों बंद किया गया?”
मीरा ने कोई जवाब नहीं दिया।
क्योंकि तभी सीढ़ियों के नीचे से एक आवाज़ आई—
“क्योंकि…”
दोनों ने नीचे देखा।
अँधेरे में ईशान खड़ा था।
उसकी आँखें बिल्कुल सामान्य थीं।
चेहरा शांत।
वह मुस्कुराया।
“क्योंकि अभय अकेला बच्चा नहीं था।”
अर्जुन ने पूछा,
“और कौन था?”
ईशान ने धीरे-धीरे सिर उठाया।
उसकी नजर सीधे अर्जुन पर थी।
“मैं।”
मीरा पीछे हट गई।
“ईशान…”
ईशान मुस्कुराया।
“बहुत देर कर दी, दीदी।”
“तुम यहाँ कैसे आए?”
“मैं कभी गया ही नहीं।”
अर्जुन ने पूछा—
“तुम अभय को जानते हो?”
ईशान ने सिर हिलाया।
“वो मेरा भाई था।”
अर्जुन का दिल धड़कना भूल गया।
“तुम…?”
ईशान ने कहा—
“और तुम…”
वह धीरे-धीरे अर्जुन के पास आया।
“तुम हमारे भाई नहीं हो।”
अर्जुन जम गया।
ईशान उसके बिल्कुल सामने आ गया।
फिर उसने बहुत धीमे कहा—
“तुम वो हो जिसे हमारे भाई ने बनाया था।”
अर्जुन के हाथ से लाल गेंद गिर गई।
**टन्न।**
ईशान ने गेंद उठाई।
उसने अर्जुन की तरफ देखते हुए कहा—
“अब तुम्हें आखिरी दरवाज़ा खोलना होगा।”
“कौन-सा?”
ईशान ने नीचे फर्श की तरफ इशारा किया।
फर्श पर धीरे-धीरे काली रेखाएँ उभरने लगीं।
एक चौकोर दरवाज़ा।
उस पर वही निशान था—
**313**
और उसके नीचे एक तारीख।
**17 जुलाई 1995**
अर्जुन ने तारीख पढ़ी।
उसकी साँस रुक गई।
“ये…”
ईशान मुस्कुराया।
“तुम्हारे जन्म की तारीख नहीं है।”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“फिर?”
ईशान ने फुसफुसाकर कहा—
“ये उस दिन की तारीख है…”
वह रुका।
“जब अभय पहली बार मरा था।”
फर्श के नीचे से तीन दस्तकें सुनाई दीं।
**ठक।**
**ठक।**
**ठक।**
फिर चौथी दस्तक।
**ठक।**
ईशान का चेहरा अचानक डर से भर गया।
“नहीं…”
मीरा ने पूछा,
“क्या हुआ?”
ईशान पीछे हट गया।
“चार दस्तकें…”
अर्जुन ने पूछा,
“इसका क्या मतलब है?”
ईशान ने काँपती आवाज़ में कहा—
“तीन दस्तकें दरवाज़े के लिए होती हैं।”
फिर उसने अर्जुन की तरफ देखा।
“चौथी…”
एक पल।
“अंदर वाले के लिए।”
फर्श पर बना दरवाज़ा अपने आप खुलने लगा।
नीचे से ठंडी हवा आई।
और उस अंधेरे के भीतर…
एक बच्चा बैठा था।
उसके हाथ में चाँदी की घंटी थी।
उसने धीरे-धीरे सिर उठाया।
चेहरा दिखाई दिया।
वह…
अर्जुन का चेहरा था।
लेकिन उसकी आँखें बंद थीं।
बच्चे ने आँखें खोलीं।
काली।
पूरी तरह काली।
और उसने कहा—
**“अब मुझे मेरा शरीर वापस चाहिए।”**
अर्जुन पीछे हट गया।
मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
ईशान ने पहली बार घबराकर चिल्लाया—
**“भागो!”**
लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
क्योंकि ऊपर की सारी घड़ियाँ एक साथ चल पड़ी थीं।
और हर घड़ी में एक ही समय था—
**3:14**
अर्जुन ने काँपते हुए घड़ी की तरफ देखा।
मीरा ने फुसफुसाकर कहा—
“3:13 के बाद…”
अर्जुन ने उसकी बात पूरी की—
“क्या होता है?”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
उसकी आँखों में डर था।
“जो 2008 में शुरू हुआ था…”
फिर नीचे अंधेरे से किसी ने अर्जुन का नाम पुकारा।
लेकिन इस बार आवाज़ किसी और की नहीं थी।
वह खुद अर्जुन की आवाज़ थी।
**“अब तुम्हारी बारी है… बाहर आने की।”**
और उसी क्षण…
अर्जुन की छाती पर बना **313** का निशान जलने लगा।
**जारी रहेगा…**
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