Pretika › Ghost Stories › “अंधेरे में कोई है”
एपिसोड 7: ईशान कौन था?
firoj saifi · Ghost Stories · 15 मिनट
- Writer
- firoj saifi
- Story
- “अंधेरे में कोई है”
- Chapter
- 7 of 7
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 15 min
- Words
- 2802
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
“अब मेरी बारी है।”
मीरा की आवाज़ कमरे में गूँज रही थी।
लेकिन वह आवाज़…
मीरा की नहीं थी।
अर्णव उसके सामने खड़ा था।
कुछ पल पहले तक जिस लड़की का हाथ वह पकड़कर खड़ा था, उसकी आँखें अब पूरी तरह काली थीं।
चेहरा वही था।
बाल वही।
आवाज़ भी वही।
लेकिन उसके चेहरे पर जो मुस्कान थी…
वह मीरा की नहीं थी।
अर्णव धीरे-धीरे पीछे हट गया।
“मीरा…”
उसने कोई जवाब नहीं दिया।
“तुम मुझे पहचानती हो?”
मीरा ने सिर थोड़ा टेढ़ा किया।
“बहुत अच्छे से।”
“तो मेरी तरफ देखो।”
मीरा ने उसकी आँखों में देखा।
“मैं तुम्हें देखकर ही तो यहाँ तक आई हूँ।”
अर्णव के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
राधा दीवार के पास खड़ी थी।
विक्रम कुछ दूर टूटे हुए आईने के सामने थे।
और बीच में…
वही तीसरा बच्चा।
ईशान।
लेकिन अब वह दिखाई नहीं दे रहा था।
सिर्फ उसकी आवाज़ कमरे में थी।
“अर्णव…”
अर्णव ने आँखें बंद कर लीं।
“तुमने गलत नाम लिया।”
“तो सही नाम क्या है?”
कोई जवाब नहीं।
फिर अचानक…
मीरा ने अर्णव का हाथ पकड़ लिया।
“चलो।”
अर्णव ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की।
“कहाँ?”
“यहाँ से।”
“क्यों?”
“क्योंकि अगर तुम रुके…”
मीरा की आँखों का काला रंग धीरे-धीरे फैलने लगा।
“…तो वो तुम्हारे अंदर से बाहर आ जाएगा।”
अर्णव जम गया।
“कौन?”
मीरा ने उसके सीने पर हाथ रखा।
“वही जिसे तुमने अपना नाम दिया था।”
अर्णव ने उसका हाथ झटक दिया।
“तुम मीरा नहीं हो।”
मीरा मुस्कुराई।
“बहुत देर से समझे।”
अचानक पीछे से आवाज़ आई—
“अर्णव!”
वह विक्रम की आवाज़ थी।
“उससे दूर हटो!”
अर्णव पलटा।
विक्रम उसके पीछे खड़े थे।
इस बार उनकी आँखें सामान्य थीं।
चेहरा थका हुआ था।
लेकिन उनकी गर्दन पर वही काले निशान थे।
“पापा?”
विक्रम ने कहा—
“मेरी तरफ मत देखना।”
“क्यों?”
“क्योंकि मैं भी पूरी तरह मैं नहीं हूँ।”
अर्णव का चेहरा उतर गया।
“तो फिर आप कौन हैं?”
विक्रम ने धीमे से कहा—
“2013 का बचा हुआ हिस्सा।”
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।
---
### 2013
अर्णव ने पहली बार उस साल को अपनी आँखों के सामने देखा।
कमरा बदल गया।
दीवारें नई थीं।
आईने कम थे।
बाहर तेज़ बारिश हो रही थी।
कैलेंडर पर तारीख थी—
**17 जुलाई 2013।**
विक्रम अकेले कमरे में खड़े थे।
उनके सामने वही बड़ा आईना था।
हाथ में लोहे की कील।
टेबल पर एक पुरानी डायरी।
और पास ही…
राधा की तस्वीर।
अर्णव ने धीरे से पूछा—
“ये क्या है?”
विक्रम ने उसकी तरफ देखा।
“मेरी आखिरी रात।”
“आप यहाँ अकेले थे?”
“नहीं।”
विक्रम ने कमरे के एक कोने की तरफ देखा।
वहाँ दस साल की मीरा खड़ी थी।
अर्णव की साँस रुक गई।
“मीरा?”
मीरा ने कुछ नहीं कहा।
वह सिर्फ विक्रम को देख रही थी।
विक्रम उसके सामने झुके।
“तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था।”
छोटी मीरा ने पूछा—
“आपने मेरी माँ को कहाँ रखा?”
विक्रम का चेहरा बदल गया।
“मैंने नहीं रखा।”
“झूठ।”
“मीरा…”
“माँ ने कहा था आप उन्हें वापस लाएँगे।”
विक्रम ने आँखें बंद कर लीं।
“मैंने कोशिश की।”
“फिर?”
“मैं असफल रहा।”
मीरा ने आईने की तरफ देखा।
“वो अंदर हैं?”
विक्रम ने जवाब नहीं दिया।
मीरा आईने के पास गई।
उसने काँच पर हाथ रखा।
अंदर राधा दिखाई दी।
लेकिन वह बूढ़ी नहीं थी।
वही उम्र।
वही चेहरा।
वही सफेद साड़ी।
वह दूसरी तरफ से काँच पीट रही थी।
“मीरा!”
छोटी मीरा चीख पड़ी—
“माँ!”
विक्रम ने उसे पीछे खींच लिया।
“उसे मत छुओ!”
“क्यों?”
“क्योंकि वो तुम्हारी माँ जैसी दिख रही है।”
मीरा ने पूछा—
“तो वो माँ नहीं हैं?”
विक्रम की आँखों में आँसू आ गए।
“मैं नहीं जानता।”
अचानक आईने के अंदर राधा मुस्कुराई।
उसने होंठ हिलाए।
विक्रम ने ध्यान से देखा।
वह कुछ कह रही थी।
“क्या बोल रही हैं?”
मीरा ने पूछा।
विक्रम ने धीरे से कहा—
“वो मेरा नाम ले रही है।”
“तो?”
विक्रम पीछे हट गए।
“वो मुझे अंदर बुला रही है।”
---
दृश्य बदल गया।
अब वही कमरा था।
लेकिन रात के **3:13** बज रहे थे।
विक्रम आईने के सामने खड़े थे।
उनके हाथ में डायरी थी।
उन्होंने पहला पन्ना खोला।
अर्णव ने पढ़ा—
**“ईशान को कभी नाम मत देना।”**
अर्णव चौंक गया।
“ईशान…”
विक्रम ने डायरी बंद कर दी।
“तुम्हें ये नाम नहीं सुनना चाहिए।”
“क्यों?”
“क्योंकि नाम सिर्फ पहचान नहीं होता।”
“फिर?”
“दरवाज़ा होता है।”
अर्णव ने पूछा—
“ईशान कौन था?”
विक्रम ने कोई जवाब नहीं दिया।
दृश्य आगे बढ़ा।
छोटी मीरा कमरे के बाहर खड़ी थी।
उसने अंदर झाँका।
विक्रम आईने से बात कर रहे थे।
“मैं उसे बाहर नहीं आने दूँगा।”
आईने से आवाज़ आई—
“तुम पहले ही उसे बाहर ला चुके हो।”
विक्रम पीछे हटे।
“मैंने नहीं।”
“तुमने उसका नाम लिया।”
“नहीं।”
“तुमने उसे बच्चे का नाम दिया।”
विक्रम ने डायरी जमीन पर फेंक दी।
“ईशान कोई बच्चा नहीं है।”
आईने में राधा की शक्ल दिखाई दी।
उसने कहा—
“तो फिर तुम किससे डरते हो?”
विक्रम चुप रहे।
अचानक आईने में राधा का चेहरा गायब हो गया।
उसकी जगह…
एक छोटे बच्चे का चेहरा आ गया।
काली आँखें।
पतला चेहरा।
और होंठों पर हल्की मुस्कान।
ईशान।
वह बोला—
“पापा।”
विक्रम जम गए।
“मुझे पापा मत कहना।”
बच्चा मुस्कुराया।
“आपने ही तो कहा था।”
“मैंने कभी नहीं।”
“जब मुझे बनाया था।”
विक्रम की साँस रुक गई।
“तुम्हें किसने बनाया?”
बच्चे ने कहा—
“आपने।”
अर्णव के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
“पापा ने?”
विक्रम ने उसकी तरफ देखा।
“नहीं।”
“तो?”
विक्रम ने कहा—
“यह दृश्य पूरा सच नहीं है।”
अर्णव ने पूछा—
“फिर क्या सच है?”
विक्रम ने उत्तर दिया—
“2013 में मैंने ईशान को पहली बार देखा था।”
“कहाँ?”
“आईने में।”
“और उसने कहा कि आपने उसे बनाया?”
“हाँ।”
“क्या वो झूठ था?”
“शायद।”
“और अगर नहीं?”
विक्रम ने उसकी आँखों में देखा।
“तब तुम्हें एक और सवाल पूछना होगा।”
“कौन-सा?”
“ईशान से पहले कौन था?”
---
अचानक दृश्य फिर बदल गया।
इस बार…
2008।
तीसरी मंज़िल।
अर्णव ने देखा—
वह खुद कमरे में खड़ा था।
तेरह साल का।
मीरा उसके साथ।
और सामने राधा।
लेकिन राधा अकेली नहीं थी।
उसकी गोद में एक नवजात बच्चा था।
अर्णव की आँखें फैल गईं।
“ये कौन है?”
विक्रम ने कहा—
“ईशान।”
“लेकिन…”
अर्णव ने बच्चे को ध्यान से देखा।
“ये तो बहुत छोटा है।”
“हाँ।”
“तो ये वही है?”
विक्रम ने सिर हिलाया।
“शायद।”
अर्णव ने उसकी तरफ देखा।
“शायद?”
“क्योंकि हमने उसका चेहरा कभी नहीं देखा था।”
“फिर?”
“उसका चेहरा आईने ने चुना।”
अर्णव चुप हो गया।
राधा बच्चे को लेकर आईने के सामने खड़ी थी।
“विक्रम…”
“हाँ?”
“ये बच्चा सामान्य नहीं है।”
“मुझे पता है।”
“इसके पैदा होते ही घड़ी 3:13 पर रुक गई थी।”
“मुझे पता है।”
“और इसकी परछाईं…”
राधा रुक गई।
“क्या?”
“इसकी परछाईं नहीं है।”
अर्णव ने बच्चे की तरफ देखा।
वास्तव में…
बच्चे के नीचे कोई परछाईं नहीं थी।
लेकिन आईने में…
एक परछाईं मौजूद थी।
वह परछाईं बच्चे की नहीं थी।
वह किसी बड़े आदमी की थी।
अर्णव ने धीरे से कहा—
“ये किसकी है?”
राधा ने आईने की तरफ देखा।
उसका चेहरा डर से भर गया।
“उसकी।”
विक्रम ने पूछा—
“किसकी?”
राधा ने कहा—
“जिसका नाम हम नहीं लेते।”
अचानक आईने में वह परछाईं हिली।
उसने बच्चे की तरफ हाथ बढ़ाया।
राधा पीछे हट गई।
“वो उसे लेने आ गई।”
विक्रम ने बच्चे को उठा लिया।
“तुम पीछे हटो।”
“नहीं!”
“राधा!”
“ये बच्चा उसके लिए नहीं है!”
अचानक आईने से एक हाथ बाहर आया।
विक्रम ने बच्चे को राधा की तरफ फेंक दिया।
राधा ने उसे पकड़ लिया।
विक्रम ने लोहे की कील से आईने पर वार किया।
काँच टूट गया।
लेकिन काँच के पीछे से…
एक आवाज़ आई।
“विक्रम…”
विक्रम रुक गए।
आवाज़ उनकी अपनी थी।
“तुम मुझे रोक नहीं सकते।”
विक्रम ने कहा—
“मैं तुम्हें खत्म कर दूँगा।”
आवाज़ हँसी।
“तुमने मुझे बनाया है।”
विक्रम चिल्लाए—
“झूठ!”
फिर आवाज़ आई—
“तो अपने बेटे से पूछ लेना।”
अर्णव ने देखा।
तेरह साल का वह खुद कमरे के दरवाज़े पर खड़ा था।
विक्रम ने उसे देखा।
उनका चेहरा डर से सफेद पड़ गया।
“अर्जुन…”
तेरह साल का अर्णव अंदर आया।
“पापा?”
विक्रम ने चिल्लाकर कहा—
“बाहर जाओ!”
लेकिन देर हो चुकी थी।
अर्णव ने आईने की तरफ देखा।
और उसकी परछाईं…
उससे अलग हो गई।
---
वर्तमान।
अर्णव ने आँखें खोल दीं।
वह जमीन पर बैठा था।
मीरा उसके सामने थी।
“अर्णव!”
उसने उसका चेहरा पकड़ लिया।
“तुम ठीक हो?”
अर्णव ने हाँफते हुए पूछा—
“ईशान…”
मीरा चुप रही।
“ईशान कौन है?”
मीरा ने नजरें झुका लीं।
“मुझे नहीं पता।”
“झूठ।”
“मुझे सच में नहीं पता।”
“तुम उसे पहचानती हो।”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
“मैंने उसे देखा है।”
“कब?”
“बहुत पहले।”
“कहाँ?”
मीरा ने धीरे से कहा—
“जब मैं आईने के अंदर थी।”
अर्णव का चेहरा बदल गया।
“तुमने उससे बात की थी?”
“हाँ।”
“उसने क्या कहा?”
मीरा की आँखों में डर उतर आया।
“उसने कहा था…”
वह रुक गई।
“क्या?”
“कि वो मेरा भाई है।”
अर्णव जम गया।
“तुम्हारा भाई?”
मीरा ने सिर हिलाया।
“माँ का दूसरा बच्चा।”
“लेकिन राधा का सिर्फ…”
“मुझे पता है।”
“फिर?”
मीरा ने कहा—
“ईशान जन्म से पहले ही गायब हो गया था।”
अर्णव चुप रहा।
“मुझे समझ नहीं आया।”
मीरा ने कहा—
“माँ ने कभी उसका नाम नहीं लिया।”
“फिर ईशान को अपना नाम कैसे पता?”
“क्योंकि…”
मीरा की आवाज़ धीमी हो गई।
“…उसने कहा था कि नाम उसे माँ ने नहीं दिया था।”
“फिर किसने?”
मीरा ने अर्णव की तरफ देखा।
“तुमने।”
अर्णव पीछे हट गया।
“मैंने?”
“हाँ।”
“कब?”
“17 जुलाई 2008।”
“लेकिन…”
“तुम्हें याद नहीं।”
“मुझे कुछ याद क्यों नहीं?”
मीरा ने कहा—
“क्योंकि उस रात तुमने सिर्फ मेरी यादें नहीं खोई थीं।”
अर्णव ने पूछा—
“और क्या?”
मीरा ने उसकी छाती की तरफ देखा।
“तुमने अपना पहला नाम खोया था।”
---
कमरे में अचानक एक घंटी बजी।
टन…
अर्णव ने चारों तरफ देखा।
चाँदी की घंटी मीरा के हाथ में नहीं थी।
फिर आवाज़ आई—
टन…
इस बार पीछे से।
दोनों पलटे।
दरवाज़े पर…
एक बच्चा खड़ा था।
ईशान।
लेकिन इस बार उसकी आँखें काली नहीं थीं।
वह बिल्कुल सामान्य बच्चा लग रहा था।
उसने कहा—
“भैया।”
अर्णव आगे बढ़ा।
“ईशान?”
बच्चे ने मुस्कुराकर सिर हिलाया।
“हाँ।”
मीरा पीछे हट गई।
“मत जाना।”
अर्णव ने उसकी तरफ देखा।
“वो बच्चा है।”
“नहीं।”
“तुमने खुद कहा था कि वो तुम्हारा भाई है।”
मीरा ने सिर हिलाया।
“लेकिन मैंने ये नहीं कहा कि वो इंसान है।”
ईशान ने मुस्कुराते हुए पूछा—
“दीदी, आपको अभी भी डर लगता है?”
मीरा काँप गई।
“तुम्हें मेरा नाम कैसे पता?”
“आपने ही तो बताया था।”
“कब?”
ईशान ने कहा—
“जब आपने मुझे आईने में छोड़ दिया था।”
मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया।
अर्णव ने उसकी तरफ देखा।
“तुमने उसे अंदर छोड़ा?”
मीरा ने सिर हिलाया।
“मुझे याद नहीं।”
ईशान हँसा।
“आपको बहुत कुछ याद नहीं।”
फिर उसने अर्णव की तरफ देखा।
“लेकिन भैया को सब याद आएगा।”
अर्णव ने पूछा—
“क्या?”
ईशान ने हाथ आगे बढ़ाया।
“मेरे साथ चलो।”
“कहाँ?”
“जहाँ तुम्हारा पहला नाम रखा गया था।”
“कहाँ?”
ईशान ने पीछे अंधेरे की तरफ इशारा किया।
“घर के नीचे।”
---
तीनों कमरे से बाहर निकले।
गलियारा बदल चुका था।
अब वहाँ सीढ़ियाँ थीं।
लेकिन नीचे जाने वाली।
बहुत लंबी।
बहुत संकरी।
दीवारों पर पुराने निशान बने थे।
कुछ जगहों पर खून जैसे लाल धब्बे।
कुछ जगहों पर नाम।
अर्णव ने एक नाम पढ़ा—
**राधा।**
दूसरा—
**विक्रम।**
तीसरा—
**शारदा।**
फिर…
एक नाम आधा मिटा हुआ था।
अर्णव ने हाथ से धूल हटाई।
नीचे लिखा था—
**अ…**
उसके बाद कुछ नहीं।
ईशान ने कहा—
“यहीं से शुरू हुआ था।”
अर्णव ने पूछा—
“क्या?”
“तुम्हारा नाम।”
वे नीचे उतरते रहे।
एक मंज़िल।
दो।
तीन।
फिर चार।
लेकिन शर्मा निवास में चार मंज़िलें थीं ही नहीं।
अर्णव रुक गया।
“हम कहाँ जा रहे हैं?”
ईशान ने कहा—
“जहाँ घर खत्म होता है।”
मीरा ने पूछा—
“और उसके बाद?”
ईशान मुस्कुराया।
“वहीं से असली घर शुरू होता है।”
---
आखिर वे एक विशाल भूमिगत कमरे में पहुँचे।
कमरे के बीचोंबीच पत्थर की गोल मेज थी।
उस पर…
एक पुरानी जन्म-पंजी रखी थी।
अर्णव आगे बढ़ा।
उसने पन्ना खोला।
पहला नाम—
**मीरा।**
जन्मतिथि।
फिर राधा का नाम।
फिर…
एक खाली जगह।
अर्णव ने पूछा—
“ये किसके लिए है?”
ईशान ने कहा—
“तुम्हारे लिए।”
अर्णव ने अगला पन्ना पलटा।
वहाँ लिखा था—
**“17 जुलाई 1995।”**
अर्णव की साँस रुक गई।
“ये मेरी जन्मतिथि है।”
नीचे समय लिखा था—
**3:13 AM**
उसके नीचे…
एक नाम।
लेकिन उस नाम पर काली स्याही पोत दी गई थी।
अर्णव ने उंगली से स्याही हटाने की कोशिश की।
अक्षर धीरे-धीरे दिखाई देने लगे।
पहला अक्षर—
**अ…**
फिर—
**र…**
फिर—
**ण…**
अर्णव की आँखें फैल गईं।
“अर्णव।”
मीरा ने कहा—
“हाँ।”
लेकिन ईशान हँसने लगा।
“नहीं।”
अर्णव ने उसकी तरफ देखा।
“क्या नहीं?”
ईशान ने जन्म-पंजी पर उंगली रखी।
“ये तुम्हारा नाम नहीं था।”
अर्णव ने पूछा—
“तो?”
ईशान ने काली स्याही पर हाथ रखा।
स्याही धीरे-धीरे हटने लगी।
नीचे एक और नाम था।
**“अर्णव”** के नीचे।
बहुत छोटा।
बहुत पुराना।
और पूरी तरह साफ़।
अर्णव ने उसे पढ़ा।
उसके होंठ काँपने लगे।
“ये…”
मीरा उसके पास आ गई।
“क्या लिखा है?”
अर्णव ने कोई जवाब नहीं दिया।
ईशान ने मुस्कुराकर कहा—
“पढ़ो, भैया।”
अर्णव ने काँपती आवाज़ में कहा—
**“अभय।”**
कमरे की सारी दीवारों से एक साथ फुसफुसाहट उठी।
“अभय…”
“अभय…”
“अभय…”
मीरा ने कान बंद कर लिए।
अर्णव पीछे हट गया।
“अभय कौन है?”
ईशान ने कहा—
“तुम।”
“नहीं।”
“तुम्हारा पहला नाम।”
“मुझे कभी नहीं बताया गया।”
“क्योंकि…”
ईशान मुस्कुराया।
“…अभय मर गया था।”
अर्णव की साँस रुक गई।
“कब?”
ईशान ने जवाब दिया—
“17 जुलाई 2008।”
अर्णव ने सिर हिलाया।
“मैं उस रात तेरह साल का था।”
ईशान ने कहा—
“अर्णव था।”
“तो?”
“अभय नहीं।”
अर्णव ने जन्म-पंजी फिर देखी।
1995।
3:13।
नाम—
अभय।
फिर नीचे लाल स्याही में एक वाक्य लिखा था।
**“पहला नाम मर चुका है। दूसरा नाम जीवित रहेगा।”**
अर्णव की आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा।
“किसने लिखा?”
ईशान ने धीरे से कहा—
“तुम्हारी दादी ने।”
मीरा ने कहा—
“लेकिन क्यों?”
ईशान ने उसकी तरफ देखा।
“क्योंकि उन्हें पता था कि असली बच्चा कौन है।”
अर्णव ने धीरे से पूछा—
“असली बच्चा?”
ईशान ने उसकी तरफ देखा।
“तुम।”
फिर उसने अपना चेहरा ऊपर उठाया।
उसकी आँखें अचानक काली हो गईं।
“और जो 2008 में आईने से बाहर आया था…”
वह मुस्कुराया।
“…वो तुम नहीं थे।”
अर्णव का दिल रुकने जैसा हुआ।
“तो कौन था?”
ईशान ने जवाब दिया—
“अर्णव।”
कमरे की सारी बत्तियाँ बुझ गईं।
अंधेरे में मीरा चीखी—
“भैया!”
अर्णव ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की।
लेकिन इस बार…
उसका हाथ किसी और ने पकड़ा।
ठंडा।
बहुत ठंडा।
अर्णव ने समझा वह मीरा है।
लेकिन जब उसने उस हाथ को देखा…
उसकी उंगलियाँ छोटी थीं।
एक बच्चे की।
अर्णव ने अंधेरे में पूछा—
“ईशान?”
बच्चे ने धीरे से कहा—
“नहीं।”
अर्णव की साँस रुक गई।
“तो कौन?”
उसके कान के पास वही पुरानी आवाज़ आई—
**“मैं अर्णव हूँ।”**
अचानक रोशनी लौटी।
अर्णव ने सामने देखा।
मीरा जमीन पर पड़ी थी।
ईशान गायब था।
और उसके सामने…
वही लड़का खड़ा था जिसे वह अब तक अपना प्रतिबिंब समझता आया था।
तेरह साल का।
भीगे बाल।
डरी हुई आँखें।
चेहरा बिल्कुल उसका।
वह मुस्कुराया।
“तुमने मुझे बहुत देर तक बाहर रखा।”
अर्णव पीछे हट गया।
“तुम…”
लड़के ने कहा—
“मैं वो हूँ जो 2008 में घर से बाहर गया था।”
“और मैं?”
लड़के ने सिर झुका लिया।
“तुम वो हो जो आईने के अंदर रह गया था।”
अर्णव के पैरों के नीचे की जमीन काँपने लगी।
लड़के ने हाथ आगे बढ़ाया।
“चलो।”
“कहाँ?”
“वापस।”
“कहाँ?”
लड़के की मुस्कान गायब हो गई।
उसने धीरे से कहा—
**“उस शरीर में… जो तुमने पंद्रह साल से पहना हुआ है।”**
अर्णव की आँखें फैल गईं।
उसके पीछे दीवार पर एक आईना दिखाई दिया।
उसमें अर्णव का प्रतिबिंब नहीं था।
सिर्फ एक खाली शरीर खड़ा था।
और उस शरीर के पीछे…
राधा।
विक्रम।
शारदा।
मीरा।
और ईशान।
सब एक साथ खड़े थे।
फिर आईने में एक-एक करके सभी ने सिर उठाया।
और एक साथ कहा—
**“अर्णव वापस आ गया।”**
अर्णव ने चीखकर आँखें बंद कर लीं।
जब उसने दोबारा आँखें खोलीं…
आईना गायब था।
मीरा भी गायब थी।
ईशान भी।
सिर्फ जमीन पर एक चाँदी की घंटी पड़ी थी।
और उसके नीचे एक कागज़।
अर्णव ने कागज़ उठाया।
उस पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—
**“17 जुलाई 2013 को विक्रम नहीं मरा था।”**
अर्णव की उंगलियाँ काँपने लगीं।
कागज़ के पीछे दूसरा वाक्य था—
**“उस रात मरने वाला कोई और था।”**
अचानक उसके पीछे से कदमों की आवाज़ आई।
एक।
दो।
तीन।
अर्णव ने धीरे-धीरे पलटना शुरू किया।
पीछे कोई खड़ा था।
उसकी आवाज़ आई—
“अब तुम्हें आखिरी नाम याद करना होगा।”
अर्णव ने पलटकर देखा।
सामने…
शारदा देवी खड़ी थीं।
लेकिन वह मर चुकी थीं।
और उनके हाथ में…
वही पुरानी डायरी थी।
उन्होंने डायरी खोली।
पहले पन्ने पर लिखा था—
**“अर्णव की कहानी झूठ से शुरू नहीं हुई थी।”**
शारदा ने ऊपर देखा।
उनकी आँखें काली थीं।
“वो शुरू हुई थी…”
उन्होंने कहा—
“…एक बच्चे की मौत से।”
फिर उन्होंने डायरी बंद कर दी।
और पीछे का अंधेरा अचानक जीवित हो उठा।
**ठक।**
एक दस्तक।
**ठक।**
दूसरी दस्तक।
**ठक।**
तीसरी दस्तक।
शारदा मुस्कुराईं।
“अब दरवाज़ा खोलो, अर्णव।”
अर्णव ने पूछा—
“कौन है?”
शारदा ने धीरे से कहा—
**“तुम्हारा असली चेहरा।”**
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