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एपिसोड 6: आईने के पीछे का नाम

firoj saifi · Ghost Stories · 19 मिनट

Writer
firoj saifi
Story
“अंधेरे में कोई है”
Chapter
6 of 7
Category
Ghost Stories
Reading time
19 min
Words
3784
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

अर्णव और मीरा भाग रहे थे।

पीछे से आती आवाज़ें लगातार उनका पीछा कर रही थीं।

कभी राधा की।

कभी विक्रम की।

कभी उस बच्चे की।

और कभी…

अर्णव की अपनी।

“रुको…”

पीछे से आवाज़ आई।

“अर्णव…”

अर्णव ने पलटकर नहीं देखा।

मीरा उसका हाथ पकड़े हुए थी।

दोनों तीसरी मंज़िल के लंबे गलियारे से नीचे उतरने की कोशिश कर रहे थे।

लेकिन गलियारा खत्म ही नहीं हो रहा था।

सीढ़ियाँ सामने थीं।

फिर वही सीढ़ियाँ।

फिर वही दीवार।

फिर वही बंद खिड़की।

और हर बार…

घड़ी 3:13 दिखा रही थी।

अर्णव हाँफते हुए रुक गया।

“हम नीचे क्यों नहीं जा पा रहे?”

मीरा ने पीछे देखा।

“क्योंकि हम घर में नहीं हैं।”

अर्णव ने उसकी तरफ देखा।

“क्या?”

“हम अभी भी उसी जगह में हैं।”

“कौन-सी जगह?”

मीरा ने धीरे से कहा—

“आईने के पीछे।”

अर्णव कुछ पल उसे देखता रहा।

“लेकिन हमने तो आईने तोड़ दिए।”

“आईने टूटे हैं।”

मीरा ने दीवार की तरफ देखा।

“रास्ता नहीं।”

अचानक ऊपर से कुछ गिरने की आवाज़ आई।

धड़ाम!

दोनों चौंक गए।

अर्णव ने सिर उठाया।

तीसरी मंज़िल की छत पर…

एक दरवाज़ा दिखाई दे रहा था।

वह दरवाज़ा पहले वहाँ नहीं था।

काला।

पुराना।

और उसके ऊपर सफेद रंग से सिर्फ एक शब्द लिखा था—

**“नाम”**

अर्णव धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ा।

मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि जिस चीज़ ने अपना नाम खो दिया हो…”

उसने दरवाज़े को देखा।

“…वो अपना नाम उसी कमरे में ढूँढती है।”

अर्णव ने पूछा—

“और अगर नाम मिल गया?”

मीरा ने उसकी आँखों में देखा।

“तो उसे चेहरा मिल जाता है।”

अर्णव के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

उसे पिछली बात याद आई।

विक्रम की आवाज़—

**“अब मुझे अपना नाम देना होगा।”**

अर्णव ने दरवाज़े को देखा।

“किसे?”

मीरा ने धीरे से कहा—

“शायद हमें पता चलने वाला है।”

---

दरवाज़ा अपने आप खुल गया।

अंदर पूरी तरह अंधेरा था।

लेकिन उस अंधेरे के बीच एक हल्की नीली रोशनी दिखाई दे रही थी।

अर्णव ने पहला कदम अंदर रखा।

कमरा बहुत बड़ा था।

इतना बड़ा कि शर्मा निवास की तीसरी मंज़िल से उसका कोई संबंध ही नहीं लगता था।

चारों तरफ आईने लगे थे।

सैकड़ों।

शायद हजारों।

कुछ दीवारों पर।

कुछ जमीन पर।

कुछ छत से लटके हुए।

और कुछ…

हवा में तैर रहे थे।

हर आईने में कोई न कोई चेहरा था।

अर्णव ने एक आईने में देखा।

उसमें वह पाँच साल का था।

दूसरे में दस साल का।

तीसरे में तेरह साल का।

चौथे में अट्ठाईस साल का।

लेकिन पाँचवें आईने में…

वह बूढ़ा था।

बहुत बूढ़ा।

उसकी आँखें धँसी हुई थीं।

बाल सफेद थे।

और उसके पीछे…

मीरा खड़ी थी।

अर्णव ने तुरंत पीछे देखा।

मीरा उसके साथ ही थी।

“उस आईने में तुम बूढ़े हो।”

मीरा ने कहा—

“आईना भविष्य नहीं दिखाता।”

“तो?”

“संभावना दिखाता है।”

अर्णव ने पूछा—

“किसकी?”

मीरा ने धीरे से कहा—

“जिस रास्ते पर हम चल रहे हैं।”

अर्णव ने उस आईने को फिर देखा।

बूढ़ा अर्णव धीरे-धीरे मुस्कुराया।

फिर उसने अपना हाथ उठाया।

और काँच पर लिखा—

**“तुम बहुत देर से आए।”**

अर्णव पीछे हट गया।

“ये जगह क्या है?”

मीरा ने चारों तरफ देखा।

“माँ ने एक बार कहा था…”

“क्या?”

“आईने घर में नहीं होते।”

अर्णव ने उसकी तरफ देखा।

“मतलब?”

“कुछ आईने घर को अपने अंदर रखते हैं।”

अचानक सामने का एक आईना काँपने लगा।

उसमें राधा दिखाई दी।

वह अकेली थी।

चेहरा थका हुआ।

बाल बिखरे हुए।

और हाथ में वही चाँदी की घंटी।

“माँ!”

मीरा उसकी तरफ दौड़ी।

लेकिन अर्णव ने उसे पकड़ लिया।

“रुको।”

“वो मेरी माँ है!”

“हो सकती है।”

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

“और अगर नहीं?”

राधा ने आईने के अंदर से उनकी तरफ देखा।

“मीरा…”

मीरा की आँखों में आँसू आ गए।

“माँ!”

राधा ने हाथ काँच पर रख दिया।

“मेरी बात ध्यान से सुनो।”

मीरा आगे बढ़ी।

“माँ, आप कहाँ हैं?”

“उस जगह…”

राधा ने पीछे देखा।

“…जहाँ पहली बार उसका नाम लिया गया था।”

अर्णव ने पूछा—

“किसका?”

राधा ने उसकी तरफ देखा।

कुछ पल वह चुप रही।

फिर बोली—

“जिसका नाम तुम्हारे पिता ने कभी तुम्हें नहीं बताया।”

अर्णव का दिल तेज़ धड़कने लगा।

“मेरा?”

राधा ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

“फिर किसका?”

राधा ने कहा—

“उसका।”

अचानक आईने के पीछे कोई काली आकृति गुजरी।

राधा घबरा गई।

“मुझे जाना होगा।”

मीरा चिल्लाई—

“माँ!”

राधा ने आखिरी बार उसकी तरफ देखा।

“मीरा…”

“हाँ?”

“अगर अर्णव को अपना असली नाम मिल गया है…”

वह रुकी।

“…तो अब उसे उसका नाम कभी मत लेने देना।”

अर्णव ने पूछा—

“किसका नाम?”

राधा ने जवाब नहीं दिया।

आईना काला हो गया।

मीरा ने काँच पर हाथ मारा।

“माँ!”

कोई जवाब नहीं।

अर्णव ने उसका कंधा पकड़ा।

“हमें उसे ढूँढना होगा।”

मीरा ने आँसू पोंछे।

“हाँ।”

फिर उसने उसकी तरफ देखा।

“लेकिन पहले हमें पता करना होगा कि माँ किसकी बात कर रही थी।”

---

कमरे के बीचोंबीच एक लंबी मेज थी।

उस पर पुरानी किताबें रखी थीं।

कुछ जली हुई।

कुछ पर धूल की मोटी परत।

और बीच में…

एक काली डायरी।

अर्णव धीरे-धीरे उसके पास गया।

डायरी के ऊपर वही निशान बना था—

**313**

उसने डायरी उठाई।

पहला पन्ना खाली था।

दूसरा भी।

तीसरा भी।

फिर चौथे पन्ने पर अचानक अक्षर उभरने लगे।

जैसे किसी अदृश्य हाथ ने गीली स्याही से लिखा हो।

**“17 जुलाई 2008।”**

अर्णव की उंगलियाँ ठंडी पड़ गईं।

उसने पन्ना पलटा।

लिखा था—

**“आज तीसरी बार बच्चा आईने के सामने गया।”**

अर्णव ने पढ़ना जारी रखा।

**“पहली बार उसने अपनी परछाईं देखी।”**

अगला पन्ना।

**“दूसरी बार उसकी परछाईं ने उसे देखा।”**

अगला।

**“तीसरी बार दोनों ने एक-दूसरे को नाम दिया।”**

अर्णव रुक गया।

“नाम दिया…”

मीरा ने पूछा—

“किसने किसे?”

अर्णव ने सिर हिलाया।

“पता नहीं।”

अगले पन्ने पर एक चित्र बना था।

दो बच्चे।

एक के नीचे लिखा था—

**“बाहर।”**

दूसरे के नीचे—

**“अंदर।”**

मीरा ने चित्र को देखा।

“ये दो बच्चे कौन हैं?”

अर्णव ने धीरे से कहा—

“शायद मैं और…”

वह रुक गया।

“मीरा?”

“नहीं।”

अर्णव ने चित्र के नीचे देखा।

वहाँ एक और शब्द लिखा था।

बहुत छोटा।

लगभग मिटा हुआ।

उसने उंगली से धूल हटाई।

**“प्रतिबिंब।”**

मीरा की साँस अटक गई।

“एक बच्चा असली था।”

“और दूसरा?”

“प्रतिबिंब।”

अर्णव ने डायरी बंद कर दी।

तभी पीछे से आवाज़ आई—

“तुम हमेशा गलत बच्चे को असली समझते रहे।”

दोनों पलटे।

वहाँ…

विक्रम खड़े थे।

अर्णव की आँखें फैल गईं।

“पापा!”

विक्रम ने हाथ उठाया।

“पास मत आना।”

“आप ठीक हैं?”

“नहीं।”

अर्णव ने उन्हें ध्यान से देखा।

इस बार विक्रम के शरीर पर खून के निशान थे।

गर्दन पर काली रेखाएँ।

और उनकी दाईं आँख…

पूरी तरह काली।

मीरा पीछे हट गई।

“आप असली हैं?”

विक्रम ने उसकी तरफ देखा।

“मुझे नहीं पता।”

अर्णव चुप हो गया।

विक्रम ने कहा—

“यही इस जगह की सबसे बड़ी समस्या है।”

“क्या?”

“यहाँ कोई खुद को पहचान नहीं सकता।”

अर्णव ने पूछा—

“आपको किसने अंदर खींचा?”

विक्रम ने जवाब दिया—

“तुमने।”

अर्णव का चेहरा बदल गया।

“मैंने?”

“जब तुमने अपना असली नाम लिया…”

विक्रम ने कहा—

“…दरवाज़ा खुल गया।”

“और आप?”

“मैं उसके पीछे था।”

“किसके पीछे?”

विक्रम ने कमरे के सबसे बड़े आईने की तरफ देखा।

“उसके।”

अर्णव ने भी देखा।

बड़ा आईना बाकी सभी आईनों से अलग था।

उस पर कोई धूल नहीं थी।

काँच बिल्कुल साफ था।

लेकिन उसमें किसी का प्रतिबिंब नहीं था।

सिर्फ एक खाली कमरा।

विक्रम धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़े।

“यही पहला आईना था।”

मीरा ने पूछा—

“कब?”

“2008 से बहुत पहले।”

“किसने बनाया?”

विक्रम चुप रहे।

अर्णव ने पूछा—

“दादी?”

“नहीं।”

“तो?”

विक्रम ने धीरे से कहा—

“हमारे परिवार ने इसे नहीं बनाया था।”

कमरे में ठंडी हवा चली।

“फिर ये यहाँ आया कैसे?”

विक्रम ने कहा—

“किसी ने इसे घर में रखा था।”

“किसने?”

विक्रम ने उसकी तरफ देखा।

“राधा के पिता ने।”

मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया।

“मेरे नाना?”

विक्रम ने सिर हिलाया।

“उन्होंने इस आईने को देवगढ़ लाया था।”

“क्यों?”

“क्योंकि उन्हें लगता था कि इसमें मृत लोगों से बात की जा सकती है।”

अर्णव ने पूछा—

“क्या सच में?”

विक्रम ने कहा—

“पहले कुछ दिनों तक।”

“फिर?”

“मृत लोग जवाब देना बंद कर देते थे।”

“और कौन जवाब देने लगा?”

विक्रम ने आईने की तरफ देखा।

“वो।”

---

आईने में अचानक एक बूढ़े आदमी का चेहरा उभरा।

सफेद दाढ़ी।

धँसी हुई आँखें।

और माथे पर राख का निशान।

मीरा पीछे हट गई।

“ये मेरे नाना हैं।”

बूढ़े आदमी ने सीधे आईने से बाहर देखा।

“राधा…”

उसकी आवाज़ गूँजी।

“राधा…”

फिर उसने अचानक कहा—

“मीरा।”

मीरा काँप गई।

“नाना?”

अर्णव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

बूढ़ा मुस्कुराया।

“तुम दोनों अभी भी उसे ढूँढ रहे हो।”

अर्णव ने पूछा—

“किसे?”

“जिसे तुमने खोया।”

“राधा?”

“नहीं।”

मीरा ने कहा—

“तो कौन?”

बूढ़े आदमी ने अर्णव की तरफ देखा।

“तुम्हारा पहला नाम।”

अर्णव का चेहरा बदल गया।

“अर्णव?”

बूढ़े आदमी ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

अर्णव ने कुछ नहीं कहा।

बूढ़े आदमी की मुस्कान गहरी हो गई।

“तुम्हें जो नाम मिला…”

उसने कहा—

“…वो सिर्फ एक परदा था।”

“परदे के पीछे क्या है?”

“नाम।”

“कौन-सा नाम?”

बूढ़े आदमी ने अपना हाथ आईने के अंदर उठाया।

“वही जिसे सुनकर परछाईं जागती है।”

अचानक उसकी गर्दन टेढ़ी हो गई।

आँखें काली हो गईं।

और उसके मुँह से दूसरी आवाज़ निकली—

“उसे मत बताना।”

विक्रम ने तुरंत चिल्लाया—

“आईने से दूर हटो!”

लेकिन देर हो चुकी थी।

आईने से एक हाथ बाहर निकला।

लंबी उंगलियाँ।

काले नाखून।

उसने मीरा की कलाई पकड़ ली।

मीरा चीख उठी।

“अर्णव!”

अर्णव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“मीरा!”

विक्रम ने लोहे की कील उठाई।

लेकिन इस बार कील हवा में ही रुक गई।

जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने उसे रोक लिया हो।

विक्रम ने पूरी ताकत लगाई।

“उसे छोड़!”

काली उंगलियाँ मीरा को धीरे-धीरे आईने की तरफ खींचने लगीं।

अर्णव ने उसकी कमर पकड़ ली।

“छोड़ना मत!”

मीरा रो रही थी।

“भैया!”

अर्णव ने दाँत भींचे।

“मैं नहीं छोड़ूँगा।”

आईने के अंदर से आवाज़ आई—

“यही तो तुमने पिछली बार कहा था।”

अर्णव का चेहरा जम गया।

उसने मीरा की तरफ देखा।

मीरा की आँखें बंद थीं।

“भैया…”

वही आवाज़।

वही डर।

वही रात।

2008।

अर्णव के सामने वही दृश्य लौट आया।

तेरह साल का वह।

मीरा उसका हाथ पकड़े हुए।

आईने के सामने।

और पीछे…

परछाईं।

“मुझे मत छोड़ना।”

मीरा रो रही थी।

लेकिन इस बार अर्णव ने देखा—

उस समय मीरा की आँखों में आँसू नहीं थे।

उसके चेहरे पर डर नहीं था।

उसकी परछाईं…

पहले से ही आईने के अंदर थी।

अर्णव की आँखें फैल गईं।

“रुको…”

वर्तमान में वापस आकर उसने मीरा का चेहरा देखा।

“तुम्हारी आँखें…”

मीरा ने पूछा—

“क्या?”

“उस रात…”

अर्णव ने धीरे से कहा—

“तुम डर नहीं रही थीं।”

मीरा चुप हो गई।

“तुम्हें पता था क्या होने वाला है।”

“अर्णव…”

“तुम मुझे आईने तक लेकर गई थीं।”

मीरा की आँखें भर आईं।

“मुझे याद नहीं।”

“लेकिन मुझे याद है।”

अर्णव ने उसकी कलाई और कसकर पकड़ ली।

“तुमने मुझे वहाँ पहुँचाया था।”

मीरा ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

“तुमने कहा था—”

अर्णव रुक गया।

उसे अचानक एक आवाज़ याद आई।

तेरह साल की मीरा की आवाज़—

**“अगर तुम अंदर जाओगे, तो मैं तुम्हारे साथ जाऊँगी।”**

अर्णव की साँस रुक गई।

“तुमने मुझे बचाने के लिए नहीं बुलाया था…”

उसने कहा।

“तुम मुझे किसी चीज़ से मिलवाने ले गई थीं।”

मीरा चुप रही।

अर्णव की आँखों में डर भर गया।

“किससे?”

मीरा ने धीरे से कहा—

“मुझे नहीं पता।”

“झूठ।”

“सच में नहीं पता।”

“फिर तुम्हारी परछाईं कहाँ है?”

मीरा की आँखें नीचे झुक गईं।

कुछ सेकंड तक कोई कुछ नहीं बोला।

फिर उसने धीरे से कहा—

“क्योंकि शायद…”

उसकी आवाज़ टूट गई।

“…मेरी परछाईं कभी मेरी थी ही नहीं।”

---

कमरे में अचानक सारी रोशनियाँ बुझ गईं।

आईने में सिर्फ एक चेहरा दिखाई दे रहा था।

मीरा का।

लेकिन वह मुस्कुरा रहा था।

“मीरा?”

अर्णव ने पुकारा।

उसके पास खड़ी मीरा ने जवाब नहीं दिया।

अर्णव ने उसकी तरफ देखा।

“मीरा?”

वह धीरे-धीरे उसकी ओर मुड़ी।

“हाँ?”

अर्णव पीछे हट गया।

“तुम…”

“क्या हुआ?”

“तुम्हारी आवाज़…”

मीरा ने सिर झुका लिया।

“क्या मेरी आवाज़ बदल गई?”

अर्णव ने ध्यान से सुना।

वह बिल्कुल सामान्य लग रही थी।

फिर आईने के अंदर वही मीरा बोली—

“अर्णव…”

बाहर वाली मीरा ने भी उसी समय कहा—

“अर्णव…”

दोनों की आवाज़ एक जैसी थी।

अर्णव की साँस अटक गई।

वह धीरे-धीरे दोनों के बीच देखने लगा।

आईने में मीरा।

उसके सामने मीरा।

दोनों एक-दूसरे की नकल कर रही थीं।

आईने वाली ने हाथ उठाया।

बाहर वाली ने भी।

आईने वाली ने सिर झुकाया।

बाहर वाली ने भी।

फिर आईने वाली मुस्कुराई।

बाहर वाली नहीं मुस्कुराई।

अर्णव ने राहत की साँस ली।

“तुम असली हो।”

मीरा ने पूछा—

“कैसे पता?”

अर्णव ने कहा—

“क्योंकि वो मुस्कुराई।”

आईने वाली मीरा की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।

उसका चेहरा काला पड़ने लगा।

आँखें फैल गईं।

फिर उसने अपना मुँह खोला।

लेकिन आवाज़ मीरा की नहीं थी।

वह राधा की आवाज़ थी।

“अर्णव…”

फिर विक्रम की।

“बेटा…”

फिर शारदा की।

“अर्जुन…”

और अंत में…

एक बच्चे की आवाज़।

“भैया।”

अर्णव का दिल काँप गया।

“तुम कौन हो?”

आईने वाली आकृति ने उत्तर दिया—

“जिसे तुमने सबसे पहले नाम दिया था।”

अर्णव ने पूछा—

“मीरा?”

“नहीं।”

“फिर?”

आकृति ने कहा—

“तुम्हारा डर।”

अर्णव ने सिर हिलाया।

“मेरा डर तुम्हारा नाम नहीं है।”

“तो फिर मुझे नाम दो।”

अर्णव चुप रहा।

आकृति हँसी।

“यही तो समस्या है।”

“क्या?”

“तुम नाम देने से डरते हो।”

“क्यों?”

“क्योंकि इस घर में…”

उसने कहा—

“…जिसे नाम मिलता है, उसे अस्तित्व मिल जाता है।”

अर्णव ने विक्रम की तरफ देखा।

“पापा…”

लेकिन वहाँ कोई नहीं था।

विक्रम गायब हो चुके थे।

“पापा?”

कोई जवाब नहीं।

मीरा ने चारों तरफ देखा।

“वो कहाँ गए?”

अर्णव ने देखा।

जहाँ विक्रम खड़े थे, वहाँ जमीन पर सिर्फ लोहे की कील पड़ी थी।

उस पर खून लगा था।

और उसके नीचे…

एक कागज़।

अर्णव ने कागज़ उठाया।

उस पर विक्रम की लिखावट थी।

सिर्फ एक वाक्य।

**“अगर मैं गायब हो जाऊँ, तो समझना कि उसने मेरा नाम सीख लिया है।”**

अर्णव ने कागज़ को मुट्ठी में दबा लिया।

“वो उसे ले गई।”

मीरा ने पूछा—

“कौन?”

अर्णव ने आईने की तरफ देखा।

“परछाईं।”

---

तभी कमरे के दूर वाले हिस्से में एक छोटा दरवाज़ा दिखाई दिया।

उसके ऊपर लिखा था—

**“2013”**

अर्णव उसकी तरफ बढ़ा।

मीरा ने पूछा—

“तुम कहाँ जा रहे हो?”

“पापा की मौत का सच देखने।”

“अगर वो हमें वहाँ भी फँसा दे?”

अर्णव ने कहा—

“तो कम से कम हमें पता होगा कि उसने उन्हें कैसे लिया।”

दरवाज़ा खुला।

अंदर एक छोटा कमरा था।

दीवारें जली हुई थीं।

फर्श पर काँच के टुकड़े।

बीच में टूटा हुआ आईना।

और उसके सामने…

विक्रम।

वह घुटनों के बल बैठे थे।

अर्णव ने पुकारा—

“पापा!”

विक्रम ने सिर उठाया।

उनका चेहरा डर से भरा था।

“अर्णव…”

“आप ठीक हैं?”

“भागो।”

“क्यों?”

विक्रम ने पीछे देखा।

“वो अभी आएगी।”

“कौन?”

विक्रम की आँखों में आँसू आ गए।

“तुम्हारी माँ।”

अर्णव रुक गया।

“राधा?”

विक्रम ने सिर हिलाया।

“वो राधा जैसी दिखती है।”

मीरा ने धीरे से पूछा—

“लेकिन वो राधा नहीं है?”

विक्रम ने उसकी तरफ देखा।

“मुझे अब यकीन नहीं।”

अचानक कमरे के बाहर पायल की आवाज़ सुनाई दी।

छन…

छन…

छन…

मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया।

“माँ…”

अर्णव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“रुको।”

दरवाज़े के बाहर एक स्त्री की परछाईं दिखाई दी।

सफेद साड़ी।

भीगे बाल।

झुका हुआ सिर।

वही आकृति जो अर्णव ने 2008 की याद में देखी थी।

राधा।

उसने धीरे से दरवाज़ा खोला।

“अर्णव…”

अर्णव ने उसकी तरफ देखा।

“माँ?”

वह मुस्कुराई।

“हाँ।”

मीरा रोते हुए आगे बढ़ी।

“माँ!”

राधा ने उसकी तरफ देखा।

लेकिन उसकी आँखें…

पूरी तरह काली थीं।

विक्रम चीख पड़े—

“पीछे हटो!”

राधा ने गर्दन धीरे-धीरे घुमाई।

“विक्रम…”

विक्रम काँप गए।

“तुम उसका नाम मत लेना।”

राधा मुस्कुराई।

“क्यों?”

विक्रम ने कहा—

“क्योंकि अब तुम्हें उसका नाम याद नहीं है।”

राधा की मुस्कान गायब हो गई।

“मुझे सब याद है।”

“नहीं।”

“मुझे 17 जुलाई याद है।”

“नहीं।”

“मुझे याद है कि तुमने बच्चे को किसके हाथ में दिया था।”

विक्रम चुप हो गए।

अर्णव ने पूछा—

“किसके?”

राधा ने उसकी तरफ देखा।

“उसके।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

अर्णव ने पूछा—

“किसके हाथ में?”

राधा धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ी।

“तुम्हें सच में कुछ याद नहीं?”

अर्णव पीछे हट गया।

“क्या?”

राधा ने कहा—

“उस रात मैंने तुम्हें नहीं बचाया था।”

“तो किसने?”

राधा की आँखों में आँसू आ गए।

“जिसे तुम आज तक परछाईं समझते रहे।”

अर्णव का चेहरा जम गया।

“क्या?”

राधा ने फुसफुसाकर कहा—

“परछाईं ने तुम्हें बचाया था।”

मीरा ने सिर हिलाया।

“नहीं…”

राधा ने उसकी तरफ देखा।

“और तुम्हें…”

वह रुकी।

“…उसने नहीं बचाया।”

मीरा की आँखें फैल गईं।

“फिर?”

राधा ने कहा—

“तुम्हें मैंने आईने में बंद किया था।”

मीरा पीछे हट गई।

“माँ…”

“मुझे मजबूर होना पड़ा।”

“क्यों?”

राधा ने उसकी तरफ देखा।

“क्योंकि उस रात दो बच्चे थे।”

अर्णव ने धीरे से पूछा—

“दो?”

राधा ने सिर हिलाया।

“एक तुम।”

फिर उसने मीरा की तरफ देखा।

“और दूसरा…”

वह अचानक चुप हो गई।

कमरे की दीवार पर लगा टूटा आईना चमक उठा।

उसमें एक तीसरा बच्चा दिखाई दिया।

लगभग दस साल का।

उसका चेहरा न अर्णव जैसा था।

न मीरा जैसा।

लेकिन उसकी आँखें…

पूरी तरह काली थीं।

अर्णव ने फुसफुसाकर पूछा—

“ये कौन है?”

राधा ने उत्तर दिया—

“वही…”

उसकी आवाज़ काँप रही थी।

“…जिसका नाम किसी ने कभी नहीं लिया।”

आईने में बच्चा मुस्कुराया।

फिर उसने अपनी उंगली होंठों पर रखी।

**श्श्श…**

और अचानक कमरे की सारी घड़ियाँ 3:13 पर रुक गईं।

अर्णव ने मीरा का हाथ पकड़ लिया।

“अब क्या?”

राधा ने डरकर पीछे देखा।

“अब…”

कमरे के बाहर से किसी ने धीरे-धीरे दस्तक दी।

ठक।

सब चुप।

ठक।

राधा का चेहरा सफेद पड़ गया।

ठक।

विक्रम ने फुसफुसाकर कहा—

“वो आ गई।”

अर्णव ने पूछा—

“कौन?”

दरवाज़े के बाहर से एक आवाज़ आई।

बहुत धीमी।

बहुत मासूम।

एक बच्चे की आवाज़।

“माँ…”

राधा काँपने लगी।

आवाज़ फिर आई—

“माँ, दरवाज़ा खोलो।”

राधा की आँखों से आँसू बहने लगे।

मीरा ने पूछा—

“माँ, ये कौन है?”

राधा ने कोई जवाब नहीं दिया।

बाहर से तीसरी बार आवाज़ आई—

“माँ…”

फिर एक और आवाज़।

इस बार…

अर्णव की।

“माँ, मैं हूँ।”

राधा ने दोनों कान बंद कर लिए।

“नहीं…”

अर्णव ने दरवाज़े की तरफ देखा।

बाहर से उसकी ही आवाज़ फिर आई—

“माँ…”

फिर अचानक वह आवाज़ बदल गई।

विक्रम की आवाज़।

“राधा, दरवाज़ा खोलो।”

फिर शारदा की।

“राधा, देर हो रही है।”

फिर मीरा की।

“माँ, मुझे अंदर आने दो।”

मीरा का चेहरा डर से जम गया।

“लेकिन मैं तो यहीं हूँ।”

अर्णव ने धीरे से कहा—

“तो बाहर कौन है?”

दरवाज़े के नीचे से काली उंगलियाँ दिखाई दीं।

एक।

दो।

तीन।

फिर एक छोटी-सी उंगली ने जमीन पर कुछ लिखना शुरू किया।

अर्णव नीचे झुका।

अक्षर धीरे-धीरे साफ़ हुए।

**“नाम दो।”**

फिर उसके नीचे दूसरा वाक्य लिखा गया—

**“एक नाम के बदले एक चेहरा।”**

अर्णव ने पीछे देखा।

कमरे में मौजूद चार लोग—

अर्णव।

मीरा।

विक्रम।

राधा।

और टूटे आईने में…

वह तीसरा बच्चा।

लेकिन अब आईने में बच्चा अकेला नहीं था।

उसके पीछे एक और आकृति खड़ी थी।

लंबी।

काली।

और उसके हाथ में…

चाँदी की घंटी।

वह धीरे-धीरे घंटी उठाने लगी।

अर्णव चीख पड़ा—

“मीरा!”

मीरा ने उसे देखा।

“क्या?”

“घंटी!”

मीरा ने नीचे देखा।

उसके हाथ में चाँदी की घंटी थी।

लेकिन उसे याद नहीं था कि वह उसे कब उठाकर लाई।

घंटी अपने आप हिलने लगी।

टन…

राधा ने चीखकर कहा—

“उसे मत बजाना!”

मीरा ने हाथ रोक लिया।

“क्यों?”

राधा ने कहा—

“क्योंकि घंटी आईने को नहीं तोड़ती।”

“फिर?”

राधा ने काँपते हुए कहा—

“वो उसके अंदर बंद चीज़ को जगा देती है।”

टन…

घंटी अपने आप फिर बज उठी।

टूटे आईने में तीसरे बच्चे ने आँखें खोल दीं।

उसकी काली आँखों में अब कोई चेहरा नहीं था।

सिर्फ अंधेरा।

वह धीरे-धीरे काँच से बाहर आने लगा।

पहले उसकी उंगलियाँ।

फिर हाथ।

फिर चेहरा।

फिर पूरा शरीर।

वह जमीन पर उतरा।

बहुत शांत।

बहुत सामान्य।

जैसे कोई बच्चा अभी-अभी नींद से उठकर कमरे में आया हो।

उसने अर्णव की तरफ देखा।

“तुम्हें मेरा नाम याद है?”

अर्णव ने कुछ नहीं कहा।

बच्चे ने मुस्कुराकर पूछा—

“नहीं?”

अर्णव की आँखों के सामने अचानक एक पुरानी याद चमकी।

2008।

बारिश।

तीसरी मंज़िल।

राधा रो रही थी।

विक्रम एक बच्चे को गोद में लिए हुए था।

मीरा दरवाज़े के पास खड़ी थी।

और एक तीसरा बच्चा…

अंधेरे में बैठा था।

अर्णव उसके पास गया था।

उस बच्चे ने उससे पूछा था—

**“तुम्हारा नाम क्या है?”**

तेरह साल के अर्णव ने अपना नाम बताया था।

फिर बच्चे ने अपना नाम बताया था।

अर्णव ने वह नाम सुनते ही डरकर पीछे कदम बढ़ाया था।

और उसी क्षण…

विक्रम ने उसे पकड़कर कमरे से बाहर खींच लिया था।

याद अचानक टूट गई।

अर्णव घुटनों के बल गिर पड़ा।

उसके होंठ काँप रहे थे।

“मुझे याद है…”

मीरा उसके पास बैठ गई।

“क्या?”

अर्णव ने बच्चे की तरफ देखा।

“उसने मुझे अपना नाम बताया था।”

बच्चा मुस्कुराया।

“बोलो।”

अर्णव ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

“बोलो।”

“नहीं।”

“तुमने मुझसे वादा किया था।”

“कौन-सा?”

बच्चा धीरे-धीरे उसके पास आया।

उसने अर्णव के कान के पास झुककर फुसफुसाया—

“कि जब तुम वापस आओगे…”

वह मुस्कुराया।

“…तुम मुझे मेरा नाम दोगे।”

अर्णव ने आँखें बंद कर लीं।

उसके अंदर कहीं बहुत पुरानी आवाज़ उठी।

एक नाम।

एक ऐसा नाम…

जिसे उसने पंद्रह साल से नहीं सुना था।

उसने धीरे-धीरे होंठ खोले।

“तुम्हारा नाम…”

कमरा काँपने लगा।

मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“अर्णव, मत बोलना!”

राधा चीख पड़ी—

“उसे नाम मत देना!”

विक्रम ने कहा—

“अगर तुमने उसका नाम लिया…”

अर्णव ने आँखें खोलीं।

बच्चा उसके सामने खड़ा था।

और अब उसकी आँखें काली नहीं थीं।

उनमें आँसू थे।

एक मासूम बच्चे के आँसू।

उसने कहा—

“भैया…”

अर्णव का दिल टूट गया।

“मुझे अकेला मत छोड़ो।”

अर्णव की आँखों से आँसू बह निकले।

उसने बहुत धीमे से कहा—

“तुम्हारा नाम…”

सभी आवाज़ें बंद हो गईं।

घड़ी की सुई 3:13 पर रुक गई।

बच्चा मुस्कुराया।

और अर्णव ने वह नाम बोल दिया—

**“ईशान।”**

कमरे में अचानक अंधेरा छा गया।

एक जोरदार चीख गूँजी।

लेकिन चीख बच्चे की नहीं थी।

वह…

राधा की थी।

अर्णव ने पलटकर देखा।

राधा की परछाईं उसके पैरों के नीचे नहीं थी।

वह दीवार पर खड़ी थी।

और दीवार पर उसकी परछाईं धीरे-धीरे मुस्कुरा रही थी।

फिर उसने अपना सिर उठाया।

और राधा की आवाज़ में कहा—

**“अर्णव… तुमने गलत नाम लिया।”**

अर्णव का खून जम गया।

“तो ईशान कौन है?”

दीवार पर खड़ी परछाईं ने उत्तर दिया—

“वो बच्चा नहीं।”

“फिर?”

परछाईं ने धीरे-धीरे अपना चेहरा बदलना शुरू किया।

पहले राधा।

फिर मीरा।

फिर विक्रम।

और अंत में…

अर्णव।

उसने मुस्कुराकर कहा—

**“ईशान उस नाम का मालिक है…”**

एक पल का सन्नाटा।

फिर—

**“…और तुम उसका चेहरा हो।”**

अर्णव पीछे हट गया।

मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

लेकिन इस बार…

उसकी उंगलियाँ बर्फ जैसी ठंडी थीं।

अर्णव ने उसकी तरफ देखा।

मीरा मुस्कुरा रही थी।

उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

“भैया…”

अर्णव ने धीरे से हाथ छोड़ दिया।

“तुम…”

मीरा ने सिर झुका लिया।

“अब मेरी बारी है।”

पीछे दीवार पर लगी घड़ी में 3:13 की सुई हिली।

3:14।

और उसी क्षण…

आईने के अंदर से एक आखिरी आवाज़ आई—

**“अगली बार आईने में जो दिखे… उसे अपना नाम मत बताना।”**

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