Pretika › Ghost Stories › “अंधेरे में कोई है”
एपिसोड 5: 3:13 का बच्चा
firoj saifi · Ghost Stories · 27 मिनट
- Writer
- firoj saifi
- Story
- “अंधेरे में कोई है”
- Chapter
- 5 of 5
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 27 min
- Words
- 5202
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
वह बच्चा…
अर्जुन था।
कम से कम उस दृश्य में तो वही दिखाई दे रहा था।
राधा उसे अपनी गोद में लिए खड़ी थी।
सफेद साड़ी बारिश से भीगी हुई थी।
उसके बाल चेहरे पर चिपके हुए थे।
और उसके पीछे…
शर्मा निवास की तीसरी मंज़िल का वही कमरा था।
लेकिन यह 2023 नहीं था।
यह 2008 था।
अर्जुन को अचानक समझ आया।
वह सिर्फ दृश्य नहीं देख रहा था।
वह उस रात को देख रहा था।
वह रात…
जिसे उसके परिवार ने पंद्रह साल से दफन कर रखा था।
“माँ…”
उसके मुँह से निकला।
राधा ने धीरे-धीरे अपना चेहरा उठाया।
लेकिन उसने अर्जुन को नहीं देखा।
उसकी नजर उसकी गोद में मौजूद बच्चे पर थी।
बच्चा रो नहीं रहा था।
वह सिर्फ सामने देख रहा था।
उसकी आँखें खुली थीं।
और उसके छोटे हाथ में…
एक चाँदी की घंटी थी।
अर्जुन ने घबराकर मीरा की तरफ देखा।
मीरा उस दृश्य को देखकर पत्थर की तरह खड़ी थी।
“तुमने ये पहले देखा है?”
मीरा ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“फिर तुम्हें इतना डर क्यों लग रहा है?”
मीरा की आवाज़ काँप रही थी।
“क्योंकि…”
वह रुक गई।
“क्योंकि ये मेरी माँ नहीं है।”
अर्जुन ने फिर राधा की तरफ देखा।
“लेकिन तुमने कहा था कि वो तुम्हारी माँ है।”
“है।”
“तो?”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
“मेरी माँ की याद में उसकी शक्ल है।”
“और?”
“उसकी आत्मा नहीं।”
अर्जुन समझ नहीं पाया।
“मतलब?”
मीरा ने धीरे से कहा—
“ये दृश्य किसी ने बनाया है।”
अचानक दृश्य बदल गया।
बारिश गायब हो गई।
कमरा अंधेरे में डूब गया।
राधा की गोद खाली हो गई।
बच्चा भी गायब।
और सामने सिर्फ एक आईना रह गया।
अर्जुन ने उस आईने में देखा।
उसमें उसका प्रतिबिंब नहीं था।
सिर्फ एक खाली कमरा।
फिर पीछे से आवाज़ आई—
“अर्जुन…”
वह पलटा।
वहाँ कोई नहीं था।
“अर्जुन…”
इस बार आवाज़ उसके ठीक पीछे थी।
उसने मुड़ने की कोशिश की।
लेकिन मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मत मुड़ना।”
“वो कौन है?”
“मैं नहीं जानती।”
“तुम्हें कुछ तो पता है!”
“मुझे इतना पता है कि ये तुम्हें कुछ दिखाना चाहती है।”
“क्या?”
मीरा ने कहा—
“तुम्हारी सबसे बड़ी कमजोरी।”
अर्जुन ने पूछा—
“मेरी कमजोरी क्या है?”
मीरा ने उसकी आँखों में देखा।
“तुम्हें अपने पिता पर भरोसा है।”
अर्जुन चुप हो गया।
“और उसे पता है।”
आईने में अचानक एक दृश्य उभरा।
विक्रम।
वह अकेला बैठा था।
सामने वही आईना।
उसके हाथ में एक पुरानी डायरी थी।
अर्जुन ने ध्यान से देखा।
डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—
“3:13 के बाद पैदा होने वाला बच्चा।”
अर्जुन के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
“ये क्या है?”
मीरा ने भी पढ़ लिया।
“मुझे नहीं पता।”
विक्रम ने डायरी का पन्ना पलटा।
उस पर लिखा था—
“अगर बच्चा 3:13 पर जन्म ले, तो वह दरवाज़ा नहीं होगा।
वह कुंजी होगा।”
अर्जुन की साँस रुक गई।
“कुंजी?”
विक्रम के सामने अचानक राधा आकर खड़ी हो गई।
लेकिन इस बार उसकी आँखें सामान्य थीं।
वह डरी हुई थी।
“विक्रम, इसे खत्म करो।”
“कैसे?”
“बच्चे को घर से दूर ले जाओ।”
“मैं ले जाऊँगा।”
“नहीं।”
राधा ने सिर हिलाया।
“तुम उसे जितना दूर ले जाओगे…”
वह आईने की तरफ देखने लगी।
“…वो उतना ही उसके करीब आएगा।”
विक्रम ने पूछा—
“तो क्या करूँ?”
राधा ने कहा—
“उसे भूलने दो।”
“क्या?”
“उसकी यादें मिटा दो।”
विक्रम पीछे हट गया।
“नहीं।”
“अगर उसे सब याद रहा…”
राधा की आवाज़ टूट गई।
“…तो वो खुद दरवाज़ा खोल देगा।”
अर्जुन ने चीखकर कहा—
“मैं क्या भूल गया था?”
दृश्य में किसी ने उसकी आवाज़ नहीं सुनी।
राधा और विक्रम बहस करते रहे।
“मैं अपने बेटे की यादें नहीं मिटाऊँगा।”
राधा ने कहा—
“तो फिर उसे खो दोगे।”
“मैं उसे बचाऊँगा।”
“तुम अकेले नहीं बचा सकते।”
“तुम कर सकती हो?”
राधा चुप रही।
फिर उसने कहा—
“शायद।”
अचानक आईने के अंदर से एक काली हथेली निकली।
राधा पीछे हट गई।
“वो जाग गई।”
विक्रम ने बच्चे को उठाया।
“अर्जुन को लेकर जाओ।”
“कहाँ?”
“शहर।”
“और तुम?”
विक्रम ने आईने की तरफ देखा।
“मैं इसे रोकूँगा।”
राधा ने सिर हिलाया।
“विक्रम…”
“जाओ।”
राधा बच्चे को लेकर भागी।
अर्जुन ने देखा—
उस बच्चे के चेहरे पर अब उसका अपना चेहरा नहीं था।
वह एक धुंधली काली आकृति था।
और उसके कान के पास कोई फुसफुसा रहा था—
“तुम मुझे छोड़कर नहीं जा सकते।”
दृश्य अचानक टूट गया।
अर्जुन चीखते हुए जमीन पर गिर पड़ा।
“अर्जुन!”
मीरा उसके पास बैठ गई।
“आँखें खोलो!”
अर्जुन ने आँखें खोलीं।
वह फिर 2023 में था।
तीसरी मंज़िल का कमरा।
टूटी दीवार।
काला दरवाज़ा।
और सामने…
वह छोटी लड़की।
लगभग दस साल की।
काली आँखें।
सफेद फ्रॉक।
चाँदी की घंटी।
वही बच्ची जिसने खुद को “मीरा” कहा था।
अर्जुन ने उसे देखा।
“तुमने ये सब मुझे दिखाया?”
बच्ची मुस्कुराई।
“नहीं।”
“तो किसने?”
उसने पीछे देखा।
अंधेरे में एक और आकृति खड़ी थी।
लंबी।
पतली।
और धीरे-धीरे वह आकृति आगे आई।
अर्जुन का चेहरा सफेद पड़ गया।
वह उसके पिता थे।
विक्रम।
लेकिन इस बार उनका चेहरा बदला हुआ नहीं था।
आँखें सामान्य थीं।
चेहरा थका हुआ था।
और उनकी गर्दन पर गहरे काले निशान थे।
“पापा…”
विक्रम ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।
“पास मत आना।”
अर्जुन की आँखों में आँसू आ गए।
“आप जिंदा हैं?”
विक्रम ने जवाब नहीं दिया।
“आप 2013 में नहीं मरे थे?”
विक्रम ने बहुत धीमे से कहा—
“मैं 2013 में मर गया था।”
अर्जुन स्तब्ध रह गया।
“फिर आप…”
“ये मेरा शरीर नहीं है।”
मीरा पीछे हट गई।
“तो आप कौन हैं?”
विक्रम ने उसकी तरफ देखा।
“मैं तुम्हारे सवालों का जवाब हूँ।”
अर्जुन आगे बढ़ा।
“मुझे सच चाहिए।”
“सच हमेशा बचाता नहीं है।”
“फिर भी बताइए।”
विक्रम कुछ पल चुप रहे।
फिर बोले—
“17 जुलाई 2008 को जो गायब हुआ था…”
उन्होंने रुककर कहा—
“…वो सिर्फ राधा और मीरा नहीं थीं।”
अर्जुन ने पूछा—
“और कौन?”
विक्रम ने उसकी तरफ देखा।
“तुम।”
अर्जुन के चेहरे पर डर उतर आया।
“मैं तो वहाँ था ही नहीं।”
“यही तुम्हें बताया गया।”
“सच क्या है?”
विक्रम ने कहा—
“तुम वहाँ थे।”
अर्जुन पीछे हट गया।
“नहीं।”
“तुम्हारी उम्र तब तेरह साल थी।”
“मुझे कुछ याद नहीं।”
“क्योंकि हमने तुम्हारी यादें बदल दी थीं।”
अर्जुन की साँस रुक गई।
“हमने?”
विक्रम ने मीरा की तरफ देखा।
मीरा की आँखें झुक गईं।
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हें पता था?”
मीरा ने धीरे से कहा—
“हाँ।”
“कब से?”
“हमेशा से।”
“तुमने मुझे क्यों नहीं बताया?”
“क्योंकि तुम्हारे पिता ने मुझे कसम दी थी।”
अर्जुन की आवाज़ टूट गई।
“मेरी यादें किसने मिटाईं?”
विक्रम ने कहा—
“मैंने।”
अर्जुन की आँखों से आँसू बहने लगे।
“क्यों?”
“क्योंकि तुमने उसे देखा था।”
“किसे?”
विक्रम ने तीसरी मंज़िल की तरफ देखा।
“परछाईं को।”
अर्जुन ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“तुमने उसे 2008 में देखा था।”
“मैंने क्या देखा?”
“तुमने उसे आईने से बाहर आते देखा।”
“फिर?”
“तुमने उसे अपना चेहरा दे दिया।”
अर्जुन का शरीर सुन्न हो गया।
“मैंने?”
विक्रम ने कहा—
“तुम्हारे डर ने उसे तुम्हारा चेहरा दिया।”
मीरा ने बीच में कहा—
“इसीलिए वो तुम्हें बार-बार बुलाती है।”
अर्जुन ने पूछा—
“क्यों?”
विक्रम ने उसकी तरफ देखा।
“क्योंकि उसने तुम्हारा चेहरा पहली बार 2008 में लिया था।”
अर्जुन ने अपने चेहरे को हाथ से छुआ।
“तो जो मैं देख रहा हूँ…”
“वो सिर्फ नकल नहीं है।”
विक्रम ने कहा।
“वो तुम्हारे अंदर की किसी चीज़ का हिस्सा है।”
अचानक छोटी बच्ची हँसने लगी।
“आप दोनों अभी भी झूठ बोल रहे हैं।”
विक्रम ने उसकी तरफ देखा।
“चुप रहो।”
बच्ची ने सिर टेढ़ा किया।
“आपने उसे सच नहीं बताया।”
अर्जुन ने पूछा—
“क्या सच?”
बच्ची धीरे-धीरे उसके पास आई।
मीरा पीछे हट गई।
“तुम्हारे पिता ने तुम्हारी यादें मिटाईं…”
वह फुसफुसाई।
“…लेकिन एक याद नहीं मिटा पाए।”
अर्जुन ने पूछा—
“कौन-सी?”
बच्ची ने अपनी उंगली उसकी छाती पर रख दी।
“तुम्हें याद है…”
अर्जुन की आँखें बंद हो गईं।
अचानक उसके सामने एक दृश्य आया।
2008।
बारिश।
तीसरी मंज़िल।
वह तेरह साल का था।
दरवाज़े के बाहर खड़ा।
उसने अंदर देखा।
मीरा जमीन पर पड़ी थी।
राधा आईने के सामने खड़ी थी।
और विक्रम…
विक्रम उसे देखकर चिल्ला रहे थे—
“अर्जुन! भाग!”
लेकिन अर्जुन भागा नहीं।
वह कमरे के अंदर गया।
आईने के सामने खड़ा हो गया।
और उसने अपनी परछाईं देखी।
लेकिन उसकी परछाईं…
उसकी हरकत नहीं कर रही थी।
वह स्थिर खड़ी थी।
फिर उसने हाथ उठाया।
और आईने के अंदर से बाहर आ गई।
अर्जुन ने देखा—
उसकी अपनी परछाईं उसके सामने खड़ी थी।
उसने कहा—
“मैं तुम्हारी जगह ले लूँ?”
तेरह साल का अर्जुन डर गया।
“नहीं।”
परछाईं मुस्कुराई।
“फिर मुझे नाम दो।”
“कौन-सा नाम?”
“जो तुम्हें सबसे ज्यादा प्यारा है।”
अर्जुन रोते हुए बोला—
“मीरा।”
परछाईं की मुस्कान फैल गई।
“मीरा…”
और उसी क्षण कमरे की सारी घड़ियाँ 3:13 पर रुक गईं।
अर्जुन ने आँखें खोल दीं।
उसका पूरा शरीर काँप रहा था।
उसने मीरा की तरफ देखा।
“मैंने…”
मीरा की आँखों से आँसू बह रहे थे।
“हाँ।”
“मैंने उसे तुम्हारा नाम दिया था।”
मीरा ने सिर झुका लिया।
“हाँ।”
अर्जुन पीछे हट गया।
“इसलिए वो तुम्हारे जैसी दिखती है?”
मीरा ने जवाब नहीं दिया।
विक्रम ने कहा—
“उस रात तुमने उसे एक नाम दिया।”
“और उसने उसी नाम को अपना चेहरा बना लिया।”
“लेकिन क्यों?”
“क्योंकि तुम मीरा पर भरोसा करते थे।”
अर्जुन ने मीरा की तरफ देखा।
“और वो भरोसा…”
विक्रम ने कहा—
“उसकी पहली ताकत बन गया।”
अचानक काला दरवाज़ा पूरी तरह खुल गया।
अंदर से बर्फ जैसी ठंडी हवा बाहर आई।
विक्रम ने तुरंत कहा—
“अब जाना होगा।”
अर्जुन ने पूछा—
“कहाँ?”
“उस कमरे में।”
“कौन-सा?”
“जहाँ 2013 में मेरी मौत हुई।”
अर्जुन ने उसे देखा।
“आपने कहा था 2013 में आप मर गए।”
“हाँ।”
“कैसे?”
विक्रम ने अपनी गर्दन के निशान छुए।
“मैंने उसे रोकने की आखिरी कोशिश की थी।”
“और?”
“मैंने आईना जला दिया।”
अर्जुन ने कहा—
“तो फिर ये सब खत्म क्यों नहीं हुआ?”
विक्रम ने कड़वी मुस्कान दी।
“क्योंकि आईना नहीं जला।”
“फिर?”
“उसका सिर्फ एक हिस्सा जला।”
“बाकी?”
विक्रम ने काले दरवाज़े के अंदर देखा।
“बाकी इसी घर के नीचे है।”
मीरा ने पूछा—
“और राधा?”
विक्रम चुप हो गए।
“पापा?”
अर्जुन ने जोर देकर पूछा।
“राधा कहाँ है?”
विक्रम ने धीरे से कहा—
“वो अभी भी उस आईने के अंदर है।”
मीरा की आँखें भर आईं।
“माँ जिंदा है?”
“जिंदा…”
विक्रम ने कहा।
“लेकिन इंसान की तरह नहीं।”
तीनों काले दरवाज़े के अंदर जाने लगे।
सबसे पहले विक्रम।
फिर मीरा।
फिर अर्जुन।
अंदर एक लंबा गलियारा था।
दीवारों पर दर्जनों आईने लगे थे।
छोटे।
बड़े।
गोल।
चौकोर।
पुराने।
नए।
हर आईने में अलग दृश्य दिखाई दे रहा था।
एक में 2008।
एक में 2013।
एक में 2023।
और एक में…
अर्जुन का बचपन।
वह एक आईने के सामने रुक गया।
उसमें वह अपने माता-पिता के साथ खड़ा था।
उसकी माँ मुस्कुरा रही थी।
विक्रम उसके कंधे पर हाथ रखे हुए था।
और पीछे…
मीरा खड़ी थी।
सब कुछ सामान्य था।
फिर अर्जुन ने ध्यान से देखा।
उस आईने में मीरा की परछाईं नहीं थी।
अर्जुन का दिल जोर से धड़का।
“मीरा…”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
“क्या?”
“इस आईने में…”
वह रुक गया।
“क्या?”
“तुम्हारी परछाईं नहीं है।”
मीरा धीरे-धीरे आईने के पास गई।
उसने देखा।
वास्तव में…
आईने में मीरा थी।
लेकिन उसके पीछे जमीन पर कोई परछाईं नहीं थी।
मीरा पीछे हट गई।
“ये संभव नहीं है।”
विक्रम ने कुछ नहीं कहा।
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“आप जानते थे।”
विक्रम ने सिर झुका लिया।
“हाँ।”
“मीरा की परछाईं क्यों नहीं है?”
विक्रम ने कहा—
“क्योंकि 17 जुलाई 2008 को…”
वह रुक गया।
“मीरा पूरी तरह वापस नहीं आई थी।”
मीरा की आँखें फैल गईं।
“क्या मतलब?”
विक्रम ने उसकी तरफ देखा।
“उस रात आईने ने तुम्हें वापस किया…”
मीरा ने काँपते हुए पूछा—
“लेकिन?”
विक्रम ने कहा—
“तुम्हारी परछाईं वहीं रह गई।”
मीरा ने आईने को देखा।
उसकी आँखों में डर था।
“तो मैं…”
विक्रम ने कुछ नहीं कहा।
अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम मीरा हो।”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
अर्जुन ने कहा—
“मुझे फर्क नहीं पड़ता।”
विक्रम ने तुरंत कहा—
“फर्क पड़ता है।”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“क्यों?”
“क्योंकि अगर मीरा की परछाईं अभी भी वहाँ है…”
विक्रम ने पीछे वाले आईने की तरफ इशारा किया।
“…तो जो हमारे साथ चल रही है…”
वह वाक्य पूरा नहीं कर पाए।
मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया।
“मैं क्या हूँ?”
विक्रम ने कहा—
“मुझे नहीं पता।”
उसी समय पीछे से एक आवाज़ आई।
“मैं बता सकती हूँ।”
तीनों पलटे।
गलियारे के अंत में…
वही काली आँखों वाली लड़की खड़ी थी।
उसके चेहरे पर मीरा की मुस्कान थी।
लेकिन इस बार उसके पीछे…
एक और परछाईं खड़ी थी।
एक छोटी लड़की की।
लगभग दस साल की।
उसने हाथ में चाँदी की घंटी पकड़ रखी थी।
काली आँखों वाली लड़की ने कहा—
“मीरा की परछाईं…”
उसने छोटी लड़की की तरफ देखा।
“…मैं नहीं हूँ।”
अर्जुन ने पूछा—
“फिर कौन है?”
छोटी लड़की मुस्कुराई।
“तुम।”
अर्जुन का चेहरा जम गया।
“क्या?”
वह लड़की धीरे-धीरे आगे आई।
“जिसे तुमने 2008 में आईने में छोड़ा था…”
वह अर्जुन की तरफ देखकर बोली—
“वो मैं हूँ।”
अर्जुन पीछे हट गया।
“लेकिन तुम तो…”
“तुम्हारी परछाईं।”
कमरे की सारी बत्तियाँ एक साथ बुझ गईं।
अंधेरे में सिर्फ एक आवाज़ गूँजी—
“और अब…”
ठक।
पहली दस्तक।
“मैं तुम्हारी जगह लेने आई हूँ।”
ठक।
दूसरी दस्तक।
मीरा ने अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।
ठक।
तीसरी दस्तक।
और इस बार…
दस्तक दरवाज़े से नहीं आई थी।
वह अर्जुन के सीने के अंदर से आई थी।
धक…
धक…
धक…
अर्जुन ने अपनी छाती पर हाथ रखा।
उसका दिल धड़क रहा था।
लेकिन हर धड़कन के साथ…
उसके शरीर की परछाईं दीवार पर उससे अलग होती जा रही थी।
एक कदम…
दो कदम…
तीन कदम…
फिर उसकी परछाईं ने दीवार से सिर उठाया।
और पहली बार…
वह अर्जुन की तरफ देखकर मुस्कुराई।
अर्जुन चीख पड़ा।
क्योंकि उसकी अपनी परछाईं ने होंठ हिलाकर कहा—
“भैया…”
मीरा के हाथ से चाँदी की घंटी गिर गई।
और उसी क्षण विक्रम ने चिल्लाकर कहा—
“अर्जुन! अपनी परछाईं को अपने पास मत आने देना!”
अर्जुन ने पीछे हटने की कोशिश की, लेकिन उसके पैर जैसे फर्श से चिपक गए थे। दीवार पर उसकी परछाईं अब पूरी तरह अलग हो चुकी थी। वह धीरे-धीरे गर्दन घुमा रही थी, जैसे कई वर्षों बाद किसी बंद कमरे से बाहर निकलने का रास्ता खोज रही हो।
“पापा…” अर्जुन की आवाज़ काँप गई, “ये मुझे क्यों बुला रही है?”
विक्रम ने अपनी जेब से एक छोटी-सी लोहे की कील निकाली। उसके ऊपर लाल धागा लिपटा हुआ था।
“क्योंकि तुमने उसे नाम दिया था।”
“मैंने तो वो बात भूल गई थी!”
“तुम भूल गए थे,” विक्रम ने कहा, “लेकिन वो नहीं भूली।”
परछाईं ने दीवार पर अपना हाथ उठाया।
उसी क्षण गलियारे के सारे आईने काँपने लगे।
एक आईने में राधा दिखाई दी।
वह दोनों हाथों से काँच पीट रही थी।
“विक्रम!”
उसकी आवाज़ इतनी तेज़ थी कि पूरा गलियारा गूँज उठा।
मीरा उसकी तरफ दौड़ना चाहती थी, लेकिन विक्रम ने उसे पकड़ लिया।
“नहीं!”
“वो मेरी माँ है!”
“वो तुम्हें बुला नहीं रही,” विक्रम ने कठोर आवाज़ में कहा, “वो तुम्हारे पीछे खड़ी चीज़ को बुला रही है।”
मीरा ने धीरे-धीरे पीछे देखा।
उसकी अपनी परछाईं अब जमीन पर नहीं थी।
वह अर्जुन की परछाईं के साथ मिल चुकी थी।
दोनों आकृतियाँ दीवार पर एक-दूसरे में घुल रही थीं।
फिर उस संयुक्त परछाईं ने अपना चेहरा उठाया।
उसके चेहरे पर आधा अर्जुन था।
और आधा मीरा।
“तुमने मुझे नाम दिया,” वह बोली, “लेकिन चेहरा उसने दिया।”
अर्जुन ने मीरा की तरफ देखा।
“किसने?”
आईने के अंदर राधा ने काँपते हुए कहा—
“मैंने।”
गलियारे में अचानक सन्नाटा छा गया।
विक्रम ने राधा की तरफ देखा।
“तुमने क्या किया?”
राधा ने काँच पर अपना हाथ रख दिया।
“उस रात अर्जुन अकेला नहीं था।”
अर्जुन की साँस अटक गई।
“और कौन था?”
राधा की आँखों में पछतावा था।
“मीरा।”
मीरा पीछे हट गई।
“मैं?”
“तुम दोनों ने उसे देखा था,” राधा बोली, “लेकिन परछाईं ने पहले अर्जुन को चुना। मैंने उसे रोकने के लिए मीरा का नाम इस्तेमाल किया।”
अर्जुन ने सिर हिलाया।
“आपने मेरा नाम नहीं मिटाया था…”
राधा ने आँखें बंद कर लीं।
“नहीं।”
“आपने मुझे झूठी यादें दी थीं।”
“मैं तुम्हें बचाना चाहती थी।”
“और मीरा?”
राधा ने मीरा की तरफ देखा।
“मीरा को मैंने वापस लाने की कोशिश की थी।”
मीरा की आवाज़ टूट गई।
“कोशिश?”
“आईने ने तुम्हारा शरीर लौटा दिया,” राधा ने कहा, “लेकिन तुम्हारी आत्मा का एक हिस्सा वहीं रह गया।”
अर्जुन ने मीरा का हाथ कसकर पकड़ लिया।
“तो जो हमारे साथ है…”
“वो मीरा का खोया हुआ हिस्सा है,” राधा ने कहा, “और जो तुम्हारी परछाईं बनकर खड़ी है… वो अर्जुन का डर।”
दीवार पर खड़ी आकृति हँसने लगी।
“डर नहीं,” उसने कहा, “सच।”
विक्रम ने लोहे की कील जमीन में गाड़ दी।
एक तेज़ चीख पूरे गलियारे में फैल गई।
परछाईं पीछे हट गई, लेकिन उसके साथ ही सभी आईनों में दरारें पड़ने लगीं।
“विक्रम!” राधा चिल्लाई, “कील निकालो!”
“नहीं।”
“अगर वो यहीं रही तो दरवाज़ा खुल जाएगा!”
“दरवाज़ा पहले ही खुल चुका है।”
विक्रम ने अर्जुन की तरफ देखा।
“अब सिर्फ कुंजी बाकी है।”
अर्जुन ने पूछा—
“कुंजी कौन है?”
विक्रम ने जवाब नहीं दिया।
तभी गलियारे के अंत में एक घड़ी दिखाई दी।
उसकी सुइयाँ 3:12 पर थीं।
सेकंड वाली सुई धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।
टिक।
टिक।
टिक।
मीरा ने घड़ी को देखा।
“3:13 होने वाला है।”
विक्रम ने अर्जुन से कहा—
“जब घड़ी 3:13 पर पहुँचे, अपनी परछाईं की तरफ मत देखना।”
“अगर देख लिया तो?”
“तो वो तुम्हारे शरीर में प्रवेश कर जाएगी।”
“और अगर मैं उसे रोक दूँ?”
“तुम्हें उसे अपना नाम वापस लेना होगा।”
अर्जुन ने काँपते हुए पूछा—
“कैसे?”
विक्रम ने कहा—
“उसे वही नाम दो, जो तुमने उससे छीना था।”
अर्जुन ने मीरा की तरफ देखा।
“मीरा?”
मीरा की आँखों में आँसू थे।
“मेरा नाम मत लेना।”
“क्यों?”
“क्योंकि अगर उसने मेरा नाम फिर से ले लिया, तो मैं पूरी तरह गायब हो जाऊँगी।”
अर्जुन के सामने दो रास्ते थे।
एक तरफ उसकी अपनी परछाईं थी, जो उसके शरीर पर कब्ज़ा करना चाहती थी।
दूसरी तरफ मीरा थी, जिसकी पहचान उसी नाम से बंधी हुई थी।
घड़ी की सुई 3:13 के करीब पहुँच रही थी।
टिक।
टिक।
टिक।
अचानक काली आँखों वाली लड़की अर्जुन के सामने आकर खड़ी हो गई।
उसने अपना चेहरा ऊपर उठाया।
अब वह बिल्कुल अर्जुन जैसी दिख रही थी।
तेरह साल का अर्जुन।
भीगे बाल।
डरी हुई आँखें।
और होंठों पर वही मुस्कान, जो उसने आईने में पहली बार देखी थी।
“मुझे अपना नाम वापस दो,” उसने कहा।
अर्जुन ने धीरे से पूछा—
“तुम्हारा नाम क्या है?”
परछाईं ने सिर टेढ़ा किया।
“तुमने ही तो रखा था।”
“मैंने तुम्हें मीरा कहा था।”
“नहीं।”
उसकी आवाज़ अचानक भारी हो गई।
“तुमने मुझे अपना डर कहा था।”
अर्जुन के पीछे दीवार पर उसकी परछाईं फैलने लगी।
“तुमने मुझे अपना अकेलापन दिया था।”
गलियारे के सभी आईनों में अर्जुन के अलग-अलग चेहरे दिखाई देने लगे।
बचपन का अर्जुन।
डरा हुआ अर्जुन।
गुस्से में अर्जुन।
और एक ऐसा अर्जुन, जिसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।
“तुमने मुझे अपना चेहरा दिया,” परछाईं फुसफुसाई, “अब मैं तुम्हारी जिंदगी लूँगी।”
घड़ी की सुई 3:13 पर पहुँच गई।
उसी क्षण सभी आईने टूट गए।
राधा की चीख सुनाई दी।
मीरा ने अर्जुन को पीछे खींचा।
लेकिन परछाईं बिजली की तरह आगे बढ़ी और अर्जुन के सीने में समा गई।
अर्जुन का शरीर झटके से पीछे उछला।
उसकी आँखें बंद हो गईं।
कुछ पल तक सब शांत रहा।
फिर अर्जुन ने आँखें खोलीं।
मीरा ने राहत की साँस ली।
“अर्जुन?”
वह उसकी तरफ मुड़ा।
लेकिन उसकी आँखें अब सामान्य नहीं थीं।
उनमें गहरा काला धुआँ घूम रहा था।
विक्रम ने लोहे की कील उठाई।
“अर्जुन, मेरी आवाज़ सुनो!”
अर्जुन मुस्कुराया।
“मैं सुन रहा हूँ, पापा।”
उसकी आवाज़ में दो आवाज़ें मिली हुई थीं।
एक अर्जुन की।
दूसरी किसी बहुत पुराने अंधेरे की।
मीरा धीरे-धीरे पीछे हटने लगी।
“तुम अर्जुन नहीं हो।”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“मैं अर्जुन भी हूँ।”
वह एक कदम आगे बढ़ा।
“और वो भी…”
उसने दीवार की तरफ इशारा किया।
वहाँ अब कोई परछाईं नहीं थी।
“जो तुम्हारे साथ चल रही थी।”
मीरा ने काँपते हुए पूछा—
“तुमने उसे अपने अंदर आने दिया?”
अर्जुन ने सिर झुका लिया।
“नहीं।”
उसने अपनी छाती पर हाथ रखा।
“मैंने उसे बुलाया।”
विक्रम का चेहरा बदल गया।
“नहीं…”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“आपने कहा था कि मैं कुंजी हूँ।”
“तुम्हें ऐसा नहीं करना था।”
“क्यों नहीं?”
अर्जुन की मुस्कान और चौड़ी हो गई।
“क्योंकि अब मुझे सब याद आ गया है।”
राधा आईने के टूटे हुए टुकड़े में दिखाई दी।
“अर्जुन, उसकी बात मत मानना!”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“माँ…”
राधा की आँखों में उम्मीद जगी।
लेकिन अगले ही पल अर्जुन ने कहा—
“आपने मुझे बचाने के लिए मेरी यादें मिटाईं।”
“हाँ।”
“लेकिन आपने ये नहीं बताया कि उस रात मैंने दरवाज़ा खुद खोला था।”
राधा का चेहरा सफेद पड़ गया।
विक्रम ने आँखें बंद कर लीं।
मीरा ने पूछा—
“कौन-सा दरवाज़ा?”
अर्जुन ने गलियारे के अंत की तरफ देखा।
वहाँ अब एक नया दरवाज़ा दिखाई दे रहा था।
काला।
बहुत ऊँचा।
और उसके ऊपर सफेद रंग से लिखा था—
3:13
दरवाज़े के पीछे से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आ रही थी।
धीमी।
कमज़ोर।
लेकिन बिल्कुल साफ़।
मीरा ने फुसफुसाकर कहा—
“अंदर कौन है?”
अर्जुन ने उत्तर दिया—
“वो बच्चा, जिसे राधा उस रात लेकर भागी थी।”
विक्रम ने तुरंत कहा—
“अर्जुन, दरवाज़े से दूर रहो!”
“क्यों?”
“क्योंकि वो बच्चा कभी बाहर नहीं आया।”
अर्जुन ने दरवाज़े की ओर कदम बढ़ाया।
“तो फिर मैं कौन हूँ?”
विक्रम ने उसकी तरफ देखा।
उनकी आँखों में पहली बार डर था।
“तुम वो बच्चा नहीं हो।”
अर्जुन रुक गया।
“क्या?”
विक्रम ने काँपती आवाज़ में कहा—
“तुम्हें हमने उस रात बाहर से उठाया था।”
“तो असली बच्चा?”
विक्रम ने दरवाज़े की तरफ देखा।
“वो अभी भी अंदर है।”
दरवाज़े के पीछे से रोने की आवाज़ अचानक बंद हो गई।
फिर एक छोटी-सी हँसी सुनाई दी।
अर्जुन के हाथ में चाँदी की घंटी अपने आप आ गई।
मीरा चीख पड़ी—
“अर्जुन, उसे मत बजाना!”
लेकिन अर्जुन ने घंटी को देखा।
उसकी सतह पर अब एक नया निशान उभर आया था।
एक छोटा-सा चेहरा।
वही चेहरा, जो उसने आईने में देखा था।
घंटी अपने आप बज उठी।
टन…
पूरे घर की दीवारें काँप गईं।
टन…
काले दरवाज़े पर दरारें फैलने लगीं।
टन…
दरवाज़ा धीरे-धीरे खुलने लगा।
अंदर घना अंधेरा था।
और उस अंधेरे में एक बच्चा खड़ा था।
उसकी पीठ अर्जुन की तरफ थी।
उसके हाथ में वही पुरानी डायरी थी।
वह धीरे-धीरे पलटा।
अर्जुन की साँस रुक गई।
बच्चे का चेहरा बिल्कुल उसके जैसा था।
लेकिन उसकी आँखें खाली थीं।
बच्चे ने डायरी खोली और पहला पन्ना दिखाया।
उस पर लिखा था—
“3:13 के बाद पैदा होने वाला बच्चा दरवाज़ा नहीं होगा।
वह कुंजी होगा।”
फिर उसने दूसरा पन्ना पलटा।
उस पर लिखा था—
“लेकिन कुंजी को घुमाने वाला कौन होगा?”
अर्जुन के पीछे खड़ी परछाईं ने उसके कान में फुसफुसाया—
“तुम।”
अर्जुन ने धीरे-धीरे दरवाज़े की ओर हाथ बढ़ाया।
मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम अंदर गए तो वापस नहीं आओगे।”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“शायद मैं कभी वापस आया ही नहीं था।”
विक्रम ने लोहे की कील उठाकर अर्जुन की तरफ फेंकी।
कील उसके सीने से टकराई और जमीन पर गिर गई।
अर्जुन पीछे नहीं हटा।
बल्कि उसके चेहरे पर एक अजीब शांति उतर आई।
“पापा,” उसने कहा, “आपने मेरी यादें मिटाईं।”
विक्रम चुप रहे।
“आपने मुझे झूठ बताया।”
विक्रम की आँखों से आँसू बहने लगे।
“मैंने तुम्हें बचाने की कोशिश की।”
“नहीं।”
अर्जुन ने दरवाज़े की चौखट पर हाथ रखा।
“आपने सिर्फ उस चीज़ को बचाया, जिसे आप अपना बेटा समझते थे।”
विक्रम ने सिर उठाया।
“अर्जुन…”
“लेकिन मैं आपका बेटा नहीं हूँ।”
मीरा ने चीखकर कहा—
“चुप रहो!”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हें भी सच पता था।”
मीरा रोते हुए बोली—
“मुझे सिर्फ इतना पता था कि तुम्हें बचाना है।”
“किससे?”
मीरा ने दरवाज़े के अंदर खड़े बच्चे की तरफ देखा।
“तुमसे।”
अर्जुन के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।
बच्चे ने डायरी बंद कर दी।
फिर उसने पहली बार बोलना शुरू किया।
उसकी आवाज़ अर्जुन जैसी थी।
“तुमने मुझे बाहर छोड़ा था।”
अर्जुन ने धीरे से पूछा—
“कब?”
“जब तुमने अपना नाम मुझे दिया।”
“मैंने तुम्हें मीरा का नाम दिया था।”
बच्चे ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
उसने अपनी छाती पर हाथ रखा।
“तुमने मुझे अपना असली नाम दिया था।”
अर्जुन पीछे हट गया।
“मेरा असली नाम…”
बच्चे ने कहा—
“अर्जुन नहीं है।”
गलियारे की हवा अचानक जम गई।
विक्रम ने आँखें बंद कर लीं।
राधा टूटे हुए आईने में चीखती रही—
“उसे मत सुनो!”
लेकिन देर हो चुकी थी।
बच्चे ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
“अपना नाम याद करो।”
अर्जुन के सिर में तेज़ दर्द उठा।
उसके सामने एक के बाद एक दृश्य चमकने लगे।
एक अंधेरा कमरा।
एक नवजात बच्चा।
राधा की गोद।
विक्रम के हाथ में चाकू।
आईने के सामने खड़ा एक बूढ़ा आदमी।
और फर्श पर लिखा हुआ एक नाम।
अर्जुन ने उसे पढ़ने की कोशिश की।
लेकिन हर बार अक्षर धुंधले हो जाते।
फिर अचानक उसे वह नाम दिखाई दिया।
उसका शरीर काँप उठा।
उसने फुसफुसाकर कहा—
“अर्णव…”
मीरा ने अपना मुँह ढक लिया।
विक्रम ने सिर झुका लिया।
बच्चा मुस्कुराया।
“अब याद आया?”
अर्जुन ने अपनी छाती पकड़ ली।
उसके अंदर से दूसरी आवाज़ निकली—
“मेरा नाम अर्णव है।”
दीवारों पर लगे टूटे आईनों में एक साथ आग जल उठी।
राधा ने चीखकर कहा—
“विक्रम, उसे रोकिए!”
विक्रम ने अर्जुन की तरफ दौड़ने की कोशिश की।
लेकिन काले दरवाज़े के अंदर से एक लंबा हाथ निकला और उसे पीछे खींच लिया।
“पापा!”
अर्जुन ने हाथ बढ़ाया।
विक्रम ने उसका हाथ पकड़ लिया।
कुछ पल के लिए दोनों की उंगलियाँ जुड़ी रहीं।
विक्रम ने कहा—
“तुम्हारा नाम चाहे जो हो… तुम मेरे बेटे हो।”
अर्जुन की आँखों में आँसू आ गए।
लेकिन उसके पीछे खड़ी परछाईं ने उसके कान में कहा—
“झूठ।”
अर्जुन की पकड़ ढीली पड़ गई।
विक्रम अंधेरे में खिंचते चले गए।
मीरा ने अर्जुन को पकड़ लिया।
“हमें भागना होगा!”
“नहीं।”
अर्जुन ने दरवाज़े के अंदर देखा।
“मुझे अपना नाम वापस लेना है।”
“किससे?”
अर्जुन ने बच्चे की तरफ देखा।
“उससे, जिसने उसे इतने सालों से पहना हुआ है।”
बच्चा धीरे-धीरे आगे आया।
अब उसके चेहरे पर अर्जुन का चेहरा नहीं था।
वह चेहरा बदल रहा था।
कभी राधा।
कभी मीरा।
कभी विक्रम।
और फिर…
एक बिल्कुल खाली चेहरा।
“अगर तुम अपना नाम वापस लोगे,” बच्चे ने कहा, “तो तुम्हारी सारी यादें भी वापस आ जाएँगी।”
“मुझे मंज़ूर है।”
“तुम्हें अपनी माँ की मौत याद आएगी।”
अर्जुन चुप रहा।
“तुम्हें अपने पिता का झूठ याद आएगा।”
अर्जुन ने दाँत भींच लिए।
“मंज़ूर है।”
“तुम्हें याद आएगा कि तुमने मीरा को आईने के अंदर धकेला था।”
मीरा ने अर्जुन की तरफ देखा।
“क्या?”
अर्जुन का चेहरा पीला पड़ गया।
बच्चे ने कहा—
“तुमने उसे बचाने के लिए नहीं छोड़ा था।”
“फिर क्यों?”
“क्योंकि तुम डर गए थे।”
अर्जुन की आँखों के सामने फिर वही रात चमकी।
तेरह साल का वह आईने के सामने खड़ा था।
मीरा उसका हाथ पकड़े हुए थी।
परछाईं उनके पीछे खड़ी थी।
वह अर्जुन से कह रही थी—
“एक को बाहर जाना होगा।”
अर्जुन रो रहा था।
मीरा चिल्ला रही थी—
“मुझे मत छोड़ना!”
लेकिन अर्जुन ने उसका हाथ छोड़ दिया था।
मीरा आईने के अंदर गिर गई थी।
और अर्जुन भाग गया था।
अर्जुन घुटनों के बल गिर पड़ा।
“मैंने…”
मीरा उसके सामने खड़ी थी।
उसकी आँखों में आँसू थे।
“तुमने मुझे छोड़ा था।”
“मुझे माफ कर दो।”
“मैंने तुम्हें कभी दोष नहीं दिया।”
“लेकिन तुम्हें देना चाहिए था।”
मीरा ने सिर हिलाया।
“मैंने तुम्हें इसलिए नहीं बचाया कि तुम निर्दोष थे।”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“फिर?”
“क्योंकि तुम वापस आना चाहते थे।”
अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।
बच्चे ने हाथ आगे बढ़ाया।
“अब अपना नाम वापस लो।”
अर्जुन धीरे-धीरे खड़ा हुआ।
उसने बच्चे का हाथ पकड़ लिया।
जैसे ही उनकी उंगलियाँ मिलीं, पूरा घर चीखने लगा।
दीवारों से आवाज़ें निकलने लगीं।
राधा की।
विक्रम की।
मीरा की।
और अर्जुन की अपनी।
हर आवाज़ एक ही बात कह रही थी—
“नाम मत लो।”
अर्जुन ने बच्चे की आँखों में देखा।
“मेरा नाम…”
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
“अर्णव है।”
बच्चे का चेहरा फटने लगा।
उसकी त्वचा के नीचे काला धुआँ घूमने लगा।
“नहीं।”
“मेरा नाम अर्णव है।”
“तुम अर्जुन हो!”
“मैं अर्णव हूँ।”
“तुम्हें अर्जुन कहा गया!”
“मुझे झूठ कहा गया।”
बच्चा पीछे हटने लगा।
अर्जुन ने उसका हाथ नहीं छोड़ा।
“मेरा नाम अर्णव है।”
तीसरी बार यह कहते ही काले दरवाज़े के अंदर तेज़ सफेद रोशनी फैल गई।
बच्चे का शरीर राख की तरह टूटने लगा।
उसके भीतर से एक छोटी-सी काली परछाईं बाहर निकली और अर्जुन के सीने में समा गई।
अर्जुन ने चीख मारी।
मीरा ने उसे पकड़ लिया।
कुछ पल बाद सब शांत हो गया।
काला दरवाज़ा बंद था।
गलियारे में कोई आईना नहीं बचा था।
विक्रम गायब थे।
राधा की आवाज़ भी नहीं आ रही थी।
अर्जुन जमीन पर बैठा काँप रहा था।
मीरा उसके सामने घुटनों के बल बैठ गई।
“अर्जुन…”
वह धीरे से बोला—
“मेरा नाम अर्णव है।”
मीरा ने उसकी आँखों में देखा।
“तुम मेरे लिए अब भी वही हो।”
“लेकिन मैं कौन हूँ?”
मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम वो हो, जिसने वापस आने की कोशिश की।”
अचानक बंद काले दरवाज़े के पीछे से तीन दस्तकें सुनाई दीं।
ठक।
ठक।
ठक।
अर्जुन और मीरा दोनों जम गए।
दरवाज़े के नीचे से काला धुआँ बाहर आने लगा।
फिर अंदर से विक्रम की आवाज़ आई—
“अर्णव…”
अर्जुन ने साँस रोक ली।
“दरवाज़ा खोलो।”
मीरा ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
“मत खोलना।”
विक्रम की आवाज़ फिर आई—
“मैं अकेला हूँ।”
अर्जुन दरवाज़े के करीब जाने लगा।
“पापा…”
मीरा ने उसे रोक लिया।
“वो तुम्हारे पिता नहीं हैं।”
अंदर से आवाज़ आई—
“अर्णव, मुझे बाहर निकालो।”
अर्जुन ने दरवाज़े पर हाथ रख दिया।
काले धुएँ ने उसकी उंगलियों को ढक लिया।
फिर दरवाज़े के दूसरी तरफ से एक और आवाज़ सुनाई दी।
बहुत धीमी।
बहुत परिचित।
“अर्णव…”
यह राधा की आवाज़ थी।
“विक्रम को मत खोलना।”
अर्जुन ने हाथ पीछे खींच लिया।
अंदर से विक्रम चीखे—
“उसकी बात मत सुनो!”
राधा बोली—
“वो विक्रम नहीं है।”
“तुम कौन हो?” अर्जुन ने काँपते हुए पूछा।
कुछ पल सन्नाटा रहा।
फिर राधा ने कहा—
“मैं भी नहीं जानती।”
दरवाज़े के नीचे से काला धुआँ अचानक लाल हो गया।
मीरा ने पीछे हटते हुए कहा—
“हमें यहाँ से निकलना होगा।”
अर्जुन ने पूछा—
“और पापा?”
“अगर वो सच में अंदर हैं, तो हम उन्हें बचाएँगे।”
“और अगर नहीं?”
मीरा ने दरवाज़े की तरफ देखा।
“तो जो भी है, उसे बाहर नहीं आने देंगे।”
अचानक ऊपर से भारी आवाज़ आई।
जैसे पूरी तीसरी मंज़िल के ऊपर कोई चल रहा हो।
एक कदम।
फिर दूसरा।
फिर तीसरा।
अर्जुन ने सिर उठाकर छत की तरफ देखा।
छत पर उसकी परछाईं दिखाई दे रही थी।
लेकिन वह अकेली नहीं थी।
उसके पीछे एक और लंबी आकृति खड़ी थी।
उस आकृति ने धीरे-धीरे अपना सिर झुकाया।
और अर्जुन के कान के पास फुसफुसाहट गूँजी—
“तुमने अपना नाम वापस ले लिया…”
अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।
“अब क्या?”
आवाज़ ने उत्तर दिया—
“अब मुझे अपना नाम देना होगा।”
मीरा ने घबराकर पूछा—
“किसे?”
अर्जुन ने ऊपर देखा।
छत पर खड़ी आकृति अब नीचे उतर रही थी।
उसका शरीर दीवार से अलग होकर फर्श पर फैलने लगा।
अर्जुन ने मीरा का हाथ पकड़ लिया।
“भागो।”
दोनों गलियारे से बाहर दौड़ पड़े।
पीछे काला दरवाज़ा फिर से खुल गया।
अंदर से एक बच्चे की हँसी गूँजी।
और उसी हँसी के बीच…
विक्रम की आवाज़ आखिरी बार सुनाई दी—
“अर्णव…”
“अगली बार…”
“तुम्हें अपना चेहरा भी वापस देना होगा।”
गलियारे की सारी घड़ियाँ एक साथ चलने लगीं।
3:14।
3:15।
3:16।
लेकिन सबसे पीछे लगी एक घड़ी अब भी 3:13 पर रुकी थी।
उसके काँच के अंदर एक छोटी-सी उंगली ने धीरे-धीरे लिखा—
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