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एपिसोड 4: वह बच्चा कौन था?

firoj saifi · Ghost Stories · 15 मिनट

Writer
firoj saifi
Story
“अंधेरे में कोई है”
Chapter
4 of 5
Category
Ghost Stories
Reading time
15 min
Words
2903
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

राधा की गोद में जो बच्चा था…

वह अर्जुन था।

कम से कम उसे ऐसा ही दिखाई दे रहा था।

अर्जुन सीढ़ियों के नीचे खड़ा था और उसकी आँखें उस दृश्य पर जमी थीं।

सफेद साड़ी में खड़ी राधा।

उसकी गोद में एक बच्चा।

और वह बच्चा…

उसका अपना चेहरा लिए हुए।

अर्जुन की साँस जैसे उसके सीने में अटक गई।

“ये…”

उसके मुँह से सिर्फ इतना निकला।

“ये मैं हूँ?”

राधा ने कोई जवाब नहीं दिया।

उसका चेहरा बालों के पीछे छिपा था।

बच्चा उसकी गोद में बिल्कुल शांत था।

लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि बच्चा अर्जुन को देख रहा था।

और वह मुस्कुरा रहा था।

अर्जुन पीछे हट गया।

“नहीं…”

मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“अर्जुन, मेरी तरफ देखो।”

लेकिन अर्जुन की नजरें उस बच्चे से हट नहीं रही थीं।

“मीरा…”

“क्या?”

“वो मैं हूँ।”

“नहीं।”

“मैं उसे पहचानता हूँ।”

“तुम उसे पहचानते नहीं हो।”

मीरा ने उसका चेहरा अपनी तरफ कर दिया।

“तुम उसे याद कर रहे हो।”

अर्जुन ने कुछ समझा नहीं।

“याद?”

“हाँ।”

“लेकिन मैं तो…”

उसने पीछे मुड़कर फिर देखा।

वहाँ कोई नहीं था।

राधा गायब थी।

बच्चा गायब था।

सीढ़ियों पर सिर्फ अंधेरा था।

अर्जुन ने घबराकर चारों तरफ देखा।

“वो कहाँ गए?”

मीरा ने कोई जवाब नहीं दिया।

“मीरा!”

“मैंने भी देखा।”

अर्जुन उसकी तरफ मुड़ा।

“तुमने क्या देखा?”

मीरा की आँखें डरी हुई थीं।

“तुम।”

“मुझे?”

“हाँ।”

“मेरे जैसा बच्चा?”

मीरा ने धीरे से सिर हिलाया।

“लेकिन वो बच्चा तुम नहीं था।”

“तो कौन था?”

मीरा ने जवाब नहीं दिया।

उसी समय तीसरी मंज़िल से एक आवाज़ आई।

बहुत धीमी।

बहुत परिचित।

“गुड्डू…”

अर्जुन जम गया।

उस नाम ने उसके भीतर कुछ तोड़ दिया।

“पापा?”

मीरा ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

“ऊपर मत जाना।”

“लेकिन वो मेरे पापा हैं।”

“नहीं।”

“तुम हर बार यही कहती हो!”

अर्जुन की आवाज़ ऊँची हो गई।

“कभी कहती हो वो पापा नहीं हैं, कभी कहती हो वो राधा है, कभी कहती हो ये घर यादों से खेलता है। आखिर सच क्या है?”

मीरा चुप रही।

अर्जुन की आँखों में गुस्सा था।

“तुम मुझसे कुछ छिपा रही हो।”

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

“हाँ।”

अर्जुन बिल्कुल शांत हो गया।

“क्या?”

मीरा ने धीमे से कहा—

“तुम्हारे बारे में।”

कुछ सेकंड तक दोनों के बीच सिर्फ खामोशी थी।

ऊपर से बारिश की बूंदें छत पर पड़ रही थीं।

टिक…

टिक…

टिक…

घर की घड़ियाँ फिर चल रही थीं।

लेकिन इस बार उनकी सुइयाँ सही दिशा में थीं।

3:14।

3:15।

3:16।

अर्जुन ने घड़ी की तरफ देखा।

“तो 17 जुलाई 2008 अभी खत्म नहीं हुई?”

मीरा ने कहा—

“नहीं।”

“लेकिन साल 2023 है।”

“साल बदल गया।”

मीरा ने ऊपर देखा।

“घर नहीं बदला।”

अर्जुन ने पूछा—

“क्या मतलब?”

“इस घर में कुछ जगहें ऐसी हैं जहाँ समय एक साथ मौजूद रहता है।”

“2008 और 2023?”

“हाँ।”

“और 3:13?”

“वो दोनों को जोड़ता है।”

अर्जुन ने धीरे से कहा—

“तो जो मैंने अभी देखा…”

“वो 2008 की याद थी।”

“मेरी?”

“शायद।”

“या?”

मीरा ने उसकी आँखों में देखा।

“किसी और की।”

अर्जुन को अचानक चक्कर आया।

दीवार उसके सामने घूमने लगी।

उसने हाथ आगे बढ़ाकर रेलिंग पकड़ ली।

“अर्जुन!”

मीरा ने उसे संभाला।

लेकिन उसी पल अर्जुन की आँखों के सामने सब कुछ बदल गया।

वह शर्मा निवास में नहीं था।

वह एक पुराने कमरे में खड़ा था।

कमरे में हल्की पीली रोशनी थी।

खिड़की के बाहर बारिश हो रही थी।

और सामने…

एक आदमी बैठा था।

अर्जुन उसे पहचानता था।

विक्रम।

उसके पिता।

विक्रम की गोद में एक बच्चा था।

बच्चा रो रहा था।

विक्रम उसे शांत कर रहा था।

“गुड्डू…”

अर्जुन की आँखें फैल गईं।

“पापा…”

विक्रम ने उसकी तरफ देखा।

लेकिन जैसे वह अर्जुन को देख नहीं रहा था।

वह उस बच्चे को देख रहा था।

“तुझे कुछ याद नहीं रखना है।”

बच्चे ने रोना बंद कर दिया।

विक्रम ने उसके माथे पर हाथ रखा।

“जो कुछ भी तू देखे…”

वह फुसफुसाया।

“…उसे सपना समझना।”

अचानक कमरे के कोने में एक आवाज़ हुई।

किर्र…

किर्र…

किर्र…

विक्रम ने तुरंत सिर उठाया।

सामने दीवार पर एक आईना था।

आईने में विक्रम दिखाई दे रहा था।

बच्चा दिखाई दे रहा था।

लेकिन उनके पीछे…

एक और आदमी खड़ा था।

विक्रम ने बच्चे को कसकर पकड़ लिया।

“तू यहाँ कैसे आई?”

आईने में खड़ा आदमी मुस्कुराया।

उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

सिर्फ आँखें।

काली।

फिर उसने कहा—

“वादा भूल गए?”

विक्रम ने बच्चे को उठाया और कमरे से बाहर भागने की कोशिश की।

लेकिन दरवाज़ा बंद था।

आईने के अंदर का आदमी हँसने लगा।

“तुम्हारा बेटा…”

उसने कहा।

“…हमारा है।”

विक्रम ने बच्चे को अपनी छाती से लगा लिया।

“नहीं।”

“तुमने वचन दिया था।”

“मैंने अपना वचन बदल दिया।”

“वचन बदलते नहीं।”

“इंसान बदलते हैं।”

आईने में खड़ा आदमी धीरे-धीरे आगे आया।

“तुम्हारे पिता ने भी यही कहा था।”

विक्रम की आँखों में डर उतर आया।

“मेरे पिता?”

“उन्होंने भी सोचा था कि मुझे बंद कर सकते हैं।”

आईने में अचानक एक बूढ़े आदमी का चेहरा उभरा।

विक्रम पीछे हट गया।

फिर एक और चेहरा।

शारदा।

फिर राधा।

फिर मीरा।

फिर…

अर्जुन।

विक्रम ने आँखें बंद कर लीं।

“नहीं…”

आईने के अंदर से आवाज़ आई—

“तुम्हारा बेटा दरवाज़ा खोलेगा।”

विक्रम ने बच्चे को और कसकर पकड़ लिया।

“मैं उसे कभी नहीं खोलने दूँगा।”

“तुम नहीं रोक पाओगे।”

“मैं मर जाऊँगा।”

“तुम्हें मरना ही होगा।”

अचानक आईना टूट गया।

और अर्जुन की आँखें खुल गईं।

वह फिर सीढ़ियों पर था।

मीरा उसके सामने खड़ी थी।

“क्या हुआ?”

अर्जुन हाँफ रहा था।

“मैंने पापा को देखा।”

मीरा का चेहरा बदल गया।

“क्या देखा?”

“वो मुझे…”

वह रुक गया।

“नहीं।”

“क्या?”

“उन्होंने मुझे नहीं देखा।”

“किसे देखा?”

अर्जुन की आँखों में डर था।

“एक बच्चे को।”

मीरा ने धीरे से पूछा—

“किस बच्चे को?”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“मुझे।”

मीरा ने आँखें बंद कर लीं।

जैसे उसे पहले से इस बात का डर था।

“तो अब तुम्हें भी याद आने लगा है।”

दोनों नीचे वाले कमरे में गए।

मीरा ने दरवाज़ा बंद कर दिया।

अर्जुन ने पूछा—

“तुम्हें क्या पता है?”

“बहुत कुछ।”

“फिर आज सब बताओ।”

मीरा चुप रही।

“कोई आधी बात नहीं।”

“ठीक है।”

वह कुर्सी पर बैठ गई।

“लेकिन जो मैं बताऊँगी, उसके बाद शायद तुम इस घर को कभी पहले जैसा नहीं देख पाओगे।”

अर्जुन ने कहा—

“मैं पहले ही इसे पहले जैसा नहीं देखता।”

मीरा ने गहरी साँस ली।

“तुम्हारे पिता को 2008 में उस चीज़ के बारे में पहली बार पता नहीं चला था।”

“तो?”

“उन्हें बहुत पहले से पता था।”

“कितने पहले?”

“तुम्हारे जन्म से पहले।”

अर्जुन चौंक गया।

“क्या?”

“राधा ने उन्हें बताया था।”

“मेरी माँ को भी पता था?”

“तुम्हारी माँ को सब नहीं पता था। लेकिन उन्हें अंदाज़ा था कि तुम्हारे पिता कुछ छिपा रहे हैं।”

“और मेरी दादी?”

“वो सब जानती थीं।”

अर्जुन कुछ देर तक चुप रहा।

“फिर उन्होंने मुझे क्यों नहीं बताया?”

“क्योंकि तुम्हारे पिता ने मना किया था।”

“क्यों?”

मीरा ने कहा—

“क्योंकि तुम पैदा होने से पहले ही…”

वह रुक गई।

“क्या?”

“तुम्हारे जन्म के समय कुछ हुआ था।”

अर्जुन की धड़कन तेज़ हो गई।

“क्या?”

मीरा ने उसकी आँखों में देखा।

“तुम तीन मिनट तक साँस नहीं ले रहे थे।”

अर्जुन के चेहरे पर कोई भाव नहीं रहा।

“क्या?”

“जब तुम पैदा हुए थे।”

“मुझे ये कभी नहीं बताया गया।”

“क्योंकि तुम्हारे पिता ने कहा था कि किसी को नहीं बताना।”

“तीन मिनट?”

“हाँ।”

“और 3:13?”

मीरा ने सिर हिलाया।

“तुम्हारा जन्म समय था…”

वह रुक गई।

अर्जुन ने धीरे से पूछा—

“कितने बजे?”

मीरा ने जवाब दिया—

“रात के 3 बजकर 13 मिनट।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

अर्जुन ने घड़ी की तरफ देखा।

3:13।

फिर उसने तुरंत घड़ी उतारकर फर्श पर फेंक दी।

घड़ी टूट गई।

लेकिन उसकी सुइयाँ चलती रहीं।

3:13।

3:13।

3:13।

“ये संभव नहीं है।”

मीरा उसके पास आई।

“इसीलिए तुम्हारे पिता डरते थे।”

“मेरे जन्म और उस आईने का क्या संबंध है?”

“मुझे नहीं पता।”

“तुम झूठ बोल रही हो।”

“नहीं।”

“तुम्हें पता है।”

मीरा ने सिर झुका लिया।

“मुझे सिर्फ इतना पता है कि तुम्हारे जन्म के दिन राधा ने तुम्हारे पिता से कहा था…”

वह रुक गई।

“क्या?”

“कि बच्चा उस रात की निशानी है।”

अर्जुन ने पूछा—

“किस रात की?”

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

“17 जुलाई।”

अर्जुन की आँखों के सामने फिर अंधेरा छाने लगा।

“लेकिन मैं 1995 में पैदा हुआ था।”

“हाँ।”

“2008 से बहुत पहले।”

“हाँ।”

“तो 17 जुलाई 2008 से मेरा क्या संबंध?”

मीरा ने धीरे से कहा—

“शायद वो रात तुम्हारे जन्म से पहले शुरू हो चुकी थी।”

उसी समय घर के बाहर किसी ने दरवाज़ा खटखटाया।

ठक।

अर्जुन और मीरा दोनों चुप हो गए।

ठक।

इस बार आवाज़ मुख्य दरवाज़े से आई थी।

मीरा उठ खड़ी हुई।

“कौन हो सकता है?”

अर्जुन ने कहा—

“इस समय?”

घड़ी में 3:21 था।

ठक।

फिर दस्तक हुई।

मीरा ने सिर हिलाया।

“मत खोलना।”

अर्जुन ने कहा—

“मैं नहीं खोलूँगा।”

लेकिन तभी बाहर से एक महिला की आवाज़ आई।

“अर्जुन?”

दोनों जम गए।

वह आवाज़…

अर्जुन की माँ की थी।

“बेटा…”

अर्जुन ने तुरंत फोन उठाया।

उसने माँ को कॉल किया।

कुछ सेकंड बाद फोन उठ गया।

“हैलो?”

अर्जुन ने पूछा—

“माँ?”

दूसरी तरफ से उसकी माँ की आवाज़ आई।

“हाँ बेटा।”

अर्जुन की साँस रुक गई।

“आप कहाँ हैं?”

“अपने घर पर।”

“अभी?”

“हाँ।”

अर्जुन ने फोन कान से हटाया।

मुख्य दरवाज़े के बाहर वही आवाज़ फिर आई।

“अर्जुन…”

“बेटा…”

“दरवाज़ा खोलो।”

अर्जुन ने फोन की तरफ देखा।

फिर दरवाज़े की तरफ।

“माँ…”

फोन पर उसकी माँ ने पूछा—

“क्या हुआ?”

अर्जुन की आवाज़ काँपने लगी।

“आपके घर के बाहर…”

वह रुक गया।

“क्या?”

“कुछ नहीं।”

उसकी माँ कुछ समझ नहीं पाईं।

अर्जुन ने फोन काट दिया।

मीरा ने धीरे से कहा—

“अब तुम समझ गए?”

“वो उसकी आवाज़ भी बना सकती है।”

“हाँ।”

“लेकिन अभी तो…”

“हाँ।”

“वो यहाँ तक पहुँच चुकी है।”

अचानक दरवाज़े के नीचे से एक सफेद कागज़ अंदर सरका।

अर्जुन और मीरा दोनों पीछे हट गए।

कागज़ धीरे-धीरे फर्श पर रुक गया।

कुछ सेकंड तक कोई उसे छूने नहीं गया।

फिर मीरा ने चाँदी की घंटी उठाई और उसके पास गई।

उसने घंटी बजाई।

टन…

कुछ नहीं हुआ।

उसने कागज़ उठाया।

उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

“विक्रम ने तुम्हें नहीं बचाया था।”

अर्जुन ने कागज़ उससे ले लिया।

“फिर?”

नीचे दूसरी लाइन थी।

“उसने तुम्हें छिपाया था।”

अर्जुन की धड़कन तेज़ हो गई।

तीसरी लाइन—

“किससे?”

और उसके नीचे सिर्फ एक नाम।

“राधा।”

मीरा ने कागज़ उसके हाथ से छीन लिया।

उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

“ये नहीं हो सकता।”

“क्यों?”

“राधा तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचाना चाहती थी।”

“तुम्हें कैसे पता?”

“क्योंकि उसने…”

मीरा की आवाज़ टूट गई।

“उसने मुझे आखिरी बार यही कहा था।”

“क्या?”

मीरा की आँखों से आँसू निकल आए।

“अगर कभी अर्जुन वापस आए…”

वह बोली।

“…तो उसे मेरे पास मत आने देना।”

अर्जुन ने पूछा—

“क्यों?”

मीरा ने धीरे से कहा—

“क्योंकि राधा को डर था कि उसके अंदर कुछ ऐसा है…”

वह रुक गई।

“…जो उसे खुद से भी अलग नहीं कर पा रही थी।”

अर्जुन ने कागज़ फिर देखा।

“हमें राधा को ढूँढना होगा।”

“नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि अगर वो सच में यहाँ है…”

मीरा ने तीसरी मंज़िल की तरफ देखा।

“…तो वो हमें नहीं ढूँढ रही होगी।”

“फिर?”

“वो हमारा इंतज़ार कर रही होगी।”

दोनों ने सुबह तक इंतज़ार किया।

सूरज निकलने के बाद तीसरी मंज़िल पर जाने का फैसला किया।

इस बार उन्होंने अकेले नहीं जाना था।

अर्जुन ने दादी की पुरानी डायरी साथ रखी।

मीरा ने चाँदी की घंटी।

और अर्जुन ने वह तस्वीर जिसमें राधा दिखाई दे रही थी।

तीसरी मंज़िल का कमरा अब पहले से अलग था।

टूटा हुआ आईना गायब था।

जहाँ आईना खड़ा था, वहाँ सिर्फ काली दीवार थी।

अर्जुन ने हाथ लगाया।

दीवार ठंडी थी।

“आईना कहाँ गया?”

मीरा ने कहा—

“आईना कभी टूटा ही नहीं था।”

“लेकिन हमने…”

“हमने उसका प्रतिबिंब तोड़ा था।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“क्या फर्क है?”

“बहुत।”

मीरा ने दीवार पर एक निशान खोजा।

फिर उसने राख हटाई।

नीचे एक गोल आकृति बनी हुई थी।

उसके बीच वही तीन अंक थे—

313।

अर्जुन ने पूछा—

“ये क्या है?”

“सील।”

“तो इसे खोलेंगे कैसे?”

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

“हम नहीं खोलेंगे।”

“क्यों?”

“इसे खोलने वाला पहले से तय है।”

अर्जुन के चेहरे पर तनाव आ गया।

“कौन?”

मीरा ने उसकी तरफ इशारा किया।

“तुम।”

अर्जुन ने कुछ नहीं कहा।

मीरा ने उसे गोल निशान के बीच खड़ा किया।

“अपना हाथ आगे करो।”

“क्यों?”

“करो।”

अर्जुन ने हाथ आगे किया।

मीरा ने उसकी हथेली उस निशान पर रख दी।

पहले कुछ नहीं हुआ।

फिर…

दीवार के भीतर से हल्की धड़कन सुनाई दी।

धक…

धक…

धक…

जैसे दीवार के पीछे किसी का दिल धड़क रहा हो।

अर्जुन ने हाथ हटाने की कोशिश की।

लेकिन उसकी हथेली दीवार से चिपक गई।

“मीरा!”

“डरो मत!”

“मेरा हाथ नहीं निकल रहा!”

दीवार गर्म होने लगी।

उसकी हथेली पर हल्की जलन हुई।

फिर काले निशान उसकी त्वचा पर फैलने लगे।

अर्जुन चीखा।

“इसे हटाओ!”

मीरा ने घंटी बजाई।

टन!

निशान कुछ पल के लिए रुके।

लेकिन फिर और तेजी से फैलने लगे।

दीवार के अंदर से आवाज़ आई—

“अर्जुन…”

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

“अर्जुन…”

“मत सुनो!”

मीरा चिल्लाई।

लेकिन आवाज़ बदल गई।

अब वह राधा की थी।

“बेटा…”

अर्जुन ने आँखें खोल दीं।

दीवार के भीतर एक चेहरा उभर आया।

एक औरत का चेहरा।

राधा।

वह रो रही थी।

“अर्जुन…”

“माँ?”

मीरा पीछे हट गई।

राधा ने दीवार के भीतर से हाथ बढ़ाया।

“मुझे बाहर निकालो।”

अर्जुन ने हाथ उसकी तरफ बढ़ाया।

मीरा ने उसे रोक लिया।

“नहीं!”

“वो मेरी माँ है!”

“नहीं!”

“तुम कैसे…”

मीरा चीखी—

“क्योंकि राधा ने कभी तुम्हें बेटा नहीं कहा था!”

अर्जुन रुक गया।

दीवार के भीतर राधा का चेहरा धीरे-धीरे बदलने लगा।

उसकी आँखें काली हो गईं।

होंठों पर मुस्कान आ गई।

“मीरा…”

अब आवाज़ राधा की नहीं थी।

वह उसी काली आँखों वाली परछाईं की आवाज़ थी।

“तुम अभी भी मुझे पहचान नहीं पाईं।”

मीरा का चेहरा जम गया।

“तुम…”

परछाईं मुस्कुराई।

“तुम्हें लगता है मैं तुम्हारी माँ हूँ?”

उसने अर्जुन की तरफ देखा।

“या तुम्हें लगता है मैं तुम्हारे पिता हूँ?”

फिर उसने अपना चेहरा बदल लिया।

विक्रम।

फिर शारदा।

फिर अर्जुन की माँ।

फिर…

अर्जुन खुद।

“मैं कोई नहीं हूँ।”

उसने कहा।

“मैं वो हूँ…”

उसकी आवाज़ गूँजी।

“…जो तुम सबके जाने के बाद बच जाता है।”

अर्जुन ने पूछा—

“तुम क्या चाहती हो?”

परछाईं मुस्कुराई।

“सिर्फ अपना घर।”

“ये तुम्हारा घर नहीं है।”

“है।”

दीवार पर अचानक पुराने अक्षर उभर आए।

“जिसका प्रतिबिंब नहीं होता, वही असली मालिक है।”

अर्जुन ने पढ़ा।

“इसका मतलब?”

मीरा ने फुसफुसाकर कहा—

“जिसका प्रतिबिंब नहीं होता…”

वह रुक गई।

“वो?”

परछाईं ने जवाब दिया—

“वो जिसे तुमने कभी इंसान समझा ही नहीं।”

अचानक कमरे में जोरदार हवा चली।

दीवार का निशान टूट गया।

अर्जुन की हथेली आज़ाद हो गई।

वह पीछे गिर पड़ा।

मीरा ने उसे संभाला।

लेकिन दीवार पर अब एक दरवाज़ा दिखाई दे रहा था।

पहले वहाँ कुछ नहीं था।

अब एक काला दरवाज़ा था।

उस पर कोई हैंडल नहीं था।

सिर्फ एक छोटा सा गोल छेद।

और उसके नीचे लिखा था—

“17 जुलाई 2008”

अर्जुन ने धीरे से कहा—

“ये दरवाज़ा कहाँ जाता है?”

मीरा ने जवाब दिया—

“उस रात में।”

“क्या?”

“उस जगह जहाँ से सब शुरू हुआ।”

अर्जुन ने दरवाज़े को देखा।

“क्या हम अंदर जा सकते हैं?”

मीरा ने सिर हिलाया।

“शायद।”

“फिर?”

“अगर अंदर गए…”

वह कुछ पल रुकी।

“…तो वापस आने की गारंटी नहीं है।”

अर्जुन ने कहा—

“मुझे अपने पिता का सच जानना है।”

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

“और अगर तुम्हें पता चला कि तुम्हारे पिता ने जो किया…”

वह रुक गई।

“…वो तुम्हें बचाने के लिए नहीं था?”

अर्जुन ने जवाब नहीं दिया।

उसने हाथ बढ़ाया।

दरवाज़े पर रखा।

और जैसे ही उसकी उंगलियाँ दरवाज़े को छुईं—

पूरा घर काँप उठा।

नीचे से घंटियाँ बजने लगीं।

खिड़कियाँ अपने आप खुल गईं।

दीवारों से आवाज़ें निकलने लगीं।

“अर्जुन…”

“अर्जुन…”

“अर्जुन…”

फिर अचानक…

एक बच्ची की आवाज़ आई।

बहुत साफ।

बहुत करीब।

“भैया…”

मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया।

“ये…”

अर्जुन ने पूछा—

“क्या हुआ?”

मीरा ने धीरे-धीरे पीछे देखा।

कमरे के कोने में एक छोटी बच्ची खड़ी थी।

दस साल की।

सफेद फ्रॉक।

भीगे बाल।

और हाथ में…

चाँदी की घंटी।

मीरा ने उसे देखते ही फुसफुसाया—

“नहीं…”

अर्जुन ने पूछा—

“कौन है?”

बच्ची मुस्कुराई।

फिर उसने मीरा की तरफ देखा।

“तुमने उसे अभी तक नहीं बताया?”

मीरा पीछे हट गई।

“मीरा?”

बच्ची ने अर्जुन की तरफ देखा।

“तुम्हें सच जानना है ना?”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

बच्ची ने हाथ उठाकर काले दरवाज़े की तरफ इशारा किया।

“तो अंदर जाओ।”

“क्यों?”

बच्ची की मुस्कान गायब हो गई।

उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—

“क्योंकि वहाँ तुम्हारे पिता नहीं हैं।”

अर्जुन का चेहरा बदल गया।

“फिर कौन है?”

बच्ची ने जवाब दिया—

“तुम्हारे पिता की मौत के बाद…”

वह एक कदम आगे बढ़ी।

“…जो उनके अंदर आया था।”

मीरा ने काँपते हुए पूछा—

“तुम कौन हो?”

बच्ची ने उसकी तरफ देखा।

फिर अपनी उंगली होंठों पर रखी।

“श्श्श…”

और मुस्कुराकर कहा—

“मैं वो मीरा हूँ…”

उसकी काली आँखें चमक उठीं।

“…जो 17 जुलाई 2008 को गायब हुई थी।”

अर्जुन की साँस रुक गई।

सामने खड़ी मीरा पीछे हट गई।

दोनों एक-दूसरे को देखने लगीं।

एक जीवित।

एक जैसी।

और फिर…

काले दरवाज़े के पीछे से विक्रम की आवाज़ आई—

“अर्जुन…”

“अगर सच में अपने पिता को ढूँढना है…”

दरवाज़ा अपने आप खुलने लगा।

अंदर सिर्फ अंधेरा था।

और उस अंधेरे में…

एक घड़ी लटकी थी।

उसकी सुइयाँ चल रही थीं।

3:13…

और उसके ठीक नीचे…

एक आदमी खड़ा था।

उसने धीरे-धीरे अपना चेहरा ऊपर उठाया।

अर्जुन ने उसे देखा।

वह विक्रम था।

लेकिन उसके चेहरे पर मुस्कान थी।

और उसकी आँखें…

पूरी तरह काली थीं।

उसने कहा—

“बेटा… बहुत देर कर दी।”

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