Pretika › Ghost Stories › “अंधेरे में कोई है”
एपिसोड 3: राधा की आखिरी रात
firoj saifi · Ghost Stories · 19 मिनट
- Writer
- firoj saifi
- Story
- “अंधेरे में कोई है”
- Chapter
- 3 of 3
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 19 min
- Words
- 3756
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
“दूसरी दस्तक शुरू हो चुकी है…”
फुसफुसाहट अर्जुन के कान के बिल्कुल पास हुई थी।
इतनी पास कि उसे उस आवाज़ की ठंडी साँस तक महसूस हुई।
अर्जुन की उंगलियाँ काँप रही थीं।
जिस हाथ को उसने मीरा समझकर पकड़ा था, वह हाथ इंसान का नहीं था।
उंगलियाँ लंबी थीं।
असामान्य रूप से लंबी।
और उसकी त्वचा बर्फ जैसी ठंडी थी।
अर्जुन ने घबराकर हाथ छोड़ दिया।
“मीरा!”
अंधेरे में कोई जवाब नहीं आया।
सिर्फ एक धीमी हँसी सुनाई दी।
फिर…
टन…
टन…
टन…
मीरा की चाँदी की घंटी अपने आप बजने लगी।
एक बार।
दो बार।
तीन बार।
हर बार घंटी की आवाज़ के साथ कमरे का अंधेरा कुछ कम होता गया।
और फिर अर्जुन ने देखा—
उसके सामने मीरा खड़ी थी।
वही मीरा।
लेकिन उसके पीछे…
वही काली आँखों वाली लड़की भी खड़ी थी।
अर्जुन के गले से आवाज़ नहीं निकली।
दोनों एक जैसी थीं।
एकदम एक जैसी।
एक ही चेहरा।
एक ही बाल।
एक ही कपड़े।
लेकिन एक की आँखों में इंसानी डर था।
दूसरी की आँखों में कुछ भी नहीं।
सिर्फ गहरा अंधेरा।
मीरा ने काँपती आवाज़ में कहा—
“अर्जुन… मेरी तरफ देखो।”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“सिर्फ मेरी तरफ।”
“लेकिन वो…”
“उसकी तरफ मत देखना।”
अर्जुन ने सिर हिलाया।
तभी पीछे से वही आवाज़ आई—
“अर्जुन…”
इस बार आवाज़ उसकी दादी की थी।
“बेटा…”
अर्जुन की आँखें बंद हो गईं।
“मत सुनो।”
मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“ये तुम्हें तुम्हारी यादों से बुलाएगी।”
पीछे से आवाज़ फिर आई।
“बेटा, मैं हूँ…”
अर्जुन के मन में दादी का चेहरा उभर आया।
सफेद बाल।
माथे पर बड़ी लाल बिंदी।
वही शांत आँखें।
वही आवाज़।
“अर्जुन…”
उसकी आँखों से आँसू निकल आए।
“दादी…”
मीरा ने तुरंत उसका चेहरा अपनी तरफ कर दिया।
“वो तुम्हारी दादी नहीं है।”
“लेकिन आवाज़…”
“आवाज़ उसकी हो सकती है।”
अर्जुन ने पहली बार महसूस किया कि इस घर में सबसे खतरनाक चीज़ वह नहीं थी जो दिखाई देती थी।
सबसे खतरनाक चीज़ थी—
वह जो इंसानों की यादों को इस्तेमाल करना जानती थी।
अचानक कमरे की टूटी खिड़की से तेज़ हवा अंदर आई।
दीवारों पर बने काले निशान चमकने लगे।
एक-एक करके।
लाल रोशनी में।
मीरा ने फौरन अपनी घंटी उठाई।
“हमें यहाँ से निकलना होगा।”
“दरवाज़ा बंद है।”
“दरवाज़ा नहीं…”
मीरा ने कमरे के कोने की तरफ देखा।
“…रास्ता बंद है।”
अर्जुन ने उसकी बात नहीं समझी।
“क्या मतलब?”
मीरा फर्श पर बैठ गई।
उसने टूटे आईने के बीच हाथ डालकर एक लोहे की छोटी सी चाबी निकाली।
“ये क्या है?”
“दादी ने मुझे दी थी।”
“कब?”
“उस रात।”
“17 जुलाई 2008 को?”
मीरा ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
अर्जुन ने चाबी को गौर से देखा।
उस पर एक छोटा सा निशान बना था।
एक गोल घेरा…
और उसके बीच तीन अंक—
313
अर्जुन का दिल धड़क उठा।
“3:13…”
मीरा ने कहा—
“ये समय नहीं है।”
“फिर?”
“ये दरवाज़ा है।”
अर्जुन उसकी तरफ देखने लगा।
“कौन-सा दरवाज़ा?”
मीरा ने कमरे की पिछली दीवार की ओर इशारा किया।
वहाँ दीवार पर पुराने लकड़ी के पैनल लगे थे।
अर्जुन ने पहले उन्हें देखा ही नहीं था।
मीरा ने एक पैनल पर हाथ रखा।
फिर चाबी उसमें लगा दी।
चाबी घूमी।
क्लिक!
दीवार धीरे-धीरे पीछे की तरफ खिसक गई।
अंदर एक संकरी सीढ़ी थी।
सीढ़ियाँ नीचे जा रही थीं।
बहुत नीचे।
इतनी नीचे कि उनकी आखिरी सीढ़ी दिखाई नहीं दे रही थी।
अर्जुन ने पूछा—
“ये रास्ता कहाँ जाता है?”
मीरा ने कहा—
“तुम्हारे परिवार के उस हिस्से में…”
वह रुकी।
“…जिसके बारे में किसी ने तुम्हें कभी नहीं बताया।”
दोनों सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे।
पीछे तीसरी मंज़िल का कमरा धीरे-धीरे अंधेरे में डूब गया।
अर्जुन ने एक बार पीछे देखने की कोशिश की।
मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मत देखो।”
“क्यों?”
“क्योंकि अगर वो तुम्हें देख लेगी…”
“तो?”
“फिर वो सिर्फ आवाज़ नहीं बनेगी।”
अर्जुन ने कुछ नहीं पूछा।
सीढ़ियाँ लगातार नीचे जा रही थीं।
एक मंज़िल।
दो मंज़िल।
फिर भी सीढ़ियाँ खत्म नहीं हुईं।
“ये घर इतना बड़ा तो नहीं है।”
“जो ऊपर दिखाई देता है…”
मीरा ने धीरे से कहा।
“…वो पूरा घर नहीं है।”
अर्जुन रुक गया।
“क्या?”
“शर्मा निवास के नीचे एक और हिस्सा है।”
“मेरी दादी ने कभी बताया नहीं।”
“क्योंकि वो चाहती थीं कि तुम कभी यहाँ तक न पहुँचो।”
“और तुम?”
“मैं चाहती हूँ कि तुम सच जानो।”
“क्यों?”
मीरा कुछ देर चुप रही।
“क्योंकि अब समय खत्म हो रहा है।”
“किसका?”
मीरा ने जवाब नहीं दिया।
सीढ़ियों के नीचे पहुँचकर दोनों एक बड़े पत्थर के दरवाज़े के सामने खड़े थे।
दरवाज़े पर वही तीन अंक बने थे—
313।
मीरा ने उसे धक्का दिया।
दरवाज़ा नहीं खुला।
अर्जुन ने पूछा—
“चाबी?”
“नहीं।”
“फिर?”
मीरा ने अपनी हथेली दरवाज़े पर रख दी।
कुछ सेकंड तक कुछ नहीं हुआ।
फिर अंदर से…
ठक।
दोनों पीछे हट गए।
ठक।
दूसरी दस्तक।
मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया।
ठक।
तीसरी दस्तक।
अर्जुन ने धीरे से पूछा—
“किसने दस्तक दी?”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हें याद है दादी ने क्या कहा था?”
अर्जुन को माँ की बात याद आई।
“अंधेरा होने के बाद अगर कोई आवाज़ दे… जवाब मत देना।”
लेकिन मीरा ने जोड़ा—
“दादी ने एक बात और कही थी।”
“क्या?”
“अगर अंदर से तीन बार दस्तक हो…”
वह दरवाज़े से पीछे हट गई।
“…तो दरवाज़ा कभी मत खोलना।”
अर्जुन ने पूछा—
“क्यों?”
मीरा की आँखें दरवाज़े पर थीं।
“क्योंकि तीसरी दस्तक के बाद…”
अंदर से फिर आवाज़ आई।
ठक।
“…वो खुद बाहर नहीं आती।”
अर्जुन की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।
“तो?”
मीरा ने फुसफुसाकर कहा—
“किसी को अंदर जाना पड़ता है।”
उसी समय ऊपर से एक आवाज़ गूँजी।
“अर्जुन!”
दोनों ने ऊपर देखा।
वह आवाज़ मीरा की थी।
लेकिन मीरा तो उसके सामने खड़ी थी।
ऊपर से फिर आवाज़ आई—
“अर्जुन, मुझे छोड़कर मत जाओ!”
अर्जुन का चेहरा बदल गया।
“वो ऊपर है…”
मीरा ने कहा—
“नहीं।”
“लेकिन…”
“जो हमारे साथ नीचे आया था…”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“क्या?”
मीरा ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
“हम दोनों अकेले नीचे नहीं आए।”
अर्जुन ने सीढ़ियों की तरफ देखा।
ऊपर अंधेरा था।
फिर उसे कुछ दिखाई दिया।
सीढ़ियों के मोड़ पर…
एक लड़की खड़ी थी।
मीरा जैसी।
उसके हाथ में चाँदी की घंटी थी।
वह मुस्कुरा रही थी।
“अर्जुन…”
उसने कहा।
“मैं यहाँ हूँ।”
अर्जुन पीछे हट गया।
सामने वाली मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मेरी बात सुनो।”
“वो कौन है?”
“मेरी परछाई।”
“परछाई?”
“हाँ।”
“परछाई इंसान जैसी कैसे…”
मीरा ने उसे रोक दिया।
“मत पूछो।”
ऊपर खड़ी लड़की धीरे-धीरे सीढ़ियों से उतरने लगी।
हर कदम पर उसकी घंटी बज रही थी।
टन…
टन…
टन…
वह मुस्कुरा रही थी।
लेकिन उसकी आँखें अब पहले से भी ज्यादा काली थीं।
“अर्जुन…”
“मेरी बात सुनो…”
“उसकी मत सुनना।”
“मैं ही असली मीरा हूँ।”
ऊपर वाली लड़की हँसी।
“उसे पूछो…”
वह बोली।
“कि 17 जुलाई की रात वो कहाँ थी।”
मीरा का चेहरा बदल गया।
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“तुम कहाँ थीं?”
मीरा चुप रही।
ऊपर वाली लड़की हँसती रही।
“पूछो उससे।”
अर्जुन ने फिर पूछा—
“मीरा?”
उसने धीरे से सिर झुका लिया।
“मैं…”
वह रुक गई।
“मैं उस रात तुम्हें बचाने गई थी।”
“कहाँ?”
“तीसरी मंज़िल पर।”
“फिर?”
“तुम्हारे पिता पहले से वहाँ थे।”
अर्जुन का चेहरा सख्त हो गया।
“मेरे पापा?”
“हाँ।”
“वो वहाँ क्यों थे?”
मीरा ने कहा—
“क्योंकि उन्हें पता चल गया था कि राधा वापस आ गई है।”
अर्जुन ने पहली बार यह नाम उसके मुँह से सुना।
“राधा?”
मीरा की आँखों में आँसू आ गए।
“मेरी माँ।”
कुछ देर तक वहाँ सिर्फ बारिश की आवाज़ सुनाई देती रही।
फिर मीरा ने बोलना शुरू किया।
“मेरी माँ का नाम राधा था।”
“वो इस घर में काम करती थीं?”
“सबको यही बताया गया था।”
“लेकिन?”
“वो सिर्फ काम करने वाली नहीं थीं।”
मीरा ने पत्थर की दीवार से टिकते हुए कहा—
“वो तुम्हारी दादी की सबसे करीबी दोस्त थीं।”
अर्जुन ध्यान से सुन रहा था।
“मेरी दादी और तुम्हारी माँ की दोस्ती कैसे हुई?”
“बहुत साल पहले।”
“कब?”
“जब तुम्हारी दादी बहुत छोटी थीं।”
अर्जुन ने चौंककर देखा।
“इतनी पुरानी?”
“हाँ।”
“और उस आईने का क्या संबंध था?”
मीरा ने कुछ देर चुप रहने के बाद कहा—
“राधा उस आईने को जानती थीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि वह आईना उनके परिवार का था।”
अर्जुन ने धीरे से पूछा—
“क्या?”
“राधा की माँ भी उसी चीज़ की वजह से मरी थीं।”
अर्जुन की साँस रुक गई।
“मतलब?”
“उनके परिवार में एक मान्यता थी।”
“कैसी?”
“कि कुछ लोग मरने के बाद चले नहीं जाते।”
“भूत?”
“नहीं।”
मीरा ने सिर हिलाया।
“भूत नहीं।”
“फिर?”
“उनकी परछाईं रह जाती है।”
अर्जुन ने उसे घूरकर देखा।
“परछाईं?”
“ऐसी परछाईं जो इंसान की शक्ल ले सकती है।”
“और आवाज़ भी?”
“हाँ।”
“यादें भी?”
“हाँ।”
“तो वो क्या चाहती है?”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
“जीना।”
अर्जुन को अचानक समझ आया कि उस काली आँखों वाली लड़की ने बार-बार उसका नाम क्यों लिया था।
“लेकिन वो मुझे क्यों चाहती है?”
मीरा ने जवाब नहीं दिया।
“मीरा।”
“क्योंकि…”
वह रुक गई।
“तुम्हारे परिवार में एक चीज़ है जो उसे चाहिए।”
“क्या?”
“खून।”
अर्जुन का चेहरा बदल गया।
“मेरा?”
मीरा ने धीरे से सिर हिलाया।
“तुम्हारे पिता ने उसे रोकने के लिए एक वचन दिया था।”
“क्या वचन?”
“कि वो अपनी अगली पीढ़ी में से किसी एक को उसके पास भेजेगा।”
अर्जुन पीछे हट गया।
“नहीं।”
“तुम्हारे पिता ने तुम्हें बचाने की कोशिश की थी।”
“फिर वो मर क्यों गए?”
मीरा की आँखें झुक गईं।
“क्योंकि उन्होंने वचन तोड़ दिया।”
अर्जुन की आवाज़ काँप गई।
“कैसे?”
“उन्होंने तुम्हें गाँव से दूर भेज दिया।”
“और?”
“फिर खुद तीसरी मंज़िल पर गए।”
“17 जुलाई को?”
“हाँ।”
“वहाँ क्या हुआ?”
मीरा ने आँखें बंद कर लीं।
“मैंने सब देखा था।”
17 जुलाई 2008
उस रात देवगढ़ में बहुत तेज़ बारिश हुई थी।
बिजली बार-बार चमक रही थी।
शर्मा निवास के अंदर सभी खिड़कियाँ बंद थीं।
तुम्हारी दादी पूजा के कमरे में बैठी थीं।
तुम्हारे पिता तीसरी मंज़िल की सीढ़ियों के सामने खड़े थे।
और मैं…
मैं छिपकर उन्हें देख रही थी।
तुम उस समय घर में नहीं थे।
तुम्हारी माँ तुम्हें लेकर शहर गई थीं।
तुम्हारे पिता ने दादी से कहा—
“आज इसे खत्म करना होगा।”
दादी ने पूछा—
“अगर तुम असफल हुए तो?”
उन्होंने जवाब दिया—
“तो अर्जुन को कभी वापस मत आने देना।”
दादी रो पड़ी थीं।
“वो तुम्हारा बेटा है।”
तुम्हारे पिता ने कहा—
“इसीलिए तो।”
फिर उन्होंने तीसरी मंज़िल का दरवाज़ा खोला।
मैं उनके पीछे चली गई।
अंदर वही आईना था।
काला कपड़ा उसके ऊपर पड़ा था।
तुम्हारे पिता ने कपड़ा हटाया।
आईने में उनका चेहरा नहीं था।
उसमें…
एक औरत खड़ी थी।
राधा।
मेरी माँ।
लेकिन वो मेरी माँ जैसी नहीं दिख रही थी।
उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।
उसने तुम्हारे पिता से कहा—
“तुमने मुझे बहुत देर तक रोका।”
तुम्हारे पिता ने कहा—
“तुम राधा नहीं हो।”
वो हँसी।
“तुम्हें लगता है तुम मुझे पहचानते हो?”
तुम्हारे पिता ने मंत्र पढ़ना शुरू किया।
दादी नीचे से घंटी बजा रही थीं।
और मैं दरवाज़े के पीछे छिपी हुई थी।
अचानक आईने में राधा का चेहरा बदलने लगा।
कभी मेरी माँ।
कभी तुम्हारी दादी।
कभी तुम्हारी माँ।
और फिर…
तुम।
तुम्हारे पिता रुक गए।
उन्होंने तुम्हें आईने में देखा।
“अर्जुन?”
आईने में तुम रो रहे थे।
“पापा…”
तुम्हारे पिता एक कदम आगे बढ़े।
तभी दादी चिल्लाईं—
“पीछे हटो!”
लेकिन देर हो चुकी थी।
आईने से एक हाथ बाहर आया।
उसने तुम्हारे पिता का गला पकड़ लिया।
मैं डरकर चीख पड़ी।
तुम्हारे पिता ने मेरी तरफ देखा।
उन्होंने सिर्फ एक बात कही—
“मीरा… अर्जुन को कभी यहाँ मत आने देना।”
फिर आईना टूट गया।
लेकिन तुम्हारे पिता…
गायब हो गए।
मीरा की कहानी सुनते हुए अर्जुन बिल्कुल स्थिर खड़ा था।
“गायब?”
“हाँ।”
“लेकिन मेरी माँ ने कहा था कि उनकी मौत हुई थी।”
“लाश मिली थी?”
अर्जुन चुप हो गया।
उसे याद नहीं था।
उसके पिता की मौत के बारे में घर में कभी ज्यादा बात नहीं होती थी।
बस इतना कहा गया था कि दुर्घटना हुई थी।
“उनकी लाश…”
मीरा ने पूछा।
“क्या तुमने कभी देखी थी?”
अर्जुन ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
मीरा ने कहा—
“क्योंकि तुम्हारे पिता की मौत वैसी नहीं थी जैसी तुम्हें बताई गई।”
अर्जुन ने दीवार पर हाथ रख दिया।
“फिर वो कहाँ गए?”
मीरा ने सामने वाले पत्थर के दरवाज़े की तरफ देखा।
“शायद…”
वह धीरे से बोली।
“…वहीं जहाँ राधा गई थी।”
उसी समय पत्थर के दरवाज़े के पीछे से आवाज़ आई।
एक पुरुष की आवाज़।
बहुत कमजोर।
बहुत दूर से आती हुई।
“अर्जुन…”
अर्जुन का शरीर सुन्न हो गया।
“पापा?”
मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“नहीं!”
लेकिन इस बार आवाज़ फिर आई।
“बेटा…”
“मैं हूँ।”
अर्जुन की आँखों में आँसू आ गए।
“ये…”
“मत खोलना।”
“लेकिन अगर वो सच में…”
“अर्जुन!”
मीरा ने पहली बार उस पर जोर से चिल्लाया।
“अगर वो सच में तुम्हारे पिता हैं…”
वह दरवाज़े के करीब गई।
“…तो वो तुम्हें अपना बचपन का नाम बताएँगे।”
अर्जुन ने चौंककर देखा।
“मेरा बचपन का नाम?”
“हाँ।”
“वो क्या था?”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हारे पिता तुम्हें ‘गुड्डू’ कहते थे।”
अर्जुन की आँखें भर आईं।
दरवाज़े के पीछे से आवाज़ फिर आई।
“अर्जुन…”
मीरा ने कहा—
“पूछो।”
अर्जुन ने काँपते हुए दरवाज़े के पास जाकर कहा—
“पापा…”
कुछ सेकंड तक कोई जवाब नहीं आया।
फिर आवाज़ आई—
“हाँ बेटा…”
अर्जुन ने पूछा—
“आप मुझे बचपन में क्या बुलाते थे?”
खामोशी।
एक लंबी खामोशी।
फिर दरवाज़े के पीछे से आवाज़ आई—
“अर्जुन।”
मीरा ने आँखें बंद कर लीं।
“भागो।”
अर्जुन पीछे हट गया।
अंदर से अचानक जोर-जोर से दरवाज़ा पीटा जाने लगा।
धड़ाम!
धड़ाम!
धड़ाम!
“अर्जुन!”
इस बार आवाज़ उसके पिता की नहीं थी।
वह कई आवाज़ों का मिश्रण थी।
उसकी माँ।
दादी।
पिता।
मीरा।
और फिर…
अर्जुन की अपनी आवाज़।
“दरवाज़ा खोलो!”
दोनों सीढ़ियों की तरफ भागे।
ऊपर वाली नकली मीरा गायब हो चुकी थी।
लेकिन सीढ़ियों के हर मोड़ पर अब छोटे-छोटे हाथों के निशान दिखाई दे रहे थे।
जैसे किसी बच्चे ने गीली मिट्टी में हाथ रखकर दीवार पर छाप छोड़ी हो।
अर्जुन ने एक निशान को छुआ।
वह गर्म था।
“मीरा…”
“मत छूना।”
लेकिन देर हो चुकी थी।
दीवार के अंदर से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आई।
“मुझे बाहर निकालो…”
अर्जुन जम गया।
“बच्चा?”
मीरा ने उसे खींचा।
“ये घर तुम्हारी दया को भी तुम्हारे खिलाफ इस्तेमाल करता है।”
“लेकिन वो बच्चा…”
“वो बच्चा नहीं है।”
“तुम्हें कैसे पता?”
“क्योंकि मैंने उसे पहले भी सुना है।”
“कब?”
“17 जुलाई 2008 को।”
ऊपर पहुँचते ही दोनों तीसरी मंज़िल के कमरे में वापस आ गए।
टूटा हुआ आईना अब पूरी तरह शांत था।
फर्श पर बिखरे काँच के टुकड़ों में कमरे की अलग-अलग तस्वीरें दिखाई दे रही थीं।
कहीं अर्जुन खड़ा था।
कहीं मीरा।
कहीं उसके पिता।
और एक टुकड़े में…
राधा।
अर्जुन नीचे बैठ गया।
उसने काँच का एक टुकड़ा उठाया।
उसमें एक दृश्य चल रहा था।
जैसे कोई पुरानी फिल्म।
एक छोटी बच्ची मीरा आँगन में खेल रही थी।
उसके पीछे एक औरत खड़ी थी।
राधा।
मीरा ने पलटकर कहा—
“माँ!”
राधा मुस्कुराईं।
फिर दृश्य बदल गया।
राधा किसी कमरे में अकेली बैठी थीं।
सामने वही आईना।
वह रो रही थीं।
और आईने में कोई उन्हें देख रहा था।
फिर तीसरा दृश्य आया।
राधा ने आईने के सामने खड़े होकर कहा—
“अगर मैं कभी बदल जाऊँ…”
वह रोते हुए बोलीं—
“तो मीरा को मेरे पास मत आने देना।”
दृश्य अचानक बंद हो गया।
अर्जुन ने काँच गिरा दिया।
“मेरी माँ को ये सब पता था?”
मीरा ने कहा—
“तुम्हारी माँ को सिर्फ कुछ बातें पता थीं।”
“और दादी?”
“सब।”
अर्जुन ने पूछा—
“फिर उन्होंने मुझे कभी क्यों नहीं बताया?”
मीरा की आवाज़ टूट गई।
“क्योंकि तुम्हारे पिता ने उनसे वादा लिया था।”
“क्या?”
“कि अगर कभी वो चीज़ वापस आए…”
वह रुकी।
“…तो तुम्हें दूर रखा जाएगा।”
अर्जुन ने धीरे से कहा—
“लेकिन मैं वापस आ गया।”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
“हाँ।”
“क्यों?”
“क्योंकि…”
मीरा की आँखों में डर भर गया।
“तुम्हारी दादी की मौत के बाद तीसरी मंज़िल की मुहर टूट गई।”
अर्जुन का चेहरा सफेद पड़ गया।
“मतलब…”
“तुम्हारा वापस आना संयोग नहीं था।”
“फिर किसने बुलाया?”
मीरा ने जवाब नहीं दिया।
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“मीरा।”
मीरा ने बहुत धीमे से कहा—
“तुम्हारी दादी ने।”
“लेकिन वो मर चुकी थीं।”
“मरने से पहले उन्होंने मुझे एक चिट्ठी दी थी।”
“कहाँ है?”
मीरा ने अपनी जेब से एक मुड़ा हुआ कागज़ निकाला।
अर्जुन ने उसे खोला।
दादी की लिखावट थी।
सिर्फ दो लाइनें।
“अर्जुन को वापस बुलाना।
वक्त आ गया है कि उसे पता चले कि उसके पिता की मौत क्यों हुई।”
अर्जुन की आँखें उस कागज़ पर टिक गईं।
“तुमने मुझे पहले क्यों नहीं दिया?”
“क्योंकि मुझे यकीन नहीं था कि तुम तैयार हो।”
“और अब?”
मीरा ने तीसरी मंज़िल की टूटी दीवार की तरफ देखा।
“अब उसके पास तुम्हारी खुशबू पहुँच चुकी है।”
“क्या मतलब?”
“अब वो तुम्हें ढूँढ सकती है।”
रात फिर उतरने लगी।
बारिश रुक चुकी थी।
पूरा देवगढ़ अजीब खामोशी में डूब गया।
अर्जुन ने घर की सभी खिड़कियाँ बंद कर दीं।
लेकिन उसे पता था कि अब दरवाज़े और खिड़कियाँ किसी काम के नहीं थे।
जो चीज़ जाग चुकी थी…
वह दीवारों के भीतर थी।
रात के 12 बजे तक कुछ नहीं हुआ।
1 बजे…
कुछ नहीं।
2 बजे…
सन्नाटा।
अर्जुन ने सोचा शायद आज की रात शांत निकल जाएगी।
फिर…
2:59।
दीवार पर लगी घड़ी की सुई हिलने लगी।
3:00।
3:01।
3:02।
अर्जुन ने मीरा की तरफ देखा।
वह पूजा के कमरे में बैठी थी।
उसके सामने चाँदी की घंटी रखी थी।
3:10।
अचानक घर की सारी बत्तियाँ बंद हो गईं।
अर्जुन उठ खड़ा हुआ।
3:11।
रसोई से बर्तन गिरने की आवाज़ आई।
धड़ाम!
3:12।
सीढ़ियों पर किसी के दौड़ने की आवाज़ आई।
धड़-धड़-धड़-धड़!
3:13।
सारी घड़ियाँ रुक गईं।
अर्जुन ने साँस रोक ली।
फिर…
दरवाज़े पर दस्तक हुई।
ठक।
एक बार।
अर्जुन ने मीरा की तरफ देखा।
दूसरी दस्तक।
ठक।
मीरा ने आँखें बंद कर लीं।
तीसरी दस्तक।
ठक।
और उसके बाद…
पूरे घर में एक साथ कई आवाज़ें गूँज उठीं।
“अर्जुन…”
“अर्जुन…”
“अर्जुन…”
“बेटा…”
“भैया…”
“गुड्डू…”
अर्जुन की आँखों से आँसू निकल आए।
क्योंकि आखिरी आवाज़…
उसके पिता की असली आवाज़ थी।
“गुड्डू…”
मीरा ने धीरे से कहा—
“ये नाम उसे नहीं पता होना चाहिए था।”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“तो फिर?”
मीरा की आँखों में पहली बार उम्मीद दिखाई दी।
“तो शायद…”
वह दरवाज़े की तरफ देखने लगी।
“…इस बार बाहर जो है, वो नकली नहीं है।”
अर्जुन ने दरवाज़े की तरफ कदम बढ़ाया।
“रुको!”
मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“पहले पूछो।”
अर्जुन दरवाज़े के सामने खड़ा हो गया।
“पापा?”
बाहर से जवाब आया।
“हाँ, बेटा।”
अर्जुन ने आँखें बंद कीं।
“अगर आप सच में मेरे पापा हैं…”
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
“…तो उस रात आपने मुझे आखिरी बार क्या कहा था?”
कुछ सेकंड तक खामोशी रही।
फिर बाहर से जवाब आया—
“भाग जा।”
अर्जुन की आँखें फैल गईं।
मीरा ने भी उसकी तरफ देखा।
बाहर से आवाज़ फिर आई—
“अर्जुन…”
“मैं तुम्हारा पिता नहीं हूँ।”
अर्जुन पीछे हट गया।
“क्या?”
“मैं तुम्हें बचाने की कोशिश कर रहा हूँ।”
मीरा ने धीरे से कहा—
“दरवाज़ा मत खोलना।”
बाहर से आवाज़ आई—
“मीरा…”
मीरा जम गई।
“मैंने तुमसे झूठ बोला था।”
मीरा की आँखों में आँसू आ गए।
“क्या?”
“तुम्हारी माँ राधा…”
बाहर की आवाज़ अचानक धीमी हो गई।
“…मरी नहीं थी।”
मीरा के हाथ से चाँदी की घंटी गिर गई।
टन…
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“मीरा?”
बाहर से आवाज़ आई—
“राधा अभी भी इसी घर में है।”
अचानक ऊपर तीसरी मंज़िल से एक और आवाज़ आई।
एक औरत की।
बहुत धीमी।
बहुत दूर से।
“मीरा…”
मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया।
“माँ…”
अर्जुन ने पूछा—
“तुमने क्या सुना?”
मीरा धीरे-धीरे सीढ़ियों की तरफ देखने लगी।
“वो मुझे बुला रही है।”
“कौन?”
मीरा की आँखों से आँसू बहने लगे।
“मेरी माँ।”
तभी तीसरी मंज़िल की तरफ से एक और आवाज़ आई—
“मीरा…”
इस बार आवाज़ बिल्कुल साफ थी।
“बेटी…”
और उसके तुरंत बाद…
घर की सारी घड़ियाँ एक साथ चल पड़ीं।
टिक…
टिक…
टिक…
लेकिन इस बार समय 3:13 नहीं था।
सारी घड़ियाँ उल्टी दिशा में चल रही थीं।
3:12…
3:11…
3:10…
3:09…
अर्जुन घड़ी को घूरता रह गया।
मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“समय पीछे जा रहा है।”
“क्यों?”
“क्योंकि…”
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
“…17 जुलाई 2008 फिर से शुरू हो रही है।”
अचानक ऊपर से किसी के दौड़ने की आवाज़ आई।
फिर एक चीख।
फिर काँच टूटने की आवाज़।
और उसके बाद…
एक बच्ची की हँसी।
अर्जुन ने धीरे से ऊपर देखा।
सीढ़ियों के सबसे ऊपर…
एक छोटी लड़की खड़ी थी।
लगभग दस साल की।
उसने सफेद फ्रॉक पहन रखी थी।
उसके बाल चेहरे पर गिरे हुए थे।
वह धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे उतर रही थी।
अर्जुन ने मीरा की तरफ देखा।
मीरा की साँस रुक गई।
“मीरा…”
“हाँ…”
“ये कौन है?”
मीरा की आँखें उस बच्ची पर टिकी थीं।
उसने काँपते हुए कहा—
“ये…”
एक पल के लिए उसकी आवाज़ बंद हो गई।
फिर उसने कहा—
“मैं हूँ।”
अर्जुन ने बच्ची को देखा।
फिर मीरा को।
“क्या?”
बच्ची ने बालों के पीछे से चेहरा उठाया।
उसकी आँखें बिल्कुल काली थीं।
और उसने मुस्कुराकर कहा—
“अर्जुन…”
“तुम्हें याद है?”
अर्जुन कुछ नहीं बोल पाया।
बच्ची ने हाथ आगे बढ़ाया।
“उस रात…”
उसकी आवाज़ अचानक बदल गई।
अब वह मीरा की आवाज़ थी।
“तुमने मुझे अकेला छोड़ दिया था।”
अर्जुन पीछे हट गया।
“मैं तो वहाँ था ही नहीं…”
बच्ची मुस्कुराई।
“यही तो झूठ है।”
मीरा अचानक अर्जुन के सामने आकर खड़ी हो गई।
“उसे मत सुनो!”
बच्ची ने सिर टेढ़ा किया।
फिर उसने मीरा से कहा—
“तुम अभी भी उसे नहीं बताओगी?”
“क्या?”
“कि उस रात…”
बच्ची की मुस्कान और चौड़ी हो गई।
“…जिसे तुम मीरा समझते हो…”
अर्जुन ने मीरा की तरफ देखा।
बच्ची ने आखिरी शब्द फुसफुसाकर कहा—
“…वो मीरा नहीं है।”
मीरा का चेहरा पत्थर जैसा हो गया।
अर्जुन ने धीरे से उसकी तरफ देखा।
“मीरा…”
उसने कोई जवाब नहीं दिया।
बच्ची सीढ़ियों से एक कदम नीचे आई।
फिर दूसरा।
फिर तीसरा।
और उसके हर कदम के साथ घर की दीवारों से एक ही आवाज़ आने लगी—
ठक…
ठक…
ठक…
अर्जुन ने महसूस किया कि उसके पीछे कोई खड़ा है।
उसने धीरे-धीरे मुड़ने की कोशिश की।
मीरा चिल्लाई—
“अर्जुन! पीछे मत देखना!”
लेकिन इस बार…
बहुत देर हो चुकी थी।
उसके पीछे उसकी दादी खड़ी थीं।
चेहरे पर वही मुस्कान।
आँखों में वही प्यार।
लेकिन गर्दन…
असामान्य तरीके से एक तरफ झुकी हुई थी।
उन्होंने अर्जुन की तरफ देखकर कहा—
“बेटा…”
फिर उनकी आवाज़ अचानक बदल गई।
“तुम्हें सच जानना है ना?”
अर्जुन की साँस रुक गई।
दादी ने अपनी उंगली तीसरी मंज़िल की तरफ उठाई।
“तो आज रात…”
उनके पीछे अंधेरे में एक और आकृति दिखाई दी।
एक औरत।
सफेद साड़ी में।
चेहरा बालों से ढका हुआ।
और उसकी गोद में…
एक बच्ची।
दादी ने फुसफुसाकर कहा—
“राधा तुम्हारा इंतज़ार कर रही है।”
अर्जुन की आँखें उस औरत पर टिक गईं।
और तभी उस औरत ने अपना चेहरा उठाया।
वह राधा थी।
लेकिन उसकी गोद में जो बच्ची थी…
वह मीरा नहीं थी।
वह…
अर्जुन था।
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