PretikaGhost Stories“अंधेरे में कोई है”

एपिसोड 2: तीसरी मंज़िल का दरवाज़ा

firoj saifi · Ghost Stories · 13 मिनट

Writer
firoj saifi
Story
“अंधेरे में कोई है”
Chapter
2 of 3
Category
Ghost Stories
Reading time
13 min
Words
2457
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

रात के ठीक 3 बजकर 13 मिनट हुए थे।

शर्मा निवास की सारी घड़ियाँ एक साथ रुक चुकी थीं।

अर्जुन दरवाज़े के सामने खड़ा था।

उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं। हाथ अभी भी काँप रहे थे। सामने मीरा खड़ी थी—ठीक वैसी ही जैसी उसे पंद्रह साल पहले याद थी।

लेकिन अब उसके चेहरे पर बचपन वाली मासूमियत नहीं थी।

उसकी आँखों में डर था।

बहुत गहरा डर।

“मीरा…”

अर्जुन के मुँह से मुश्किल से आवाज़ निकली।

मीरा ने तुरंत अपनी उंगली होंठों पर रख दी।

“श्श्श…”

अर्जुन चुप हो गया।

बाहर गलियारे में कुछ था।

कुछ ऐसा जो दिखाई नहीं दे रहा था।

लेकिन उसकी मौजूदगी साफ महसूस हो रही थी।

पुराने मकान की लकड़ी सिकुड़ने की आवाज़ों और बाहर चलती हवा के बीच अचानक फर्श पर किसी के कदमों की आहट सुनाई दी।

ठक…

ठक…

ठक…

आवाज़ सीढ़ियों की तरफ से आ रही थी।

मीरा ने अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।

उसका हाथ बर्फ की तरह ठंडा था।

“चलो।”

“कहाँ?”

“नीचे।”

“लेकिन वो कौन है?”

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

“अगर तुम्हें सच में जानना है…”

वह कुछ पल रुकी।

“…तो पहले तुम्हें इस घर से जिंदा बाहर निकलना होगा।”

अर्जुन कुछ समझ पाता, उससे पहले ऊपर से एक आवाज़ आई।

“अर्जुन…”

अर्जुन जम गया।

वही आवाज़।

उसके पिता की आवाज़।

“अर्जुन बेटा…”

आवाज़ में दर्द था।

“दरवाज़ा खोलो।”

अर्जुन की आँखें भर आईं।

उसके पिता को मरे हुए दस साल हो चुके थे।

लेकिन आवाज़ बिल्कुल वैसी ही थी।

वही लहजा।

वही ठहराव।

वही प्यार।

“पापा…”

अर्जुन आगे बढ़ा।

मीरा ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

“नहीं!”

“लेकिन वो मेरे पापा हैं!”

“नहीं हैं!”

“तुम कैसे जानती हो?”

मीरा ने उसकी आँखों में देखा।

“क्योंकि तुम्हारे पापा की आवाज़ में कभी तुम्हारा नाम इस तरह नहीं बोला गया था।”

अर्जुन चुप हो गया।

ऊपर से फिर आवाज़ आई।

“अर्जुन…”

इस बार आवाज़ बदल गई।

वह उसके पिता की नहीं थी।

वह उसकी माँ की थी।

“बेटा… दरवाज़ा खोलो।”

अर्जुन के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

मीरा पीछे हट गई।

“अब समझे?”

अर्जुन ने धीरे से सिर हिलाया।

वह आवाज़ किसी की भी नकल कर सकती थी।

और शायद…

वह सिर्फ आवाज़ों की नकल नहीं कर रही थी।

वह लोगों की यादों की नकल कर रही थी।

मीरा ने उसका हाथ खींचा।

“चलो।”

दोनों धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे।

सीढ़ियाँ पुरानी थीं और हर कदम पर लकड़ी हल्की-सी चरमराती थी। अर्जुन कोशिश कर रहा था कि उसका पैर किसी ढीले तख्ते पर न पड़े। ऊपर से आती आवाज़ कुछ देर तक उनका पीछा करती रही, फिर धीरे-धीरे कमजोर होती गई।

लेकिन जब वे पहली मंज़िल पर पहुँचे, तभी ऊपर से एक जोरदार धमाका हुआ।

धड़ाम!

अर्जुन पलटकर देखने लगा।

तीसरी मंज़िल की तरफ जाने वाला दरवाज़ा अपने आप खुल चुका था।

वही दरवाज़ा…

जिसे उसकी दादी ने हमेशा बंद रखा था।

मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया।

“ये नहीं होना चाहिए था…”

“क्या?”

“दरवाज़ा खुल गया।”

“तो?”

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

“अब वो बाहर आ सकता है।”

अर्जुन कुछ बोल नहीं पाया।

सुबह होने तक दोनों नीचे वाले कमरे में बैठे रहे।

कमरे की बत्ती पूरी रात जलती रही, लेकिन उसकी रोशनी बार-बार हल्की पड़ जाती थी। बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी। पानी की बूंदें खिड़की के शीशे पर पड़तीं और कुछ देर के लिए घर के भीतर की आवाज़ें दब जातीं।

फिर कदमों की आहट सुनाई देती।

कभी ऊपर।

कभी रसोई में।

कभी बिल्कुल उनके कमरे के बाहर।

एक बार दरवाज़े के नीचे से किसी की परछाईं भी गुज़री थी। अर्जुन ने मीरा की तरफ देखा था, लेकिन उसने उसे आँखों से चुप रहने का इशारा किया। दोनों ने पूरी रात दरवाज़ा नहीं खोला।

सुबह की पहली रोशनी खिड़की से अंदर आई तो अर्जुन ने राहत की साँस ली।

मीरा खिड़की के पास खड़ी थी।

उसके चेहरे पर सूरज की रोशनी पड़ रही थी।

अर्जुन उसे ध्यान से देखने लगा।

“तुम…”

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

“क्या?”

“तुम बदली नहीं हो।”

मीरा हल्का सा मुस्कुराई।

“तुम बदल गए हो।”

“पंद्रह साल हो गए।”

“मेरे लिए नहीं।”

अर्जुन का चेहरा गंभीर हो गया।

“तुम्हारे लिए कितना समय हुआ?”

मीरा ने जवाब नहीं दिया।

“मीरा?”

“मुझे नहीं पता।”

“तुम 2008 में गायब हुई थीं।”

“हाँ।”

“सबने कहा था कि तुम मर गई।”

मीरा ने खिड़की से बाहर देखा।

“सबने बहुत कुछ कहा था।”

“लेकिन सच क्या था?”

मीरा कुछ देर चुप रही।

फिर उसने कहा—

“सच तीसरी मंज़िल पर बंद है।”

अर्जुन के शरीर में फिर से ठंड दौड़ गई।

“वहाँ क्या है?”

“तुम्हारी दादी का सबसे बड़ा राज़।”

“और वो चीज़?”

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

“वो राज़ नहीं है।”

“फिर?”

“वो गलती है।”

अर्जुन को अचानक बचपन का एक दृश्य याद आया।

वह लगभग दस साल का था।

बारिश की रात थी।

वह और मीरा घर की तीसरी मंज़िल की सीढ़ियों के पास खेल रहे थे।

दादी ने उन्हें वहाँ देख लिया था।

दादी ने अर्जुन को जोर से डाँटा था।

“कितनी बार कहा है वहाँ मत जाना!”

अर्जुन डर गया था।

लेकिन मीरा…

मीरा कुछ देख रही थी।

तीसरी मंज़िल के दरवाज़े के नीचे से हल्की लाल रोशनी निकल रही थी।

अर्जुन ने पूछा था—

“मीरा, वहाँ लाल लाइट क्यों है?”

मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया था।

“चल यहाँ से।”

“लेकिन…”

“अर्जुन, अगर दादी पूछें तो कहना हम नीचे खेल रहे थे।”

उस समय अर्जुन को समझ नहीं आया था।

आज उसे वह घटना बिल्कुल साफ याद आ रही थी।

“मीरा…”

“हम्म?”

“तुम्हें उस कमरे के बारे में पहले से पता था?”

मीरा ने सिर झुका लिया।

“हाँ।”

“कैसे?”

“क्योंकि तुम्हारी दादी ने मुझे बताया था।”

“क्या?”

“कि उस कमरे में जो कुछ है… उसे कभी बाहर नहीं आने देना।”

अर्जुन ने पूछा—

“क्या है वहाँ?”

मीरा ने धीमी आवाज़ में कहा—

“एक आईना।”

अर्जुन चौंक गया।

“सिर्फ आईना?”

“नहीं।”

मीरा ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

“वो आईना किसी का चेहरा नहीं दिखाता।”

“फिर क्या दिखाता है?”

“वो दिखाता है…”

वह रुक गई।

“…कि तुम्हारे पीछे कौन खड़ा है।”

अर्जुन ने उसी समय तय कर लिया कि वह तीसरी मंज़िल पर जाएगा।

मीरा ने मना किया।

लेकिन अर्जुन नहीं माना।

“अगर मेरी दादी ने इतने साल इसे बंद रखा था, तो मुझे जानना होगा क्यों।”

“जानना और देखना दो अलग बातें हैं।”

“मैं डरकर नहीं भागूँगा।”

मीरा ने उसकी तरफ कुछ पल देखा।

“यही गलती तुम्हारे पिता ने भी की थी।”

अर्जुन रुक गया।

“मेरे पापा?”

मीरा ने कोई जवाब नहीं दिया।

“तुम्हें मेरे पापा के बारे में क्या पता है?”

“बहुत कुछ।”

“तो बताओ।”

मीरा ने धीरे से कहा—

“तुम्हारे पिता उस रात तीसरी मंज़िल पर गए थे।”

अर्जुन का चेहरा बदल गया।

“कौन-सी रात?”

मीरा ने जवाब दिया—

“17 जुलाई 2008।”

अर्जुन की धड़कन तेज़ हो गई।

वही तारीख…

जिस दिन मीरा गायब हुई थी।

“उस रात हुआ क्या था?”

मीरा ने कहा—

“मैं तुम्हें सब बताऊँगी।”

“अभी।”

“अभी नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि दिन में भी कुछ चीज़ें इस घर में जागती हैं।”

अर्जुन ने चारों तरफ देखा।

घर बिल्कुल शांत था।

“तुम क्या कहना चाहती हो?”

मीरा ने जवाब देने के बजाय दीवार की तरफ इशारा किया।

वहाँ लगी एक पुरानी घड़ी चल रही थी।

टिक…

टिक…

टिक…

अर्जुन ने घड़ी को देखा।

फिर अचानक उसकी सुइयाँ रुक गईं।

समय था—

3:13।

अर्जुन के चेहरे से रंग उड़ गया।

मीरा ने फुसफुसाकर कहा—

“वो अभी भी यहीं है।”

दोपहर तक दोनों ने घर की पुरानी अलमारियाँ खंगालनी शुरू कर दीं।

अर्जुन को उम्मीद थी कि शायद दादी ने कोई डायरी या चिट्ठी छोड़ी होगी।

काफी देर बाद उसे एक पुराना लकड़ी का संदूक मिला।

संदूक पर धूल की मोटी परत थी।

ताला जंग लगा हुआ था।

अर्जुन ने लोहे की रॉड से ताला तोड़ दिया।

अंदर पुराने कपड़े, कुछ तस्वीरें और कागज़ रखे थे।

सबसे नीचे एक छोटी सी डायरी थी।

काले कपड़े में लिपटी हुई।

अर्जुन ने उसे उठाया।

पहले पन्ने पर लिखा था—

“अगर यह डायरी अर्जुन के हाथ लगे, तो उसे तीसरी मंज़िल पर अकेले नहीं जाना चाहिए।”

अर्जुन ने मीरा की तरफ देखा।

“ये दादी की लिखावट है।”

मीरा ने कुछ नहीं कहा।

अर्जुन ने अगला पन्ना खोला।

तारीख थी—

12 जुलाई 2008।

नीचे लिखा था—

“आज फिर ऊपर से आवाज़ आई। मैंने दरवाज़ा नहीं खोला।”

अगले पन्ने पर—

“वह अब अर्जुन का नाम लेने लगी है।”

अर्जुन का हाथ रुक गया।

उसने अगला पन्ना पलटा।

“मीरा ने आज उसे देख लिया।”

अर्जुन ने मीरा की तरफ देखा।

“तुमने देखा था?”

मीरा ने धीरे से सिर हिलाया।

“क्या?”

“उस दिन पहली बार।”

“क्या देखा?”

“एक औरत।”

“कौन औरत?”

“मेरी तरह दिखती थी।”

अर्जुन ने कुछ समझने की कोशिश की।

“तुम्हारी तरह?”

“हाँ।”

“मतलब?”

मीरा की आँखों में डर लौट आया।

“वो मेरे पीछे खड़ी थी।”

“आईने में?”

“नहीं।”

“फिर?”

मीरा ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—

“सीधे मेरे पीछे।”

अर्जुन ने डायरी फिर खोली।

17 जुलाई 2008 का पन्ना आधा जला हुआ था।

सिर्फ कुछ शब्द पढ़े जा सकते थे।

“आज रात दरवाज़ा खुलेगा…”

नीचे—

“अगर मैं वापस न आऊँ तो अर्जुन को लेकर घर छोड़ देना।”

और सबसे नीचे—

“मीरा को मत बताना कि उसकी माँ कौन थी।”

अर्जुन ने डायरी बंद कर दी।

“मीरा…”

वह पलटा।

लेकिन मीरा कमरे में नहीं थी।

“मीरा?”

कोई जवाब नहीं।

अर्जुन ने पूरे घर में उसे ढूँढा।

रसोई खाली।

आँगन खाली।

सीढ़ियाँ खाली।

फिर उसकी नजर तीसरी मंज़िल की तरफ गई।

दरवाज़ा खुला हुआ था।

अर्जुन के पैरों तले जमीन खिसक गई।

वह सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।

एक कदम।

दूसरा।

तीसरा।

हर सीढ़ी के साथ हवा ठंडी होती जा रही थी।

तीसरी मंज़िल पर पहुँचकर उसने देखा—

दरवाज़े के सामने मीरा खड़ी थी।

उसकी पीठ अर्जुन की तरफ थी।

“मीरा!”

वह धीरे से पलटी।

उसकी आँखों में आँसू थे।

“तुम यहाँ क्यों आए?”

“तुम गायब हो गई थीं।”

“मुझे लगा तुम मुझे ढूँढोगे।”

“मैंने पूरी जिंदगी तुम्हें मरा हुआ समझा।”

मीरा ने कुछ नहीं कहा।

अर्जुन उसके पास पहुँचा।

दरवाज़े के अंदर अंधेरा था।

बहुत गहरा अंधेरा।

“यही कमरा है?”

मीरा ने सिर हिलाया।

“हाँ।”

“अंदर क्या है?”

“आईना।”

“और?”

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

“और वो।”

अर्जुन ने दरवाज़े के अंदर झाँका।

कमरे के बीचोंबीच एक विशाल पुराना आईना खड़ा था।

उस पर काला कपड़ा पड़ा हुआ था।

दीवारों पर अजीब निशान बने थे।

फर्श पर राख फैली हुई थी।

और कमरे के कोने में एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी रखी थी।

कुर्सी पर…

किसी के बैठने के निशान थे।

जैसे कोई अभी-अभी वहाँ से उठा हो।

अर्जुन ने धीरे से पूछा—

“यहाँ कोई रहता है?”

मीरा ने कहा—

“रहता नहीं।”

“फिर?”

“इंतज़ार करता है।”

अर्जुन ने पूछा—

“किसका?”

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

“तुम्हारा।”

अचानक आईने के पीछे से आवाज़ आई।

खरोंचने की आवाज़।

किर्र…

किर्र…

किर्र…

अर्जुन ने कदम पीछे किए।

“मीरा…”

“पीछे मत देखना।”

“क्यों?”

“बस मत देखना।”

लेकिन तभी किसी ने अर्जुन के कान के पास फुसफुसाया—

“अर्जुन…”

वह जम गया।

आवाज़ बिल्कुल उसकी अपनी थी।

उसकी ही आवाज़।

उसने धीरे-धीरे आईने की तरफ देखा।

काले कपड़े के नीचे आईने में कुछ हिल रहा था।

मीरा चिल्लाई—

“मत देखो!”

लेकिन देर हो चुकी थी।

अर्जुन ने कपड़े का एक कोना पकड़ लिया।

और उसे खींच दिया।

काला कपड़ा नीचे गिरा।

आईना सामने था।

पहले अर्जुन को सिर्फ अपना प्रतिबिंब दिखाई दिया।

फिर मीरा।

फिर कमरा।

फिर…

कुछ और।

अर्जुन के प्रतिबिंब के पीछे एक आदमी खड़ा था।

लंबा।

बहुत लंबा।

चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

अर्जुन ने तुरंत पीछे देखा।

वहाँ कोई नहीं था।

वह फिर आईने की तरफ मुड़ा।

वह आदमी अभी भी वहाँ था।

और इस बार…

उसका चेहरा दिखाई दे रहा था।

अर्जुन की साँस रुक गई।

वह चेहरा उसके पिता का था।

“पापा…”

मीरा ने उसका मुँह दबा दिया।

“नाम मत लो!”

आईने में खड़ा चेहरा मुस्कुराया।

और उसके होंठ हिले।

“बेटा…”

अर्जुन की आँखों से आँसू निकल आए।

“ये मेरे पापा नहीं हैं…”

मीरा ने धीरे से कहा—

“अब तुम समझ रहे हो।”

अचानक आईने पर एक दरार आई।

चटाक!

फिर दूसरी।

चटाक!

तीसरी।

पूरा आईना काँपने लगा।

मीरा ने अर्जुन को पीछे खींचा।

“भागो!”

दोनों दरवाज़े की तरफ दौड़े।

लेकिन दरवाज़ा बंद हो चुका था।

अर्जुन ने हैंडल घुमाया।

कुछ नहीं हुआ।

“मीरा!”

“पीछे मत देखना!”

लेकिन पीछे से कदमों की आवाज़ आने लगी।

ठक…

ठक…

ठक…

धीरे-धीरे वह आवाज़ उनके करीब आ रही थी।

अर्जुन ने दरवाज़ा पीटना शुरू कर दिया।

“खुल जा!”

मीरा दीवार से लगी खड़ी थी।

उसकी आँखें बंद थीं।

वह कुछ बुदबुदा रही थी।

“क्या कर रही हो?”

“उसे रोक रही हूँ।”

“कैसे?”

“जिस तरह दादी ने मुझे सिखाया था।”

“क्या?”

मीरा ने अपनी जेब से एक छोटी सी चाँदी की घंटी निकाली।

और उसे बजा दिया।

टन…

आवाज़ पूरे कमरे में फैल गई।

कदमों की आवाज़ तुरंत रुक गई।

अचानक सब शांत हो गया।

फिर आईने से एक भयानक चीख निकली।

इतनी तेज़ कि अर्जुन ने अपने कान बंद कर लिए।

आईने में दरारें फैलती चली गईं।

और फिर—

आईना टूट गया।

धड़ाम!

काँच के हजारों टुकड़े फर्श पर बिखर गए।

कुछ सेकंड तक कोई आवाज़ नहीं हुई।

फिर टूटे हुए काँच के बीच से एक छोटी सी तस्वीर बाहर आकर गिरी।

अर्जुन ने तस्वीर उठाई।

उसमें तीन लोग थे।

उसके पिता।

उसकी दादी।

और…

एक छोटी बच्ची।

मीरा।

लेकिन तस्वीर के पीछे एक चौथा चेहरा भी दिखाई दे रहा था।

एक औरत का।

अर्जुन ने तस्वीर पलटी।

पीछे लिखा था—

“मीरा की माँ — राधा।”

अर्जुन ने मीरा की तरफ देखा।

“तुम्हारी माँ…”

मीरा की आँखों से आँसू बहने लगे।

“हाँ।”

“वो कौन थी?”

मीरा ने जवाब दिया—

“जिसे इस घर ने निगल लिया।”

अर्जुन के हाथ से तस्वीर गिर गई।

तभी पीछे से एक और आवाज़ आई।

इस बार वह आवाज़ किसी और की नहीं थी।

वह मीरा की आवाज़ थी।

लेकिन मीरा तो उसके सामने खड़ी थी।

पीछे से आवाज़ आई—

“अर्जुन…”

मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

दोनों धीरे-धीरे पलटे।

कमरे के टूटे आईने के बीच…

एक लड़की खड़ी थी।

वह बिल्कुल मीरा जैसी दिख रही थी।

एकदम वैसी।

चेहरा।

बाल।

कपड़े।

सब कुछ।

लेकिन उसकी आँखें…

पूरी तरह काली थीं।

उसने मुस्कुराते हुए कहा—

“तुमने मुझे बहुत देर कर दी, अर्जुन।”

मीरा चीख पड़ी—

“वो मैं नहीं हूँ!”

अर्जुन पीछे हट गया।

काली आँखों वाली लड़की मुस्कुराती रही।

फिर उसने अपना सिर थोड़ा टेढ़ा किया।

और बोली—

“मैं तो वही हूँ…”

एक पल के लिए उसकी आवाज़ मीरा जैसी थी।

फिर वह बदलकर अर्जुन की माँ की आवाज़ बन गई।

“जिसे तुम्हारी दादी ने बंद किया था।”

फिर उसके चेहरे पर अर्जुन के पिता का चेहरा उभर आया।

“और अब…”

उसने हाथ आगे बढ़ाया।

“…तुम्हारी बारी है।”

अचानक कमरे की सारी बत्तियाँ बुझ गईं।

अंधेरे में अर्जुन ने मीरा का हाथ कसकर पकड़ लिया।

लेकिन अगले ही पल उसे एहसास हुआ—

उसने जिस हाथ को पकड़ा था…

वह मीरा का हाथ नहीं था।

वह हाथ बेहद ठंडा था।

और उसकी उंगलियाँ…

मानव उंगलियों से कहीं ज्यादा लंबी थीं।

अर्जुन ने डरते हुए नीचे देखा।

अंधेरे में उसे सिर्फ दो चमकती हुई काली आँखें दिखाई दीं।

और उसके कान के बिल्कुल पास किसी ने फुसफुसाया—

“दूसरी दस्तक शुरू हो चुकी है…”

← पिछला भाग  ·  अगला भाग →

“अंधेरे में कोई है” · सभी भाग →

और कहानियाँ · More stories