PretikaGhost Stories“अंधेरे में कोई है”

एपिसोड 1: अर्जुन की वापसी

firoj saifi · Ghost Stories · 15 मिनट

Writer
firoj saifi
Story
“अंधेरे में कोई है”
Chapter
1 of 3
Category
Ghost Stories
Reading time
15 min
Words
2932
Language
Hindi (हिंदी)
Price
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अर्जुन शर्मा की कहानी उस रात से शुरू होती है, जब वह पंद्रह साल बाद अपने पुश्तैनी गाँव देवगढ़ लौट रहा था।

रात के ठीक बारह बजकर सैंतालीस मिनट हुए थे।

आसमान में बादल इतने घने थे कि चाँद का कहीं कोई निशान नहीं था। चारों तरफ सिर्फ काला अंधेरा था और उस अंधेरे को चीरती हुई तेज़ बारिश की आवाज़।

शहर से करीब सत्तर किलोमीटर दूर, पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच एक पुरानी सड़क थी।

उस सड़क पर एक काली कार धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।

कार के अंदर बैठा अर्जुन बार-बार सामने देख रहा था।

सड़क लगभग सुनसान थी।

न कोई गाड़ी।

न कोई इंसान।

न कोई दुकान।

बस दोनों तरफ ऊँचे-ऊँचे पेड़, जिनकी टहनियाँ हवा के साथ इस तरह हिल रही थीं जैसे कोई अंधेरे में खड़ा होकर उन्हें हाथों से हिला रहा हो।

अर्जुन ने कार की स्पीड थोड़ी बढ़ा दी।

उसकी उम्र करीब अट्ठाईस साल थी। चेहरे पर थकान साफ दिखाई दे रही थी। पिछले छह घंटों से वह लगातार गाड़ी चला रहा था।

उसके फोन की स्क्रीन पर एक ही नाम पिछले दस मिनट से चमक रहा था—

“माँ”

अर्जुन ने कॉल काट दी।

कुछ सेकंड बाद फोन फिर बजने लगा।

उसने इस बार कॉल उठा ली।

“हाँ माँ।”

दूसरी तरफ कुछ पल तक खामोशी रही।

फिर उसकी माँ की धीमी आवाज़ आई—

“अर्जुन... तुम पहुँच गए?”

“अभी रास्ते में हूँ।”

“मैंने कहा था रात में मत निकलना।”

अर्जुन हल्का-सा मुस्कुराया।

“माँ, बस एक घंटा और। सुबह तक तो वैसे भी पहुँच जाता।”

“तुम मेरी बात समझ क्यों नहीं रहे?”

इस बार माँ की आवाज़ में चिंता थी।

अर्जुन ने भौंहें सिकोड़ लीं।

“क्या हुआ?”

“कुछ नहीं।”

“माँ।”

कुछ सेकंड तक फिर खामोशी रही।

फिर माँ ने कहा—

“बस... वहाँ पहुँचकर रात में बाहर मत निकलना।”

अर्जुन ने हँसने की कोशिश की।

“आप ऐसे बोल रही हो जैसे मैं किसी भूतों के गाँव में जा रहा हूँ।”

माँ ने जवाब नहीं दिया।

अर्जुन का चेहरा गंभीर हो गया।

“माँ?”

दूसरी तरफ से बहुत धीमी आवाज़ आई—

“वहाँ... अंधेरा होने के बाद किसी की आवाज़ सुनाई दे तो जवाब मत देना।”

अर्जुन के हाथ स्टीयरिंग पर जम गए।

“क्या?”

लेकिन उसी पल फोन कट गया।

“माँ?”

उसने दोबारा कॉल किया।

फोन बंद था।

अर्जुन कुछ देर तक फोन को देखता रहा।

फिर उसने सिर झटका।

“शायद नेटवर्क चला गया।”

उसने फोन सीट पर रख दिया।

तभी—

ठक।

अर्जुन चौंक गया।

आवाज़ कार के पीछे से आई थी।

उसने तुरंत रियर-व्यू मिरर में देखा।

पीछे कुछ नहीं था।

सिर्फ बारिश।

सिर्फ अंधेरा।

उसने फिर कार आगे बढ़ा दी।

करीब पाँच मिनट बाद सड़क के किनारे एक जंग लगा बोर्ड दिखाई दिया।

उस पर लिखा था—

“देवगढ़ — 8 किलोमीटर”

अर्जुन ने राहत की साँस ली।

देवगढ़।

यही उसकी मंज़िल थी।

यही वह गाँव था जहाँ उसके पिता का पुश्तैनी घर था।

करीब पंद्रह साल बाद वह वापस वहाँ जा रहा था।

उसके पिता की मौत के बाद उसकी माँ ने वह घर कभी बेचने की कोशिश नहीं की थी।

और अब, कुछ दिन पहले, उसकी दादी की मृत्यु के बाद वह घर पूरी तरह अर्जुन के नाम हो गया था।

अर्जुन को वहाँ सिर्फ एक रात रुकना था।

अगली सुबह वह घर के कागज़ात देखने वाला था और फिर वापस शहर लौट जाना था।

कम से कम यही उसका इरादा था।

लेकिन उसे नहीं पता था कि देवगढ़ में उसका इंतज़ार सिर्फ एक पुराना घर नहीं कर रहा था।

कोई और भी था।

कोई...

जो पंद्रह साल से उसके लौटने का इंतज़ार कर रहा था।

रात करीब डेढ़ बजे अर्जुन देवगढ़ पहुँच गया।

बारिश अब थोड़ी धीमी हो चुकी थी।

गाँव लगभग पूरी तरह सो चुका था।

कुछ घरों में हल्की रोशनी दिखाई दे रही थी।

अर्जुन ने कार की हेडलाइट्स तेज़ कीं।

सड़क धीरे-धीरे सँकरी होती गई।

फिर गाँव खत्म हो गया।

सामने एक कच्चा रास्ता था।

अर्जुन ने कार उस रास्ते पर मोड़ दी।

कुछ दूर जाने के बाद पेड़ों के बीच से एक विशाल लोहे का गेट दिखाई दिया।

गेट के ऊपर पत्थर की पट्टी पर लिखा था—

“शर्मा निवास”

अर्जुन ने कार रोक दी।

उसने कुछ पल उस घर को देखा।

बारिश की बूंदें विंडस्क्रीन पर गिर रही थीं।

उसकी आँखों के सामने बचपन की कुछ धुंधली यादें तैर गईं।

वह इसी घर में पैदा हुआ था।

यहीं खेला था।

यहीं उसकी दादी उसे रात में कहानियाँ सुनाया करती थीं।

लेकिन फिर...

एक रात कुछ ऐसा हुआ था जिसे अर्जुन का दिमाग आज तक पूरी तरह याद नहीं कर पाया था।

वह सिर्फ सात साल का था।

उस रात बहुत तेज़ बारिश हुई थी।

उसे याद था कि वह डरकर अपनी माँ के कमरे में गया था।

फिर उसने...

एक लड़की को देखा था।

सीढ़ियों के नीचे।

सफेद कपड़ों में।

लंबे बाल चेहरे पर।

और वह लड़की उसे देखकर मुस्कुरा रही थी।

अर्जुन ने उस समय अपनी माँ को बताया था।

माँ ने उसे डाँट दिया था।

“कोई लड़की नहीं थी।”

लेकिन अर्जुन को आज भी याद था।

वह लड़की सच में वहाँ थी।

अर्जुन ने कार से उतरते हुए उस याद को दिमाग से निकालने की कोशिश की।

गेट का ताला पुराना था।

उसने चाबी निकाली।

चाबी घुमाई।

क्लिक।

गेट खुल गया।

कार अंदर चली गई।

घर सामने खड़ा था।

तीन मंज़िला पुरानी हवेली।

दीवारों पर जगह-जगह काई जम चुकी थी।

खिड़कियों के शीशे धूल से ढके थे।

तीसरी मंज़िल की एक खिड़की खुली थी।

अर्जुन ने उसे देखा।

उसकी आँखें कुछ पल वहीं टिक गईं।

फिर अचानक—

खिड़की अपने आप बंद हो गई।

धड़ाम!

अर्जुन पीछे हट गया।

“हवा होगी।”

उसने खुद से कहा।

लेकिन उस रात हवा बिल्कुल नहीं चल रही थी।

अर्जुन ने मुख्य दरवाज़ा खोला।

दरवाज़ा खुलते ही अंदर से एक अजीब-सी गंध आई।

गीली मिट्टी।

पुरानी लकड़ी।

और कुछ ऐसा...

जिसकी गंध वह पहचान नहीं पाया।

उसने मोबाइल की टॉर्च जलाई।

बड़ा-सा हॉल उसके सामने था।

दीवार पर पुराने पारिवारिक फोटो लगे थे।

एक फोटो पर उसकी नजर रुक गई।

उसमें उसके पिता थे।

उसकी माँ थी।

उसकी दादी थी।

और...

एक लड़की।

अर्जुन आगे बढ़ा।

फोटो के नीचे धूल जमी थी।

उसने उंगली से फोटो साफ किया।

लड़की करीब दस या ग्यारह साल की लग रही थी।

उसके लंबे बाल थे।

आँखें बड़ी थीं।

और वह कैमरे की तरफ देखकर मुस्कुरा रही थी।

अर्जुन का दिल अचानक तेज़ धड़कने लगा।

उसे यह चेहरा जाना-पहचाना लगा।

बहुत जाना-पहचाना।

लेकिन वह याद नहीं कर पा रहा था कि कहाँ देखा था।

उसने फोटो को दीवार से उतार लिया।

पीछे कुछ लिखा हुआ था।

सिर्फ चार शब्द।

“इसे कभी मत जगाना।”

अर्जुन कुछ सेकंड तक उस लिखावट को देखता रहा।

फिर उसकी गर्दन के पीछे ठंडी लहर दौड़ गई।

“इसे?”

कौन?

और किसे जगाना था?

उसने फोटो वापस दीवार पर रख दिया।

तभी ऊपर से आवाज़ आई।

ठक... ठक... ठक...

अर्जुन ने सिर उठाया।

आवाज़ तीसरी मंज़िल से आई थी।

वह कुछ देर वहीं खड़ा रहा।

फिर खुद को समझाते हुए बोला—

“पुराना घर है।”

लेकिन आवाज़ फिर आई।

ठक... ठक... ठक...

इस बार थोड़ी तेज़।

अर्जुन ने सीढ़ियों की तरफ देखा।

तीसरी मंज़िल पर जाने वाली सीढ़ियाँ अंधेरे में गायब हो रही थीं।

उसकी माँ की बात उसके कानों में गूँजी—

“अंधेरा होने के बाद किसी की आवाज़ सुनाई दे तो जवाब मत देना।”

अर्जुन ने सिर झटका।

“मैं आवाज़ के पीछे नहीं जा रहा।”

वह सीधे अपने पुराने कमरे की तरफ चला गया।

कमरा लगभग वैसा ही था जैसा उसे याद था।

एक पुराना पलंग।

लकड़ी की अलमारी।

खिड़की के पास मेज़।

और दीवार पर बचपन की कुछ तस्वीरें।

अर्जुन ने बैग नीचे रखा।

कपड़े बदले।

फिर पलंग पर लेट गया।

उसे लगा कि नींद तुरंत आ जाएगी।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

उसकी आँखें बंद होते ही अजीब-अजीब आवाज़ें सुनाई देने लगीं।

कभी लकड़ी चरमराती।

कभी खिड़की हिलती।

कभी लगता जैसे कोई गलियारे में चल रहा हो।

अर्जुन ने फोन देखा।

2:41 AM

“बस दो घंटे सोना है।”

उसने आँखें बंद कर लीं।

करीब दस मिनट बाद उसे नींद आने लगी।

तभी—

ठक।

उसने आँखें खोलीं।

खामोशी।

फिर—

ठक।

इस बार आवाज़ दरवाज़े से आई।

अर्जुन उठकर बैठ गया।

“कौन?”

कोई जवाब नहीं।

उसने कुछ सेकंड इंतज़ार किया।

फिर—

ठक... ठक... ठक...

तीन बार।

धीरे।

बिल्कुल उसी तरह जैसे कोई बाहर खड़ा होकर दरवाज़ा खटखटा रहा हो।

अर्जुन पलंग से उठा।

वह दरवाज़े के पास गया।

हाथ कुंडी पर रखा।

फिर माँ की बात याद आई।

उसने हाथ वापस खींच लिया।

“कौन है?”

कोई जवाब नहीं।

अर्जुन ने धीरे से दरवाज़े के नीचे देखा।

बाहर गलियारे की हल्की रोशनी दिखाई दे रही थी।

लेकिन उसके साथ...

एक परछाईं भी थी।

किसी के पैरों की।

अर्जुन का शरीर ठंडा पड़ गया।

दरवाज़े के दूसरी तरफ कोई खड़ा था।

उसने साँस रोक ली।

परछाईं बिल्कुल स्थिर थी।

फिर धीरे-धीरे...

वह परछाईं दरवाज़े के नीचे से पीछे हटने लगी।

अर्जुन ने राहत की साँस ली।

तभी एक बच्ची की आवाज़ आई—

“भैया...”

अर्जुन की आँखें फैल गईं।

वही आवाज़।

बहुत मासूम।

बहुत धीमी।

“भैया... दरवाज़ा खोलो।”

अर्जुन पीछे हट गया।

उसकी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।

वह आवाज़ उसने पहले सुनी थी।

बहुत साल पहले।

उसी घर में।

उसी रात।

“भैया...”

आवाज़ फिर आई।

“मुझे बहुत डर लग रहा है।”

अर्जुन के हाथ काँपने लगे।

उसने धीरे से पूछा—

“तुम... कौन हो?”

बाहर कुछ सेकंड तक खामोशी रही।

फिर जवाब आया—

“आप मुझे भूल गए?”

अर्जुन का दिल जैसे रुक गया।

उसकी आँखों के सामने वही पुरानी तस्वीर घूम गई।

वही लड़की।

सफेद कपड़े।

लंबे बाल।

मुस्कुराता चेहरा।

अर्जुन ने दरवाज़े से कान लगा दिया।

“तुम्हारा नाम क्या है?”

बाहर से धीमी हँसी सुनाई दी।

“आपने ही तो मेरा नाम रखा था।”

अर्जुन का माथा ठंडे पसीने से भर गया।

“मैंने?”

“हाँ।”

“क्या नाम?”

कुछ पल तक खामोशी।

फिर आवाज़ आई—

“मीरा।”

अर्जुन पीछे हट गया।

उसे अचानक सब कुछ याद आने लगा।

मीरा।

वह लड़की...

जिसके साथ वह बचपन में खेलता था।

जो उसके कमरे के बाहर बैठकर उसका इंतज़ार करती थी।

जो उसे “भैया” कहती थी।

लेकिन...

मीरा कौन थी?

उसके परिवार की कोई तस्वीरों में नहीं थी।

उसकी माँ ने उसके बारे में कभी बात नहीं की।

और सबसे डरावनी बात—

अर्जुन को याद आया कि मीरा...

मर चुकी थी।

अर्जुन के दिमाग में यादों का तूफान उठने लगा।

एक छोटी लड़की।

लाल रिबन।

सफेद फ्रॉक।

हाथ में लकड़ी की गुड़िया।

वह सीढ़ियों के पास बैठी थी।

अर्जुन उसके साथ खेल रहा था।

फिर दादी की चीख।

लोगों का भागना।

माँ का उसे कमरे में बंद कर देना।

और फिर...

आग।

बहुत तेज़ आग।

उसके बाद मीरा कभी दिखाई नहीं दी।

अर्जुन ने माथा पकड़ लिया।

“नहीं...”

बाहर से फिर आवाज़ आई—

“भैया...”

अर्जुन ने जवाब नहीं दिया।

“आपने मुझे उस रात अकेला छोड़ दिया था।”

अर्जुन की साँस रुक गई।

“नहीं।”

“आप भाग गए थे।”

“मैं बच्चा था।”

“लेकिन आपने दरवाज़ा बंद किया था।”

अर्जुन की आँखों में आँसू आ गए।

उसे कुछ-कुछ याद आ रहा था।

एक कमरा।

एक छोटी लड़की।

एक बंद दरवाज़ा।

और बाहर...

किसी की आवाज़।

फिर आग।

वह काँपते हुए फर्श पर बैठ गया।

“मैंने जानबूझकर नहीं किया था।”

बाहर से कोई जवाब नहीं आया।

अर्जुन ने धीरे से दरवाज़े की तरफ देखा।

परछाईं गायब हो चुकी थी।

उसने राहत की साँस ली।

लेकिन तभी...

उसके कमरे की खिड़की पर किसी ने थपथपाया।

टक... टक... टक...

अर्जुन ने धीरे-धीरे खिड़की की तरफ देखा।

तीसरी मंज़िल की खिड़की के बाहर कोई कैसे हो सकता था?

वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

खिड़की बंद थी।

उसने पर्दा हटाया।

बाहर सिर्फ अंधेरा था।

फिर बिजली चमकी।

एक सेकंड के लिए पूरा आँगन रोशनी में नहा गया।

और अर्जुन ने उसे देख लिया।

आँगन के बीच...

एक छोटी लड़की खड़ी थी।

सफेद फ्रॉक।

लाल रिबन।

चेहरा नीचे झुका हुआ।

अर्जुन का मुँह खुला रह गया।

बिजली की रोशनी गायब हुई।

फिर अंधेरा।

अर्जुन ने आँखें झपकाईं।

जब दोबारा बिजली चमकी...

लड़की वहाँ नहीं थी।

लेकिन खिड़की के शीशे पर...

अंदर की तरफ से...

एक छोटा-सा हाथ का निशान बना हुआ था।

अर्जुन पीछे गिर पड़ा।

उसने तुरंत कमरे की लाइट जलाई।

बल्ब दो बार झपका।

फिर बंद हो गया।

कमरा अंधेरे में डूब गया।

अर्जुन ने मोबाइल की टॉर्च जलाई।

और तभी उसे महसूस हुआ...

कमरे में वह अकेला नहीं था।

उसके पीछे...

किसी के साँस लेने की आवाज़ आ रही थी।

बहुत धीमी।

बहुत पास।

ह्ह्ह्ह...

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं।

उसने हिम्मत करके पीछे देखने की कोशिश की।

धीरे...

बहुत धीरे...

वह मुड़ा।

कोई नहीं था।

लेकिन उसके सामने रखी मेज़ पर एक चीज़ पड़ी थी।

एक पुरानी लकड़ी की गुड़िया।

अर्जुन उसे पहचानता था।

वह मीरा की गुड़िया थी।

उसने उसे हाथ में उठाया।

गुड़िया की गर्दन पर काले धागे से कुछ बंधा हुआ था।

अर्जुन ने धागा खोला।

उसमें एक छोटा-सा कागज़ था।

कागज़ पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

“पहली दस्तक हो चुकी है।”

अर्जुन के हाथ से कागज़ गिर गया।

उसी पल...

नीचे हॉल से किसी चीज़ के टूटने की आवाज़ आई।

छन्न्न्न!

अर्जुन ने फोन उठाया और कमरे से बाहर निकल गया।

गलियारा अंधेरा था।

वह सीढ़ियों से नीचे उतरा।

हॉल में पहुँचते ही उसने देखा—

दीवार पर लगा वही पुराना पारिवारिक फोटो फर्श पर गिरा हुआ था।

काँच टूट चुका था।

अर्जुन ने फोटो उठाया।

लेकिन इस बार...

फोटो में कुछ बदल चुका था।

उसमें पहले चार लोग और वह लड़की थी।

अब लड़की के पास...

एक और व्यक्ति खड़ा था।

एक आदमी।

काला चेहरा।

आँखें दिखाई नहीं दे रही थीं।

बस वह अर्जुन के पीछे खड़ा था।

अर्जुन ने घबराकर पीछे देखा।

कोई नहीं।

उसने फिर फोटो देखा।

वह आदमी फोटो में नहीं था।

अर्जुन ने काँपते हाथों से फोटो नीचे रख दिया।

तभी घर के मुख्य दरवाज़े पर दस्तक हुई।

ठक... ठक... ठक...

अर्जुन जम गया।

रात के तीन बजने वाले थे।

फिर दस्तक हुई।

ठक... ठक... ठक...

इस बार किसी ने बाहर से कहा—

“अर्जुन...”

उसकी साँस अटक गई।

आवाज़...

उसके पिता की थी।

उसके पिता...

जो पाँच साल पहले मर चुके थे।

“अर्जुन... दरवाज़ा खोलो।”

अर्जुन पीछे हट गया।

आवाज़ फिर आई—

“बेटा... मैं हूँ।”

अर्जुन की आँखों से आँसू निकल आए।

“पापा...?”

दरवाज़े के बाहर से धीमी हँसी आई।

फिर वही आवाज़ बोली—

“हाँ बेटा।”

अर्जुन दरवाज़े के करीब गया।

उसका हाथ कुंडी की तरफ बढ़ा।

लेकिन जैसे ही उसकी उंगलियाँ कुंडी को छूने वाली थीं...

पीछे से किसी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

बर्फ जैसी ठंडी उंगलियाँ।

अर्जुन चीख पड़ा।

उसने पलटकर देखा।

वहाँ...

मीरा खड़ी थी।

वही सफेद फ्रॉक।

वही लाल रिबन।

लेकिन इस बार उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।

और उसके होंठों पर एक बहुत हल्की मुस्कान थी।

मीरा ने अपनी उंगली होंठों पर रखी।

“श्श्श...”

फिर उसने धीरे से दरवाज़े की तरफ इशारा किया।

अर्जुन ने काँपते हुए दरवाज़े को देखा।

बाहर से पिता की आवाज़ फिर आई—

“बेटा... दरवाज़ा खोलो।”

मीरा ने सिर हिलाकर मना किया।

अर्जुन ने पहली बार उसकी आँखों में देखा।

उसके होंठ हिले।

लेकिन आवाज़ नहीं निकली।

अर्जुन समझ नहीं पाया।

फिर उसने ध्यान से देखा।

मीरा सिर्फ दो शब्द बोल रही थी—

“वो पापा नहीं है।”

अर्जुन के पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

दरवाज़े पर दस्तक अचानक बंद हो गई।

कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।

फिर बाहर से एक अलग आवाज़ आई।

भारी।

खुरदरी।

और इंसानी नहीं।

“अर्जुन...”

मीरा ने अर्जुन का हाथ और कसकर पकड़ लिया।

बाहर से आवाज़ आई—

“तुमने मुझे पहचाना नहीं?”

अर्जुन की आँखें फैल गईं।

फिर दरवाज़े के नीचे से धीरे-धीरे...

काले रंग का पानी अंदर आने लगा।

वह पानी फर्श पर फैलता हुआ अर्जुन के पैरों तक पहुँचा।

उसमें से सड़ी हुई मिट्टी की गंध आ रही थी।

मीरा पीछे हट गई।

उसके चेहरे पर पहली बार डर दिखाई दिया।

उसने अर्जुन की तरफ देखा और बहुत धीमी आवाज़ में कहा—

“वो जाग गया है।”

अर्जुन ने पूछा—

“कौन?”

मीरा ने ऊपर देखा।

तीसरी मंज़िल की तरफ।

फिर फुसफुसाई—

“जिसे तुम्हारी दादी ने इतने सालों से बंद करके रखा था।”

अर्जुन ने ऊपर देखा।

तीसरी मंज़िल की सारी लाइटें एक साथ जल उठीं।

एक...

दो...

तीन...

फिर ऊपर किसी कमरे का दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।

क्रीईईईक...

अंधेरे कमरे के अंदर कोई खड़ा था।

बहुत लंबा।

इतना लंबा कि उसका सिर दरवाज़े की चौखट से ऊपर दिखाई दे रहा था।

अर्जुन की साँस रुक गई।

उस आकृति ने धीरे-धीरे अपना सिर झुकाया।

फिर अंधेरे में दो सफेद आँखें चमकीं।

और उसी पल पूरे घर में एक आवाज़ गूँजी—

“अर्जुन... घर वापस आने में बहुत देर कर दी।”

अर्जुन ने मीरा की तरफ देखा।

लेकिन वहाँ कोई नहीं था।

मीरा गायब हो चुकी थी।

फर्श पर सिर्फ उसकी लकड़ी की गुड़िया पड़ी थी।

और गुड़िया के पास...

खून से लिखे तीन शब्द थे—

“अब तुम अकेले हो।”

अर्जुन पीछे हटता गया।

उसका पैर किसी चीज़ से टकराया।

उसने नीचे देखा।

फर्श पर एक पुरानी तस्वीर पड़ी थी।

उस तस्वीर में...

अर्जुन खुद था।

सिर्फ सात साल का।

उसके बगल में मीरा खड़ी थी।

और उनके पीछे वही लंबी काली आकृति खड़ी थी।

तस्वीर के नीचे तारीख लिखी थी—

17 जुलाई 2008

अर्जुन ने तारीख देखते ही अपना फोन निकाला।

आज की तारीख थी—

17 जुलाई 2026।

ठीक अठारह साल बाद।

उसी तारीख।

उसी रात।

अर्जुन के हाथ से फोन गिर गया।

ऊपर तीसरी मंज़िल से कदमों की आवाज़ आने लगी।

एक...

दो...

तीन...

धीरे-धीरे कोई सीढ़ियों से नीचे उतर रहा था।

अर्जुन ने अंधेरे में ऊपर देखा।

और पहली बार उसे एहसास हुआ—

जिस घर में वह सिर्फ एक रात रुकने आया था...

वह घर उसे जाने देने वाला नहीं था।

सीढ़ियों पर कदम रुक गए।

फिर अंधेरे से एक आवाज़ आई—

“दूसरी दस्तक के लिए तैयार रहो...”

और घर की सारी घड़ियाँ एक साथ रुक गईं।

3:13 AM।

उस रात...

देवगढ़ में किसी ने दरवाज़ा नहीं खोला।

लेकिन सुबह होने तक...

घर के अंदर से तीन लोगों के चीखने की आवाज़ें पूरे जंगल में सुनी गईं।

और उनमें से एक आवाज़...

अर्जुन की नहीं थी।

वह उसके पिता की थी।

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