Pretika › Jinn & Spirits › रेत का क़ैदी
एपिसोड 1: सूनगढ़
firoj saifi · Jinn & Spirits · 16 मिनट
डॉ. मीरा राठौड़ एक पुरातत्वविद् है, जिसके पिता प्रोफेसर वी. एस. राठौड़ वर्ष 2004 में रहस्यमय परिस्थितियों में लापता हो गए थे। अपने पिता के गायब होने के पीछे का सच जानने के लिए मीरा अपने भाई कबीर, ड्राइवर भंवर सिंह और बुज़ुर्ग हकीम रुस्तम ख़ान के साथ राजस्थान के वीरान और खंडहर हो चुके सूनगढ़ क़िले पहुँचती है।
जैसलमेर से निकले हुए छह घंटे हो चुके थे, और सड़क कब की ख़त्म हो चुकी थी।
अब जीप के नीचे सिर्फ़ रेत थी। कहीं सख़्त, कहीं इतनी भुरभुरी कि पहिये धँसने लगते। भंवर सिंह ने स्टीयरिंग पर पकड़ और मज़बूत की और बिना पीछे मुड़े बोला, "मैडम, अभी भी वक़्त है। लौट चलिए।"
डॉक्टर मीरा राठौड़ ने खिड़की से बाहर देखा। दोपहर के तीन बजे थे, पर आसमान का रंग अजीब था, न नीला, न सफ़ेद, जैसे किसी ने उस पर राख मल दी हो। दूर क्षितिज पर रेत के टीले लहरों की तरह उठे हुए थे और उनके बीच कहीं कोई पेड़ या झाड़ी नहीं थी।
"भंवर जी," मीरा ने शांत आवाज़ में कहा, "आप पिछले दो दिन से यही बात कह रहे हैं। मैं आपको तीसरी बार वही जवाब दूँगी। मैं एक पुरातत्वविद हूँ। मेरा काम ऐसी जगहों पर जाना है जहाँ लोग जाने से डरते हैं।"
"डर और समझदारी में फ़र्क़ होता है, मैडम," भंवर ने धीमे से कहा। उसकी उम्र पचास के आसपास थी। चेहरे पर धूप की गहरी लकीरें थीं और आँखों में वह थकान जो रेगिस्तान में पैदा हुए लोगों की आँखों में होती है। "सूनगढ़ का नाम मेरी दादी लेती थीं, तो आवाज़ धीमी कर लेती थीं। कहती थीं कि कुछ नाम ज़ोर से लो तो वो सुन लेते हैं।"
पिछली सीट पर बैठा कबीर हँस पड़ा। वह मीरा का छोटा भाई था, उम्र सत्ताईस साल, गले में हमेशा दो कैमरे लटके रहते थे। "यार भंवर जी, आप तो हॉरर फ़िल्म की स्क्रिप्ट सुना रहे हैं। थोड़ा और सुनाइए। मैं इसे अपने ट्रैवल व्लॉग में डाल दूँगा।"
भंवर ने शीशे में कबीर को देखा। उसकी नज़र में न ग़ुस्सा था, न चिढ़। सिर्फ़ एक ठंडी सी दया थी। "बेटा, जो लोग वहाँ हँसते हुए गए थे, उनकी हँसी मैंने फिर कभी नहीं सुनी।"
कबीर की हँसी अधूरी रह गई। जीप में कुछ देर सिर्फ़ इंजन की घरघराहट सुनाई देती रही।
सीट के बीच बैठे चौथे आदमी ने अब तक एक शब्द नहीं कहा था। वह हकीम रुस्तम ख़ान थे, सत्तर के पार, सफ़ेद दाढ़ी, सिर पर पुरानी हरी टोपी और गोद में कपड़े में लिपटी एक छोटी सी पोटली। मीरा को उन्हें साथ लाने की ज़रूरत नहीं लगी थी। उन्हें भंवर ने ही बुलाया था। "अगर आप जाने पर अड़ी ही हैं," भंवर ने कहा था, "तो किसी ऐसे को साथ ले चलिए जो ये सब समझता हो।"
हकीम साहब पेशे से यूनानी हकीम थे, पर जैसलमेर और बाड़मेर के गाँवों में लोग उन्हें एक और नाम से जानते थे, आमिल। जो लोग जिन्न-भूत के मामले जानते हैं, उनके लिए यही शब्द इस्तेमाल होता है।
अचानक हकीम साहब ने आँखें खोलीं। "रोको।"
भंवर ने ब्रेक मारा। जीप थोड़ी फिसली और रुक गई।
"क्या हुआ हकीम साहब?" मीरा ने पूछा।
हकीम ने जवाब नहीं दिया। वे जीप से उतरे और रेत पर खड़े होकर चारों तरफ़ देखने लगे। हवा बिल्कुल थमी हुई थी। फिर उन्होंने झुककर मुट्ठी भर रेत उठाई, उसे सूँघा और हथेली से झाड़ दिया।
"यहाँ से आगे की ज़मीन अलग है," उन्होंने धीमे स्वर में कहा। "यहाँ हवा चलना बंद कर देती है, परिंदे उड़ना बंद कर देते हैं। देखिए, आसमान में एक भी चील नहीं है।"
मीरा ने ऊपर देखा। हकीम सही थे। पूरे आसमान में एक भी पक्षी नहीं था।
"ये महज़ संयोग हो सकता है," मीरा ने कहा, हालाँकि उसकी आवाज़ में पहले जैसा भरोसा नहीं था।
हकीम साहब ने हल्की मुस्कान के साथ उसकी तरफ़ देखा। "बेटी, संयोग उस चीज़ का नाम है जिसे हम समझा नहीं पाते।"
सूनगढ़ पहली बार दिखाई दिया शाम के लगभग पाँच बजे।
पहले दूर एक काली लकीर सी दिखी, जो टीलों के ऊपर से झाँक रही थी। जीप जैसे-जैसे नज़दीक गई, वह लकीर किले की टूटी हुई दीवार में बदलती गई। पीले बलुआ पत्थर की ऊँची प्राचीर थी, जिसमें जगह-जगह दरारें पड़ी थीं। बुर्जों के ऊपर के हिस्से ढह चुके थे, मानो किसी ने दाँत तोड़ दिए हों।
मगर सबसे अजीब बात यह थी कि किला रेत में आधा धँसा नहीं था। रेगिस्तान की रेत सदियों में हर चीज़ को निगल लेती है, पर सूनगढ़ के चारों ओर एक गोल घेरे में साफ़ ज़मीन थी, जैसे रेत उस जगह को छूने से डरती हो।
"ये तो कमाल है," कबीर ने कैमरा उठाते हुए कहा। "पाँच सौ साल पुराना किला है और रेत इसके अंदर नहीं घुसी? मीरा दी, इसका कोई वैज्ञानिक कारण होगा न?"
"होगा," मीरा ने कहा। "शायद ऊँची प्राचीर हवा को मोड़ देती है। या फिर नीचे चट्टानी ज़मीन है।" उसने जवाब दे तो दिया, पर मन में एक सवाल अटक गया था। अगर दीवार के पीछे की रेत हटी हुई थी, तो दीवार के बाहर का घेरा किसने साफ़ रखा था?
जीप फाटक के सामने रुकी। लकड़ी के विशाल दरवाज़े सदियों पहले सड़ चुके थे। अब वहाँ सिर्फ़ पत्थर की चौखट खड़ी थी, ऊपर एक अधमिटा हुआ शिलालेख लिए हुए।
मीरा ने टॉर्च निकालकर शिलालेख पर रोशनी डाली। "ये मारवाड़ी में है, पर बहुत पुरानी लिपि है। कुछ अक्षर घिस चुके हैं।" वह धीरे-धीरे पढ़ने लगी। “...जो द्वार के भीतर... प्रवेश करे... वह जाने कि... बंधन टूटने पर... और आगे घिसा हुआ है।”
भंवर सिंह जीप से नहीं उतरा। उसने सामान की गठरियाँ नीचे रखीं और दूर से ही बोला, "मैं यहीं रुकूँगा। सूरज डूबने से पहले आप लोग लौट आइएगा। और अगर किसी ने नाम पुकारा तो जवाब मत दीजिएगा।"
कबीर ने आँखें घुमाईं। "कौन नाम पुकारेगा, भंवर जी? यहाँ तो हम चार लोगों के अलावा कोई है ही नहीं।"
भंवर ने उसकी ओर देखा। "इसी बात का तो डर है, बेटा।"
किले के भीतर कदम रखते ही मीरा को लगा कि तापमान कुछ डिग्री गिर गया है। बाहर रेगिस्तान की झुलसाती गर्मी थी, पर यहाँ हवा में ठंडक थी, एक चुभती हुई ठंडक, जैसे किसी तहख़ाने में घुस गए हों।
भीतर एक चौड़ा आँगन था, जिसके चारों ओर टूटे हुए कमरे और गलियारे थे। फ़र्श पर पत्थर की टूटी हुई टाइलें बिखरी थीं, कहीं-कहीं सूखी झाड़ियाँ उग आई थीं। दीवारों पर पुरानी चित्रकारी के अवशेष थे, घोड़ों पर सवार योद्धा और फूलों की बेलें, सब धूल और समय से धुँधले।
कबीर ने कैमरा चालू कर लिया था। "हेलो दोस्तो! आज हम पहुँचे हैं राजस्थान के सबसे रहस्यमयी खंडहर सूनगढ़ में, जहाँ स्थानीय लोग कहते हैं कि..." वह रुका और कैमरे की स्क्रीन को घूरने लगा। "अरे, ये क्या हो रहा है?"
"क्या हुआ?" मीरा ने पूछा।
"कैमरा बार-बार फ़ोकस खो रहा है। देखो, यहाँ आँगन के बीचोंबीच कुछ धुँधला सा दिख रहा है।" उसने कैमरा मीरा की ओर घुमाया। स्क्रीन पर आँगन का बीच वाला हिस्सा किसी पानी की सतह की तरह काँप रहा था, जबकि आँखों से देखने पर वहाँ सिर्फ़ सपाट पत्थर था।
हकीम साहब तेज़ी से आगे बढ़े। उन्होंने कबीर के हाथ से कैमरा लगभग छीन लिया। "इसे बंद करो।"
"पर हकीम साहब..."
"बंद करो! अभी!"
उनकी आवाज़ में ऐसी सख़्ती थी कि कबीर ने बिना कुछ कहे कैमरा बंद कर दिया। हकीम ने गहरी साँस ली और धीरे से बोले, "आईने और लेंस बहुत सी चीज़ें देख लेते हैं जो आँखें नहीं देखतीं। और जो चीज़ें देखी जाती हैं, उन्हें भी पता चल जाता है कि कोई उन्हें देख रहा है।"
मीरा ने तनाव कम करने की कोशिश की। "चलिए, पहले इमारत का नक़्शा बना लेते हैं। मैं उत्तरी हिस्से की ओर जाती हूँ। कबीर, तुम मेरे साथ रहो। हकीम साहब..."
"मैं आँगन में ही रहूँगा," हकीम ने कहा। उनकी नज़र आँगन के बीच उसी जगह पर टिकी थी जहाँ कैमरे में धुँध दिखी थी। "आप लोग ज़्यादा दूर मत जाइएगा।"
उत्तरी गलियारे में मीरा को पहली अजीब चीज़ मिली।
दीवार में एक छोटा सा आला बना था, जैसे पुराने ज़माने में दीया रखने के लिए बनाया जाता है। उसमें दीया नहीं, एक छोटी सी तांबे की तख़्ती रखी थी। वह लगभग हथेली जितनी थी और हरी पड़ चुकी थी। उसकी सतह पर कुछ खुदा हुआ था।
मीरा ने दस्ताने पहने, तख़्ती उठाई और रुमाल से उसकी धूल पोंछी। नीचे से बारीक अक्षर निकले, दो अलग लिपियों में। एक देवनागरी थी और दूसरी अरबी-फ़ारसी जैसी।
"ये तो अजीब है," उसने बुदबुदाते हुए कहा। "एक ही तख़्ती पर दो धर्मों की लिपि। ये किसी हिंदू राजा के किले में किसने रखी होगी?"
कबीर ने झुककर देखा। "दी, ये अरबी वाला हिस्सा पढ़ सकती हो?"
"थोड़ा-थोड़ा।" मीरा ने आँखें सिकोड़ीं। "ये... 'क़ैद' जैसा कुछ है। और ये दूसरा शब्द... 'अशरार'... नहीं, 'शरर'..."
"शरर मतलब चिंगारी न?"
"हाँ, या आग।" मीरा का दिल थोड़ा तेज़ धड़कने लगा। "और यहाँ देवनागरी में लिखा है... 'सात कुओं का पानी, सात रातों का नमक...'"
पीछे से हकीम साहब की आवाज़ आई। वे चुपचाप आ गए थे और अब मीरा के कंधे के पीछे खड़े थे। उनका चेहरा पीला पड़ गया था। "इसे वापस रख दीजिए।"
"हकीम साहब, ये एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक..."
"बेटी," उन्होंने पहली बार इतना धीमा बोला कि मीरा को झुककर सुनना पड़ा, "ये तख़्ती कोई कलाकृति नहीं है। ये ताला है।"
मीरा के हाथ रुक गए।
"जिस चीज़ पर दो ज़बानों में लिखा जाता है," हकीम बोलते रहे, "वो इसलिए कि उसे दो अलग-अलग क़िस्म की ताक़तों को बाँधना होता है। एक ऊपरवाली और एक नीचेवाली। ये किसी को क़ैद करने का तावीज़ है, और इसे बनाने वाले ने इसे दीवार के आले में छुपाकर इसलिए रखा था कि कोई इसे छुए नहीं।"
मीरा ने तख़्ती को धीरे से आले में लौटा दिया। उसके हाथ हल्के काँप रहे थे, हालाँकि वह ख़ुद को समझा रही थी कि यह सिर्फ़ थकान है।
उसी क्षण कबीर ने कहा, "दी, एक मिनट... तुमने ये आवाज़ सुनी?"
"कौन सी आवाज़?"
"जैसे कोई... पानी टपका रहा हो।"
मीरा ने कान लगाए। सन्नाटे में दूर कहीं से सचमुच एक आवाज़ आ रही थी। बूँद गिरने की, टप... टप... टप... धीमी और बराबर अंतराल पर, जैसे किसी गहरे कुएँ में से आ रही हो।
"रेगिस्तान में पानी टपकने की आवाज़?" कबीर ने फुसफुसाकर कहा। "यहाँ तो पाँच सौ साल से पानी नहीं गिरा होगा।"
हकीम साहब ने आँखें बंद कर लीं और होंठ हिलाने लगे। कोई दुआ पढ़ रहे थे, पर आवाज़ इतनी धीमी थी कि कुछ सुनाई नहीं दिया। जब उन्होंने आँखें खोलीं तो उनमें साफ़ डर था।
"चलिए, लौट चलिए," उन्होंने कहा। "अभी, इसी वक़्त।"
"हकीम साहब, हमने तो अभी देखा ही क्या है?" मीरा ने कहा। उसकी जिज्ञासा डर पर भारी पड़ रही थी, वही जिज्ञासा जिसने उसे बीस साल से ऐसी जगहों पर भटकाया था। "वो आवाज़ किसी भूमिगत जलस्रोत की हो सकती है। अगर यहाँ कोई बावड़ी या कुआँ है तो ये किले की पूरी कहानी बदल सकता है।"
"वही तो मैं नहीं चाहता," हकीम ने कहा।
मीरा ने उनकी बात को अनसुना कर दिया। टॉर्च हाथ में लिए वह आवाज़ की दिशा में चल पड़ी। कबीर झिझका, फिर बहन के पीछे चल दिया। हकीम साहब कुछ क्षण वहीं खड़े रहे, फिर लंबी साँस लेकर उनके पीछे हो लिए। उनके हाथ में अब वह कपड़े की पोटली खुली हुई थी और उसमें से एक पुरानी काली माला झाँक रही थी।
आवाज़ उन्हें किले के पिछले हिस्से तक ले गई।
वहाँ पत्थर की सीढ़ियाँ नीचे की ओर उतर रही थीं, एक चौड़ी और अँधेरी बावड़ी की तरफ़। सीढ़ियाँ सात-सात की क़तारों में बनी थीं, हर क़तार के बाद एक चौकोर चबूतरा। नीचे गहराई इतनी थी कि टॉर्च की रोशनी भी तल तक नहीं पहुँच पा रही थी।
"नीली बावड़ी," हकीम साहब ने धीमे स्वर में कहा।
"आप इसे जानते हैं?" मीरा ने चौंककर पूछा।
"नाम सुना है। मेरे उस्ताद के उस्ताद ने इसका ज़िक्र किया था।" हकीम ने सीढ़ियों के किनारे लगे पत्थरों को देखा। "कहते हैं, इस किले के राजा ने जब हद पार कर दी थी, तब यहीं सात आमिलों ने मिलकर कुछ बाँधा था। फिर वो सातों कभी वापस नहीं लौटे।"
"क्या बाँधा था?"
हकीम ने जवाब नहीं दिया। उनकी नज़र सीढ़ियों के नीचे के अँधेरे पर टिकी थी।
मीरा ने पहला क़दम रखा। पत्थर ठंडा था, लगभग बर्फ़ जैसा। दूसरा, तीसरा। हर क़दम पर टप-टप की आवाज़ पास आती जा रही थी। सातवीं सीढ़ी पर पहुँचकर वह चबूतरे पर रुकी और नीचे टॉर्च मारी।
बावड़ी का तल अब दिखाई दे रहा था। वहाँ पानी था।
काला, स्थिर, शीशे जैसा पानी। रेगिस्तान के बीचोंबीच, पाँच सौ साल पुराने सूखे किले की तलहटी में।
"ये नामुमकिन है," मीरा ने फुसफुसाकर कहा। "यहाँ पानी कैसे..."
"दी," कबीर की आवाज़ काँप रही थी। "पानी को देखो। हिल नहीं रहा।"
मीरा ने ग़ौर किया। बावड़ी की सतह पर हर दो-तीन सेकंड में एक बूँद गिर रही थी, पर पानी में कोई लहर नहीं बन रही थी। बूँद गिरती और जैसे सतह उसे चुपचाप निगल लेती।
तभी मीरा की नज़र पानी में गई और वह जम गई। पानी में आसमान का प्रतिबिंब नहीं था। उसका अपना भी नहीं। वहाँ सिर्फ़ एक गहरी, बेरंग कालिमा थी जो नीचे की ओर बहुत दूर तक जाती लग रही थी।
और उस कालिमा के भीतर, बहुत गहरे में, कुछ हिला।
"पीछे हटो," हकीम साहब ने अचानक उसका बाज़ू पकड़कर खींचा। उनके हाथ की पकड़ लोहे जैसी थी। "अभी! पीछे हटो!"
मीरा लड़खड़ाकर पीछे हटी। उसी पल पानी की सतह पर पहली बार एक लहर उठी, छोटी सी गोलाकार लहर, जैसे किसी ने नीचे से उँगली छुआई हो।
फिर वह आवाज़ आई।
वह बूँद की आवाज़ नहीं थी। वह बहुत धीमी, बहुत पास से आती हुई आवाज़ थी, जैसे कोई कान के बिल्कुल पास होंठ लाकर फुसफुसा रहा हो।
“...मीरा...”
मीरा का पूरा शरीर सुन्न हो गया।
उसने अपना नाम इस जगह किसी को नहीं बताया था। भंवर को बताया था, पर वह तो बाहर जीप के पास था। हकीम साहब और कबीर उसके पास खड़े थे, और दोनों के होंठ बंद थे।
“...मीरा... तुम आ गईं...”
"किसने बोला?" कबीर ने घबराकर पूछा। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ चुका था। "दी, किसने तुम्हारा नाम लिया?"
हकीम साहब ने ज़ोर से हाथ उठाया। "कोई जवाब मत देना! कोई भी नहीं! जवाब देना मतलब दावत क़बूल करना है।"
“...इतने बरसों बाद... कोई तो आया...”
आवाज़ में अजीब सी मिठास थी, एक थके हुए, अकेले इंसान जैसी। इसी वजह से वह और भी ख़ौफ़नाक लग रही थी। उसमें न ग़ुस्सा था, न धमकी, सिर्फ़ एक गहरी, पुरानी तड़प थी।
“...मुझे बहुत प्यास लगी है...”
हकीम साहब ने पोटली से काली माला निकाली और मुट्ठी में कस ली। उनके होंठ तेज़ी से हिलने लगे। वे कुछ पढ़ रहे थे, अरबी जैसे शब्द, लगातार और दृढ़। उनके माथे पर पसीना चमकने लगा था।
पानी की सतह पर अब एक के बाद एक लहरें उठ रही थीं। बावड़ी के किनारे की दीवारों से रेत झरने लगी थी। ऊपर आसमान, जो अभी कुछ देर पहले राख जैसा था, अचानक गहरा काला हो गया, जबकि शाम होने में अभी देर थी।
फिर पानी के बीचोंबीच से कुछ ऊपर उठा।
पहले धुएँ की एक पतली लकीर, फिर एक आकृति। वह बहुत लंबी थी, छत तक पहुँचती हुई, और उसका कोई निश्चित आकार नहीं था। वह कभी इंसान जैसी लगती, कभी किसी विशाल परछाईं जैसी। उसके चेहरे की जगह सिर्फ़ दो अंगारे दहक रहे थे, धीमे और लाल।
कबीर के मुँह से चीख़ निकल गई।
"भागो!" हकीम साहब चिल्लाए। "सीढ़ियों से ऊपर! पीछे मुड़कर मत देखना!"
तीनों ने एक साथ सीढ़ियों की ओर दौड़ लगाई। मीरा की साँसें उखड़ रही थीं। पत्थर की सीढ़ियाँ उसे पहले से कहीं ज़्यादा लंबी लग रही थीं। उसे लग रहा था कि वह ऊपर नहीं, किसी अंतहीन ढलान पर दौड़ रही है।
पीछे से वही आवाज़ आ रही थी, अब पहले से धीमी और ज़्यादा क़रीब।
“...मत जाओ... रुक जाओ... मैं तुम्हें कुछ नहीं करूँगा...”
मीरा का पैर लड़खड़ाया। उसका एक पल को मन हुआ कि पलटकर देख ले। वह आवाज़ इतनी उदास थी, इतनी अकेली।
"मीरा!" हकीम साहब ने उसका हाथ पकड़कर पूरी ताक़त से ऊपर खींचा। "मत देखना! उसकी आवाज़ सुनने वालों को वह अपनी तरफ़ बुलाता है!"
आख़िरी सीढ़ी पार करते ही तीनों बावड़ी के बाहर आँगन में गिर पड़े। मीरा के घुटने छिल गए थे और कबीर की साँस धौंकनी की तरह चल रही थी।
सब कुछ अचानक शांत हो गया। आसमान फिर राख जैसा हो गया, पानी की आवाज़ बंद हो गई।
कुछ देर तीनों ज़मीन पर पड़े रहे। फिर कबीर ने काँपती आवाज़ में कहा, "ये... ये क्या था?"
हकीम साहब धीरे-धीरे उठे और अपनी टोपी सीधी की। उनका चेहरा राख जैसा सफ़ेद था। जब वे बोले तो आवाज़ में थकान थी।
"वो जिन्न है। और उसे इस तख़्ती ने नहीं, किसी और ने कई सौ साल पहले यहाँ बाँधा था।" उन्होंने मीरा की ओर देखा। "और बेटी, आज तुमने तख़्ती को छू लिया है।"
मीरा का गला सूख गया। "मतलब?"
हकीम ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, पर उससे पहले ही बाहर से भंवर सिंह की चीख़ सुनाई दी, जो हवा को चीरती हुई आई।
"मैडम! जल्दी बाहर आइए! जीप... जीप का इंजन..."
तीनों दौड़कर फाटक की ओर भागे। बाहर पहुँचकर उन्होंने देखा कि भंवर जीप के पास ज़मीन पर बैठा था और उसकी आँखें फटी हुई थीं। जीप का बोनट खुला था, पर इंजन में कुछ नहीं बचा था। सारे पुर्ज़े पिघले हुए लोहे की तरह मुड़े-तुड़े थे, जैसे किसी ने उन्हें भट्ठी में डालकर निकाल लिया हो।
"मैं बस पानी पीने गया था, बोतल उठाई ही थी कि..." भंवर हकलाया। "पीछे मुड़ा तो ये हाल था। मैडम, आपने... आपने ज़रूर उसे जगा दिया है।"
सूरज क्षितिज के पास पहुँच चुका था और उसकी लाल रोशनी रेत पर फैल रही थी। रेगिस्तान की रात बहुत जल्दी और बहुत गहरी उतरती है।
"अब हम लौट नहीं सकते," हकीम साहब ने धीरे से कहा। "कम से कम आज रात तो नहीं।"
कबीर घबराकर चिल्लाया, "तो क्या हम यहाँ रुकेंगे? इस जगह पर, उस चीज़ के साथ?"
"हमें रुकना ही पड़ेगा," हकीम ने कहा। "रेगिस्तान में रात को जीप के बिना निकलना मौत है। और वह..." उन्होंने किले की ओर इशारा किया, “...अब बाहर आ चुका है। हमारी सबसे बड़ी ग़लती यही थी कि हमने उसे अपना नाम बता दिया।”
"पर मैंने तो नहीं बताया!" मीरा ने कहा। "उसे मेरा नाम पहले से पता था!"
हकीम ने उसे बहुत देर तक देखा। उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मीरा को और भी डरा गया। वह डर नहीं था, वह दुख था।
"इसका एक ही मतलब है, बेटी," उन्होंने धीमे स्वर में कहा। "वह तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था।"
उसी पल किले के भीतर से, बहुत दूर से, एक आवाज़ आई। वही बूँद गिरने की, टप... टप... टप...
और उसके साथ एक फुसफुसाहट, इस बार चारों तरफ़ से, हवा में घुली हुई:
“...आज रात... बातें करेंगे... मीरा...”
भंवर ने दोनों हाथों से कान ढक लिए और ज़ोर-ज़ोर से रामनाम जपने लगा। कबीर ने बहन का हाथ कसकर पकड़ लिया। हकीम साहब ने पोटली से एक और चीज़ निकाली, चाँदी की एक छोटी सी कील, और उसे रेत पर गाड़कर चारों ओर एक गोला खींचना शुरू कर दिया।
"आज रात इस घेरे से कोई बाहर नहीं निकलेगा," उन्होंने कहा। "चाहे कितनी भी आवाज़ें आएँ, चाहे कोई अपना कितनी ही मिन्नतें करे। समझ गए?"
सबने सिर हिलाया।
सूरज की आख़िरी किरण रेत के पीछे डूब गई। और सूनगढ़ के ऊपर, पहली बार पाँच सौ सालों में, किसी ने चुपचाप आँखें खोल दीं।
- Writer
- firoj saifi
- Story
- रेत का क़ैदी
- Chapter
- 1 of 30
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 16 min
- Words
- 3195
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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