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एपिसोड 2: घेरे के भीतर

firoj saifi · Jinn & Spirits · 19 मिनट

रात रेगिस्तान में धीरे-धीरे नहीं उतरती। सूरज डूबते ही वह एक झटके में आ जाती है, जैसे किसी ने दुनिया पर काला कंबल डाल दिया हो।

हकीम रुस्तम ख़ान ने चाँदी की कील से रेत पर जो घेरा खींचा था, वह लगभग बारह फ़ुट चौड़ा था। उसकी लकीर इतनी महीन थी कि टॉर्च की रोशनी में भी मुश्किल से दिखती थी। फिर भी उसके भीतर बैठते ही चारों को कुछ अजीब सा सुकून महसूस हुआ, जैसे किसी ने भीगी हवा में अचानक खिड़की बंद कर दी हो।

भंवर सिंह ने जीप से बची-खुची चीज़ें खींचकर घेरे में रख दी थीं। दो पानी की कैनें, एक थैला रोटियों और सूखे चनों का, तीन कंबल, एक छोटा स्टोव और दो टॉर्च। कबीर ने स्टोव जलाने की कोशिश की, पर उसके हाथ इतने काँप रहे थे कि माचिस तीन बार गिर गई।

"मैं करता हूँ," भंवर ने कहा और माचिस उसके हाथ से ले ली। उसने लौ जलाई, चाय का पानी चढ़ाया और बिना किसी की तरफ़ देखे बैठ गया। उसकी आँखें किले की ओर थीं, जो अब अँधेरे में सिर्फ़ एक काली, ऊँची आकृति भर रह गया था।

मीरा ने अपने घुटनों पर पानी डालकर रुमाल से ख़ून पोंछा। घाव ज़्यादा गहरा नहीं था, पर जलन तेज़ थी। उसे अच्छा लगा कि कोई दर्द ऐसा था जो समझ में आता था।

"हकीम साहब," उसने आख़िरकार कहा, "आप कुछ कहने वाले थे। जब भंवर जी चिल्लाए थे, उससे पहले। आपने कहा था कि आज मैंने तख़्ती को छू लिया है।"

हकीम साहब ने घेरे की लकीर पर एक बार उँगली फिराई, फिर बोले, "चाय पी लो। फिर बताता हूँ। लंबी बात है।"

चाय बनी तो चारों ने मिट्टी के कुल्हड़ों में, जो भंवर साथ लाया था, गर्म चाय पी। गर्मी भीतर उतरी तो डर थोड़ा ढीला पड़ा। बाहर तारे निकलने लगे थे, इतने साफ़ और इतने ज़्यादा कि लगता था आसमान किसी ने चाँदी की धूल से भर दिया है। शहर की रोशनी में रहने वालों को यह नज़ारा कभी नसीब नहीं होता, और इस रात मीरा को उसकी ख़ूबसूरती भी डरावनी लग रही थी।

"पहले मैं तुमसे कुछ पूछूँगा, बेटी," हकीम साहब ने कुल्हड़ नीचे रखकर कहा। "तुम्हारे पिता का नाम डॉक्टर विक्रम सिंह राठौड़ था न?"

मीरा के हाथ से कुल्हड़ छूटते-छूटते बचा।

कबीर ने चौंककर हकीम की तरफ़ देखा। "आप... आप पापा को कैसे जानते हैं?"

"बताता हूँ।" हकीम की आवाज़ में थकावट थी। "पर पहले तुम बताओ मीरा। तुम्हें उनके बारे में क्या पता है?"

मीरा ने गहरी साँस ली। यह कहानी उसने बरसों से किसी को नहीं सुनाई थी, पर आज न जाने क्यों रुकना मुश्किल था।

"पापा जयपुर यूनिवर्सिटी में इतिहास पढ़ाते थे," उसने धीमे से कहना शुरू किया। "रेगिस्तानी किलों पर उनका शोध था। मैं चौदह साल की थी, कबीर पाँच साल का। एक दिन वे सर्वे के लिए जैसलमेर की तरफ़ निकले और फिर कभी नहीं लौटे। पुलिस ने कहा कि वे रेतीले तूफ़ान में रास्ता भटक गए होंगे। तलाशी हुई, पर न उनकी जीप मिली, न उनका सामान, न उनकी लाश। कुछ भी नहीं।"

उसकी आवाज़ थोड़ी भर्रा गई। "माँ ने कभी हार नहीं मानी। हर साल वे उनका जन्मदिन मनाती रहीं, मेज़ पर उनकी थाली लगाती रहीं। बारह साल तक। फिर एक दिन उन्हें नींद में ही हार्ट अटैक आया और वे भी चली गईं। उसके बाद मैंने तय किया कि मैं भी वही बनूँगी जो पापा थे। शायद इसलिए कि मुझे लगता था, उनके रास्ते पर चलते-चलते कभी न कभी मैं उन तक पहुँच जाऊँगी।"

कबीर चुपचाप सिर झुकाए बैठा रहा। उसकी उँगलियाँ अपने कैमरे के पट्टे को मसल रही थीं। उसे पिता की बस धुँधली सी याद थी, एक लंबा आदमी जो उसे कंधे पर बिठाकर घुमाता था। बाक़ी सब वह बड़ी बहन की सुनाई कहानियों से जानता था।

"मैं कभी नहीं मान पाया कि वो मर गए," कबीर ने अचानक कहा। उसकी आवाज़ फटी हुई थी। "लोग मुझे पागल कहते थे। पर जब आप किसी को मरते हुए नहीं देखते, तो दिल के किसी कोने में वो हमेशा ज़िंदा रहता है।"

हकीम साहब ने आँखें बंद कर लीं। कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला। सिर्फ़ स्टोव की धीमी लौ चटक रही थी।

"बाईस साल पहले," हकीम ने आख़िरकार कहा, "एक सुबह तुम्हारे पिता मेरी दुकान पर आए थे। जैसलमेर के पुराने बाज़ार में, जहाँ मैं तब नब्ज़ देखा करता था।"

मीरा की साँस रुक गई।

"वो एक पुरानी तस्वीर लेकर आए थे। सूनगढ़ की एक बहुत पुरानी तस्वीर, जो किसी अंग्रेज़ अफ़सर ने खींची थी। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं जानता हूँ कि इस किले को लोग क्यों छोड़कर चले गए थे। मैंने उनसे झूठ बोला। कहा कि मैं कुछ नहीं जानता। पर वो ज़िद्दी आदमी थे। उन्होंने कहा, 'हकीम साहब, मैं जानता हूँ कि आपके उस्ताद इस किले के बारे में कुछ जानते थे।'"

"तो आप..." मीरा की आवाज़ टूट गई।

"मैंने उन्हें सब कुछ बता दिया," हकीम ने कहा, और पहली बार मीरा ने उस बूढ़े आदमी की आँखों में आँसू देखे। "मैंने उन्हें बताया कि सूनगढ़ में एक क़ैदी है। मैंने उन्हें ख़ूब समझाया कि वे वहाँ न जाएँ। मैंने कहा कि जिस चीज़ को सात आमिलों ने अपनी जान देकर बाँधा था, उसे छेड़ना मौत को दावत देना है। पर वो नहीं माने। उन्होंने मुझसे वादा किया कि बस दूर से देखेंगे, भीतर नहीं जाएँगे। मैंने उन पर भरोसा किया।"

"और फिर?"

"फिर एक हफ़्ते बाद ख़बर आई कि डॉक्टर राठौड़ लापता हैं।" हकीम की आवाज़ बहुत धीमी हो गई। "बाईस साल से मैं ख़ुद को यही समझाता रहा कि मेरी वजह से कुछ नहीं हुआ। कि वो वैसे भी चले जाते। पर सच यही है बेटी, कि उन्हें वहाँ मैंने भेजा। मेरे शब्द उनके क़दमों के रास्ते बन गए। जब मैंने सुना कि मीरा राठौड़ नाम की एक पुरातत्वविद सूनगढ़ पर शोध करना चाहती है, तो मुझे लगा कि क़िस्मत मुझे दूसरा मौक़ा दे रही है। इसलिए मैं भंवर के कहने पर आ गया। मैं तुम्हें वहाँ जाने से रोक नहीं पाया, तो सोचा कम से कम साथ रहकर बचा लूँ।"

मीरा कुछ देर तक सुन्न बैठी रही। पिता का वह चेहरा, जिसे वह बाईस साल से अपनी यादों में सँजोए बैठी थी, एक बार फिर उसकी आँखों के सामने आ गया। उनकी मुस्कान, उनकी भारी आवाज़, वे कहानियाँ जो वे हर रात सुनाया करते थे।

"आपने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?" उसने काँपती आवाज़ में पूछा। उसमें ग़ुस्सा था, और उसके नीचे एक पुराना दर्द।

"क्योंकि मैं बुज़दिल था," हकीम ने सीधे कहा। "और क्योंकि मुझे यक़ीन नहीं था कि तुम मुझे माफ़ करोगी।"

मीरा ने कुछ नहीं कहा। वह उठकर घेरे के किनारे गई और अँधेरे में देखने लगी। उसकी पीठ पर तीन लोगों की निगाहें थीं, पर उसने किसी की तरफ़ नहीं देखा।

उसी वक़्त उसने महसूस किया कि कोई उसके पास आकर खड़ा हो गया है। भंवर सिंह।

"मैडम," उसने धीमे से कहा, "मैं भी आपसे एक बात छुपा रहा था।"

मीरा ने सिर घुमाकर उसे देखा। भंवर की नज़र ज़मीन पर थी।

"मेरा छोटा भाई था, जगत। उम्र में मुझसे बारह साल छोटा। बीस बरस का था जब... पंद्रह साल पहले की बात है। उसे ऊँटों का बहुत शौक़ था। एक दिन कुछ पर्यटक आए, उन्होंने सूनगढ़ की सैर के लिए पैसे दिए। जगत ने मुझसे पूछा तो मैंने मना किया। उसने मेरी बात नहीं मानी। रात को ऊँट लेकर निकल गया।"

भंवर की आवाज़ में वही सूनापन था जो पूरे दिन उसके चेहरे पर टिका रहा था। "तीन दिन बाद ऊँट वापस आया। अकेला। उसकी पीठ पर ख़ून के छींटे थे और एक पोटली बँधी थी। पोटली में सिर्फ़ मेरे भाई की टोपी थी, और वो भीगी हुई थी। पूरी तरह भीगी, रेगिस्तान के बीच।"

मीरा के पूरे बदन में सिहरन दौड़ गई। "भीगी?"

"जैसे किसी ने पानी में डुबोकर निकाली हो।" भंवर ने सिर उठाया और उसकी आँखों में अब वही चीज़ थी जो मीरा ने सुबह जीप में देखी थी, पर अब वह ख़ौफ़ से कहीं गहरी थी। "मैंने बाईस साल की उम्र में जगत को पाला था, मैडम। माँ-बाप के बाद। वही मेरा सब कुछ था। मैं आज इसलिए आया हूँ कि मैं उसकी जगह देखना चाहता था। मुझे बस एक बार जानना था कि वहाँ क्या हुआ था।"

"आप ये सब पहले भी बता सकते थे।"

"क्या बताता? कि मैं बदले के लिए आया हूँ? या सच जानने के लिए? मुझे ख़ुद नहीं पता था।" भंवर ने थके हुए आदमी की तरह कंधे झुका लिए। "लेकिन आज जब उस बावड़ी में पानी देखा, जो बहता नहीं था..."

वह बात पूरी नहीं कर सका।

अब तक कबीर भी पास आ गया था। उसने मीरा के कंधे पर हाथ रखा। "दी, हम सबका इस जगह से कोई न कोई नाता है। ये संयोग नहीं हो सकता।"

मीरा ने सबके चेहरे बारी-बारी से देखे। पिता को खोने वाली एक बेटी, भाई को खोने वाला एक भाई, एक बूढ़ा हकीम जो बाईस साल से अपने अपराध-बोध के साथ जी रहा था, और एक छोटा भाई जिसे अपनी बहन की कहानी बरसों से पता थी, पर जिसने हमेशा सवाल पूछने से डरना चुना था।

हर किसी के पास इस रेगिस्तान में आने की अपनी वजह थी। और वह वजह ख़ुद उन्हें यहाँ लाई थी।

"हकीम साहब," मीरा ने धीरे से पूछा, "वो जिन्न हमें ही क्यों बुला रहा है? क्या उसे हमारे अतीत से कोई मतलब है?"

हकीम ने सिर हिलाया। "जिन्न इंसान की सबसे गहरी चीज़ें सूँघ लेते हैं। जो ज़ख़्म हम सबसे ज़्यादा छुपाते हैं, वही उनके लिए दरवाज़े का काम करता है। वो आज रात हम सबको उसी दरवाज़े से बुलाएगा।"

रात के लगभग ग्यारह बजे, जब चाँद ऊपर चढ़ आया था और रेत पर चाँदी जैसी रोशनी फैल गई थी, पहली बार घेरे के बाहर कुछ हिला।

कबीर पहरे पर था। बाक़ी तीनों कंबलों में लिपटे थे, हालाँकि नींद किसी की आँखों में नहीं थी। कबीर ने कैमरा तो बंद कर रखा था, पर उसकी आदत थी कि जब डर लगे तो वह किसी चीज़ को गौर से देखता रहे। उसने इसी तरह घेरे के बाहर के टीलों को देखते-देखते महसूस किया कि एक टीले की चोटी पर कुछ खड़ा है।

सीधा, स्थिर, एक इंसानी आकृति।

"भंवर जी..." उसने धीरे से पुकारा।

भंवर ने तुरंत कंबल हटाया। "क्या हुआ?"

"उधर देखो। उस टीले पर।"

भंवर ने देखा और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। टीले की चोटी पर एक आदमी खड़ा था, चाँद की रोशनी में उसका सिर्फ़ सिल्हूट दिख रहा था। वह धीरे-धीरे हाथ हिला रहा था, इशारा करता हुआ, जैसे कह रहा हो, "इधर आओ।"

"ये... ये तो..." भंवर के होंठ काँपे। "ये जगत जैसा खड़ा है। उसी तरह कंधा झुकाकर, एक पैर आगे निकालकर।"

"भंवर जी, चुप रहिए," हकीम साहब की आवाज़ आई। वे उठकर बैठ चुके थे। उनकी आँखें पूरी तरह खुली थीं और उनमें नींद का कोई निशान नहीं था। "वो तुम्हारा भाई नहीं है। वो उसकी परछाईं भर है, जो तुम्हारे दिल से चुराई गई है। जवाब मत देना।"

पर भंवर पहले से सुन रहा था। हवा में एक बहुत धीमी आवाज़ तैर रही थी। वह कबीर और मीरा को भी सुनाई दी, पर सिर्फ़ भंवर को उसमें शब्द सुनाई दे रहे थे।

"भाई... भाई, मुझे यहाँ ठंड लग रही है... मुझे घर ले चलो..."

भंवर की आँखों से आँसू बहने लगे। "जगत..." उसके होंठों से निकला। "जगत मेरे भाई..."

"भंवर!" कबीर ने उसका हाथ पकड़ा। "देखो मुझे! वो तुम्हारा भाई नहीं है!"

"भाई, तुमने कहा था तुम मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ोगे... मैं बहुत अकेला हूँ..."

भंवर ने झटके से कबीर का हाथ छुड़ाया और घेरे की लकीर की ओर बढ़ा। उसके क़दम किसी नींद में चलने वाले की तरह थे, धीमे और बेसुध। मीरा ने भागकर उसकी बाँह पकड़ी, पर भंवर की ताक़त उस वक़्त किसी जुनूनी की सी थी। उसने मीरा को झटक दिया और लकीर के पास पहुँच गया।

हकीम साहब ने उसकी कमर में दोनों हाथ डालकर पूरा ज़ोर लगाया। "मत जाओ! भंवर! वो तुम्हें मार देगा!"

"मेरा भाई वहाँ है! आप नहीं समझते!" भंवर चीख़ा, और उसकी आवाज़ किसी घायल जानवर जैसी थी। "वो मुझे बुला रहा है! पंद्रह साल से उसकी आवाज़ मेरे सपनों में आती रही है! मैं उसे फिर नहीं छोड़ सकता!"

कबीर ने तभी वही किया जो उस पल उसे सूझा। उसने भंवर के सामने आकर उसे दोनों कंधों से पकड़ा और चिल्लाया, "तो मुझे बताओ भंवर जी, जगत के हाथ में क्या था?"

भंवर रुक गया।

"क्या?"

"जगत ने जो टोपी पहनी थी, उसका रंग क्या था? उसकी कोई ऐसी बात बताओ जो सिर्फ़ तुम जानते हो!"

भंवर ने उलझन में कबीर को देखा। फिर टीले की ओर देखा। चाँद की रोशनी में वह आकृति अब भी हाथ हिला रही थी। उसके हाथ में कुछ नहीं था।

"जगत... जगत हमेशा अपनी टोपी हाथ में रखता था," भंवर बुदबुदाया। "जब वो घबराता था। हमेशा टोपी को मसलता रहता था..."

वह एक पल को ठिठका। फिर उसकी आँखें फैल गईं।

"उसके हाथ में टोपी नहीं है।"

टीले पर खड़ी आकृति अचानक ठहर गई। हाथ हिलाना बंद हो गया। चाँदनी में उसका सिर धीरे-धीरे एक तरफ़ झुका, इतना कि इंसान की गर्दन उतना नहीं झुक सकती।

फिर वह हँसा।

वह हँसी किसी इंसान की नहीं थी। उसमें सैकड़ों आवाज़ें थीं, मर्द, औरतें, बच्चे, सब एक साथ हँसते हुए, एक कर्कश, खोखली, दर्दनाक गूँज में। आकृति का चेहरा अब बदलने लगा था, जगत का चेहरा पिघलकर किसी और चीज़ में ढल रहा था, किसी लंबे, खिंचे हुए, अंगारों जैसी आँखों वाले चेहरे में।

“...चतुर बालक...” हवा में आवाज़ गूँजी, इस बार जगत की नहीं, वही गहरी, मीठी आवाज़ जो बावड़ी में सुनाई दी थी। “...पर मैं कोई चाल नहीं चल रहा था, भंवर सिंह। तुम्हारा भाई सचमुच यहाँ है। और ठंड भी उसे सचमुच लगती है।”

भंवर के घुटने जवाब दे गए और वह रेत पर ढह गया। मीरा और कबीर ने उसे संभाला। उसका पूरा बदन काँप रहा था।

आकृति गायब हो चुकी थी।

हकीम साहब ने गहरी, थरथराती साँस ली। उनके हाथ में काली माला के दाने तेज़ी से घूम रहे थे। "वो हमारा इम्तिहान ले रहा था। देख रहा था कि हममें से सबसे कमज़ोर कड़ी कौन है।"

"और कौन थी?" मीरा ने पूछा।

"जो आज रात टूट जाएगा, वही जिन्न की चाबी बनेगा," हकीम ने कहा। "इसलिए आज रात किसी को अकेला नहीं छोड़ना। कोई भी अकेला नहीं रहेगा।"

आधी रात के बाद हवा चलने लगी।

वह ठंडी, पतली हवा थी, जो रेत के कणों को लहराती हुई घेरे तक आती और लकीर के पास पहुँचकर बिखर जाती। कबीर और मीरा एक-दूसरे के पास कंबल में लिपटे बैठे थे। भंवर सिर झुकाए, घुटनों में चेहरा छुपाए, हल्के-हल्के सिसक रहा था। हकीम साहब बीच में बैठे लगातार कुछ पढ़ रहे थे।

तभी मीरा ने महसूस किया कि स्टोव की लौ टेढ़ी हो गई है, और बुझने लगी है। उसके पास वाली पानी की कैन से कुछ टपकने की आवाज़ आ रही थी।

टप... टप... टप...

उसने पानी की कैन की तरफ़ देखा। कैन का ढक्कन बंद था, और कैन बिल्कुल सूखी थी। पर आवाज़ बहुत पास से आ रही थी।

फिर उसे समझ आया। आवाज़ कैन से नहीं, उसके अपने पैरों के नीचे से आ रही थी।

उसने धीरे से टॉर्च जलाकर रेत पर रोशनी डाली। घेरे के भीतर, ठीक उसके बैठने की जगह से कुछ ही इंच दूर, रेत पर गीला धब्बा बन रहा था। धब्बा फैल रहा था। ऊपर से कुछ टपक नहीं रहा था, पानी सीधे नीचे से रेत को भिगोता हुआ ऊपर आ रहा था।

मीरा ने इशारे से हकीम का ध्यान खींचा। हकीम ने गीले धब्बे को देखा, उनकी आँखें सिकुड़ गईं।

"घेरे की लकीर टूटी नहीं है," उन्होंने धीमे से कहा, "पर वो ज़मीन के नीचे से आ रहा है। रेत के नीचे से।" उन्होंने झट से जेब से चाँदी की कील निकाली और धब्बे के बीच गाड़ दी।

पानी रुक गया।

पर उसी पल कबीर की चीख़ निकल गई।

"दी! मेरी बोतल!"

कबीर के पास वाली पानी की बोतल उलटी पड़ी थी, और उसमें से पानी बह रहा था। पर पानी का रंग काला था, गाढ़ा, स्याही जैसा। और बोतल की सतह पर, काँच जैसे पारदर्शी प्लास्टिक के भीतर, कबीर को अपनी शक्ल दिखाई दे रही थी।

पर वह शक्ल मुस्कुरा रही थी।

कबीर गंभीर था। उसके होंठ बंद थे और माथे पर पसीना था, पर बोतल में दिखता चेहरा मुस्कुरा रहा था, चौड़ा, चीरता हुआ, जबड़े के सिरे तक।

"बंद करो उसे!" कबीर ने बोतल दूर फेंक दी। वह रेत पर लुढ़कती हुई घेरे के बाहर चली गई और काले पानी की एक लंबी लकीर पीछे छोड़ गई।

"देखो मत!" हकीम साहब ने उसका चेहरा अपनी तरफ़ घुमाया। "शीशे और पानी, वो इन्हीं से बात करता है। अब कोई अपना चेहरा किसी चीज़ में मत देखना। न बोतल में, न कैमरे में, न किसी चमकती चीज़ में।"

मीरा ने धीरे से अपने आसपास की सब चीज़ें देखीं। टॉर्च की चमकती सतह, कैन का टीन, चाय के कुल्हड़ में बचे हुए पानी की परछाईं। हर जगह चाँद की झिलमिलाती रोशनी थी, और उसे लग रहा था कि हर जगह से कोई उसे देख रहा है।

"मुझे पता है तुम सब क्या सोच रहे हो," उसने धीमी आवाज़ में कहा। "कि हम यहाँ से कभी नहीं निकल पाएँगे।"

"निकलेंगे," हकीम ने कहा। "सुबह होने तक।"

"आप झूठ बोल रहे हैं।"

हकीम चुप रहे। मीरा ने पहली बार उन पर हल्का सा गुस्सा महसूस किया, फिर जल्द ही वह ग़ुस्सा बुझ गया। वे अकेले आदमी थे जो उस वक़्त सच बोलने की हिम्मत रखते थे, और उनकी चुप्पी ही उसका जवाब थी।

रात के तीन बजे, जब सबसे गहरा अँधेरा होता है, किले की ओर से एक रोशनी दिखी।

वह पीली, धीमी रोशनी थी, किसी दीये या मशाल जैसी। वह किले की प्राचीर के ऊपर चलती हुई आ रही थी, धीरे-धीरे एक बुर्ज से दूसरी बुर्ज की ओर, जैसे कोई चौकीदार गश्त पर हो।

"वहाँ कोई है," कबीर ने फुसफुसाकर कहा।

"कोई नहीं है," हकीम ने कहा, पर इस बार उनकी आवाज़ में कम यक़ीन था।

रोशनी बुर्ज के कोने पर रुकी। फिर उसके पीछे से एक आकृति उभरी, एक आदमी की, जिसके हाथ में सचमुच एक मशाल थी। वह आदमी प्राचीर के किनारे पर खड़ा हुआ और नीचे घेरे की ओर देखने लगा।

मीरा की आँखें अँधेरे में गड़ी रहीं। उसे लगा कि वह उस आकृति को जानती है। उस कंधे की ढलान, उस सिर के झुकाव को।

"पापा..." उसके होंठों से अनजाने में निकला।

"नहीं!" हकीम साहब ने उसका मुँह दबा दिया। "नहीं, बेटी! वो तुम्हारे पिता नहीं हैं!"

पर मीरा की आँखें उस आकृति पर टिकी रहीं। वह आदमी अब हाथ उठाकर उसकी ओर इशारा कर रहा था, उसी तरह जैसे बचपन में पापा सर्वे से लौटते वक़्त दूर से हाथ हिलाया करते थे, जब वह छत पर खड़ी इंतज़ार करती थी।

"मीरा..." आवाज़ आई, और इस बार वह सुनने में कुछ अलग थी। गहरी, भारी, पिता की जैसी। "मेरी गुड़िया... मैं यहाँ हूँ..."

मीरा के गले से एक सिसकी निकल गई। उसका बदन लड़खड़ाया। उसके भीतर बाईस साल की सारी रातें एक साथ जाग उठीं, वे सारी रातें जब वह खिड़की पर बैठकर पापा का इंतज़ार करती थी, जब उसने सुबह-सुबह फ़ोन की हर घंटी पर दौड़कर उठाया था, जब माँ ने उसका सिर सहलाकर कहा था, "वो आएँगे, बेटा।"

"मैं बहुत थक गया हूँ मीरा... मुझे बचा ले... सिर्फ़ तू ही मुझे यहाँ से निकाल सकती है..."

"दी!" कबीर ने उसका बाज़ू पकड़ा। "ये पापा नहीं हैं! तुम ख़ुद कह रही थीं कि जिन्न सबसे गहरे ज़ख़्म पर वार करता है!"

"पर अगर ये सच हुआ तो?" मीरा की आवाज़ टूट रही थी। आँसू उसके गालों पर बह रहे थे। "अगर पापा वाकई वहाँ हों, कबीर? इतने साल... बाईस साल से वो वहाँ अकेले हों?"

"अगर वो सच में पापा हैं," कबीर ने काँपते हुए, पर दृढ़ आवाज़ में कहा, "तो वो कभी नहीं चाहेंगे कि तू अपनी जान ख़तरे में डालकर उनके पास जाए। वो हमेशा हमें बचाने वाले थे, बुलाने वाले नहीं!"

वही बात, जो भंवर को रोकने के लिए कही गई थी, अब मीरा को रोकने के लिए कही जा रही थी। एक पल को मीरा के क़दम घेरे की लकीर तक पहुँच गए। उसने एक बार आख़िरी बार प्राचीर की ओर देखा।

आकृति अब भी वहाँ खड़ी थी। मशाल की रोशनी में उसका चेहरा पहली बार थोड़ा साफ़ दिखा।

वह चेहरा पापा का नहीं था। वह किसी का भी चेहरा नहीं था। वहाँ सिर्फ़ एक चिकनी, सपाट खाल थी, बिना आँखों, नाक या होंठ के। और उस सपाट चेहरे के बीच से एक पतली सी दरार खुल रही थी, धीरे-धीरे, एक मुस्कान की तरह।

मीरा ने चीख़ दबाई और पीछे हट गई। कबीर ने उसे सीने से लगा लिया।

हकीम साहब ने अब पूरे ज़ोर से पढ़ना शुरू कर दिया था। उनकी आवाज़ रात के सन्नाटे में गूँज रही थी, और उसके साथ घेरे की लकीर हल्की-हल्की सुनहरी चमकने लगी थी। प्राचीर की आकृति ठिठकी, मशाल बुझ गई, और अँधेरा फिर से सब कुछ निगल गया।

सुबह की पहली किरण से पहले वाला पल रेगिस्तान में सबसे ख़ामोश होता है।

चारों थके-हारे बैठे थे। भंवर ने रोना बंद कर दिया था, पर उसकी आँखें अब भी लाल थीं। कबीर कंबल में सिर छुपाए बैठा था और मीरा की उँगलियाँ अब तक भाई की हथेली को पकड़े हुए थीं। हकीम साहब की आवाज़ बैठ गई थी, पर उनके होंठ अब भी धीमे-धीमे हिल रहे थे।

पूर्व में पहली धुँधली लाली फैली।

सबने एक साथ राहत की साँस ली। कबीर कुछ कहने ही वाला था कि हकीम साहब ने हाथ उठाकर उसे रोका।

"अभी नहीं।"

वे उठकर खड़े हुए और घेरे की लकीर तक गए। उन्होंने झुककर लकीर को ग़ौर से देखा, फिर चाँदी की कील उठाई। जब वे पलटे तो उनका चेहरा बदल चुका था।

"घेरा आधा टूट चुका है।"

"क्या?" मीरा ने उठते हुए कहा। "पर ये तो..."

"उत्तर की तरफ़ वाली लकीर मिट चुकी है," हकीम ने कहा। "कोई हवा या रेत की वजह से नहीं। उस तरफ़ किसी के पैरों के निशान हैं। घेरे के भीतर से बाहर की तरफ़ गए हुए।"

सब ने उस दिशा में देखा।

रेत पर साफ़ निशान थे, किसी के नंगे पैरों के, जो घेरे के बीच से शुरू होकर लकीर पार करते हुए बाहर टीले की ओर गए थे।

"हम चारों तो यहीं बैठे थे," कबीर ने फुसफुसाकर कहा। "कोई घेरे से बाहर नहीं गया।"

"गिनती करो," हकीम साहब ने अचानक कहा। उनकी आवाज़ अजीब सी तेज़ हो गई थी। "हम कितने लोग हैं?"

"चार," मीरा ने कहा। "आप, मैं, कबीर और भंवर जी।"

"भंवर कहाँ है?"

तीनों ने एक साथ पलटकर देखा।

जहाँ भंवर सिंह रात भर बैठा रहा था, वहाँ सिर्फ़ एक कंबल पड़ा था। उसके पास रखे कुल्हड़ में थोड़ा सा चाय का पानी बचा था, और कुल्हड़ के तले में एक चीज़ चमक रही थी।

एक छोटी, भीगी हुई टोपी, जो किसी बीस साल के नौजवान की हो सकती थी।

रेत पर पड़े नंगे पैरों के निशान सीधे किले की ओर जा रहे थे।

और दूर, किले के भीतर से, बहुत धीमी, बहुत साफ़ आवाज़ आई:

“...एक आ गया... अब बाक़ी तीन भी आ जाएँगे...”

Writer
firoj saifi
Story
रेत का क़ैदी
Chapter
2 of 30
Category
Jinn & Spirits
Reading time
19 min
Words
3782
Language
Hindi (हिंदी)
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