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एपिसोड 3: तहख़ाना

firoj saifi · Jinn & Spirits · 15 मिनट

भंवर सिंह के बिना घेरे की चुप्पी बहुत भारी हो गई थी।
कबीर पहले पल में दौड़कर किले की ओर बढ़ा। मीरा ने उसकी कमीज़ पकड़कर पीछे खींचा और हकीम साहब ने उसका रास्ता रोक लिया। "रुको!" हकीम की आवाज़ बैठी हुई थी, पर उसमें अब भी हुक्म की धार थी। "तुम अकेले उधर गए तो दो आदमी खोएँगे, फिर हम उन्हें ढूँढने जाएँगे, फिर और खोएँगे। यही वो चाहता है।"
"तो क्या हम उसे छोड़ दें?" कबीर चिल्लाया। उसकी आँखें लाल थीं और होंठ फड़क रहे थे। "वो आदमी रात भर रोता रहा, हकीम साहब! उसने अपना भाई खोया है! और हम यहाँ बैठे उसे जाते हुए देखते रहे!"
"हमने उसे जाते हुए नहीं देखा," मीरा ने धीरे से कहा। उसे ख़ुद अपनी आवाज़ अजनबी लगी, इतनी ठंडी और ठहरी हुई। "हम सब रात भर जागे थे। पर किसी ने उसे उठते नहीं देखा। न कोई आहट, न कोई परछाईं।"
हकीम ने सिर हिलाया। "इसका मतलब वो अपने पैरों से नहीं गया। उसे बुलाया गया था, और बुलावा इतना गहरा था कि उसके पैर उसे ख़ुद ले गए, और हमारी नज़रें उसे देख ही नहीं पाईं।" उन्होंने पूर्व की ओर देखा, जहाँ आसमान पर लाली गहरी होती जा रही थी। "सूरज निकलने वाला है। सुबह की पहली एक-दो घड़ी में उसकी पकड़ सबसे ढीली होती है। जो करना है, अभी करना है।"
"तो चलिए," मीरा ने कहा।
हकीम ने उसे ग़ौर से देखा, जैसे कुछ तौल रहे हों। "तुम्हें डर नहीं लग रहा, बेटी?"
"बहुत लग रहा है," मीरा ने साफ़ कहा। "पर मैं बाईस साल एक ग़ायब आदमी का इंतज़ार कर चुकी हूँ। एक और को ग़ायब होते नहीं देख सकती।"
तैयारी में आधा घंटा लगा।
हकीम साहब ने अपनी पोटली पूरी खोल दी और सारा सामान रेत पर बिछा दिया। काली माला, चाँदी की तीन और कीलें, मोटे नमक का एक थैला, लाल धागे का गुच्छा, एक पुरानी तांबे की कटोरी, और एक छोटी सी बोतल जिसमें गाढ़ा भूरा तेल था।
"नियम सुन लो," उन्होंने तीनों को सामने बैठाकर कहा। "पहला, हम सब एक रस्सी से बँधकर चलेंगे। जीप में जो रस्सी थी वो है न? कमर पर बाँधो। अगर किसी को कुछ दिखे या सुनाई दे तो रस्सी खींचकर बताओ, आवाज़ से नहीं। दूसरा, कोई पानी की तरफ़ नहीं देखेगा। कुआँ, बावड़ी, कोई ठहरा हुआ गड्ढा, कुछ नहीं। तीसरा, अगर कोई अपना नाम पुकारे, चाहे आवाज़ माँ की हो या बाप की, जवाब नहीं देना। चौथा..." वे रुके। "चौथा और सबसे ज़रूरी। अगर मैं कहूँ कि भागो, तो पीछे मुड़कर मत देखना। मेरी तरफ़ भी नहीं।"
कबीर के गले में कुछ अटक गया। "हकीम साहब..."
"वादा करो।"
"वादा।"
हकीम ने हर किसी की कलाई पर लाल धागा बाँधा और उस पर नमक की चुटकी रगड़कर उँगली से तेल का एक बिंदु लगाया। तेल से अजीब सी महक आती थी, जली हुई लकड़ी और गुलाब के बीच की। मीरा ने पूछा तो उन्होंने कहा, "ये ऊद है। ये उसे दूर रखता है जो सुगंध से बेचैन होता है।"
"और कौन बेचैन होता है?" कबीर ने पूछा।
"हम सब," हकीम ने कहा। "पर जिन्न कुछ ज़्यादा ही।"
उन्होंने रस्सी बाँधी। सबसे आगे हकीम, बीच में मीरा, फिर कबीर। हर किसी के हाथ में एक टॉर्च थी, यद्यपि सूरज की सुनहरी किरणें अब रेत की सतह को छू चुकी थीं और किला पहले दिन से भी ज़्यादा साफ़ दिख रहा था।
पर साफ़ दिखने का मतलब यह नहीं था कि वह डरावना कम हो गया था। सूरज की रोशनी में सूनगढ़ की प्राचीर पर लगे काले धब्बे साफ़ नज़र आ रहे थे, किसी जले हुए पत्थर के निशान, बेतरतीब और बहुत पुराने। और पूरी दीवार में एक भी पक्षी का घोंसला नहीं था, जबकि रेगिस्तानी किलों में कबूतर और चील हर कोने में बसेरा बनाते हैं।

भंवर के पैरों के निशान किले के फाटक से भीतर गए थे और आँगन के बीच से होते हुए उत्तरी गलियारे की ओर मुड़ गए थे। रेत पर वे साफ़ थे, पर जैसे ही तीनों भीतर पत्थर के फ़र्श पर पहुँचे, निशान बदल गए। अब वे गीले थे।

हर निशान में पानी भरा था, और पानी की सतह पर हल्की सी चमक थी, जैसे किसी ने पैर रखते ही उसमें से सोते निकाल दिए हों। मीरा ने झुककर देखने की कोशिश की, पर हकीम ने उसका कंधा दबाया। "देखना मत। बस चलते रहो।"

वे गलियारे तक पहुँचे। मीरा के क़दम अपने आप धीमे हो गए, क्योंकि उसे कल की एक बात याद आ गई थी।

"हकीम साहब," उसने धीरे से कहा, "वो आला।"

"कौन सा?"

"जहाँ वो तांबे की तख़्ती रखी थी। मैंने उसे वापस रख दिया था।" मीरा ने गलियारे की दीवार की ओर इशारा किया। "वो आला अब ख़ाली है।"

तीनों ठिठक गए। आला पत्थर की दीवार में एक छोटा सा चौकोर खाँचा था, और उसमें अब सिर्फ़ धूल जमी थी, तख़्ती का कोई निशान नहीं। पर हैरानी इस बात की नहीं थी। हैरानी यह थी कि आले के पीछे, जहाँ कल तक ठोस दीवार थी, अब एक पतली सी दरार खुली थी, ऊपर से नीचे तक, और उसके भीतर से ठंडी हवा आ रही थी।

कबीर ने टॉर्च की रोशनी दरार पर डाली। "ये दरवाज़ा है," उसने फुसफुसाया। "पत्थर का, दीवार जैसा बनाया हुआ। ताला खुलते ही ये किनारे से हट गया है।"

हकीम साहब के चेहरे पर कुछ दौड़ गया, डर या पहचान, कहना मुश्किल था। "तख़्ती इसकी चाबी थी," उन्होंने बुदबुदाते हुए कहा। "आला उसका ताला था। जो कल मैंने सोचा था उसका उल्टा।"

"पर चाबी तो ग़ायब है," मीरा ने कहा। "फिर दरवाज़ा किसने खोला?"

"जिसके पास कल तख़्ती थी," हकीम ने धीरे से कहा। उनकी नज़र सीधी मीरा पर थी। मीरा ने इनकार में सिर हिलाया, पर उसके मन में कहीं कुछ चुभ रहा था।

दरार के भीतर अँधेरा था। पत्थर की सीढ़ियाँ नीचे की ओर उतरती थीं, और सीढ़ियों पर, ठीक भंवर के पैरों के गीले निशान थे, एक के बाद एक, नीचे की ओर, अँधेरे में गुम होते हुए।

"मैं सबसे आगे चलता हूँ," हकीम ने कहा। "तुम दोनों मेरे पीछे। मीरा, तुम बीच में रहो और रस्सी को ढीला मत होने देना।"

वे नीचे उतरने लगे।

तहख़ाने की सीढ़ियाँ गिनने लायक़ नहीं थीं। हर सीढ़ी के बाद एक और सीढ़ी आती थी, और टॉर्च की रोशनी हर बार बस थोड़ा सा आगे जाकर दम तोड़ देती थी। हवा में अजीब सी नमी थी, पर वह नमी पानी की नहीं थी, पुराने काग़ज़ और जंग लगे लोहे जैसी महक वाली थी।

लगभग तीन मंज़िल नीचे उतरकर सीढ़ियाँ एक चौड़े गलियारे में खुलीं। दोनों तरफ़ दीवारों में छोटे आले बने थे, सैकड़ों, हर एक में एक मिट्टी का दीया। हर दीया सूखा और काला था, पर हर दीये के नीचे दीवार पर एक छोटा सा निशान खुदा था, कोई बारीक सा चिह्न।

"ये क्या हैं?" कबीर ने पूछा।

मीरा ने रोशनी डालकर एक चिह्न को पास से देखा। "तारीख़ें लग रही हैं। ये... गिनती है। कोई यहाँ दिन गिन रहा था।"

हर दीये के नीचे एक नई लकीर, और लकीरों के गुच्छे। चार लकीरें और एक आड़ी, फिर चार और एक आड़ी। जैसे कैदी जेल की दीवार पर दिन गिनते हैं।

"ये पुराने नहीं लगते," कबीर ने कहा। उसने एक दीये को छुआ और उँगली पर काली राख लग गई। "ये ज़्यादा से ज़्यादा कुछ दशक पुराने होंगे।"

हकीम साहब बहुत देर से कुछ नहीं बोले थे। वे गलियारे में आगे बढ़ते गए, और गिनती वाले दीये बढ़ते गए। जब एक मोड़ आया तो हकीम अचानक रुक गए। उनके क़दम रुकते ही रस्सी खिंच गई और मीरा उनसे टकराते-टकराते बची।

"क्या हुआ?"

हकीम ने कुछ नहीं कहा। उनकी टॉर्च ने गलियारे के अंत में एक छोटे कमरे का दरवाज़ा रोशन कर रखा था। कमरे के भीतर कोई चीज़ चमक रही थी, कोई सपाट सी चीज़, जो रोशनी को वापस फेंक रही थी।

तीनों आहिस्ता से कमरे में दाख़िल हुए।

यह कभी शायद किसी गार्ड का कमरा रहा होगा। छोटा सा, चौकोर, पत्थर की दीवारों और एक अकेली खिड़की जैसे रोशनदान के साथ, जो ऊपर कहीं आँगन की ओर खुलता था। पर अब यह एक कैंप जैसा दिख रहा था। एक कोने में सड़ा हुआ तिरपाल पड़ा था, दीवार से टिकी एक टूटी हुई तिपाई थी, और बीच में लोहे की जंग खाई एक संदूक रखी थी जिसका ढक्कन आधा खुला था।

संदूक के पास फ़र्श पर एक आदमी बैठा हुआ था।

मीरा की चीख़ गले में ही घुट गई।

वह एक कंकाल था। पूरी तरह सूखा हुआ, हड्डियों पर बची-खुची खाल चिपकी हुई, कपड़े सड़कर चीथड़े बन चुके थे। उसकी पीठ दीवार से टिकी थी, सिर थोड़ा आगे झुका हुआ, और उसकी हड्डियों वाली उँगलियाँ गोद में रखी एक नोटबुक को पकड़े हुए थीं।

"पापा नहीं हैं," कबीर ने काँपते हुए कहा, जैसे ख़ुद को समझा रहा हो। "ये पापा नहीं हो सकते। ये बहुत पुराना है।"

मीरा ने ग़ौर से देखा। कंकाल के पास की ज़मीन पर कुछ चीज़ें बिखरी थीं। जंग लगी एक कलाई घड़ी, जिसकी सूइयाँ अब भी रुकी हुई थीं। एक काला चश्मा, और एक चौड़े किनारे वाली पुरानी हैट।

"ये हैट," मीरा ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा। "ये पापा की हैट जैसी है।"

उसके पैर काँपने लगे थे, पर उसने ख़ुद को रोका। वह आगे बढ़ी और टॉर्च कंकाल के पास की दीवार पर डाली। दीवार पर कोयले से लिखी एक पंक्ति थी, अंग्रेज़ी में, कमज़ोर मगर पहचानी हुई लिखावट में।

“If you are reading this, I failed. — V.S.R.”

मीरा घुटनों के बल गिर गई। उसकी साँस उखड़ने लगी। वह लिखावट वही थी जो उसने बचपन में अपनी स्कूल की कॉपियों पर देखी थी, जब पिता सुधार दिया करते थे।

कबीर ने भाई का हाथ पकड़कर उसे सँभाला, उसकी आँखों में भी आँसू थे। "दी, रुको। देखो, ये कंकाल उतना पुराना नहीं लगता। सिर्फ़ बीस-बाईस साल..."

"बाईस साल," मीरा ने खोखली आवाज़ में कहा। "इतने साल मैंने इंतज़ार किया, और वो यहीं थे।"

हकीम साहब ने धीमे से झुककर कंकाल की गोद की नोटबुक की ओर देखा। "बेटी, एक बात देखो।"

"क्या?"

"इसकी हड्डियाँ..." हकीम ने कंकाल के पास की हड्डियों को टॉर्च से परखते हुए कहा, "ये किसी एक आदमी की नहीं हैं।"

मीरा ने चौंककर उनकी तरफ़ देखा।

"खोपड़ी बड़ी है, पर पसलियाँ किसी कम उम्र की हैं। हाथ की हड्डियाँ किसी तीसरे की। ये हड्डियाँ किसी ने मिलाकर यहाँ सजाई हैं।" हकीम की आवाज़ भी बदल गई थी। "ये तुम्हारे पिता नहीं हैं। ये... एक दिखावा है। जिसे जिन्न ने तुम्हारे लिए बनाया है, कि तुम उसे ढूँढो और टूट जाओ।"

मीरा कुछ पल उस कंकाल को घूरती रही। फिर धीरे से, बहुत सावधानी से, उसने नोटबुक की ओर हाथ बढ़ाया।

"मत छूओ!" कबीर ने रोका। "अगर ये जाल है तो?"

"जाल है, इसीलिए देखना है," मीरा ने कहा। "वो हमसे क्या चाहता है, ये समझना होगा।"

उसने नोटबुक उठाई। वह कसकर बँधी थी और ऊपर सफ़ेद फफूँदी जमी हुई थी। पर पन्नों के बीच से एक चीज़ फिसलकर नीचे गिर गई। एक मुड़ा हुआ, पीला पड़ा अख़बार का टुकड़ा।

कबीर ने उसे उठाया और खोला।

यह स्थानीय अख़बार 'मरुभूमि समाचार' का एक पन्ना था। ऊपर तारीख़ छपी थी, 23 मार्च 2004। हेडलाइन मोटे अक्षरों में थी: 'इतिहासकार प्रोफ़ेसर राठौड़ नौ दिन से लापता, तलाशी अभियान जारी'।

मीरा की साँस थम गई।

"ये वो अख़बार है जो पापा के ग़ायब होने के नौ दिन बाद निकला था," उसने फुसफुसाते हुए कहा। "मुझे याद है। माँ ने इसे संभालकर रखा था। हम सबने इसे सौ बार पढ़ा था।"

"पर ये यहाँ कैसे आया?" कबीर ने पूछा।

"यही तो सवाल है।" मीरा ने अख़बार को पलटा। पीछे के हिस्से पर, छपे हुए अक्षरों के ऊपर, किसी ने कोयले से हाथ से कुछ लिखा था। वही कमज़ोर लिखावट, वही हाथ जिसने दीवार पर अंग्रेज़ी में संदेश लिखा था।

"दिन 41. उसने आज यह अख़बार मुझे लाकर दिया। चाहता है कि मैं देखूँ कि बाहर सब मुझे ढूँढना बंद कर चुके हैं। पर मेरी मीरा ज़रूर ढूँढेगी। मेरी गुड़िया कभी हार नहीं मानती। बस वो यहाँ न आए। भगवान के लिए, वो यहाँ न आए।"

मीरा के मुँह से एक अजीब सी आवाज़ निकली, आधी हँसी, आधी चीख़। उसके हाथ से अख़बार छूट गया। वह दोनों हाथों से अपना मुँह ढककर वहीं बैठ गई और फूट-फूटकर रोने लगी, जैसे बाईस साल की सारी घुटन एक साथ बह निकली हो।

कबीर उसके पास बैठ गया और बहन को अपने कंधे से लगा लिया। उसकी अपनी आँखें भी नम थीं।

"दिन इकतालीस," हकीम ने धीरे से दोहराया, उनकी आवाज़ में बहुत पुराना दर्द था। "तो तुम्हारे पिता कम से कम इकतालीस दिन तक ज़िंदा थे, बेटी। और वो जानते थे कि तुम उन्हें खोजोगी।"

"और मैं इतनी देर से आई," मीरा ने सिसकते हुए कहा।

"तुम देर से नहीं आईं," हकीम ने कहा। "तुम अब आई हो, क्योंकि तुम्हारा आना किसी और की मर्ज़ी से तय था। और तुम्हारे पिता का आख़िरी संदेश यही था कि तुम यहाँ न आओ।" उन्होंने गहरी साँस ली। "शायद इसीलिए ये अख़बार जानबूझकर यहाँ छोड़ा गया है। जिन्न चाहता है कि तुम अपराध-बोध में डूबकर और गहरे चली जाओ।"

मीरा ने आँसू पोंछे। उसकी आँखों में अब एक सख़्त चमक थी, जो टूटे हुए लोगों में तभी आती है जब वे तय कर लेते हैं कि और नहीं टूटेंगे।

"मैं हारूँगी नहीं," उसने कहा। "कम से कम यह जाने बिना नहीं कि पापा के साथ क्या हुआ।"

उसी वक़्त कमरे के पीछे, गलियारे के और भीतर से, एक आवाज़ आई।

भारी, धीमी, किसी के बुदबुदाने जैसी।

"भाई... भाई... भाई..."

कबीर ने घबराकर चारों ओर देखा। "ये तो भंवर जी की आवाज़ है!"

"नहीं," हकीम ने कहा। "भंवर बोल रहा है, पर वो आवाज़ किसी और की नक़ल करके बोल रहा है। उसकी आवाज़ में दो आवाज़ें मिली हुई हैं।"

तीनों ने कान लगाए। आवाज़ बहुत धीमी थी, पर ग़ौर करने पर सुनाई देता था, भंवर की अपनी भर्राई हुई आवाज़, और उसके नीचे कोई और, छोटी उम्र के किसी लड़के की आवाज़, जो बार-बार वही शब्द दोहरा रहा था।

“...ठंड लग रही है... भाई... मुझे घर ले चलो...”

वे दौड़कर गलियारे में निकले। रस्सी बीच में खिंच गई और तीनों एक साथ लड़खड़ाए, पर किसी ने गति कम नहीं की। गलियारा और संकरा होता गया और उसकी दीवारों पर गिनती वाले दीयों की जगह अब पत्थर में उकेरी हुई आकृतियाँ थीं, इंसानी चेहरे, सैकड़ों, सब आँखें बंद किए हुए, सब मुँह खोले हुए, जैसे चीख़ रहे हों।

गलियारे के अंत में एक गोल कक्ष था, कोई ऊँची छत वाला हॉल, जिसके बीच में एक काले पत्थर का चबूतरा था और चबूतरे के बीच एक गड्ढा, जिसमें काली स्थिर सतह वाला पानी भरा था।

पानी के पास, घुटनों के बल, भंवर सिंह बैठा था।

उसकी पीठ उनकी ओर थी। उसके हाथ पानी की सतह की ओर बढ़े हुए थे और पूरा शरीर इस तरह काँप रहा था जैसे किसी तेज़ ठंड में हो। उसके कपड़े गीले थे, चेहरा झुका हुआ, और वह बराबर वही दो शब्द दोहरा रहा था।

"भंवर जी!" कबीर चिल्लाया।

भंवर ने कोई जवाब नहीं दिया।

"मत देखना पानी को!" हकीम ने चिल्लाकर कहा। "सब लोग आँखें नीची रखो! कबीर, तुम उसकी बाँहों को पकड़ो! मीरा, तुम पैरों को! मैं पीछे से माला डालता हूँ!"

तीनों भंवर की ओर बढ़े, आँखें फ़र्श पर गड़ाए हुए। पर जैसे ही कबीर ने भंवर के कंधे को छुआ, भंवर ने झटके से सिर घुमाया।

उसकी आँखों में पुतलियाँ नहीं थीं।

वहाँ सिर्फ़ गीला सफ़ेद था, जैसे आँखें अंदर से धुल गई हों। उसके होंठ नीले पड़ चुके थे और उनके कोनों से पानी की पतली धार बह रही थी।

"वो कहता है," भंवर ने कहा, पर यह आवाज़ उसकी अपनी नहीं थी। यह किसी बहुत बूढ़े और बहुत थके हुए आदमी की आवाज़ थी, जो भंवर के गले से निकल रही थी, "कि तुम सब बहुत देर कर चुके हो। सात रातों में नमक बाक़ी नहीं बचा।"

हकीम साहब ने तुरंत माला भंवर के गले में डाली। भंवर ने एक भयानक चीख़ मारी, उसका बदन अकड़ गया और वह पीछे की ओर गिर पड़ा। कबीर और मीरा ने उसे थाम लिया।

"चलो! अभी निकलो! उसे उठाओ!" हकीम चिल्लाए।

कबीर ने भंवर को कंधे पर लाद लिया। मीरा ने रस्सी पकड़ी। हकीम पीछे रहकर लगातार दुआ पढ़ते हुए उन्हें बाहर की ओर धकेलने लगे। गलियारे की दीवारों पर बनी आकृतियों की आँखें अब खुल रही थीं, एक-एक करके, हज़ारों बंद आँखें खुल रही थीं।

तीनों किसी तरह सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर पहुँचे। जब वे आख़िरकार सुबह की धूप में, आँगन में गिरे, तो भंवर का बदन बेहोशी में ढीला पड़ चुका था। उसकी साँस चल रही थी, धीमी और बराबर।

मीरा ने जेब में हाथ डाला, क्योंकि उसे टॉर्च वापस रखनी थी। उसकी उँगलियाँ किसी ठंडी और चपटी चीज़ से टकराईं।

उसने धीरे से उसे बाहर निकाला।

तांबे की वही तख़्ती। हरी पड़ी हुई, दो लिपियों वाली।

और वह हल्की-हल्की गर्म थी, जैसे किसी जीवित चीज़ की त्वचा।

"मैंने इसे वापस रख दिया था," मीरा ने खोखले स्वर में कहा। "मैंने इसे आले में वापस रख दिया था, कल।"

हकीम साहब ने तख़्ती को देखा। फिर मीरा को देखा। उनके चेहरे पर पहली बार वह भाव उभरा जो मीरा ने अब तक नहीं देखा था। डर नहीं, बल्कि एक अजीब सी पहचान, जैसे उन्हें अब कोई बात समझ में आ गई हो।

"ताले अपनी जगह नहीं छोड़ते," उन्होंने धीमे से कहा। "जो चीज़ ख़ुद चलकर तुम्हारी जेब में पहुँच जाए, वह तुम्हें चुन चुकी है।"

Writer
firoj saifi
Story
रेत का क़ैदी
Chapter
3 of 30
Category
Jinn & Spirits
Reading time
15 min
Words
2847
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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