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एपिसोड 4: सात क़ब्रें

firoj saifi · Jinn & Spirits · 13 मिनट

दोपहर होते-होते घेरे के भीतर का माहौल बदल चुका था।

भंवर सिंह को कंबल पर लिटा दिया गया था, पर उसकी आँखें अब भी बंद थीं। उसके होंठ बार-बार काँपते थे, जैसे कोई सपना उसे जकड़े हुए हो। हकीम साहब ने उसके माथे पर ठंडे पानी की पट्टी रखी, पर ग़ौर से देखने पर पट्टी के नीचे से पानी की बूँदें ऊपर की ओर रेंग रही थीं, उसके चेहरे की तरफ़, मानो पानी उसके अंदर वापस जाना चाहता हो।

"ये पट्टी हटाओ," हकीम ने झट से कहा। "पानी उसे और खींचेगा।"

मीरा ने पट्टी हटा दी। कबीर कैन से बचा हुआ पानी देखने लगा। "दो कैनें थीं, हकीम साहब। एक में अब आधी भी नहीं बची।"

"रात को पानी का एक घूँट भी बर्बाद मत करना," हकीम ने कहा। "वो पानी के ज़रिए हम तक पहुँचता है, इसलिए हम पानी पीएँगे भी तो गिनकर, और नमक डालकर।"

"नमक डालकर?" कबीर ने नाक सिकोड़ी।

"नमक उसकी आँख में काँटा है। उसे बाँधने वालों ने सात रातों का नमक इस्तेमाल किया था, तुमने तख़्ती पर देखा था न?"

मीरा ने तख़्ती हाथ में उठाकर घुमाई। उसका गर्म होना अब बंद हो चुका था, पर उसके भीतर कुछ धड़कता हुआ सा महसूस होता था। "हकीम साहब, आपने कहा था कि इसने मुझे चुना है। इसका मतलब क्या है? पूरा बताइए।"

हकीम ने बहुत देर तक चुप्पी साधे रखी। वे आँखें बंद किए अपनी माला के दाने गिनते रहे, फिर धीरे से बोले, "मुझे सब कुछ नहीं पता, बेटी। जो पता है वह भी आधा-अधूरा। मेरे उस्ताद, हज़रत शमसुद्दीन, ने मुझे सिर्फ़ इतना बताया था कि सूनगढ़ का जिन्न सात आमिलों ने बाँधा था, और बाँधने के लिए एक चीज़ की ज़रूरत पड़ी थी, जो उस राजा के ख़ून से जुड़ी थी जिसने जिन्न को बुलाया था।"

"राजा के ख़ून से?"

"हाँ। इस किले का आख़िरी राजा, सूरजमल राठौड़।"

मीरा का दिल धक् से रह गया। "राठौड़?"

कबीर ने फ़ौरन उसकी तरफ़ देखा। "दी, हमारा सरनेम भी..."

"राजस्थान में हज़ारों राठौड़ हैं," मीरा ने जल्दी से कहा, जैसे ख़ुद को समझा रही हो। "ये सिर्फ़ संयोग है।"

"संयोग," हकीम ने फिर वही शब्द दोहराया, और उनकी उदास मुस्कान ने बात पूरी कर दी।

भंवर ने आख़िरकार शाम से पहले आँखें खोलीं।

पहले उसकी पलकें फड़फड़ाईं, फिर उसने धीरे से सिर घुमाया। मीरा उसके पास बैठी थी, हाथ में पानी का कुल्हड़ लिए। "भंवर जी, आप ठीक हैं? पहचान रहे हैं मुझे?"

भंवर ने कुछ पल उसे देखा। उसकी आँखें अब सामान्य थीं, भूरी और थकी हुई, पर उनमें एक अजीब सी ख़ाली गहराई थी, जैसे उन्होंने ऐसा कुछ देख लिया हो जो आँखों के लिए बना ही नहीं था।

"मैडम," उसने फुसफुसाया। उसकी आवाज़ रेत की तरह खुरदुरी थी। "मैंने जगत को देखा।"

सब चुप हो गए। कबीर और हकीम पास खिसक आए।

"मुझे कुछ याद नहीं आ रहा कि मैं घेरे से कैसे निकला," भंवर ने धीमे-धीमे कहना शुरू किया। "रात को टीले पर वो आकृति खड़ी थी, उसके बाद सब धुँधला है। मुझे लग रहा था कि मैं सपना देख रहा हूँ, कि मैं चल रहा हूँ पर ख़ुद को देख रहा हूँ, जैसे कोई और मेरे शरीर में बैठा हो। मैं किले के भीतर गया, एक दरवाज़े से होकर सीढ़ियों से नीचे उतरा, बहुत नीचे।"

"वहाँ क्या था?" कबीर ने पूछा।

"एक बड़ा कमरा। बीच में पानी। उसी पानी के किनारे मेरा भाई बैठा था।"

मीरा की साँस थम गई।

"वो वैसा ही था जैसा पंद्रह साल पहले," भंवर की आवाज़ भर्रा गई। "वही कुर्ता, वही चेहरा, वही हँसमुख आँखें। उसकी उम्र नहीं बढ़ी थी, मैडम। बीस का है आज भी, और मैं पैंतीस से पचास का हो गया।" उसने कुछ पल आँखें बंद कर लीं। "उसने कहा, 'भाई, तुम आ गए? मुझे पता था तुम आओगे।' मैंने उसे गले लगा लिया। उसका शरीर बहुत ठंडा था, पर मैंने सोचा कोई बात नहीं, अब सब ठीक हो जाएगा।"

हकीम ने पूछा, बहुत धीरे से, "उसने तुमसे कुछ माँगा?"

भंवर ने आँखें खोलीं और हकीम को देखा। "आपको कैसे पता?"

"मुझे पता नहीं था," हकीम ने कहा। "बस अंदाज़ा था।"

"उसने कहा कि वो अकेला नहीं है।" भंवर की आवाज़ और धीमी हो गई। "उसने कहा कि वहाँ और भी हैं, बहुत से। जो पानी के नीचे रहते हैं, और जो सब प्यासे हैं। फिर उसने मेरा हाथ पकड़ा, मैडम, और कहा, 'भाई, हमें सिर्फ़ थोड़ा सा पानी चाहिए। जो तुम लाए हो, बस वो दे दो।'"

"कौन सा पानी?" मीरा ने पूछा।

भंवर ने काँपते हाथ से अपनी जेब से कुछ निकाला। वह एक छोटी चमड़े की थैली थी, जिसमें से कुछ गीला-गीला सा झलक रहा था। "मैं अपने साथ गंगाजल लाया था," उसने कहा। "पंद्रह साल पहले जगत के जाने के बाद माँ ने मुझे दिया था कि जब भी मैं उसे ढूँढने जाऊँ तो साथ रखूँ। मैं इसे हर बार लाता था, जब भी सूनगढ़ की ओर आता था। आज पहली बार किले के भीतर तक आया, और..."

"और जगत ने उसे माँगा," हकीम ने कहा।

"हाँ। मैंने थैली निकाली। मैं उसे देने ही वाला था कि..." भंवर रुका। उसकी आँखों में डर लौट आया। "कि मैंने पानी में कुछ देखा। मेरे भाई की परछाईं पानी में नहीं थी। बाक़ी सब की थी। कमरे की, छत की, मेरी भी। पर मेरे भाई की नहीं।"

मीरा ने तुरंत समझ लिया। "तो आपने उसे नहीं दिया।"

"नहीं। मेरे हाथ रुक गए। मेरा भाई मुस्कुराता रहा, पर उसकी मुस्कान... वह जगत की मुस्कान नहीं थी, मैडम। वह इतनी चौड़ी थी, इतनी चौड़ी..." भंवर ने उँगली से अपने गालों की ओर इशारा किया। "उसके बाद मुझे याद नहीं। शायद मैं बेहोश हो गया।"

हकीम ने गंगाजल की थैली अपने हाथ में ले ली और उसे सूँघा। फिर उनके चेहरे पर एक हल्की सी राहत दौड़ी। "तुमने इसे न देकर अपनी और हम सबकी जान बचा ली, भंवर। ये गंगाजल उसके लिए चाबी का काम करता। पवित्र पानी जिन्न को छू ले तो उसके बंधन ढीले पड़ सकते हैं। पर सिर्फ़ तब जब कोई उसे अपनी मर्ज़ी से दे। जबरदस्ती ले ले तो असर उलटा हो जाता है।"

"तो वो हमसे मर्ज़ी से पानी देने को कहेगा," कबीर ने धीमे स्वर में कहा। "हर बार, हर तरह से।"

"और जो वह माँगता है, उसे देना नहीं है," मीरा ने कहा। वह उठकर खड़ी हो गई। "पर हम बैठे रहकर भी कुछ हासिल नहीं करेंगे। हमें पता लगाना है कि सूरजमल ने क्या किया था, किस वजह से किया था, और उस जिन्न को कैसे बाँधा गया था। जितना ज़्यादा जानेंगे, उतना बेहतर लड़ पाएँगे।"

"कहाँ से शुरू करें?" कबीर ने पूछा।

"किले का वो हिस्सा जहाँ हम अब तक नहीं गए," हकीम ने कहा। "पिछवाड़े का।"

किले का पिछला हिस्सा बावड़ी के और आगे, पश्चिमी प्राचीर के नीचे था। तीनों ने भंवर को घेरे में छोड़ने का जोखिम नहीं लिया। कबीर ने उसे सहारा देकर साथ चलने के लिए खड़ा किया, और चारों एक ही रस्सी में बँधकर चल पड़े।

दिन ढलने में अभी तीन-चार घंटे थे, पर धूप कुछ अजीब तरह से फीकी पड़ रही थी। आसमान पर हल्के भूरे बादल उठ रहे थे, जो रेगिस्तान में सामान्य नहीं होते। हवा बिल्कुल रुकी हुई थी।

बावड़ी को दूर से बचाते हुए, वे एक पतली गली से गुज़रे, जिसके दोनों ओर टूटी-फूटी कोठरियाँ थीं, और फिर अचानक गली खुलकर एक छोटे आँगन में पहुँच गई।

वहाँ सात क़ब्रें थीं।

सात चबूतरे, बलुआ पत्थर के, एक अर्धवृत्त में सजे हुए। हर चबूतरे पर एक साधारण सा पत्थर खड़ा था, जिस पर नाम और तारीख़ खुदी थी। पुरानी अरबी और फ़ारसी में, कुछ घिसे हुए, कुछ अब भी साफ़। हर क़ब्र के ऊपर एक छोटा सा मिट्टी का दीया रखा था, और हर दीया बुझा हुआ था।

पर सबसे अजीब बात यह थी कि सातों क़ब्रों पर ताज़ा मिट्टी का ढेर था, जैसे किसी ने कल-परसों ही उन्हें ठीक किया हो।

"ये मज़ार किसने ठीक किए?" कबीर ने फुसफुसाकर पूछा। "यहाँ तो कोई आता नहीं।"

हकीम धीरे-धीरे आगे बढ़े। उनके चेहरे पर आदर और भय का अजीब मेल था। वे पहली क़ब्र के सामने रुके, अपनी टोपी उतारी, और झुककर पत्थर पर खुदे नाम को पढ़ने लगे।

"सैयद नूरुद्दीन शाह," उन्होंने पढ़ा। उनकी आवाज़ काँप रही थी। "सन् 1631 हिजरी... नहीं, ये उनसे भी पुराना है। इसमें तारीख़ बहुत धुँधली है।" वे अगली क़ब्र की तरफ़ बढ़े। "शेख़ अब्दुल रहीम। मौलवी क़ुतबुद्दीन। हाफ़िज़ इस्माईल..." एक के बाद एक वे नाम पढ़ते गए।

मीरा सबके पीछे खड़ी थी, उसकी नज़र तख़्ती पर थी जो अब उसके हाथ में थी। जब हकीम साहब ने चौथी क़ब्र का नाम पढ़ा, तख़्ती हल्की सी गर्म हो उठी।

"हकीम साहब, ये क़ब्र..."

"रुको," हकीम ने कहा। उनकी नज़र पाँचवीं क़ब्र पर थी, और उनके हाथ-पैर सुन्न पड़ गए थे। वे एक बुत की तरह खड़े थे, आँखें पत्थर पर जमी हुईं।

"क्या हुआ?" मीरा ने पास आकर देखा।

पाँचवें पत्थर पर लिखा था:

"हज़रत शमसुद्दीन-ए-सानी। जिन्होंने सात में पाँचवाँ क़दम रखा।"

हकीम की आँखों से आँसू बह निकले। "ये... ये मेरे उस्ताद के उस्ताद के भी उस्ताद हैं।" उन्होंने काँपते हाथ से पत्थर को छुआ। "मैं बचपन से ये नाम सुनता आया हूँ। हमारे सिलसिले में सब कहते थे कि हज़रत शमसुद्दीन-ए-सानी एक ऐसी जंग लड़ने गए थे जिससे वे कभी लौटकर नहीं आए, पर किसी को नहीं पता था कि वो कहाँ दफ़न हैं।"

कबीर ने धीरे से सात क़ब्रों को गिना। "सात क़ब्रें। सात आमिल। मगर..."

"मगर क्या?"

"देखिए, छठी और सातवीं क़ब्र के बीच में एक फ़र्क़ है।"

सबने उस ओर देखा। छठी क़ब्र पर साफ़ नाम खुदा था, "मौलाना सफ़दर अली"। पर सातवीं क़ब्र के पत्थर पर कुछ नहीं लिखा था। न नाम, न तारीख़। बस एक खाली, चिकना पत्थर।

और जब उन्होंने ग़ौर से देखा, तो सातवीं क़ब्र का चबूतरा भी बाक़ियों से अलग था। उसकी मिट्टी ताज़ा नहीं, बल्कि अंदर की तरफ़ धँसी हुई थी, जैसे किसी ने नीचे से खोदी हो और वापस भरी न हो।

"ये ख़ाली है," हकीम ने धीमे से कहा। "इसके भीतर कुछ नहीं है।"

"पर तारीख़ें?" मीरा ने झुककर पत्थरों को देखा। "देखिए, पहली छह क़ब्रों की तारीख़ें लगभग एक जैसी हैं। एक ही हफ़्ते की। यानी सब सातों आमिल एक साथ मरे थे, उसी रात। पर इस सातवीं क़ब्र पर कोई तारीख़ नहीं।"

"क्योंकि सातवाँ आमिल उस रात मरा नहीं," हकीम ने कहा। उनके स्वर में अचानक एक तरह की थकान आ गई थी, जैसे कोई पुराना शक पक्का हो गया हो। "या फिर, वो उस रात उन्हें छोड़कर चला गया।"

कबीर ने चौंककर कहा, "मतलब सातवें आमिल ने बाक़ी छह के साथ धोखा किया?"

"मैंने ये नहीं कहा।"

"पर आप यही सोच रहे हैं।"

हकीम ने आँखें मूँद लीं। "मेरे उस्ताद ने एक बार बहुत अजीब बात कही थी। उन्होंने कहा था, 'रुस्तम, जिन्न को बाँधना आसान है। मुश्किल उसे बाँधे रखना है, क्योंकि सबसे बड़ा ख़तरा बाहर से नहीं, उन सात हाथों के अंदर से आता है जिन्होंने उसे बाँधा।' मैंने तब इसका मतलब नहीं समझा था।"

वे बहुत देर तक सात क़ब्रों के सामने ख़ामोश खड़े रहे। हवा अब भी रुकी हुई थी, पर कहीं दूर से धीमी सी फुसफुसाहट आ रही थी, बिना शब्दों की, बस साँसों जैसी।

मीरा ने तख़्ती को हाथ में कसकर पकड़ लिया। उसे लगा कि सातवीं क़ब्र उसे बुला रही है, बिना आवाज़ के, किसी खिंचाव की तरह। वह धीरे से उस ओर बढ़ी।

"मीरा, रुको," हकीम ने कहा।

"बस देख रही हूँ।" वह सातवीं क़ब्र के पास पहुँची और धँसी हुई मिट्टी पर झुकी। मिट्टी के बीच में कोई चीज़ चमक रही थी। वह रेत में आधी दबी एक छोटी, सपाट वस्तु थी।

उसने हाथ बढ़ाकर उसे निकाला।

वह एक और तांबे की तख़्ती थी, बिल्कुल उसी जैसी जो उसके हाथ में थी।

मीरा ने दोनों तख़्तियों को पास-पास रखा। उन्हें किनारे से जोड़ते ही हल्की सी खनक हुई, और दोनों ऐसे जुड़ गईं जैसे वे हमेशा से एक ही चीज़ रही हों। जुड़ने पर उन पर खुदी दोनों लिपियाँ एक साथ पढ़ी जाने लगीं।

मीरा ने जोर से पढ़ना शुरू किया:

"सात कुओं का पानी, सात रातों का नमक, सात आमिलों का रक्त। और आठवाँ, जो द्वार का रक्षक होगा, वह राजा के वंश का होगा। जब तक वह जीवित है, बंधन बना रहेगा। जब वह द्वार खोलेगा, बंधन टूट जाएगा।"

सब सुन्न रह गए।

"आठवाँ," कबीर ने फुसफुसाया। "आठवाँ रक्षक राजा के वंश का होगा।"

हकीम ने अपनी माला कसकर पकड़ी। "तो इसलिए तख़्ती तुम्हारी जेब में पहुँची, मीरा। उसने तुम्हें नहीं चुना। तुम्हारे ख़ून ने तुम्हें चुना है।"

मीरा ने तख़्ती को बहुत देर तक घूरा। उसके हाथ फिर काँपने लगे थे, पर इस बार वह काँप सिर्फ़ डर से नहीं थी। उसमें कुछ और भी था, कोई बहुत पुरानी पहचान, जैसे किसी भूली हुई भाषा का एक शब्द अचानक ज़ुबान पर आ गया हो।

"अगर मैं आठवीं रक्षक हूँ," उसने धीमे से कहा, "तो पापा..."

"तो तुम्हारे पिता भी," हकीम ने उसकी बात पूरी की, "उसी वंश के थे। और शायद उन्होंने यह बात तुमसे छुपाई थी।"

आँगन से निकलते वक़्त कबीर की नज़र एक छोटे से दरवाज़े पर पड़ी, जो क़ब्रों के पीछे की दीवार में था। लकड़ी का पुराना दरवाज़ा, जिसकी चौखट पर खुदाई में फूल-पत्तियों की नक़्क़ाशी थी।

"ये कमरा देखिए," उसने कहा। "ये बाक़ी कोठरियों से अलग है। इसकी नक़्क़ाशी सजावटी है, कोई शाही कमरा लगता है।"

मीरा ने दरवाज़े को धक्का दिया। वह चरमराकर खुल गया।

भीतर एक छोटा, सुंदर सा कक्ष था। दीवारों पर पुराने रंगों के अवशेष थे, कोनों में बैठने के लिए पत्थर की चौकियाँ बनी थीं, और बीच में एक नक़्क़ाशीदार लकड़ी की मेज़ रखी थी। मेज़ पर धूल की मोटी परत जमी थी, पर परत के बीच में एक चीज़ साफ़ थी, जैसे किसी ने हाल ही में उस जगह से धूल पोंछी हो।

वहाँ एक पुरानी, चमड़े से बँधी मोटी किताब रखी थी।

मीरा ने झुककर उसे देखा। चमड़े का आवरण फटा हुआ था, पर भीतर के पन्ने अब भी सलामत थे। पहले पन्ने पर देवनागरी में, मारवाड़ी लहजे की पुरानी लिपि में, कुछ लिखा था।

उसने पढ़ा, धीमे और ठहरकर:

"मेरे वंशजों के लिए। जो इसे पढ़े, वह जान ले कि मैं, राव सूरजमल राठौड़, सूनगढ़ का स्वामी, अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल यहाँ दर्ज करता हूँ।"

मीरा की आवाज़ गले में फँस गई।

"ये राजा की डायरी है," हकीम ने फुसफुसाकर कहा।

"और हमारे लिए छोड़ी गई है," कबीर ने कहा।

"नहीं," मीरा ने डायरी को सीने से लगाते हुए कहा। "सिर्फ़ मेरे लिए।"

बाहर आसमान पर बादल और गहरे हो गए थे, और दूर कहीं, बावड़ी की ओर से, पानी में एक भारी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई। जैसे कोई बहुत विशाल, बहुत धीमे से, पानी की सतह के नीचे करवट बदल रहा हो।

Writer
firoj saifi
Story
रेत का क़ैदी
Chapter
4 of 30
Category
Jinn & Spirits
Reading time
13 min
Words
2406
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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