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एपिसोड 5: राजा की डायरी

firoj saifi · Jinn & Spirits · 15 मिनट

सूरज ढलने में दो घंटे बाक़ी थे जब मीरा ने डायरी का पहला पन्ना खोला।

वह किले के उसी छोटे शाही कक्ष में बैठी थी, पत्थर की एक चौकी पर, डायरी घुटनों पर रखे। कबीर उसके बाएँ बैठा था और हकीम साहब सामने की चौकी पर। भंवर को कक्ष के कोने में कंबल पर बिठाया गया था, उसके पास कबीर ने पानी की एक कैन रख दी थी। भंवर की नज़र दीवार पर टिकी थी और वह रह-रहकर अपनी उँगलियाँ मसल रहा था, जैसे कोई चीज़ ढूँढ रहा हो जो उसके पास नहीं थी।

हकीम साहब ने कक्ष के चारों कोनों में नमक की लकीर खींच दी थी और दरवाज़े की चौखट पर चाँदी की एक कील गाड़ दी थी। "यह घेरा कमज़ोर है," उन्होंने कहा था, "पर थोड़ी देर के लिए काम करेगा।"

मीरा ने डायरी की भाषा पर ध्यान लगाया। पुरानी मारवाड़ी थी, जिसमें हिंदी, संस्कृत और फ़ारसी के शब्द घुले हुए थे। उसने सोचा कि पुरातत्व के बीस साल बिना कारण नहीं थे। वह धीरे-धीरे पढ़ने लगी और साथ-साथ आसान हिंदी में बोलती गई।

"संवत् 1788 की कार्तिक अमावस्या। आज मेरी पचासवीं वर्षगाँठ है। और आज तक मेरे आँगन में किलकारी नहीं गूँजी।

रानी चंद्रावती हर साल मंदिर में दीप जलाती हैं। ज्योतिषी हर ग्रहण पर नया उपाय बताते हैं। मैंने सब किया। पंडितों को गाँव दान दिए, फ़क़ीरों की दरगाहों पर चादरें चढ़ाईं, सैकड़ों यज्ञ करवाए। पर वंश का दीया नहीं जला।

मेरे चाचा के बेटे दरबार में ताक लगाए बैठे हैं। वे जानते हैं कि मेरे बाद सूनगढ़ उन्हीं का है। मैं रात को सोते हुए उनके क़दमों की आहट सुनता हूँ।"

मीरा ने पढ़ना रोककर साँस ली। "ये राजा बहुत अकेला आदमी था।"

"सभी राजा अकेले होते हैं," हकीम ने कहा। "आगे पढ़ो।"

"आज रात एक अजीब बात हुई। मैं नीली बावड़ी के किनारे अकेला बैठा था। यह बावड़ी हमारे पुरखों ने बनवाई थी और कहते हैं कि इसका पानी रेगिस्तान में भी कभी नहीं सूखता। मैं पानी में देख रहा था कि अचानक मुझे ऐसा लगा कि पानी मुझे देख रहा है।

फिर एक आवाज़ आई। बहुत मधुर, बहुत उदास।

'राजा, तुम्हारा दुख मैं सुन सकता हूँ।'

मैं डरा नहीं। मैं ऐसे थक चुका था कि डर के लिए जगह ही नहीं बची थी। मैंने पूछा, 'तू कौन है?' आवाज़ ने कहा, 'मैं वह हूँ जिसे लोग जिन्न कहते हैं। मेरा नाम शरर है। मैं इस बावड़ी के नीचे रहता हूँ, उस समय से जब यह पानी धरती के सीने में बहता था और बावड़ी का पत्थर खदान में पड़ा था।'

मैंने पूछा, 'तू मुझसे क्या चाहता है?'

उसने कहा, 'मैं कुछ नहीं चाहता, राजा। मैं बस तुम्हारी मदद करना चाहता हूँ।'”

कबीर ने धीरे से कहा, "यहीं से सब शुरू हुआ।"

"मैंने उससे संतान माँगी।

उसने मुझसे सौदा किया। उसने कहा कि वह मुझे एक पुत्र देगा। पर इसके बदले मुझे उसके लिए कुछ करना होगा। मैंने पूछा क्या। उसने कहा, 'मुझे रेगिस्तान की प्यास सताती है, राजा। मैं हज़ारों सालों से पानी के नीचे हूँ पर कभी एक बूँद नहीं पी। यह पानी मेरे लिए नहीं है। यह मेरा पिंजरा है। मुझे बस इतना चाहिए कि तुम मुझे हर पूर्णिमा पर सात कुओं का पानी पिलाओ, उन सात कुओं का, जो तुम्हारे राज्य की सात दिशाओं में हैं। बस इतना ही।'

यह सौदा मुझे बहुत सस्ता लगा। पानी ही तो माँगा था। मैंने हामी भर दी।"

मीरा ने पन्ना पलटा। यहाँ लिखावट बदल गई थी, पहले से ज़्यादा तेज़ और बेचैन।

"संवत् 1789 की वैशाख पूर्णिमा। रानी ने पुत्र को जन्म दिया।

पूरे सूनगढ़ में उत्सव है। नगाड़े बज रहे हैं, ग़रीबों में अन्न बँट रहा है। मैंने बालक को गोद में लिया। उसका नाम राव विजयसिंह रखा है। वह बहुत सुंदर है। पर मैंने उसकी आँखों में कुछ अजीब देखा, जो मैंने किसी को बताया नहीं। जब वह रोता है तो उसकी पुतलियों में एक पल के लिए लाल चमक कौंध जाती है, जैसे भीतर कोई अंगारा सुलग रहा हो।

मैं डर नहीं रहा। मैं ख़ुश हूँ। मेरे वंश का दीया जल गया है।"

हकीम ने धीमे स्वर में कहा, "उसने ग़ौर नहीं किया। किसी भी बाप ने नहीं किया होता।"

"संवत् 1795। विजय छह वर्ष का हो गया है।

मैं हर पूर्णिमा पर नीली बावड़ी जाता हूँ। सात दिशाओं के सात कुओं का पानी घड़ों में भरकर लाया जाता है और मैं स्वयं उसे बावड़ी में डालता हूँ। पानी डालते ही एक ठंडी साँस उठती है, जैसे किसी ने गहरी तृप्ति महसूस की हो। मैं कभी नहीं जान पाया कि वह साँस राहत की है या भूख की।

पर आज कुछ और हुआ। जब मैंने पानी डाला तो आवाज़ आई, 'राजा, एक बात कहूँ?'

'कहो।'

'तुम्हारा बेटा बहुत होनहार है। पर उसकी आँखों में मेरी आग है। जब तक तुम मेरा हिस्सा पूरा करते रहोगे, वह आग शांत रहेगी। पर जिस दिन तुम रुक गए...'

मैंने पूछा, 'तो क्या होगा?'

'तो वह आग तुम्हारे बेटे को खा जाएगी, और उसके बाद तुम्हारे वंश को।'

मैं जम गया। उसने मुझे पहले क्यों नहीं बताया? उसने कहा, 'मैंने तुमसे कुछ छुपाया नहीं, राजा। मैंने कहा था सौदा सस्ता है। यह नहीं कहा था कि वह सदा के लिए है।'”

मीरा का स्वर धीमा पड़ गया। कक्ष में बिल्कुल सन्नाटा था।

"तो उसने सौदे की बारीक शर्तें पहले नहीं बताईं," कबीर ने धीरे से कहा।

"जिन्न झूठ नहीं बोलते," हकीम ने कहा। "पर सच को इस तरह रखते हैं कि इंसान ख़ुद धोखा खा जाए।"

मीरा ने आगे पढ़ा। पन्ने अब तेज़ी से पलट रहे थे, और लिखावट में डर घुलता जा रहा था।

"संवत् 1802। विजय तेरह वर्ष का है।

उसके व्यवहार में परिवर्तन आ रहा है। वह रात को सोते हुए उठकर घूमता है। एक बार मैंने उसे नीली बावड़ी की सीढ़ियों पर बैठे देखा, पानी में पैर डाले हुए, अकेला। मैंने उसे पुकारा। वह मुड़ा तो उसकी आँखें पूरी तरह लाल थीं। उसने मुस्कुराकर कहा, 'पिताजी, मुझे प्यास लगी है।'

मैंने उसे गोद में उठाया और दौड़कर महल ले आया। वह उसके बाद तीन दिन बेहोश रहा।

मैंने निश्चय कर लिया। मैं जिन्न को बाँधूँगा। यह सौदा मैं और नहीं निभा सकता। यह बालक मेरा है, उसका नहीं।"

हकीम साहब ने अपनी हथेलियाँ कसकर जोड़ लीं। "यहीं से ग़लती शुरू हुई।"

"क्यों?" कबीर ने पूछा।

"क्योंकि राजा ने सौदा तोड़ने का फ़ैसला किया था। जिन्न से किया हुआ वादा तोड़ना सबसे बड़ा पाप होता है। उसके बाद वह जो भी करे, उसके पास वजह होती है।" हकीम ने आँखें बंद कर लीं। "आगे पढ़ो, मीरा।"

"मैंने दूर-दूर से आमिल बुलवाए। सात फ़क़ीर, जिनके नाम जैसलमेर से बीकानेर तक फैले थे। उनके मुखिया हज़रत शमसुद्दीन थे, जिनका नाम सुनकर रेगिस्तान काँपता था। मैंने उन्हें सब बता दिया, सौदा, शर्तें, बालक की आँखें, सब कुछ।

हज़रत ने मुझे गहरी नज़रों से देखा और कहा, 'राजा, तुमने जिन्न से सौदा किया, यह तुम्हारा पाप था। अब तुम उससे मुकर रहे हो, यह दूसरा पाप है। मैं तुम्हारी मदद करूँगा, पर एक शर्त पर। तुम्हें इस पाप की सज़ा अपने ख़ून से भरनी होगी। मैं उसे बाँध तो दूँगा, पर उसके बंधन की कुंजी तुम्हारे वंश में रहेगी। सात पीढ़ियों तक। और जब सातवीं पीढ़ी का कोई बंधन तोड़ने का फ़ैसला करेगा, तब तक यह बंधन चलेगा।'

मैंने कहा, 'मैं तैयार हूँ। मेरे बेटे को बचा लो।'

तब तक मुझे नहीं पता था कि मैं क्या कह रहा हूँ।"

मीरा रुकी। उसकी उँगलियाँ पन्ने पर काँप रही थीं। "सात पीढ़ियाँ," उसने फुसफुसाया।

"सूरजमल से मीरा तक कितनी पीढ़ियाँ होती हैं?" कबीर ने धीरे से पूछा।

मीरा ने अंदाज़े से गिना। "सन् 1730 के आसपास राजा, अब 2026। लगभग तीन सौ साल। हर पीढ़ी पच्चीस-तीस साल की... दस से बारह पीढ़ियाँ।"

"तो सात की गिनती कब की ख़त्म हो चुकी है," हकीम ने कहा।

"या फिर गिनती सीधी नहीं है," मीरा ने डायरी की ओर देखकर कहा। "आगे लिखा है।"

"वह रात मुझे जीवन भर याद रहेगी।

सात आमिल नीली बावड़ी के किनारे इकट्ठा हुए। हज़रत शमसुद्दीन ने बावड़ी के पानी में सात कुओं का जल डाला, सात रातों का नमक मिलाया, और अपनी उँगली चीरकर रक्त की बूँद डाली। उनके साथ छह और आमिलों ने भी वैसा ही किया।

जिन्न बावड़ी के बीच से उठा। उसका क़द आसमान तक पहुँचता था। उसकी आँखें अंगारों जैसी थीं और उसकी आवाज़ में सैकड़ों आवाज़ें गूँज रही थीं। उसने कहा, 'राजा! तूने वादा तोड़ा!' मैं घुटनों के बल गिर पड़ा। मुझे लगा कि वह मुझे अभी निगल लेगा।

पर आमिलों ने मंत्र पढ़ने शुरू कर दिए। पानी उबलने लगा। जिन्न चीख़ा, इतना भयानक कि मेरे कान से ख़ून बहने लगा। बावड़ी की सीढ़ियाँ फट गईं। और फिर, धीरे-धीरे, वह आकृति सिकुड़ने लगी, पानी के भीतर घुसने लगी, जैसे कोई उसे नीचे खींच रहा हो।

उसने जाते-जाते मुझसे कहा, 'राजा, तूने जो किया, उसकी क़ीमत तेरा वंश चुकाएगा। मैं इंतज़ार करूँगा। मुझे प्यास रहेगी, और मेरी प्यास कभी नहीं मरेगी। एक दिन तेरा कोई वंशज मुझे पानी पिलाने आएगा, और उसी दिन मेरे बंधन खुल जाएँगे।'
फिर सब शांत हो गया।
पर मुझे पता नहीं था कि सातवें आमिल का चेहरा उस रात ठीक से मेरी नज़र में नहीं आया था।"
मीरा ने रुककर पन्ना पलटा। अगला पन्ना कोरा नहीं था, पर उस पर लिखावट अलग थी, बहुत जल्दी में लिखी हुई, जैसे राजा के हाथ काँप रहे हों।
"मैंने एक भयंकर ग़लती की है।
जिन्न को बाँधे सात दिन हो गए हैं। छह आमिल अपने स्थान पर बैठे पहरा देते रहे, पर सातवाँ, मौलाना ख़लील, ग़ायब हो गया। कोई नहीं जानता कहाँ। उसके आसन पर सिर्फ़ एक ख़ाली चटाई पड़ी है।
हज़रत शमसुद्दीन ने कहा, 'राजा, सातवाँ आमिल हमारे बंधन का आख़िरी ताला था। उसके बिना यह बंधन अधूरा है।'
मैंने पूछा, 'अब क्या होगा?'
उन्होंने कहा, 'अब तुम्हें ख़ुद वह ताला बनना होगा। या तुम्हारे वंशज को।'”
कबीर ने फ़ौरन कहा, "यानी ख़लील वो आमिल था जो धोखा दे गया, और इसलिए राजा के वंश को ताला बनाना पड़ा।"
"या सातवाँ आमिल जिन्न से जा मिला," हकीम ने बुदबुदाते हुए कहा। "जो कुछ भी हुआ हो, उसने बंधन को आधा छोड़ दिया।"
मीरा ने तेज़ी से पन्ने पलटे। डायरी के अंतिम कुछ पन्ने बाक़ी थे, और उनकी लिखावट सबसे अधिक बेचैन थी।
"मेरे वंशज, जो भी तुम हो, इसे ध्यान से पढ़ना।
सात आमिलों में से छह ने अपनी जान देकर यह बंधन बनाया था। सातवाँ भाग गया। इसलिए बंधन की अंतिम कड़ी मेरा वंश है। तुम्हारे ख़ून में वह ताक़त है जो या तो इस द्वार को खुला रखे, या बंद।
जब तक तुम जीवित हो और द्वार को स्वयं नहीं खोलते, जिन्न बावड़ी के नीचे बँधा रहेगा। पर वह तुम्हें लुभाएगा। वह तुम्हारे दुख को पहचानेगा। वह तुम्हारे सबसे प्रिय लोगों की शक्ल लेगा। वह तुम्हें वह सब दिखाएगा जो तुम खो चुके हो। और जब तुम टूटोगे, तब तुम अपने हाथों से द्वार खोल दोगे।
इसलिए मैं तुम्हें एक चेतावनी देता हूँ। जिन्न कभी झूठ नहीं बोलता। जो वह कहे, सच ही होगा। पर वह जो नहीं कहता, वही असली मार है।
मैं यह डायरी इसी कक्ष में छोड़ रहा हूँ। हर पीढ़ी में कोई न कोई मेरे वंश से सूनगढ़ आएगा। उसे बताना कि उसके पास विकल्प है। द्वार खोलना या न खोलना। पर उसका चुनाव सबको प्रभावित करेगा, जीवितों को भी और मृतकों को भी।
अगर तुम सातवाँ आमिल मिल जाओ, तो उससे पूछना कि उसने क्यों भागा। उसका उत्तर शायद तुम्हें दुनिया का सबसे बड़ा सच बता दे।"
पढ़ते-पढ़ते मीरा की आवाज़ बैठ गई। उसने डायरी बंद की और काफ़ी देर तक उसे सीने से लगाए रही।
"तो मैं वही आठवीं हूँ," उसने धीरे से कहा। "द्वार की रक्षक।"
"या द्वार खोलने वाली," कबीर ने धीमे से कहा।
मीरा ने भाई की ओर देखा। उसकी आँखों में डर साफ़ था, पर उस डर के पीछे एक और बात थी, कोई चेतावनी, जैसे वह भी पहली बार देख रहा हो कि उसकी बड़ी बहन कितनी नाज़ुक डोर पर खड़ी है।
तभी कक्ष के कोने से भंवर की आवाज़ आई, धीमी और थकी हुई।
"मैडम, मुझे आपसे कुछ कहना है।"
सबने उसकी ओर देखा। भंवर अब बैठा हुआ था, कंबल उसके कंधों पर लिपटा था। उसके हाथ में एक छोटी सी चीज़ थी जो उसने अपनी जेब से निकाली थी।
वह एक पीतल की छोटी सी चाबी थी, पुरानी, काली पड़ी हुई।
"ये क्या है?" हकीम ने पूछा।
"ये मेरे भाई की टोपी में सिली हुई थी," भंवर ने कहा। उसकी आँखें नम थीं। "पंद्रह साल पहले जब जगत की भीगी टोपी ऊँट पर लौटी, तो मैंने उसे ग़ौर से नहीं देखा था। बस रोता रहा। पर बाद में, एक रात, जब मैं उसे सूँघ रहा था कि शायद अपने भाई की कोई ख़ुशबू बची हो, तो मुझे उसके अंदर कोई कठोर चीज़ महसूस हुई। मैंने सिलाई खोली तो ये चाबी निकली।"
"इसे तुमने इतने सालों तक क्यों नहीं बताया?" कबीर ने पूछा।
"क्योंकि मुझे लगा कि ये जगत की आख़िरी निशानी है," भंवर ने सिर झुकाकर कहा। "और क्योंकि मुझे शर्म आती थी। जगत सूनगढ़ यूँ ही नहीं गया था, मैडम। उसे एक आदमी ने भेजा था।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
"किसने?" मीरा ने पूछा।
"उसे जैसलमेर के बाज़ार में एक आदमी मिला था," भंवर ने कहा। "पुराने कपड़े, लंबी दाढ़ी, गहरी आँखें। उसने जगत को पैसे दिए और कहा कि सूनगढ़ के किले के भीतर एक चीज़ रखकर आना है, और बदले में उतने ही पैसे और मिलेंगे। जगत ग़रीब था, मैडम। उसे पैसों की ज़रूरत थी। मैंने उसे समझाया, पर वह नहीं माना।"
"वह कौन सी चीज़ रखकर आने वाला था?" हकीम ने पूछा। उनकी आवाज़ में अजीब सा तनाव था।
भंवर ने पीतल की चाबी ऊपर उठाई। "यही चाबी। उसे इसे किले की बावड़ी के पास रखना था, और बदले में वह लौट आता।"
मीरा ने तुरंत तख़्ती हाथ में ली और चाबी के पास रखी। चाबी का आकार तख़्ती के किनारे के एक छोटे से खाँचे से बिल्कुल मेल खा रहा था।
"ये तख़्ती का ताला है," उसने कहा, "जिसे दो हिस्सों वाली तख़्ती ने बंद किया था। और ये चाबी..."
"इसे खोलती है," हकीम ने बात पूरी की। उनके चेहरे पर पसीना चमक रहा था। "भंवर, उस आदमी का हुलिया दोबारा बताओ। ठीक से। उसकी उम्र? उसकी आवाज़?"
भंवर ने आँखें मींचकर याद करने की कोशिश की। "उम्र का अंदाज़ा नहीं लगता। कभी जवान लगता था, कभी बूढ़ा। उसकी आवाज़ में एक अजीब मिठास थी, जैसे कोई गाना गा रहा हो। और उसके हाथ में..." वह रुका। "उसके हाथ की एक उँगली नहीं थी। दाहिने हाथ की तर्जनी।"
हकीम साहब का रंग उड़ गया।
"क्या हुआ?" मीरा ने पूछा।
हकीम ने कुछ नहीं कहा। वे उठे और धीरे-धीरे अपनी कमीज़ की आस्तीन चढ़ाई। फिर अपना दाहिना हाथ सबके सामने रखा।
उनकी भी तर्जनी नहीं थी।
कबीर पीछे हट गया। "आप..."
"नहीं!" हकीम ने फ़ौरन कहा। उनकी आवाज़ में घबराहट थी। "ये उँगली मैंने तीस साल पहले एक हादसे में खोई थी। मेरी दुकान में लोहे की आरी से। पूरा जैसलमेर जानता है। मैं वह आदमी नहीं हूँ!"
"मैं ये नहीं कह रहा कि आप हैं," कबीर ने धीरे से कहा। "पर संयोग भी अजीब है।"
"संयोग नहीं," हकीम ने कहा। उनके माथे की नसें उभर आई थीं। "वह आदमी जानता था कि मैं इस सबमें शामिल हूँ। उसने मेरी उँगली की नक़ल की। या शायद..." उनकी आवाज़ टूट गई। "या शायद मैं उसकी नक़ल हूँ।"
"क्या मतलब?"
हकीम ने कोई जवाब नहीं दिया। वे चुपचाप बैठ गए, दोनों हाथों से सिर पकड़कर। पहली बार मीरा को उस बूढ़े आदमी में एक डरा हुआ, उलझा हुआ इंसान दिखाई दिया।
कक्ष के बाहर शाम की रोशनी हल्की पड़ रही थी। आसमान के बादल अब कुछ अजीब रंग के हो गए थे, गहरे बैंगनी, किनारों पर सुनहरे।
कबीर उठकर रोशनदान तक गया और बाहर देखा। फिर अचानक उसकी साँस रुक गई।
"दी," उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा। "बाहर देखो।"
मीरा ने रोशनदान से झाँका।
किले का आँगन, जो कुछ घंटे पहले सूखा और सपाट था, अब पानी से भरा हुआ था। एड़ी तक गहरा, काला और स्थिर, बिल्कुल बावड़ी जैसे पानी जैसा। और उस पानी के बीच में, बहुत सावधानी से, एक के बाद एक, पैर के निशान उभर रहे थे, किसी अदृश्य आदमी के क़दमों से।
वे निशान उनके कक्ष की ओर बढ़ रहे थे।
"हकीम साहब," मीरा ने काँपती आवाज़ में कहा, "वह आ रहा है।"
हकीम ने सिर उठाया। उन्होंने दरवाज़े की चौखट की चाँदी की कील को देखा। कील के आसपास जमा नमक की लकीर में एक छोटी सी दरार पड़ चुकी थी।
"कमज़ोर घेरा सिर्फ़ तब तक टिकता है जब तक रात नहीं हुई," उन्होंने धीमे से कहा। "और आज रात..." वे रुके। "आज रात वह घेरा तोड़ देगा। इसमें कोई शक नहीं।"
"तो हम क्या करें?" कबीर ने पूछा।
हकीम ने सबकी ओर देखा। फिर अपनी पोटली की तरफ़। उनकी आँखों में एक ऐसा निश्चय था जो मीरा ने अब तक नहीं देखा था।
"अब वह करने का वक़्त है जो मैंने बाईस साल पहले करना चाहिए था," उन्होंने कहा। "हम उससे बात करेंगे।"
"क्या?" तीनों ने एक साथ कहा।
"हाँ। जिन्न से सीधे बात। उसकी बात सुनने के बाद ही हम समझ पाएँगे कि वह क्या चाहता है, और सातवाँ आमिल कौन था, और वह आदमी कौन है जिसने भंवर के भाई को भेजा।" हकीम ने गहरी साँस ली। "पर इसके लिए हमें किसी को बीच में बिठाना होगा। एक माध्यम। और जिन्न सिर्फ़ उससे बात करेगा, जो उसके बंधन की कुंजी है।"
सबकी नज़रें धीरे-धीरे मीरा की ओर घूम गईं।
मीरा ने तख़्ती को अपने हाथ में कसकर पकड़ा। बाहर आँगन के पानी में कदमों की आहट अब दरवाज़े के बिल्कुल पास आ चुकी थी।

टप... टप... टप...
"ठीक है," उसने बहुत धीमे से कहा। उसकी आवाज़ में पहली बार कोई काँपन नहीं थी। "मैं तैयार हूँ।"

Writer
firoj saifi
Story
रेत का क़ैदी
Chapter
5 of 30
Category
Jinn & Spirits
Reading time
15 min
Words
2909
Language
Hindi (हिंदी)
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