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एपिसोड 6: शरर

firoj saifi · Jinn & Spirits · 15 मिनट

दरवाज़े के नीचे की दरार से पानी रिसकर भीतर आने लगा था।

वह तेज़ बहाव नहीं था। धीमा, सब्र वाला, एक पतली काली लकीर जो फ़र्श की धूल को भिगोती हुई कक्ष के बीच की ओर रेंग रही थी, जैसे उसे कोई जल्दी न हो, जैसे उसे पता हो कि भीतर बैठे लोग कहीं नहीं जा सकते।

हकीम साहब ने चौखट की चाँदी की कील को देखा। उसके चारों ओर बिछी नमक की लकीर का एक हिस्सा घुलकर भूरा पड़ चुका था। उन्होंने बिना घबराए नमक का थैला निकाला और दरार के सामने एक मोटी, दोहरी लकीर खींच दी। पानी वहाँ पहुँचकर ठिठक गया, किसी अदृश्य दीवार से टकराया और किनारे की ओर मुड़कर वहीं जमा होने लगा।

"ये हमें आधा घंटा देगा," हकीम ने कहा। "उससे ज़्यादा नहीं। जो करना है, सलीके से और जल्दी करना है।"

उन्होंने कक्ष के बीचोंबीच भंवर का कंबल बिछाया। उस पर नमक से एक छोटा गोला खींचा, इतना कि एक आदमी आराम से पालथी मारकर बैठ सके। गोले के सामने तांबे की वही कटोरी रखी जो उनकी पोटली में थी। उसमें कैन का बचा हुआ पानी डाला और उसमें नमक घोल दिया। फिर एक मिट्टी का दीया जलाकर कटोरी के बाईं ओर रखा। ऊद के तेल की महक कक्ष में फैल गई, जली लकड़ी और गुलाब की मिली-जुली महक।

"मीरा, यहाँ बैठो।"

मीरा गोले में बैठ गई। दोनों जुड़ी हुई तख़्तियाँ उसकी गोद में थीं, और पीतल की चाबी उसकी बाईं हथेली में। उसके हाथ ठंडे थे, पर उसने उन्हें काँपने नहीं दिया।

"अब नियम सुनो," हकीम उसके सामने घुटनों के बल बैठ गए। उनकी आवाज़ बहुत धीमी और बहुत साफ़ थी, जैसे कोई बच्चे को सड़क पार करना सिखा रहा हो। "चार बातें हैं, और चारों जान की क़ीमत वाली हैं। पहली, अपना पूरा नाम मत देना। उसे 'मीरा' पता है, पर 'मीरा राठौड़' नहीं बोलना, क्योंकि पूरा नाम ही पूरी पकड़ है। दूसरी, कोई वादा मत करना, चाहे कितना छोटा हो। 'मैं सोचूँगी' भी वादा बन सकता है। तीसरी, 'शुक्रिया' मत कहना। जिन्न के यहाँ शुक्रिया क़र्ज़ की रसीद होती है। और चौथी, वह कुछ भी आगे बढ़ाए, कोई चीज़, कोई हाथ, कोई जवाब, तो उसे लेना नहीं।"

"वादा, शुक्रिया, पूरा नाम, कोई चीज़," मीरा ने दोहराया।

"और सबसे ज़रूरी।" हकीम ने अपनी माला का तीसरा दाना उँगली और अँगूठे के बीच दबाया। "अगर मैं ये दाना खींचूँ, तो बात वहीं ख़त्म। कबीर, रस्सी खींचकर मीरा को पीछे घसीट लेना, चाहे वह कुछ भी कहे। और भंवर, तुम गंगाजल की थैली लिए पीछे बैठो। अगर कमरे का पानी बढ़ने लगे, तो थैली खोलना।"

कबीर ने रस्सी का एक सिरा मीरा की कमर में बाँधा और दूसरा अपनी कलाई पर तीन बार लपेटा। उसके हाथ काँप रहे थे। "दी, एक बार और सोच लो। ये पागलपन है।"

"पागलपन वो है जो हम बिना जाने कर रहे हैं," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव था। "कल रात से हम अँधेरे में हाथ मार रहे हैं। वो हमें थका रहा है, हमारे अपनों की शक्लों में आ रहा है, हमारे नाम पुकार रहा है। मैं जानना चाहती हूँ कि वो चाहता क्या है। सीधे उससे, उसके मुँह से।"

कबीर ने कुछ नहीं कहा। उसने बहन के कंधे को एक पल के लिए दबाया और रस्सी थामकर पीछे हट गया।

पानी की रेखा अब नमक के दोहरे घेरे के बाहर चौखट के पास एक छोटे तालाब की तरह फैल चुकी थी। उसकी सतह पर दीये की लौ की कोई परछाईं नहीं पड़ रही थी।

"शुरू करो," हकीम ने कहा।

मीरा ने काँपती उँगलियों से पीतल की चाबी तख़्ती की नाली में डाली।

चाबी बिना किसी ज़ोर के भीतर उतर गई, जैसे वह सदियों से वहीं के लिए बनी हो। एक हल्की सी खनक हुई, किसी बहुत पुराने ताले के खुलने की। दोनों तख़्तियाँ उसकी गोद में एक साथ गुनगुनाने लगीं, एक ऐसी धीमी भिनभिनाहट जो कानों से ज़्यादा हड्डियों में महसूस होती थी।

दीये की लौ झुकी। फिर झुकती चली गई, तांबे की कटोरी की ओर, जैसे किसी ने उसे पानी की तरफ़ खींच लिया हो।

कटोरी का पानी अचानक शांत हो गया। मीरा ने झुककर देखा तो उसकी अपनी परछाईं उसमें नहीं थी। सतह किसी गहरे कुएँ का मुँह लग रही थी, काली और अथाह।

और उस कालिमा में, बहुत नीचे, कुछ आकृतियाँ थीं।

पहले वे धुँधली थीं, फिर साफ़ होती गईं। चेहरे। दर्जनों, शायद सैकड़ों, ऊपर की ओर देखते हुए, जैसे बर्फ़ की परत के नीचे दबे हों। कुछ की आँखें बंद थीं, कुछ की खुली। कुछ बूढ़े थे, कुछ औरतें, कुछ बच्चे। सबके मुँह हल्के से खुले हुए थे, जैसे वे साँस लेने के लिए तड़प रहे हों।

पीछे बैठे भंवर के गले से एक दबी हुई आवाज़ निकली। मीरा ने मुड़कर नहीं देखा, पर उसे पता था कि भंवर ने उन चेहरों में कोई जाना-पहचाना चेहरा देख लिया है।

"आख़िरकार," आवाज़ आई।

वह कटोरी से नहीं आई थी, न दीवारों से, न छत से। वह कक्ष के भीतर हर जगह थी, उसी मीठी, थकी हुई आवाज़ में जो बावड़ी पर सुनाई दी थी।

"तुम्हारी तख़्ती की भनभनाहट मैं तीन सौ साल से सुन रहा हूँ, बेटी, पर पहली बार किसी ने उसे उसकी चाबी से बजाया है। मैं तुम्हारा शुक्रगुज़ार हूँ।"

हकीम की उँगलियाँ माला पर कस गईं। मीरा ने नियम याद किए और सीधा जवाब दिया, "तुम कौन हो?"

"शरर," आवाज़ ने कहा। "लोग इसका मतलब चिंगारी बताते हैं। मैं कभी चिंगारी नहीं था। मैं उस आग से बना हूँ जिसमें धुआँ नहीं होता। और देखो, इतने बरस पानी के नीचे रहकर भी मैं बुझा नहीं।" एक हल्की, थकी हुई हँसी उठी। "तुम्हारी आवाज़ काँपती है, पर रुकती नहीं। पिछली बार जब कोई राठौड़ मुझसे बात करने बैठा था, उसकी आवाज़ कई बार टूटी थी। तुम्हारा बाप भी ऐसा ही था।"

मीरा का गला सूख गया। "तुम मेरे पिता से मिले थे।"

"मैं सबसे मिलता हूँ जो मेरे पानी तक पहुँचते हैं। यही तो मेरी सज़ा है कि लोग आते रहते हैं, और मैं उन्हें गिनता रहता हूँ।" आवाज़ कुछ पल रुकी। "तुम पूछना चाहती हो कि मैं तुम्हें यहाँ क्यों बुला रहा हूँ। मैं बताऊँगा। पर पहले एक बात: क्या तुमने सूरजमल की डायरी पढ़ ली?"

"हाँ।"

"पूरी?"

मीरा झिझकी। "आख़िरी पन्ने तक।"

"आख़िरी पन्ने तक," आवाज़ ने दोहराया, और उसमें अजीब सी दया थी। "मैं तुम्हें एक बात बताता हूँ, बेटी। इस दुनिया की हर किताब में दो पन्ने होते हैं, वह जो लिखा जाता है, और वह जो लिखने वाला काट देता है। तुम्हारे पुरखे ने बहुत कुछ काटा था।"

"राजा ने तुमसे क्या कहा था," शरर की आवाज़ धीमे, मुलायम सुर में चल रही थी, जैसे कोई बूढ़ा किस्सागो बच्चों को रात की कहानी सुना रहा हो, "कि उसने मुझसे बेटा माँगा था? सच है। पर वह अधूरा सच है।

"मैंने उसे बेटा दिया नहीं था, बेटी। मैंने उसे बचाया था।"

कक्ष में चुप्पी छा गई। भंवर पीछे सिमट गया।

"रानी चंद्रावती का बच्चा पैदा हुआ तो न उसकी साँस चल रही थी, न धड़कन। दाई ने उसे ठंडा, नीला, चुप उठाया था। राजा ने उसे गोद में लिया और उसी पल बावड़ी की ओर भागा। उसे मेरी याद थी। उसने कहा, 'तूने मुझे बेटा देने को कहा था। मेरा बेटा मर रहा है। बचा ले।' और मैंने उसे बचाया। पर मैं किसी को उसकी उम्र नहीं दे सकता, बेटी। मैं सिर्फ़ उधार दे सकता हूँ। मैं उस बच्चे की साँसें चलाता रहा, और बदले में हर पूर्णिमा पर पानी माँगता रहा।"

"वह पानी तुम्हारी प्यास के लिए नहीं था," मीरा ने धीरे से कहा।

"वह किराया था। उस बच्चे की साँसों का किराया। सात कुओं का पानी, हर पूर्णिमा, जैसे कोई कर्ज़दार अपनी किस्त भरता है।" आवाज़ में एक पुराना दर्द छलका। "मैंने राजा से कुछ छुपाया नहीं था। उसने पूछा कि सौदा कितना लंबा चलेगा, तो मैंने कहा था, 'जब तक बच्चा जिए।' उसने समझा कि बच्चा बड़ा होकर राजा बनेगा, उम्र भर जिएगा। वह समझ नहीं पाया कि मैं उस बच्चे की उम्र नहीं, उसकी साँस चला रहा हूँ। जिस दिन किस्त रुकेगी, उस दिन साँस रुक जाएगी।"

हकीम ने धीमे से कहा, "इसीलिए उसकी आँखों में लाल चमक थी।"

"वह मेरी आग थी," शरर ने कहा। "वह बच्चा मेरी साँसों पर जी रहा था। मैं उसे मरने नहीं दे सकता था, क्योंकि उसके मरते ही मेरा सौदा टूट जाता। इसलिए मैं उसे पानी के सहारे ज़िंदा रखता रहा। पर जब वह तेरह बरस का हुआ, राजा के भीतर डर पैठ गया। उसने सात फ़क़ीर बुला लिए।"

मीरा की मुट्ठी चाबी पर भिंच गई। "और बंधन बाँध दिया गया।"

"जिस रात राजा ने मुझे बाँधा, उसी रात किस्त रुक गई। सातवें दिन बच्चे की साँस रुक गई।" शरर की आवाज़ बहुत धीमी हो गई, जैसे वह कोई ऐसी बात कह रहा हो जो हज़ार बार पहले भी कही जा चुकी हो और जिसने कभी किसी को नहीं सुना। "उसने मेरा नाम लेकर पुकारा था, बेटी। आख़िरी साँस पर। उसने कहा, 'शरर, मुझे प्यास लगी है।' और मैं उसे पानी नहीं दे सका, क्योंकि मैं बँधा हुआ था।"

कमरे में सिर्फ़ दीये की लौ की चटख सुनाई दे रही थी।

"राजा ने बच्चे को बावड़ी की सातवीं सीढ़ी के नीचे दफ़नाया," आवाज़ ने कहा। "रात के अँधेरे में, अकेले। न आमिलों को बताया, न रानी को। रानी ने मरते दम तक यही माना कि उसका बेटा किसी बीमारी से गया। डायरी का आख़िरी पन्ना देखो, बेटी। उसकी स्याही के नीचे एक चिपका हुआ पन्ना है, जिसे सूरजमल ने ख़ुद गोंद लगाकर चिपकाया था, ताकि उसके वंशज उसे पढ़ न सकें।"

मीरा ने काँपते हाथों से डायरी की ओर देखा, जो कबीर के पास रखी थी। पर वह उठी नहीं। नियम याद थे: जो भी वह कहे, उसे परखने के लिए बीच में मत हटो।

"तुम झूठ भी तो बोल सकते हो," उसने धीरे से कहा।

"जिन्न की जीभ पर झूठ का स्वाद नहीं होता, बेटी," शरर ने नरमी से कहा। "सिर्फ़ चुप्पी का होता है। मैं तुम्हें वही बताता हूँ जो सच है। और जो सच नहीं बताता, वह तुम्हें ख़ुद ढूँढना पड़ेगा।"

पीछे से भंवर की साँस उखड़ी हुई सुनाई दी। "वो बच्चा... तेरह बरस का..." वह बुदबुदाया, "जगत भी तो बीस का था..."

"और जगत भी यहीं है," शरर ने कहा, जैसे किसी ने उसे सीधे बुलाया हो। "पर उसके बारे में पूछने का वक़्त अभी नहीं आया, भंवर सिंह। तुम्हारी बारी बाद में आएगी।"

"तुम्हारे पास तीन सवाल हैं, बेटी।"

शरर की आवाज़ अब पहले से भी ज़्यादा मीठी थी। मीरा ने अनजाने में महसूस किया कि वह उस आवाज़ की ओर झुक रही है, जैसे किसी गर्म कमरे की तरफ़ सर्दी में जाते हुए।

"मेरे यहाँ मेहमान से किराया नहीं लिया जाता। तुम मेरे पानी तक चलकर आई हो, इसलिए तीन सवाल तुम्हारे। बिना क़ीमत के। पूछो।"

हकीम ने तुरंत मीरा की कलाई छुई। उनकी उँगलियाँ बर्फ़ जैसी थीं। उन्होंने बहुत धीमे से, सिर्फ़ होंठ हिलाकर कहा, 'फँसना मत। उसके सच में भी जाल है।'

मीरा ने सिर हिलाया। उसने एक लंबी साँस ली और पहला सवाल पूछा। वह जो बाईस साल से उसके सीने में पड़ा था।

"मेरे पिता कहाँ हैं?"

"तुम्हारे पिता की आख़िरी साँस मेरे पास है, बेटी। और उनका आख़िरी शब्द भी।"

मीरा का दिल बैठ गया। यह जवाब था, और जवाब नहीं भी था। उसने तुरंत दूसरा सवाल पूछा, इस बार काँपती हुई आवाज़ में।

"क्या वे ज़िंदा हैं?"

पानी में कुछ हिला। शरर की आवाज़ में एक हल्की मुस्कान की आहट आई। "तुम इंसान किसे ज़िंदा कहते हो, बेटी? जो साँस लेता है? तब तो हाँ।"

"ये कैसा जवाब है?" कबीर के मुँह से निकल गया।

"कबीर!" हकीम ने फुसफुसाकर डाँटा।

"मैंने सच कहा," शरर ने बिना बुरा माने कहा। "उनकी साँस चल रही है। इसका मतलब क्या है, यह मैंने नहीं कहा।"

मीरा की आँखें भर आईं। उसने दाँत भींचकर तीसरा सवाल सोचा। उसका मन बार-बार पिता की ओर भाग रहा था, पर तभी पीछे बैठे भंवर की रुलाई उसके कानों में पड़ी, दबी हुई, बेआवाज़। उसने अपना फ़ैसला बदल दिया।

"भंवर के भाई को सूनगढ़ किसने भेजा था?"

एक पल को कमरे की हवा जम गई।

"वही, जिसने तुम्हारे पिता को भी भेजा था," शरर ने कहा।

मीरा को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके सीने में बर्फ़ की सिल्ली उतार दी हो। वह अनायास मुड़कर हकीम की ओर देखने लगी।

हकीम साहब का चेहरा सफ़ेद पड़ चुका था। उनकी आँखें अपने जुड़े हुए हाथों पर टिकी थीं, और होंठ हल्के-हल्के काँप रहे थे।

"हकीम साहब?" मीरा ने बहुत धीमे से कहा।

"मैंने कहा था न," हकीम ने आख़िरकार सिर उठाया। उनकी आँखों में आँसू थे। "मैंने तुमसे कहा था कि मैंने तुम्हारे पिता को सब बता दिया था। यह भी कि मेरे शब्द उनके क़दमों के रास्ते बन गए।"

"आप पर यही आरोप है, रुस्तम," शरर ने कहा, पर उसकी आवाज़ में आरोप नहीं था। वह एक पुराने दोस्त की सी तकलीफ़ में भीगी हुई थी। "मैंने तो सिर्फ़ इतना कहा था कि जिसने तुम्हारे पिता को भेजा। नाम नहीं लिया। पर तुम आज बाईस साल बाद भी ख़ुद बताने से डरते हो, कि उस रात तुम फाटक पर क्यों रुके थे?"

कबीर और भंवर दोनों ने एक साथ हकीम की ओर देखा।

हकीम ने काँपती हुई साँस ली, और जब वे बोले, तो उनकी आवाज़ पहले से बहुत बूढ़ी और बहुत छोटी लग रही थी।

"वो रात मार्च की थी," उन्होंने कहा। "विक्रम सिंह मेरे साथ फाटक तक आए थे। मैं उन्हें वहीं तक छोड़ने आया था, क्योंकि मैंने उनसे वादा किया था कि भीतर नहीं जाऊँगा। वो अकेले भीतर गए। मैं फाटक पर खड़ा रहा, पूरे डेढ़ घंटे। फिर भीतर से उनकी पुकार सुनाई दी।"

"कैसी पुकार?" मीरा की आवाज़ बैठ गई।

"मेरा नाम लेकर। 'रुस्तम भाई! रुस्तम भाई, मदद करो!' तीन बार।" हकीम के होंठ फड़के। "और मैं भाग गया, बेटी। मैंने जैसे ही वह आवाज़ सुनी, मेरे पैर अपने आप मुड़ गए। मैं पीछे मुड़कर देखे बिना रेगिस्तान में तीन मील दौड़ता चला गया, और तब तक भागा जब तक साँस नहीं रुक गई। उसके बाद मैंने बाईस साल तक किसी से यह बात नहीं कही।"

कबीर के गले से एक कठोर, टूटी हुई आवाज़ निकली, जिसमें ग़ुस्सा और दर्द साथ-साथ थे। "आपने हमारे पापा को मरने के लिए छोड़ दिया।"

"मैंने उन्हें बुज़दिली से छोड़ दिया," हकीम ने सिर झुकाकर कहा। "और मैंने कभी ख़ुद को माफ़ नहीं किया।"

मीरा ने कुछ नहीं कहा। उसने हकीम साहब को देखा, उस बूढ़े, थके हुए आदमी को, जिसकी दाढ़ी आँसुओं से भीग चुकी थी। उसके भीतर कई चीज़ें एक साथ उठीं, ग़ुस्सा, शोक, एक अजीब सी तरस। पर जिन्न की मौजूदगी में वह कोई फ़ैसला नहीं कर सकती थी। वह जानती थी कि शरर यही चाहता था कि वे आपस में बिखर जाएँ।

"तुम इसे सुनकर क्या महसूस कर रही हो, बेटी?" शरर ने पूछा। उसकी आवाज़ बहुत कोमल थी। "ग़ुस्सा? मैं तुम्हारा ग़ुस्सा समझता हूँ। सदियों से मैं भी एक ऐसे ही धोखे के नीचे दबा पड़ा हूँ। पर देखो, तुम्हारे साथ रहने वाले सब लोग किसी न किसी के क़ैदी हैं। कोई अपनी बुज़दिली का, कोई अपने भाई का, कोई अपनी जिज्ञासा का। मैं सबके दुख देख सकता हूँ।"

"तुम क्या चाहते हो?" मीरा ने सीधा पूछा। यह उसका चौथा सवाल था, और उसने नियम तोड़ा था, पर शरर हँसा नहीं।

"मैं सिर्फ़ एक चीज़ चाहता हूँ, बेटी। जो पूर्णिमा आने में तीन रातें बची हैं। उस रात, तुम बावड़ी के किनारे आना और मुझे एक घड़ा पानी देना, अपने हाथ से, अपनी मर्ज़ी से।"

"और बदले में?"

"तुम्हारे पिता का शरीर तुम्हें लौटा दूँगा। भंवर का भाई अपने भाई के पास लौट जाएगा। विजय की रूह, जो तीन सौ साल से सीढ़ी के नीचे ठंड में अकेली पड़ी है, चैन से सो सकेगी। और उन सबको जो मेरे पानी में फँसे हैं, छोड़ दूँगा। तुम चारों सुरक्षित घर जाओगे।"

"और तुम?" हकीम ने पहली बार सीधा जिन्न से बात की। उनकी आवाज़ टूटी हुई थी, पर उसमें आमिल की पुरानी धार लौट आई थी। "आज़ाद होकर तू क्या करेगा, शरर?"

एक लंबी चुप्पी रही। दीये की लौ काँपी।

"यह मत पूछो, रुस्तम," शरर ने धीमे से कहा। "तुम्हारे उस्ताद ने भी कभी नहीं पूछा था।"

हकीम के चेहरे का रंग फिर उड़ गया।

"जवाब मत दो, बेटी," शरर ने मीरा से कहा। "तीन रातें हैं। मैं इंतज़ार करना जानता हूँ। सोचो कि तुम्हारे पुरखे ने किसे धोखा दिया था, और तुम्हें किसे।"

तख़्तियों की भनभनाहट धीमी पड़ने लगी। चाबी अपने आप नाली से बाहर सरक आई और मीरा की हथेली में गिर पड़ी। दीये की लौ सीधी हो गई। कटोरी के पानी में पहली बार मीरा का चेहरा दिखा, थका हुआ, डरा हुआ, आँसुओं से सना।

चौखट की चाँदी की कील काली पड़ चुकी थी और फ़र्श पर गिरकर बेजान पड़ी थी। दरवाज़े के बाहर के पानी की आवाज़ बंद हो गई थी।

मीरा लड़खड़ाकर पीछे की ओर गिरने लगी। कबीर ने रस्सी खींचकर उसे थाम लिया। वह उसके कंधे पर निढाल हो गई, साँसें तेज़ और उखड़ी हुई।

"दी, दी!" कबीर उसका चेहरा थपथपा रहा था। "आँखें खोलो! मुझे देखो!"

मीरा ने आँखें खोलीं। कबीर का चेहरा धुँधला था, पर उसे देखकर उसकी साँस थोड़ी सँभली। उसने कुछ कहने के लिए होंठ खोले, तभी उसकी नज़र अपनी बाईं कलाई पर पड़ी।

वहाँ, ठीक नब्ज़ के ऊपर, किसी की हथेली का गीला निशान उभर रहा था। उँगलियाँ पतली और छोटी, किसी बच्चे जैसी। निशान बहुत ठंडा था, और धीरे-धीरे सूख रहा था, जैसे किसी ने अभी-अभी उसे छोड़ा हो।

हकीम ने उसकी कलाई देखी और आँखें बंद कर लीं।

"उसने तुम्हें छू लिया है," उन्होंने फुसफुसाकर कहा। "अब वह तुम्हें कहीं भी ढूँढ सकता है।"

Writer
firoj saifi
Story
रेत का क़ैदी
Chapter
6 of 30
Category
Jinn & Spirits
Reading time
15 min
Words
2884
Language
Hindi (हिंदी)
Price
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