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एपिसोड 7: पुराना टेप

firoj saifi · Jinn & Spirits · 16 मिनट

रात बीत गई, और किसी को पता नहीं चला कि कब।

मीरा कंबल में लिपटी पड़ी थी, आँखें खुली, छत की पुरानी कड़ियों को घूरती हुई। कबीर उसके पास बैठा ऊँघ रहा था, रस्सी अब भी उसकी कलाई पर लिपटी थी। भंवर दीवार से टिका सो गया था, गंगाजल की थैली छाती से चिपकाए। हकीम साहब कक्ष की चौखट पर बैठे थे, पीठ दीवार से टिकी, आँखें बंद, पर होंठ अब भी माला के साथ हिल रहे थे।

पौ फटने की पहली लाली रोशनदान से भीतर आई तो मीरा उठ बैठी।

कक्ष का फ़र्श सूखा था। रात भर रिसकर आया पानी सुबह तक जाने कहाँ ग़ायब हो चुका था। उसकी जगह सफ़ेद नमक की पतली पपड़ी जमी थी, जिस पर जगह-जगह छोटे पैरों के गीले निशान थे, उस जगह से शुरू होकर जहाँ वह रात को बैठी थी, और दरवाज़े तक जाकर ख़त्म होते हुए। छोटे, बहुत छोटे, किसी तेरह बरस के बच्चे के पैरों के।

मीरा ने उन्हें ज़्यादा देर नहीं देखा। उसने डायरी उठाई, जो कबीर के पास पड़ी थी, और आख़िरी पन्ने तक पलटती चली गई।

शरर ने सही कहा था।

डायरी के अंतिम पन्ने की स्याही के नीचे एक और पन्ना चिपका हुआ था। इतनी सफ़ाई से कि किसी ने ध्यान ही नहीं दिया था, किनारे इतने बारीक जुड़े थे कि वे पन्ने की सिलाई जैसे लगते थे। मीरा ने अपनी जेब से छोटा चाकू निकाला, बहुत सावधानी से किनारे के बीच ब्लेड फिराया, और पन्ना धीरे-धीरे अलग हो गया।

लिखावट बदली हुई थी। न तेज़, न बेचैन। पहली बार बहुत धीमी, और आँसुओं से धुली हुई।

"विजय सातवें दिन नहीं रहा।

मैंने उसे अपनी गोद में लिया तो उसकी साँस पहले से धीमी थी। उसने आँखें खोलकर मुझसे कहा, 'पिताजी, मुझे प्यास लगी है।' मैंने उसे पानी दिया। उसने एक घूँट पिया, और फिर कुछ नहीं बोला।

मैं जानता हूँ कि मैंने क्या किया। मैंने जिन्न से सौदा किया, फिर उसे तोड़ा। मैंने अपने बेटे को बचाने के लिए उसे बाँध दिया, और उसी बंधन ने मेरे बेटे की साँस छीन ली। मैं किसी से नहीं कह सकता। न रानी से, न आमिलों से। अगर आमिल जान गए कि बच्चा मर चुका है तो वे शायद बंधन तोड़ दें, और मैं उसे और दुख नहीं दे सकता।

मैंने उसे बावड़ी की सातवीं सीढ़ी के नीचे दफ़नाया है। उसी जगह जहाँ वह रोज़ पानी में पैर डालकर बैठता था।

जो भी मेरा वंशज इसे पढ़े, वह जान ले कि जिन्न ने मुझसे झूठ नहीं बोला था। मैंने ही अपने आपसे झूठ बोला।"

पन्ने के नीचे सिर्फ़ एक पंक्ति और थी, इतनी धुँधली कि मीरा को उसे चार बार पढ़ना पड़ा।

"मेरे बच्चे, मुझे माफ़ कर देना।"

मीरा ने डायरी बंद कर दी। उसके हाथ ठंडे थे, पर आँखें सूखी। रात के आँसू रात के साथ चले गए थे।

"दी?" कबीर ने आँखें खोलीं और उसका चेहरा देखकर तुरंत उठ बैठा। "क्या हुआ?"

मीरा ने चुपचाप डायरी उसे थमा दी और पन्ना खोलकर दिखाया।

कबीर ने पढ़ा। उसका चेहरा धीरे-धीरे सख़्त होता गया। "तो वह सच बोल रहा था," उसने कहा।

"वह हमेशा सच बोलता है," मीरा ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा। "यही तो उसका सबसे बड़ा हथियार है। हम जिस आदमी को शैतान बनाकर आए थे, वह पहले पीड़ित निकलता है। हम जो भी करने जाएँगे, उसके सच के सामने हमारा पक्ष कमज़ोर पड़ जाएगा।"

"पर वह हमारे आदमियों को चुरा रहा है," कबीर ने कहा। "भंवर जी के भाई को, पापा को। अगर वह इतना ही पीड़ित है तो इन्हें क्यों पकड़कर बैठा है?"

"मुझे नहीं पता," मीरा ने कहा। "और यही मुझे सबसे ज़्यादा डराता है।"

हकीम साहब ने पूरा दिन उन्हें किले में नहीं रहने दिया।

"सूरज की रोशनी में उसकी पकड़ सबसे कमज़ोर होती है," उन्होंने समझाया, जब चारों कक्ष से निकलकर आँगन में आए। आँगन अब पूरा सूखा था, बिना किसी निशान के, जैसे रात भर यहाँ कुछ हुआ ही न हो। "रात में वह पानी के सहारे चलता है, और दिन में रेगिस्तान की धूप उसका पानी सोख लेती है। इसलिए जो ढूँढना है, आज ही ढूँढना होगा।"

"क्या ढूँढना है?" भंवर ने पूछा। उसकी आवाज़ में अब भी रात की थकान थी, पर उसके चेहरे पर एक नया कठोर भाव था।

"पापा का सच," मीरा ने कहा। "वह कहाँ रुके थे, क्या करते रहे, क्या जानते थे। शरर कहता है कि मेरे पिता की साँस उसके पास है। मैं जानना चाहती हूँ कि उन्होंने इकतालीस दिनों में क्या किया था।"

हकीम ने उसकी ओर देखा। वे कुछ कहना चाहते थे, पर फिर चुप रहे। उन्होंने बस इतना कहा, "उनका डेरा किले के भीतर नहीं था। पश्चिमी प्राचीर के बाहर, एक पुराना ऊँटवालों का ठिकाना है, जहाँ वे रुके थे। मैंने उन्हें वहीं छोड़ा था।"

"आप वहाँ ले चलेंगे?"

"हाँ।" हकीम ने गहरी साँस ली। "मैं पहले ही बहुत देर कर चुका हूँ।"

पश्चिमी प्राचीर की दीवार का बाहरी हिस्सा रेत से ढका हुआ था। जहाँ किले के भीतर की ज़मीन साफ़ थी, वहाँ बाहर टीले दीवार से सटे ऊँचे होते चले गए थे। चारों ने रस्सी बाँधकर रेत पर चलना शुरू किया। पैर घुटनों तक धँस रहे थे और धूप सिर पर आग बरसा रही थी।

कबीर पीछे-पीछे चल रहा था, कंधे पर कैमरे का थैला लटकाए, पर कैमरा बंद था। उसके होंठ सूखे थे और वह बार-बार पानी की बोतल से घूँट भर रहा था। मीरा ने ग़ौर किया कि पिछले एक घंटे में वह तीसरी बार बोतल मुँह से लगा रहा है।

"कबीर, धीरे। पानी गिनकर पीना है, याद है?"

"पता है, दी," कबीर ने झुँझलाकर कहा। "पर प्यास ही नहीं बुझ रही। मुँह बार-बार सूख जाता है।" उसने ज़बान होंठों पर फेरी और होंठ फटे हुए निकले। "शायद रात की थकान है।"

भंवर, जो उसके पीछे चल रहा था, अचानक रुक गया। उसकी नज़र ज़मीन पर थी।

"क्या हुआ?" मीरा ने पूछा।

"कुछ नहीं, मैडम," भंवर ने धीमे से कहा। पर उसकी आवाज़ में कुछ अटका हुआ था। उसने कबीर की पीठ की ओर देखा, और फिर वहाँ से रेत पर पड़ती परछाईं की ओर। "बस... धूप की वजह से आँखों में धोखा हो रहा होगा।"

कबीर चलता रहा, और भंवर भी। पर मीरा ने देखा कि भंवर अब कबीर से थोड़ी दूरी बनाकर चल रहा है।

वह ख़ुद भी परछाईं देखने लगी, पर रेत की चमक में कुछ साफ़ नहीं दिखा।

वे लगभग एक घंटे चले होंगे, जब हकीम ने इशारा किया। प्राचीर के कोने के पीछे, एक छोटे से गड्ढे में, जिसे चारों ओर से रेत के टीलों ने घेर रखा था, एक आकृति आधी दबी पड़ी थी।

जीप।

वह पुरानी, धूल से सनी और जंग से भूरी हो चुकी थी। उसकी छत तक रेत चढ़ी हुई थी, और टायर पूरे ग़ायब थे। पर सिर्फ़ कुछ दूर पर एक पुराना सा झंडा लगा था, जिसकी नीली पट्टी पर जयपुर विश्वविद्यालय का निशान आधा-अधूरा दिख रहा था।

मीरा के पैर जम गए।

"ये पापा की जीप है," उसने सुन्न आवाज़ में कहा। "बाईस साल तक सबने कहा कि इसे ढूँढा नहीं जा सका। रेतीले तूफ़ान में बह गई होगी।"

"बही नहीं थी," हकीम ने कहा। "हमेशा यहीं थी। यह जगह रेत के टीलों के पीछे छिपी है, कोई ऊपर से नहीं देख सकता।"

कबीर दौड़कर जीप की ओर गया और हाथों से रेत हटाने लगा। भंवर भी उसकी मदद को आगे बढ़ा, पर उसने कबीर से दो क़दम दूरी बनाए रखी। कुछ मिनटों में जीप का दरवाज़ा खुल गया।

भीतर सीटें गल चुकी थीं, पर पिछली सीट पर एक चमड़े का थैला अब भी सलामत रखा था। मीरा ने काँपते हाथों से उसे खींचा। थैला भारी था। उसमें एक टार्च, एक छोटी नोटबुक, एक कम्पास, और काले प्लास्टिक के छह छोटे डिब्बे थे। उनके ऊपर किसी की जानी-पहचानी लिखावट में नंबर लिखे थे: 1, 2, 3, 4, 5, 6।

मीरा ने एक डिब्बा खोला।

भीतर माइक्रो-कैसेट थी। और थैले के सबसे नीचे, किसी रुमाल में लिपटा, एक छोटा-सा हाथ में समाने वाला टेप-रिकॉर्डर था। पुराने ज़माने का, सोनी का, जिसका प्लास्टिक पीला पड़ चुका था।

"ये पापा हमेशा साथ रखते थे," मीरा ने फुसफुसाया। "वे अपने सर्वे की बातें इसमें रिकॉर्ड करते थे। घर पर भी, जब वे थककर आते थे और हम सो जाते थे, तब भी वे इसमें कुछ बोलते रहते थे।" उसकी आवाज़ टूट गई। "मुझे याद है कि मैं कई बार रात को दरवाज़े पर कान लगाकर सुनती थी।"

"चलेगा?" कबीर ने पूछा।

मीरा ने रिकॉर्डर का पिछला ढक्कन खोला। बैटरी वाला खाना ख़ाली था। "कबीर, तुम्हारे पास कोई छोटी बैटरी है?"

"मेरे फ़्लैश ट्रिगर में दो AAA पड़ी हैं।" कबीर ने थैला टटोला। निकालीं, मीरा को थमाईं।

मीरा ने बैटरियाँ लगाईं। उसके हाथ इतने काँप रहे थे कि पहली बार वे गिर गईं। कबीर ने उसके हाथ थामे और धीरे से कहा, "मैं करता हूँ, दी।"

उसने बैटरियाँ लगाईं, ढक्कन बंद किया, और पहला कैसेट रिकॉर्डर में डाला।

"प्ले करो," मीरा ने कहा, और उसकी आँखें बंद हो गईं।

कबीर ने बटन दबाया।

पहले सिर्फ़ फुफकार सुनाई दी। फिर एक खटका, किसी कुर्सी के हिलने की आवाज़, और फिर, इतनी साफ़ कि जैसे वह इसी कमरे में खड़ा हो, एक भारी, गर्म, जाना-पहचाना स्वर:

"आज सात मार्च, दो हज़ार चार। सूनगढ़ का पहला दिन। शाम के चार बजे हैं।"

मीरा ने अपना मुँह दोनों हाथों से ढक लिया।

वह आवाज़। बाईस साल बाद भी, एक पल में वह आवाज़ उसे चौदह साल की उस लड़की में बदल गई जो छत पर बैठकर अपने पिता की राह देखा करती थी। गहरी, ठहरी हुई, हर शब्द पर हल्की मुस्कान घुली हुई।

"किले तक पहुँचने में दो दिन लगे। रेगिस्तान ने रास्ता बहुत मुश्किल बनाया, पर जब सामने सूनगढ़ की प्राचीर दिखी तो थकान पूरी तरह भूल गया। ऐसा लगा जैसे मैं किसी पुरानी याद में लौट आया हूँ। अजीब बात है, मैं पहले यहाँ कभी नहीं आया।"

एक हल्की हँसी।

"मीरा को पुरातत्व का शौक़ मुझ पर गया है, शायद। कल रात उसने मुझसे पूछा कि पापा, आप हमेशा पुरानी चीज़ें क्यों ढूँढते हो? मैंने कहा, क्योंकि पुरानी चीज़ें झूठ नहीं बोलतीं। वह हँसी। चौदह साल की हो गई है, इतनी जल्दी। और कबीर पाँच का, जो अब भी हर रात मेरे कंधे पर चढ़कर आसमान के तारे गिनता है।"

कबीर की आँखों में आँसू आ गए। उसने रिकॉर्डर को पकड़े हुए हाथ से बहन का कंधा पकड़ लिया।

"मैं इस सर्वे के बाद दोनों को यहाँ ज़रूर लाऊँगा। कबीर शोर मचाएगा, मीरा हर पत्थर पर सवाल करेगी, और मैं उन दोनों के साथ बैठकर रेत में सूरज डूबता देखूँगा। बस ये सर्वे पूरा हो जाए।"

टेप में थोड़ी देर सन्नाटा रहा। फिर:

"सूनगढ़ के बारे में दादाजी ने एक बार बताया था। कहते थे कि हमारे परिवार की जड़ें किसी राजवंश तक जाती हैं, पर वे कभी इसका नाम नहीं लेते थे। जब मैंने ज़िद की तो उन्होंने बस इतना कहा, 'विक्रम, कुछ जगहों से लौटने के बाद आदमी वैसा नहीं रहता।' तब मैं उनकी बात का मतलब नहीं समझा था।"

टेप खटका, और अगली रिकॉर्डिंग शुरू हो गई। तारीख़ें आगे बढ़ती गईं। "नौ मार्च... बारह मार्च... पंद्रह मार्च..." विक्रम की आवाज़ में धीरे-धीरे कुछ बदलता गया। मुस्कान की जगह एक तनाव ने ले ली, जैसे वह किसी बहुत बड़ी चीज़ को छुपाकर बोल रहा हो।

"सत्रह मार्च। कल रात बावड़ी पर गया था। वहाँ कोई था। मैं उसे देख नहीं सका, पर उसने मुझसे बात की। मेरा नाम लिया। उसने कहा कि वह मेरा इंतज़ार कर रहा था।"

मीरा की साँस रुक गई।

"मैंने उससे डरने की कोशिश की, पर उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो डर नहीं पैदा करता था। वह बहुत अकेला लगता था। उसने कहा, उसका नाम शरर है। उसने मुझे अपनी सारी कहानी सुनाई। मैं पूरी रात बावड़ी की सीढ़ियों पर बैठा रहा, और जब सुबह हुई, तो मुझे लगा कि मैंने सपना देखा है।"

"एक बात जो मुझे अटक रही है। वह कभी झूठ नहीं बोलता, लेकिन हर बात में कुछ छोड़ देता है। रुस्तम भाई ने ठीक कहा था। वह सच के भीतर जाल बुनता है।"

कबीर ने चौंककर हकीम की ओर देखा। हकीम साहब पथराई आँखों से रिकॉर्डर को घूर रहे थे।

"आज मैंने उससे पूछा कि वह मुझसे क्या चाहता है। उसने कहा, 'तुम्हारे वंश का ख़ून।' मैंने पूछा, 'किसलिए?' उसने कहा, 'क्योंकि तुम उस द्वार की चाबी हो जो मुझे आज़ाद कर सकता है। और उसी द्वार की ताला भी।'"

"उसने मुझे एक बात और बताई, जो मैंने अब तक किसी को नहीं बताई। उसने कहा कि सातवें आमिल का नाम मौलाना ख़लील था, और वह भागा नहीं था। उसे किसी ने..."

टेप में एक चीख़ जैसी तेज़ खरखराहट हुई और आवाज़ कट गई।

कबीर ने रिकॉर्डर को देखा। "क्या हुआ? बंद हो गया?"

"नहीं," मीरा ने कहा। उसकी आँखें रिकॉर्डर पर गड़ी थीं। "टेप ख़त्म हुआ है। अगला डिब्बा लगाओ।"

कबीर ने कैसेट पलटी, दूसरा कैसेट लगाया, और बटन दबाया।

पाँचवें कैसेट तक पहुँचते-पहुँचते मीरा की साँस उखड़ चुकी थी। दोपहर ढलने लगी थी। रेत की गर्मी कम हो गई थी, पर किसी की प्यास कम नहीं हुई थी। कबीर ने बोतल खाली कर दी थी, और भंवर चुपचाप अपनी कैन से उसे आधा पानी थमा रहा था।

पाँचवाँ टेप चलने लगा। अब विक्रम की आवाज़ में न मुस्कान थी, न तनाव। सिर्फ़ थकावट थी, गहरी, खोखली थकावट।

"आज इकतीस दिन हो गए। मैं अब बाहर नहीं जा सकता। जब भी किले के फाटक की तरफ़ जाता हूँ, रेत ऊपर उठकर रास्ता रोक लेती है। शरर नहीं चाहता कि मैं जाऊँ।"

"मैंने अपने बच्चों के बारे में सोचना बंद कर दिया है। यह मेरी सबसे बड़ी हार है। जब आदमी अपने बच्चों के बारे में सोचना बंद कर देता है, तब उसे पता चल जाता है कि वह भीतर से टूट रहा है।"

"पर कल रात मैंने कुछ देखा। तहख़ाने के नीचे, जहाँ पानी जमा है, एक आदमी बैठा था। उसने मुझसे बात नहीं की। वह सिर्फ़ मुझे देखता रहा। उसके कंधे पर एक पुरानी हरी चादर थी, और उसके दाहिने हाथ की एक उँगली..."

हकीम साहब ने झटके से मुट्ठी बाँध ली।

"उसकी तर्जनी नहीं थी। वह बस मुझे एक चाबी दिखा रहा था, पीतल की। फिर वह धुएँ की तरह ग़ायब हो गया।"

भंवर के हाथ की कैन ज़मीन पर गिर पड़ी। छनाक की आवाज़ रेत में खो गई।

"वही," भंवर ने फुसफुसाकर कहा। "वही आदमी, जिसने जगत को चाबी दी थी।"

मीरा ने रिकॉर्डर की ओर झुककर कैसेट आगे बढ़ाई। टेप फिर चल पड़ा।

"मैं अब समझ रहा हूँ कि यह सब चाल है। जो मुझे यहाँ तक लाया, उसने सब पहले से तय कर रखा था। मैं बस एक मोहरा था।"

"अगर कोई इस टेप को सुने, तो ये जान ले कि चाबी ग़लत हाथ में गई तो... तो..."

आवाज़ कट गई। फुफकार फिर लौटी, और उसके बीच में, बहुत धीमी, एक और आवाज़ आई। किसी का दरवाज़ा खटखटाना।

मीरा ने साँस रोक ली।

"कौन है?" विक्रम की आवाज़ टेप में गूँजी, घबराई हुई।

"मैं हूँ।" जवाब आया। वह आवाज़ किसी बूढ़े आदमी की थी, धीमी और थकी हुई। "मैं हूँ, विक्रम सिंह।"

"रुस्तम भाई?" विक्रम की आवाज़ में अविश्वास और राहत दोनों थे। "आप? आप यहाँ कैसे? आपने तो वादा किया था कि भीतर नहीं आएँगे..."

टेप यहीं रुक गया।

एक लंबी, भारी चुप्पी छा गई।

मीरा ने धीरे-धीरे सिर घुमाकर हकीम की ओर देखा। भंवर और कबीर भी उन्हें देख रहे थे। हकीम साहब की आँखें रिकॉर्डर पर जमी थीं, चेहरा बेजान, जैसे किसी ने उनके भीतर का सारा ख़ून खींच लिया हो।

"आपने कहा था," मीरा की आवाज़ बहुत शांत थी, इतनी शांत कि उससे डर लग रहा था, "कि आप फाटक पर रुके थे। कि आपने पुकार सुनी और भाग गए।"

"मैंने..." हकीम ने बोलने की कोशिश की, पर गला साथ नहीं दे रहा था। "मैंने ऐसा ही कहा था।"

"तो ये कौन था?"

"मैं नहीं जानता," हकीम ने कहा। उनके होंठ सूख चुके थे। "बेटी, भगवान की क़सम, मैं नहीं जानता कि ये कौन था।"

कबीर रिकॉर्डर को घूर रहा था। उसकी भौंहें सिकुड़ गईं। "एक मिनट," उसने कहा। "ये रिकॉर्डर... इसकी रील घूम क्यों नहीं रही?"

सबने नीचे देखा। रिकॉर्डर के पारदर्शी ढक्कन के भीतर कैसेट की रीलें स्थिर थीं। उनमें कोई हरकत नहीं थी, पर टेप की आवाज़ अब भी आ रही थी।

“...रुस्तम भाई...”

विक्रम की आवाज़। पर उसमें अब दर्द नहीं था, न डर। वह किसी रिकॉर्ड की हुई चीज़ की तरह बिल्कुल सपाट थी, बार-बार वही शब्द दोहराती हुई। जैसे कोई तोता रटे हुए शब्द बोल रहा हो।

“...रुस्तम भाई... आप यहाँ कैसे... आप यहाँ कैसे... आप...”

"बंद करो इसे!" हकीम चीख़े। "बैटरी निकालो! अभी!"

कबीर ने रिकॉर्डर का ढक्कन खोला। भीतर की दोनों बैटरियाँ वहाँ थीं, पर उनके ऊपर पानी की पतली परत जमी थी, और उनके किनारों पर जंग लग चुकी थी, जैसे वे बरसों से वहाँ पड़ी हों। कबीर ने बैटरियाँ नोच फेंकीं।

आवाज़ बंद नहीं हुई।

“...रुस्तम भाई...”

आवाज़ अब रिकॉर्डर से नहीं आ रही थी। वह उनके चारों ओर की रेत से आ रही थी, हवा से, धूप से, और हर शब्द के साथ थोड़ी-थोड़ी बदल रही थी। विक्रम की आवाज़ धीरे-धीरे किसी और में घुल रही थी, किसी गहरी, मीठी, थकी हुई आवाज़ में।

“...रुस्तम भाई... रुस्तम भाई... तुम्हारे सिवा और कौन जानता था...”

भंवर के हाथ में गंगाजल की थैली काँप रही थी। कबीर ने रिकॉर्डर को पूरी ताक़त से रेत पर पटक दिया। प्लास्टिक के टुकड़े बिखर गए, पर आवाज़ जारी रही।

“...मैंने कहा था ना, मीरा... बहुत कुछ काट दिया जाता है...”

"चलो!" हकीम चिल्लाए। "सब वापस चलो! अभी!"

वे दौड़ पड़े। जीप, रेत, टेप, सब पीछे छूट गए। मीरा के हाथ में चमड़े का थैला था, जिसे उसने किसी तरह थामे रखा, पाँचों और छठा कैसेट उसमें लिपटे हुए। हकीम सबसे आगे थे, और उनके पीछे-पीछे रेत में उनकी लंबी परछाईं भागती आ रही थी।

कबीर सबसे पीछे था। दौड़ते हुए उसे अचानक ऐसा लगा कि उसकी पीठ पर किसी की नज़र है। उसने भागते-भागते मुड़कर देखा।

रेत पर उसकी परछाईं पड़ी थी, लंबी, सीधी। और जब वह रुका, तब भी उसकी परछाईं कुछ क्षण और चलती रही, जैसे उसे रुकने का एहसास देर से हुआ हो।

फिर वह भी ठहर गई।

कबीर का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। उसने अपनी आँखें मलीं और आगे भागने लगा, यह सोचकर कि शायद थकान है, शायद धूप का धोखा।

पर उसे पता नहीं चला कि रेत पर उसकी परछाईं, चलते-चलते, उसके पीछे दो क़दम पीछे छूट गई थी।

Writer
firoj saifi
Story
रेत का क़ैदी
Chapter
7 of 30
Category
Jinn & Spirits
Reading time
16 min
Words
3012
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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