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एपिसोड 8: सातवीं क़ब्र का ताला
firoj saifi · Jinn & Spirits · 14 मिनट
शाम होने से पहले चारों वापस शाही कक्ष में पहुँच गए।
दौड़ने से उनकी साँसें उखड़ी हुई थीं। मीरा ने थैला ज़मीन पर रखा और दीवार से पीठ टिकाकर बैठ गई। कबीर ने दरवाज़े पर नमक की नई लकीर खींची। भंवर ने ख़ामोशी से कैन से पानी निकाला और सबके कुल्हड़ों में आधा-आधा भर दिया, कबीर के कुल्हड़ में थोड़ा ज़्यादा। कबीर ने बिना कुछ बोले एक ही घूँट में उसे ख़त्म कर दिया।
हकीम साहब कक्ष के सबसे दूर के कोने में जाकर बैठ गए थे। उन्होंने दोनों घुटने सीने से लगा लिए थे और माथा उन पर टिका दिया था। उनकी माला उनकी उँगलियों में पड़ी थी, पर उसके दाने नहीं हिल रहे थे।
मीरा ने उन्हें बहुत देर तक देखा। फिर वह उठी, चलकर उनके सामने बैठ गई।
"हकीम साहब।"
हकीम ने सिर नहीं उठाया।
"मैं चिल्लाऊँगी नहीं," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ में न ग़ुस्सा था, न नरमी, बस एक थकी हुई सच्चाई थी। "आपने मुझसे सब कुछ बताने को कहा था न, एक बार? कि मैं पूछूँ तो आप बताएँगे? आज मैं पूछ रही हूँ। टेप में जो आवाज़ आई, वह किसकी थी? आप फाटक से भागे, या आप भीतर गए थे?"
हकीम ने धीरे-धीरे सिर उठाया। उनकी आँखें लाल थीं और चेहरे पर बाईस साल की थकान उतर आई थी।
"मैं भीतर गया था," उन्होंने कहा।
कबीर दो क़दम आगे बढ़ा, पर भंवर ने हाथ पकड़कर उसे रोक लिया। "सुनो पहले," भंवर ने धीमे से कहा।
"मैंने पहले जो कहा था वह आधा सच था," हकीम बोले। उनकी आवाज़ टूट-टूटकर निकल रही थी। "वो रात आई थी जब मैंने विक्रम को फाटक पर छोड़ा। मैं भागा भी था, और वह पुकार भी मैंने सुनी थी। पर वह पहली रात थी, बेटी। मार्च की पंद्रह तारीख़।"
"पहली रात?"
"मैं पूरे चालीस दिन तक हर रात जैसलमेर से लौटकर फाटक तक आता रहा। चोरी-छुपे, किसी को बताए बिना। मैं भीतर जाने की हिम्मत नहीं कर पाता था। रोज़ एक घंटा फाटक पर खड़ा रहता, फिर लौट जाता। और चालीसवें दिन..." वे रुके। "चालीसवें दिन मैंने तय किया कि मैं और नहीं भाग सकता।"
"आप भीतर गए।"
"हाँ। मैं रस्सी, पानी और रोटी लेकर गया। मुझे लगा था कि अगर विक्रम ज़िंदा हैं तो मैं उन्हें निकाल लाऊँगा।" हकीम ने गहरी साँस ली। "पर रास्ते में कोई चीज़ मुझे बार-बार रोकती रही। कभी रेत, कभी हवा। फिर भी मैं तहख़ाने तक पहुँचा। वहाँ उन्हें ढूँढ़ लिया। वह उसी गार्ड के कमरे में थे, जहाँ आज सुबह तुमने वह नक़ली कंकाल देखा था।"
"पापा ज़िंदा थे?" मीरा की आवाज़ फट गई।
"ज़िंदा थे। बहुत कमज़ोर, पर ज़िंदा। उनकी दाढ़ी बढ़ चुकी थी, कपड़े फट चुके थे, पर आँखें साफ़ थीं।" हकीम की आँखों से आँसू बह रहे थे और वे उन्हें पोंछने की कोशिश भी नहीं कर रहे थे। "उन्होंने मुझे देखा तो रो पड़े। हम दोनों बहुत देर तक वहीं बैठे रहे। फिर उन्होंने मुझसे एक वादा लिया।"
"कौन सा?"
"कि मैं तुम्हें कभी यहाँ नहीं आने दूँगा, बेटी। तुम्हें, और कबीर को। उन्होंने कहा, 'रुस्तम भाई, कसम खाओ कि चाहे जो हो जाए, मेरे बच्चे सूनगढ़ का रास्ता नहीं देखेंगे।' और मैंने कसम खाई।"
हकीम ने दोनों हाथों से चेहरा ढक लिया। "और आज मैं तुम्हारे साथ यहाँ बैठा हूँ।"
मीरा चुपचाप उन्हें देखती रही। उसके भीतर कोई पुरानी गाँठ धीरे-धीरे ढीली हो रही थी, पर उसने अपने चेहरे पर कोई भाव नहीं आने दिया।
"जब मैं रात को लौट रहा था तो पीछे से किसी ने पुकारा," हकीम ने कहा। "मेरे ही नाम से, मेरी ही आवाज़ में। मैं रुका नहीं। जब मैं बाहर पहुँचा, तब भी पीछे वह आवाज़ आती रही, बिल्कुल मेरी तरह। मैं उसके बाद कभी लौटकर नहीं गया। मुझे अब यक़ीन नहीं है कि टेप में जो विक्रम से बात कर रहा था, वह मैं था या वह जो मेरी आवाज़ बनाता है।"
"आपने अपनी आवाज़ किसी को दी है, हकीम साहब?" कबीर ने धीमे से पूछा। "क्या ऐसा कुछ सौदा..."
"कभी नहीं," हकीम ने कहा। "पर जिन्न को सौदे की ज़रूरत नहीं होती। जो उसके सामने बोलता है, उसकी आवाज़ वह सीख लेता है।"
एक चुप्पी रही।
फिर हकीम ने अपनी पोटली में हाथ डाला और भीतर से एक छोटी सी, पुरानी चीज़ निकाली। एक लिफ़ाफ़ा। पीला पड़ा हुआ, किनारे फफूँदी लगे, और उस पर मोम की टूटी हुई मुहर।
"उस रात, जब मैं जाने लगा, तो विक्रम ने मुझे यह दिया था," उन्होंने कहा। "कहा, 'अगर कभी मीरा किसी तरह यहाँ पहुँच जाए, तो उसे यह देना।' मैंने बाईस साल इसे अपने पास रखा। हर साल सोचता रहा कि कब दूँगा। कब हिम्मत जुटा पाऊँगा।"
उन्होंने काँपते हाथों से लिफ़ाफ़ा मीरा की ओर बढ़ाया।
"पर मैंने इसे कभी खोला नहीं। मैंने कसम खाई थी कि तुम्हें यहाँ आने से रोकूँगा, और अगर मैं यह चिट्ठी देता तो मानता कि वह कसम टूट चुकी है। आज मैं यह मान रहा हूँ। लो, बेटी।"
मीरा ने लिफ़ाफ़ा लिया। उसके हाथ में वह अजीब सा हल्का लगा, इतना हल्का कि उसे विश्वास नहीं हुआ कि इतने साल एक आदमी के हाथों में बँधी रही चीज़ इतनी हल्की हो सकती है।
उसने लिफ़ाफ़ा खोला। भीतर एक पन्ना था, तह किया हुआ, और उस पर अपने पिता की जानी-पहचानी लिखावट।
वह बहुत देर तक पढ़ नहीं पाई। उसकी आँखों में आँसू भर आए थे। कबीर उसके पास आकर बैठा और उसने कंधे पर हाथ रखा। "मैं पढ़ दूँ, दी?"
"नहीं," मीरा ने कहा। "मैं पढ़ूँगी।"
उसने आँखें पोंछीं, और धीमी, काँपती आवाज़ में पढ़ना शुरू किया।
"मेरी गुड़िया,
अगर तू यह पढ़ रही है तो इसका मतलब है कि मैं हार गया, और तू फिर भी आ गई। मैं तुझ पर नाराज़ नहीं हूँ। मैं जानता हूँ कि तू बचपन से किसी रोक को नहीं मानती। तूने अपनी माँ से सीखा होगा, या मुझसे।
पहले एक बात: डर मत। मैं यहाँ ठीक हूँ। मुझे अब तक यहाँ चालीस दिन हो गए, और मैंने इस जगह को इतना जान लिया है कि इससे डरना बंद कर दिया है। डर वहाँ होता है जहाँ अज्ञान होता है, और मैंने अपना अज्ञान काफ़ी हद तक काट लिया है।
मैं तुझे कुछ बातें बताना चाहता हूँ, बिटिया, क्योंकि शायद आगे मौक़ा न मिले।
एक: रुस्तम भाई को दोष मत देना। उन्होंने मुझे वही बताया जो उन्हें बताया गया था। और वह आधा सच था। पूरा सच सातवीं क़ब्र के नीचे है।
दो: जिन्न कभी झूठ नहीं बोलता। यह बात याद रखना। पर वह जो नहीं कहता, उसे पहचानना सीख। जब भी उसका कोई जवाब तुझे बहुत मीठा लगे, तो खुद से पूछना कि उसने क्या नहीं कहा।
तीन: पीतल की एक चाबी है। उसे एक बार एक आदमी ने मुझे दिखाया था, जिसके हाथ की उँगली नहीं थी। चाबी सातवीं क़ब्र का ताला खोलती है। पर उसे सिर्फ़ तब खोलना जब पाँच लोग साथ हों... नहीं, चार, क्योंकि मैं पाँचवाँ हो ही नहीं सकता। सूरज के रहते खोलना, रात में नहीं।
चार: मेरी गुड़िया, जो आदमी तेरे पास पानी लेकर आए, चाहे वह तेरा सबसे प्यारा क्यों न हो, उसका पानी मत पीना। और जो आदमी अपनी परछाईं के बिना आए, उसे पानी मत देना।
पाँच: कबीर को सँभालकर रखना। उसकी आँखों में मेरी आँखें हैं, और मुझे डर है कि इस जगह से वे दोनों ही पहचानी जाएँगी।
मैं तुझसे कभी कह नहीं पाया कि मुझे तुझ पर कितना गर्व है। इसलिए आज लिख रहा हूँ।
तेरा पापा।
पुनश्च: माँ से कहना कि मैं जल्दी आऊँगा। वह जानती है कि मैं हमेशा देर से आता हूँ।"
मीरा की आवाज़ उस आख़िरी पंक्ति पर पूरी तरह टूट गई। वह चिट्ठी सीने से लगाए बैठी रही, कंधे हिलते हुए, पर बिना आवाज़ के। कबीर ने बहन को पूरी तरह अपनी बाँहों में भर लिया। उसकी अपनी आँखों से आँसू बह रहे थे, पर उसके होंठ भिंचे हुए थे, जैसे वह किसी अनकही बात को अपने भीतर दबा रहा हो।
भंवर ने चुपचाप मुँह फेर लिया। हकीम साहब के कंधे हिल रहे थे।
काफ़ी देर बाद, जब कमरे की हवा थोड़ी हल्की हुई, तब मीरा ने सिर उठाया और रुँधे गले से कहा, "वह कहते थे... कबीर की आँखों में उनकी आँखें हैं। और मुझे डर है कि इस जगह से वे दोनों पहचानी जाएँगी।"
कबीर ने कुछ नहीं कहा। उसने अपने हाथ देखे, फिर चुपचाप पानी का कुल्हड़ उठाकर घूँट भरा।
"सातवीं क़ब्र," हकीम ने धीमे से कहा। "वही बात जो विक्रम ने कही, जो डायरी में लिखा है, जो टेप में कटी हुई आवाज़ ने कहा। सब कुछ वहाँ की ओर जा रहा है।"
"और चाबी हमारे पास है," भंवर ने कहा। उसने अपनी जेब से वह पीतल की चाबी निकाली और हथेली पर रखकर उसे घूरने लगा। उसकी आवाज़ में अजीब सा हौसला था, जैसे किसी ने उसके भीतर कुछ जगा दिया हो। "जगत ने इसे मेरे लिए छुपाया था। अब इसे वहीं लगाना है जिसके लिए यह बनी है।"
"सूरज डूबने में एक घंटा बचा है," मीरा ने कहा। उसने चिट्ठी तह की और अपनी जेब में रख ली। "अभी चलना होगा।"
पिछवाड़े का आँगन सूरज की आख़िरी किरणों में सुनहरा लग रहा था।
सात क़ब्रें अर्धवृत्त में खड़ी थीं, वैसी ही जैसी उन्होंने उन्हें पिछली दोपहर देखा था। छठी तक पत्थरों पर नाम खुदे थे। सातवीं पर वही ख़ाली, चिकना पत्थर और धँसी हुई मिट्टी।
चारों उसके सामने खड़े हो गए। हकीम ने पहले चारों ओर नमक की लकीर खींची। फिर अपनी माला गले में डाली। भंवर ने चाबी हाथ में ली।
"ताला कहाँ है?" कबीर ने पूछा। "इस पत्थर में तो कुछ नहीं दिखता।"
"नीचे देखो," मीरा ने कहा। "विक्रम ने लिखा था कि चाबी ताला खोलती है। पर ताला कहीं छुपा होगा।"
कबीर ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ गया और धँसी हुई मिट्टी को हाथों से हटाने लगा। कुछ ही देर में, पत्थर की जड़ के पास, जहाँ मिट्टी ने क़ब्र के चबूतरे को छूना छोड़ दिया था, एक छोटा सा गोल छेद दिखा, किसी ताले की चाबी लगाने जैसा, पर इतना पुराना और जंग खाया कि शुरू में किसी को नज़र नहीं आया था।
"यहाँ है," उसने कहा।
भंवर आगे बढ़ा। उसके हाथ काँप रहे थे। वह घुटनों के बल बैठा और बहुत धीरे से चाबी छेद में डाली।
चाबी बिना किसी रुकावट के भीतर चली गई।
भंवर ने उसे घुमाया। एक भारी, पत्थर के रगड़ खाने जैसी आवाज़ आई। चबूतरे की ऊपरी पटिया, पूरी की पूरी, एक तरफ़ सरकने लगी। धूल का एक ग़ुबार उठा, और जब वह छँटा तो नीचे एक चौकोर खुला हुआ रास्ता दिख रहा था। छोटी सी सीढ़ियाँ, सिर्फ़ सात, जो नीचे एक गोल कक्ष तक जाती थीं।
हवा में अजीब सी गंध आई। नमी की, पर पानी की नहीं। पुराने, बंद कमरे की गंध, जो सदियों से हवा के इंतज़ार में थी।
"मैं पहले उतरता हूँ," हकीम ने कहा।
"नहीं," भंवर बोला। "मैं।" उसकी आँखों में वही सख़्ती थी जो रात की रुलाई के बाद आई थी। "यह मेरे भाई की चाबी है। मैं जाऊँगा।"
उसने किसी के जवाब का इंतज़ार नहीं किया। टॉर्च जलाकर वह सीढ़ियों पर उतर गया। बाक़ी तीनों उसके पीछे-पीछे उतरे। मीरा ने तख़्ती हाथ में ले ली थी, चाबी की जोड़ी वाली। कबीर सबसे पीछे था।
सातवीं सीढ़ी पर पहुँचकर भंवर रुक गया।
कक्ष छोटा था, गोलाकार, बलुआ पत्थर की दीवारें ऊपर की ओर गुंबद की शक्ल में मुड़ती हुईं। दीवार में सात आले बने थे, छह ख़ाली, बस एक भरा हुआ। उस आले में एक आदमी बैठा था।
भंवर के हाथ से टॉर्च गिर पड़ी।
"जगत," उसने कहा। और उसके मुँह से कोई और शब्द नहीं निकला।
वह सचमुच जगत था। बीस साल का दुबला-पतला नौजवान, कुर्ता और पायजामा पहने, पालथी मारकर बैठा हुआ, सिर थोड़ा सा झुका हुआ, दोनों हाथ गोद में। उसके बाल भीगे हुए थे और उनसे पानी की बूँदें गालों पर होती हुईं कुर्ते पर गिर रही थीं, टप... टप... टप...। उसकी आँखें खुली थीं और छत की ओर देख रही थीं, पर उनमें कोई रोशनी नहीं थी।
"जगत!" भंवर चीख़ा। वह घुटनों पर गिरा और उसे कंधों से पकड़ लिया। "जगत! मेरे भाई! मैं आ गया! मैं आ गया हूँ!"
जगत का बदन बर्फ़ जैसा ठंडा था, और पूरी तरह गीला। भंवर उसे सीने से लगाकर रोने लगा, इतना कि उसकी साँस रुकने लगी। "पंद्रह साल... पंद्रह साल... मैंने तुझे कहाँ-कहाँ नहीं ढूँढा..."
मीरा की आँखों में आँसू थे। कबीर ने चुपचाप सिर घुमा लिया। हकीम साहब सीढ़ियों के पास खड़े थे, किसी तरह ख़ुद को रोके हुए।
तभी जगत के होंठ हिले।
भंवर ने रोना बंद कर दिया।
"जगत?"
बहुत धीमे, बहुत कमज़ोर, जैसे कोई गहरे कुएँ की तली से बोल रहा हो, जगत की आवाज़ आई। उसकी पुतलियाँ अब भी छत पर टिकी थीं, पर उसके होंठ भाई के कान के पास झुक गए थे।
"भाई..."
"हाँ, मैं यहीं हूँ। मैं यहीं हूँ, जगत।"
"भाई... ये वो नहीं है... जिसने मुझे भेजा था..."
भंवर का चेहरा पथरा गया। "क्या? कौन?"
"वो आदमी... भाई..." जगत की आवाज़ काँप रही थी, हर शब्द बहुत मेहनत से बाहर आ रहा था। "वो तुम्हारे साथ है... तुम्हारे बहुत क़रीब... उँगली..."
मीरा की नज़र अपने आप हकीम के हाथ पर गई। हकीम साहब ने भी ख़ुद अपना दाहिना हाथ देखा।
"नहीं!" हकीम ने चिल्लाकर कहा। "नहीं, मैं नहीं हूँ! मैंने कभी जगत को..."
"चुप रहिए," भंवर ने सख़्ती से कहा। उसके हाथ जगत के कंधों पर कस गए थे। "जगत, बोलो। पूरा बोलो।"
"उँगली... और..." जगत की साँस उखड़ने लगी। उसकी आँखें पहली बार छत से हटीं और धीरे-धीरे भाई की ओर घूमीं। उनमें एक अजीब सा सुकून था, जैसे बहुत लंबे इंतज़ार के बाद किसी ने उसे नींद की इजाज़त दे दी हो। “...परछाईं, भाई... देखो उसकी परछाईं... वो देर से चलती है...”
और फिर जगत का बदन ढीला पड़ गया।
उसकी आँखें बंद हो गईं। चेहरे पर एक हल्की शांति उतर आई। उसकी त्वचा धीरे-धीरे सूखने लगी, बाल धुँधले पड़ने लगे, कपड़े रेत की तरह भुरभुरे होकर झड़ने लगे। कुछ ही पलों में भंवर की बाँहों में रेत का एक ढेर बचा था, जिस पर एक छोटी, भीगी हुई टोपी रखी थी, बिल्कुल वैसी जैसी भंवर के पास थी, पर सूखी।
भंवर ने रेत को अपनी मुट्ठी में भर लिया और उसे सीने से लगाकर, घुटनों के बल, बच्चे की तरह रोने लगा। उसकी आवाज़ कक्ष की दीवारों से टकराकर गूँजती रही।
और उसी पल, मीरा को अपने पीछे कुछ महसूस हुआ।
एक नज़र। कोई उसे देख रहा था।
उसने धीरे-धीरे सिर घुमाया। सीढ़ियों की तरफ़ से सूरज की आख़िरी रोशनी कक्ष में आ रही थी, एक लंबी, पीली लकीर की शक्ल में। उस रोशनी में चारों की परछाइयाँ दीवार पर पड़ रही थीं, लंबी और सीधी। हकीम की, भंवर की, उसकी अपनी।
और कबीर की।
कबीर सीढ़ी के पास खड़ा था, एक हाथ दीवार पर टिकाए। वह जगत की रेत को देख रहा था, उसकी आँखें नम थीं। बाईं ओर की दीवार पर उसकी परछाईं पड़ रही थी।
मीरा ने देखा कि जब कबीर ने सिर उठाया, तो उसकी परछाईं का सिर आधे पल बाद उठा।
जब कबीर ने हाथ दीवार से हटाया, तो परछाईं का हाथ एक पल और टिका रहा।
और फिर, बहुत धीरे, बहुत सहजता से, परछाईं के होंठ हिले। कबीर के होंठ तब भी बंद थे। परछाईं मुस्कुरा रही थी, एक चौड़ी, चीरती हुई मुस्कान, जबड़े के किनारों तक, बिल्कुल वही जो उस रात पानी की बोतल में दिखी थी।
"कबीर," मीरा ने फुसफुसाया।
कबीर ने मुड़कर उसकी ओर देखा। "क्या हुआ, दी?"
भंवर भी सिर उठाकर रेत से देखने लगा था। उसकी नज़र पहले कबीर के चेहरे पर गई, फिर दीवार की परछाईं पर, और उसके सारे शरीर में एक सिहरन दौड़ गई।
हकीम साहब ने अपना दाहिना हाथ अपनी पीठ के पीछे छुपा लिया था, पर उनकी नज़र भी दीवार की ओर थी।
तभी सातवें आले के ऊपर, जहाँ जगत बैठा था, गुंबद की ऊँचाई से एक धीमी, मीठी, थकी हुई आवाज़ गूँजी। हँसी नहीं, बस एक हल्की सी साँस, जैसे कोई बहुत पुराना दोस्त किसी पुराने मज़ाक पर मुस्कुरा रहा हो।
"मैंने तुमसे कहा था, बेटी। मैं झूठ नहीं बोलता।"
कक्ष की हवा थम गई।
"मैंने कभी नहीं कहा कि वह आदमी रुस्तम नहीं है।"
"और मैंने कभी नहीं कहा कि वह सिर्फ़ एक है।"
- Writer
- firoj saifi
- Story
- रेत का क़ैदी
- Chapter
- 8 of 30
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 14 min
- Words
- 2648
- Language
- Hindi (हिंदी)
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