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एपिसोड 9: उँगली और परछाईं

firoj saifi · Jinn & Spirits · 17 मिनट

गुंबद से आई आवाज़ धीरे-धीरे पत्थर की दीवारों में घुलकर मिट गई, पर उसके पीछे जो चुप्पी छूटी, वह किसी भी आवाज़ से भारी थी।

भंवर सिंह रेत को बाँहों में लिए बैठा था। कुछ पल पहले तक वह रेत उसका भाई थी। उसने बहुत धीरे से, जैसे किसी सोते बच्चे को सँभाल रहा हो, अपना गमछा खोला और रेत को उसमें समेटना शुरू किया। हर मुट्ठी के बाद वह रुकता, उसे सूँघता, फिर गमछे में रखता। भीगी टोपी सबसे आख़िर में रखी। उसने गमछे की चारों गाँठें कसीं और पोटली को कमीज़ के भीतर, सीने से सटाकर बाँध लिया।

रेत सूखी थी। मीरा ने यह ग़ौर किया। पंद्रह साल जिस देह को पानी भिगोता रहा, वह जाते-जाते हल्की, गर्म और बिल्कुल सूखी रेत छोड़ गई थी, जैसे किसी ने उसे अभी-अभी धूप से उठाकर रखा हो।

फिर भंवर उठा। उसके आँसू सूख चुके थे, और जो चेहरे पर बचा था वह रोने से ज़्यादा ख़तरनाक था, एक ठंडा, ठहरा हुआ फ़ैसला।

"हाथ दिखाइए, हकीम साहब।"

हकीम सीढ़ियों के पास खड़े थे, दाहिना हाथ पीठ के पीछे छिपाए हुए। उन्होंने भंवर की आँखों में देखा और इनकार नहीं किया। धीरे-धीरे हाथ आगे लाए और टॉर्च की रोशनी में खोलकर फैला दिया। चार उँगलियाँ थीं और अँगूठा। तर्जनी की जगह हथेली की त्वचा चिकनी, सफ़ेद और पुरानी गाँठ की तरह उभरी हुई थी।

भंवर ने उन्हें कॉलर से पकड़कर दीवार से भिड़ा दिया। पत्थर से पीठ टकराने की भारी आवाज़ हुई। कबीर झपटकर आगे बढ़ा, पर मीरा ने उसकी कलाई थाम ली। "रुको।"

"बीस साल," भंवर के दाँत भिंचे हुए थे। उसकी आवाज़ दबी थी, पर हर शब्द काँप रहा था। "बीस साल की जान-पहचान। मेरी माँ की दवा आपने की। जगत के जाने के बाद ताबीज़ आपने बाँधा। जब भी मैं टूटा, आप चुपचाप मेरे पास बैठे। और आज मेरा भाई मरते-मरते कह गया कि वह उँगली वाला आदमी मेरे बहुत क़रीब है। बोलिए कि वह आप नहीं हैं। बोलिए!"

"मैं नहीं हूँ," हकीम ने कहा। उनकी आवाज़ में न घबराहट थी, न विरोध, सिर्फ़ एक थकान। "पर तुम्हें मेरी बात मानने की ज़रूरत नहीं है, भंवर। अगर इससे तुम्हारा बोझ हल्का होता है तो हाथ मत रोकना।"

"आपको मारना आसान है। इसीलिए नहीं मारूँगा।" भंवर की आँखों से आँसू फिर छलक पड़े। "मुझे जवाब चाहिए।"

मीरा दोनों के बीच आ खड़ी हुई। उसने भंवर के हाथ पर अपना हाथ रखा, इतने हल्के से कि वह चाहता तो झटक सकता था। "भंवर जी, जगत के आख़िरी शब्द आपने सुने हैं। उसने क्या कहा था? 'देखो।' उसने 'पकड़ लो' नहीं कहा। उसने कहा कि परछाईं देखो, वह देर से चलती है। वह आपको किसी का गला पकड़ने के लिए नहीं, आँखें खोलने के लिए कह गया है।" उसने साँस ली। "और जिन्न ने क्या कहा? कि वह आदमी सिर्फ़ एक नहीं है। हमारा सबसे बड़ा दुश्मन वही चाल है जो अभी चल रही है। हम आपस में उलझें, और वह दूर बैठकर देखे।"

भंवर की पकड़ ढीली पड़ गई। हकीम दीवार से सरककर नीचे बैठ गए और अपना दाहिना हाथ घुटने पर टिका लिया, जैसे कोई ऐसी चीज़ जिसे बरसों से छुपाकर रखा गया हो और अब उसे दिखाने में भी शर्म बाक़ी न रही हो।

"मुझे आज सब बताना है," उन्होंने कहा। "एक बार, पूरा, बिना कुछ बचाए।"

"मेरा जन्म पोखरण में हुआ था," हकीम ने कहना शुरू किया। "अनाथ। माँ-बाप को मैंने देखा नहीं। दस साल का था जब हज़रत शमसुद्दीन, जिन्हें मैं उस्ताद कहता हूँ, मुझे अपने साथ जैसलमेर ले आए। उन्होंने मुझे हकीमी सिखाई। नब्ज़ पढ़ना, जड़ी-बूटियाँ पहचानना, घाव सीना। और फिर वह सिखाया जो किताबों से नहीं सीखा जाता।"

उन्होंने अपनी पोटली से काली माला निकाली और उँगलियों में फिराने लगे।

"जो डायरी में नहीं लिखा, वह मैं तुम्हें बताता हूँ। जिस रात सात आमिलों ने सूनगढ़ का जिन्न बाँधा, हर एक ने अपनी तर्जनी चीरकर पानी में रक्त डाला। यह बात राजा ने लिखी है। पर उन्होंने उसके साथ एक वचन भी दिया था, जो राजा ने नहीं सुना। कि हर आमिल के सिलसिले में, हर पीढ़ी का एक शागिर्द अपनी तर्जनी इस बंधन को सौंपेगा। सात सिलसिले, सात रखवाले, हर पीढ़ी में। हम अपने आपको हाफ़िज़-ए-बंद कहते हैं। बंद के रखवाले।"

"तर्जनी ही क्यों?" कबीर ने धीमे से पूछा।

"क्योंकि वह इशारे की उँगली है," हकीम ने कहा। "वह उँगली जिससे आदमी इल्ज़ाम लगाता है, क़सम खाता है, किसी की तरफ़ इशारा करके कहता है, 'वह'। उसे देने का मतलब है कि अब तुम किसी पर उँगली नहीं उठाओगे। सिर्फ़ अपने वचन को निभाओगे।"

उन्होंने अपने हाथ के ठूँठ की ओर इशारा किया। जब मीरा ने झुककर ग़ौर से देखा तो गाँठ के ठीक ऊपर, चमड़ी के नीचे, एक छोटा-सा नीला निशान दिखा, पानी की एक बूँद का गोदना।

"मैं चालीस का था," हकीम ने कहा। "मेरे उस्ताद ने मेरा हाथ लकड़ी की तख़्ती पर रखा और एक ही वार में... मैं चीख़ा नहीं। उन्होंने कटी हुई उँगली मिट्टी के एक दीये में रखकर मुझे दी और कहा, 'इसे आज रात बहते पानी को सौंप देना।' मैंने उसे गड़सीसर झील में छोड़ दिया। फिर उस्ताद ने मुझे अपना रजिस्टर दिखाया।"

"रजिस्टर?"

"चमड़े का एक पुराना बही-खाता। उसमें सात पन्ने थे, हर पन्ना एक सिलसिले का, और हर पन्ने पर उसके रखवालों के नाम की क़तार। उनमें से पाँच सिलसिले उस वक़्त तक ख़त्म हो चुके थे, छठा बस एक बूढ़े में बचा था, जो मेरे सामने ही उसी साल चल बसा। मैं पाँचवें सिलसिले का आख़िरी रखवाला था। और सातवाँ पन्ना..." हकीम की आवाज़ धीमी हो गई। "सातवाँ पन्ना फटा हुआ था।"

मीरा की साँस रुक गई। "फटा हुआ?"

"किसी ने उसे जड़ से काट लिया था। कब, किसने, उस्ताद नहीं जानते थे। कहते थे कि जिसने फाड़ा, उसका हाथ बहुत पुराना था। मैंने मान लिया था कि सातवाँ सिलसिला भी मर चुका है। यह मेरी सबसे बड़ी भूल थी।"

कोई कुछ नहीं बोला।

"और मेरे हाथ का क़िस्सा," हकीम ने एक कड़वी, टूटी हुई मुस्कान के साथ कहा, "कि मैंने तीस साल पहले आरी से उँगली कटवा ली, वह मैंने ही फैलाया था। रखवाले का नाम किसी को नहीं बताया जाता। जिसे दुनिया जानती है कि वह बंद का रखवाला है, उसे दुनिया ढूँढ़ने आती है, और जिन्न भी।"

"यानी आपने झूठ बोला," मीरा ने धीरे से कहा। उसकी आवाज़ में कोई चीख़ नहीं थी, बस एक थकी हुई सच्चाई। "बाईस साल से, मुझसे। मेरे पिता से। भंवर जी से। कितनी बार, हकीम साहब? कितनी बार आधा सच?"

"जितनी बार मेरी ज़ुबान पर क़सम थी," हकीम ने कहा। "पर आज के बाद एक भी नहीं। मैं यह तुमसे वादा नहीं करता, क्योंकि वादा तुम्हारे ही नियमों में पाप है। बस इतना कहता हूँ कि आज के बाद अगर मैं झूठ बोलूँ तो तुम मुझे वहीं छोड़ देना जहाँ मैं खड़ा हूँ।"

मीरा कुछ देर चुप रही। फिर उसने गुंबदवाले कक्ष में चारों ओर देखा, जगत की ख़ाली जगह, छह ख़ाली आले, भंवर के हाथ में दबी पोटली, कबीर का पीला पड़ा चेहरा। उसे लगा कि वह इस पूरी लड़ाई के बीच कहीं अपने साथियों को खो रही है, और उन्हें बचाने का एक ही तरीक़ा था।

"मेरा एक नियम है," उसने कहा। "आज रात से पहले, हम चारों, एक-एक कर के अपनी हर वह बात कहेंगे जो अब तक छुपाई है। कोई बहाना नहीं। जो जिन्न हमारे भीतर से खींच लेगा, वह हमें ख़ुद बता देना बेहतर है।"

भंवर सबसे पहले बोला। वह पत्थर की दीवार से पीठ टिकाकर बैठ गया और बहुत देर तक अपने हाथों को देखता रहा।

"तीन महीने पहले," उसने कहा, "जैसलमेर में मुझे एक आदमी मिला। मुँह पर गमछा बँधा था, आँखों पर काला चश्मा। उसने मुझे सौ-सौ के नोटों की एक गड्डी दी और कहा कि एक मैडम आएँगी, राठौड़, जयपुर से। उन्हें सूनगढ़ ज़रूर ले जाना। और कहा कि मैडम के साथ बूढ़े हकीम रुस्तम को भी लेकर जाना। 'वह ख़ुद चलने की हिम्मत नहीं करेगा, तुम बुलाना।'"

हकीम की आँखें सिकुड़ गईं।

"मैंने पैसे ले लिए," भंवर ने कड़वाहट से कहा। "जगत को भी किसी ने ऐसे ही पैसे दिए थे। यह बात मुझे पता थी, फिर भी मैंने ले लिए। मैं चाहता था कि वह आदमी लौटे, ताकि मैं उसका चेहरा देख सकूँ। इसीलिए मैं मैडम को रास्ते भर वापस लौटने को कहता रहा, कि वे ख़ुद मना कर दें और क़र्ज़ मेरे सिर पर न रहे। मैं सबसे बुरा आदमी हूँ।"

"नहीं," मीरा ने कहा। "आप वह आदमी हैं जिसने हमें बार-बार रोका। उस आदमी का चेहरा याद है?"

"दस्ताने पहने था, मैडम। चमड़े के। दाहिने हाथ में भी।"

कबीर ने सिर झुका लिया। जब उसकी बारी आई तो उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी।

"मैंने पहली रात बोतल से पूछा था।"

सबकी नज़रें उस पर टिक गईं।

"जब मेरा चेहरा बोतल में मुस्कुरा रहा था," कबीर ने कहा, "तो मैंने मन ही मन नहीं, ज़ोर से, उससे पूछा था, 'तुम कौन हो?' और जवाब आया।" उसने निगला। "उसने कहा, 'तुम।' हकीम साहब ने कहा था कि किसी को जवाब मत देना, और मैंने पूछा भी और सुना भी। उस रात के बाद से मुझे हर घंटे प्यास लगती है, दी। जितना पीता हूँ, उतनी ज़्यादा।"

मीरा का दिल बैठ गया। हकीम ने आँखें बंद कर लीं।

"और तुम, बेटी?" हकीम ने पूछा।

मीरा ने जेब से एक छोटा-सा तह किया हुआ काग़ज़ निकाला, बहुत मुड़ा-तुड़ा, किनारे घिसे हुए। "तीन महीने पहले यूनिवर्सिटी के मेरे पते पर एक भूरा लिफ़ाफ़ा आया। उसमें एक काली-सफ़ेद तस्वीर थी, सूनगढ़ का फाटक, और उसके पास पापा खड़े थे। तारीख़ सन् दो हज़ार चार की थी। पीछे देवनागरी में एक पंक्ति लिखी थी: 'आठवीं, द्वार तुम्हारी प्रतीक्षा में है।'" उसने कसकर मुट्ठी बाँधी। "मैंने सोचा कि किसी सहकर्मी का भद्दा मज़ाक है। पर मैंने उसे फेंका नहीं। उसी हफ़्ते सूनगढ़ के सर्वे का परमिट बिना किसी देरी के आ गया, जबकि बाक़ी परमिट महीनों लटकते हैं। मैंने सब कुछ समझते हुए भी तुम सबको बताया नहीं। कबीर को भी नहीं। क्योंकि मैं चाहती थी कि मुझे जाने से कोई न रोके। मैं पापा तक पहुँचना चाहती थी, चाहे जैसे भी।"

कबीर ने उसका हाथ दबाया, और बहन-भाई के बीच वह पुराना, चुप समझौता लौट आया।

हकीम ने धीरे से कहा, "तो हम चारों को बुलाया गया। तुम्हें लिफ़ाफ़े से, क्योंकि तुम द्वार की आठवीं हो। भंवर को पैसे और शोक से, ताकि वह रास्ता दिखाए। मुझे भंवर के हाथों, क्योंकि पाँचवाँ रखवाला आख़िरी है। और कबीर..."

"मैं मीरा के साथ आया था," कबीर ने कहा।

"और तुम्हारी आँखें तुम्हारे पिता की हैं," हकीम ने कहा। "विक्रम ने ऐसा ही लिखा था। यह तुम्हारे बारे में कुछ कहता है, जो मुझे अब तक समझ नहीं आया।"

जिसने भी उन चारों को बुलाया था, उसने हर एक की कमज़ोरी पहचानकर बुलाया था। मीरा को लगा कि वह एक ऐसी शतरंज की बिसात पर खड़ी है जिसकी चालें किसी ने सदियों पहले चल दी थीं।

जाने से पहले हकीम ने कक्ष की टॉर्च से दीवारों की जाँच की। सातों आलों के पीछे की दीवार चूने की थी, और हर आले की पिछली दीवार पर किसी ने बाएँ-दाएँ हाथ का साँचा बनाया था, हथेली का निशान गीले चूने में दबाकर सुखाया हुआ।

छहों निशानों में चार उँगलियाँ और अँगूठा थे। तर्जनी की जगह चूने में बस एक सपाट खाली खाँचा।

"ये पाँच रखवालों के नहीं, छह आमिलों के हाथ हैं," हकीम ने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी, जैसे किसी इबादतगाह में बोल रहे हों। "हर आमिल ने बैठने से पहले अपने हाथ का निशान यहाँ छोड़ा था। और तर्जनी की जगह ख़ाली है, क्योंकि उसका रक्त पहले ही पानी में जा चुका था।"

मीरा ने सातवें आले की ओर टॉर्च घुमाई, जहाँ जगत बैठा था। उस आले की दीवार पर कोई निशान नहीं था। बस चूने पर एक गहरी, खुरची हुई लकीर थी, जैसे किसी ने नाख़ूनों से या किसी तेज़ चीज़ से जानबूझकर निशान मिटा दिया हो। और चौखट के ऊपर पत्थर में खुदा एक वाक्य था, इतना पुराना कि हकीम ने उसे उँगलियों से टटोलकर पढ़ा।

“छह बैठे, एक रुका। जो रुका, वही द्वार है।”

कमरे में सबको एक साथ सिहरन हुई।

"राजा की डायरी में लिखा था कि सातवाँ आमिल, मौलाना ख़लील, भाग गया," कबीर ने कहा।

"राजा ने वही लिखा जो उसने देखा," हकीम बोले। "उसने ख़ाली चटाई देखी। पर देखो, यह सातवाँ आसन मरे हुए का नहीं है। 'जो रुका' का है। जो पीछे रह जाए, जो कभी उठे ही नहीं। जो छह के जाने के बाद भी रुका रहे, ताकि द्वार पर कोई पहरा देता रहे।" उन्होंने गुंबद की ओर देखा। "ख़लील भागा नहीं, मीरा। उसे रुकना था। और जिसे रुकना था, उसने आज तक रुककर देखा।"

"तीन सौ साल?" मीरा ने पूछा।

"जो द्वार बन जाए, उसकी उम्र कोई नहीं गिनता।"

जब वे सातवीं क़ब्र की सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर पहुँचे तो आँगन पर सूरज की आख़िरी सुनहरी रोशनी पड़ रही थी। पश्चिम का आसमान तपे हुए ताँबे जैसा था, और किले की प्राचीर की परछाईं आधे आँगन पर लंबी लेटी हुई थी।

हकीम ने चारों को पश्चिमी दीवार के सामने क़तार में खड़ा किया। "सूरज रहते देख लो," उन्होंने कहा। "फिर बहुत देर तक रोशनी नहीं मिलेगी।"

सबकी परछाइयाँ रेत की तरह पूर्व की ओर पसरी थीं। भंवर की भारी और ठहरी। मीरा की पतली, हवा में हल्के हिलते दुपट्टे के साथ। हकीम की सीधी और लंबी, और जब उन्होंने हाथ उठाया तो मीरा की साँस थम गई।

दीवार पर पड़ती परछाईं के हाथ में पाँच उँगलियाँ थीं।

"जो दिया जाता है, वह परछाईं में रह जाता है," हकीम ने बिना मुड़े कहा, जैसे उन्हें मीरा की नज़र का पता चल गया हो। "यह मेरे वचन की निशानी है, बेटी। मेरी उँगली पानी ने ली, पर उसकी याद मुझसे नहीं छूटी।"

फिर सबकी नज़र कबीर पर गई।

कबीर बीच में खड़ा था, और उसकी परछाईं उसके पैरों से निकलकर दीवार पर पसरी थी। पर जब उसने बाँह उठाई तो परछाईं का हाथ आधी साँस बाद उठा। जब उसने हाथ नीचे किया तो परछाईं का हाथ कुछ पल और ऊपर रहा, उँगलियाँ हल्के-हल्के हिलती हुईं, जैसे वे हवा को टटोल रही हों। कबीर ने सिर हिलाया, और परछाईं का सिर हिलने से पहले, एक पल के लिए, बहुत धीरे, सीधा बावड़ी की ओर घूम गया।

"दी..." कबीर की आवाज़ बैठ गई। "यह क्या कर रही है?"

मीरा ने आगे बढ़कर अपनी हथेली दीवार पर उसकी परछाईं के कंधे पर रखी। वहाँ रोशनी और पत्थर के सिवा कुछ नहीं होना चाहिए था। पर उसकी उँगलियों के नीचे ठंडक थी। नमी जैसी, किसी भीगे कपड़े जैसी।

उसने हाथ झटककर हटा लिया।

"हकीम साहब!"

हकीम ने तुरंत लाल धागा निकाला और कबीर के बाएँ टखने पर तीन बार लपेटा, हर फेरे के साथ कुछ पढ़ते हुए। "इसे बाँधना पड़ेगा। वरना रात तक यह तुमसे पूरी तरह अलग हो जाएगी।"

सूरज क्षितिज के नीचे जा चुका था। आँगन में अँधेरा रेंगता हुआ उतर आया, और जैसा हर सूर्यास्त पर होता है, परछाइयाँ अपने मालिकों के पैरों में सिमटकर धरती में समा गईं। भंवर की। हकीम की। मीरा की।

पर कबीर की नहीं।

अँधेरा घिर चुका था। उसके पैरों के पास की ज़मीन पर कोई रोशनी नहीं थी, फिर भी उसकी परछाईं वहाँ उतनी ही साफ़, उतनी ही गहरी पड़ी थी, जैसे दिन में। बल्कि आसपास के अँधेरे से भी ज़्यादा काली।

उस रात उन्होंने शाही कक्ष में डेरा डाला। हकीम ने दरवाज़े पर नमक की तिहरी लकीर खींची, और चाँदी की कीलें गाड़कर चौखट बाँधी। भंवर ने पहरा संभाला, पीठ दरवाज़े से टिकाए, सीने की पोटली पर एक हाथ रखे। कबीर और मीरा कक्ष के भीतरी कोने में बिछी दरी पर बैठे थे, बीच में लालटेन की मद्धम लौ।

कबीर की प्यास अब छुप नहीं रही थी। उसके होंठ फट चुके थे और उनके कोनों में ख़ून की महीन लकीरें थीं। मीरा ने पानी की कैन से नमक वाला घूँट उसके कुल्हड़ में डाला। कबीर ने आधा कुल्हड़ एक साँस में पी लिया, फिर रुका, जैसे उसे अपनी ही प्यास पर शर्म आ रही हो।

"दी, तुम्हें याद है, मैं तैरना क्यों नहीं सीख पाया?" उसने अचानक पूछा।

मीरा ने चौंककर उसकी ओर देखा। "क्या?"

"माँ मुझे कभी तालाब या नहर के पास नहीं जाने देती थीं। स्कूल पिकनिक पर स्विमिंग पूल में भी नहीं। मैंने कितनी बार ज़िद की, और हर बार वे बस इतना कहती थीं कि पानी मुझे अच्छा नहीं लगेगा।" कबीर ने हल्की सी हँसी हँसी, जिसमें कुछ भी हल्का नहीं था। "मुझे हमेशा लगता था कि माँ को डर था कि मैं डूब जाऊँगा।"

मीरा चुप रही। उसकी आँखों में बचपन की एक तस्वीर कौंधी, जिसे वह बरसों से भुलाए बैठी थी।

"पाँच साल का था तू," उसने धीमे से कहा। "पापा को गए कुछ महीने हुए थे। एक रात मैं पानी पीने उठी तो आँगन का दरवाज़ा खुला था। तू पानी की टंकी के पास खड़ा था, अकेला, पजामे में। चाँदनी थी। तू टंकी में झाँककर किसी से बात कर रहा था। मैं डर गई। मैंने माँ को जगाया।"

कबीर की साँस थम गई। "मुझे याद नहीं।"

"माँ ने तुझे गोद में उठाया और कुछ नहीं कहा। फिर मेरी तरफ़ मुड़ीं और बोलीं, 'मीरा, यह बात किसी को मत बताना। कबीर को भी नहीं।' मैं चौदह साल की थी। मैंने उनकी बात मान ली, और फिर भूल गई।" मीरा का गला भर आया। "मैंने इतने साल यह सोचा तक नहीं कि वे क्यों डर रही थीं। माँ जानती थीं, कबीर। उन्हें पापा से पता चला होगा, किसी ख़त से, किसी फ़ोन से। उन्हें शायद पहले से सब मालूम था।"

कबीर कुछ देर सिर झुकाए बैठा रहा। फिर बहुत धीरे से उसने कहा, "तो पापा ने जो लिखा, 'उसकी आँखों में मेरी आँखें हैं।' वह मेरी आँखों की बात नहीं थी, दी। वह इस बात की थी कि मैं भी उसी रास्ते पर हूँ।"

मीरा ने भाई को अपनी बाँहों में खींच लिया। उसके कंधों की हड्डियाँ किसी बच्चे जैसी लग रही थीं। "मैं तुझे कुछ नहीं होने दूँगी। सुना? मैंने पापा को खोया, माँ को खोया। तुझे नहीं खोऊँगी।"

कबीर ने उसके कंधे में चेहरा छुपा लिया। कुछ देर तक कक्ष में सिर्फ़ लालटेन की लौ की चटख सुनाई देती रही।

फिर उसने मीरा के कान में बहुत धीमे, एक फटी हुई, सूखी आवाज़ में कहा।

"दी... पानी।"

"हाँ, लो," मीरा ने कैन उठाई। "नमक डालकर..."

"नहीं," कबीर ने कहा। उसकी आवाज़ किसी और की हो गई थी, एक गहरी, मधुर, थकी हुई आवाज़ की परत उसकी अपनी आवाज़ के नीचे चली आई थी। "पूरी कैन, दी। मुझे बहुत प्यास लगी है। बस एक बार जी भरकर पीने दो।"

मीरा के हाथ रुक गए।

पिता की चिट्ठी के शब्द उसके कानों में गूँजे: जो आदमी अपनी परछाईं के बिना आए, उसे पानी मत देना।

उसने कबीर की ओर देखा। वह दरी पर बैठा था, लालटेन की लौ उसके चेहरे पर पड़ रही थी। पर उसके पीछे की दीवार पर, जहाँ उसकी परछाईं होनी चाहिए थी, कुछ नहीं था। सिर्फ़ खुरदरा, पीला पत्थर।

मीरा ने धीरे-धीरे नज़र कमरे में घुमाई।

परछाईं कोने में खड़ी थी।

वह दीवार पर चिपकी हुई नहीं थी। वह फ़र्श से उठकर, खड़ी, अपने पैरों पर सीधी, छत को छूती हुई। एक चपटी, काली, बिना किसी चेहरे की आकृति, जिसके सिर का आकार कबीर के सिर जैसा था और जिसके कंधे बिल्कुल पिता जैसे चौड़े थे। उसका एक हाथ आगे बढ़ा हुआ था, हथेली ऊपर की ओर, उँगलियाँ मुड़ी हुईं, जैसे कोई प्यासा पानी की भीख माँग रहा हो।

लालटेन की लौ अचानक झुक गई।

कबीर के होंठों से वही दोहरी आवाज़ फिर निकली, अब पूरी तरह दो हिस्सों में बँटी हुई: एक उसकी अपनी, काँपती हुई, और दूसरी उसके ठीक ऊपर कहीं से, मधुर और गहरी।

"दी... पानी..."

Writer
firoj saifi
Story
रेत का क़ैदी
Chapter
9 of 30
Category
Jinn & Spirits
Reading time
17 min
Words
3208
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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