Pretika › Jinn & Spirits › रेत का क़ैदी
एपिसोड 10: प्यास
firoj saifi · Jinn & Spirits · 13 मिनट
मीरा ने कैन उठाई थी। उसके हाथ में थी, भरी हुई, मुँह खुला हुआ।
उसने कबीर की आँखों में देखा। वे आँखें उसकी थीं, गहरी भूरी, पापा जैसी, पर उनके पीछे कुछ और भी बैठा था, कुछ जो पलक झपकने के साथ आगे-पीछे होता था जैसे दो चेहरे एक ही खिड़की के पीछे से झाँक रहे हों।
"नहीं," उसने कहा।
यह शब्द उसके मुँह से किसी और की आवाज़ में निकला, एक ऐसी आवाज़ जो उसे ख़ुद अपनी नहीं लगी, इतनी सख़्त और इतनी टूटी हुई। उसने कैन को सीने से चिपका लिया।
कबीर की आँखें फैल गईं। "दी?"
"मैं नहीं दे सकती, कबीर।" उसके गाल गीले हो चुके थे और वह इसे रोक नहीं पा रही थी। "पापा ने लिखा था। जो आदमी अपनी परछाईं के बिना आए, उसे पानी मत देना। यह तू नहीं है। तू मेरा भाई है, तू बस भीतर से फँसा हुआ है। पर जो बोल रहा है, वह तू नहीं है।"
"दी, मुझे बस एक घूँट..." कबीर का गला किसी सूखी लकड़ी की तरह चरमराया। उसके दोनों हाथ आगे बढ़े, बच्चे की तरह, कैन की ओर। "मेरे गले में रेत भरी है। मैं मर जाऊँगा।"
"तू नहीं मरेगा।" मीरा ने रोते हुए सिर हिलाया। "मैं तुझे मरने नहीं दूँगी।"
तभी कोने में खड़ी परछाईं ने हरकत की।
वह दीवार पर सरकती हुई मीरा की ओर नहीं बढ़ी। वह सीधी कैन की ओर बढ़ी, और मीरा की बाँहों में दबी कैन ज़ोर से काँपने लगी। उसका ढक्कन ख़ुद-ब-ख़ुद खुल गया, और भीतर का पानी ऊपर की ओर उठा, एक पतली, गाढ़ी धार की तरह, कैन के मुँह से निकलकर हवा में तनी हुई सीधी, परछाईं की ओर।
परछाईं ने अपना चपटा सिर झुकाया और पानी की धार उसके चेहरे की जगह में समा गई।
कक्ष में एक भीगी हुई, ख़ौफ़नाक आवाज़ गूँजी। गटकने की। गट... गट... गट... इतनी लंबी, इतनी लालची कि मीरा के कान सुन्न हो गए।
और उसी लय में कबीर का गला हिलने लगा।
उसने मुँह खोल रखा था, और उसके गले की नसें उभरकर हर घूँट के साथ ऊपर-नीचे हो रही थीं, जैसे वह पानी पी रहा हो। पर उसके होंठों के बीच सिर्फ़ ख़ालीपन था। उसकी आँखें ऊपर चढ़ गई थीं, सफ़ेदी भर, और उसके फटे होंठों से ख़ून बहता हुआ ठोड़ी तक आ गया था। वह बिना पानी के निगल रहा था, और हर घूँट के साथ वह और सूखता जा रहा था।
"भंवर!" मीरा चिल्लाई। "हकीम साहब!"
दोनों उसकी आवाज़ से पहले ही दौड़ चुके थे। हकीम ने नमक की मुट्ठी परछाईं पर फेंकी। परछाईं ने सिर घुमाया और नमक किसी दीवार से टकराकर गिर गया। कैन की धार नहीं टूटी। मीरा के हाथों में कैन अब इतनी हल्की हो चुकी थी कि वह उसे उछल जाने के डर से पकड़े हुए थी।
"दी... बहुत प्यास है... दी..."
परछाईं के मुँह के पास, जहाँ पानी समा रहा था, एक छोटी सी आवाज़ हुई। एक तृप्त, गहरी साँस। फिर कैन का पानी ख़त्म हो गया, और परछाईं ने धीरे से सिर उठाया, जैसे कोई जी भरकर पी चुका आदमी।
लेकिन कबीर का निगलना बंद नहीं हुआ।
"वह उसे सुखा रही है!" हकीम ने चिल्लाकर कहा। "उसका गला परछाईं के गले से जुड़ गया है! भंवर! रेत! अभी!"
भंवर ने एक पल को हकीम की ओर देखा। उसके हाथ ने अपने आप कमीज़ के भीतर की पोटली को भींच लिया।
"इसके अलावा कोई रास्ता नहीं?" उसकी आवाज़ टूट गई थी।
"जो पंद्रह साल पानी में रहकर भी सूखा निकला, उसकी रेत को वह छू नहीं सकती," हकीम ने कहा। "पर सब मत लगाना, भंवर। चुटकी भर काफ़ी है। बाक़ी तुम्हारे पास रहेगी।"
भंवर की आँखों में एक पल को पूरा पंद्रह साल का दर्द उतर आया। उसने गमछे की गाँठ खोली, बहुत धीरे, जैसे कोई क़ब्र खोल रहा हो। फिर उसने अपनी उँगलियों से चुटकी भर रेत उठाई, भाई की रेत, गरम और सूखी, और कबीर के चारों ओर दरी पर एक पतली, गोल लकीर खींचने लगा।
"जगत," उसने बुदबुदाया, "मेरे छोटे भाई, मेरी मदद करना।"
जैसे ही गोल लकीर पूरी हुई, कक्ष में एक सन्नाटे जैसी हवा चली।
परछाईं ने एक ऐसी चीख़ मारी जिसमें कोई आवाज़ नहीं थी, सिर्फ़ दबाव। मीरा के कानों में सीटी बजने लगी। परछाईं की आकृति दीवार पर लहराई, ऊपर उठने की कोशिश करती हुई, पर रेत की लकीर से जैसे कोई अदृश्य डोर उसे नीचे खींच रही थी। वह फ़र्श पर गिरी, छटपटाई, सिकुड़ती चली गई, और आख़िरकार कबीर के पैरों के नीचे, दरी पर, पूरी तरह चपटी होकर सो गई, एक काले धब्बे की तरह।
कबीर का गला ढीला पड़ गया। वह मीरा की गोद में लुढ़क गया, साँस भारी और तेज़।
उसके बाद एक घंटा किसी ने कुछ नहीं कहा।
कबीर को कंबल में लपेटकर सुला दिया गया था। हकीम ने नमक के पानी की कुछ बूँदें उसके होंठों पर रखीं। वह नींद में उन्हें चाट गया, हर बूँद के साथ उसके चेहरे का तनाव ढीला पड़ता गया। कैन ख़ाली थी। दूसरी कैन में आधे से कम पानी बचा था, और वह किसी का भी नहीं था, सबका था।
मीरा ने कबीर का सिर अपनी गोद में रखा था, उँगलियों से उसके बाल सहलाती हुई। उसे अब भी अपने कानों में गटकने की वह आवाज़ सुनाई दे रही थी।
भंवर दरवाज़े के पास चला गया था। उसने गमछे की पोटली फिर से कस ली थी, और अब वह उसे दोनों हाथों में थामे बैठा था, जैसे किसी नवजात को। बहुत देर बाद हकीम उसके पास जाकर बैठे। दोनों ने कुछ नहीं कहा। फिर भंवर ने बिना मुड़े कहा, "आपने मुझे माफ़ नहीं किया न, हकीम साहब? कि मैंने आपका गला पकड़ा था।"
"माफ़ करने जैसा कुछ हुआ ही नहीं," हकीम ने कहा। "तुमने वही किया जो मैं तुम्हारी जगह करता। जो हमारा भाई मरा हो, उसके लिए हम किसी का भी गला पकड़ लेते हैं।"
"आपका भाई नहीं था कोई?"
हकीम की आवाज़ बहुत नीचे उतर आई। "मेरी बेटी थी। ज़ैनब।"
भंवर ने सिर घुमाकर उन्हें देखा। हकीम सामने की दीवार पर टिमटिमाती लालटेन की लौ को देख रहे थे, पर उनकी आँखें उसे नहीं देख रही थीं।
"तीन साल की थी। चालीस साल पहले की बात है। मैं तब तक नया-नया हकीम बना था और पूरे जैसलमेर का इलाज करता था। एक रात ज़ैनब को बुख़ार चढ़ा, और वह सब दवाएँ जो दूसरों को ठीक करती थीं, उसे नहीं लगीं। तीन दिन उसका बदन आग की तरह जलता रहा। मैंने हर जड़ी आज़माई, हर नुस्ख़ा। तीसरी रात उसने मुझसे सिर्फ़ एक बात कही।" हकीम की आवाज़ टूट गई। “'अब्बा, पानी।' मैंने उसे पानी दिया, पर वह निगल नहीं पाई। उसका गला बंद हो चुका था। उसने मेरी तरफ़ देखा, बहुत प्यासी आँखों से, और फिर कभी कुछ नहीं माँगा।”
भंवर ने हकीम का कंधा थाम लिया।
"उस रात के बाद मैं किसी की प्यास नहीं देख पाता, भंवर। जब मैंने कबीर को वैसे सूखते देखा तो मेरे हाथ-पैर सुन्न पड़ गए। मैं एक हकीम हूँ, और मैं उस वक़्त सिर्फ़ एक बाप था जो अपने बच्चे को पानी नहीं दे पाया।" उन्होंने धीरे से सिर झुका लिया। "यह मेरी असली कमज़ोरी है। और जिन्न यह जानता है। इसीलिए उसने यह रास्ता चुना है।"
भंवर ने कुछ नहीं कहा। उसने अपना हाथ हकीम के कंधे पर रहने दिया। दो ऐसे आदमी, जिन्होंने अपने-अपने छोटों को खोया था, दरवाज़े पर पास-पास बैठे रहे, उस रात की सबसे लंबी ख़ामोशी में।
रात के तीन बजे दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी।
टक... टक... टक...
बहुत हल्की, बहुत नर्म, जैसे कोई बच्चा हथेली के किनारे से खटखटाए, डर के साथ कि कहीं बड़ों को जगा न दे।
सबके सिर एक साथ उठे। कबीर नींद में कसमसाया। हकीम ने उँगली होंठों पर रखकर चुप रहने का इशारा किया। भंवर ने उठकर दरवाज़े के पास पीठ टिका ली।
टक... टक...
"दीदी?" बाहर से आवाज़ आई। एक छोटे लड़के की, तेरह-चौदह बरस के, साफ़ और मीठी। "दीदी, दरवाज़ा खोलिए। मैं पानी लाया हूँ।"
मीरा ने साँस रोक ली।
"भाई साहब ने कहा था कि अंदर एक बीमार है। मैं उसके लिए ठंडा पानी लाया हूँ। बहुत ठंडा।"
हकीम ने तेज़ी से सिर हिलाया, नहीं। मीरा की आँखों में पिता की चिट्ठी की पंक्ति जल उठी: जो आदमी तेरे पास पानी लेकर आए, चाहे वह तेरा सबसे प्यारा क्यों न हो, उसका पानी मत पीना।
पर आवाज़ में कुछ ऐसा था जो उसे ठिठका गया। बच्चे की आवाज़ में कोई चालाकी नहीं थी। सिर्फ़ उम्मीद थी, और डर, वही डर जो किसी बच्चे को तब होता है जब उसे लगता है कि अब उसे अंदर नहीं बुलाया जाएगा।
वह उठी। हकीम ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की, पर उसने हल्के से उनकी पकड़ से हाथ निकाल लिया। "मैं दरवाज़ा नहीं खोलूँगी," उसने फुसफुसाया। "सिर्फ़ देखूँगी।"
दरवाज़े की ऊपरी दरार, जहाँ कभी जालीदार लकड़ी लगी रही होगी, अब एक संकरी खिड़की जैसी थी। मीरा उस पर पंजों के बल खड़ी हुई और बाहर झाँकी।
आँगन में चाँदनी थी। पूनम से ठीक पहले की, दूधिया, लगभग पूरी। और चौखट के बाहर, नमक की लकीर से कुछ हाथ दूर, एक बच्चा खड़ा था।
वह तेरह साल का था, शायद। दुबला, गोरा, चेहरा किसी राजकुमार जैसा सुंदर। उसने पुराने ज़माने की राजस्थानी पोशाक पहनी थी, चूड़ीदार पायजामा और ज़री की किनारी वाला अंगरखा, पर सब कुछ पानी से भीगा हुआ, कपड़े उसकी देह से चिपके हुए। उसके बालों से पानी की बूँदें गालों पर होती हुई ठोड़ी से टपक रही थीं। उसके नंगे पैरों के नीचे ज़मीन पर पानी का एक छोटा-सा तालाब बन चुका था।
उसके हाथ में मिट्टी का एक छोटा घड़ा था, जिसमें से ठंडी भाप उठ रही थी।
उसकी आँखों में, बहुत गहरे में, एक पल के लिए लाल अंगारे की चमक कौंधी, और फिर चली गई।
"आप डरिए मत, दीदी," बच्चे ने कहा। वह सीधा मीरा की तरफ़ देख रहा था, जैसे उसे पता हो कि वह वहाँ है। "मैं सच में आपके भाई के लिए लाया हूँ। मुझे पता है प्यास क्या होती है।"
"तुम कौन हो?" मीरा ने धीरे से पूछा। उसे ख़ुद नहीं पता चला कि उसने नियम तोड़ दिया।
लड़का मुस्कुराया, और उसकी मुस्कान में तेरह साल के बच्चे की मासूमियत थी, जिसके नीचे तीन सौ साल की थकान दबी थी। "आपके पुरखे का बेटा, दीदी। विजयसिंह।" उसने थोड़ा झिझककर कहा। "मुझे सब भूल गए। किसी ने मेरा नाम तीन सौ साल से नहीं पुकारा।"
मीरा की आँखें भर आईं। वह जानती थी कि यह जाल हो सकता है। पर वह यह भी जानती थी कि अगर यह जाल था तो वह इतना सच्चा था कि उसकी बनावट ही उसकी सबसे बड़ी सच्चाई थी।
"विजय," उसने पुकारा।
लड़के के चेहरे पर कुछ टूटकर बिखरा। उसने घड़ा ज़मीन पर रख दिया और दोनों हाथों से अपना मुँह ढक लिया, और उसके कंधे हिलने लगे। वह बिना आवाज़ के रो रहा था, जैसे बच्चे तब रोते हैं जब उन्हें डर होता है कि कोई सुन लेगा।
"मैं यह पानी आपको नहीं पिला सकती," मीरा ने रुँधे गले से कहा। "मुझे माफ़ कर दो।"
"मुझे पता है," विजय ने सिसकते हुए कहा। "सब यही कहते हैं। बाबा ने भी नहीं दिया था..." वह रुका और उसने सिर उठाकर बहुत धीरे, जैसे वह राज़ बता रहा हो, कहा, "दीदी, एक बात बताऊँ? शरर मुझे बुरा नहीं लगता। वह मुझे पानी पिलाता था। जब मैं बीमार पड़ा, तब भी वही मेरे पास बैठा रहा। जिसने मुझे प्यासा रखा, वह कोई और है।"
कक्ष के भीतर हकीम ने ऐसी साँस खींची जैसे किसी ने उनकी पसलियों पर चोट की हो।
"कौन?" मीरा ने फुसफुसाया।
"मुझे नहीं पता कि उसका नाम क्या है।" विजय ने इधर-उधर देखा, जैसे कोई उसकी बात सुन न ले। "वह बहुत नीचे है। शरर के भी नीचे, जहाँ पानी बहुत काला है। हर पूर्णिमा को जब बाबा सात कुओं का पानी डालते थे, मैंने देखा कि शरर वह पानी नहीं पीता था। वह बस उसे नीचे भेज देता था। नीचे कोई था जो पीता था, और जब पीता था, तो पूरा किला साँस रोक लेता था। और शरर उसकी तरफ़ पीठ करके खड़ा रहता था, ताकि वह ऊपर न आ सके।"
मीरा के भीतर कुछ ठंडा होकर जम गया।
"फिर बाबा ने शरर को बाँध दिया," विजय ने कहा, "और पानी बंद हो गया। उस दिन के बाद वह नीचे वाला कभी पूरी तरह शांत नहीं हुआ। और हरी चादर वाले आदमी ने मुझे सातवीं सीढ़ी के नीचे सुलाते हुए कहा था, 'चुप रहना, बच्चे। जब तक द्वार पर कोई बैठा न हो, तुम्हें जागना है।' मैं तब से जाग रहा हूँ, दीदी।"
"हरी चादर?" मीरा के मुँह से निकला। "उँगली..."
"उसकी एक उँगली नहीं थी।" विजय ने सिर हिलाया। "और उसकी परछाईं कभी नहीं बनती थी। चाँद के नीचे भी नहीं।"
तभी आँगन के ऊपर से चाँद एक बादल की ओट में सरका। विजय ने ऊपर देखा, और उसके चेहरे पर घबराहट दौड़ गई। "मुझे जाना होगा। चाँदनी हटते ही मुझे नीचे बुलाते हैं।" उसने घड़ा उठाया, दरवाज़े की ओर एक आख़िरी नज़र डाली, और ठिठक गया, उसकी नज़र नमक की लकीर पर जमी थी। लकीर के भीतर, चौखट के पास, एक पतली-सी रेखा सोने जैसी चमक रही थी।
"ये रेत किसकी है?" उसने पूछा।
"मेरे भाई की," भंवर की आवाज़ भीतर से आई, भारी और धीमी।
विजय ने कुछ पल उस चमकती रेखा को देखा। फिर बहुत नर्मी से कहा, "तभी तो इतनी प्यारी है। यह मुझे भी नहीं आने देती।" वह मुस्कुराया, एक पल को वह राजकुमार लगा जो कभी रहा होगा। "आपका भाई बहुत अच्छा है, काका।"
चाँद बादल में पूरी तरह छुप गया। जब वह दोबारा निकला, तब आँगन ख़ाली था, और चौखट के बाहर सिर्फ़ गीली ज़मीन पर पैरों के छोटे-छोटे निशान थे।
भंवर ने एक हाथ अपनी आँखों पर रख लिया। उसके कंधे हिल रहे थे। कक्ष में कोई कुछ नहीं बोला।
सुबह की पहली किरण रोशनदान से फूटी तो कबीर की आँखें खुलीं।
उसके होंठ अब भी फटे हुए थे, पर उन पर कोई नया ख़ून नहीं था। मीरा ने उसके माथे पर हाथ रखा। बुखार नहीं था। बस एक थकी हुई, हल्की ठंडक।
"दी?" उसने भर्राई आवाज़ में कहा। "मैंने एक सपना देखा। एक लड़का मेरा हाथ पकड़कर मुझे सीढ़ियों से नीचे ले जा रहा था। उसने कहा कि मुझे डरना नहीं चाहिए। फिर उसने मेरे कान में कुछ कहा।"
"क्या कहा?"
"कि जो पानी पहले कुएँ में है, वही सब कुछ बदलेगा।"
मीरा और हकीम ने एक-दूसरे की ओर देखा। हकीम पहले ही से उठकर बैठे थे, चेहरे पर रात भर की सलवटें और आँखों में एक नई, तेज़ बेचैनी।
"मेरे उस्ताद एक बात बार-बार कहते थे," उन्होंने धीरे से कहा, "जिसका मतलब मैं आज तक नहीं समझा था। 'सूनगढ़ का पहला कुआँ पूरब में नहीं, उत्तर में है। और वह किले से पहले का है।'"
"किले से पहले का?" मीरा ने दोहराया।
"जिस जगह पर राजा सूरजमल ने बावड़ी बनाई, वहाँ पहले कुछ और था," हकीम ने कहा। "और वह जगह नीली बावड़ी नहीं है, बेटी। बावड़ी तो उस जगह का दरवाज़ा भर है।"
कक्ष की दीवार पर सुबह की धूप की पहली लकीर पड़ी। पास पड़ी दरी पर, जहाँ रात भर कबीर की परछाईं एक काले धब्बे की तरह पड़ी रही थी, अब वह धीरे-धीरे उठ रही थी, उसके पैरों की ओर सिमटती हुई, मानो नींद से जागकर अपनी जगह ढूँढ़ रही हो।
पर इस बार, जब वह उठी, तो उसने सीधे बावड़ी की ओर देखना बंद कर दिया था। वह अब उत्तर की ओर देख रही थी।
- Writer
- firoj saifi
- Story
- रेत का क़ैदी
- Chapter
- 10 of 30
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 13 min
- Words
- 2526
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
और कहानियाँ · More stories
- उस जिन्न की आख़िरी मोहब्बत · Pretika
- जिन्न का इश्क़ · Pretika
- हमज़ाद · Pretika
- मुझे आवाज़ किसने दी? · firoj saifi