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एपिसोड 11: उत्तर का कुआँ

firoj saifi · Jinn & Spirits · 18 मिनट

पानी की आख़िरी कैन में बस चार घूँट बचे थे।

मीरा ने उसे हिलाकर देखा, भीतर पानी के हल्के छलकने की आवाज़ आई, छोटी और सिकुड़ी हुई। उसने कैन भंवर को थमा दी। "यह आज दोपहर तक चलेगा। उसके बाद हमें पानी चाहिए। असली पानी, जो इस जगह से न आया हो।"

"असली पानी इस रेगिस्तान में कहीं नहीं है, मैडम," भंवर ने कहा। उसकी आवाज़ थकी हुई थी, पर रात की रुलाई के बाद उसमें एक नई, पथरीली सख़्ती आ गई थी। "सबसे नज़दीकी बस्ती यहाँ से पैंतालीस कोस है। जीप के बिना..."

"पापा की नोटबुक," मीरा ने कहा।

सबने उसकी ओर देखा।

उसने चमड़े का थैला खींचकर पास किया। सारे कैसेट, कम्पास, टॉर्च, सब हटाकर नीचे से वह छोटी, काली, मोटे पन्नों वाली नोटबुक निकाली जो बाईस साल से रेत में दबी पड़ी थी। फफूँदी की एक पतली, सफ़ेद परत उसके कवर पर थी। मीरा ने रुमाल से उसे पोंछा, और भीतर की लिखावट देखकर उसकी आँखें धुँधली हो गईं।

"मैं पहले ही पढ़ लेती," उसने धीमे से कहा, "पर मुझमें हिम्मत नहीं थी।"

"अब पढ़ो, दी," कबीर ने कहा। वह कंबल में लिपटा बैठा था, पर चेहरे पर अब जान लौट रही थी। "हमारे पास वक़्त कम है।"

मीरा ने पहला पन्ना खोला। विक्रम सिंह की लिखावट: नुकीली, साफ़, हर अक्षर पर बराबर दबाव। शुरू के पन्नों में पुरातत्व की आदत की झलक थी, तारीख़ें, मापें, पत्थरों के प्रकार, शिलालेखों की नक़लें। पर पन्ने पलटते-पलटते लिखावट बदलती गई। मापों की जगह रेखाचित्र आने लगे। और फिर एक पूरे पन्ने पर एक नक़्शा था।

किले का। उसके चारों ओर एक गोल घेरा, जैसे रेत से साफ़ वह जगह जो उन्होंने पहले दिन देखी थी। और उस घेरे के किनारे पर, सात बिंदु, हर बिंदु के पास एक संख्या और एक दिशा।

“1. उत्तर। जल: हाँ। गहराई: ~40 फुट। किले से पहले का।
2. उत्तर-पूर्व। सूखा। बंद किया।
3. पूर्व। सूखा। बंद किया।
4. दक्षिण-पूर्व। सूखा। बंद किया।
5. दक्षिण। सूखा। बंद किया।
6. दक्षिण-पश्चिम। सूखा। बंद किया।
7. पश्चिम। सूखा। बंद किया।”

हकीम ने झुककर पन्ना देखा। "छह कुएँ सूखे थे," उन्होंने कहा, "और विक्रम ने उन्हें पाट दिया? जानबूझकर?"

मीरा ने अगले पन्ने पर आँखें दौड़ाईं। कुछ पंक्तियों के नीचे अंडरलाइन थी।

"मैंने समझ लिया है कि राजा क्या कर रहा था। सात कुओं का पानी जिन्न को किराये की तरह नहीं जा रहा था। वह जिस नीचे वाले को जा रहा था, उसे यह सात कुओं से खिंचकर पहुँचता था। अगर मैं कुएँ पाट दूँ, तो पानी की लकीर टूट जाएगी, और वह भूखा रहेगा। शरर ने मुझे यह नहीं बताया, पर वह जानता है कि मैं क्या कर रहा हूँ, और उसने रोका नहीं।

एक कुआँ मैं नहीं पाट पाया। उत्तर का। वह किले से भी पुराना है। उसमें अब भी पानी है, पर पानी से मुझे डर लगता है।

कारण: वहाँ पानी नहीं है। वहाँ पानी की याद है।"

मीरा ने नोटबुक बंद करके सीने से लगा ली।

"तो पापा ने छह कुएँ पाट दिए," उसने कहा, और उसकी आँखों में हल्की सी चमक थी, गर्व और डर के बीच की। "उन्होंने उसकी जड़ पर वार करना चाहा। वह उसे भूखा रखकर कमज़ोर करना चाहते थे।"

"और शायद इसीलिए वह उनकी साँस पकड़े बैठा है," हकीम ने धीरे से कहा। "भूखे को किसी की साँस ही तसल्ली देती है।"

"फिर भी हमें उत्तर का कुआँ चाहिए," भंवर ने कहा। "वह इकलौता है जिसमें पानी बचा है।"

मीरा ने सबको बारी-बारी देखा। "यह ख़तरा है। यह नोटबुक किसी ने पापा के जाने के बाईस साल बाद भी हमारे हाथ में आने दी है। हो सकता है यह भी उसी बुलाने वाले का इंतज़ाम हो।"

"हो सकता है," हकीम ने कहा। "पर बिना पानी के हम दो दिन भी नहीं चलेंगे। और पूनम में अब सिर्फ़ दो रातें बची हैं।"

सबने अपनी-अपनी साँस रोकी। फिर मीरा ने फ़ैसला किया।

"चलेंगे। पर नियम से। सब एक रस्सी में बँधे। सूरज सिर के ऊपर आने से पहले लौटना है। और नीचे जो भी मिले, कुछ भी पीने से पहले हकीम साहब जाँच करेंगे।"

किले के फाटक से निकलकर उत्तर की ओर रेत में क़दम रखना ऐसा था जैसे किसी साफ़ कमरे से तूफ़ानी रात में उतरना।

पहले दिन उन्होंने किले के चारों ओर की उस गोल, साफ़ ज़मीन को देखकर अचरज किया था। आज उन्होंने उसका किनारा पार किया। किनारे पर, हर पचास-सौ क़दम पर, पत्थरों का एक छोटा-सा ढेर था, सात की क़तार में, किसी पुराने ज़माने में गाड़ी गई सीमा के निशान जैसे। जैसे ही वे आख़िरी ढेर के पार निकले, हवा चल पड़ी।

हल्की, गर्म, रेत और धूप से भरी, पूरी तरह साधारण रेगिस्तानी हवा। इतने घंटों की जकड़ी हुई चुप्पी के बाद वह किसी पागल करने वाली राहत की तरह लगी।

और ऊपर आसमान में एक चील चक्कर काट रही थी।

कबीर रुककर उसे देखता रहा, उसके होंठ काँपने लगे। "दी, देखो। पक्षी।"

"हाँ।" मीरा के गले में कुछ अटक गया। "बाहर की दुनिया ज़िंदा है।"

हकीम ने मुड़कर किले को देखा, जो पीछे अब एक पीली, टूटी हुई आकृति में सिमट गया था। उनकी आँखों में कुछ गहरा उभरा। "यह घेरा हमारी रक्षा के लिए नहीं बना," उन्होंने कहा। "यह उसके पिंजरे की दीवार है। जो भी इसके भीतर है, उसके लिए बाहर की हवा बंद है।"

कबीर ने अपने पैरों की ओर देखा। उसकी परछाईं, जो अब तक उसके साथ बँधी हुई-सी चल रही थी, यहाँ घेरे के बाहर पहली बार सीधी, निश्चल, उसके साथ-साथ पड़ी थी। उसने हाथ उठाया, और परछाईं का हाथ उसी पल उठा।

"कबीर?" मीरा ने पूछा।

"ठीक है," उसने धीरे से कहा। "यहाँ ठीक है।"

वे उत्तर की ओर चलते रहे। भंवर आगे था, रेत पर अपने पैरों की हर आहट पहचानता हुआ, जैसे वह कभी भटक ही न सकता हो। दो घंटे बाद, जब धूप तपकर नीचे की रेत को सफ़ेद कर चुकी थी, उसने हाथ उठाकर इशारा किया।

"वहाँ।"

कुआँ एक छोटी-सी गोल पत्थर की मुँडेर था, आधा रेत में धँसा, चार हाथ चौड़ा। उसकी मुँडेर पर बलुआ पत्थर का भारी ढक्कन रखा था, और उस पर दोनों लिपियों में वही खुदाई थी जो तख़्ती पर थी। पर यहाँ अक्षर और पुराने थे, उनके किनारे नरम हो चुके थे, और बीच-बीच में कुछ और आकृतियाँ थीं जिन्हें मीरा पहचान नहीं सकी, ब्राह्मी जैसी, पर उससे भी पहले की।

"यह राजा से बहुत पहले का है," उसने कहा, उँगलियाँ अक्षरों पर फिराती हुई। "शायद हज़ार साल। यह किला इस कुएँ के बाद बना है।"

ढक्कन एक ओर खिसका हुआ था, पूरा नहीं, इतना कि एक आदमी भीतर उतर सके। रेत में खिसकाने के निशान साफ़ थे, पर पुराने नहीं। किनारों की रेत हवा से भरी हुई थी, पर ताज़ा खरोंचों में एक पतली, भीगी हुई लकीर थी।

"किसी ने इसे हाल ही में हटाया है," भंवर ने झुककर कहा। उसने मिट्टी को सूँघा। "या फिर यह ख़ुद हटा है।"

मुँडेर के भीतर पत्थर की सीढ़ियाँ गोल घूमती हुई नीचे उतरती थीं, एक सर्पिल की शक्ल में। ऊपर से देखने पर अँधेरा ही अँधेरा था। पर उसमें से ठंडी, साफ़ हवा आ रही थी, और उसके साथ पानी की महक। असली पानी की। गीली मिट्टी, पत्थर और ठंडक की।

कबीर ने गहरी साँस भीतर खींची और उसकी आँखों में आँसू आ गए। "यह असली है, दी। मुझे पता है। मैं पानी सूँघ सकता हूँ।"

"नीचे मैं जाऊँगा," भंवर ने कहा। उसने रस्सी का सिरा अपनी कमर में बाँधा। "मैं कुओं का आदमी हूँ, मैडम। मेरे बाप ने मुझे सात साल की उम्र में रस्सी पकड़ाई थी। मुझे पता है गहराई में पैर कैसे रखे जाते हैं।"

मीरा ने उसकी आँखों में देखा और सिर हिला दिया।

भंवर पहले उतरा, फिर हकीम, फिर कबीर, सबसे आख़िर में मीरा। सीढ़ियाँ गिनने लायक़ थीं, उनतालीस, चालीस, और हर क़दम पर ठंडक गहरी होती जाती थी। दीवारों पर वही प्राचीन अक्षर थे, कहीं-कहीं छोटे आले, जिनमें पत्थर के सूखे दीये रखे थे। सीढ़ियों के बीच-बीच में, दीवार पर, कोयले से लगी कुछ पुरानी लकीरें थीं, पाँच-पाँच की गिनती में।

मीरा के पैर अपने आप धीमे हो गए।

सीढ़ियों के बीच, लगभग आधी गहराई पर, एक चौड़ी चौकी थी, पत्थर की एक छोटी चबूतरे जैसी जगह, जिसमें एक आदमी के सोने भर की जगह थी। और उस चौकी पर वही सब कुछ था जो किसी आदमी के कई हफ़्ते वहाँ रहने पर होता: एक लुढ़का हुआ कंबल, ज़ंग लगा स्टोव, कुछ ख़ाली टिन, एक छोटा-सा लोहे का तवा। और दीवार पर कोयले की इकतालीस लकीरें, जिनके नीचे एक ही नाम लिखा था:

"विक्रम।"

मीरा घुटनों के बल गिर गई।

वह चौकी पर रखे कंबल को छू नहीं पा रही थी, उसके हाथ हवा में रुके हुए थे, जैसे कोई चीज़ जिसे छू लेने से वह सब कुछ टूट सकता था जो बाईस साल से उसके भीतर साबुत था। कबीर उसके पास बैठ गया। उसने चुपचाप चौकी पर रखे एक छोटे से गोल चश्मे को उठा लिया, मोटी काली फ़्रेम, एक काँच चटका हुआ।

"यह पापा का चश्मा है," उसने बहुत धीमे से कहा। "वे सिर्फ़ पढ़ते वक़्त पहनते थे। मैं बचपन में इसे उनके सिर से खींचकर भाग जाता था।"

"और मैं तुझे पकड़ने दौड़ती थी," मीरा ने रोते हुए हँसकर कहा।

दोनों भाई-बहन कुछ देर उस चौकी के पास बैठे रहे, एक-दूसरे का हाथ थामे हुए। हकीम ने सिर झुका लिया। भंवर, जो ऊपर की सीढ़ी पर रुका था, मुड़कर उन्हें देखने लगा, उसकी आँखों में एक अजीब सी कोमलता थी।

चौकी की दीवार पर कोयले से कुछ और लिखा था, गहरे, दबाव डालकर।

"यहाँ से रात में नीचे मत जाना। कभी।
दरवाज़ा मत खोलना। चाहे कोई भी खोलने को कहे।
बच्चों, मैं जानता हूँ तुम आओगे। पानी अच्छा है। पर उसे मत पीना।"

मीरा ने वह आख़िरी पंक्ति दो बार पढ़ी। फिर उसने हकीम की ओर देखा।

"आप कहते हैं कि कुछ भी पीने से पहले जाँच करेंगे," उसने कहा। "और पापा कहते हैं कि पानी मत पीना।"

"जो पानी इंसान की प्यास बुझाए, उसे पीना कोई पाप नहीं है," हकीम ने कहा। "पर पापा ने यह भी लिखा है कि यह पानी की याद है, पानी नहीं। जब तक हम देख न लें कि वह क्या है..."

"नीचे चलते हैं," मीरा ने कहा। "पहले देखेंगे।"

सीढ़ियाँ और कुछ देर उतरकर एक गोल चौड़े चबूतरे पर ख़त्म हुईं। तल पर पानी था, पर वह कुएँ के बीचोंबीच नहीं, एक किनारे की चट्टान की दरार से रिसता हुआ एक पत्थर की चौड़ी, उथली कुंडी में जमा हो रहा था। पानी साफ़ था, इतना साफ़ कि टॉर्च की रोशनी तल को छूती थी, और उसके नीचे चिकने सफ़ेद कंकड़ चमकते थे।

और कुंडी के पीछे की दीवार में, जो कुएँ की गोल दीवार से अलग, सीधी और चौकोर थी, एक लोहे का द्वार जड़ा था।

वह बहुत पुराना था, काला, जंग खाया हुआ, और उसकी सतह पर किसी चीज़ का भारी दबाव पड़ा हुआ लगता था, जैसे उसे सदियों से भीतर से कोई धकेल रहा हो और वह फिर भी टिका रहा हो। द्वार के बीचोंबीच, एक सीध में, सात छोटे गोल छेद थे, और हर छेद के चारों ओर किसी हाथ की उँगली की आकृति उकेरी गई थी, तर्जनी की, एक सीधी, पतली उँगली जो भीतर की ओर इशारा कर रही थी।

हकीम का हाथ अपने आप सीने तक उठ गया।

"यह..." उनकी आवाज़ बैठ गई।

"क्या है?" मीरा ने पूछा।

"सात ताले। सात रखवालों की उँगलियों के लिए," उन्होंने फुसफुसाकर कहा। उनका दाहिना हाथ, जिसकी तर्जनी नहीं थी, काँप रहा था, और जब उन्होंने उसे उठाया तो ठूँठ की जगह की चमड़ी हल्की नीली पड़ चुकी थी। "तीस साल से मेरे इस हाथ में दर्द नहीं हुआ था। आज सुबह से यह जल रहा है।"

वह एक क़दम द्वार की ओर बढ़े, और जैसे ही उनका हाथ दरवाज़े के क़रीब पहुँचा, पाँचवें गोल छेद के चारों ओर की उकेरी हुई उँगली हल्की सी चमकी। वह चमक किसी जलते अंगारे की नहीं, ठंडी, नीली लौ की थी।

"यह मुझे पहचानता है," हकीम ने सन्न होकर कहा। "यह मेरा ताला है।"

"मत छूना!" मीरा ने उनका हाथ पकड़ लिया। "पापा ने कहा था कि द्वार मत खोलना।"

हकीम ने पलटकर उसकी ओर देखा। उनकी आँखों में वह भाव था जो किसी को घर की याद आने पर होता है, गहरा खिंचाव, डर के साथ घुला हुआ। "यह मैं जानता हूँ, बेटी। मैं इसे नहीं खोलूँगा।" उन्होंने धीरे से अपना हाथ पीछे खींचा, और जैसे ही उन्होंने ऐसा किया, चमक बुझ गई।

द्वार के सबसे नीचे के किनारे पर, जहाँ से उसका लोहा फ़र्श को छूता था, पानी की एक पतली, चमकती लकीर बह रही थी, भीतर की ओर से बाहर, कुंडी में जाती हुई। यही उस पानी का स्रोत था। द्वार के पीछे से।

"वह पानी का ज़रिया यहाँ से है," भंवर ने धीमे से कहा। "हम जो पानी पीने वाले हैं, वह उस द्वार के उस पार से आ रहा है।"

कोई कुछ नहीं बोला।

हकीम ने चाँदी की एक कील निकाली और कुंडी के पानी में डुबोई। कील चमकती रही, न काली पड़ी, न उसके चारों ओर कोई बुलबुला उठा। उन्होंने पानी की एक बूँद उँगली पर लेकर सूँघा, फिर जीभ पर रखी, और कुछ पल रुके रहे।

"ठंडा, मीठा और साफ़," उन्होंने कहा। "इसमें कोई ज़हर नहीं है। कोई दवा नहीं। कुछ भी नहीं जो मैं पहचान सकूँ।"

"और फिर भी पापा ने मना किया था," मीरा ने धीरे से कहा।

"हाँ।"

कबीर के होंठ फिर काँपने लगे। वह कुंडी की ओर देख रहा था, और मीरा ने उसकी आँखों में वही भूख देखी जिसे उसने रात में दरी पर देखा था, पर इस बार वह ज़ोर-ज़बरदस्ती वाली नहीं थी। यह किसी इंसान की सीधी, सच्ची प्यास थी।

"हम चार दिन से सूख रहे हैं," कबीर ने कहा। "अगर यह पानी भी हमें मार देगा तो कम से कम..."

"कबीर।" मीरा ने उसका हाथ दबाया।

"दी, पापा ने भी तो यहाँ चालीस दिन गुज़ारे थे। इसी चौकी पर। उन्होंने ख़ुद पानी पिया होगा। उनके बर्तन देखो, यहाँ चूल्हे पर चाय का पानी चढ़ा था। उन्होंने मना इसलिए किया कि वे जानते थे कि हम पिएँगे, और डर गए थे कि कुछ होगा। पर यह नहीं लिखा कि क्या होगा।"

मीरा ने हकीम की ओर देखा। हकीम के होंठ भिंचे हुए थे, पर उनकी आँखें भी कुंडी पर टिकी थीं, और उनके कंधे ढीले पड़ गए थे। भंवर ने ख़ामोशी से कैन का आख़िरी घूँट सबके कुल्हड़ में बाँट दिया।

तभी मीरा के भीतर कोई बहुत छोटी-सी बात खटकी, जिसे वह पकड़ नहीं पाई। कोई बात जो पापा की चिट्ठी में थी, या विजय के शब्दों में, या डायरी में। पर वह उसे ठीक से याद करने से पहले ही गुज़र गई।

उसने फ़ैसला किया।

"हम भरेंगे," उसने कहा। "कैन भरेंगे और पिएँगे। पर सब एक साथ, सब सतर्क, और एक भी चौथाई घूँट से ज़्यादा नहीं।"

पानी ठंडा था, इतना कि पहले घूँट में दाँत सुन्न हो गए। फिर वह गले से उतरा, और मीरा को लगा कि उसने कभी ज़िंदगी में इतना अच्छा पानी नहीं पिया। उसमें कोई स्वाद नहीं था, बस एक अजीब, गहरी शांति जो गले से उतरकर पूरे बदन में फैल गई, जैसे किसी ने उसकी हर थकान, हर डर को धो दिया हो।

उसने कैन भरी। सबने चौथाई-चौथाई घूँट पिया। कबीर ने दो और माँग लिए, और मीरा ने दे दिए, क्योंकि उसकी आँखों में अब कोई पागलपन नहीं था, बस सुकून था।

"कुछ अजीब है," हकीम ने कहा, पर उनकी आवाज़ धीमी और दूर लग रही थी। "यह पानी..."

"मुझे नींद आ रही है," भंवर बुदबुदाया।

"नहीं," मीरा ने कहा, और उसने उठने की कोशिश की। उसके पैर रुई जैसे हो गए थे। "सब जागे रहो... कोई..."

पर उसकी पलकें भारी हो चुकी थीं, और कुएँ की दीवारें धीरे-धीरे उसके चारों ओर घूमने लगीं। उसने किसी तरह ख़ुद को सँभाला, पर उसके ठीक पहले उसने देखा कि कबीर चबूतरे पर लुढ़क गया था, उसके होंठों पर एक शांत मुस्कान थी, और उसके पैरों के पास उसकी परछाईं पूरी तरह स्थिर, शांत, उसके साथ पड़ी थी।

फिर सब कुछ अँधेरा हो गया।

मीरा ने देखा कि वह घर में है।

उसके बचपन का घर, जयपुर का, पीली दीवारों और नीले दरवाज़ों वाला। रसोई से तेल में प्याज़ तलने की ख़ुशबू आ रही थी, और माँ की गुनगुनाहट। वह चौदह साल की थी, स्कूल की यूनिफ़ॉर्म में, और कमरे के कोने में, लकड़ी की पुरानी कुर्सी पर, पापा बैठे अख़बार पढ़ रहे थे।

उसने नज़र उठाई और मुस्कुराए। "आ गई, गुड़िया?"

"पापा..." उसकी आवाज़ साफ़ नहीं निकल रही थी।

"क्या हुआ? इतनी उदास क्यों हो?"

"आप..." मीरा ने रुक-रुककर कहा। "आप वापस आ गए?"

"मैं तो कहीं गया ही नहीं था, बेटा।" उन्होंने अख़बार तह किया और बाँहें फैला दीं। "आ, मेरे पास आ।"

वह दौड़कर उनकी बाँहों में समा गई। उनके कंधे से वही पुरानी महक आ रही थी, तंबाकू और पुराने काग़ज़ की। उसने आँखें बंद कर लीं, और रोई, और वे उसका सिर सहलाते रहे।

"क्या तू मेरे पास रहेगी, मीरा?" उन्होंने उसके कान में कहा।

"हाँ, पापा। हमेशा।"

उस पल उसके ज़ेहन के एक सुदूर कोने में किसी ने ज़ोर से ख़तरे की घंटी बजाई। कोई वादा मत करना, मीरा, कोई भी नहीं...

पर वह घंटी इतनी दूर थी, और पापा के सीने की धड़कन इतनी पास।

भंवर ने देखा कि वह एक नीले तालाब के किनारे बैठा है, और उसका छोटा भाई ऊँट के बच्चे को नहला रहा है। जगत हँस रहा था, पानी उछाल रहा था, और ऊँट का बच्चा चीख़कर भाग रहा था। जगत ने मुड़कर भाई की ओर हाथ हिलाया। "भाई, आओ! पानी बहुत ठंडा है!" और भंवर, जो पंद्रह साल से हँसना भूला हुआ था, पहली बार खुलकर हँस पड़ा।

हकीम ने देखा कि वह अपने पुराने मकान के आँगन में है, और तीन साल की ज़ैनब गुड़िया का पैर थामे उसकी तरफ़ दौड़ रही है। "अब्बा! अब्बा!" उसने उसे गोद में उठा लिया। उसके माथे पर हाथ रखा। ठंडा था। बुख़ार नहीं था। वह बस हँस रही थी।

और कबीर ने देखा कि वह एक बच्चे के रूप में है, और पापा के कंधे पर चढ़ा है, और आसमान के तारे गिन रहा है। "एक, दो, तीन..." और पापा हँसते हुए कह रहे थे, "बहुत सारे हैं, कबीर। कभी ख़त्म नहीं होंगे।"

सपना इतना कोमल था, इतना मीठा, कि चारों के चेहरों पर वही शांति थी, कुएँ की गहराई में, लोहे के द्वार के सामने, पानी की उस ठंडी कुंडी के किनारे।

मीरा जागी तो उसके गाल पर पत्थर की ठंडक थी।

उसने आँखें खोलीं। सिर में हल्का भारीपन था, जैसे बहुत लंबी नींद के बाद होता है। उसने उठने की कोशिश की, और कुछ पल लगे यह याद करने में कि वह कहाँ है। कुआँ। कुंडी। द्वार।

उसने कलाई की घड़ी देखी। उसकी सुइयाँ दस बजकर चालीस मिनट पर रुकी हुई थीं।

"उठो!" उसने कबीर का कंधा हिलाया। "हकीम साहब! भंवर जी! उठो!"

एक-एक कर सबकी आँखें खुलीं। भंवर सबसे पहले उठा और उसने चारों ओर नज़र दौड़ाई। उसकी आँखों में अजीब सी घबराहट थी। "मैडम, कितना वक़्त..."

"पता नहीं। घड़ी बंद है।"

कबीर ने अपनी कमीज़ की जेब से कैमरा निकाला और उसे एक पल के लिए चालू किया। स्क्रीन पर तारीख़ चमकी, और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

"दी..." उसने काँपती आवाज़ में कहा। "ये तारीख़..."

मीरा ने झुककर देखा। कैमरे की तारीख़ वह थी जो कल की होनी चाहिए थी। वह दिन जिसकी वे बात कर रहे थे, उसके अगले दिन की।

"हम एक पूरा दिन और एक पूरी रात यहाँ सोते रहे," हकीम ने धीमे से कहा। उनका चेहरा पीला पड़ चुका था और उनके होंठ सूखे थे। उन्होंने काँपते हाथों से अपनी माला पकड़ी। "इस पानी में कुछ था जो हम नहीं देख पाए।"

"पानी की याद," मीरा ने फुसफुसाया।

वे लगभग भागकर सीढ़ियाँ चढ़े। हर क़दम पर पैर भारी लग रहे थे, पर जिस्म हल्का, जैसे उसे लंबी नींद ने ताज़ा कर दिया हो, यह बात जितनी राहत देती थी, उतना ही डरा रही थी। उनके कैन भरे हुए थे, पानी से लबालब, और चारों के पेट भरे हुए थे, जैसे अभी-अभी किसी ने खाना खिलाया हो। किसने?

जब वे कुएँ की मुँडेर से बाहर निकले, तो आसमान का नज़ारा देखकर चारों रुक गए।

पश्चिम में सूरज डूब रहा था। लाल, भारी, क्षितिज को छूता हुआ। और ठीक उसके सामने, पूरब के रेतीले क्षितिज पर, दूसरी तरफ़, एक विशाल, गोल, सुनहरा-पीला चाँद उठ रहा था, पूरा का पूरा, इतना बड़ा कि वह रेत के टीलों को निगलता हुआ लग रहा था।

सूरज और चाँद, एक-दूसरे के आमने-सामने, पूरे रेगिस्तान को अपनी दोनों रोशनियों के बीच थामे हुए।

"पूनम," भंवर ने फुसफुसाया। "आज पूनम है।"

"हमने कल की रात गँवा दी," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में एक नई, डरावनी स्पष्टता थी। "उसने हमें यहाँ सुलाए रखा, ताकि हमारे पास सोचने का वक़्त न रहे।"

तभी हवा में एक आवाज़ तैरती हुई आई। धीमी, मीठी, थकी हुई। बहुत दूर किले की दिशा से, पर ऐसी साफ़ कि जैसे वह उनके कान के बिल्कुल पास बोल रही हो।

"आज पूर्णिमा है, बेटी।"

कबीर ने काँपते हाथों से अपनी पानी की कैन को सीने से भींच लिया।

"और तुम मेरी एक किस्त लेकर आई हो।"

मीरा ने झटके से अपनी कलाई देखी। वह बाईं कलाई, जहाँ रात उस छोटे बच्चे के हाथ का निशान उभरा था। अब वह सूखा नहीं था। वह नब्ज़ के ऊपर, पानी की एक पतली, चाँदी जैसी धार की तरह, हल्के-हल्के बह रहा था, और उसकी चमक ठीक उस चाँद के रंग की थी जो रेगिस्तान के ऊपर चढ़ रहा था।

Writer
firoj saifi
Story
रेत का क़ैदी
Chapter
11 of 30
Category
Jinn & Spirits
Reading time
18 min
Words
3515
Language
Hindi (हिंदी)
Price
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