Pretika › Jinn & Spirits › रेत का क़ैदी
एपिसोड 12: पूर्णिमा की रात
firoj saifi · Jinn & Spirits · 18 मिनट
सूरज और चाँद आमने-सामने खड़े थे, और रेगिस्तान उनके बीच की रोशनी में काँप रहा था।
मीरा ने कलाई पर नज़र जमाए रखी। चाँदी की वह धार नब्ज़ के ऊपर बह रही थी, पर कहीं गिर नहीं रही थी। न बूँद बनती थी, न त्वचा गीली होती थी। जब उसने हाथ उठाया तो धार उसकी हथेली की ओर लुढ़कने की जगह हवा में एक क्षण को सीधी तन गई, किले की दिशा में इशारा करती हुई, जैसे कम्पास की सुई उत्तर ढूँढ़ती है।
"यह हमें वापस बुला रही है," उसने कहा।
"यह तुम्हें बुला रही है," हकीम ने सुधारा। उनकी आवाज़ में बाईस साल की सारी सावधानी लौट आई थी। उन्होंने मीरा की कलाई पकड़कर उलट-पुलटकर देखी, फिर नमक की एक चुटकी उस पर रगड़ी। धार ने नमक को छुआ और ऐसे सिकुड़ गई जैसे किसी जीवित चीज़ ने काँटा चुभा हो, पर बुझी नहीं। "यह निशान जिन्न का है, पर इसे लगाने वाला हाथ बच्चे का था। विजय का। शरर ने उसे अपनी तरफ़ से नहीं भेजा होता तो यह निशान इतना कोमल न होता।"
"क्या इसका मतलब है कि विजय शरर के साथ है?" कबीर ने पूछा।
"इसका मतलब है कि हम अभी तक नहीं जानते कि कौन किसके साथ है।" हकीम ने गहरी साँस ली। "और आज रात हमारे पास यह जानने का वक़्त नहीं होगा।"
पश्चिम में सूरज का आख़िरी किनारा रेत के नीचे डूब गया। आसमान का रंग एक साँस में बदला, ताँबे से बैंगनी, बैंगनी से नीला, और चाँद पूरे आसमान का मालिक हो गया। उसकी रोशनी में रेत चाँदी की चादर जैसी बिछ गई, और चारों की परछाइयाँ अपने-अपने पैरों से निकलकर पश्चिम की ओर लंबी हो गईं।
मीरा ने तुरंत गिना। हकीम की, भंवर की, अपनी। और कबीर की।
कबीर की परछाईं बाक़ी तीनों जैसी ही थी, पर उसके पैरों से निकलकर नहीं, कुछ बित्ता आगे से शुरू होती थी, जैसे उसके और ज़मीन के बीच कोई बारीक, अदृश्य दूरी आ गई हो। मीरा ने कुछ नहीं कहा। कबीर ने भी नहीं, क्योंकि उसे पता था।
किले तक लौटते-लौटते रात गहरा चुकी थी, पर चाँदनी इतनी थी कि टॉर्च की ज़रूरत नहीं पड़ी। रेगिस्तान में पूर्णिमा की रात अपने आप में एक अजीब चीज़ होती है। हर टीले का हर कगार तराशा हुआ लगता है, हर परछाईं गहरी स्याही, हर आवाज़ दूर तक जाती हुई। वे पानी की भरी हुई कैनें कंधों पर लादे, एक रस्सी में बँधे चलते रहे। किसी ने बात नहीं की।
जब वे घेरे की सीमा पर पहुँचे, जहाँ पत्थरों के सात-सात ढेर थे, तो हवा थम गई। चील, जो दिन में दिखी थी, अब कहीं नहीं थी। और रेत पर पड़ी लकीर, घेरे के भीतर और बाहर की रेत के बीच की सीमा, चाँदनी में एक पतली, चमकती रेखा की तरह दिख रही थी।
"पार करते ही हम उसके इलाक़े में होंगे," हकीम ने कहा। "वहाँ जो भी कहे, मैं नहीं तो मीरा ही उसका जवाब देगी। बाक़ी तीनों चुप रहेंगे।"
"और अगर वह मेरा नाम ले?" कबीर ने पूछा।
"तब भी चुप रहना।"
कबीर ने सिर हिलाया। पर उसके पैर रेखा के पास आकर ठिठक गए। उसकी परछाईं रेखा पार कर चुकी थी, और वह अभी भी बाहर था।
मीरा ने उसकी बाँह थाम ली। "मैं हूँ," उसने कहा। "साथ चलो।"
उन्होंने एक साथ रेखा लाँघी।
फाटक पर पहुँचकर चारों ने एक साथ वही देखा।
किले के भीतर रोशनी थी। एक नहीं, सैकड़ों छोटे-छोटे दीये, आँगन के हर कोने में, हर आले में, हर चबूतरे पर, जलते हुए। उनकी लौ स्थिर थी, इतनी स्थिर कि वह किसी तस्वीर की लौ लगती थी। पीली, गर्म, सुनहरी रोशनी में पूरा आँगन नहाया हुआ था, और वही आँगन जो कल सूखा और उजड़ा था, आज किसी उत्सव की तैयारी जैसा सजा था।
"यह दीपावली जैसा लग रहा है," कबीर ने फुसफुसाया।
"यह स्वागत है," हकीम ने कहा, और उनके चेहरे पर कोई खुशी नहीं थी। "जिन्न मेहमान को अपने घर बुलाता है, तो घर सजाता है।"
वे आँगन में उतरे। हर दीये के नीचे एक छोटा सा निशान खुदा था, वही गिनती वाले निशान जो तहख़ाने में थे। पर यहाँ गुच्छे में पाँच-पाँच नहीं, सात-सात लकीरें थीं, हर सात के बाद एक आड़ी।
"पूरे तीन सौ साल की पूर्णिमाएँ," मीरा ने धीरे से कहा। "हर पूर्णिमा पर एक दीया।"
आँगन के पार, पश्चिमी गलियारे की तरफ़ से, एक हल्की सी आवाज़ आई। पानी की नहीं, पत्थर के रगड़ने की। वही आवाज़ जो सातवीं क़ब्र का चबूतरा खुलते वक़्त आई थी।
हकीम का चेहरा सख़्त हो गया। "पिछवाड़ा।"
सात क़ब्रें अर्धवृत्त में खड़ी थीं, और छह के ऊपर रखे दीये जल रहे थे। सातवीं क़ब्र का दीया बुझा था, और उसका चबूतरा पूरी तरह खुला हुआ था, ऊपर की पटिया एक ओर खिसकी हुई, भीतर की सात सीढ़ियाँ चाँदनी में दिख रही थीं।
पर कुछ बदल चुका था।
चबूतरे के ठीक किनारे पर, सीढ़ियों के मुहाने पर, एक आदमी बैठा था।
चारों जम गए। वह पीठ फेरे बैठा था, ज़मीन पर पालथी मारे, कंधे झुके हुए। पुरानी, घिसी हुई खाकी कमीज़, सिर पर वही चौड़े किनारे वाली हैट जो मीरा ने तहख़ाने के नक़ली कंकाल के पास देखी थी। हैट के नीचे से सफ़ेद होते बाल गर्दन तक आ रहे थे।
मीरा के पैरों ने जवाब दे दिया। वह घुटनों पर गिरते-गिरते बची।
"पापा?"
आकृति नहीं हिली।
"पापा!" वह दौड़ पड़ी। हकीम ने झपटकर उसकी बाँह पकड़ ली। "रुको, मीरा! देखो पहले! उसकी परछाईं देखो!"
मीरा ने रुककर देखा। चाँदनी में आदमी की परछाईं ज़मीन पर पड़ी थी, लंबी और सीधी, पूरी की पूरी, उसके पैरों से जुड़ी हुई। उसके पास भी एक चीज़ थी जो नक़ली चीज़ों के पास नहीं होती: साँस। उसकी कमीज़ पीठ पर धीरे-धीरे उठ रही थी और गिर रही थी। बहुत धीमे। एक मिनट में दो-तीन बार।
भंवर ने रेत की पोटली कसकर भींची। "नहीं मरा है," उसने फुसफुसाकर कहा। "साँस चल रही है।"
मीरा हकीम का हाथ झटककर आगे बढ़ी, और इस बार किसी ने नहीं रोका। वह घुटनों के बल उस आदमी के सामने बैठी और धीरे से, बहुत धीरे से, उसका कंधा पकड़कर अपनी ओर घुमाया।
वह विक्रम सिंह राठौड़ थे।
वही चेहरा। पर बाईस साल बड़ा नहीं। यादों वाला चेहरा, भूरी आँखें, घनी भौंहें, कनपटी पर वही पुराना कटा हुआ निशान जो एक बार सर्वे में पत्थर लगने से बना था। पर उसमें अब एक अजीब सी शांति थी, और एक ऐसी झुर्रीदार थकान जो उम्र की नहीं, नींद की थी। उनकी आँखें बंद थीं, होंठ हल्के से खुले हुए, और उनकी गोद में रखे दोनों हाथ, जिनकी उँगलियाँ पतली और लंबी थीं, किसी बहुत पुरानी बात को थामे हुए लगते थे।
"पापा," मीरा ने उनके गाल पर हाथ रखा, और वह गर्म था। पहली बार इन चार दिनों में कोई चीज़ उसे गर्म मिली थी, जो किसी जिन्न की नहीं थी। "पापा, मैं हूँ। मीरा। उठिए।"
विक्रम नहीं जागे।
कबीर उनके दूसरी ओर बैठा था। उसके होंठ काँप रहे थे, और उसकी आँखों से आँसू गिर रहे थे, पर उसके मुँह से शब्द नहीं निकल रहे थे। उसने पिता का हाथ अपने दोनों हाथों में ले लिया, बच्चे की तरह, और उसे गाल से लगा लिया।
"पापा... मैं कबीर हूँ। आपका कबीर।"
हकीम चबूतरे के पास खड़े थे, एक क़दम पीछे। उनकी आँखें सीढ़ियों के नीचे के अँधेरे पर टिकी थीं। फिर उन्होंने धीरे से झुककर विक्रम की नब्ज़ पर उँगलियाँ रखीं। बहुत देर तक वे ऐसे ही रहे, आँखें बंद किए।
"ज़िंदा हैं," उन्होंने आख़िरकार कहा। "पर यह नींद नहीं है। इनकी नब्ज़ एक मिनट में सिर्फ़ चार बार चलती है। इनका शरीर वहीं रुका हुआ है जहाँ बाईस साल पहले था। इनके बाल पूरे सफ़ेद नहीं हुए, इनकी त्वचा नहीं झुर्राई। जो पानी हमने पिया, उसी की तरह यह भी किसी ऐसे तल में डूबे हैं जहाँ वक़्त की चाल अलग है।"
"तो इन्हें जगाने का तरीक़ा?" मीरा ने पूछा।
"मुझे नहीं पता।"
उसी वक़्त हवा में एक भारी, जानी-पहचानी चुप्पी उतर आई। दीयों की लौ एक साथ झुकी, किसी अदृश्य साँस से। और सातवीं क़ब्र की सीढ़ियों के नीचे के अँधेरे से, धीरे-धीरे, सब कुछ पीछे हटता चला गया, जैसे पर्दा उठता है।
"मैंने कहा था, बेटी। उनकी साँस मेरे पास है।"
शरर की आवाज़ गुंबद जैसी गूँजती आई, पर आज उसमें अलग बात थी। वह थका हुआ नहीं था। उसमें एक उत्साह था, वही उत्साह जो एक बहुत लंबे इंतज़ार के आख़िरी पल में आता है।
"मैं उन्हें जगा सकता हूँ। एक पल में। पर उसके लिए मुझे वह चाहिए जो तुम लाई हो।"
मीरा ने सिर उठाया। चबूतरे के पार, क़ब्रों के पीछे वाली दीवार की ऊपरी मुँडेर पर, चाँद की रोशनी में एक आकृति खड़ी थी। बहुत ऊँची, बहुत स्थिर, धुएँ और रोशनी से बनी हुई, जिसका चेहरा तो कोई चेहरा नहीं था पर जिसकी आँखों की जगह दो धीमे-धीमे जलते अंगारे थे।
"शरर," उसने कहा। उसकी आवाज़ में कोई काँपन नहीं थी। इन चार दिनों ने उसे कुछ सिखा दिया था। "तुमने कहा था कि तुम झूठ नहीं बोलते। तुम मेरे पिता को जगा सकते हो?"
"मैं उन्हें जगा सकता हूँ, क्योंकि उन्हें मैंने ही सुलाया था।"
सबके चेहरे सख़्त हो गए।
"चौंको मत। उन्होंने मुझसे कहा था। इकतालीसवें दिन, जब वे सबसे ज़्यादा टूटे हुए थे, तब उन्होंने मुझसे एक बात माँगी थी। कि मैं उन्हें सुला दूँ, तब तक जब तक उनकी बेटी न आ जाए। वे जाग नहीं सकते थे, क्योंकि जागने का मतलब था कि उन्हें फिर वह सब देखना पड़ता जो नीचे है। इसलिए मैंने उन्हें वहाँ रखा जहाँ वक़्त नहीं चलता, और मैंने तुम्हारा इंतज़ार किया।"
"ये झूठ है," कबीर ने कहा, और हकीम की चेतावनी के बावजूद उसकी आवाज़ बाहर आ गई। "पापा तुझसे बात करने वाले आदमी नहीं थे। उन्होंने चिट्ठी में लिखा था कि तू ख़तरनाक है!"
"मैंने झूठ का एक शब्द नहीं कहा, कबीर।" शरर ने नरमी से कहा, और उसके नाम लेने पर कबीर की साँस अटक गई। "तुम्हारे पिता ने तुम्हें सबसे पहले मुझसे बचाने की कोशिश की। पर उन्होंने यह भी जाना कि मैं वह नहीं हूँ जो तुम सब सोचते हो।"
हकीम ने तीखी आवाज़ में बीच में कहा, "तू क्या है, शरर? ये बात आज पूरी कहो। कसम खाकर नहीं, क्योंकि जिन्न की क़सम का कोई वज़न नहीं। बस पूरा बोल।"
एक पल को चुप्पी रही। दीयों की लौ फिर काँपी।
"मैं एक पहरेदार हूँ, रुस्तम," शरर ने कहा। "तीन हज़ार साल से भी पुराना। और जिसकी मैं रखवाली कर रहा था, वह नीचे है।"
मीरा के पीछे भंवर ने हल्की सी साँस खींची, पर किसी ने उसकी तरफ़ नहीं देखा।
"जो सात आमिलों ने बाँधा, वह मैं नहीं था। वे मुझे बाँध सके क्योंकि मैं बँधना चाहता था। यही मेरा सबसे गहरा राज़ है। मैंने राजा के सौदे में जानबूझकर वह क़ीमत रखवाई थी कि एक दिन वह मुझे बाँध दे। क्योंकि मेरी अकेली राह वही थी जिससे मैं उस दरवाज़े के सामने स्थायी रूप से खड़ा हो सकता था।"
"कौन से दरवाज़े के सामने?" मीरा ने पूछा।
"उस दरवाज़े के, जिसे तुमने उत्तर के कुएँ में देखा है। सात उँगलियों के सात ताले। जो उसके पीछे है, वह मुझसे पहले का है। वह इस रेगिस्तान से भी पहले का है, जब यहाँ समुद्र था। उसके पास कोई नाम नहीं, इसलिए मैं उसे 'नीचे वाला' कहता हूँ। वह जो पानी की याद पीता है। और जब तक वह जागता है, कोई जगह जीवित नहीं रह सकती।"
कबीर ने धीमे से कहा, "विजय ने भी यही कहा था।"
"विजय ने सच कहा था। वह मेरी सबसे छोटी उम्मीद था।"
शरर की आवाज़ पहली बार काँपी।
"जब मैंने राजा के बेटे को ज़िंदा रखा, तो मैंने उसे इसलिए नहीं बचाया कि राजा को बेटा चाहिए था। मैंने उसे इसलिए बचाया कि उसकी साँस मेरे लिए एक ताला बन सकती थी। वह राजा के वंश का पहला रक्त था जो इस द्वार के पास रह सकता था। पर मैंने ग़लती की, रुस्तम। मैंने उसे इंसान की तरह नहीं, औज़ार की तरह देखा। और आज तीन सौ साल बाद भी मैं उस ग़लती का बोझ लेकर खड़ा हूँ।"
हकीम ने बहुत धीमे से पूछा, "तो सात कुओं का पानी?"
"वह मेरी किस्त नहीं थी। वह नीचे वाले की थी। मैं हर पूर्णिमा पर उसे इसलिए भेजता था कि वह शांत सोता रहे। अगर वह प्यासा जाग जाए तो वह सीधा ऊपर आएगा। मैं तीन हज़ार साल से यही कर रहा हूँ। जब राजा ने मुझे बाँधा और सात कुओं का पानी रोक दिया, तो नीचे वाला पहली बार प्यासा हुआ। उसके बाद की हर बात, मेरे गुमशुदा लोग, भीगी टोपियाँ, ये सब उसी प्यास के असर हैं।"
"तू हमें क्यों बता रहा है?" मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ बहुत शांत थी, और भीतर से इस्पात की बनी हुई। "अगर तू पहरेदार है तो हमें बुलाने की ज़रूरत क्या थी?"
"मुझे तुम्हारी ज़रूरत थी, बेटी। क्योंकि पानी पिलाने वाला हाथ राजा के वंश का होना चाहिए। मैं ख़ुद नहीं पिला सकता। मैं बँधा हूँ।"
"पानी पिलाने का मतलब है उस नीचे वाले को पिलाना!" भंवर की आवाज़ गूँजी। उसकी आँखों में आग थी। "जो मेरे भाई को खा गया!"
"तुम्हारे भाई को मैंने नहीं खाया, भंवर। वह नीचे वाले की प्यास ने खींचा था। पर तुमने सही कहा। पानी पिलाने का मतलब है उसे पिलाना। और इसीलिए मैं तुमसे पिलाने को कह रहा हूँ।"
कबीर ने भाई की तरह बहन को देखा। "दी, ये पागल है। ये हमसे उसी चीज़ को पानी पिलवाना चाहता है जिसे रोकना है!"
"जिसे रोकना है, उसे प्यासा रखकर नहीं रोका जा सकता।" शरर की आवाज़ में सदियों की थकान उतर आई थी। "मैंने तीन हज़ार साल में सीखा है कि बंद दरवाज़े के पीछे का भूखा, बंद दरवाज़े को तोड़ता है। मैं उसे हमेशा के लिए सुला देना चाहता हूँ। और उसे सुलाने का एक ही तरीक़ा है, उसे वह पानी पिलाना जो प्यास बुझाए, भूख नहीं बढ़ाए। और वह पानी उत्तर के कुएँ का है। जो तुम्हारे कैनों में है।"
मीरा ने अपनी कैन की ओर देखा। भरी हुई, ठंडी, चाँदनी में हल्की सी चमकती हुई।
उसी क्षण उसे वह बात याद आई जो कुएँ पर पानी पीते वक़्त उसके ज़ेहन में अटकी थी, पर पकड़ में नहीं आई थी। पापा की चिट्ठी की एक पंक्ति: जिन्न कभी झूठ नहीं बोलता। पर वह जो नहीं कहता, उसे पहचानना सीख।
"तुमने एक बात नहीं कही," उसने धीरे से कहा।
एक पल की चुप्पी रही।
"अगर यह पानी नीचे वाले को सुला देता है, तो पापा को क्यों छह कुएँ पाटने पड़े? अगर यह पानी इतना अच्छा है तो उन्होंने इसे पीने को क्यों मना किया? और हम इसे पीकर एक दिन और एक रात सोते रहे, ताकि आज रात पूनम पर तुम्हारे दरवाज़े पर पहुँचें, तो तुमने हमें यहाँ तक लाने के लिए ही सुलाया था न?"
“...”
"तुमने एक बात नहीं कही," मीरा ने दोहराया। "यह पानी पीकर सोने वाला कभी नहीं जागता। या जागता है तो बदला हुआ।"
शरर कुछ नहीं बोला। मुँडेर पर खड़ी आकृति के अंगारे धीमे हुए, जैसे कोई आँखें झुका ले।
"तुम अपने पिता से ज़्यादा चतुर हो," आख़िरकार उसने कहा।
"तो बताओ," मीरा ने कहा। "वह क्या है जो तुम नहीं कह रहे?"
"मैं तुम्हें बताऊँगा। पर चाँद सिर पर आने में एक घंटा बाक़ी है। तब तक तुम सब नीचे आओ। बावड़ी की सात सीढ़ियाँ। मैं तुम्हें दिखाऊँगा कि मैंने क्या छिपाया है, और तुम ख़ुद फ़ैसला करोगी।"
"और अगर हम न आएँ?"
"तो नीचे वाला तुम्हारे पिता की साँस पीकर आज रात जाग जाएगा। और उसके बाद फ़ैसले का कोई मतलब नहीं रह जाएगा।"
आकृति धुएँ में घुल गई। दीयों की लौ फिर सीधी हो गई, और पिछवाड़े के आँगन में सिर्फ़ चार जीवित लोग, छह जलते दीये और एक साँस लेता हुआ बाप रह गए।
उन्होंने विक्रम को घसीटकर नहीं, उठाकर, भंवर और हकीम की मदद से, शाही कक्ष तक पहुँचाया। उसके शरीर में कोई वज़न नहीं लग रहा था, जैसे उसकी हड्डियाँ हवा की बनी हों। मीरा और कबीर पीछे-पीछे चले, एक-दूसरे का हाथ थामे। कक्ष में पहुँचकर विक्रम को कंबल पर लिटाया गया, और मीरा ने उसके सिर के नीचे तह किया हुआ अपना दुपट्टा रख दिया।
"हमें फ़ैसला करना है," हकीम ने कहा। वे दरवाज़े पर नमक की नई लकीर खींच रहे थे, हाथ अब थोड़े स्थिर थे। "सुनो, मैं तुम्हें बताता हूँ कि मैं क्या सोचता हूँ, और फिर तुम तय करना।"
"बताइए।"
"मेरे उस्ताद की बात याद करो। 'जिन्न को बाँधना आसान है। मुश्किल उसे बाँधे रखना है।' और उस्ताद ने यह भी कहा था कि सबसे बड़ा ख़तरा उन सात हाथों के अंदर से आता है जिन्होंने उसे बाँधा। अगर शरर सच कह रहा है, तो सात आमिलों ने ग़लत को बाँधा। पर अगर उसने हमसे कुछ छिपाया है तो..." हकीम रुके। "तो वह हमें उसी तरह ठग रहा है, जैसे उसने राजा को ठगा था।"
"वह कभी झूठ नहीं बोलता," भंवर ने कड़वाहट से कहा। "यही तो उसकी चाल है। हर बात सच, और फिर भी हर बात फंदा।"
"फंदा ही सही," कबीर ने कहा। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, पर उसमें एक ऐसी स्थिरता थी जो मीरा ने पहले नहीं सुनी थी। "पर पापा की साँस सच है, दी। वे ज़िंदा हैं। अगर हम नीचे नहीं गए तो..."
"मैं जानती हूँ," मीरा ने कहा।
उसने कबीर की ओर देखा। उसकी परछाईं कक्ष की दीवार पर पड़ रही थी, और जिस तरह वह एक बित्ता आगे से शुरू होती थी, वैसे ही आज उसके सिर के ऊपर एक छोटा सा मोड़ भी था, जैसे वह किसी की बात सुन रही हो।
"हम नीचे जाएँगे," उसने कहा। "पर शर्तों के साथ।"
"बताओ।"
"एक: हम कैनें साथ नहीं ले जाएँगे। पानी यहाँ रहेगा, इसी कक्ष में, नमक के घेरे में। दो: कबीर यहाँ पापा के पास रहेगा।"
"दी, नहीं..."
"कबीर।" मीरा ने उसके दोनों कंधे पकड़ लिए। "तेरी परछाईं हमारे साथ नीचे नहीं जाएगी। मुझे नहीं पता कि वह किसके साथ है। पर जब तक पता न चले, तब तक मैं तुझे उस जगह नहीं ले जाऊँगी जहाँ वह तुझे बुला सकती है।"
कबीर का चेहरा उतर गया। "तुम्हें लगता है कि मैं..." वह शब्द पूरा नहीं कर सका।
"मुझे लगता है कि तू मेरा भाई है और मुझे तुझे खोना नहीं है।" मीरा ने उसके माथे से माथा टिकाया। "पापा के साथ रह। उनका हाथ मत छोड़ना। अगर कुछ भी बदले, कुछ भी, तो भंवर जी की रेत की लकीर के भीतर चला जाना।"
कबीर ने कुछ पल बहन की आँखों में देखा। फिर उसने धीरे से सिर हिलाया।
"ठीक है।"
हकीम ने कबीर के चारों ओर रेत की एक पतली लकीर खींच दी, भंवर की पोटली से चुटकी भर लेकर, फिर नमक की दोहरी रेखा। उन्होंने विक्रम के माथे पर तेल की एक बूँद लगाई, कुछ पढ़ा, और धीरे से उठे।
"चलो," उन्होंने कहा। "चाँद सिर पर आने में अब पचास मिनट बचे हैं।"
वे तीनों बावड़ी की ओर गए, मीरा, भंवर और हकीम, रस्सी में बँधे हुए।
रास्ते में चाँदनी सबसे तेज़ थी। बावड़ी की सीढ़ियाँ, जो पहले दिन अँधेरे में डूबी लगी थीं, अब आधी साफ़ दिख रही थीं, सात-सात की क़तारों में, सफ़ेद पत्थर चाँदनी में चमकता हुआ। हर चबूतरे पर एक दीया रखा था, जल रहा था।
सातवीं सीढ़ी के पास, जहाँ पहले दिन मीरा खड़ी हुई थी, अब पानी साफ़ दिख रहा था। काला, स्थिर, शीशे जैसा, पर इस बार उसके भीतर एक रोशनी थी, चाँद की नहीं, किसी और की। बहुत गहराई में, एक धुँधली, नीली चमक।
और सबसे ऊपर की सीढ़ी पर, जहाँ से बावड़ी की सीढ़ियाँ शुरू होती थीं, एक बच्चा बैठा था।
विजयसिंह। भीगा हुआ, कपड़े देह से चिपके हुए, घुटनों को छाती से लगाए। उसने उन्हें आते देखा तो उठकर खड़ा हो गया। उसके चेहरे पर कल रात वाली घबराहट नहीं थी। उसकी आँखें बहुत गंभीर और बहुत बड़ी लग रही थीं।
"दीदी," उसने कहा। "आप आ गईं।"
"विजय," मीरा ने उसके सामने रुककर कहा। "तुमने कहा था कि नीचे कोई है जो शरर के भी नीचे है।"
"हाँ।"
"तो आज बताओ। शरर क्या छिपा रहा है?"
विजय ने गर्दन घुमाकर बावड़ी की गहराई की ओर देखा। पानी की सतह के नीचे वह नीली चमक अब कुछ और तेज़ हो गई थी, जैसे कोई बहुत नीचे से धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा हो।
"वह कुछ नहीं छिपा रहा, दीदी," उसने धीमे से कहा। "वह बस आपसे वह नहीं कह पा रहा जो उसे कहना चाहिए।"
"क्या?"
विजय ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखें उठाईं और सीधे मीरा के चेहरे पर टिका दीं। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, एक बच्चे की फुसफुसाहट जैसी, पर उसमें तीन सौ साल का ठंडापन था।
"कि आपके कैनों का पानी उसे सुला नहीं सकता। वह उसे जगाएगा। और शरर यह जानता है।"
हकीम ने तेज़ी से साँस खींची।
"तो फिर शरर हमसे पानी क्यों चाहता है?" भंवर ने पूछा।
विजय ने कुछ पल कोई जवाब नहीं दिया। फिर उसने बहुत धीमे से कहा, इतना कि मीरा को उसके होंठ देखकर समझना पड़ा।
"क्योंकि वह चाहता है कि नीचे वाला जागे।"
- Writer
- firoj saifi
- Story
- रेत का क़ैदी
- Chapter
- 12 of 30
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 18 min
- Words
- 3423
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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