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एपिसोड 13: दो पहरेदार

firoj saifi · Jinn & Spirits · 14 मिनट

बावड़ी की पहली सीढ़ी पर खड़े होकर मीरा को लगा कि पूरा किला उसकी साँस सुन रहा है।

विजय की बात हवा में अब भी टँगी हुई थी। वह चाहता है कि नीचे वाला जागे। इतनी सीधी, इतनी सरल, इतनी बेरहम। हकीम के चेहरे का रंग उड़ चुका था, और भंवर की मुट्ठी रेत की पोटली पर इतनी कसी थी कि उसकी उँगलियों की गाँठें सफ़ेद पड़ गई थीं।

"तुम यह कैसे जानते हो?" मीरा ने बहुत धीरे से पूछा। "शरर तो कहता है कि वह उसे सुलाना चाहता है।"

विजय ने गर्दन झुका ली और भीगे हुए बालों की एक लट आँखों पर आ गिरी। "मैं तीन सौ साल से सीढ़ी के नीचे पड़ा हूँ, दीदी। पहले मुझे लगता था कि मैं सोया हूँ। फिर समझ आया कि मैं सुन रहा हूँ। बावड़ी के नीचे जो भी बात होती है, मुझे सुनाई देती है। शरर रात-रात भर अकेला बात करता है, पर किसी से नहीं। अपने आप से। या शायद नीचे वाले से।"

"क्या कहता है वह?"

"वह कहता है, 'अब थोड़ा और। बस एक पूर्णिमा और। जब राजा का रक्त आएगा, तब सब बदल जाएगा।'" विजय की आवाज़ बहुत हल्की हो गई थी। "तीन सौ साल से वह यही दोहराता आ रहा है। मैंने कभी किसी से नहीं कहा, क्योंकि मुझे उससे प्यार था। उसी ने तो मुझे पानी पिलाया था जब मैं बीमार था। पर कल रात जब आप बाहर नमक के पीछे थीं और मैंने आपके पीछे बैठे भाई के हाथ में वह रेत देखी, तो मुझे लगा कि..." वह रुका। "मुझे लगा कि मैं भी अब सच बता सकता हूँ।"

हकीम ने आगे बढ़कर उसके सामने घुटने टेके। "बेटा, एक बात सच-सच बताओ। जब तुमने कहा कि शरर पहरेदार है, तो क्या तुमने उसकी कोई बात सुनी थी जिससे यह लगे कि वह नीचे वाले का दोस्त है, दुश्मन नहीं?"

विजय ने बहुत देर तक सोचा, और फिर बहुत धीरे से सिर हिलाया। "मैंने उसे कभी नीचे वाले को 'वह' कहते नहीं सुना। वह हमेशा उसे 'मेरे स्वामी' कहता है।"

सन्नाटा।

पानी की सतह पर, सात सीढ़ियाँ नीचे, एक छोटी सी लहर उठी।

"तुम बच्चे से बहुत ज़्यादा बात कर रही हो, बेटी।"

आवाज़ बावड़ी की दीवारों से उठी। इस बार वह मीठी नहीं थी। उसमें एक सपाट ठंडक थी, जैसे किसी ने भीतर का सारा रंग निचोड़ लिया हो। विजय ने सहमकर मीरा के पीछे जगह बना ली, और उसके नंगे पैरों के नीचे से पानी की एक पतली लकीर बहकर सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी।

पानी के बीचोंबीच से शरर की आकृति उठ रही थी, धीरे-धीरे, पहले धुएँ की तरह, फिर गाढ़ी होती हुई। उसकी ऊँचाई छत तक पहुँची, और आँखों की जगह दो अंगारे उनकी ओर घूमे।

"तुमने हमसे झूठ बोला," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ में कोई काँपन नहीं थी। "या झूठ नहीं बोला, पर सच भी नहीं कहा। यह मेरे पापा की सिखाई बात है, और तुम्हारी सबसे बड़ी कमज़ोरी।"

"मैंने एक भी झूठ नहीं कहा।"

"तो यह भी सच है कि तुम नीचे वाले को 'स्वामी' कहते हो?"

अंगारे एक पल को पूरी तरह बुझ गए, फिर भड़ककर दोबारा जल उठे।

"हाँ," शरर ने कहा। उसकी आवाज़ में अब कोई बनावट नहीं बची थी। "यह भी सच है। तीन हज़ार साल पहले, जब मैं पहली बार इस द्वार के सामने खड़ा हुआ था, तब वह मेरा स्वामी ही था। मैं उसका पहरेदार नहीं, उसका सेवक था।"

हकीम ने झटके से माला मुट्ठी में भींची। "तो राजा ने तुम्हें बाँधा, और आमिलों ने..."

"उन्होंने एक ऐसे सेवक को बाँधा जो अपने स्वामी को क़ैद में रखे हुए था, रुस्तम। मैंने तुमसे कहा था कि मैं पहरेदार हूँ। यह भी सच है। पर किसके लिए? मैंने कभी नहीं कहा कि उसे रोकने के लिए।"

भंवर ने आगे बढ़कर तेज़ी से कहा, "तुम क्या कह रहे हो? कि तुम उसके ग़ुलाम हो और उसे आज़ाद करना चाहते हो?"

"ग़ुलाम नहीं," शरर ने कहा। "उसका बेटा। मेरा नाम शरर है, और 'शरर' का मतलब चिंगारी है। चिंगारी वह होती है जो किसी बड़ी आग से अलग होकर गिरती है। मैं उसी आग की चिंगारी हूँ जो द्वार के पीछे जल रही है।"

कुछ क्षणों तक बावड़ी में सिर्फ़ चाँदनी की चुप्पी रही।

मीरा के भीतर जैसे कोई गाँठ खुली। तीन दिन की सब बातें, तख़्ती, सात क़ब्रें, सातवाँ आमिल, उँगली, परछाईं, पानी, सब एक साथ किसी नक़्शे की तरह उसके सामने बिछ गईं।

"तो यह पूरी कहानी इसी के लिए थी," उसने धीरे से कहा। "तुम्हारे पिता, तुम्हारा स्वामी, कोई भी नाम दो, उसे सात आमिलों ने नहीं बाँधा था। उसे किसी और ने बाँधा था, बहुत पहले। और तुम उस द्वार के सामने खड़े रहे, उसे खोलने की राह देखते हुए।"

"मैं उसे खोलना चाहता था," शरर ने कहा, "क्योंकि मैं उसे बचाना चाहता था। जिन्हें तुम सात आमिल कहते हो, वे मुझे बाँधने नहीं आए थे, बेटी। वे द्वार के पास वाले बंधन को मज़बूत करने आए थे। पर राजा ने उन्हें मेरे ख़िलाफ़ मोड़ दिया। उसने समझा कि मैं ख़तरा हूँ, और उन्होंने मुझे बाँधकर द्वार को और कस दिया।"

"और नीचे वाला?" हकीम ने पूछा। उनकी आवाज़ बहुत धीमी थी। "वह किसने बाँधा?"

"सबसे पहले आमिल ने।"

"कौन?"

"एक सातवें आमिल ने, रुस्तम। उसका नाम ख़लील नहीं था, जैसा राजा ने समझा। वह उससे बहुत पुराना है। जो बैठा था, उसे मैं नाम से नहीं पुकारता, क्योंकि वह नाम अब किसी ज़बान में नहीं बचा।"

हकीम का चेहरा पथरा गया। उन्होंने बहुत धीमे से बुदबुदाया, "सातवाँ सिलसिला। फटा हुआ पन्ना।"

"वही।" शरर की आवाज़ भारी थी। "तीन हज़ार साल पहले उस आमिल ने इस द्वार के पीछे एक आग को बाँधा था। उसे लगा कि वह आग दुनिया के लिए ख़तरा है। उसने मुझे, जो उस आग की सबसे छोटी चिंगारी था, पहरेदार बनाकर यहाँ खड़ा किया, इस वचन के साथ कि मैं उसे कभी खोलूँगा नहीं। और फिर वह चला गया। हर पीढ़ी में उसके सिलसिले का कोई न कोई यहाँ आता रहा। सात सिलसिले, सात रखवाले, एक द्वार।"

"तो तुम्हारा वचन..."

"मैंने अपने ही पिता को क़ैद रखने का वचन दिया था, रुस्तम। और तीन हज़ार साल तक निभाया। पर आख़िर में, जब राजा ने मुझे बाँध दिया, तब मैंने पहली बार देखा कि मैं कितने दिनों से ग़लत तरफ़ खड़ा हूँ।"

मीरा ने तख़्ती हाथ में ले ली थी। उसे पता नहीं चला कि कब। वह गर्म थी, और उसके भीतर की भनभनाहट अब हड्डियों में नहीं, सीधी उसकी नब्ज़ में थी, उसी चाँदी की धार के साथ ताल मिलाती हुई।

"एक बात बताओ," उसने कहा। "अगर तुम्हारे पिता को खोलना सही है, तो आमिलों ने उसे बाँधा क्यों? क्या वह वाक़ई ख़तरनाक नहीं?"

एक लंबी चुप्पी रही। बावड़ी का पानी हल्के-हल्के घूमने लगा।

"वह ख़तरनाक है," शरर ने आख़िरकार कहा। "मैं तुमसे झूठ नहीं बोलूँगा। जब वह जागेगा तो वह रेगिस्तान को निगल जाएगा, जैसे उसने कभी समुद्र को निगला था। पर वह बुरा नहीं है। वह सिर्फ़ एक प्यास है, जिसे किसी ने कभी पानी नहीं पिलाया। उसे बाँधने वाले ने पानी की जगह दीवार दी, और तीन हज़ार साल तक दीवार के पीछे उसकी प्यास बढ़ती गई।"

"और तुम चाहते हो कि हम उसे पानी पिलाएँ," हकीम ने कहा। उनके स्वर में एक अजीब सी थकी हुई समझ थी।

"उत्तर के कुएँ का पानी वह पानी है जो उसके अपने स्रोत से आता है। उसका अपना। उसे पीकर वह शांत होगा, और जब वह शांत होगा तो वह मुझे पहचानेगा। फिर मैं उसे समझा सकूँगा कि उसे ऊपर नहीं आना। उसके बग़ैर वह कभी नहीं सो पाएगा।"

"और अगर वह तुम्हें न पहचाने?" भंवर ने तीखे स्वर में पूछा। "अगर वह बस उठे और सब कुछ निगल ले? तब?"

शरर चुप रहा।

"तब?" भंवर ने फिर कहा।

"तब कुछ नहीं बचेगा," शरर ने कहा। "मैं नहीं, तुम नहीं, यह किला नहीं, इस रेगिस्तान में कोई नहीं। पर यही तो मैं तुमसे कह रहा हूँ, भंवर। यह दाँव बहुत बड़ा है। इसीलिए मैं तुम्हें पूरा सच बता रहा हूँ।"

मीरा ने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा। फिर उसने तख़्ती को सीने से लगा लिया, और सिर उठाया। उसकी आवाज़ में एक नई चीज़ आ गई थी, कोई बहुत पुराना, भारी अधिकार, जो न उसका था न किसी और का, जैसे उसके रक्त में सदियों से बैठा कोई उसकी ज़बान से बोल रहा हो।

"मैं राजा के वंश की आठवीं रक्षक हूँ," उसने कहा। "डायरी कहती है कि मैं या तो द्वार खुला रख सकती हूँ, या बंद। मैंने अब तक यह नहीं माना था। आज मानती हूँ।" उसने साँस ली। "इसलिए मैं तुमसे एक सवाल पूछूँगी, शरर। और तुम्हें उसका सच जवाब देना होगा, क्योंकि राजा के वंश के सामने तुम बँधे हो।"

अंगारे सीधे उसकी ओर घूमे।

"पूछो।"

"जब मेरे पिता यहाँ आए, और उन्होंने तुमसे बात की, तो उन्होंने क्या माँगा था? असल में? जो तुमने मुझसे छिपाया?"

इस बार चुप्पी इतनी लंबी चली कि मीरा को लगा कि शरर जवाब नहीं देगा। पानी स्थिर हो गया। दीयों की लौ झुक गई। पीछे से कहीं रेत सरकी।

"उन्होंने कहा," शरर ने आख़िरकार कहा, और उसकी आवाज़ बहुत नीची और बहुत टूटी हुई थी, "कि द्वार मत खोलना।"

मीरा की आँखें भर आईं।

"उन्होंने कहा, 'तुम जो भी हो, तुम्हारी कहानी जो भी हो, मैं तुम्हारा दर्द समझता हूँ। पर मेरी बेटी इसकी क़ीमत नहीं चुकाएगी। मैं तुम्हें वह नहीं दूँगा जो तुम माँग रहे हो।' और मैंने उनसे कहा, 'तब तुम्हें यहीं रहना होगा।' उन्होंने जवाब दिया, 'ठीक है। मैं यहीं रहूँगा। जब तक मेरी बेटी न आए, और जब वह आए तो उसे बता देना कि उसके पिता उसे सबसे ज़्यादा इसी बात के लिए प्यार करते थे कि वह ख़ुद फ़ैसला करेगी।'"

मीरा के गाल पर आँसू गिर पड़े। उसने कुछ नहीं कहा।

"इसलिए मैंने उन्हें सुला दिया," शरर ने कहा। "जबरदस्ती नहीं। उनकी मर्ज़ी से। और जब तुम आई तो मैंने सोचा कि मैं तुम्हें झूठ न बताकर, आधा सच भी न बताकर, बस पूरा सच बता दूँ। पर तुम्हारे पिता का आख़िरी संदेश मैं कह नहीं पाया था। इसलिए अब कह रहा हूँ।"

हकीम ने मीरा के कंधे पर हल्के से हाथ रखा, जैसे कोई चुपचाप कह रहा हो कि वह अकेली नहीं है।

"तुम्हारे पास दो रास्ते हैं, बेटी। एक: तुम पानी पिलाओ, और मैं पूरी कोशिश करूँगा कि वह शांत हो जाए। दो: तुम पानी न पिलाओ, और हम सब चले जाएँ, और नीचे वाला प्यासा बैठा रहे। मैं तुम्हें नहीं रोकूँगा। मैं बँधा हूँ, पर मैंने तुमसे कोई वादा नहीं लिया है। जो चुनो, वह तुम्हारा होगा।"

"और अगर मैं न पिलाऊँ, तो वह अपने आप जाग जाएगा?"

"आज रात नहीं। शायद कल नहीं। पर एक दिन।"

"और अगर पिलाऊँ तो?"

"तो आज रात फ़ैसला होगा।"

मीरा सीढ़ियाँ उतरकर बावड़ी के किनारे तक गई। भंवर ने रोकने के लिए आगे बढ़ने की कोशिश की, पर हकीम ने उसका हाथ थाम लिया। मीरा सातवीं सीढ़ी के चबूतरे पर खड़ी हो गई, पानी के बिल्कुल ऊपर, जहाँ से उसकी अपनी परछाईं पानी की काली सतह में नहीं दिख रही थी।

उसने दोनों हाथ पानी की सतह की ओर बढ़ाए, खाली, हथेलियाँ ऊपर की ओर।

"मैं तुझे वही दूँगी जो राजा के वंश के पास है," उसने कहा। "पानी नहीं। पर कुछ ज़रूरी।"

सबकी साँस रुक गई।

मीरा ने अपनी जेब से तह किया हुआ काग़ज़ निकाला, पिता की चिट्ठी। उसने उसे खोला, एक बार पूरा पढ़ा, फिर बहुत धीरे से उसे पानी की सतह पर रखा।

चिट्ठी डूबी नहीं। वह सतह पर तैरती रही, जैसे पानी कोई ठोस चीज़ हो। और धीरे-धीरे, उसकी स्याही ऊपर उठने लगी, पन्ने से अलग होकर, हवा में तैरते हुए अक्षरों की एक पतली लड़ी बनती हुई, एक-एक शब्द जैसे किसी अदृश्य हाथ से लिखा जा रहा हो।

"मेरी गुड़िया... अगर तू यह पढ़ रही है..."

बावड़ी के भीतर वह नीली रोशनी तेज़ हुई। नीचे, बहुत नीचे, कुछ हिला।

मीरा ने पिता के शब्द फुसफुसाकर पानी को सुनाए। उसके अपने शब्द नहीं, पिता के, जो बाईस साल एक चिट्ठी में बंद रहे थे। "जो आदमी तेरे पास पानी लेकर आए, चाहे वह तेरा सबसे प्यारा क्यों न हो, उसका पानी मत पीना। और जो आदमी अपनी परछाईं के बिना आए, उसे पानी मत देना।"

पानी में एक झटका उठा। नीचे की नीली रोशनी लपककर ऊपर आई, एक पल के लिए सतह के बिल्कुल पास, और मीरा को लगा कि उसने किसी बहुत बड़ी चीज़ की आँख देखी, खुली हुई, सदियों से जागती।

"क्या कर रही हो?" शरर की आवाज़ पहली बार घबराई हुई थी।

"मैं तुम दोनों को एक बात सुना रही हूँ," मीरा ने कहा। उसके हाथ काँप रहे थे, पर आवाज़ नहीं। "मेरे पिता ने कहा था कि जो आदमी अपनी परछाईं के बिना आए, उसे पानी मत देना। तुम दोनों में से एक बिना परछाईं के आया है, और मुझे नहीं पता कि कौन। इसलिए मैं तब तक कोई फ़ैसला नहीं करूँगी जब तक मैं यह न जान लूँ।"

उसने मुड़कर सीढ़ियों के ऊपर देखा, जहाँ हकीम और भंवर खड़े थे, चाँदनी में। दोनों की परछाइयाँ पीछे की दीवार पर पड़ रही थीं।

हकीम की परछाईं में पाँच उँगलियाँ थीं। भंवर की परछाईं में उसकी पोटली का उभार था।

विजय की परछाईं कहीं नहीं थी।

मीरा ने उसकी ओर देखा। विजय, जो दीवार के पास सहमा हुआ खड़ा था, पानी से तर-बतर, उसके नंगे पैरों के पास पानी का तालाब बन चुका था। उसकी देह पर चाँदनी पड़ रही थी, पर ज़मीन पर उसके पैरों के नीचे कोई छाया नहीं थी।

"दीदी?" उसने घबराकर कहा।

"तुम मर चुके हो, विजय," मीरा ने नर्मी से कहा। "भूतों की परछाईं नहीं होती। यह मैं जानती हूँ। पर वह सबसे बड़ी बात नहीं है।"

वह आगे बढ़ी, सीढ़ियाँ चढ़ती हुई, और हकीम के पास पहुँचकर उनकी आँखों में देखा। "हकीम साहब, मुझे एक बात बताइए। उस रात जब पापा सूनगढ़ आए, और आप फाटक पर रुके, आपने कहा कि भीतर से उन्होंने आपका नाम पुकारा। 'रुस्तम भाई, मदद करो!' तीन बार।"

"हाँ।"

"और टेप में उन्होंने कहा, 'रुस्तम भाई? आप यहाँ कैसे? आपने तो वादा किया था कि भीतर नहीं आएँगे।'" मीरा ने साँस ली। "यानी उन्होंने कहा कि आप भीतर आए थे। पर आपने मुझसे कहा कि आप फाटक पर रुके।"

"मैंने अपनी बात सुधार ली थी," हकीम ने कहा। "चालीसवें दिन..."

"हाँ। चालीसवें दिन आप गए। पर टेप में विक्रम सिंह ने इकतालीसवें दिन बात की थी, और आप तब तक आ चुके थे। पर पापा के हिसाब से आप पहली बार आए थे, तभी उन्होंने आश्चर्य किया था कि आपने वादा तोड़ा।" मीरा की आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। "तो एक रात दो रुस्तम थे। एक जो फाटक पर था और भागा, और एक जो तहख़ाने में पापा के सामने बैठा।"

हकीम का चेहरा पीला पड़ गया।

"और आपने मुझे बताया कि जब आप लौट रहे थे, तो पीछे से किसी ने आपकी आवाज़ में आपको पुकारा।"

"हाँ..."

"तो यह तय है कि आपके अलावा कोई और है जो आपकी आवाज़ में बोलता है। और अब मुझे पूरा यक़ीन है कि वही आदमी है जिसकी उँगली नहीं है, जिसकी परछाईं नहीं है, जिसने जगत को पीतल की चाबी दी और मुझे वह लिफ़ाफ़ा।"

उसने गर्दन घुमाई। बावड़ी के ऊपरी सिरे पर, आँगन की ओर जाने वाले गलियारे के मुहाने पर, चाँदनी में एक चौथी आकृति खड़ी थी।

लंबा, सूखा-सा बूढ़ा। सिर पर हरी टोपी, कंधों पर हरी चादर। दाढ़ी बिल्कुल सफ़ेद। दाहिना हाथ आगे की ओर उठा हुआ, चार उँगलियाँ और अँगूठा, तर्जनी की जगह चिकना, सपाट ठूँठ।

वह बिल्कुल हकीम रुस्तम ख़ान जैसा था।

हर बाल, हर झुर्री, हर तिल।

मीरा के पास खड़े हकीम ने भी उसे देखा, और उनके होंठों से एक अजीब सी, बुदबुदाती आवाज़ निकली, जैसे कोई बाईस साल बाद अपने आईने में अपना चेहरा पहचान रहा हो।

और उस मुहाने पर खड़े आदमी ने मुस्कुराकर कहा, हकीम की ही आवाज़ में, बिल्कुल उसी लहजे में:

"मैं यहाँ हूँ, मीरा बेटी। इस बूढ़े ने जो कुछ कहा, उसमें से क्या सच था, यह अब पूछने का वक़्त है।"

Writer
firoj saifi
Story
रेत का क़ैदी
Chapter
13 of 30
Category
Jinn & Spirits
Reading time
14 min
Words
2615
Language
Hindi (हिंदी)
Price
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