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एपिसोड 14: दो हकीम

firoj saifi · Jinn & Spirits · 14 मिनट

एक ही चेहरा, दो जगह।

मीरा बावड़ी की सीढ़ी पर खड़ी थी। उसके दाईं ओर एक क़दम की दूरी पर हकीम रुस्तम ख़ान साँस रोके खड़े थे, और ठीक सामने, सीढ़ियों के ऊपरी मुहाने पर, चाँदनी में नहाया हुआ बिल्कुल वही आदमी खड़ा था। वही हरी टोपी, वही बर्फ़ जैसी सफ़ेद दाढ़ी, वही माथे की तीन गहरी लकीरें। फ़र्क़ बस इतना था कि ऊपर वाले की आँखें शांत थीं, और नीचे वाले की आँखें डरी हुई।

भंवर ने रेत की पोटली सीने से भींच ली और आधा क़दम पीछे हट गया। विजय ने मीरा की कुर्ती का किनारा थाम लिया। उसके भीगे हाथ से कपड़ा तर हो गया, पर मीरा ने उसे छुड़ाया नहीं।

"कौन हो तुम?" भंवर ने गला साफ़ करके पूछा। उसकी आवाज़ भारी थी और उसमें ग़ुस्सा कम, बेबसी ज़्यादा थी।

ऊपर वाले आदमी ने थकी हुई, नरम मुस्कान के साथ कहा, "वही जो चार दिन से तुम्हारे साथ चल रहा है, भंवर। वही जिसने तुम्हारी बीमार माँ की नब्ज़ पकड़ी थी, जिसने जगत के जाने के बाद तुम्हारे गले में ताबीज़ बाँधा था। तुम मुझे बीस साल से जानते हो।"

यह हकीम की आवाज़ थी। हर उतार, हर ठहराव, बात के बीच वह छोटी सी खाँसी, सब कुछ वही। नीचे खड़े हकीम का चेहरा राख हो गया।

"यह झूठ है," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ फट रही थी, जैसे किसी ने गले में रेत भर दी हो। "भंवर, बेटी, यह झूठ है। यह मैं नहीं हूँ। मैं..."

"देखो, कितनी जल्दी घबरा जाता है," ऊपर वाले ने उसी शांति से कहा। "मैं बाईस साल से इस घड़ी का इंतज़ार कर रहा था, और मैं जानता था कि यह आएगी। इसलिए मैं तैयार हूँ, और यह नहीं है।"

मीरा ने दोनों के बीच नज़र घुमाई। उसके भीतर एक ठंडा, साफ़ हिसाब चल रहा था। यह वही हिसाब था जो वह खुदाई की जगह पर तब लगाती थी जब दो परतों में से यह तय करना होता कि कौन सी असली है और कौन सी बाद में डाली गई। वहाँ उसने सीखा था कि जल्दबाज़ी से ज़्यादा झूठ पत्थर के नीचे कुछ नहीं दबाता।

उसके पास समय कम था। आसमान के बीच खड़ा चाँद हर पल सिर के और क़रीब आ रहा था। चाँदनी बावड़ी के पानी में सीधी उतरने लगी थी, और नीचे की नीली चमक उसके साथ-साथ धीरे-धीरे ऊपर सरक रही थी।

"ठीक है," उसने कहा। "दोनों वहीं रुकिए जहाँ हैं। जो भी हिलेगा, मैं उसी को नक़ली मानूँगी।"

उसने जेब से तख़्ती निकाली और अपनी नब्ज़ पर बहती चाँदी की धार के पास रखी। भनभनाहट दोनों हाथों में एक साथ उठी, इतनी तेज़ कि उसकी उँगलियाँ सुन्न होने लगीं।

"मैं तीन सवाल पूछूँगी," उसने कहा। "सिर्फ़ तीन। जिसका जवाब पूरा और सच्चा होगा, वही असली होगा।"

"यह कोई सबूत नहीं है, बेटी," ऊपर वाले ने कहा। उसकी आवाज़ में अब भी वही अपनापन था। "जो आदमी मेरी आवाज़ बना सकता है, वह मेरी यादें भी सुन सकता है। मैं तुम्हें ऐसी कसौटी नहीं बताता जिस पर जिन्न जीत जाए।"

"तो मैं ऐसी कसौटी बनाऊँगी जिसे जीता न जा सके," मीरा ने कहा। "पहला सवाल। हकीम साहब, आपके उस्ताद ने आपकी तर्जनी काटने से पहले आपसे कौन सा वचन दिलवाया था? ठीक उन्हीं शब्दों में।"

दोनों ने एक साथ मुँह खोला।

नीचे वाले ने काँपती आवाज़ में कहा, "उन्होंने कहा था, 'रुस्तम, आज से तू किसी की तरफ़ उँगली नहीं उठाएगा। सिर्फ़ उसकी तरफ़ जो बंद के दूसरी ओर है।'"

ऊपर वाले ने उसी पल कहा, “'तू बंद का पहरेदार नहीं, बंद की कड़ी है। कड़ी टूटे तो बंद टूटे।'”

दोनों ने एक-दूसरे को देखा। नीचे वाले की आँखों में हैरानी थी। ऊपर वाले की आँखों में एक हल्की सी चमक कौंधी, जैसे कोई चाल सही पड़ी हो।

"तुमने मेरे दिल में दबा वचन उठाया है," नीचे वाले ने फुसफुसाकर कहा। "वह तो मैंने कभी किसी को नहीं सुनाया।"

"और उसे थोड़ा सुंदर भी कर दिया," ऊपर वाले ने मुस्कुराकर कहा। "तुम्हारे उस्ताद के शब्द कभी इतने गढ़े हुए नहीं थे, रुस्तम। उन्होंने सीधे-सादे शब्दों में कहा था, 'अब तू अकेला रखवाला है।' बस इतना।"

नीचे वाले हकीम के होंठ हिले। बहुत देर बाद उन्होंने धीमे से कहा, "हाँ। यही कहा था।"

मीरा का दिल बैठ गया। यह बात सिर्फ़ असली हकीम को पता होनी चाहिए थी। पर दोनों ने उसे जाना था, और ऊपर वाले ने उसे बिना किसी झिझक के बोला था। जब कोई बात बिना झिझक के बोली जाती है तो वह या तो बहुत सच्ची होती है, या बहुत रटी हुई।

क्या दोनों सच बोल रहे हैं? या एक सच है, और दूसरा सच की नक़ल?

"दूसरा सवाल," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ में अब हल्की सी थकान थी, पर वह सीधी खड़ी रही। "तीन दिन पहले जैसलमेर के बाज़ार में, आपकी दुकान पर, मैंने आपसे चाय पीते हुए क्या पूछा था? और आपने क्या जवाब दिया था?"

नीचे वाले हकीम ने कहा, "तुमने पूछा था कि सूनगढ़ तक जाने का सबसे सुरक्षित रास्ता कौन सा है। मैंने कहा था कि कोई रास्ता सुरक्षित नहीं, पर सबसे कम बुरा वह है जो रात में चलकर सुबह पहुँचे।"

ऊपर वाले ने शांति से कहा, "तुमने पूछा था, 'क्या आप मेरे पिता को जानते थे?' और मैंने तुम्हारी आँखों में देखकर कहा था, 'नहीं।'"

मीरा का चेहरा पथरा गया।

यह बात बिल्कुल सच थी। उसे ख़ुद याद थी। वह छोटी सी दुकान, जड़ी-बूटियों की महक, काँच की बरनियाँ, और बूढ़े हकीम की वह नज़र जो एक पल के लिए चाय के प्याले पर झुक गई थी। उसने तब सोचा था कि वह बस बात टाल रहे हैं। आज रात पहली बार उसे साफ़ दिखा कि वह एक सीधा, लंबा झूठ था, जो उसके पिता के नाम पर बोला गया था।

और अभी उसने जो सवाल पूछा था, उसका जवाब नीचे वाले ने वह दिया जो उसे सुरक्षित लगा। उसने रास्ते वाली बात बताई, जबकि बाक़ी हर चीज़ से ज़्यादा ज़रूरी बात वह थी जिसके लिए वह शर्मिंदा था। जिसने उस शर्म को भी जस का तस बता दिया, वह या तो हकीम से भी ज़्यादा सच्चा था, या हकीम की रूह के बहुत भीतर तक झाँक चुका था।

"तुमने एक बात छुपाई थी," मीरा ने धीरे से नीचे वाले हकीम से कहा। "और इसने उसे बाहर रख दिया।"

"मैंने तुम्हें बाद में बता दिया था," नीचे वाले ने कमज़ोर आवाज़ में कहा। "चार दिन बाद। जब तुमने ख़ुद..."

"जब मैंने ख़ुद पूछा।" मीरा ने सिर हिलाया, पर उसके भीतर कुछ सुलग रहा था। "पर यह भी सच है कि जो आदमी तुम्हारी ग़लतियाँ सबसे ज़्यादा जानता है, वह तुम्हारा सबसे क़रीबी दोस्त हो सकता है, या तुम्हारा सबसे ख़तरनाक दुश्मन।"

ऊपर वाला हल्के से मुस्कुराया। "बहुत ख़ूब, बेटी। तुम सचमुच अपने पिता की बेटी हो।"

मीरा की साँस एक पल को रुक गई।

उस वाक्य में कुछ था। हकीम की आवाज़ के पीछे, बहुत धीमी, बहुत दबी हुई, एक और आवाज़ थी, जानी-पहचानी, गर्म और भारी। जैसे कोई पुराना गाना दीवार के उस पार किसी दूसरे रेडियो पर बज रहा हो। उसने उसे पकड़ने की कोशिश की, पर वह एक पल में ग़ायब हो गई।

उसके कंधे के पास विजय ने हल्के से फुसफुसाकर कहा, "दीदी, इनमें से एक के पास से कुएँ के पानी की महक आ रही है। नीचे वाले कुएँ की। ऊपर वाले के पास से।"

मीरा ने बिना सिर घुमाए धीरे से पूछा, "पक्का?"

"मुझे सब महकें पहचानने आती हैं, दीदी। तीन सौ साल से मैं सिर्फ़ महकों से ही दुनिया को जानता हूँ।"

"तीसरा इम्तिहान सवाल का नहीं है," मीरा ने कहा। उसने भंवर की ओर मुड़कर इशारा किया। "भंवर जी, आपके भाई की रेत।"

भंवर ने एक पल को झिझककर पोटली की ओर देखा। फिर उसने गाँठ खोली और हथेली पर चुटकी भर रेत उठाई। रेत चाँदनी में हल्की सुनहरी चमकी, किसी जीवित चीज़ की तरह।

"विजय ने कहा था कि यह रेत उसे नहीं आने देती," मीरा ने कहा। "जगत की रेत किसी भी ऐसी चीज़ को पास नहीं आने देती जो पानी से बनी हो। भंवर जी, इस सीढ़ी पर एक लकीर खींचिए। दोनों के बीच।"

भंवर ने झुककर सीढ़ी के पत्थर पर रेत की एक पतली, सुनहरी लकीर खींच दी, जो नीचे वाले हकीम को ऊपर वाले से अलग करती थी।

"अब दोनों इस लकीर को एक साथ पार करेंगे," मीरा ने कहा। "जिसके पैर लकीर के पार जाएँगे और वह बिना कुछ हुए खड़ा रहेगा, वह हम में से एक है। जिसे लकीर रोकेगी, वह नहीं।"

नीचे वाले हकीम ने बिना एक पल गँवाए आगे क़दम बढ़ाया। उनके चेहरे पर एक अजीब सी राहत थी, जैसे कोई बरसों बाद सच साबित करने का मौक़ा पा रहा हो। उन्होंने लकीर के ऊपर पैर रखा, और लकीर ने उनके पैर को चूम लिया। रेत की चमक एक पल को थोड़ी तेज़ हुई, और फिर शांत हो गई। उनके पैर के नीचे कुछ नहीं हुआ।

ऊपर वाला हकीम अपनी जगह पर खड़ा रहा। न आगे बढ़ा, न पीछे हटा। उसकी आँखों में पहली बार एक छोटी सी, बहुत तेज़ झलक आई, जैसे किसी ने उसके ऊपर रोशनी फेंक दी हो।

"तुम क्यों रुके?" मीरा ने पूछा।

"क्योंकि मैं एक बूढ़े आदमी के दुख को तमाशा नहीं बनाना चाहता," ऊपर वाले ने कहा। उसकी आवाज़ में अब हल्की सी धार थी। "यह रेत तुम्हारे भंवर के भाई की है, और उसकी रूह की याद है। मैं उसे पार करूँ तो उसे दर्द होगा, और भंवर को भी। मैं यह नहीं करूँगा।"

"तो तुम पार नहीं करोगे।"

"मैं पार करूँगा, बेटी, अगर तुम्हें सच्चा सबूत चाहिए।" उसने एक क़दम बढ़ाया। लकीर से ठीक पहले उसका पैर रुका, और उसके होंठ पतले हो गए। "पर पहले तुम मुझे एक बात बताओ। जो आदमी इतनी चतुराई से सब कुछ तौलता है, क्या वह यह नहीं देख पा रहा कि पिछले एक घंटे में उसके अपने कक्ष में क्या हो रहा है?"

मीरा का दिल एक पल को धड़कना भूल गया।

"क्या कहा तुमने?"

ऊपर वाले ने कुछ नहीं कहा। उसकी नज़र किले की ओर थी, शाही कक्ष की दिशा में। मीरा ने भी सिर घुमाया।

और तभी वह चीख़ सुनाई दी।

कबीर की चीख़। इतनी तेज़, इतनी कच्ची, कि पूरे किले की दीवारों से टकराकर लौटी और रेत के ऊपर से बहती हुई बावड़ी तक पहुँची।

"दी! पापा... पापा!"

मीरा ने एक पल भी नहीं गँवाया। वह सीढ़ियाँ चढ़ती हुई दौड़ पड़ी। भंवर उसके पीछे लपका। विजय हवा की तरह ऊपर निकल गया, उसके नंगे पैर पत्थर पर गीले निशान छोड़ते हुए। पीछे दोनों हकीम एक पल के लिए अपनी-अपनी जगह जमे रहे, फिर दोनों ने एक साथ दौड़ लगाई। उनके क़दमों की आवाज़ भी एक सी थी।

मीरा को दौड़ते हुए भी एक बात दिख गई, और वह उसके दिल में काँटे की तरह बैठ गई। सामने की दीवार पर चाँदनी में हकीमों की परछाइयाँ पड़ रही थीं। एक की परछाईं में पाँच उँगलियाँ साफ़ दिख रही थीं। दूसरे के पीछे दीवार पर सिर्फ़ ख़ाली, पीली चाँदनी थी, कोई परछाईं नहीं।

पर वह नज़ारा सिर्फ़ एक साँस भर टिका। अगले मोड़ पर चाँदनी की दिशा बदल गई, और जब वे कक्ष के गलियारे में पहुँचे तो दोनों के पीछे धुँधली सी कुछ-कुछ छायाएँ फैल गईं। मीरा को अब ठीक से याद नहीं रहा कि किसकी कौन सी थी। उसने ख़ुद को कोसा, और दौड़ती रही।

शाही कक्ष का दरवाज़ा खुला पड़ा था।

कबीर के चारों ओर भंवर की रेत की लकीर एक जगह से टूटी हुई थी, जैसे किसी ने भीतर से बाहर की ओर पैर घसीटकर चलाया हो। नमक की तिहरी रेखा बिखरी पड़ी थी। चाँदी की कीलें चौखट से उखड़कर कोनों में फेंकी हुई थीं, और उनमें से हर एक काली, जली हुई, राख की तरह।

कबीर कक्ष के बीच में घुटनों के बल बैठा था। उसके हाथ ख़ाली थे और वह सिर से पाँव तक काँप रहा था। उसके चेहरे पर आँसू बह रहे थे, और उसकी आँखें दरी पर लेटे हुए शरीर पर जमी थीं।

विक्रम सिंह की देह वहीं थी, पर उसमें कुछ बदल गया था।

अब तक उनकी साँस एक मिनट में चार बार चलती थी। अब उनकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी, मानो किसी ने उन्हें गहरी नींद से झटके में खींच लिया हो। उनकी आँखें बंद थीं पर पलकों के नीचे पुतलियाँ बेचैनी से भाग रही थीं। उनके होंठ हिल रहे थे, किसी एक शब्द को बार-बार बुदबुदाते हुए, और उनके गले की नसें रस्सियों की तरह उभर आई थीं। पूरा बदन किसी ज्वर की तरह थरथरा रहा था।

मीरा ने झपटकर पिता का हाथ थाम लिया। वह बर्फ़ जैसा ठंडा था, और उसकी हर उँगली अकड़ी हुई।

"कबीर, क्या हुआ? बताओ मुझे!"

"मुझे नहीं पता, दी!" कबीर रो रहा था, उसकी आवाज़ टूट-टूटकर निकल रही थी। "मैं यहीं बैठा था। पापा का हाथ पकड़े। रेत की लकीर के बीच। बस एक पल को मेरी आँख लगी, और जब खुली तो दरवाज़ा खुला था, लौ बुझ चुकी थी, और..." वह रुका, उसने काँपते हाथ से कमरे के कोने की ओर इशारा किया।

कोने में पानी की कैनें पड़ी थीं। नमक के घेरे के बीच रखी चार कैनें, जो मीरा ने सुबह उत्तर के कुएँ से भरी थीं। अब तीन ख़ाली और लुढ़की हुई थीं। चौथी का ढक्कन खुला पड़ा था, और फ़र्श पर पानी की पतली, चमकती धाराएँ दरवाज़े की ओर बह रही थीं।

जहाँ-जहाँ पानी बहा था, कक्ष का पत्थर काला पड़ता जा रहा था, जैसे किसी ने उस पर स्याही उँडेल दी हो।

"किसने गिराया यह पानी?" मीरा ने साँस रोककर पूछा।

कबीर ने मुँह खोला, फिर बंद कर लिया। उसकी आँखें धीरे-धीरे दीवार की ओर उठीं। मीरा ने उसकी नज़र का पीछा किया।

दीवार पर कबीर की परछाईं पड़ी थी। पर वह उसके घुटनों पर झुके शरीर की परछाईं नहीं थी। वह खड़ी थी, सीधी, पूरी ऊँचाई में, छत को छूती हुई। उसका एक हाथ आगे बढ़ा हुआ था, और उसकी उँगलियाँ अब भी कैनों की ओर इशारा कर रही थीं, जैसे कोई जी भरकर पी चुका आदमी प्याला नीचे रखने के बाद भी होंठ चाट रहा हो।

"वह ख़ुद..." कबीर की आवाज़ बैठ गई। "मैं हिल भी नहीं सका, दी। मैं बस देखता रहा। वह दीवार से अलग हुई, कैन उठाई, पूरा पानी पिया। फिर बाक़ी सब गिरा दिया। मेरे अपने हाथ अपनी जगह जमे हुए थे। मैं चीख़ना भी चाहता था, पर गला बंद हो गया था।"

मीरा ने भाई के कंधे पर हाथ रखा। वह भी बर्फ़ की तरह ठंडा था।

हकीम कक्ष के दरवाज़े पर पहुँच चुके थे, दोनों। उनमें से एक, नीचे वाला, तुरंत आगे बढ़कर कबीर के पास घुटनों पर बैठ गया और उसकी नब्ज़ टटोलने लगा। उसके चेहरे पर सच्ची, गहरी चिंता थी, किसी बाप जैसी। उसका हाथ काँप रहा था।

दूसरा, ऊपर वाला हकीम, दरवाज़े पर ही खड़ा रहा। उसकी आँखें दीवार पर खड़ी उस परछाईं पर जमी थीं, और उन आँखों में कोई डर नहीं था। मीरा ने ग़ौर से देखा। उनमें संतुष्टि थी, वही संतुष्टि जो उस इंसान के चेहरे पर होती है जिसकी चाल आख़िर में सही पड़ गई हो।

और मीरा को सब समझ में आ गया।

"तुम्हीं ने किया," उसने कहा।

ऊपर वाले हकीम ने सिर घुमाया। उसकी मुस्कान अब थोड़ी बदल गई थी। उसमें से हकीम की वह झिझक, वह बाईस साल की झुकी हुई शर्मिंदगी, सब हट चुकी थी। जो बचा था वह एक चिकनी, चौड़ी, ख़ाली मुस्कान थी, ठीक वैसी जैसी बोतल में कबीर के चेहरे पर दिखी थी, जबड़े के किनारों तक फैली हुई।

"हाँ, मीरा बेटी," उसने कहा। उसकी आवाज़ अब हकीम की नहीं रही थी। वह किसी ऐसे आदमी की आवाज़ थी जो बहुत दूर से बोल रहा हो, और जिसके हर शब्द के नीचे पानी की ठंडी लहरें चलती हों। "मैंने कहा था न, यह पूछने का वक़्त आ गया है कि इस बूढ़े ने जो कुछ कहा, उसमें से क्या सच था।"

उसने अपना दाहिना हाथ उठाया और सीधा नीचे वाले हकीम की ओर इशारा किया। चार उँगलियाँ, एक अँगूठा, और तर्जनी की जगह चिकना, सपाट ठूँठ।

"यह कभी बंद का रखवाला नहीं था।"

कक्ष में सन्नाटा छा गया। नीचे वाला हकीम कबीर की नब्ज़ छोड़कर धीरे-धीरे खड़ा हुआ। उसके होंठ सूखे थे। उसने बोलने की कोशिश की, पर आवाज़ नहीं निकली।

दीवार पर खड़ी परछाईं ने एक हाथ उठाया, और उसी इशारे में अपनी उँगली नीचे वाले हकीम की ओर तान दी।

Writer
firoj saifi
Story
रेत का क़ैदी
Chapter
14 of 30
Category
Jinn & Spirits
Reading time
14 min
Words
2665
Language
Hindi (हिंदी)
Price
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