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एपिसोड 15: जो रुका

firoj saifi · Jinn & Spirits · 13 मिनट

इल्ज़ाम हवा में लटका रहा।

कक्ष की लालटेन बुझ चुकी थी, और अब सिर्फ़ चाँदनी रोशनदान से टेढ़ी होकर फ़र्श पर गिर रही थी। उसी चाँदनी में नीचे वाले हकीम का चेहरा सफ़ेद काग़ज़ जैसा लग रहा था। उनके होंठ काँपे, और उन्होंने बहुत धीमी आवाज़ में कहा, "बेटी, मैं तुम्हें क़सम देकर कुछ नहीं कह सकता। मेरी क़सम का कोई वज़न नहीं रहा। पर मैं इतना कहता हूँ कि मेरे हाथ की यह नीली बूँद सच्ची है।"
उन्होंने अपना दाहिना हाथ मीरा की ओर बढ़ाया। ठूँठ के ऊपर, चमड़ी के नीचे, पानी की एक बूँद का नीला गोदना चाँदनी में हल्के-हल्के दमक रहा था। मीरा ने झुककर उसे देखा। जब उसने तख़्ती उसके पास रखी तो तख़्ती की भनभनाहट एक क्षण को ठहर गई, जैसे वह किसी पुराने साथी को पहचान रही हो।
"यह मेरी पहचान है," हकीम ने कहा। "दूसरे के हाथ पर भी यही निशान होगा, क्योंकि जो मेरे दिल से वचन उठा सकता है, वह मेरी चमड़ी भी बना सकता है। मुझे सिर्फ़ एक चीज़ नहीं पता कि वह क्या नहीं बना सकता।"
"वह क्या है?" मीरा ने पूछा।
"मेरी भूल।"
ऊपर वाला आदमी हल्के से हँसा। वह हँसी हकीम की भी नहीं रही थी। उसमें कई परतें थीं, सबसे ऊपर एक बूढ़े की खनक, उसके नीचे किसी और की गहरी गूँज, और सबसे नीचे जैसे पानी की सतह का हल्का सा हिलना। "भूल? तुमने तो अपनी भूलों की बाईस साल की क़तार बना रखी है, रुस्तम। तुम्हारे लिए भूल कोई नई बात नहीं। तुमने पहली भूल की जब तुमने जाना कि सातवें सिलसिले का पन्ना फटा है, और चुप रहे। दूसरी तब की जब विक्रम सिंह को सच बता दिया, और तीसरी तब की जब तुम फाटक से भाग गए। मैं तो बस तुम्हारी सब भूलों का गवाह हूँ।"
"तुम गवाह नहीं हो," भंवर ने गरजकर कहा। उसकी मुट्ठी में रेत की पोटली थी, और उसकी आँखें जल रही थीं। "तुम वही हो जिसने जगत को सूनगढ़ भेजा। तुम वही हो जो भेस बदलकर मेरे घर आया था, और बीस साल से मेरे साथ बैठा रहा।"
"बीस साल नहीं," ऊपर वाले ने सिर हिलाकर कहा, "तीन महीने। असली रुस्तम तुम्हारे साथ बीस साल रहा। मैंने बस तीन महीने उसकी जगह ली, जब तुमने उसे जैसलमेर में सूनगढ़ चलने के लिए मनाया था।"
भंवर के मुँह से एक दबी हुई गुर्राहट निकली।
"तो तुमने मान लिया?" मीरा ने ठंडे स्वर में कहा।
"मैंने कब इनकार किया?" ऊपर वाला मुस्कुराया। "मैंने कहा था कि यह पूछने का वक़्त है कि इस बूढ़े ने क्या सच कहा था। मैंने यह नहीं कहा था कि मैं रुस्तम हूँ।"
बाहर आसमान में चाँद अब ठीक सिर के ऊपर था। उसकी रोशनी रोशनदान से सीधी उतरकर कक्ष के बीचोंबीच एक चमकता हुआ गोल घेरा बना रही थी, और उसी घेरे के भीतर विक्रम सिंह की तड़पती हुई देह पड़ी थी।
मीरा का ध्यान उनकी ओर चला गया। उनके होंठ अब भी हिल रहे थे। उसने झुककर कान लगाया, और अब पहली बार शब्द सुने जा सकते थे, टूटे-टूटे, जैसे कोई बहुत गहरे कुएँ की तली से बोल रहा हो।
“...रुस्तम... भाई... रुस्तम...”
"पापा, मैं यहीं हूँ," मीरा ने रुँधी आवाज़ में कहा। "मीरा। आपकी गुड़िया।"
“...पानी... मत... पीना...”
"नहीं पी रही, पापा।"
“...वह... वह रुस्तम नहीं है...”
कमरे में हर आदमी के बदन में बिजली दौड़ गई।
विक्रम की पलकों के नीचे पुतलियाँ अचानक स्थिर हुईं। फिर, एक भारी, लंबी साँस के साथ, उनकी आँखें खुल गईं।
वे भूरी थीं। घनी भौंहों के नीचे, थकी हुई, बाईस साल की नींद में डूबी हुई, पर साफ़। उन्होंने पहले छत देखी, फिर चाँदनी का गोल घेरा, फिर धीरे-धीरे अपना सिर घुमाया और सबसे पहले अपनी बेटी का चेहरा देखा।
"मीरा..." उनके होंठों से एक टूटी हुई, भीगी हुई फुसफुसाहट निकली। "तू आ गई।"
मीरा ने उनका हाथ पकड़ा और अपने गाल से लगा लिया। वह रोने से ज़्यादा हँस रही थी, पर हँसी के नीचे साँस नहीं थी। "हाँ, पापा। मैं आ गई।"
"मैंने कहा था... तू मत आना..." विक्रम ने काँपती मुस्कान के साथ कहा। "पर तू कभी नहीं सुनती।"
"नहीं सुनती," मीरा ने रोते हुए कहा। "आपकी बेटी हूँ।"
कबीर ने उनके दूसरे हाथ को दोनों हथेलियों में भींच लिया, और वह बच्चे की तरह सिसक पड़ा। विक्रम ने उसकी ओर आँखें घुमाईं, और उनके चेहरे पर एक ऐसी कोमलता उतरी जिसने कमरे की हवा तक नरम कर दी। "कबीर। मेरा शेर।"
"पापा..." बस इतना ही कबीर कह पाया।
हकीम का दिल जैसे किसी ने मुट्ठी में जकड़ लिया हो। वे दो क़दम पीछे हट गए। उनके पाँव दीवार से टकराए, और उन्होंने आँखें बंद कर लीं, क्योंकि उनके भीतर वह चेहरा खुल गया था जिसे उन्होंने बाईस साल तक अपनी ग़लतियों के पीछे छिपाकर रखा था।
विक्रम की नज़र कमरे में घूमी। वह भंवर पर रुकी, फिर विजय पर, जो दरवाज़े पर पानी से तर, सहमा हुआ खड़ा था। उसने बच्चे की ओर देखा और कुछ पल देखता रहा, और उसकी आँखों में एक गहरा दुख उतर आया। फिर उसकी नज़र नीचे वाले हकीम पर गई।
"रुस्तम भाई," उसने कहा। उसकी आवाज़ में बाईस साल का बोझ भी था, और बाईस साल का प्यार भी। "तुम आ गए।"
नीचे वाले हकीम की आँखों से आँसू बह निकले। वे घुटनों के बल गिर पड़े, और उन्होंने विक्रम का दूसरा हाथ चूम लिया। "मुझे माफ़ कर दो, विक्रम। मैं... मैं तुम्हें छोड़कर भाग गया था..."
"तुम नहीं भागे थे," विक्रम ने धीमे से कहा। "वह पहली रात, फाटक पर, तुम्हारी आवाज़ मैंने सुनी थी। पर वह तुम नहीं थे। असली रुस्तम ने मुझे कभी 'मदद करो' नहीं पुकारा था। वह मुझे पुकारने वाला आदमी नहीं था।"
सबकी नज़रें एक साथ दरवाज़े की ओर गईं।
ऊपर वाला हकीम अब भी वहीं खड़ा था। उसकी मुस्कान पहली बार हिली थी, किनारे से सूखकर।
"तुम जानते हो, ख़लील," विक्रम ने कहा।
उसने उठने की कोशिश की। मीरा और कबीर ने उसे सहारा दिया, और वह दीवार से पीठ टिकाकर बैठ गया। उसका चेहरा पीला था, पर उसकी आवाज़ अब साफ़ हो चुकी थी, और उसमें वह पुराना, पढ़ाने वाले की सी ठहरी हुई धार लौट आई थी।
"तुम जानते हो मैंने तुम्हें पहचान लिया था। इकतालीसवें दिन से पहले ही। जब तुमने मेरे सामने बैठकर हकीम की आवाज़ में बात की, और मैंने देखा कि जब तुम बोलते हो तो तुम्हारी साँस बाहर नहीं आती। भाप नहीं बनती। उस ठंडी रात में भी नहीं।"
ऊपर वाला हकीम उसी तरह खड़ा रहा, पर उसकी आँखें अब धुँधली हो रही थीं, जैसे उनके पीछे कुछ बदल रहा हो।
"ख़लील?" मीरा ने फुसफुसाकर कहा। "वह नाम तो राजा की डायरी में था। सातवाँ आमिल, जो भाग गया।"
"राजा ने वही नाम लिखा जो उसने सुना," विक्रम ने कहा। उसके गले से खाँसी की धीमी, भारी आवाज़ निकली। "पर मैंने इन इकतालीस दिनों में, जब मैं रात-रात भर इन दीवारों के बीच जागता रहा, कुछ और समझा। मौलाना ख़लील उस रात भागा नहीं था। वह मर गया था। नीली बावड़ी की सातवीं सीढ़ी पर, बाक़ी छह के सामने, जब वे जिन्न को बाँध रहे थे। किसी ने उसके ठीक पीछे से उसका गला दबा दिया था, और छहों आमिल अपनी साधना में इतने डूबे थे कि किसी ने देखा तक नहीं।"
हकीम की साँस रुक गई।
"वह जो रुका था, 'छह बैठे, एक रुका', वह ख़लील नहीं था। वह वह था जिसने ख़लील की जगह ली, उसकी चटाई पर बैठा, उसके हाथ का निशान दीवार पर नहीं छोड़ा, और सुबह होने से पहले ग़ायब हो गया। आमिलों ने समझा कि सातवाँ भाग गया। राजा ने भी। सिर्फ़ एक जानता था कि सच क्या है।"
"कौन?" भंवर ने पूछा।
"जिसने ख़लील को मारा था। और जो आज तक इस किले में रुका हुआ है।" विक्रम की आँखें दरवाज़े पर टिक गईं। "तुम्हारा कोई नाम नहीं है, है न? उस रात तुमने ख़लील का नाम पहना, पर वह तुम्हें कभी फिट नहीं हुआ। तुम्हारा असली नाम वह है जो तुमने इसलिए छोड़ दिया क्योंकि उसके साथ एक वचन जुड़ा था।"
ऊपर वाले आदमी ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया। हकीम की दाढ़ी, हकीम की टोपी, हकीम की झुर्रियाँ, सब एक साथ धुँधली पड़ने लगीं, जैसे सुबह की धुँध में पेड़ की आकृति मिटती है। उसका चेहरा चिकना होता गया, फिर पिघलता गया, और फिर अचानक एक चेहरा उभरा जो न जवान था न बूढ़ा, न दाढ़ी वाला न सफ़ाचट। एक ऐसा चेहरा जिसे आप सौ बार देखें तो भी याद नहीं रख पाएँगे, सिवाय उसकी आँखों के, जो बहुत पुरानी और बहुत भूखी थीं।
"तुम बहुत चतुर थे, विक्रम," उसने कहा। उसकी आवाज़ अब सिर्फ़ उसकी अपनी थी, और वह आवाज़ पानी जैसी थी। उसमें न कोई उम्र थी, न कोई लहजा। "इसीलिए मैंने तुम्हें सुलाया, मारा नहीं।"
"तुमने मुझे सुलाया नहीं," विक्रम ने कहा। "मैंने ख़ुद नींद चुनी थी। ताकि तुम मेरी आवाज़ और मेरी बेटी की याद का इस्तेमाल न कर सको। तुम बाईस साल से मेरी आवाज़ की नक़ल करते रहे, पर मेरी नींद में तुम घुस नहीं सके।"
मीरा के मन में एक बिजली कौंधी। एपिसोड 14 की वह धीमी, पर जानी-पहचानी आवाज़, जो हकीम की आवाज़ के पीछे छिपी थी। वह पापा की थी। यह वही था जिसने बाईस साल पापा की आवाज़ चुराकर रखी थी।
"तो यह नाटक यहीं ख़त्म हुआ।"
शरर की आवाज़ गुंबद की तरह कक्ष में उतरी। चाँदनी के गोल घेरे के ऊपर धुएँ और अंगारों की एक विशाल आकृति बन रही थी, और उसकी आँखों की जगह दहकते लाल अंगारे कमरे के बीच खड़े उस चेहरे पर टिके थे।
"तुम्हें देखकर मुझे तीन हज़ार साल पुराना ज़ख़्म याद आ गया," शरर ने कहा। उसकी आवाज़ में न मिठास थी, न थकान, सिर्फ़ ठंडा, साफ़ क्रोध। "तुम वही हो जिसने उस आमिल को मारा था जिसने मेरे स्वामी को बाँधा था।"
विक्रम की आँखें चौड़ी हो गईं। "मतलब... सात आमिलों के भी पहले का..."
"पहला सातवाँ," शरर ने कहा। "जिसने मेरे स्वामी को बाँधा, वह भी अपने बाद एक शिष्य छोड़ गया था। उसका शिष्य, इस ख़ामोश सेवक का नाम, जो उसके सामने था और उसका हाथ बाँट रहा था। उसने अपने गुरु के मरने की रात उसे मार दिया था, ताकि वह बंधन की अकेली कुंजी बन जाए, और उसी दिन से वह हर बंधन के पीछे छाया की तरह खड़ा रहा।"
"छाया," भंवर ने बुदबुदाया। "इसीलिए इसकी परछाईं नहीं।"
"क्योंकि उसने अपनी परछाईं बहुत पहले बेच दी थी," शरर ने कहा। "और उसे ख़रीदा था मेरे स्वामी ने। यह चेहरा विहीन आदमी उसी का आख़िरी सेवक है। वह बंधन का कभी रखवाला नहीं था, बेटी। वह बंधन का सेंधमार था।"
मीरा की समझ में सब कुछ एक साथ बैठ गया। टुकड़े जुड़ते चले गए।
तीन हज़ार साल पहले एक आमिल ने आग को बाँधा। उसके शिष्य ने उसे मार दिया, ताकि वह बंधन के भीतर से उसे खोल सके। सात आमिलों के सिलसिले बने, पर हर बार जब कोई सिलसिला बंधन को मज़बूत करने जाता, यह आदमी उसके ठीक पीछे बैठा होता, गला दबाने के लिए, या आवाज़ चुराने के लिए। पाँचवें सिलसिले का आख़िरी रखवाला हकीम रुस्तम था, और वह सिलसिला भी इसी के हाथों कमज़ोर पड़ता चला गया।
"तो तुम सब कुछ जानते थे," उसने नीचे वाले हकीम से कहा। "पर तुमने सिर्फ़ आधा बताया।"
"मैं सिर्फ़ आधा जानता था," हकीम ने सिर झुकाकर कहा। "सातवें पन्ने के फटने की बात मैंने तुम्हें बताई। पर फाड़ने वाले का नाम मुझे नहीं पता था।"
चेहरा विहीन आदमी हल्के से हँसा। उसने अपने दाहिने हाथ को ऊपर उठाया, और उसकी तर्जनी के ठूँठ की जगह एक पतली, काली लकीर उभरने लगी, जैसे धुएँ की एक छोटी सी उँगली उग रही हो।
"तुम सब बहुत सोचते हो," उसने कहा। "जबकि तुमसे सिर्फ़ एक काम माँगा गया था। पानी पिलाना।"
उसने उँगली से दीवार पर खड़ी कबीर की परछाईं की ओर इशारा किया।
परछाईं ने सिर घुमाया।
कबीर की चीख़ घुट गई। उसकी परछाईं, जो अब तक दीवार से पूरी तरह अलग हो चुकी थी, कमरे के बीच उतर आई थी। उसकी चपटी, काली देह ने अपना हाथ आगे बढ़ाया, और ज़मीन पर पड़ी चौथी कैन उसके हाथ में अपने आप उड़कर चली आई। वह कैन अब भी पानी से भरी थी, चाँदनी में हल्की चमकती हुई।
मीरा तुरंत उसकी ओर झपटी, पर परछाईं ने अपना दूसरा हाथ हल्के से हिलाया, और मीरा को लगा जैसे उसके बदन पर किसी ने ठंडे पानी की दीवार गिरा दी हो। वह पीछे गिर पड़ी। भंवर ने रेत की मुट्ठी फेंकी। रेत परछाईं के आरपार निकल गई, जैसे वह पानी हो, पर परछाईं की चाल एक क्षण को लड़खड़ाई।
"रेत इसे रोकती है, पर रोक नहीं पाती!" भंवर चिल्लाया। "इसमें बहुत पानी है!"
"क्योंकि यह कबीर के पिए हुए पानी से बनी है," चेहरा विहीन आदमी ने शांति से कहा। "लड़के ने उस कुएँ का पानी पिया था, और पानी की याद उसकी परछाईं में बस गई। मैंने तो बस उसे जगाया।" उसकी आँखों में पुरानी भूख चमकी। "तीन हज़ार साल पहले एक आमिल ने कहा था कि बंधन की कुंजी तब मिलेगी जब कोई राजा का रक्त अपनी मर्ज़ी से अपने भीतर पानी की याद को ले जाएगा, और उसे वहाँ तक पहुँचाएगा जहाँ वह दरवाज़ा है। मुझे आठवें रक्षक की ज़रूरत नहीं थी, बेटी। मुझे आठवें रक्षक की परछाईं चाहिए थी। वही कबीर की परछाईं है। वही असली चाबी है।"
"पापा!" कबीर चीख़ा। "इसे रोकिए!"
विक्रम ने उठने की कोशिश की, पर उसके पैर जवाब दे गए। उसने सिर्फ़ इतना कह पाया, बहुत धीमे, लगभग फुसफुसाकर:
"मीरा... कबीर की परछाईं को रोकना मत। उसके पीछे जाना। उसके साथ जाना। क्योंकि अगर वह अकेली पहुँची तो..."
उसकी आवाज़ टूट गई।
परछाईं ने कैन को सीने से लगाया, और बिना कोई आवाज़ किए दीवार की ओर मुड़ गई। वह पत्थर में सिमटती चली गई, और दीवार पर एक काली, तैरती हुई लकीर बनकर दरवाज़े की ओर सरकने लगी। चौखट के पार वह बाहर आँगन में फैली, फिर पत्थर की ज़मीन पर, फिर रेत की ओर।
कबीर निढाल होकर ज़मीन पर गिर पड़ा। उसकी साँस बहुत धीमी थी, और उसके पैरों के नीचे की ज़मीन ख़ाली थी। चाँदनी में उसके पास कोई परछाईं नहीं थी।
चेहरा विहीन आदमी ने पीछे की ओर एक क़दम रखा, और दीवार उसे निगल गई। जाते-जाते उसके होंठ मुस्कुराए, और उसकी आवाज़ हवा में घुलती रही:
"अब पानी रास्ते में है। उत्तर के द्वार की ओर।"
मीरा ने झपटकर कबीर को अपनी बाँहों में उठाया। उसका बदन बर्फ़ की तरह ठंडा हो रहा था। हकीम ने उसकी नब्ज़ पर उँगली रखी, और उनका चेहरा पीला पड़ गया।
"उसकी नब्ज़ परछाईं के साथ जा रही है," उन्होंने कहा। "जैसे-जैसे वह दूर जाएगी, कबीर की साँस कमज़ोर होती जाएगी।"
"कितना वक़्त है?"
"सुबह होने तक। शायद उससे भी कम।"
मीरा ने पिता की ओर देखा। विक्रम की आँखें फिर बंद होने लगी थीं, पर उसने एक आख़िरी बार बेटी की ओर देखा और होंठ हिलाए, बिना आवाज़ के। मीरा ने पढ़ा:
"तू आठवीं नहीं है।"
और फिर वह बेहोश हो गया।

Writer
firoj saifi
Story
रेत का क़ैदी
Chapter
15 of 30
Category
Jinn & Spirits
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13 min
Words
2447
Language
Hindi (हिंदी)
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