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एपिसोड 16: आठवाँ नाम

firoj saifi · Jinn & Spirits · 14 मिनट

कबीर की साँसें अब गिनी जा सकती थीं।

मीरा ने उसे आँगन के बीचोंबीच चाँदनी में लिटाया था, सिर अपनी गोद में रखकर। असली हकीम रुस्तम उसकी कलाई पर दो उँगलियाँ रखे बैठे थे और होंठ हिलाकर गिन रहे थे। "सोलह... पंद्रह... चौदह..." हर गिनती के साथ उनकी आवाज़ थोड़ी और पतली हो जाती थी। कबीर का चेहरा मोम जैसा सफ़ेद होता जा रहा था। उसके पैरों के पास, पत्थर की ज़मीन पर, वह ख़ालीपन साफ़ दिख रहा था जहाँ उसकी परछाईं होनी चाहिए थी। चाँदनी वहाँ गिरती थी और किसी चीज़ से टकराए बिना पत्थर में समा जाती थी।
"वह चल पड़ी है," हकीम ने धीमे से कहा। "पानी की चाल से। रेत पर पानी जितनी तेज़ बहता है, परछाईं उससे भी तेज़ चलती है। हम पैदल जाएँ तो दो घंटे लगेंगे। वह एक घंटे से पहले पहुँच जाएगी।"
"और तब तक?" भंवर ने पूछा। उसकी आवाज़ में कोई उम्मीद नहीं बची थी, बस एक कठोर, सीधा सवाल।
हकीम ने कबीर की कलाई छोड़ दी और उसे मीरा की गोद में वापस रखा, जैसे किसी नाज़ुक काँच की चीज़ को रखते हैं। "तब तक इसकी साँस एक मिनट में पाँच से भी नीचे उतर आएगी। सुबह की पहली किरण तक शायद दो।" उन्होंने अपना सिर झुका लिया। "और यह सब मेरी वजह से हुआ है। मैंने तुम्हें पहले दिन ही रोक लिया होता, तो..."
"नहीं," मीरा ने उनकी बात काट दी। उसकी आवाज़ ऊँची नहीं थी, पर उसमें ऐसा ठहराव था कि हकीम चुप हो गए। "आज रात कोई अपनी ग़लतियों की गिनती नहीं करेगा, हकीम साहब। जिसके पास वक़्त हो, वह पहले जान बचाए।"
उसके भीतर कोई चीज़ बहुत शांत हो चुकी थी। यह रोने से पहले की शांति नहीं थी। यह उस इंसान की शांति थी जिसने रास्ते के दोनों छोर देख लिए हों और जान लिया हो कि चलने लायक़ सिर्फ़ एक है।
"पापा को यहीं छोड़ना होगा," उसने कहा।
किसी ने जवाब नहीं दिया।
वह उठी और कबीर को भंवर की बाँहों में सौंप दिया। भंवर ने उसे ऐसे थामा जैसे वह पहले भी किसी अपने को थाम चुका हो और छोड़ने का दर्द जानता हो। फिर मीरा तेज़ क़दमों से शाही कक्ष में गई।
विक्रम सिंह वहीं पड़े थे, दीवार से टिके, सिर एक ओर लुढ़का हुआ। उनकी साँस फिर धीमी हो चुकी थी, पर नब्ज़ अब भी चल रही थी। मीरा ने झुककर उनका माथा चूमा। चार दिन में पहली बार उसने ऐसा किया था। उसने उनकी चौड़ी पुरानी हैट उठाकर उनके सीने पर रखी और उनके दोनों हाथ उस पर टिका दिए।
"मैं लौटूँगी, पापा," उसने फुसफुसाकर कहा। "वादा नहीं करती, क्योंकि नियम है कि वादा नहीं करना। पर मैं लौटूँगी।"
हकीम ने दरवाज़े की चौखट पर पाँचवीं और आख़िरी चाँदी की कील गाड़ी और उसके चारों ओर नमक की मोटी लकीर खींची। भंवर ने जगत की रेत की पोटली खोलकर देखी। पोटली पहले से काफ़ी हल्की हो चुकी थी। उसने एक चुटकी रेत विक्रम की हथेली पर रखी और बुदबुदाया, "जगत, इनका ध्यान रखना।" रेत हथेली पर पल भर चमकी, फिर शांत हो गई, जैसे उसने बात सुन ली हो।
विजय आँगन में खड़ा था, चाँद की ओर मुँह उठाए। जब मीरा बाहर आई तो वह उसकी तरफ़ मुड़ा, और उसके चेहरे पर वही हिचक थी जो किसी बच्चे के चेहरे पर तब आती है जब वह कोई बात कहना चाहता हो पर डरता हो कि बड़े नाराज़ होंगे।
"दीदी, एक रास्ता है।"
मीरा रुक गई।
"बावड़ी की सातवीं सीढ़ी के नीचे," विजय ने कहा, "जहाँ मुझे बाबा ने सुलाया था, वहाँ से एक नाली शुरू होती है। राजा के बनवाए सातों कुओं को बावड़ी से जोड़ने वाली नालियाँ। छह सूख चुकी हैं, क्योंकि आपके पापा ने उन कुओं को पाट दिया था। पर उत्तर वाली नाली नहीं सूखी। वह किले से भी पुरानी है, और उसमें अब भी पानी बहता है। वह सीधी उत्तर के कुएँ तक जाती है, ज़मीन के नीचे।"
"कितना वक़्त लगेगा?" हकीम ने झपटकर पूछा।
"चलकर आधे घंटे से कम। परछाईं रेत पर टीलों के ऊपर से घूम-घूमकर जाएगी, दीदी, पर नाली सीधी है।"
भंवर ने कहा, "तो चलें।"
"पर नाली का मुँह शरर के पास है," विजय ने धीमे से कहा। "वह जब तक न खोले, कोई भीतर नहीं जा सकता।"
सबने एक-दूसरे की ओर देखा। मीरा ने गहरी साँस ली, तख़्तियाँ जेब से निकालकर मुट्ठी में भींच लीं और कहा, "तो शरर से ही पूछते हैं।"
बावड़ी की सीढ़ियाँ चाँदनी में नहाई हुई थीं। चाँद अब ठीक सिर के ऊपर था, और उसकी सीधी रोशनी पानी की काली सतह पर एक गोल, चमकता घेरा बना रही थी। बावड़ी के भीतर की नीली चमक बहुत धीमी पड़ गई थी, जैसे कोई देखने वाला अपनी आँखें मूँद ले।
शरर पहले से इंतज़ार कर रहा था। पानी के बीचोंबीच उसकी आकृति खड़ी थी, पर आज वह छत तक नहीं पहुँच रही थी। उसके कंधे झुके थे और अंगारे धीमे सुलग रहे थे।
"तुम्हारे पास वक़्त नहीं है, बेटी," उसने कहा। उसकी आवाज़ में न मिठास थी, न ठंडक, बस साफ़, सीधी हड़बड़ी। "मैं जानता हूँ तुम क्या माँगने आई हो। मैं नाली का मुँह खोलूँगा।"
मीरा ने भौंहें सिकोड़ीं। उसने बार-बार सुना था कि जिन्न जब बिना माँगे कुछ देता है तो उसकी क़ीमत सबसे बड़ी होती है। "बदले में क्या?"
"कुछ नहीं।"
"जिन्न 'कुछ नहीं' नहीं कहता।"
"मैं कहता हूँ," शरर ने कहा। "मुझे बस एक नाम चाहिए।"
हकीम का चेहरा सख़्त हो गया। "नाम देना सबसे बड़ा सौदा है, शरर। जिसे नाम दिया जाता है, उस पर पकड़ बन जाती है।"
"जानता हूँ, रुस्तम। पर इस बार पकड़ नहीं, जगाना है। यह नाम किसी को बाँधने के लिए नहीं, उठाने के लिए है।"
"किसका नाम?" मीरा ने पूछा।
एक लंबी चुप्पी रही। पानी हल्के से हिला।
"मैं नहीं कह सकता। मैं बँधा हूँ। जो नाम मैं ज़बान पर नहीं ला सकता, वह तुम्हें लाना होगा, राजा के वंश की किसी बेटी को। द्वार का रक्षक रक्त से नहीं, नाम से जागता है, और नाम वही दे सकता है जिसकी नसों में वह नाम बहता हो।"
"द्वार का रक्षक," मीरा ने दोहराया। "तुम आठवें की बात कर रहे हो।"
शरर ने जवाब नहीं दिया। पर उसके अंगारे एक पल को पूरी तरह बुझ गए, और जब दोबारा जले तो उनमें कुछ ऐसा था जो मीरा ने पहले कभी नहीं देखा था। थकान। तीन हज़ार साल की थकान।
"मैं कह चुका हूँ कि मैं तुमसे कुछ नहीं माँगता। पर सच यह है कि मैं माँगता हूँ, बेटी। बस इतना कि इस बोझ को उतार दो।"
भंवर ने बेचैनी से कहा, "मैडम, यह फिर वही चाल है। आधा सच, आधा जाल। अगर नाम ग़लत निकला तो?"
"और अगर सही निकला?" मीरा ने बिना मुड़े कहा। "कबीर की हर साँस के बदले मैं एक जोखिम उठा सकती हूँ, भंवर जी। पर मुझे जोखिम अँधेरे में नहीं उठाना। मुझे पहले समझना है।"
उसने तख़्तियों को मुट्ठी से निकाला। दोनों जुड़ी हुई थीं, तांबे की हरी, भारी, गर्म। उसने उन्हें चाँद की सीधी रोशनी में ऊपर उठाया, और उसकी साँस रुक गई।
तख़्ती का पिछला हिस्सा, जिसे उसने अब तक कभी ग़ौर से नहीं देखा था, सीधी चाँदनी में चमक रहा था। हरे जंग के नीचे बारीक उभरे हुए अक्षर थे, जो सिर्फ़ तब दिखते थे जब रोशनी ठीक ऊपर से गिरे। देवनागरी और अरबी, वही दो लिपियाँ, पर इस बार बिल्कुल साफ़।
"हकीम साहब, अरबी वाला हिस्सा पढ़िए," उसने कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी।
हकीम ने तख़्ती थामी और झुककर पढ़ा। उनके होंठ हिलते रहे, फिर उन्होंने आँखें ऊपर उठाईं। "जो पुकारा गया, वह सोया न रहे।" उन्होंने धीरे-धीरे कहा। "और तुम्हारा देवनागरी हिस्सा?"
मीरा ने ख़ुद पढ़ा, धीमे, ठहर-ठहरकर।
"द्वार का रक्षक रक्त से नहीं, नाम से जागता है। जिसे वंश पुकारे, वही आठवाँ।"
भंवर और हकीम ने एक साथ साँस खींची।
"रक्त से नहीं," हकीम ने फुसफुसाया। "तो वह जो सोचता है कि कबीर के रक्त की परछाईं से द्वार खुलेगा, वह आधा ही सच जानता है।"
"वह परछाईं का इस्तेमाल इसलिए कर रहा है कि उसे लगता है रक्त काफ़ी है," मीरा ने कहा। उसके भीतर बहुत कुछ तेज़ी से घूम रहा था, जैसे बरसों से बिखरे पत्थर अपनी-अपनी जगह बैठ रहे हों। "और पापा ने कहा कि मैं आठवीं नहीं हूँ। तख़्ती ने मुझे इसलिए चुना कि मैं रक्षक नहीं, नाम देने वाली हूँ।"
उसने चारों ओर देखा। सबकी आँखें उसी पर टिकी थीं। पर एक जोड़ी आँखें थीं जिनसे उसकी नज़र टकराई और वहीं ठहर गई।
विजय सीढ़ियों के किनारे खड़ा था, भीगे कपड़ों में, गंभीर, बड़ी-बड़ी आँखों के साथ।
मीरा के भीतर सारे सुराग एक साथ जुड़ते चले गए।
राजा की डायरी में लिखा था: 'जब तक वह जीवित है, बंधन बना रहेगा।' और शरर ने कहा था कि विजय राजा के वंश का पहला रक्त था जो इस द्वार के पास रह सकता था। तीन सौ साल से किसी ने उस बच्चे का नाम नहीं पुकारा था, और जिस रात मीरा ने पहली बार 'विजय' कहा, उस बच्चे के चेहरे पर कुछ टूटकर बिखर गया था। उसके बाद से वही बच्चा सारे सच बताता आया था। हरी चादर वाले ने उसे सुलाते हुए कहा था: 'जब तक द्वार पर कोई बैठा न हो, तुम्हें जागना है।' वही बच्चा, जिसकी परछाईं नहीं थी, जिसके पैरों के नीचे पानी जमता था, और जिसके पास से कुएँ के पानी की महक पहचानी जाती थी।
वह धीरे-धीरे उसके पास गई, घुटनों के बल बैठी, और अपना चेहरा उसकी आँखों के बराबर लाया।
"तुम पहले से जानते थे," उसने कहा। यह सवाल नहीं था।
विजय ने सिर झुका लिया। उसकी भीगी लटों से पानी की बूँदें गिरीं, एक-एक कर, पत्थर पर। "नहीं जानता था, दीदी। बस महसूस होता था।"
"क्या महसूस होता था?"
"कि मैं सोया नहीं हूँ। कि मैं पहरे पर हूँ।" उसने गला साफ़ किया। "उस हरी चादर वाले ने मुझे सीढ़ी के नीचे लिटाते हुए कहा था, 'चुप रहना, बच्चे। जब तक द्वार पर कोई बैठा न हो, तुम्हें जागना है।' मैंने सोचा कि यह कोई सज़ा है। कि मैं बुरा बच्चा हूँ। पर तीन सौ साल जागते-जागते मैं समझ गया कि वह मुझे सज़ा नहीं दे रहा था। वह मुझे इस्तेमाल कर रहा था, ताकि जब मैं पूरी तरह जाग जाऊँ तो वह मुझे खोल सके।"
"और तुमने किसी से कभी नहीं कहा?"
"कौन सुनता? बाबा सिर्फ़ एक बार आए थे। दो सौ साल पहले, भूत बनकर। मैंने उन्हें देखा, पर वे मुझे नहीं देख पाए। मैंने पुकारा, पर सुन नहीं सके। वे बावड़ी के किनारे बैठकर रोते रहे, और फिर चले गए।"
मीरा की आँखें भर आईं। उसने हाथ बढ़ाकर विजय के भीगे गाल पर रखा। वह बर्फ़ जैसा ठंडा था, पर उसने हाथ नहीं हटाया।
"तुम्हारे बाबा ने डायरी का एक आख़िरी पन्ना लिखा था," उसने कहा। "जिसे उन्होंने गोंद से चिपका दिया था ताकि कोई पढ़ न सके। मैंने उसे पढ़ा है। उन्होंने लिखा था कि उन्होंने तुम्हें रात के अँधेरे में, अकेले, उसी सीढ़ी के नीचे दफ़नाया। कि वे किसी से कह नहीं सके। और आख़िरी पंक्ति में लिखा था..."
वह रुकी। विजय की आँखें उसके होंठों पर टिकी थीं।
“मेरे बच्चे, मुझे माफ़ कर देना।”
विजय के होंठ काँपे। उसने कुछ कहना चाहा, पर आवाज़ नहीं निकली। उसके कंधे हिलने लगे, और इस बार वह बिना आवाज़ के नहीं रोया। उसने मीरा के कंधे में मुँह छिपा लिया और बच्चे की तरह फूट पड़ा, उस तरह जैसे बहुत देर से रुके हुए आँसू आख़िर बाहर आ जाते हैं। मीरा उसे थामे रही। भंवर ने मुँह फेर लिया। हकीम ने आँखें बंद कर लीं।
बहुत देर बाद विजय ने सिर उठाया। उसका चेहरा आँसुओं और पानी से तर था। "क्या बाबा सच में माफ़ी माँग रहे थे?"
"हाँ।"
"तो मैं माफ़ करता हूँ," उसने कहा। उसकी आवाज़ बहुत छोटी थी, पर उसमें एक राजकुमार की गरिमा थी जो तीन सौ साल से किसी ने नहीं सुनी थी। "बाबा से कह देना, दीदी, अगर कभी मिलें।"
मीरा ने अपने भीतर एक बहुत भारी सवाल दबाकर रखा था, और अब वह उसे टाल नहीं सकती थी। उसने एक और बच्चे को आज़ाद नहीं, बाँधने का फ़ैसला करना था। उसने कबीर के बारे में सोचा, जो आँगन में निढाल पड़ा था, और फिर उस तेरह साल के लड़के के बारे में जो उसके सामने खड़ा था।
"विजय," उसने कहा। "मैं तुमसे एक बात पूछूँगी, और तुम्हें सच बताना है। इसलिए नहीं कि कोई नियम है। इसलिए कि यह तुम्हारा फ़ैसला है। अगर मैं तुम्हारा नाम पुकारूँ, ठीक वैसे जैसे तख़्ती कहती है, तो तुम आठवें रक्षक बन जाओगे। तुम्हें द्वार के सामने खड़ा रहना होगा, शायद हमेशा के लिए। तुम चैन से सो नहीं पाओगे। तुम चाहो तो मना कर सकते हो। मैं कोई और रास्ता ढूँढूँगी।"
"क्या कोई और रास्ता है?"
मीरा ने झूठ नहीं बोला। "मुझे नहीं पता।"
विजय ने कुछ देर बावड़ी की ओर देखा, जहाँ चाँद की रोशनी में पानी चमक रहा था। फिर उसने सब पर नज़र डाली: भंवर, जिसकी बाँहों में कबीर निढाल पड़ा था, हकीम, जो बूढ़े कंधे झुकाए खड़े थे, और मीरा, जिसकी आँखों में एक साथ पिता और भाई का डर था।
"मुझे ठंड लगती है, दीदी," उसने धीरे से कहा। "तीन सौ साल से। पर आज पहली बार, जब आपने मेरे गाल पर हाथ रखा, मुझे लगा कि मैं गर्म हो रहा हूँ।" वह मुस्कुराया, और उस पल वह तेरह साल का बच्चा नहीं, कोई बहुत बड़ा, बहुत थका हुआ और बहुत बहादुर लड़का लगा। "मैं तैयार हूँ। मुझे जागने दीजिए। पर इस बार किसी वजह से।"
मीरा उठी। वह बावड़ी की सातवीं सीढ़ी पर गई, जहाँ विजय को दफ़नाया गया था। उसने तख़्तियाँ उस पत्थर पर टिका दीं और सीधी खड़ी हुई, ठीक चाँद के नीचे।
"मैं कोई वादा नहीं माँगती," उसने साफ़ आवाज़ में कहा, "और कोई वादा नहीं करती। मैं किसी का शुक्रिया नहीं कहती, और कुछ क़बूल नहीं करती। मैं सिर्फ़ एक नाम पुकारती हूँ।"
उसने गहरी साँस ली।
"विजयसिंह राठौड़। राव सूरजमल के पुत्र। इस वंश के पहले रक्त, इस द्वार के आठवें रक्षक। मैं, मीरा, उसी वंश की, तुम्हें नाम से पुकारती हूँ। जागो।"
सब कुछ एक पल के लिए थम गया।
फिर तख़्तियाँ गाने लगीं।
वह भनभनाहट नहीं थी। एक साफ़, ऊँची, मीठी धुन थी, जैसे कोई बहुत बड़ी काँसे की घंटी, जो तीन सौ साल से चुप पड़ी थी, पहली बार बजी हो। चाँदनी सीधी तख़्ती पर उतरी, और तख़्ती से उठकर विजय पर बरसने लगी, सुनहरी, गाढ़ी, जैसे दूध की धार।
विजय के कपड़ों से पानी भाप बनकर उठने लगा। उसके बाल सूखते गए। उसकी आँखों में जो कभी-कभी लाल अंगारे की चमक कौंधती थी, वह बुझ गई, और उसकी जगह साफ़, गहरी, भूरी पुतलियाँ चमक उठीं, किसी साधारण बच्चे की तरह। उसके गालों पर रंगत लौटने लगी, पतली, गुलाबी, सुबह की धूप जैसी।
और जब उसने अपने पैरों की ओर देखा, तो चाँदनी में उसके पैरों से निकलकर पत्थर पर एक छोटी, साफ़, गहरी परछाईं बिछी हुई थी।
"दीदी..." उसने फुसफुसाया। "मेरी परछाईं।"
उसने हाथ उठाया, परछाईं का हाथ उठा। उसने ठुमककर एक पैर आगे बढ़ाया, परछाईं भी ठुमकी। वह हँस पड़ा, एक छोटी, चकित, अविश्वास भरी हँसी, और फिर वह चाँदनी में पत्थर पर दौड़ पड़ा, अपनी परछाईं के साथ, जैसे कोई बच्चा पहली बार बर्फ़ देखकर उसमें कूद पड़ता है। भंवर के गले से एक दबी हुई हँसी निकल गई, जो रोने के बहुत पास थी।
"तीन हज़ार साल," शरर की आवाज़ आई।
मीरा ने पलटकर देखा। उसका क़द और घट चुका था। अब वह एक साधारण, लंबे आदमी जितना था, और उसकी आकृति से धुआँ एक पतली धार की तरह ऊपर उठकर चाँदनी में घुल रहा था। उसके कंधे ढीले थे, और उसके अंगारे बहुत नरम।
"तीन हज़ार साल में पहली बार मेरे कंधे हल्के हैं," उसने कहा। "मेरे वचन का ताला आठवें रक्षक के जागते ही ढीला पड़ गया। मैं अब पहरेदार नहीं रहा। मैं सिर्फ़ एक चिंगारी हूँ, और चिंगारी को बुझने से पहले एक काम करने की इजाज़त है।"
"कौन सा काम?" हकीम ने पूछा।
"अपने स्वामी का दरवाज़ा देखना, एक बार, अपनी आँखों से।" शरर ने बावड़ी की ओर हाथ बढ़ाया। "और इस बार तुम्हारे साथ।"
पानी की सतह के बीचोंबीच, सातवीं सीढ़ी के ठीक सामने, अचानक एक भँवर उठा। पानी धीरे-धीरे दो हिस्सों में बँटता गया, जैसे किसी ने परदा खींचा हो, और बीच में पत्थर की सीढ़ियाँ नीचे उतरती दिखाईं दीं। गोल, तंग, सात-सात की क़तारों में, जिन पर पानी की एक पतली धार नीचे की ओर, उत्तर की तरफ़, बह रही थी।
विजय ने मीरा का हाथ पकड़ लिया। उसका हाथ अब ठंडा नहीं था। हल्का सा गुनगुना।
"चलिए, दीदी," उसने कहा। "वह वहाँ पहले से है।"
सीढ़ियों के नीचे के अँधेरे से, बहुत दूर से, एक आवाज़ आई। लोहे के ऊपर लोहे के रगड़ने की। एक भारी, कराहती चरमराहट, जैसे किसी विशाल ताले की पहली कुंडी सदियों बाद पहली बार सरकी हो।
भंवर की बाँहों में कबीर की साँस एक बार काँपी, और रुक गई।
फिर, बहुत धीरे, लौट आई।

Writer
firoj saifi
Story
रेत का क़ैदी
Chapter
16 of 30
Category
Jinn & Spirits
Reading time
14 min
Words
2769
Language
Hindi (हिंदी)
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