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एपिसोड 17: लोहे का द्वार
firoj saifi · Jinn & Spirits · 16 मिनट
नाली के भीतर की दुनिया किसी और ही ज़माने की थी।
सीढ़ियाँ उतरकर वे एक तंग, गोल सुरंग में पहुँचे। ऊँचाई इतनी कम कि भंवर को कबीर को कंधे पर लादे हुए झुककर चलना पड़ रहा था। टखने तक ठंडा पानी बह रहा था, धीमे, लगातार, उत्तर की ओर, जैसे वही उन्हें रास्ता दिखा रहा हो। दीवारों पर पुरानी नक़्क़ाशी थी, वही अक्षर जो उत्तर के कुएँ की मुँडेर पर देखे थे, ब्राह्मी से भी पहले की लिपि, और बीच-बीच में छोटे आले, जिनमें पत्थर के सूखे दीये रखे थे।
शरर सबसे आगे चल रहा था, पर अब वह किसी विशाल आकृति की तरह नहीं, एक लंबी, पतली, धुँधली छाया की तरह, जिसके सीने में अंगारे जैसी एक धीमी चमक टिमटिमा रही थी। उसी चमक से सुरंग में उजाला था। विजय उसके ठीक पीछे चल रहा था और बार-बार पलटकर अपनी परछाईं को देख लेता था, जो अंगारे की लाल रोशनी में दीवार पर लहरा रही थी। हर बार वह मुस्कुरा देता, फिर अचानक संजीदा हो जाता, जैसे उसे याद आ गया हो कि वह किस काम से चल रहा है।
मीरा उसके पीछे थी, और उसके पीछे हकीम, सबसे आख़िर में, ताकि कोई उनके पीछे से न आ सके।
बहुत देर तक किसी ने बात नहीं की। पानी की आवाज़ और अपने क़दमों की छपछप के सिवा कुछ नहीं था। फिर भंवर ने, कबीर को कंधे पर सँभालते हुए, अचानक पूछा, "शरर, मेरे भाई को तुमने..."
"नहीं," शरर ने बिना मुड़े कहा। उसकी आवाज़ सुरंग में धीमे-धीमे गूँजी। "तुम्हारा भाई मेरे पानी में कभी नहीं उतरा, भंवर। उसे उस चेहरा विहीन ने रास्ता दिखाया था, और नीचे वाले की प्यास ने खींच लिया। पर एक बात है जो मैंने तुम्हें अब तक नहीं बताई।"
"क्या?"
"वह पीतल की चाबी जो तुमने उसकी टोपी में पाई। उसे वहाँ तुम्हारे भाई ने ख़ुद सिला था। उसे वह चाबी सातवीं क़ब्र पर रखकर आनी थी, पर उसने उस आदमी का इरादा भाँप लिया था। जब वह यहाँ आया तो उसने चाबी वहाँ नहीं रखी। उसने उसे अपनी टोपी में सी लिया, और उसी हालत में रेत हो गया। वह चाबी बीस साल बाद तुम्हारे ही हाथ में पहुँचे, इसी इरादे से।"
भंवर के क़दम एक पल को रुक गए। उसके कंधे पर कबीर का सिर हिला, और उसने तुरंत अपने आपको सँभाला। उसने आँखें बंद कीं, एक लंबी साँस भीतर खींची, और जब खोलीं तो उनमें आँसू थे, पर होंठों पर एक कठोर, गर्व भरी मुस्कान।
"मेरा छोटा भाई," उसने फुसफुसाकर कहा, "हमेशा मुझसे चतुर निकला।"
उसकी कमीज़ के भीतर, सीने से सटी पोटली में जगत की रेत हल्की-हल्की सुनहरी चमकी, और भंवर ने उसे हथेली से ढक लिया, जैसे किसी जलती लौ को हवा से बचाते हैं।
सुरंग एक मोड़ पर चौड़ी हुई।
वहाँ पानी का एक छोटा गड्ढा बन गया था, जिसकी सतह पर अंगारे की लाल रोशनी काँप रही थी। और उस सतह के ऊपर, चार क़दम की दूरी पर, एक बच्ची खड़ी थी।
वह लगभग सात-आठ साल की थी। लाल रंग की छोटी फ़्रॉक, बालों में दो चोटियाँ, एक हाथ में कपड़े की गुड़िया। वह बिल्कुल सामान्य लग रही थी, पर उसके नंगे पैरों के नीचे पानी की सतह बिल्कुल सपाट थी, कोई लहर नहीं।
हकीम के गले से एक दबी हुई चीख़ निकली, जो चीख़ से ज़्यादा किसी ज़ख़्म के खुलने जैसी थी। उनका पूरा बदन काँपा, और वे सुरंग की दीवार से टिककर रुक गए।
"अब्बा," बच्ची ने कहा। उसकी आवाज़ बहुत साफ़ और बहुत मीठी थी। "अब्बा, आप मुझे छोड़कर क्यों चले गए थे?"
हकीम के होंठ हिले, पर कोई आवाज़ नहीं निकली। उनके हाथ काँप रहे थे। मीरा ने पलटकर उनकी ओर देखा, और उसका दिल बैठ गया। चालीस साल पुराने उस दर्द को उसने पहली बार किसी इंसान के चेहरे पर इतना साफ़ देखा था।
"अब्बा, मुझे बहुत प्यास लगी थी," बच्ची ने कहा, और एक क़दम आगे बढ़ी। "मैं आपको बुलाती रही। आप क्यों नहीं आए?"
"ज़ैनब..." हकीम की आवाज़ टूट गई। उन्होंने काँपते हाथ आगे बढ़ाए। "ज़ैनब, मेरी बच्ची..."
"हकीम साहब!" मीरा ने उनकी कलाई पकड़ ली। "रुकिए!"
पर हकीम ने उसकी पकड़ से हाथ छुड़ाने की कोशिश नहीं की। वे बस खड़े रहे, पथराए हुए, बच्ची की ओर देखते हुए। और फिर, बहुत धीरे, उनके चेहरे पर कुछ बदला। एक साफ़, ठंडी समझ उभरी, जो आँसुओं के बीच भी सुलग रही थी।
"नहीं," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर उसमें इस्पात था। "तू ज़ैनब नहीं है।"
बच्ची ने सिर झुकाया। "अब्बा?"
"ज़ैनब तीन साल की थी। मेरी बच्ची को पूरा वाक्य बोलना नहीं आता था। उसे 'क्यों' का मतलब भी नहीं पता था। जब वह मरी, तो उसने मुझसे सिर्फ़ दो शब्द कहे थे। इतनी लंबी बात कहने की ताक़त उसमें कभी नहीं थी।" हकीम ने गहरी, काँपती साँस ली। "तू मेरी याद है। मेरी ज़ैनब नहीं। मेरे दुख ने तुझे बनाया है, और तू उसे मेरे ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर रही है।"
बच्ची के चेहरे पर मुस्कान फैली। वह मासूम मुस्कान नहीं थी। वह किनारों तक खिंचती हुई, चीरती हुई मुस्कान थी, जो अब मीरा के लिए बहुत जानी-पहचानी थी। फिर वह धीरे-धीरे पानी में पिघलती गई, पैरों से ऊपर की ओर, और कुछ ही पल में सिर्फ़ गुड़िया तैरती रह गई, कपड़े की, भीगी हुई, चेहरे के बिना।
हकीम ने अपना चेहरा हथेलियों में छिपा लिया। मीरा ने उनके कंधे पर हाथ रखा और कुछ नहीं कहा। कभी-कभी सबसे बड़ी तसल्ली यह होती है कि कोई आपके पास खड़ा रहे और चुप रहे।
आगे सुरंग धीरे-धीरे ढलान पर उतरने लगी। हवा में ठंडक बढ़ती जा रही थी, और उसके साथ एक और चीज़ भी, एक हल्की, गहरी, लगातार भनभनाहट, जो पहले कानों के पास आई और फिर सीधे सीने में बैठ गई। मीरा ने महसूस किया कि वह उसकी नब्ज़ की ताल के साथ मिल रही है, और उसकी कलाई पर बहती चाँदी की धार तेज़ी से धड़कने लगी थी।
"हम पास हैं," विजय ने धीमे से कहा। "यह द्वार की भनभनाहट है।"
सुरंग का अंत एक चौड़े, गोल कक्ष में हुआ, और वह कक्ष बिल्कुल वही था जो मीरा ने दो दिन पहले, उत्तर के कुएँ की तली में देखा था, पर अब उसका रंग बदल चुका था। पत्थर की कुंडी सूख चुकी थी, और उसकी जगह फ़र्श पर टखनों तक पानी भरा था। चारों ओर की दीवारों पर पुराने दीये अपने आप जल उठे थे, ठंडी, नीली लौ के साथ। और सामने की दीवार में जड़ा काला, जंग लगा लोहे का द्वार इस बार उन्हें चुपचाप नहीं देख रहा था। वह काँप रहा था।
द्वार के बीचोंबीच सात गोल छेद थे, एक सीध में, हर छेद के चारों ओर उकेरी हुई तर्जनी की आकृति। इनमें से पाँच के ऊपर नीली लौ जल रही थी, हल्की, पतली, चमकदार। एक में कोई लौ नहीं थी, उसके चारों ओर की उँगली का चिह्न बुझा हुआ था। और सातवें छेद में एक धुएँ की उँगली धँसी हुई थी, काली, पतली, किसी जीवित चीज़ की तरह हल्के-हल्के लहराती हुई।
उस उँगली के दूसरे सिरे पर, द्वार के ठीक सामने, वह खड़ा था।
चेहरा विहीन आदमी। पर अब उसके पास कोई भेस नहीं था। न हकीम की दाढ़ी, न टोपी। एक सीधा, लंबा, पतला आदमी, पुरानी हरी चादर लपेटे, जिसका चेहरा हर बार देखने पर कुछ और लगता था, और जिसकी आँखें सदियों की भूख से चमक रही थीं। उसके पास की दीवार पर कोई परछाईं नहीं थी।
और उसके दाईं ओर, पानी में खड़ी, कबीर की परछाईं थी। चपटी, काली, पूरी ऊँचाई तक तनी हुई, कैन दोनों हाथों में थामे हुए।
"पूरे वक़्त पर," चेहरा विहीन आदमी ने कहा। उसने बिना मुड़े कहा, जैसे उसे सबके आने की आहट पहले से मिल चुकी हो। उसकी आवाज़ एक साथ कई आवाज़ों की थी, और उनमें सबसे ऊपर वही थी जो मीरा ने कई बार सुनी थी, हकीम की। "मैं तुम्हारे इंतज़ार में बोर नहीं हुआ। देखो, कितने सुंदर काम हुए।"
उसने द्वार की ओर इशारा किया।
"पहला, दूसरा, तीसरा, चौथा और छठा ताला। इन पाँच रखवालों की उँगलियाँ बरसों पहले पानी में मिल गई थीं, और यह पानी सब कुछ याद रखता है। कबीर की परछाईं ने इसे इन तालों पर उँडेला, और पाँचों ताले अपने आप खुल गए। सातवाँ ताला मैंने ख़ुद भर दिया। कोई और तो था नहीं जो उसे भरे।" उसने हल्की, खोखली हँसी हँसी। "बस एक ताला अड़ा हुआ है। पाँचवाँ। जानते हो क्यों? क्योंकि उसका रखवाला अब भी ज़िंदा है। पानी मरे हुओं को याद करता है, ज़िंदा आदमी को नहीं। ज़िंदा आदमी को ख़ुद आना पड़ता है।"
उसकी आँखें हकीम पर टिक गईं।
"और देखो, वह ख़ुद चलकर आ गया। रुस्तम, मेरे पुराने दोस्त। बाईस साल पहले मैंने तुम्हें सब बताया, और तुमने सब सुना, और फिर भी तुम आज यहाँ खड़े हो। तुमसे ज़्यादा भरोसेमंद आदमी मैंने आज तक नहीं देखा।"
"मैं तुम्हें अपना हाथ नहीं दूँगा," हकीम ने कहा। उनकी आवाज़ में अभी भी ज़ैनब के आँसू थे, पर वह सीधी थी।
"तुम्हें देना नहीं पड़ेगा।"
उसी पल हकीम के दाहिने हाथ में एक तेज़, जलती हुई चुभन उठी। उन्होंने चीख़कर हाथ पकड़ लिया। उनकी तर्जनी के ठूँठ की जगह वह नीला गोदना भड़क उठा था, तेज़ नीली रोशनी में, और पाँचवें छेद के ऊपर की बुझी हुई उँगली का चिह्न उसी रंग में सुलगने लगा। हकीम का हाथ अपने आप आगे की ओर खिंचने लगा, उनके बाक़ी बदन को घसीटता हुआ, जैसे कोई अदृश्य रस्सी उसे द्वार की तरफ़ खींच रही हो।
"भंवर!" मीरा चिल्लाई।
भंवर ने कबीर को बहुत सावधानी से पानी से ऊपर, एक सूखे पत्थर पर लिटाया, और अगले ही पल रेत की मुट्ठी भरकर हकीम की ओर झपटा। उसने रेत हकीम की कलाई के चारों ओर एक सुनहरे घेरे में फेंक दी। घेरा चमका, और खिंचाव एक पल को कमज़ोर पड़ा, पर पूरी तरह रुका नहीं। हकीम एड़ियाँ गड़ाकर पीछे की ओर ज़ोर लगा रहे थे, पर उनके पैर पानी में फिसलते हुए एक-एक इंच आगे सरक रहे थे।
"रुको!" शरर की आवाज़ कक्ष में गूँजी। उसका क़द दोबारा बढ़ रहा था, अंगारे भड़क रहे थे, और उसकी आकृति चेहरा विहीन आदमी और हकीम के बीच आ खड़ी हुई। "तीन हज़ार साल बाद भी तू वही करता है। दूसरों के हाथ को अपना औज़ार बनाना।"
"तुम्हारा औज़ार भी तो मैं ही बना था, शरर," चेहरा विहीन आदमी ने कहा। उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ नर्म हुआ, लगभग उदास। "तुम्हें याद है न? जब तुम बस एक नन्ही चिंगारी थे, और तुम्हारे स्वामी ने तुम्हें बाहर भेजा था, और मैंने ही तुम्हें पहली बार पानी पिलाया था?"
शरर के अंगारे डगमगाए।
इसी बीच विजय ने आगे क़दम बढ़ाया। वह सीधा, नन्हा, गीले पत्थर पर नंगे पैर, कबीर की परछाईं के सामने जाकर खड़ा हो गया। उसकी अपनी परछाईं उसके पीछे दीवार पर पड़ रही थी, छोटी, पर साफ़।
"परछाईं," उसने कहा। उसकी आवाज़ किसी बच्चे की थी, पर उसमें अधिकार था, वैसा अधिकार जो बहुत छोटे उम्र के राजाओं में कभी-कभी होता है। "मैं विजयसिंह हूँ, इस द्वार का आठवाँ रक्षक। मैं तुझे आदेश देता हूँ। रुक।"
कबीर की परछाईं के हाथ में कैन झुकी हुई थी, और उसके मुँह से एक बूँद लटक रही थी, जो अब गिरने ही वाली थी। विजय के शब्द सुनते ही परछाईं का चपटा सिर झटके से घूमा। कैन हवा में काँपी। बूँद किनारे पर थरथराती रही, गिरी नहीं।
मीरा के पीछे, पत्थर पर लेटे कबीर की छाती ऊपर उठी। उसने पहली बार एक भारी, गहरी, आवाज़ वाली साँस ली, और फिर दूसरी।
"वह सुन रही है!" मीरा के मुँह से निकला।
चेहरा विहीन आदमी की मुस्कान पहली बार लड़खड़ाई। उसने सिर घुमाकर विजय की ओर देखा, और उसकी आँखों में कुछ ऐसा आया जो हैरानी और सम्मान के बीच का था।
"बहुत ख़ूब," उसने कहा। "तो किसी ने सचमुच नाम पुकार दिया। तीन हज़ार साल में पहली बार किसी ने रास्ता समझा।" उसने अपना दाहिना हाथ नीचे किया, और पाँचवें छेद की ओर खिंचते हकीम पर से उसका ध्यान एक पल को हट गया। "पर तुम बच्चे हो, राजकुमार, और बच्चों को चीज़ें चाहिए होती हैं। मैं तुम्हें वह दूँगा जो तुम सबसे ज़्यादा माँगते हो।"
विजय का हाथ काँपा।
"तुम्हारी माँ," चेहरा विहीन आदमी ने बहुत नरमी से कहा। "रानी चंद्रावती। वह मरकर ग़ायब नहीं हुईं, बेटा। उनकी साँस, उनकी याद, पानी में बँटी हुई है। हर प्यासे मरने वाले की याद नीचे वाले के पास है। इस द्वार के पीछे राजा के सारे प्यासे हैं। द्वार खुलेगा तो पानी लौटेगा, और उनके साथ वे सब भी। तुम्हारी माँ। तुम्हारे बाबा की हँसी। तुम्हारे बग़ीचे की ख़ुशबू। सब कुछ। तुम्हें बस एक ही चीज़ करनी है। उस परछाईं को कह दो कि कैन झुका दे। एक बूँद। बस एक।"
विजय की साँस रुक गई। उसकी आँखें पानी से भर गईं। उसने सिर घुमाकर मीरा की ओर देखा, और उस नज़र में वही सवाल था जो हर बच्चे की आँखों में होता है जब कोई उसे उसकी सबसे गहरी इच्छा दिखा दे।
"दीदी..."
"विजय," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर उसने अपने आपको सँभाला। "मैं तुम्हें कुछ नहीं कह सकती। यह तुम्हारा फ़ैसला है। मैंने तुमसे कहा था। पर एक बात याद रखना। जिन्न कभी झूठ नहीं बोलता, और जो वह नहीं कहता, वही असली मार होती है।"
"क्या नहीं कह रहा यह?" विजय ने धीमे से पूछा।
"यह नहीं कह रहा कि जो लौटेगा, वह वही नहीं होगा," शरर ने कहा। उसकी आवाज़ बेहद धीमी और बेहद सच्ची थी। "मैंने तीन हज़ार साल में बहुत से सच बोले हैं, विजय, और वे सब अधूरे थे। इसी की सज़ा भुगत रहा हूँ। नीचे जो पानी है, वह किसी को नहीं लौटाता। वह उसे अपने जैसा बना लेता है। तुम्हारी माँ तुम्हारी माँ की तरह नहीं लौटेंगी। वह पानी की तरह लौटेंगी, जो हर चीज़ में भर जाता है, और हर प्यास बन जाता है।"
विजय ने कुछ देर शरर को देखा। फिर उसने आँखें पोंछीं, गहरी साँस ली, और बहुत धीमे, पर साफ़ कहा, "अम्मा कहती थीं कि प्यासे को पानी पिलाना पुण्य है।"
चेहरा विहीन आदमी मुस्कुराया।
"पर," विजय ने कहा, और उसकी आवाज़ में एक छोटा सा, अटल इनकार उतर आया, "वे यह भी कहती थीं कि जो पूरा तालाब पी जाए, उसे पानी नहीं, रोकना पिलाते हैं।" उसने सीधा खड़े होकर कहा, "मैं अम्मा को पानी से नहीं बुलाऊँगा। मैं उन्हें बाबा की माफ़ी से बुलाऊँगा। परछाईं, कैन सीधी कर। अभी।"
कैन झटके से सीधी हो गई। लटकती बूँद वापस भीतर लौट गई।
कक्ष में एक भारी, ठहरा हुआ सन्नाटा छा गया।
चेहरा विहीन आदमी ने बहुत देर तक विजय को देखा। उसकी मुस्कान धीरे-धीरे उतर गई, और उसके चेहरे पर कुछ ऐसा आया जो मीरा ने पहले कभी नहीं देखा था: थकान। वही थकान जो कुछ देर पहले शरर की आँखों में थी।
"ठीक है," उसने कहा। उसकी आवाज़ अब सपाट थी, सारे रंग उतर चुके थे। "पानी नहीं तो हाथ ही सही।"
उसका दाहिना हाथ बिजली की तरह उठा, और उसकी धुएँ की उँगली सातवें छेद से खिंचकर लहराती हुई हकीम की ओर लपकी। पानी की सतह से अनगिनत पतली धाराएँ एक साथ उठीं, साँपों की तरह, और हकीम की दोनों बाँहों, कमर और टाँगों से लिपट गईं। भंवर की रेत का घेरा चटखकर टूट गया।
"रुस्तम!" शरर चीख़ा। उसकी आकृति भड़क उठी और वह चेहरा विहीन आदमी पर टूट पड़ा। दो धुओं की टक्कर में कक्ष की दीवारें थरथराईं, नीली लौ वाले दीये एक साथ भड़के, और पानी की सतह पर ऊँची-ऊँची लहरें दौड़ गईं।
मीरा हकीम की ओर झपटी। उसने दोनों हाथों से उनकी कलाई पकड़ ली, उनके और द्वार के बीच अपनी पूरी ताक़त से खड़ी हो गई। "नहीं! मैं आपको नहीं जाने दूँगी!" भंवर उनकी कमर पर लिपटी पानी की धाराओं को हाथों से नोचता रहा, उसकी उँगलियों से ख़ून बह रहा था।
"बेटी..." हकीम ने भींचे हुए दाँतों से कहा। उनकी आँखें बंद थीं और पसीने की बूँदें गालों से उतर रही थीं। "मैं... मैं अब और नहीं रोक पा रहा..."
उनके हाथ का गोदना इतना तेज़ चमक रहा था कि मीरा की आँखें चौंधिया गईं। फिर एक झटके से सब रस्सियाँ, सब धाराएँ, सब पकड़ें एक साथ खिंचीं, और हकीम का दाहिना हाथ बिजली की तेज़ी से द्वार की ओर उड़ गया। उनकी तर्जनी का ठूँठ पाँचवें छेद में धँस गया।
एक भारी, गूँजती हुई क्लिक की आवाज़ आई।
पाँचवें छेद के ऊपर नीली लौ भड़की, और सातों लौ एक साथ जल उठीं। द्वार की पूरी सतह पर सात नीली रेखाएँ दौड़ीं, एक छेद से दूसरे तक, और लोहे के भीतर कहीं सदियों से जमा कोई चीज़ हिली।
हकीम का हाथ छेद से वापस छिटककर आया। वे घुटनों के बल पानी में गिर पड़े, अपनी हथेली को सीने से लगाए, हाँफते हुए। उनकी तर्जनी का ठूँठ ख़ून से भीगा था, पर ख़ून लाल नहीं था। वह नीला था।
चेहरा विहीन आदमी ने शरर को झटके से पीछे धकेला और सीधा खड़ा हो गया। वह हाँफ रहा था, पर उसकी आँखें पूरी तरह चमक रही थीं।
"सातों ताले खुल चुके हैं," उसने कहा। उसकी आवाज़ में तीन हज़ार साल की भूख काँप रही थी। "द्वार अब सिर्फ़ एक चीज़ का इंतज़ार कर रहा है। आख़िरी बूँद की।"
सबकी नज़रें कबीर की परछाईं पर गईं।
कैन उसके हाथ में थी, मुँह तक भरी, ठंडी, चमकती हुई। कैन के किनारे पर पानी की एक बूँद फिर से जमा हो चुकी थी, भारी, गोल, चाँदनी में थरथराती हुई। परछाईं का चपटा बदन विजय के आदेश और अपने भीतर की किसी पुरानी पुकार के बीच काँप रहा था। विजय उसके सामने खड़ा था, एक नन्हा सा लड़का, दोनों हाथ फैलाए, और उसका चेहरा पसीने और आँसुओं से तर था।
"परछाईं, रुक," उसने फुसफुसाकर कहा। "रुक जा। रुक जा, मेरी बात सुन।"
बूँद काँपी। एक सूत भर झुकी।
मीरा का हाथ अपने आप सीने तक गया। पत्थर पर लेटे कबीर की साँस फिर कमज़ोर पड़ रही थी, हर साँस के बीच का ठहराव लंबा होता जा रहा था। द्वार के ऊपर सातों नीली लौ एक साथ तेज़ हुईं, और लोहे की सतह पर पहली बार एक बारीक दरार उभरी, ऊपर से नीचे तक, एक बाल जितनी पतली। उस दरार से बहुत धीमे, बहुत ठंडे, पानी के रेंगने की आवाज़ आई।
और फिर उसी दरार के भीतर से, बहुत नज़दीक से, एक नन्ही सी आवाज़ आई।
एक तीन साल की बच्ची की आवाज़। साफ़, कोमल, थोड़ी तुतलाती हुई, और उसमें वह पूरी कच्ची तड़प थी जो किसी इंसान की नक़ल से कभी नहीं बनाई जा सकती।
"अब्बा... पानी..."
हकीम रुस्तम ख़ान, जो अब तक घुटनों के बल गिरे हुए थे, एक झटके से सिर उठाकर द्वार की ओर देखने लगे। उनके चेहरे का रंग एक ही पल में उड़ गया। उनके होंठ हिले, पर कोई शब्द नहीं निकला। उनकी आँखों से आँसू बिना किसी आवाज़ के बहने लगे।
क्योंकि यह आवाज़ उनकी याद नहीं थी, और यह वह नक़ल भी नहीं थी जो सुरंग में मिली थी। यह वही दो शब्द थे जो चालीस साल पहले एक छोटी बच्ची ने अपने आख़िरी पल में कहे थे, और जिन्हें हकीम ने आज तक किसी को नहीं बताया था, सिवाय एक रात, भंवर के सामने।
- Writer
- firoj saifi
- Story
- रेत का क़ैदी
- Chapter
- 17 of 30
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 16 min
- Words
- 3118
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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