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एपिसोड 18: दरार के पीछे

firoj saifi · Jinn & Spirits · 13 मिनट

हकीम रुस्तम ख़ान घुटनों के बल पानी में बैठे थे और उनकी आँखें दरार पर जमी थीं।

कक्ष में नीली लौ वाले दीये स्थिर जल रहे थे, पर पानी की सतह पर उनकी परछाइयाँ काँप रही थीं, जैसे नीचे से कोई साँस ले रहा हो। लोहे का द्वार अब चुप नहीं था। उसके भीतर से एक धीमी, लगातार, गीली सरसराहट आ रही थी, जैसे कोई बहुत पास से, बहुत सब्र के साथ, करवट बदल रहा हो।

"अब्बा..."

आवाज़ फिर आई। तीन साल की बच्ची की, जिसके मुँह में अभी पूरे शब्द नहीं बैठते थे। 'अब्बा' में पहला अक्षर थोड़ा खिंचा हुआ, दूसरा हल्का तुतलाया हुआ। मीरा ने उस आवाज़ को सुना और उसके बदन के रोंगटे खड़े हो गए। उसे पहचानने की ज़रूरत नहीं थी। सुरंग वाली नक़ली बच्ची पूरे वाक्य बोलती थी, ठहरकर, सलीक़े से। यह बच्ची वैसी नहीं थी। यह रुक-रुककर बोल रही थी, जैसे हर शब्द के लिए साँस जुटानी पड़ रही हो।

"यह चाल है," भंवर ने हकीम का कंधा पकड़कर कहा। "हकीम साहब, सुनिए मुझे। यह वही कर रहा है जो सुरंग में किया था।"

"नहीं," हकीम ने कहा। उनकी आवाज़ बहुत धीमी थी। उसमें डर नहीं था। उसमें कुछ और था, जो डर से कहीं गहरा था। "नहीं, भंवर। सुरंग में जो थी, वह मेरी याद थी। मैं जानता था कि वह झूठ है, क्योंकि उसे मैंने अपने ही हाथों से गढ़ा था। पर यह..." वे रुके। "यह मेरी याद में नहीं है। मैंने इसे कभी याद नहीं किया, क्योंकि मैं इसे याद करने की हिम्मत ही नहीं कर पाया।"

"क्या?" मीरा ने पूछा।

हकीम ने धीरे से सिर घुमाया और भंवर की ओर देखा। उनके गालों पर आँसू बह रहे थे और वे उन्हें पोंछ भी नहीं रहे थे।

"जब ज़ैनब मरी," उन्होंने कहा, "तो उसने दो बार बोलने की कोशिश की थी। पहली बार उसने कहा, 'अब्बा, पानी।' यह बात मैंने तुमसे उस रात कही थी, भंवर। पर उसने दूसरी बार भी कुछ कहा था। उसकी आवाज़ इतनी महीन थी कि मैंने उसे सुना ही नहीं। या शायद सुना और मन ने उसे मिटा दिया। आज इस दरार के पीछे वही आवाज़ मुझे बता रही है कि वह दूसरी बात क्या थी।"

द्वार के भीतर से बच्ची की साँस साफ़ सुनाई दी, छोटी, सूखी, सीटी जैसी।

"अब्बा... अब निगल सकती हूँ..."

हकीम के मुँह से एक आवाज़ निकली जो न चीख़ थी, न रोना। जैसे किसी ने उनके सीने की पसलियों को एक साथ तोड़ दिया हो। वे दोनों हाथ पानी में टेककर आगे की ओर झुक गए, और भंवर ने उन्हें कमर से पकड़ लिया, ताकि वे द्वार की ओर न घिसटें।

"उसने यह कहा था?" भंवर ने फुसफुसाकर पूछा।

"आख़िरी साँस पर। जब उसका गला खुल गया था, बुख़ार टूट गया था, और मैंने सोचा था कि वह बच जाएगी। उसने कहा, 'अब्बा, अब निगल सकती हूँ।' और तभी उसकी आँखें..." हकीम की आवाज़ गले में अटक गई। "मैंने उसे पानी नहीं पिलाया था उस पल। मैं उसकी बात का मतलब समझने में, उसके बुख़ार के उतरने की ख़ुशी मनाने में, एक क्षण चूक गया। और जब मैं कटोरा लेकर लौटा तो वह जा चुकी थी। सिर्फ़ एक पल का फ़र्क़ था।"

मीरा ने उनकी बाँह पर हाथ रखा। वह इतना काँप रहा था कि उसे लगा जैसे वह किसी टूटते पुल को थामे खड़ी है।

"हाँ," चेहरा विहीन आदमी ने कहा।

उसने इतनी नरमी से कहा कि कक्ष का हर आदमी चौंक गया। उसके चेहरे पर कोई जीत नहीं थी। उसकी आवाज़ में वह ठंडी चालाकी भी नहीं थी जो पहले थी। वह द्वार की दरार के पास खड़ा था, एक हाथ लोहे पर टिकाए, जैसे किसी सोते बच्चे के माथे पर हाथ रखते हैं।

"यही तो मैं तुम सबसे कहता आया हूँ, रुस्तम। नीचे वाला मारता नहीं। वह इकट्ठा करता है। इस रेगिस्तान में, इन तीन हज़ार सालों में, जो भी प्यास से मरा, चाहे कुओं के पास, चाहे घर में, चाहे बच्चों की तरह गोद में, उनकी आख़िरी साँस, आख़िरी शब्द, आख़िरी चाहत उसके पास है। वह उन्हें खोता नहीं। हर एक को सँभालकर रखता है।" उसने द्वार को थपथपाया। "तुम्हारी बेटी वहाँ अकेली नहीं है। उसके साथ हज़ारों हैं। सब प्यासे, सब पानी की बाट जोहते।"

"तू उन्हें इस्तेमाल कर रहा है," हकीम ने गरजकर कहा। उन्होंने भंवर की पकड़ से छूटने की कोशिश की। "तू मेरी बच्ची की आवाज़ से..."

"मैंने उसे सिखाया नहीं है," चेहरा विहीन आदमी ने कहा। उसकी आवाज़ में अचानक थकान थी, और उस थकान में सच्चाई इतनी साफ़ थी कि मीरा के भीतर कुछ हिल गया। "मैं झूठ बोल सकता हूँ, रुस्तम, और तीन हज़ार साल से बोलता आया हूँ, हर रूप में, हर आवाज़ में। पर यह मेरा बनाया हुआ नहीं है। यह असली है। ज़ैनब वहाँ है। उसकी वह आख़िरी बात, जो तुम बाईस साल से अपने ही भीतर दबाते आए हो, वह पानी में सुरक्षित रखी हुई है। मैं तुम्हें उसे वापस देना चाहता हूँ।"

हकीम की साँस रुक गई।

"मैं द्वार इसलिए खोलना चाहता हूँ कि सब लौट आएँ," आदमी ने कहा, और उसकी आँखों में पहली बार कोई आग नहीं, सिर्फ़ गहरी, सीली हुई उदासी थी। "इन सबको, जिन्हें रेत ने निगला है, उनके घर लौटने का वक़्त आ गया है। मैं कोई शैतान नहीं हूँ, मीरा। तुम सब मुझे शैतान समझते हो क्योंकि मैंने झूठ बोले, भेस बदले, लोगों को फँसाया। पर देखो, मैंने इनमें से किसी को मारा नहीं। जो हुआ, वह प्यास ने किया। और प्यास तब तक मारती रहेगी जब तक उसे पानी नहीं मिलता।"

मीरा ने अपनी आँखें उससे नहीं हटाईं। उसके भीतर पिता की आवाज़ गूँज रही थी, जिन्न कभी झूठ नहीं बोलता, पर जो वह नहीं कहता, उसे पहचानना सीख। यह आदमी जिन्न नहीं था, पर उसके हर शब्द में वही बनावट थी: जो कहा गया, वह सच था, और जो छोड़ दिया गया, वह उससे कहीं बड़ा।

"और जब द्वार खुलेगा," उसने ठंडी आवाज़ में कहा, "तो ऊपर के उन गाँवों का क्या होगा जो रेगिस्तान की रेत पर बसे हैं? वह सारा पानी जो बाहर आएगा, वह कहाँ जाएगा? और जो आएगा वह पानी होगा, या प्यास?"

चेहरा विहीन आदमी ने कुछ नहीं कहा।

"तुमने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया।"

"मैंने कहा था कि मैं झूठ बोल सकता हूँ," उसने बहुत धीमे से कहा। "पर तुमसे नहीं बोलूँगा। मुझे नहीं पता, बेटी।"

उस एक वाक्य में कक्ष की हवा बदल गई। भंवर ने गहरी साँस खींची। विजय, जो परछाईं के सामने फैलाए हाथों के साथ खड़ा था, एक पल को पीछे मुड़कर देखने लगा। शरर के धुएँ वाले कंधे हिले।

"यही उसकी सबसे बड़ी बात है," शरर ने कहा। "वह नहीं जानता। तीन हज़ार साल में उसने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि दरवाज़े के पार क्या है। उसे बस इतना पता है कि वह प्यासा है, और प्यासे के लिए पानी ही धर्म है।"

कबीर पत्थर पर पड़ा था और उसकी साँस अब हर आधे मिनट में एक बार आ रही थी।

मीरा ने देखा तो उसका दिल बैठ गया। भाई का चेहरा नीला पड़ने लगा था, होंठ सिकुड़ गए थे, और पलकों के नीचे आँखें बिल्कुल स्थिर थीं। उसकी नब्ज़ को पकड़ने की कोशिश में उसकी उँगलियाँ कुछ महसूस नहीं कर पाईं। वह घुटनों के बल उसके पास गई और उसका सिर अपनी गोद में रखकर उसके कान के पास झुकी।

"कबीर," उसने फुसफुसाया। "सुन रहा है? मैं हूँ। दी। तुझे वापस आना है। तेरी परछाईं तुझे बुला रही है, पर तुझे उसे जवाब देना है। मैंने तुझसे वादा नहीं किया, पर मैं कह रही हूँ कि तू मेरे साथ घर जाएगा।"

कुछ नहीं हुआ। कबीर की छाती एक बार फिर ऊपर उठी, देर से, कमज़ोर।

उसके पीछे, विजय की आवाज़ काँपते-काँपते ऊँची हो गई। "परछाईं! रुक! मैं कहता हूँ रुक जा!"

परछाईं का चपटा बदन थरथरा रहा था। कैन उसके हाथों में हिल रही थी। मुहाने पर लटकती बूँद इतनी भारी हो गई थी कि उसकी सतह पर नीली लौ की चमक किसी छोटे चाँद की तरह दिखाई देती थी। विजय उसके सामने सीधा खड़ा था, पर उसके छोटे-छोटे पाँव पानी में काँप रहे थे, और उसके माथे से पसीने की बूँदें गालों पर लुढ़क रही थीं। तीन सौ साल बाद पहली बार किसी ने उससे आदेश देने के लिए कहा था, और वह इस काम में अभी कच्चा था।

"तुम्हारी आवाज़ में अधिकार है, राजकुमार," चेहरा विहीन आदमी ने बहुत नरमी से कहा। "पर अधिकार के लिए उम्र चाहिए। उम्र के लिए थकान चाहिए। और थकान..." उसने सिर झुकाया, "थकान तुम्हारे पास अभी नहीं है।"

उसी पल दरार के भीतर से एक और आवाज़ उठी।

वह बच्ची की नहीं थी। यह एक औरत की थी, भरी हुई, पर सूखी हुई, किसी बहुत पुराने कंठ से, जैसे किसी ने मिट्टी के घड़े में गाना गाया हो। उसकी बोली मारवाड़ी थी, और उसका हर शब्द दुलार से भीगा हुआ।

"विजय... मेरे लाल... उधर क्यों खड़ा है? इधर आ। अम्मा के पास आ।"

विजय के चेहरे का सारा रंग उड़ गया।

उसके हाथ जो परछाईं के सामने फैले थे, एक पल को ढीले पड़ गए। उसने सिर घुमाकर द्वार की ओर देखा, और उसके होंठ काँप उठे। "अम्मा?" उसने फुसफुसाकर कहा। उसकी आवाज़ में तेरह साल के उस बच्चे की सारी हसरत थी जो तीन सौ साल अँधेरे में अकेला पड़ा रहा हो।

"हाँ बेटा। तू इतना भीग गया है। ठंड लगी होगी तुझे। आ, अम्मा तेरे बाल सुखा दे।"

"विजय!" मीरा चिल्लाई। "मत सुनना! वह तुम्हारा ध्यान तोड़ रही है! परछाईं की तरफ़ देखो!"

पर विजय अब किसी को नहीं सुन रहा था। उसके क़दम एक के बाद एक द्वार की ओर बढ़ने लगे, पानी में छपछप करते हुए, और उसके पीछे परछाईं के हाथ की कैन धीरे-धीरे, अपने आप, झुकने लगी। बूँद ने किनारे से बाहर झाँका।

मीरा झपटकर उठी।

सब कुछ एक साथ हुआ।

भंवर ने जेब से जगत की रेत की मुट्ठी भरकर परछाईं की ओर फेंकी। रेत सुनहरी धुंध की तरह उसकी चपटी देह से टकराई और कुछ पल के लिए परछाईं के हाथ रुक गए, पर कैन अब भी झुकी हुई थी। शरर चेहरा विहीन आदमी से टकराया, दोनों धुँधली आकृतियाँ एक-दूसरे में गुँथ गईं, और कक्ष में आग और पानी के टकराने जैसी तेज़ फुफकार उठी। हकीम, जो अभी तक द्वार की दरार में समाई बच्ची की आवाज़ में बँधे थे, एक पल को पूरी तरह निश्चल रहे, फिर उनके होंठों से एक फटी हुई चीख़ निकली, "ज़ैनब!" और वे भंवर की पकड़ से छूटकर द्वार की ओर भागे।

"हकीम साहब, नहीं!" भंवर ने पीछे से उनकी कमर पकड़ ली और दोनों पानी में लुढ़क गए।

मीरा किसी की तरफ़ नहीं देख रही थी। उसकी नज़र सिर्फ़ उस बूँद पर थी।

वह कैन के किनारे से अलग हुई।

बहुत धीमे, जैसे समय रुक गया हो। भारी, गोल, चाँदी जैसी। नीली लौ की चमक उसमें इकट्ठी होकर एक नन्ही, तैरती तारा बन गई थी। वह हवा में एक क्षण के लिए ठहरी, और फिर नीचे की ओर चली, द्वार की दरार के सामने की सूखी लकीर की तरफ़, जहाँ पानी की सतह के ऊपर लोहा चमक रहा था।

मीरा ने छलाँग लगाई।

उसका दाहिना हाथ आगे बढ़ा, हथेली खुली। उसका घुटना पानी से टकराया और पूरा शरीर आगे को फिसला। उसने सब कुछ भूलकर सिर्फ़ एक चीज़ देखी: बूँद, जो उसकी हथेली से बस एक इंच ऊपर काँप रही थी।

फिर वह उसकी हथेली पर गिरी।

वह पानी की तरह ठंडी नहीं थी। न बर्फ़ की तरह, न आग की तरह। वह किसी जीवित धड़कन जैसी थी, एक नन्ही, गर्म, अनजानी धड़कन जो उसकी हथेली की लकीरों के बीच बैठ गई। और उसी क्षण मीरा की कलाई पर बहती चाँदी की धार, जो पूरे दिन सुलग रही थी, बिजली की तरह चमकी और उसके पूरे हाथ में दौड़ गई।

मीरा की साँस रुक गई।

उसकी आँखों के सामने कक्ष धुँधला पड़ने लगा। नीली लौ वाले दीये लम्बी लकीरों में पिघलने लगे। विजय की पुकार, भंवर की चीख़, हकीम का रोना, शरर की गर्जना, सब एक भारी, गूँजती हुई गहराई में डूब गए, जैसे कोई किसी कुएँ के भीतर धीरे-धीरे उतर रहा हो और ऊपर की सारी आवाज़ें दूर होती जा रही हों।

उसने आख़िरी बार जो देखा, वह कबीर का चेहरा था। उसकी पलकें एक पल को काँपीं।

फिर सब अँधेरा हो गया।

कक्ष में मीरा की देह बीच में पानी के ऊपर घुटनों के बल खड़ी रह गई।

उसका हाथ आगे बढ़ा हुआ था, हथेली खुली, और हथेली पर पानी की एक नन्ही बूँद चमक रही थी, गोल, स्थिर, तैरती हुई, जैसे किसी ने काँच का मनका रखा हो। उसकी आँखें खुली थीं, पर उनमें कुछ नहीं था। न पुतलियाँ, न रोशनी, सिर्फ़ एक गहरी, साफ़, पानी जैसी धुँधली सफ़ेदी।

विजय पलटा। परछाईं के हाथ की कैन रुक चुकी थी, क्योंकि जिस बूँद के गिरने का इंतज़ार था, वह गिर चुकी थी, और वह द्वार के पास नहीं, एक जीवित इंसान की हथेली में गिरी थी।

चेहरा विहीन आदमी शरर के धुएँ से छूटकर एक क़दम पीछे हटा। उसकी हैरानी साफ़ थी। उसके सब हिसाब-किताब में यह बात नहीं थी।

"उसने पकड़ ली," उसने फुसफुसाया।

"किसने?" शरर ने हाँफते हुए पूछा।

"आठवीं।"

"वह आठवीं नहीं है," शरर ने कहा। "आठवाँ विजय है। मीरा नाम देने वाली है।"

"नाम देने वाली भी पानी सुन सकती है," चेहरा विहीन आदमी ने कहा। उसकी आँखें मीरा की स्थिर देह पर टिकी थीं। "मैं तीन हज़ार साल से नीचे वाले की आवाज़ का पीछा कर रहा हूँ, और उसने कभी किसी जीवित इंसान को अपनी याद नहीं सुनाई। वह उसे अब सुना रहा है। उसे अपनी पूरी कहानी सुना रहा है।"

भंवर और हकीम, जो पानी में गुँथे पड़े थे, एक साथ उठ बैठे। हकीम की आँखें अब भी द्वार की दरार पर थीं, पर उनकी नज़र धीरे-धीरे मीरा की ओर मुड़ी, और उनके चेहरे पर पहली बार एक अजीब सी आशा काँपी।

"वह ज़ैनब से बात कर रही होगी," उन्होंने फुसफुसाया।

"नहीं," विजय ने कहा। उसकी आवाज़ बदल चुकी थी। उसमें वह घबराहट नहीं थी जो कुछ पल पहले थी। उसने अपनी माँ की आवाज़ को पीछे छोड़ दिया था, और अब वह अपनी जगह पर सीधा खड़ा था, दोनों हाथ कमर पर, उस बच्चे की तरह जिसने अभी-अभी कोई बहुत बड़ी चीज़ समझ ली हो। "वह उससे बात कर रही है जो द्वार के पीछे है। वह उसकी कहानी सुन रही है।"

उसने पानी में बैठी मीरा की ओर देखा, और फिर चेहरा विहीन आदमी की ओर।

"तुम्हें डर लग रहा है," उसने कहा।

चेहरा विहीन आदमी कुछ नहीं बोला।

"तीन हज़ार साल से तुम उसकी कहानी जानने से डरते रहे। क्योंकि अगर वह कहानी वह नहीं निकली जो तुमने सोचा था, तो तुम्हारा सारा किया बेकार हो जाएगा।"

चेहरा विहीन आदमी के होंठ हिले। मीरा की स्थिर देह के ऊपर, उसकी खुली हथेली पर, पानी की बूँद ने धीरे-धीरे चमकना शुरू किया, पहले हल्का नीला, फिर चाँदी जैसा, फिर सोने जैसा, जैसे किसी ने उसके भीतर एक बहुत पुरानी दुनिया की रोशनी जला दी हो।

और द्वार की दरार, जो एक बाल जितनी पतली थी, पहली बार अपने आप एक उँगली चौड़ी हो गई।

Writer
firoj saifi
Story
रेत का क़ैदी
Chapter
18 of 30
Category
Jinn & Spirits
Reading time
13 min
Words
2468
Language
Hindi (हिंदी)
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