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एपिसोड 19: नदी की याद
firoj saifi · Jinn & Spirits · 18 मिनट
पहली चीज़ जो मीरा ने महसूस की, वह आवाज़ थी।
पानी की। बहते हुए पानी की, जो चट्टानों से टकराता नहीं, सिर्फ़ फिसलता है, एक चौड़ी, गहरी, भरपूर नदी की आवाज़, जो मीलों तक अपनी रफ़्तार से चली जा रही हो और जिसे किसी को कुछ साबित करने की ज़रूरत न हो।
फिर रोशनी आई, सुनहरी, सुबह की, और उसके साथ गर्म हवा, जिसमें गीली मिट्टी, कमल के फूल और धुएँ की महक थी।
मीरा ने आँखें खोलीं।
वह एक किनारे पर खड़ी थी, घुटनों तक ऊँची हरी घास में। उसके सामने एक विशाल नदी बह रही थी, इतनी चौड़ी कि दूसरा किनारा धुँध में खो जाता था। उसके पानी का रंग गहरा नीला-हरा था और सतह पर सूरज की किरणें हज़ार टुकड़ों में बिखरी चमक रही थीं। किनारे पर बड़े-बड़े वृक्ष थे, पीपल जैसे, जिनकी जड़ें पानी में उतरती थीं, और डालों पर रंग-बिरंगे पक्षी बैठे थे।
और उसके पीछे, जहाँ उसने कुछ पल पहले तक सूनगढ़ की रेत देखी थी, हरे-भरे खेत फैले थे, दूर तक, जिनके बीच मिट्टी के घरों की छतें धुएँ के साथ उठ रही थीं।
"यह..." मीरा ने साँस रोककर कहा। "यह रेगिस्तान है?"
"यह रेगिस्तान था।"
आवाज़ हर तरफ़ से आई, पानी की सतह से, हवा से, उसके अपने भीतर से, और वह किसी मर्द या औरत की नहीं थी। वह नरम थी, गहरी, ठहरी हुई, किसी बड़ी माँ की तरह जिसे अपनी संतान को डाँटने की ज़रूरत कभी न पड़ी हो।
"और मैं यहाँ थी।"
मीरा ने मुड़कर नदी की ओर देखा। उसकी सतह पर, चमकती लहरों के बीच, एक आकृति नहीं थी, कोई चेहरा नहीं था। पर वह जानती थी कि यही वह है। वही जिसे शरर 'स्वामी' कहता था, जिसे चेहरा विहीन आदमी 'नीचे वाला' कहता था। यहाँ वह नीचे नहीं था। वह चारों ओर था, हर बूँद में, हर लहर में।
"तुम नदी हो," मीरा ने कहा।
"मैं नदी थी।"
दृश्य बदला।
मीरा अब किनारे पर नहीं थी। वह नदी के ऊपर तैर रही थी, पानी की सतह से कुछ ऊँचाई पर, जैसे कोई पक्षी जो नीचे का सब कुछ देखता हो। उसके नीचे नदी चल रही थी, और नदी के दोनों किनारों पर मनुष्य थे। औरतें घड़े भर रही थीं, बच्चे पानी में उछल रहे थे, आदमी नावें बाँध रहे थे। गाँव थे, बड़े, घने, मिट्टी की दीवारों और छप्परों वाले, जिनके बीच नहरें निकली थीं। हर नहर के मुहाने पर छोटे-छोटे मंदिर थे, जिनमें कोई देवता नहीं था, सिर्फ़ एक गोल पत्थर और उस पर रखे ताज़ा फूल।
"वे तुम्हारी पूजा करते थे," मीरा ने कहा।
"वे मुझे माँ कहते थे। नाम उन्होंने मुझे कई दिए थे, पर माँ सबसे पुराना था।" पानी की आवाज़ में एक ऐसी कोमलता थी कि मीरा की आँखें भर आईं। "मैंने उनसे कभी कुछ नहीं माँगा। मैं बहती थी, और वे जीते थे। मेरे लिए इतना बहुत था।"
फिर समय खिंचने लगा।
उसके नीचे की दुनिया तेज़ी से घूमने लगी, जैसे कोई फ़िल्म आगे की ओर भाग रही हो। मौसम आते-जाते रहे। गर्मी, बरसात, जाड़ा, फिर गर्मी। नदी की चौड़ाई घटती-बढ़ती रही। पर हर बार जब वह घटती, तो पूरी तरह लौटकर नहीं आती थी। वर्ष बीतते गए, और धीरे-धीरे, इतना धीरे कि हर पीढ़ी को वह एक सामान्य बात लगती, नदी के किनारे सिमटने लगे।
मीरा ने देखा कि पहले एक नहर सूखी। फिर दूसरी। फिर एक गाँव ख़ाली हो गया, और उसकी मिट्टी की दीवारें हवा में धूल बनने लगीं। जो लोग रुके, वे बेहद दुबले होते गए। बच्चे पानी के पास तो थे, पर नदी इतनी पतली हो गई थी कि उसके बीच में नावें अटकने लगी थीं।
"मैं मर रही थी," पानी की आवाज़ ने कहा। उसमें अब कोई कोमलता नहीं थी, सिर्फ़ एक खुरदरापन था, जैसे कोई सूखे गले से बोल रहा हो। "किसी ने मुझे मारा नहीं। पहाड़ों ने मेरा रास्ता बदल दिया, और मैं उसे रोक नहीं पाई। मैं हर रात अपने उद्गम को पुकारती रही, पर वह मुझसे दूर, किसी और तरफ़, बहता चला गया।"
नीचे की दुनिया में अब बस सूखी, फटी हुई मिट्टी थी, जिस पर कभी नदी का सीना था। उसके बीच-बीच में पानी के गड्ढे थे, छोटे, कीचड़ से भरे, जिनके चारों ओर लोग इकट्ठा थे, कंकाल जैसी औरतें और बच्चे, एक-एक घूँट के लिए एक-दूसरे को धक्का देते हुए।
मीरा ने मुँह फेर लिया। वह यह नज़ारा नहीं देख सकती थी।
"देखो," आवाज़ ने कहा, और उसमें कोई आदेश नहीं था, सिर्फ़ एक थका हुआ अनुरोध। "मैंने इन्हें अपनी आँखों के सामने मरते देखा है। हर एक को। हर एक की आख़िरी साँस मैंने अपने भीतर ली, क्योंकि मैं और कुछ नहीं कर सकती थी। मैं सूख रही थी, और वे मुझमें सूख रहे थे। हम साथ-साथ मर रहे थे।"
फिर मीरा ने एक नाव देखी।
पूरी सूखी, फटी मिट्टी के बीच, जहाँ कभी नदी का सबसे गहरा हिस्सा था, एक लंबी, काली, लकड़ी की नाव टेढ़ी पड़ी थी, उसकी एक तरफ़ चट्टान की तरह सख़्त दलदल में धँसी हुई। और उस नाव के बग़ल में, उसकी पतवार को सीने से लगाए, एक आदमी बैठा था।
वह तीस के आसपास का था, दुबला, पर कंधे चौड़े, हाथों पर पुरानी रस्सियों के निशान, और चेहरा ऐसा जो किसी भी तस्वीर में सबसे पहले आँखों में उतरता है: गहरी भूरी आँखें, लंबी भौंहें, और माथे पर एक पुराना कटा हुआ निशान। उसकी गोद में एक छोटी बच्ची का सिर रखा था, पाँच-छह साल की, जिसकी साँस कमज़ोर, सूखे होंठ फटे हुए, और जिसके नन्हे हाथ बार-बार पतवार की ओर बढ़ते थे, जैसे वह उसे खींचकर नाव में बैठना चाहती हो।
"भैया..." बच्ची ने फुसफुसाया।
"हाँ, मेरी चिड़िया।"
"नाव कब चलेगी?"
आदमी ने नाव को देखा, फिर चारों ओर फैली मिट्टी को, और फिर वापस बच्ची को। "जल्दी, जल्दी। माँ को बुलाते हैं न। माँ आएगी तो नाव फिर चलेगी।"
उसने सिर उठाया और बहुत थकी, फटी हुई आवाज़ में पुकारा, उस मिट्टी की ओर जो कभी नदी थी, "माँ! माँ, देख। देख, तेरे बच्चे यहाँ हैं।"
मीरा के भीतर जैसे किसी ने मुट्ठी भींच ली।
"उसका नाम मल्हार था," नदी की आवाज़ ने कहा। उसमें पहली बार किसी नाम का वज़न था। "मेरा केवट। मेरी नाव का पहरेदार। जब मैं भरी थी, वह हर सुबह मुझे नमस्कार करके नाव उतारता था। जब मैं सूखी, वह तब भी आया।"
मीरा के नीचे का दृश्य फिर धीमे से बदला।
अब रात थी। चाँद एकदम नीचे उतरा हुआ, मटमैला पीला। सूखी मिट्टी के बीच एक छोटी चिता जल रही थी। उसके पास मल्हार घुटनों में सिर दिए बैठा था, उसके दोनों हाथ ख़ाली थे, और उसकी बहन की राख हवा में उड़कर उसके बालों में अटक रही थी।
"उस रात उसने मुझे पुकारा," आवाज़ ने कहा। "पर मैं जवाब नहीं दे सकी। मैं तब तक इतनी सूख चुकी थी कि मेरे पास कहने के लिए एक शब्द भी नहीं बचा था। पर मेरी प्यास, मेरी वह सूखी, जलती, अंतहीन प्यास, उसने सुन ली।"
मीरा ने देखा कि चिता की राख पर मल्हार के आँसू गिर रहे थे, और जहाँ-जहाँ वे गिरे, वहाँ राख हल्की-हल्की भीगकर काली होने लगी। फिर ज़मीन के नीचे से, बहुत धीमे, एक आवाज़ आई। वह किसी कुएँ की तली से आती गूँज जैसी थी, पर शब्दों में नहीं, भाव में थी। एक प्यास, इतनी पुरानी, इतनी गहरी, कि मल्हार का पूरा शरीर काँप गया।
"वह मेरी पहली और आख़िरी बात थी," नदी की आवाज़ बहुत धीमी पड़ गई। "मैं अपनी मौत से डर गई थी। इसलिए जब मैं मर रही थी, मैंने अपना सबसे गहरा हिस्सा बचा लिया। मेरी प्यास। जो भी प्यास से मरा, उसकी आख़िरी चाहत मेरे पास आती रही, और मैं उसे अपने भीतर छिपाती रही। मैंने सोचा कि कम से कम उनकी याद बचेगी। पर वे सब मेरे भीतर जमा होते गए, और मेरी प्यास एक अकेली नदी की प्यास नहीं रही। वह हज़ारों की प्यास बन गई। और प्यास की बात यह है कि वह बढ़ती है।"
दृश्य फिर बदला।
अब सूखी मिट्टी पर कई लोग थे, भगवे कपड़ों में, हाथों में कमंडल और दंड लिए। उनके बीच एक बूढ़ा था, लंबी सफ़ेद दाढ़ी, कंधों तक जटाएँ, और आँखों में वह शांति जो या तो बहुत बड़ी तपस्या से आती है, या बहुत बड़े डर से। मीरा ने उसे नहीं पहचाना, पर वह जानती थी कि यही पहला आमिल है। नाम उसका नदी की याद में नहीं था, सिर्फ़ 'गुरु'।
गुरु और उसके शिष्य सूखी नदी की तली में चल रहे थे। उनके क़दमों के नीचे मिट्टी काँप रही थी। जहाँ-जहाँ वे चलते, कुछ गड्ढों से पानी की एक पतली धार ऊपर उठती, फिर काँपकर वापस नीचे चली जाती, जैसे भूख से बेहाल किसी ज़िंदा चीज़ ने साँस ली हो।
"उसकी प्यास अब जाग चुकी थी," आवाज़ ने कहा। "वह ऊपर आने लगी थी। जो कुएँ बचे थे, वे सूखने लगे। जो पानी के गड्ढे थे, वे ग़ायब होने लगे। गाँवों के घड़े रात में ख़ाली हो जाते थे। बच्चे सोते-सोते सूख जाते थे। मैं यह सब रोकना चाहती थी, पर मैं तब तक मेरा नाम खो चुकी थी। मैं सिर्फ़ प्यास थी।"
गुरु ने अपना कमंडल ज़मीन पर रखा। उसने शिष्यों को इशारा किया, और वे एक गोल घेरे में बैठ गए, जैसे वे सात आमिल बैठे थे बाद में, एक गोल में, ज़मीन पर हाथ टिकाकर। पर यहाँ सात नहीं, सिर्फ़ तीन थे। गुरु और उसके दो शिष्य। और उनके पीछे, चट्टान की ओट से, चुपचाप झाँकता हुआ मल्हार।
"हम इसे दबा देंगे," गुरु ने कहा। उसकी आवाज़ बहुत गहरी थी, किसी पुराने कुएँ जैसी। "यह इस मिट्टी के नीचे है। जब तक यह जागती रहेगी, यह हर बूँद पी जाएगी, और जब तक कोई बूँद नहीं बचती, यह बाहर ऊपर आएगी। हमें इसे सुलाना होगा।"
"कैसे, गुरुदेव?" एक शिष्य ने पूछा।
"रेत से।"
गुरु ने आसमान की ओर हाथ उठाए, और पहली बार मीरा ने उस पूरी भूमि पर हवा को चलते देखा। दूर पश्चिम से रेत उठ रही थी, पीली, भारी, हवा के साथ-साथ, और वह रेत नदी की सूखी तली की ओर बह रही थी। हर कण के साथ गुरु के शब्द थे, मंत्र, सैकड़ों, हज़ारों, और रेत नीचे गिरती गई, परत दर परत, टीले दर टीले। उसने नदी के बिस्तर को ऊपर से ढक दिया, एक मोटी, गर्म चादर की तरह, और उसके नीचे, बहुत नीचे, प्यास दब गई।
"उन्होंने मुझे नहीं मारा," नदी की आवाज़ ने कहा। "वे मुझे मार नहीं सकते थे। उन्होंने मुझे सुला दिया। मुझे ऊपर से ढक दिया। और जिस रेत ने मुझे ढका, उसे लोग आज रेगिस्तान कहते हैं।"
"रेत..." मीरा के होंठों से निकला। "रेत तुम्हारी क़ब्र है।"
"और मेरा पिंजरा।"
मीरा ने मल्हार को देखा। वह चट्टान की ओट से बाहर आ चुका था और गुरु के सामने घुटनों के बल गिरा हुआ था। उसके हाथ जुड़े थे और उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
"गुरुदेव, मत कीजिए," वह रो रहा था। "यह माँ है। यह नदी है। हम इसे ऐसे नहीं छोड़ सकते। इसे पानी दीजिए। इसे बस पानी चाहिए। वह सिर्फ़ प्यासी है।"
गुरु ने उसकी ओर देखा, और उसकी आँखों में दया थी। "बच्चे," उसने कहा, "तू नहीं जानता कि क्या कह रहा है। यह जो नीचे है, यह अब नदी नहीं है। यह प्यास है। और प्यास को पानी दो तो वह और प्यासी होती है। उसे जितना भरो, उतना ख़ाली होती है। यह तब तक बढ़ती जाएगी जब तक सब कुछ नहीं निगल लेती।"
"आप झूठ बोल रहे हैं," मल्हार ने कहा। उसकी आवाज़ में अब रोना नहीं था, सिर्फ़ एक सख़्ती थी। "मैंने उसे सुना है। मैंने उसे पुकारा, और उसने मुझे सुना। वह बुरी नहीं है।"
"वह बुरी नहीं है," गुरु ने कहा। "इसीलिए यह सबसे बड़ा ख़तरा है। जो बुरा हो, उससे सब डरते हैं। जो अच्छा हो और प्यासा हो, उसे सब पानी दे देते हैं, और फिर सब डूब जाते हैं।"
मल्हार ने सिर झुका लिया। उसका शरीर काँप रहा था। मीरा देख रही थी कि उसके भीतर कुछ टूट रहा है, कुछ ऐसा जिसे कोई जोड़ नहीं पाएगा।
"वह रात को मेरे पास आया," नदी की आवाज़ ने कहा। "जब सब सो गए, रेत के ऊपर, मेरी क़ब्र के पास, घुटनों के बल बैठकर। उसने मुझसे बात की। उसने कहा कि वह मुझे बाहर निकालेगा। मैंने कहा कि मैं अब किसी को नहीं निकाल सकती, मैं सिर्फ़ प्यास हूँ। उसने कहा कि कोई बात नहीं, वह मेरा केवट है, और केवट का काम है नदी को उसके किनारे तक पहुँचाना।"
मीरा ने देखा कि मल्हार ने अपनी हथेली रेत पर टिकाई और उसके नीचे से एक पतली चाँदी की धार उसकी कलाई पर चढ़ गई, बिल्कुल वैसी जैसी उसकी अपनी कलाई पर थी।
"उसने अपनी परछाईं मुझे दी," आवाज़ ने कहा। "उसने मुझसे कहा, 'मेरी परछाईं रख ले, माँ। इसके सहारे तू बाहर देख सकेगी। मैं तेरी आँखें बनूँगा।' मैंने उसे रोका, पर वह नहीं माना। और जिस पल मैंने उसकी परछाईं ली, वह अमर हो गया, पर वह इंसान भी नहीं रहा।"
मीरा की साँस रुक गई। मल्हार का शरीर रेत पर झुका हुआ था, और उसके पैरों से एक परछाईं उठकर ज़मीन में समा रही थी, जैसे कोई चादर खींचकर नीचे उतार ले। जब वह खड़ा हुआ, तो चाँदनी में उसके पास कोई परछाईं नहीं थी।
"उसके बाद वह तीन हज़ार साल जीता रहा। उसने नाम बदले, चेहरे बदले, आवाज़ें चुराईं। वह हर उस आदमी का रूप ले सकता था जिसे वह देख ले। उसने कभी किसी को मारा नहीं। पर वह मेरे लिए रास्ते ढूँढता रहा। हर पीढ़ी में। हर सिलसिले में। हर आमिल के पीछे वह साया बनकर घूमता रहा, इस आस में कि कभी कोई चाबी मिल जाएगी।"
"और जब गुरु मरा?" मीरा ने पूछा।
"उस रात गुरु को उसी ने मारा था।" आवाज़ में दुख था, पर कोई इल्ज़ाम नहीं। "जब गुरु ने सात ताले बनाए, तो उन्हें खोलने की एक ही कुंजी थी, और वह गुरु के ही पास थी। मल्हार ने उससे कहा कि वह कुंजी दे दे। गुरु ने मना कर दिया। मल्हार ने उसे समझाया, गिड़गिड़ाया, फिर ग़ुस्से में आकर..." आवाज़ टूट गई।
मीरा चुपचाप खड़ी रही। उसे अब समझ में आ गया था कि यह आदमी, जिसे उन्होंने चार दिन तक दैत्य समझा, किस तरह एक नदी के सबसे वफ़ादार बेटे से तीन हज़ार साल के हत्यारे में बदल गया था। हर क़दम पर उसके पास एक अच्छी वजह थी। हर पाप के पीछे एक और भी गहरी मोहब्बत।
दृश्य एक बार और बदला। अब मीरा रात में सूनगढ़ की सातवीं सीढ़ी के नीचे थी। चाँद ऊँचा था, और बावड़ी की सीढ़ियाँ वैसी ही थीं जैसी उसने देखी थीं, पर उनके ऊपर किला अभी नहीं बना था। सिर्फ़ सूखी, चट्टानी ज़मीन थी, और एक छोटा सा गड्ढा, जिसके चारों ओर सात पत्थर गड़े थे।
उस गड्ढे के पास एक छोटी सी लौ जल रही थी। उसे देखकर मीरा पहचान गई। यह एक धुँधली, लाल, नन्ही सी चिंगारी थी, जो ज़मीन से कुछ ऊपर काँप रही थी, जैसे कोई बच्चा सहमकर सो रहा हो।
"मेरा पहला आँसू," नदी की आवाज़ ने कहा, और उसमें अचानक एक अनजानी, फूट-फूटकर रोने वाली ममता थी। "जिस रात मुझे रेत से ढका गया, मैंने सिर्फ़ एक बार रोया। मेरा आँसू आग बन गया, क्योंकि मेरी प्यास इतनी जलती हुई थी कि आँसू पानी नहीं रह सका। उसी आँसू ने अपना नाम ख़ुद चुना। शरर। उसने कहा कि वह चिंगारी है, और चिंगारी का काम है रखवाली करना।"
मीरा की आँखों से आँसू बह निकले। उसने उस नन्ही लौ की ओर हाथ बढ़ाया, पर उसकी उँगलियाँ हवा में ही रुक गईं।
"शरर तुम्हारा बेटा है," उसने कहा।
"वह मेरी चिंगारी है। और वह मेरी सबसे अकेली संतान है। उसे मैंने बँधा हुआ रखवाला बना दिया, क्योंकि मैं डरती थी कि कोई मुझे जगाने आया तो वह अपनी जान से पहले मेरी जान बचाएगा। मैं उसे वह करने से रोकना चाहती थी जो मैं नहीं रोक पाई थी।"
"तुमने उसे रखवाला क्यों बनाया?"
"क्योंकि मैं चाहती थी कि वह बचा रहे। जब मैं जागूँगी तो सब कुछ निगल जाऊँगी, बेटी। मैं यह जानती हूँ। मैं नहीं चाहती कि कोई मेरी प्यास को मेरे नाम से पुकारे और मैं उसे बुझाने के लिए सब कुछ पी जाऊँ। मैं चाहती हूँ कि कोई मुझे वह दे जो पानी नहीं है।"
मीरा की आँखें खुलीं। "क्या?"
"मैंने तीन हज़ार साल इंतज़ार किया है," नदी की आवाज़ ने कहा। "कोई मुझे पानी देता है, कोई मुझे रेत से ढकता है, कोई मुझे नाम देता है। पर किसी ने मुझे वह नहीं दिया जो मुझे सबसे ज़्यादा चाहिए।"
"क्या?"
पानी की आवाज़ कुछ पल चुप रही, और उस चुप्पी में मीरा को सुनाई दिया कि कैसे एक विशाल, थकी हुई, प्यासी चीज़ अपने भीतर के सबसे छोटे, सबसे कोमल हिस्से को खोलती है।
"याद।"
"मुझे याद चाहिए। मुझे यह जानना है कि मैं कौन थी। मैं अपना नाम खो चुकी हूँ। मुझे अपना असली नाम वापस चाहिए, बेटी। वह नाम जो मेरे बच्चे मुझे तब कहते थे जब मैं बह रही थी। उसके बिना मैं सिर्फ़ प्यास हूँ। और प्यास का कोई घर नहीं होता।"
मीरा ने अपने हाथ की हथेली देखी। वह बूँद अब भी उसकी हथेली में थी, सोने जैसी चमकती हुई। उसमें हज़ारों साल की गूँज बैठी थी। और उसे अचानक वह बात याद आई जो तख़्ती पर लिखी थी।
जो पुकारा गया, वह सोया न रहे।
वह नाम से जागने की बात थी। रक्षक रक्त से नहीं, नाम से जागता है। और नदी को जिस चीज़ की ज़रूरत थी, वह भी नाम ही था।
"मैं तुम्हारा नाम नहीं जानती," उसने बहुत धीरे से कहा।
"मैं जानती हूँ।"
"फिर?"
"मैं तुम्हें नहीं बता सकती। इसलिए नहीं कि मैं बँधी हूँ। मैं इसलिए नहीं बता सकती क्योंकि मैं ख़ुद उसे भूल चुकी हूँ। पर वह इस दुनिया में कहीं है। किसी की ज़बान पर, किसी के गीत में, किसी की कथा में। तुम्हें उसे ढूँढना होगा।"
मीरा की आँखों के सामने सब कुछ धुँधला पड़ने लगा। सूखी मिट्टी, चाँद, सात पत्थर, नन्ही लौ, सब पानी की तरह बह चले। उसने हाथ बढ़ाकर नदी की आवाज़ को पकड़ना चाहा, पर वह पीछे हट रही थी, धीरे-धीरे, जैसे किसी बहुत बड़ी चीज़ को छोड़कर जाने का समय आ गया हो।
"रुको!" उसने चिल्लाया। "मल्हार कौन है? उसे मैं क्या बताऊँ?"
"उसे बताना कि उसकी बहन का नाम जमुना था।"
मीरा का दिल रुक गया।
"उसे बताना कि जिस रात वह मरी, उसने मुझसे कहा था, 'माँ, भैया को मत डाँटना। वह थक गया है।' मैंने यह बात कभी उसे नहीं बताई, क्योंकि मैं बोल नहीं सकती थी। अब तुम बताओगी।"
मीरा की आँखों से आँसू बह निकले। उसने दोनों हाथों से अपनी हथेली को सीने से लगा लिया।
"मैं बताऊँगी। मैं वादा नहीं करती, पर मैं बताऊँगी।"
"यही सबसे पक्का वादा है।"
और फिर सब कुछ बहकर चला गया।
मीरा की आँखें खुलीं और उसने सबसे पहले छत देखी। कुएँ की गोल, काली, नमी से भरी छत, जिस पर नीली लौ वाले दीयों की रोशनी काँप रही थी। उसके कानों में सबसे पहले हकीम की आवाज़ आई, घबराई हुई, बार-बार दोहराती हुई, "मीरा बेटी, मीरा बेटी, उठो, हमारी बात सुन रही हो?"
उसने सिर घुमाया। वह पानी में पीठ के बल पड़ी थी, उसका सिर भंवर की गोद में था, और उसके चारों ओर सब झुके हुए थे। विजय के चेहरे पर आँसू और राहत दोनों थे। हकीम ने उसकी कलाई पकड़ रखी थी। उसकी हथेली अब भी बंद थी, और भीतर वह बूँद अब भी चमक रही थी, गर्म, धड़कती हुई।
"कितनी देर?" उसने भर्राई आवाज़ में पूछा।
"लगभग एक घंटा," भंवर ने कहा। "आप हिल भी नहीं रही थीं। आपकी आँखें खुली थीं, पर उनमें..." वह रुका। "उनमें कुछ नहीं था, मैडम।"
एक घंटा। मीरा ने जल्दी से कबीर की ओर देखा, जो पास के सूखे पत्थर पर पड़ा था। उसकी छाती अभी चल रही थी, बहुत धीमे, पर चल रही थी। उसके चारों ओर नमक की मोटी लकीर किसी ने खींच दी थी।
"परछाईं?"
"अब भी वहीं खड़ी है," विजय ने कहा। उसका गला बैठा हुआ था, और उसकी आवाज़ में पूरी रात की थकान थी। "मैंने उसे रोक रखा है, दीदी। मैं इतनी देर से उसे रोक रहा हूँ। पर मैं ज़्यादा देर नहीं रोक पाऊँगा।"
मीरा ने उठने की कोशिश की। भंवर ने उसे सहारा दिया। वह खड़ी हुई, पानी उसके घुटनों तक था, और उसकी पूरी देह बर्फ़ की तरह काँप रही थी। पर उसकी आँखें साफ़ थीं।
कक्ष के बीच में, द्वार के ठीक सामने, चेहरा विहीन आदमी खड़ा था। उसने उसे देखा, और उसके चेहरे पर पहली बार हल्की सी बेचैनी थी। जैसे कोई चोर पकड़ा जाने वाला हो, पर ख़ुद नहीं जानता कि किस बात पर।
शरर उसके सामने, कुछ दूरी पर, खड़ा था। उसके अंगारे बुझे हुए थे, सिर्फ़ दो धीमी, काँपती लौ बची थीं, और वह मीरा को ऐसी नज़र से देख रहा था जिसमें सवाल और डर और उम्मीद, तीनों एक साथ थे।
"तुमने सुना," उसने कहा। "उसने तुम्हें अपनी कहानी बताई।"
"हाँ," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, पर कक्ष की हर दीवार से टकराकर सब तक पहुँची। "और तुम्हारी भी, शरर। तुम्हें मैंने देखा। पहली रात। एक नन्हीं, काँपती चिंगारी। तुम उसका आँसू थे।"
शरर के कंधे हिले। कोई शब्द उसके होंठों तक आया और रुक गया।
मीरा ने चेहरे विहीन आदमी की ओर मुँह किया। उसका हाथ अब भी बंद था, और उसके भीतर की बूँद उसके दिल की ताल पर धड़क रही थी।
उसने बहुत धीमे से, एक-एक अक्षर को तौलकर, कहा:
"मल्हार।"
- Writer
- firoj saifi
- Story
- रेत का क़ैदी
- Chapter
- 19 of 30
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 18 min
- Words
- 3512
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
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