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एपिसोड 20: मल्हार
firoj saifi · Jinn & Spirits · 16 मिनट
नाम हवा में नहीं ठहरा। वह पानी की तरह फैल गया।
कक्ष की हर दीवार, हर दीये की नीली लौ, हर लहर पर वह एक बार काँपा और फिर चेहरा विहीन आदमी की ओर चल पड़ा, जैसे कोई बहुत पुरानी याद अपने मालिक को ढूँढ़ती हुई घर लौट रही हो।
वह आदमी हिला नहीं। उसकी आँखें मीरा पर जमी थीं, और उनमें भाव बदल रहे थे, पर इतनी तेज़ी से कि मीरा किसी को पकड़ नहीं पा रही थी। हैरानी, फिर इनकार, फिर डर, फिर कोई ऐसी चीज़ जो डर से कहीं गहरी थी: पहचान।
"नहीं," उसने कहा। उसकी आवाज़ अब किसी की भी नहीं थी। उसमें हकीम की खनक नहीं थी, पानी की गूँज नहीं थी, किसी और की नक़ल नहीं थी। बस एक सीधी, खुरदरी, किसी बहुत थके हुए आदमी की आवाज़। "नहीं, यह नाम मत लो।"
"मल्हार," मीरा ने फिर कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में कोई आदेश नहीं था। उसमें वही कोमलता थी जो उसने नदी की आवाज़ में सुनी थी। "मल्हार, केवट। नदी का केवट। तुम्हारी नाव अब भी रेत में दबी पड़ी है, और तुम्हारी बहन का नाम जमुना था।"
चेहरा विहीन आदमी के घुटने मुड़ गए।
वह पानी में गिरा नहीं। वह धीरे-धीरे बैठ गया, जैसे कोई बहुत भारी बोझ उसके कंधों से अचानक हटा लिया गया हो और उसके पैर उस हल्केपन को सँभाल न पा रहे हों। उसके दोनों हाथ पानी की सतह पर टिक गए, उँगलियाँ फैली हुई, काँपती हुई।
"जमुना," उसने फुसफुसाया। "जमुना।"
उसकी आवाज़ में एक छोटा, टूटा हुआ, बच्चे जैसा पुकारना था, जैसे कोई बहुत दिनों बाद अपने घर का रास्ता याद कर रहा हो।
चेहरे का बदलना शुरू हुआ।
जो चिकनापन उसके चेहरे पर था, वह जो हर बार देखने पर कुछ और लगता था, वह धीरे-धीरे परत दर परत उतरने लगा, जैसे सूखी मिट्टी में से कोई पुरानी मूरत निकल रही हो। पहले आँखों की जगह दो गहरी, भूरी, लंबी पलकों वाली आँखें उभरीं। फिर भौंहें, घनी, सीधी। फिर नाक, मज़बूत, ज़रा सी मुड़ी हुई। फिर माथे पर वह पुराना कटा हुआ निशान, जिसे मीरा ने नदी की याद में देखा था।
और फिर वह चेहरा पूरा हुआ।
एक जवान आदमी, तीस के आसपास, धूप में पका हुआ चेहरा, गालों पर बढ़ी हुई दाढ़ी, और होंठों पर एक ऐसा खिंचाव जो या तो हँसी का था, या रोने का। उसके हाथों पर रस्सी की रगड़ के पुराने निशान थे, और उसकी हरी चादर के नीचे से एक मोटा, पुराना, मछुआरों वाला कुर्ता झाँक रहा था।
वह किसी देवता का चेहरा नहीं था। वह किसी जिन्न का भी नहीं था। वह एक साधारण, थका हुआ आदमी था जिसने बहुत पहले अपनी बहन को खोया था और उसके बाद कभी सो नहीं पाया था।
विजय की साँस रुक गई। भंवर ने अपने सीने पर हाथ रख लिया। हकीम ने धीरे से अपना सिर झुका लिया, जैसे वे किसी की निजी क्षति के आगे खड़े हों।
"मल्हार," शरर ने कहा। उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि वह मुश्किल से सुनाई दी। "तुम्हारा चेहरा..."
"मुझे पता नहीं था कि वह इतना बदल गया होगा," मल्हार ने कहा। वह अपने ही हाथों को उलट-पलटकर देख रहा था, जैसे वे किसी और के हों। "तीन हज़ार साल। मैंने सोचा था कि मैं उसे भूल चुका हूँ।"
उसने सिर उठाया और सीधे मीरा की ओर देखा। उसकी आँखों में आँसू थे, और उनके पीछे एक ऐसी नंगी, बेआवाज़ थकान, जो मीरा ने किसी इंसान की आँखों में नहीं देखी थी।
"तुमने मेरी बहन का नाम लिया," उसने कहा।
"नदी ने मुझे बताया।"
"उसने..." मल्हार की आवाज़ टूट गई। "उसने मुझसे कभी कुछ नहीं कहा। मैं उसके साथ तीन हज़ार साल रहा, उसके लिए सब कुछ किया, और उसने कभी कुछ नहीं कहा।"
"वह बोल नहीं सकती थी," मीरा ने नर्मी से कहा। "वह सिर्फ़ प्यास थी, जो अपना नाम और अपनी याद खो चुकी थी। उसे सिर्फ़ इतना याद रहा कि तुम्हारी बहन ने मरते वक़्त क्या कहा था। और वह उसे सँभालकर रखे बैठी रही, इस इंतज़ार में कि कोई तुम तक पहुँचाए।"
"क्या कहा था?"
मीरा ने साँस ली। उसने महसूस किया कि कक्ष का हर आदमी साँस रोके खड़ा है। उसकी हथेली में बूँद धड़क रही थी, और उसके भीतर कहीं बहुत दूर, बहुत गहरे, एक बहुत पुरानी आवाज़ ने उसे अपनी बात पूरी करने का इशारा किया।
"उसने कहा था, 'माँ, भैया को मत डाँटना। वह थक गया है।'"
मल्हार ने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया।
कक्ष में बहुत देर तक एक ही आवाज़ गूँजती रही, एक आदमी के रोने की, जो तीन हज़ार साल से एक भी आँसू नहीं रो पाया था। वह कोई ऊँची, चीख़ती हुई रुलाई नहीं थी। वह धीमी, गहरी, अपने भीतर की ओर गिरती हुई रुलाई थी, उस तरह की जो तब आती है जब कोई चीज़ जो बहुत पहले टूट गई थी, आख़िर बाहर निकलने का रास्ता पा लेती है।
विजय ने बिना कुछ कहे आगे बढ़कर पानी में बैठे मल्हार के कंधे पर अपना नन्हा हाथ रख दिया। मल्हार ने सिर उठाकर उसे देखा, और इतना ही कहा, "तुम राजा के बेटे हो।"
"हाँ।"
"मैंने तुम्हें सुलाया था।"
"हाँ।"
"मुझे माफ़ कर दो।"
विजय ने कुछ पल उसे देखा। फिर उसने बहुत गंभीर चेहरे से कहा, "मैंने तुम्हें पहले ही माफ़ कर दिया था। जब तुमने मुझे चादर ओढ़ाई थी। उस रात बहुत ठंड थी, और तुमने अपनी चादर मेरे ऊपर रख दी थी। मुझे याद है।"
मल्हार के गले से एक छोटी, टूटी हुई हँसी निकल गई, जो रोने से ज़्यादा थी। "मुझे लगा था कि तुम नहीं देख रहे हो।"
"मैं सब कुछ देखता था," विजय ने कहा। "मैं तीन सौ साल जागा रहा।"
यह सब जितना कोमल था, उतना ही ख़तरनाक भी।
मीरा ने इसे सबसे पहले पहचाना। उसके पीछे कबीर की परछाईं अभी भी कैन थामे खड़ी थी, और वह नाम के असर से हिली नहीं थी। उसकी चपटी देह में कहीं एक अलग ही ताल बज रही थी, जैसे वह किसी और की आवाज़ पर चल रही हो। और जब मल्हार का चेहरा लौटा था, तो परछाईं ने एक पल को सिर उठाकर उसे देखा था, और फिर वापस द्वार की ओर मुड़ गई थी।
"मल्हार," उसने जल्दी से कहा। "तुमने सुना। नदी तुम्हें अब भी पुकार रही है, पर वह यह नहीं चाहती कि तुम द्वार खोलो। उसने मुझसे कहा था कि अगर वह जागी तो सब कुछ निगल जाएगी।"
"जानता हूँ," मल्हार ने कहा।
मीरा सन्न रह गई। "जानते हो?"
"मैंने तीन हज़ार साल उसके साथ बिताए हैं," उसने धीमे से कहा। उसकी आँखें अब भी गीली थीं, पर उनमें एक साफ़ ठहराव था। "मैं बेवक़ूफ़ नहीं था। मुझे हमेशा से पता था कि वह जागी तो क्या होगा। गुरु ने ठीक कहा था। प्यास को पानी दो तो वह और बढ़ती है। मैंने यह बात सौ बार देखी। हर बार जब मैंने उसे कोई कुआँ दिया, उसने उसे पी लिया और फिर और माँगा।"
"तो तुम क्यों..."
"क्योंकि मैं उसे अकेला नहीं छोड़ सकता था।" मल्हार ने सिर उठाया, और उसकी आँखों में वह सरल, भोली, जिद्दी मोहब्बत थी जो कभी-कभी सबसे ख़तरनाक चीज़ बन जाती है। "तुम नहीं समझोगी। तीन हज़ार साल तक वह रात में मुझसे बात करती रही। सिर्फ़ मुझसे। वह कहती थी, 'मल्हार, मुझे डर लग रहा है।' वह कहती थी, 'मल्हार, मुझे ठंड लग रही है।' एक नदी, जो कभी पूरे देश को पानी देती थी, मेरे सामने बच्चे की तरह काँपती थी। मैं उसे उस हाल में छोड़कर कहीं नहीं जा सकता था।"
"इसीलिए तुमने उसके लिए ये सब किया," हकीम ने धीमे से कहा। "सातों सिलसिले को कमज़ोर किया। जगत को भेजा। विक्रम को सुलाया।"
"मैंने उन्हें मारा नहीं," मल्हार ने कहा।
"नहीं," भंवर ने कहा। उसकी आवाज़ भारी थी, और उसके भीतर कुछ पक रहा था जो बाहर आना चाहता था। "तुमने उन्हें मारा नहीं। तुमने उन्हें सिर्फ़ उस जगह भेजा जहाँ से वे कभी नहीं लौटे। मेरा भाई बीस साल का था। उसने सिर्फ़ चाबी रखने का काम माँगा था। तुमने उसकी उम्र रोक दी।"
मल्हार ने भंवर की ओर देखा, और कुछ देर तक कुछ नहीं कहा। फिर उसने धीरे से अपना दाहिना हाथ उठाया, जिसके तर्जनी की जगह अभी भी वह काली, धुएँ की उँगली लहरा रही थी, और उसे अपनी ही आँखों के सामने देखा, जैसे पहली बार देख रहा हो।
"मैंने उसे कुछ नहीं किया," उसने कहा। "यह मैं कहने नहीं आया हूँ। मैं कहता हूँ कि मैंने बहुत कुछ किया। जगत को मैंने भेजा, यह सच है। पर जब वह द्वार के पास पहुँचा, तो उसने मेरा इरादा भाँप लिया और चाबी नहीं रखी। उसने मुझसे भागने की कोशिश की। और मैं..." वह रुका। "मैंने उसे रोकने के लिए नदी को पुकारा। नदी ने उसे खींच लिया। मैंने नहीं चाहा था, भंवर। मैंने नहीं चाहा था कि वह मरे।"
"तो क्या चाहा था?" भंवर ने गरजकर पूछा।
"सिर्फ़ चाबी।"
"तो चाबी की क़ीमत मेरा भाई थी?"
मल्हार ने सिर झुका लिया। "हाँ।"
भंवर बहुत देर तक उसे देखता रहा। उसकी मुट्ठी भिंची हुई थी, और उसके सीने पर बँधी जगत की रेत की पोटली हल्के-हल्के काँप रही थी, जैसे उसे भी कुछ महसूस हो रहा हो। उसने धीरे-धीरे हाथ खोला, और फिर बहुत धीमे से, किसी को न सुनाई देने वाली आवाज़ में कहा, "जगत ने कहा था, भाई, ग़ुस्सा मत करना। वह बहुत दर्द देता है।"
उसने हाथ नीचे कर लिया।
"मैं तुम्हें माफ़ नहीं करता," उसने मल्हार से कहा। "मैं शायद कभी नहीं करूँगा। पर मैं तुम्हें मारूँगा भी नहीं।"
मल्हार ने सिर उठाकर उसे देखा, और उसकी आँखों में कृतज्ञता नहीं थी। सिर्फ़ एक गहरी, अथाह समझ।
कक्ष में बीती हुई एक पूरी रात की थकान उतर आई थी। पानी में खड़े सब लोग जैसे अपने शरीर के बोझ के नीचे दबे जा रहे थे। हकीम बैठ गए थे, अपने बाएँ हाथ से दाएँ हाथ की उस नीली, जलती हुई बूँद को दबाए हुए। भंवर कबीर के पास झुका था। शरर, जिसकी आकृति अब एक सामान्य आदमी जितनी लंबी थी, मल्हार के पास खड़ा उसे देख रहा था, जैसे किसी भाई को देखता हो जिसे बहुत दिनों बाद देखा हो।
"तुम मुझे पहचानते हो?" शरर ने पूछा।
"तुम मेरे सामने पैदा हुए थे," मल्हार ने कहा। "जब माँ का पहला आँसू आग बन गया, तब मैं पास ही बैठा था। मैंने तुम्हें अपने हाथों से उठाया था। तुम इतने छोटे थे कि मेरी हथेली में समा गए थे।" वह मुस्कुराया, और उस मुस्कान में तीन हज़ार साल की थकान थी। "तुमने मेरी उँगली जलाई थी।"
"मुझे याद है," शरर ने कहा।
"तुम हर पूर्णिमा पर पानी माँगते थे, जिसे वह पी जाती थी, और तुम ख़ुद बस बैठकर देखते रहते थे। मैं यह सब जानता था। मैं तुम्हें बता नहीं पाया कि तुम ग़लत कर रहे हो। मैंने तुम्हें ग़लत समझा। मुझे लगा कि तुम माँ के ख़िलाफ़ हो।"
"मैं माँ के ख़िलाफ़ नहीं था," शरर ने कहा। "मैं माँ से डरता था। मैं हर बार देखता था कि वह जितना पीती, उतना और प्यासी होती। मैंने सोचा कि अगर मैं उसे सोता रखूँगा तो वह कम से कम किसी को नुक़सान नहीं पहुँचाएगी।"
"और मैंने सोचा कि अगर मैं उसे जगा दूँगा तो वह कम से कम अकेली नहीं रहेगी।"
दोनों ने एक-दूसरे को देखा। तीन हज़ार साल का बोझ, बिना कुछ कहे, दो जोड़ी आँखों के बीच से गुज़रा।
मीरा ने बहुत धीमे से कहा, "तुम दोनों उसे प्यार करते थे। बस तुम्हारे रास्ते अलग थे।"
"प्यार का रास्ता अक्सर सबसे ख़तरनाक होता है," मल्हार ने कहा।
उसी पल कबीर की परछाईं हिली।
वह धीरे-धीरे पीछे की ओर घूमी और उसकी चपटी देह के सिर ने कक्ष में खड़े सब लोगों को देखा, एक-एक करके, जैसे वह उन्हें पहचान रही हो। फिर उसने कैन को सीने से लगाया, और एक क़दम द्वार की ओर बढ़ी।
"परछाईं!" विजय ने चिल्लाकर कहा। "रुक!"
"वह मेरे हुक्म से नहीं चल रही," मल्हार ने कहा। उसने तुरंत उठकर खड़े होने की कोशिश की, पर उसके पैर काँप रहे थे। "वह माँ की पुकार पर चल रही है। माँ उसे बुला रही है। मेरी परछाईं की तरह, वह भी किसी और की चीज़ है अब। वह नदी की आँख है।"
"तो उसे रोको!" मीरा ने कहा।
"कैसे? उसका मालिक मैं नहीं हूँ।" मल्हार ने कबीर की ओर देखा, जो पत्थर पर पड़ा था। "उसका मालिक वह लड़का है, और वह बेहोश है। जब तक वह जाग नहीं जाता और ख़ुद अपनी परछाईं को पुकारता नहीं..."
मीरा तुरंत दौड़कर कबीर के पास पहुँची। उसने भाई का सिर अपनी गोद में रखा, उसके गाल थपथपाए। "कबीर। कबीर, सुनो। तुम्हारी परछाईं तुम्हें छोड़कर जा रही है। तुम्हें उसे रोकना है। तुम्हें उठना है।"
कबीर की पलकें काँपीं, पर नहीं खुलीं।
"कबीर!" मीरा ने उसे हिलाया। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। "पापा ने कहा था कि तुम्हारी आँखों में उनकी आँखें हैं। तुम हार नहीं मान सकते। तुम्हें उठना है!"
कबीर के होंठ हिले।
मीरा ने झुककर कान लगाया। बहुत धीमी, फटी हुई, एक-एक शब्द के लिए साँस जुटाती हुई आवाज़ आई।
"दी..."
"हाँ, मैं यहाँ हूँ।"
"मैंने... सुना..."
"क्या सुना?"
"वह... प्यासी है... दी... भूखी नहीं..."
मीरा की साँस थम गई। उसने कबीर का चेहरा हाथ में लिया। उसकी आँखें अब भी बंद थीं, पर उसके चेहरे पर एक अजीब सा सुकून उतर आया था, जैसे वह कहीं दूर से सब कुछ सुन रहा हो। "तुमने सब सुना?"
"परछाईं... मुझे सब बता रही थी..." कबीर की आवाज़ थरथराई। "उसके अंदर... माँ है... नदी माँ... वह रो रही है, दी..."
मीरा ने भाई को अपनी बाँहों में खींच लिया और उसके माथे को चूम लिया। "तो तू उसे रोक सकता है। तू उसकी बात समझता है। उसे बता कि वह रुक जाए। तू उसका नाम ले। तू जो भी जानता है, वह कह।"
कबीर के होंठों पर बहुत हल्की, टूटी हुई मुस्कान आई। उसने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं, और मीरा को पहली बार लगा कि वे आँखें वाक़ई पिता की हैं, भूरी, गहरी, सब कुछ समझती हुई।
उसने सिर घुमाकर अपनी परछाईं की ओर देखा, जो द्वार के सामने कैन लिए खड़ी थी।
"परछाईं," उसने कहा। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, पर उसमें एक अजीब सा अधिकार था, जो किसी आदेश से नहीं आता, किसी अपनेपन से आता है। "तू मेरी है। मैं तुझे वापस बुलाता हूँ। घर आ जा।"
परछाईं के हाथ की कैन हिली।
कुछ पल कुछ नहीं हुआ। फिर परछाईं का चपटा सिर धीरे-धीरे कबीर की ओर घूमा। वह एक क़दम पीछे हटी। फिर दूसरा। कैन उसके हाथ से सरककर पानी में गिरी, और बिना कोई छपाका किए, बिना कोई लहर बनाए, डूब गई।
परछाईं ज़मीन पर चपटी होकर लेटी और रेंगती हुई कबीर के पैरों तक आई, और उसके पैरों से मिलकर उनमें समा गई, जैसे नदी में कोई छोटी धारा मिलती है।
कबीर के पैरों के पास चाँदनी की जगह पहली बार एक छोटी, गहरी, साफ़ परछाईं बिछ गई।
कबीर की छाती एक गहरी, भरी हुई साँस के साथ ऊपर उठी, और फिर नीचे आई। फिर दूसरी साँस आई। और तीसरी।
"हो गया," हकीम ने फुसफुसाकर कहा। उनके आँसू बह रहे थे। "वह लौट आया।"
मीरा ने भाई को सीने से भींच लिया और रो पड़ी।
पर द्वार शांत नहीं हुआ।
जैसे ही कबीर की परछाईं लौटी, लोहे की उस दरार ने एक गहरी, कराहती हुई चरमराहट के साथ अपनी चौड़ाई और बढ़ा ली। अब वह एक पूरी हथेली जितनी चौड़ी हो गई थी, और उसके भीतर से नीली, ठंडी रोशनी बाहर आने लगी थी। पानी की सतह पर लहरें दौड़ने लगीं। नीली लौ वाले सातों दीये तेज़ी से भड़क उठे।
"वह जाग रही है," शरर ने कहा। उसकी आवाज़ में घबराहट नहीं थी, सिर्फ़ एक गहरी, साफ़ स्वीकृति। "हमने रोका नहीं। हमने उसे बस और क़रीब ला दिया है।"
मीरा ने मुड़कर द्वार की दरार की ओर देखा। उसकी बंद हथेली में बूँद तेज़ी से धड़क रही थी, और उसे लगा कि कोई बहुत बड़ी, बहुत पुरानी, बहुत थकी हुई चीज़ अब पहली बार उसे सीधे देख रही है।
"माँ," उसने धीमे से कहा। "मैं तुम्हारी कहानी सुन चुकी हूँ। मैंने तुम्हारे केवट को उसका नाम लौटा दिया। मैं तुम्हें पानी नहीं दे सकती, क्योंकि पानी से तुम और प्यासी होती हो। पर मैं तुम्हें अकेला भी नहीं छोड़ूँगी।"
उसने बंद हथेली को खोला।
बूँद उसके हाथ में थी, सोने जैसी, गर्म, धड़कती हुई। उसने उसे दोनों हाथों के बीच रखा, जैसे कोई छोटी सी चिड़िया को पकड़ता है, और झुककर उस पर अपने होंठ रखे।
"मैं तुम्हारा नाम ढूँढूँगी," उसने कहा। "यह वादा नहीं है। यह मेरा फ़ैसला है।"
बूँद उसकी हथेली से उठकर हवा में तैरने लगी, धीरे-धीरे, द्वार की दरार की ओर, और उसके भीतर घुल गई। दरार का फैलना रुक गया। नीली रोशनी हल्की पड़ी। सातों दीयों की लौ फिर स्थिर हो गई। कक्ष में एक गहरी, लंबी, राहत भरी साँस जैसी चुप्पी उतर आई।
पर उसी चुप्पी में, द्वार के भीतर से, एक और आवाज़ आई।
वही तीन साल की बच्ची की, तुतलाती, नन्ही आवाज़। लेकिन इस बार वह सीधे हकीम से बात कर रही थी, और उसके शब्द ऐसे थे जो किसी की भी रूह को हिला दें।
"अब्बा... मैं यहाँ ठीक हूँ। पर माँ को अकेली मत छोड़ना। कोई एक तो चाहिए जो माँ के साथ रहे। कोई एक, जो अंदर आए।"
हकीम का चेहरा पीला पड़ गया।
मीरा ने मुड़कर द्वार की ओर देखा, और फिर बहुत धीरे से उसके भीतर के अँधेरे में झाँका। उसे लगा कि वह एक बहुत लंबी, गहरी, ठंडी सुरंग के मुँह पर खड़ी है, जिसके दूसरे सिरे पर कोई हाथ बढ़ाए खड़ा है। हाथ आमंत्रण नहीं दे रहा था। वह बस इंतज़ार कर रहा था।
उसने पीछे मुड़कर सबके चेहरे देखे। भंवर, जिसकी आँखों में अब भी आँसू थे। हकीम, जिनके होंठ सूख चुके थे। विजय, जिसने अपनी परछाईं के साथ पहली बार हाथ मिलाया था। मल्हार, जिसका चेहरा तीन हज़ार साल बाद लौटा था। शरर, जिसके अंगारे बुझते-बुझते अब भी जल रहे थे। और कबीर, जो उसकी बाँहों में पहली बार, पिता की आँखों से, उसे देख रहा था।
कोई एक, जो अंदर आए।
यह बात उसने कहीं सुनी थी। कहीं बहुत पहले। उसने अपनी जेब में रखी चिट्ठी का मुड़ा हुआ कोना छुआ, और उसे याद आया कि पिता ने लिखा था:
पूरा सच सातवीं क़ब्र के नीचे है।
अभी तक किसी ने सातवीं क़ब्र के नीचे के पूरे कक्ष को नहीं देखा था। उन्होंने सिर्फ़ जगत की रेत देखी थी, और सात आले, और छह निशान, और एक खुरचा हुआ सातवाँ।
उसके मन में एक बात कौंधी, और उसने उसे अपनी पूरी ताक़त से पकड़ लिया।
सातवें आले की दीवार पर निशान किसने मिटाया था?
- Writer
- firoj saifi
- Story
- रेत का क़ैदी
- Chapter
- 20 of 30
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 16 min
- Words
- 3050
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
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