Pretika › Jinn & Spirits › रेत का क़ैदी
एपिसोड 21: चालीस दिन
firoj saifi · Jinn & Spirits · 16 मिनट
द्वार की दरार से आई वह नन्ही आवाज़ कुछ देर तक कक्ष की गोल दीवारों से टकराती रही, फिर धीरे-धीरे पानी की सतह में घुल गई। उसके पीछे जो चुप्पी छूटी, वह किसी भी चीख़ से ज़्यादा भारी थी।
कोई एक, जो अंदर आए।
सबसे पहले हकीम हिले। वे घुटनों के बल पानी में बैठे थे। बिना किसी से कुछ कहे उन्होंने हथेलियाँ पत्थर पर टेकीं और उठने लगे। उनके बूढ़े घुटने काँप रहे थे, पर उनकी आँखें दरार पर जमी थीं, जैसे किसी भूखे आदमी की आँखें रोटी पर जम जाती हैं।
"हकीम साहब," भंवर ने उनका बाज़ू थाम लिया।
"छोड़ दो, भंवर।"
"नहीं छोड़ूँगा।"
"चालीस साल हो गए," हकीम ने कहा। उनकी आवाज़ किसी बहुत पतली दरार से निकलती लग रही थी। "चालीस साल से मैं हर रात उस कटोरे को याद करके सोता हूँ जो मैंने उसके होंठों तक देर से पहुँचाया था। आज वह मुझे बुला रही है, और तुम मुझे रोक रहे हो?"
"मैं आपको रोक नहीं रहा। मैं आपको बचा रहा हूँ।" भंवर की आवाज़ भारी थी, पर उसकी पकड़ में ज़रा ढील नहीं थी। "मैंने जगत को जाते देखा था, हकीम साहब। तब मैं सिर्फ़ चिल्लाया था, पकड़कर नहीं रोका। आज मैं चिल्लाऊँगा नहीं। आज मैं पकड़कर रखूँगा।"
हकीम ने उसके हाथ से बाँह छुड़ाने की कोशिश की, पर बूढ़ी हड्डियों में उतनी जान नहीं बची थी। वे थककर भंवर के कंधे पर झुक गए, और भंवर ने उन्हें ऐसे थाम लिया जैसे कोई बेटा अपने बाप को थामता है।
मीरा उनके पास आई। "हकीम साहब, अंदर जो भी है, वह आपकी बेटी की आवाज़ बोलना जानता है। हमें अभी नहीं पता कि वह नक़ल है या असली। और अगर असली हो, तो भी असली आवाज़ हमें फंदे तक ले जा सकती है। शरर ने मेरे पिता के बारे में सब कुछ सच कहा था, फिर भी वह एक जाल था।"
"वह असली है," हकीम ने फुसफुसाकर कहा। "मैं जानता हूँ।"
"शायद। पर जानना और सुरक्षित होना दो चीज़ें हैं।"
"वह ठीक कहती है, रुस्तम," शरर ने कहा। वह कक्ष के किनारे खड़ा था, उसका क़द अब एक साधारण आदमी जितना रह गया था और सीने में दो अंगारे थके हुए सुलग रहे थे। "द्वार के भीतर कौन है, यह हममें से किसी ने नहीं देखा। मैंने भी नहीं। तीन हज़ार साल मैं इस द्वार के सामने खड़ा रहा, पर माँ ने मुझे कभी भीतर नहीं बुलाया। हर बार जब मैंने पूछा, उसने बस इतना कहा कि बेटा, तू बाहर ही ठीक है।"
"और मुझे भी नहीं," मल्हार ने कहा। वह पानी से उठकर एक सूखे पत्थर पर बैठ गया था, हरी चादर घुटनों पर, और अपने नए चेहरे को बार-बार हथेली से छूकर देख रहा था। "तीन हज़ार साल में मैंने उसके लिए सब कुछ किया, पर उसने मुझे एक बार भी अपने भीतर आने की इजाज़त नहीं दी। मैंने सोचा था कि वह मुझे इस लायक़ नहीं समझती। आज मुझे अचानक लगता है कि वह मुझे बचा रही थी।"
"चाँद पश्चिम की ओर उतर रहा है," शरर ने कहा। "जब वह क्षितिज को छुएगा, तब द्वार अपने आप पूरा खुल जाएगा, चाहे हम कुछ करें या न करें। दो घंटे, शायद उससे थोड़ा ज़्यादा।"
"दो घंटे," विजय ने दोहराया। वह अपनी परछाईं के पास खड़ा था और बार-बार उसे देख लेता था, जैसे डरता हो कि वह फिर खो जाएगी।
मीरा ने गहरी साँस ली और सबको बारी-बारी देखा। उसके भीतर एक सवाल पिछले आधे घंटे से घूम रहा था, और अब उसे पूछने का वक़्त आ गया था।
"मल्हार," उसने कहा।
उसने सिर उठाया। इस नाम पर उसके चेहरे पर हर बार वही कच्ची सी चौंक उभरती थी, जैसे किसी बहुत पुरानी चोट पर हाथ पड़ गया हो।
"तुम चालीस दिन तक मेरे पिता के साथ रहे। तुमने उन्हें खाना दिया, पानी दिया, कंबल दिया। तुमने उन्हें ज़िंदा रखा। क्यों?"
कक्ष में चुप्पी छा गई। हकीम और भंवर भी उसकी ओर मुड़ गए।
मल्हार देर तक अपने हाथों को देखता रहा। फिर उसने बहुत धीमे, जैसे हर शब्द को पहली बार तौल रहा हो, कहना शुरू किया।
"पहली रात मैं हकीम रुस्तम बनकर गया था। इसलिए नहीं कि मुझे उसकी शक्ल पसंद थी। विक्रम सिंह ने इस नाम पर भरोसा किया था, और मुझे लगा कि भरोसे वाले चेहरे से बात जल्दी बनेगी। मैं रोटी लेकर गया, साथ में पानी, किसी दूर के गाँव के कुएँ का, उत्तर वाले का नहीं। वह बहुत थका हुआ था, पर उसने मेरा शुक्रिया अदा किया। और फिर मुझसे कहा कि बैठो, चाय पिलाता हूँ।"
"चाय?" कबीर ने धीमे से पूछा। वह अब भी मीरा की गोद में सिर रखे पड़ा था, आँखें आधी खुली, चेहरे पर पीलापन।
"उसके पास एक छोटा सा स्टोव था और चाय की पत्ती की एक पोटली। हमने उस पत्थर की चौकी पर बैठकर चाय पी जो तुमने कुएँ की सीढ़ियों के बीच देखी थी। तीन रातें तक मैं वही रुस्तम बना रहा। चौथी रात उसने मुझसे कहा, 'भाई, तुम्हारी साँस भाप नहीं बनाती। इतनी ठंड में भी।'"
मीरा की आँखें फैल गईं। "उन्होंने तुम्हें पकड़ लिया?"
"उसने मुझे पकड़ा नहीं। उसने बस इतना कहा और चाय का प्याला मेरी ओर बढ़ा दिया।" मल्हार के होंठों पर एक छोटी, हैरान सी मुस्कान आई। "तीन हज़ार साल में किसी ने मुझे पहचाना नहीं था, मीरा। न किसी आमिल ने, न राजा ने। और इस आदमी ने बिना कोई डर दिखाए मुझे पहचान लिया और फिर पूछा कि चाय में चीनी कम लूँगा या ज़्यादा।"
हकीम ने धीमे से आँखें बंद कर लीं। मीरा को लगा कि वे कुछ सोच रहे हैं, शायद अपने बारे में, जिसने पहचानने के बाद भागना चुना था।
"उसने मुझसे पूछा कि मैं कौन हूँ। मैंने कहा कि मेरा कोई नाम नहीं। उसने कहा, 'हर आदमी का नाम होता है, कभी-कभी बस खो जाता है।' फिर वह मुझे ग़ौर से देखता रहा, इतनी देर कि मैं असहज हो गया। और फिर बोला, 'तुम बार-बार पानी की तरफ़ हाथ बढ़ाते हो, जैसे कोई पतवार थाम रहा हो। तुम्हारे कंधे ऐसे झुकते हैं जैसे रस्सी खींचने वाले के। तुम मुझे केवट लगते हो।'"
मल्हार ने अपनी हथेलियाँ घुटनों पर रख लीं, और उनके काँपने को रोकने के लिए उन्हें कसकर दबा लिया।
"तीन हज़ार साल बाद किसी ने वह शब्द बोला था। केवट। मैंने रात भर उसे अपने भीतर दोहराया। अगली रात जब मैं लौटा तो उसने मुझे उसी नाम से पुकारा। चालीस दिन वह मुझे केवट कहता रहा। मैंने उसे कभी नहीं टोका।"
"और तुम उसे डराते भी रहे," भंवर ने कड़वाहट से कहा। "आवाज़ें, परछाइयाँ, नक़ली चेहरे।"
"हाँ। मैंने उससे चाबी माँगी, आठवीं रक्षक की तख़्ती, द्वार का रास्ता। उसने हर बार मना कर दिया। मैंने उसे डराया, फुसलाया, उसकी पत्नी की आवाज़ में बात की। एक बार तो उसकी बेटी की आवाज़ में भी।" मल्हार ने सिर झुका लिया। "वह रोया, पर उसने फिर भी मना किया। मैं उसे कुछ कर नहीं सकता था। माँ ने मुझसे एक वचन लिया था, तीन हज़ार साल पहले, जब मैं पहली बार रेत के ऊपर उसके पास रोता हुआ बैठा था। उसने कहा था, 'मल्हार, किसी की जान मत लेना, चाहे मेरे लिए ही क्यों न हो।' मैंने बस एक बार वह वचन तोड़ा, गुरु के साथ। उस दिन के बाद फिर कभी नहीं।"
"तो तुम उसे ज़िंदा रखने को मजबूर थे," मीरा ने धीरे से कहा। "यह कोई दया नहीं थी।"
"पहले नहीं थी," मल्हार ने ईमानदारी से कहा। "पर दसवें दिन के बाद वह दया बन गई। मैंने उसके साथ चाय पी, उसकी बातें सुनीं, उसके बच्चों के क़िस्से सुने। मीरा, वह तुम्हारे बारे में घंटों बोलता था। कि तुम बचपन में हर चीज़ से सवाल करती थीं, कि एक बार तुमने उसकी घड़ी खोल दी थी और बंद नहीं कर पाई थीं, और फिर तीन दिन उससे छुपती रही थीं।"
मीरा की आँखें भर आईं। उसे वह घटना याद थी। उसने पिता की घड़ी खोलकर उसके पुर्ज़े मेज़ पर बिखेर दिए थे, और रात भर रोई थी। पिता ने अगली सुबह चुपचाप घड़ीसाज़ के पास जाकर उसे ठीक करवा लिया था और कभी किसी से नहीं कहा।
"उसने कबीर के बारे में भी बात की," मल्हार ने कबीर की ओर देखा, जिसकी पलकें इस नाम पर काँपी थीं। "कि वह तारे गिनते-गिनते हमेशा सात पर आकर रुक जाता था और फिर कहता था, 'पापा, सात के बाद कुछ नहीं है।' वह हँसता था, पर हँसते-हँसते चुप हो जाता था। मैंने तब नहीं समझा कि वह चुप क्यों होता है।"
कबीर के होंठों से एक टूटी हुई, बहुत धीमी आवाज़ निकली। "मुझे... याद है... वह तारा..."
मल्हार ने सिर हिलाया। "मैंने इकतालीसवें दिन से पहले ही तय कर लिया था कि मैं इस आदमी को मारूँगा नहीं। मैंने ख़ुद से कहा कि यह सिर्फ़ माँ के वचन की वजह से है। पर सच यह है कि मुझे उसके साथ बैठना अच्छा लगने लगा था।" उसकी आवाज़ ज़रा टूटी। "फिर उसने उन्तालीसवीं रात एक लोरी गुनगुनाई।"
मीरा की साँस रुक गई।
"लोरी?"
"वह स्टोव के पास बैठा था, पानी चढ़ाते हुए, और अपने आपसे बेख़याली में कोई धुन गुनगुना रहा था। मैंने पूछा कि क्या है यह। उसने कहा कि उसकी पत्नी बच्चों को सुलाते वक़्त गाया करती थी, और वह भी कभी-कभी गुनगुना लेता है, बिना शब्दों के, क्योंकि शब्द उसे कभी याद नहीं रहे।" मल्हार ने गला साफ़ किया। "वह धुन सुनकर मेरे भीतर कुछ हिला। मैंने तीन हज़ार साल में पहली बार अपने भीतर कोई याद हिलती महसूस की। मैं उसे पकड़ नहीं पाया। मैंने उसे पकड़ने की कोशिश भी नहीं की। मैं डर गया, मीरा। मैंने उस रात चाय अधूरी छोड़ दी और चला गया।"
"फिर इकतालीसवें दिन तुम तहख़ाने में आए," मीरा ने कहा। "हकीम की शक्ल में। और पापा ने तुम्हें पहचान लिया।"
"उसने मुझे उस दिन भी पहचान लिया था, और इससे पहले भी। वह जानता था कि मैं उसकी आवाज़ चुरा रहा हूँ। मैं जब भी उसके बग़ल में बैठता, उसकी बातें सुनता, तो उसकी बोली के लहजे, उसके शब्दों के उतार-चढ़ाव को अपने भीतर रख लेता था। मेरी आदत है। जिससे मिलता हूँ, उसकी आवाज़ मेरे भीतर बस जाती है। बाईस साल तक मैंने उसकी आवाज़ में तुम सबको बुलाया, मीरा। टेप में जो आवाज़ आई थी, जिसने बावड़ी पर तुम्हारे पिता बनकर तुम्हें पुकारा, वह मेरी ही थी।"
मीरा की मुट्ठी भिंच गई। उसे याद आया वह रात जब आले के ऊपर मशाल लिए एक आकृति खड़ी थी, और उसकी ज़ुबान से पापा की आवाज़ में "मेरी गुड़िया" निकला था।
"मैं यह सब बताना नहीं चाहता था," मल्हार ने कहा। "पर तुमने पूछा कि उसे ज़िंदा क्यों रखा। इसलिए कि उसके साथ बैठकर पहली बार मुझे लगा था कि मैं थका हुआ हूँ। और थका हुआ होना कोई शर्म की बात नहीं।"
उसने मीरा की ओर देखा, और उन भूरी आँखों में तीन हज़ार साल का सब कुछ था।
"उसने इकतालीसवें दिन के बाद सोने का फ़ैसला किया। मैंने रोका नहीं। मैं रोक भी नहीं सकता था। पर वह अब तक मुझसे एक चीज़ छुपाता रहा, और मुझे आज तक पता नहीं कि वह क्या थी।"
"सातवें आले का निशान," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ में अब सवाल नहीं, एक पक्की पकड़ थी। "क्या वह तुमने मिटाया था?"
मल्हार ने तुरंत सिर हिलाया। "नहीं। सातवें आले में ख़लील का रक्त गिरा था, और रक्त मेरी राह रोकता है। मैं कभी उसके पास नहीं गया। जब मैं बाईस साल पहले पहली बार लौटा, तो वह निशान पहले से खुरचा हुआ था। मैंने सोचा कि शरर ने मिटाया होगा।"
"मैंने नहीं," शरर ने कहा। "मैं उस आले के सामने से भी गुज़रने से डरता था। वहाँ वह जगह है जहाँ गुरु ने अपना आख़िरी मंत्र रखा था।"
मीरा ने अपने हाथ की उँगलियाँ आपस में बाँध लीं। "तो पापा ने। उन्हीं चालीस दिनों में।"
"शायद।"
"पर क्यों?"
किसी के पास जवाब नहीं था। कक्ष में पानी के बहने की हल्की आवाज़ भर थी, और दीयों की नीली लौ की चटख।
उसी चुप्पी में कबीर ने गुनगुनाना शुरू किया।
पहले मीरा को लगा कि वह नींद में बड़बड़ा रहा है। उसकी आँखें बंद थीं, गर्दन ज़रा सी एक ओर झुकी हुई, होंठ बस हल्के हिल रहे थे। पर फिर एक धुन उभरी। धीमी, ठहरी हुई, ऊपर-नीचे झूलती हुई, जैसे कोई पालना हिला रहा हो।
मीरा के रोंगटे खड़े हो गए। उसने उस धुन को पहचाना, उसी पल, अपनी हड्डियों में, अपनी नींद में, अपने बचपन की हर रात में।
"कबीर?" उसने फुसफुसाया।
कबीर ने जवाब नहीं दिया। वह गुनगुनाता रहा, दो पंक्तियों तक, और फिर धुन एक जगह जाकर ठिठकी, जैसे किसी ने गाते-गाते साँस रोक ली हो। वहाँ कुछ पल कबीर के होंठ बस हल्के काँपते रहे, एक सादे, बिना शब्द की गुनगुनाहट में, हूँ-हूँ-हूँ, हूँ-हूँ..., फिर धुन आगे बढ़ गई।
मीरा को इसकी ज़रूरत नहीं थी, पर उसने ख़ुद को रोक नहीं पाया। उसके होंठ अपने आप खुले, और बाईस साल पुरानी आवाज़ उसकी ज़ुबान से बाहर आ गई, काँपती हुई, बहुत धीमी:
"सो जा रे सो जा, नदिया किनारे नाव,
चुपके-चुपके चंदा उतरे, धीमे-धीमे पाँव।
हूँ-हूँ, हूँ-हूँ-हूँ... हूँ-हूँ...
सो जा, कल फिर लौटेगी वह, लेकर ठंडी छाँव।"
उसके आँसू गिरने लगे। "माँ गाती थी," उसने रोते हुए कहा। "हर रात। मैं कभी समझ नहीं पाई कि वह बीच में गाना बंद क्यों कर देती थीं। जहाँ वह हूँ-हूँ करती थीं, वहाँ शब्द आने चाहिए थे। मैंने कितनी बार पूछा, माँ, वहाँ क्या आता है? वह बस कहती थीं कि बेटा, वहाँ नाम आता है, और वह नाम गाया नहीं जाता।"
कक्ष में अचानक कुछ गिरा।
मल्हार पत्थर से उठकर पानी में घुटनों के बल गिर पड़ा था। उसके दोनों हाथ पानी की सतह पर थे, और वह किसी भूत को देखने वाले की तरह मीरा की ओर देख रहा था। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ चुका था, और होंठ काँप रहे थे।
"यह धुन," उसने कहा। उसकी आवाज़ किसी बहुत गहरे कुएँ से आ रही थी। "यह धुन तुमने कहाँ से सीखी?"
"मेरी माँ गाती थी।"
"तुम्हारी माँ का नाम क्या था?"
मीरा ने धीमे से कहा, "जमुना।"
मल्हार के गले से एक आवाज़ निकली जो न रोना थी, न चीख़। जैसे किसी ने उसकी साँस की नली एक पल को बंद कर दी हो। उसने दोनों हाथों से अपना सिर थाम लिया और आगे की ओर झुक गया, माथा पानी को छूता हुआ।
"जमुना," उसने फुसफुसाया। "जमुना।"
"क्या हुआ?" भंवर ने घबराकर पूछा।
मल्हार देर तक नहीं बोला। जब बोला तो उसकी आवाज़ हवा की तरह पतली थी।
"मेरी बहन के मरने के बाद, मैंने अपने गाँव की औरतों से एक बात कही थी। कि अब से हर घर की एक बेटी का नाम जमुना रखा जाएगा। हर पीढ़ी में, एक। ताकि उस नाम की कोई न कोई हमेशा ज़िंदा रहे।" उसने सिर उठाया, और उसकी आँखों से आँसू पानी में गिर रहे थे। "मैंने सोचा था कि यह बस एक याद है। मैंने नहीं सोचा था कि तीन हज़ार साल बाद वह नाम किसी लोरी के साथ, किसी की माँ के रूप में, इस द्वार तक लौटेगा।"
"तो मेरी माँ..." मीरा का गला बैठ गया।
"तुम्हारी माँ केवट घराने की थी। मेरे गाँव की संतान।" मल्हार ने मीरा के चेहरे को ऐसे देखा जैसे उसमें किसी बहुत पुरानी तस्वीर को ढूँढ रहा हो। "और तुम, और यह लड़का, तुम दोनों में दो घाटों का रक्त है। राजा का और केवट का।"
कबीर के होंठ अभी भी धुन को थामे हुए थे। उसने आँखें खोलीं, बहुत धीमे, और मीरा को देखा। उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी, जैसे वह किसी बहुत दूर की चीज़ को सुन रहा हो।
"दी," उसने कहा। उसकी आवाज़ कमज़ोर थी, पर साफ़। "परछाईं ने मुझे यह धुन सुनाई थी। जब वह दूर थी, पानी में, उसके अंदर से कोई यही गा रही थी। रुक-रुककर, जैसे थक गई हो। और जब वह हूँ-हूँ वाली जगह पर पहुँचती थी तो रुक जाती थी, और रोती थी।"
"वह उसे याद करने की कोशिश कर रही थी," शरर ने बहुत धीमे से कहा।
"गुरु ने नाम ले लिया था," मल्हार ने कहा। उसकी आवाज़ अब एकदम साफ़ थी, जैसे कोई बहुत पुरानी बात आख़िरकार अपनी जगह पा गई हो। "सात ताले बाँधते वक़्त उसने नाम के सात टुकड़े किए और सातों तालों में बाँध दिए। फिर उसने सबकी ज़ुबान से वह नाम हटा दिया, गाँव वालों की, आमिलों की, मेरी भी। मैं तीन हज़ार साल इसी वजह से उसे नहीं बता पाया कि उसका नाम क्या था। पर औरतें..." उसकी साँस काँपी। "औरतें लोरी में नाम की जगह सिर्फ़ गुनगुनाती रहीं। नाम चला गया, पर उसकी धुन बची रही।"
उसी पल पानी की सतह पर एक लहर उठी।
एक नहीं, कई। बहुत हल्की, बहुत धीमी, जैसे बहुत नीचे से किसी ने साँस ली हो। नीली लौ वाले सातों दीये एक साथ झुके, फिर सीधे हो गए। कक्ष के बीचोंबीच पानी, जो टखनों तक था, अचानक स्थिर हो गया, इतना स्थिर कि उसमें दीयों की परछाइयाँ तस्वीर की तरह जम गईं।
शरर के अंगारे ऊपर उठे। "वे आ रहे हैं," उसने कहा।
"कौन?" भंवर ने पूछा।
किसी को जवाब देने की ज़रूरत नहीं पड़ी।
द्वार की दरार से धुआँ जैसा कुछ बाहर आने लगा। वह धुआँ नहीं था। वह हवा में उठती हुई एक बहुत महीन, बहुत सूखी धूल थी, किसी पुराने मक़बरे को खोलने पर निकलने वाली। और उस धूल के भीतर, धीरे-धीरे, आकृतियाँ बनने लगीं।
पहली आकृति सीधी खड़ी हुई, पानी की सतह के ठीक ऊपर, उसके पैर बिना पानी को छुए हवा में टिके हुए। वह एक औरत थी, दुबली, इतनी दुबली कि हड्डियों का हर जोड़ त्वचा के नीचे से उभर रहा था। उसके होंठ फटकर सफ़ेद पड़ चुके थे और आँखें अंदर धँसी हुई थीं, पर वे खुली थीं, सीधी मीरा पर जमी हुईं।
फिर दूसरी आकृति। फिर तीसरी। फिर एक पूरी क़तार, फिर दूसरी, फिर पूरा कक्ष। बच्चे, बूढ़े, मर्द, औरतें, सब सूखे, सब चिमटे हुए, सब पानी के ऊपर खड़े। किसी ने पानी को छुआ नहीं। वे उसकी सतह से इस तरह दूर थे जैसे वह कोई ज़हर हो, जबकि उनकी हर साँस, हर निगाह, हर फटे होंठ का हिलना सिर्फ़ एक चीज़ माँग रहा था।
कबीर ने मीरा का हाथ पकड़ लिया। हकीम का चेहरा पत्थर हो गया। भंवर ने जगत की रेत की पोटली खोलकर चारों के चारों ओर घेरा खींच दिया।
कक्ष में उन हज़ारों सूखे होंठों से एक बहुत हल्की, बहुत धीमी, लाखों रेत के कणों जैसी सरसराहट उठी। एक आवाज़ नहीं। अनगिनत फुसफुसाहटें, एक के बाद एक, एक के ऊपर एक, और उनमें सबसे साफ़ एक ही शब्द सुनाई दे रहा था।
"पा... नी... पा... नी... पा... नी..."
और उन सबके बीच, ज़मीन के बहुत पास, एक सबसे नन्ही आकृति आगे सरक रही थी। एक बच्ची, कपड़े की गुड़िया सीने से चिपकाए, नंगे पैर, भीगे हुए। उसके पैरों के नीचे पानी की सतह पर उसकी अपनी छोटी सी परछाईं थी।
वह उन सबमें अकेली थी जो सूखी नहीं थी। वह पूरी तरह भीगी हुई थी।
- Writer
- firoj saifi
- Story
- रेत का क़ैदी
- Chapter
- 21 of 30
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 16 min
- Words
- 3092
- Language
- Hindi (हिंदी)
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