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एपिसोड 22: प्यासों की क़तार
firoj saifi · Jinn & Spirits · 14 मिनट
उन्हें देखकर पहला विचार जो मीरा के मन में आया, वह डर नहीं था। वह एक बेवक़ूफ़ सा, अटपटा सवाल था: पानी में खड़े होकर भी कोई इतना प्यासा कैसे हो सकता है?
वे सब सूखे थे। यही सबसे भयानक बात थी। इन हज़ारों प्रेतों के पैर पानी की सतह से बस एक उँगली ऊपर टिके थे, और उस पानी की ठंडक उनके चेहरों पर कोई असर नहीं डाल रही थी। उनकी त्वचा चटखी हुई ज़मीन जैसी थी, जिसमें दरारें पड़ चुकी थीं। उनकी जीभें बाहर लटक रही थीं, काली, मोटी, पपड़ी जमी हुई। उनके होंठों पर सफ़ेद नमक की धारियाँ थीं और आँखों के कोनों में आँसू नहीं, सूखी, नुकीली रेत जमी हुई थी।
वे हिल नहीं रहे थे। वे सिर्फ़ सब एक साथ बहुत धीमे साँस ले रहे थे, और हर साँस के साथ कक्ष की हवा थोड़ी और सूखती जा रही थी। मीरा के होंठ अपने आप चटखने लगे। उसने जीभ फेरी तो वह सैंडपेपर जैसी लगी।
"ये हमें नहीं छू रहे," भंवर ने फुसफुसाकर कहा। उसकी पोटली से रेत की एक पतली, सुनहरी लकीर उनके चारों ओर खिंची थी, और कोई भी प्रेत उसके दो हाथ के भीतर नहीं आ रहा था। "रेत इन्हें रोक रही है।"
"नहीं," विजय ने कहा। वह लकीर के किनारे खड़ा था, अपने ही आगे सब कुछ देख रहा था। "ये ख़ुद रुके हुए हैं। इन्हें हमसे कुछ नहीं चाहिए।"
वह आगे बढ़ा, इतना कि लकीर के बाहर पहुँच गया, और सीधे सबसे नज़दीक खड़े एक बूढ़े प्रेत के सामने रुककर उसकी आँखों में झाँका।
"तुम्हें क्या चाहिए?" उसने साफ़, ऊँची आवाज़ में पूछा। "मैं इस द्वार का आठवाँ रक्षक हूँ। बोलो।"
बूढ़े प्रेत के फटे होंठ हिले। बहुत धीमे, किसी पुरानी चरमराती दीवार की तरह, एक आवाज़ निकली।
"नाम..."
विजय ने पलटकर मीरा की ओर देखा।
"नाम..." दूसरे प्रेत ने कहा। फिर तीसरे ने। फिर पूरा कक्ष, हज़ारों कंठों से, एक साथ, धीमे और भारी स्वर में। "नाम... नाम... नाम..."
और फिर, बिना किसी इशारे के, बिना किसी आदेश के, पूरी क़तार एक साथ घुटनों के बल बैठने लगी।
यह जितना ख़ामोश था, उतना ही भयानक भी। हज़ारों सूखे शरीर हवा में तैरते पानी के ऊपर घुटनों पर झुके, दोनों हाथ जुड़े हुए, मुँह खुले हुए, मीरा की ओर, जैसे वे किसी मंदिर में बैठे भिखारी हों और वह उनकी देवी। उनके मुँह के भीतर का अँधेरा, काली जीभें, सफ़ेद पड़े मसूड़े, सब कुछ मीरा की नज़र के सामने था।
मीरा का दिल बेतहाशा धड़क रहा था। उसने अपने भीतर हर चीज़ को जकड़ लिया। डर नहीं, मीरा। ये तुम्हें नुक़सान नहीं पहुँचा रहे। ये कुछ माँग रहे हैं।
"ये पानी नहीं माँग रहे," उसने कहा। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, पर उसने उसे स्थिर रखा। "ये नदी का नाम माँग रहे हैं।"
भीड़ में एक हलचल हुई। नन्ही बच्ची, कपड़े की गुड़िया लिए, घुटनों पर बैठे प्रेतों के बीच से सरकती हुई आगे आ रही थी।
वह लगभग तीन साल की थी। गुलाबी रंग का एक पुराना, सिलाई उधड़ा हुआ कुर्ता पहने, बालों में दो छोटी चोटियाँ बाँधे, और नंगे पैर। उसके पैरों के पास की जगह गीली थी, जैसे वह पानी से अभी-अभी निकली हो। और जब वह हकीम रुस्तम के सामने जाकर रुकी, तो उसके पैरों के पास की पूरी सूखी दुनिया में एक छोटा सा नम घेरा बन गया।
हकीम का सारा शरीर जम गया। उनके दोनों हाथ जुड़े हुए थे, बिना किसी इरादे के, जैसे किसी इबादत में हों। उनके होंठ हिले, पर कोई आवाज़ नहीं निकली।
"अब्बा," बच्ची ने कहा।
वही आवाज़। वही तुतलाहट। वही छोटा सा, गोल 'अ' जो उसके मुँह में हमेशा आधा रह जाता था।
"अब्बा, आप रो क्यों रहे हैं?"
हकीम घुटनों के बल गिर गए। वे बच्ची के सामने ज़मीन से कुछ इंच ऊपर टिके, उसके चेहरे के बराबर, और उन्होंने काँपते हाथ बढ़ाकर उसके गाल पर रखे। गाल गीला था, ठंडा और असली। उनकी उँगलियाँ उस पर टिकीं, और फिर उनका पूरा शरीर हिल उठा।
"ज़ैनब," उन्होंने फुसफुसाया। "ज़ैनब, मेरी बच्ची..."
"मैं ठीक हूँ, अब्बा," ज़ैनब ने गुड़िया को दूसरे हाथ में बदलते हुए कहा। "देखिए, मैं भीगी हुई हूँ।"
"तू भीगी क्यों है?" हकीम ने रुँधे गले से पूछा। उनके आँसू बच्ची के कुर्ते पर गिर रहे थे और वहाँ गायब हो रहे थे, बिना कोई निशान छोड़े। "यहाँ सब सूखे हैं।"
"क्योंकि माँ ने मुझे पानी दिया था," ज़ैनब ने सीधी, नन्ही सच्चाई के साथ कहा। "आपको याद है न? मैंने आपसे कहा था कि अब निगल सकती हूँ। आप कटोरा लेने गए थे। तब माँ आई थी।"
हकीम का चेहरा पथरा गया।
"माँ आई थी?"
"हाँ। वह बहुत बड़ी थी, अब्बा। और बहुत ठंडी। उसने मेरे होंठों पर हाथ रखा और कहा, 'बेटी, डर मत।' फिर उसने मुझे पानी पिलाया। मीठा था। बहुत। मैंने पूरा पी लिया। फिर मुझे नींद आ गई।" उसने गुड़िया की चोटी सहलाई। "उसके बाद मैं यहाँ आ गई, माँ के पास। यहाँ बहुत सारे लोग हैं, अब्बा, सब प्यासे। पर मैं नहीं। क्योंकि माँ ने सबसे पहले मुझे पिलाया था।"
हकीम की आँखों से आँसू बेरोक बह रहे थे। उन्हें लग रहा था जैसे चालीस साल की ईंटें एक-एक करके उनके सीने से उठ रही हों, और हर ईंट के नीचे से एक छोटी सी रोशनी निकल रही हो।
"मैं चालीस साल तक सोचता रहा," उन्होंने भर्राई आवाज़ में कहा, "कि तू प्यासी मरी। कि मैंने तुझे प्यासा मार दिया।"
"नहीं, अब्बा।" ज़ैनब ने अपने नन्हे हाथों से उनकी दाढ़ी पकड़ी और धीरे से खींची, जैसे बच्चे खींचते हैं जब बड़ों का ध्यान चाहिए होता है। "आप बहुत देर से आए थे, पर मैं अकेली नहीं थी। माँ मेरे पास थी।"
भंवर ने अपना मुँह फेर लिया। विजय ने आँखें भींच लीं। मीरा ने बहुत धीमे, अपनी छाती पर हाथ रख लिया। उसे लगा कि इस पल में कक्ष की हर दीवार, हर बूँद, हर सूखा होंठ, सब साथ-साथ साँस रोके खड़े हैं।
चालीस साल से यह बात किसी ने हकीम को नहीं बताई थी। नदी ने बता दी थी, जिसे वे इतने दिनों से अपनी बेटी की प्यास का हत्यारा मानते थे।
"मैंने उसे सुलाया था, रुस्तम," शरर की आवाज़ बहुत धीमी थी, पर साफ़। "उस रात माँ ने अपना आख़िरी पानी उसे दिया था। जब वह मर रही थी और कुछ नहीं कर पा रही थी, तब भी जिसे पानी पिला सकती थी, पिलाती थी। यही उसकी सबसे बड़ी बात थी। और यही बात उसे प्यासी भी बनाती गई।"
हकीम ने गर्दन उठाकर नदी की दरार की ओर देखा। उनकी आँखों में अब कोई ग़ुस्सा नहीं था, कोई डर नहीं। एक बहुत शांत, बहुत भीगी हुई कृतज्ञता थी।
"शुक्रिया," उन्होंने दरार से कहा। मीरा की नियमों वाली सारी सावधानी के बावजूद, उन्होंने कह दिया। "शुक्रिया, माँ।"
ज़ैनब ने गर्दन घुमाकर मीरा की ओर देखा। उसकी गोल, गहरी आँखों में एक अजीब सी चमक थी।
"दीदी, आपके गले में नाव है," उसने कहा।
मीरा का हाथ अपने आप गले पर गया।
वह भूल गई थी। चौदह साल की उम्र से वह चाँदी की एक पतली ज़ंजीर पहनती आई थी, जिस पर एक छोटा सा, लगभग उँगली के पोर जितना लॉकेट झूलता था। नाव के आकार का। माँ ने उसे पहनाया था, पापा के गुम होने के कुछ महीने बाद, एक रात जब मीरा उन्हें याद करके रो रही थी। माँ ने कुछ नहीं कहा था, बस ज़ंजीर उसके गले में डाली और बोली, 'इसे कभी उतारना मत। और कभी खोलना मत। ख़ासकर पानी के पास।' मीरा ने मान लिया था कि वह माँ के किसी रीति-रिवाज़ की निशानी होगी।
बारह साल बाद माँ भी चली गईं। मीरा ने ज़ंजीर कभी नहीं उतारी। वह कपड़ों के भीतर हमेशा उसकी त्वचा से चिपकी रहती थी, इतनी आदत में कि उसे याद भी नहीं रहता था।
उसने उसे बाहर खींचा।
वह चाँदनी के बिना भी चमकी। नीली लौ की रोशनी में उसकी सतह पर बारीक नक़्क़ाशी दिखाई दी, लहरों की, और नाव के पिछले हिस्से पर एक छोटी सी कील जैसी कुंडी, जो मोम जैसी किसी चीज़ से बंद थी, पुरानी, पीली पड़ी हुई।
"माँ ने कहा था कि इसे पानी के पास खोलना मत," मीरा ने कहा।
"माँ को पता था कि तुम एक दिन पानी तक आओगी," मल्हार ने बहुत धीमे से कहा। वह उठकर उसके पास आ गया था, और उसकी नज़र उस नन्ही नाव पर टिकी हुई थी, जैसे उसे कोई बहुत जानी-पहचानी चीज़ मिल गई हो। "और उसे यह भी पता था कि जब तुम आओगी, तब तुम्हें इसे खोलना पड़ेगा। सिर्फ़ तब, इसी जगह।"
मीरा ने अपने नाख़ून से कुंडी का मोम कुरेदा। वह कड़ा था, बाईस साल पुराना। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। कबीर ने उसका हाथ थाम लिया, और दोनों भाई-बहन साथ-साथ ज़ोर लगाने लगे। मोम चटका, एक सूखी, हल्की खट की आवाज़ आई, और नाव का ऊपरी हिस्सा ढक्कन की तरह खुल गया।
भीतर एक छोटा सा, लपेटा हुआ काग़ज़ का टुकड़ा था। काग़ज़ नहीं, किसी बहुत महीन, पतली चाँदी की पन्नी, इतनी पतली कि साँस से भी हिल जाती थी।
मीरा ने उसे सावधानी से उठाया और खोला। उस पर बहुत बारीक अक्षर खुदे थे, एक ऐसी लिपि में जिसे वह नहीं पहचानती थी, ब्राह्मी से भी कुछ पुरानी, कुछ अलग। सीधी लकीरें, छोटे गोल बिंदु, लहरदार रेखाएँ।
"हकीम साहब?" उसने पूछा।
हकीम ने झुककर देखा, फिर धीरे से सिर हिलाया। "यह मेरी भाषा नहीं है, बेटी। न मैं इसे पढ़ सकता हूँ, न शरर।"
"मैं भी नहीं," शरर ने कहा। "यह मुझसे भी पुरानी है।"
सबकी नज़र मल्हार पर गई।
वह पन्नी को एकटक देख रहा था, और उसके चेहरे पर कुछ बहुत धीमे धीमे उतर रहा था, जैसे कोई भूली हुई परत सतह पर आ रही हो। उसकी आँखों का रंग बदला। उसके होंठ हिले, बिना आवाज़ के, और फिर उसने बहुत धीरे से हाथ बढ़ाकर पन्नी को छुआ, इतने हल्के से जैसे किसी सोते बच्चे को छू रहा हो।
"यह मेरी लिपि है," उसने कहा। उसकी आवाज़ में अविश्वास था। "यह केवटों की लिखावट है। जो हमने रेत पर, नावों के तख़्तों पर, मछली पकड़ने के जालों की गाँठों में लिखी थी। कोई इसे पढ़ नहीं सकता, सिवाय हमारे गाँव के।"
"तो पढ़िए," मीरा ने कहा।
मल्हार ने साँस ली, और पढ़ना शुरू किया। हर पंक्ति के साथ उसकी आवाज़ काँपती गई।
“'जो इसे पढ़े, वह जान ले कि गुरु ने नाम छीन लिया, पर नाम की धुन नहीं छीन पाया। सात ताले, सात स्वर। नाम सात स्वरों में बँटा है। छह स्वर लोरी में हैं, गुनगुनाहट के पीछे। सातवाँ स्वर अंतिम ताले के भीतर बंद है।'”
उसने रुककर एक और साँस ली।
“'नाम तभी लौटेगा जब तीन कंठ मिलकर गाएँ। एक वह जो राजा के घाट का हो। एक वह जो केवट के घाट का हो। और एक वह जो उसके साथ जाए।'”
"उसके साथ जाए?" भंवर ने तुरंत पूछा।
मल्हार ने नीचे पढ़ा, और उसकी आवाज़ बैठ गई।
“'नाम पूरा होते ही नदी अपने बिस्तर में लौटेगी। पर वह अकेली नहीं लौटेगी। जो उसके साथ गाएगा, वह उसके साथ रहेगा, उसकी हर बहती साँस में, जब तक वह बहती है। यही केवट का धर्म है।'”
कक्ष की हवा जम गई।
"नीचे हस्ताक्षर है," मल्हार ने आगे कहा, और उसके होंठ काँप रहे थे, “'यह मैंने लिखा। मल्हार, केवट, जमुना का भाई। यह उस दिन के लिए है जब मैं भूल जाऊँगा।'”
मीरा सन्न रह गई।
मल्हार वहीं खड़ा रहा, पन्नी हाथ में थामे, और उसके चेहरे पर आँसू बहते रहे। बहुत देर तक वह कुछ नहीं बोला। फिर उसने बहुत धीमे, लगभग हँसते हुए, कहा, "मैंने लिखा था।"
"तुम्हें याद नहीं?" मीरा ने पूछा।
"नहीं।" उसने सिर हिलाया। "मुझे बिल्कुल याद नहीं। मैं तीन हज़ार साल इसी को ढूँढता रहा, और यह मेरे ही हाथ का लिखा था, मेरे ही गाँव की किसी लोरी में, किसी गले की नन्ही नाव में। गुरु ने सबकी ज़ुबान से नाम हटा दिया था। मैंने सोचा होगा कि नाम को किसी और तरीक़े से बचा लूँगा, औरतों के ज़रिए, एक लोरी के भीतर, एक लॉकेट में। और फिर मैंने अपनी परछाईं बेची। और उस सौदे ने मुझसे वह सब छीन लिया जो मैंने ख़ुद बनाया था।"
वह हँसने लगा, पर वह हँसी बहुत जल्द रुलाई में बदल गई।
"मैंने तीन हज़ार साल क़त्ल किए, फ़रेब किए, भेस बदले, लोगों की आवाज़ें चुराईं। और रास्ता मेरे ही घर के आँगन में बिछा था, मेरी ही लिखावट में। काश मुझे याद होता।"
"याद दिलाने के लिए ही मैंने उसे ज़िंदा रखा था," शरर ने कहा। उसकी आवाज़ बहुत कोमल थी। "मैं तीन हज़ार साल तुम्हें देखता रहा, मल्हार, और तुम्हारी आँखों में एक बात थी जो मुझे समझ नहीं आती थी। अब आती है। तुम ढूँढ नहीं रहे थे। तुम ख़ुद को याद करने की कोशिश कर रहे थे।"
मल्हार ने शरर की ओर देखा, और कुछ कहने के बजाय बस एक बार सिर हिला दिया।
फिर सबकी नज़र एक साथ उस आख़िरी पंक्ति पर लौट आई। 'जो उसके साथ गाएगा, वह उसके साथ रहेगा।'
"कोई एक," हकीम ने धीमे से कहा। "ज़ैनब ने यही कहा था। कोई एक, जो अंदर आए।"
"वह मैं ही हूँ," मल्हार ने कहा।
"नहीं," मीरा ने तुरंत कहा।
"यह मेरा धर्म है, मीरा। मैं केवट हूँ।"
"तुम्हारे धर्म ने तुम्हें तीन हज़ार साल अकेला रखा है।" मीरा के स्वर में पहली बार कठोरता आई। "मैं तुम्हें फिर से उसी अकेलेपन में नहीं भेजूँगी।"
"मैं जाऊँगा," हकीम ने कहा। वे अब भी ज़ैनब का हाथ थामे बैठे थे, और उनकी आँखों में एक अजीब सी निश्चिंतता थी, जैसे उन्होंने जीवन भर का कोई फ़ैसला कर लिया हो। "मेरी बेटी वहाँ है। मेरा हाथ पहले ही तालों में बँधा है। मैं ही हूँ जो..."
"मैं जाऊँगा," भंवर ने कहा।
"मैं आठवाँ रक्षक हूँ," विजय ने कहा। उसकी आवाज़ अब भी बच्चे की थी, पर उसमें एक टूटी हुई, साफ़ गरिमा थी। "मेरा काम द्वार के पास रहना है। मैं जाऊँगा।"
"मैं उसका आँसू हूँ," शरर ने कहा। "मैं उसके साथ हूँ, चाहे वह जाने या न जाने। मैं जाऊँगा।"
सब एक साथ बोलने लगे। मल्हार ने कुछ कहा। हकीम ने जवाब दिया। भंवर चिल्लाया। विजय और शरर ने एक-दूसरे को टोका। कक्ष में आवाज़ें टकराने लगीं, और हर आवाज़ के पीछे एक अलग तरह का प्यार था, और हर प्यार के पीछे एक अलग तरह की हार।
मीरा ने दोनों हाथ उठाकर सबको चुप कराया।
"रुकिए!" उसकी आवाज़ में इतनी ताक़त थी कि सब ठिठक गए। "कोई नहीं जाएगा, अभी। मैं यह नहीं मानती कि कोई एक अपनी जान देकर ही यह कहानी ख़त्म करेगा। पापा ने सब कुछ यों ही नहीं छोड़ा था। उन्होंने चालीस दिन, सब कुछ ढूँढते हुए बिताए, और आख़िर में उन्होंने कुछ किया, जो हम अभी तक नहीं समझे। सातवाँ आला। उसका मिटाया हुआ निशान। जब तक मैं यह नहीं जान लेती कि पापा ने क्या किया, तब तक कोई हाथ नहीं उठाएगा।"
"पर पापा सो रहे हैं, दी," कबीर ने कहा। उसकी आवाज़ में निराशा थी। "वे ऊपर हैं। तीन मंज़िल ऊपर, एक बंद कक्ष में।"
मीरा कुछ कहने ही वाली थी कि उसे कुछ सुनाई दिया।
सुरंग की ओर से, जिस रास्ते वे नीचे आए थे। पानी में छपछप करते हुए क़दमों की आवाज़। धीमी, ठहरी हुई, किसी थके हुए आदमी की चाल। और उसके साथ, बहुत धीमे, एक धुन। वही लोरी।
सबके सिर एक साथ सुरंग की ओर मुड़े।
अँधेरे के भीतर से एक आकृति निकली। लंबा आदमी, ज़रा झुका हुआ, फटी-पुरानी खाकी कमीज़ पहने, सिर पर एक चौड़े किनारे वाली पुरानी हैट। उसके कंधे पर कोई बोझ नहीं था, पर वह ऐसे चल रहा था जैसे पूरी दुनिया ढोकर आया हो। उसके चेहरे पर बाईस साल की नींद थी, और उसकी आँखें, भूरी, गहरी, साफ़, सीधी अपनी बेटी पर टिकी थीं।
वह गुनगुना रहा था। वही धुन। और जब वह हूँ-हूँ वाली जगह पर पहुँचा तो वह रुका नहीं, उसके होंठों ने बिना किसी झिझक के वह जगह पार की, जैसे उसे पता हो कि वहाँ क्या आता है।
"मीरा," विक्रम सिंह राठौड़ ने कहा। "कबीर।"
- Writer
- firoj saifi
- Story
- रेत का क़ैदी
- Chapter
- 22 of 30
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 14 min
- Words
- 2606
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
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