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एपिसोड 23: सातवाँ स्वर
firoj saifi · Jinn & Spirits · 16 मिनट
पहले किसी ने साँस नहीं ली।
मीरा खड़ी थी, पर उसके पैरों ने उसे उठाए रखने से इनकार कर दिया था। उसने जो पहला क़दम बढ़ाया, वह पानी में लड़खड़ा गया, और अगले ही पल कबीर उसके साथ था, दोनों भाई-बहन एक साथ, एक-दूसरे का हाथ थामे, उस आदमी की ओर दौड़ रहे थे जिसे उन्होंने बाईस साल से बचपन की किसी तस्वीर की तरह जिया था।
विक्रम ने बाँहें फैला दीं।
वह टक्कर बहुत धीमी नहीं थी। मीरा ने उन्हें इतनी ज़ोर से पकड़ा कि उनकी हैट सिर से गिरकर पानी में तैरने लगी। कबीर उनके दूसरे कंधे में सिर छुपाए बच्चों की तरह सिसक रहा था। विक्रम दोनों को एक साथ अपने सीने में समेटे खड़े थे, उनकी आँखें बंद थीं, और उनके कंधे ऐसे हिल रहे थे जैसे कोई बहुत भारी चीज़ आख़िरकार उन पर से उतर रही हो।
"मेरी गुड़िया," उन्होंने मीरा के बालों में कहा। उनकी आवाज़ साफ़ और गर्म थी, उसमें वही पुरानी भारी खनक थी। "मेरे शेर।"
"आप क्यों चले गए थे?" मीरा ने रोते हुए पूछा, और उसके मुँह से वह सवाल निकल गया जो बाईस साल से उसके भीतर गुच्छा बना बैठा था। "आपने कहा था जल्दी आऊँगा। आपने कहा था माँ से..."
"मुझे माफ़ कर दे," विक्रम ने कहा। "मैं देर से आया, बेटा। बहुत देर से।"
"आप आए तो हैं।"
"हाँ।" उन्होंने उसके माथे को चूमा। "मैं आ गया हूँ।"
पीछे खड़े हकीम की आँखें बंद थीं। भंवर ने अपना चेहरा हथेली से ढक रखा था। विजय एक किनारे दुबका खड़ा था और टकटकी लगाए इस नज़ारे को देख रहा था, जैसे किसी ऐसी चीज़ की झलक पा रहा हो जो उसे तीन सौ साल पहले मिलनी चाहिए थी। शरर और मल्हार चुपचाप, दो अलग-अलग कोनों में, खड़े रहे।
बहुत देर बाद, जब रुलाई थोड़ी थमी, विक्रम ने अपने बच्चों को अपने से अलग किया और उनके चेहरों को हथेलियों में लेकर बारी-बारी से देखा। उनकी आँखें कबीर पर देर तक टिकी रहीं।
"तू बड़ा हो गया," उन्होंने कहा। "तेरे गाल पर वह निशान अब भी है।"
कबीर ने हैरानी से अपना गाल छुआ। "वह तो बचपन में टंकी से गिरकर..."
"तू टंकी से गिरा नहीं था," विक्रम ने धीमे से कहा। "तू किसी ने खींचा था। पर इसकी बात बाद में।"
फिर उन्होंने कमर सीधी की और सबको देखा। उनकी नज़र हकीम पर आकर रुकी, और उनके चेहरे पर एक बहुत पुरानी, बहुत गर्म मुस्कान आई।
"रुस्तम भाई।"
हकीम ने सिर उठाया। उनके गाल आँसुओं से तर थे। "विक्रम," उन्होंने भर्राई आवाज़ में कहा, "मुझे माफ़ करना। उस रात..."
"उस रात तुम फाटक पर थे," विक्रम ने कहा। "मुझे पता है। मैंने तुम्हारे क़दमों की आवाज़ सुनी थी, जब तुम दौड़कर गए।"
"तुमने सुना था?"
"हाँ। और मैंने तुम्हें जाने दिया, क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि तुम भी यहाँ फँसो।" उन्होंने हकीम का दाहिना हाथ अपने दोनों हाथों में लिया, तर्जनी के ठूँठ वाला हाथ, और उसे थपथपाया। "तुमने कसम खाई थी कि मेरे बच्चों को यहाँ नहीं आने दोगे। यह कसम तुमने तोड़ी नहीं है, रुस्तम। मेरी बेटी ख़ुद आई है, अपनी मर्ज़ी से, अपने पैरों से। उसे कौन रोक सकता है? मैंने ख़ुद भी तो कभी नहीं रोक पाया।"
हकीम ने कुछ कहना चाहा, पर गला साथ नहीं दे रहा था। उन्होंने बस सिर झुका दिया, और विक्रम ने उनके कंधे पर हाथ रखकर उसे थपथपाया।
फिर विक्रम की नज़र कक्ष के बीच खड़े उस आदमी पर गई, जो अब एक साधारण केवट का चेहरा लिए हरी चादर में लिपटा हुआ था।
कुछ क्षण दोनों ने एक-दूसरे को देखा। बहुत धीमे विक्रम की मुस्कान लौट आई, एक थकी, कोमल, लगभग दोस्ताना मुस्कान।
"तो तुमने अपना चेहरा पा लिया, केवट।"
मल्हार की आँखें भर आईं। "तुम्हारी बेटी ने दिया।"
"हाँ, वह ऐसा ही करती है।" विक्रम ने कहा। "तुम्हारी चाय अब भी मेरे पास उधार है, भाई। इकतालीसवें दिन तुम आए थे, और मैंने तुम्हें चाय नहीं पिलाई।"
मल्हार हँस पड़ा, और वह हँसी तीन हज़ार साल में पहली बार हँसी जैसी सुनाई दी। "चाय बाद में, विक्रम। पहले यह सब ठीक कर लें।"
"ज़रूर।"
"पापा," मीरा ने अपने आँसू पोंछते हुए पूछा। "आपने सातवें आले का निशान क्यों मिटाया था?"
विक्रम के चेहरे पर एक गंभीर साया उतर आया। उन्होंने कुछ पल कक्ष में चारों ओर नज़र दौड़ाई: द्वार, दरार, घुटनों पर बैठे सूखे प्रेत, चमकती नीली लौ, पानी। फिर वे पानी के बीच एक ऊँचे सूखे पत्थर पर बैठ गए, और सबको अपने आसपास इकट्ठा होने का इशारा किया।
"मैं सब बताता हूँ। पर पहले मुझे यह बताओ, तुम लोगों ने लोरी कहाँ तक समझी?"
मीरा ने लॉकेट की पन्नी उन्हें दी। विक्रम ने उसे देखा, और उनके चेहरे पर कोई हैरानी नहीं आई, सिर्फ़ एक धीमी सहमति।
"जमुना ने मुझे यह दिखाया था," उन्होंने कहा। "हमारी शादी के तीसरे साल। उसने कहा था कि यह उसके ख़ानदान की निशानी है, और वह नहीं जानती कि इसमें क्या लिखा है। उसे बस इतना पता था कि हर बेटी को इसे सौंपना है, और जब तक सही वक़्त न आए, इसे खोलना नहीं है।" उन्होंने पन्नी को तह किया। "मैंने इसके बारे में पढ़ना शुरू किया। हर पुरानी लिपि, हर शिलालेख। पाँच साल लग गए मुझे यह जानने में कि यह केवटों की लिखावट है। और जब मैं यह जान गया, तब मैं सूनगढ़ आया।"
"आप जमुना माँ की वजह से आए थे," मीरा ने धीमे से कहा।
"मैं सच की वजह से आया था। पर जमुना का इसमें हाथ था, यह मैं मानता हूँ।" विक्रम ने कबीर की ओर देखा। "जिस रात तू टंकी के पास खड़ा था, तेरी माँ ने तुझे गोद में उठाया और तब मुझे एक चिट्ठी लिखी थी। उसे पता था कि मैं सूनगढ़ में हूँ। उसने लिखा था कि कबीर पानी से बात करता है। यह उसे वहाँ से पता चला जहाँ से हर माँ को पता चलता है, बिना कुछ कहे, बस अपने बच्चे को देखकर। मैंने तब समझा कि यह सिर्फ़ एक कहानी नहीं है। यह हमारे घर के आँगन में है।"
कबीर ने सिर झुका लिया। "मुझे याद नहीं।"
"तू पाँच साल का था। तुझे क्या याद रहेगा।" विक्रम ने उसकी ठुड्डी उठाई। "पर पानी तुझे याद रखता था, बेटा।"
"अब सातवाँ निशान," विक्रम ने कहा, और अपनी आवाज़ नीचे ले आए। "मैंने इन चालीस दिनों में बहुत कुछ पढ़ा। तहख़ाने की दीवारें, कुएँ की सीढ़ियाँ, सातों आले। जो कुछ समझा, वह सब नोटबुक में है।" उन्होंने मीरा की ओर देखा। "तुम्हारे पास है न?"
"मेरे पास है," मीरा ने कहा। "थैले में, ऊपर शाही कक्ष में।"
"अच्छा। उसके आख़िरी पन्ने पढ़ना। पर अभी मैं तुम्हें मुख्य बात बताता हूँ। गुरु ने नाम सात स्वरों में बाँटा था। छह लोरी में बच गए। सातवाँ स्वर सातवें आले की दीवार पर खुदा था, एक छोटे से चिह्न में, ठीक उस जगह जहाँ ख़लील का रक्त गिरा था। वही हाथ का निशान था जो मैंने मिटाया।"
"क्यों?" मीरा ने पूछा।
"क्योंकि केवट," विक्रम ने मल्हार की ओर मुड़कर कहा, "तुम्हारे पास एक आदत है, जो इन चालीस दिनों में मैंने ग़ौर से देखी। तुम जिसे सुनते हो, उसकी आवाज़ अपने भीतर रख लेते हो। और जिस चीज़ को तुम देख लेते हो, उसे भूलते नहीं। और अगर तुम किसी तरह वह सातवाँ स्वर पढ़ लेते, तो तुम कोई भी अधूरा नाम गाकर द्वार को खोल सकते थे।"
मल्हार का चेहरा सन्न पड़ गया। "मैं करता भी यही, शायद।"
"जानता हूँ। इसीलिए मिटाया।" विक्रम ने कंधे उचकाए। "दरवाज़ा अधूरे नाम से भी खुल सकता है, पर तब नदी को अपना नाम नहीं मिलता। वह सिर्फ़ प्यास बनकर बाहर आती है। मैंने सोचा कि तुम्हें यह पता नहीं चलना चाहिए कि वह स्वर क्या था। इसलिए मैंने उसे मिटा दिया, और उसे अपने भीतर रख लिया।"
"आपके भीतर?" भंवर ने चौंककर पूछा।
"हाँ। मैंने उसे याद कर लिया था, बेटे। एक बार देखकर, एक बार छूकर। मैं इतिहास पढ़ाता था। चिह्न याद रखना मेरा काम था।" उन्होंने अपना माथा छुआ। "वह स्वर यहाँ है। और तुम समझ सकते हो कि मैं क्यों सोया।"
मीरा की साँस रुक गई। "आप सोए ताकि वह आपके सिर से चुराया न जा सके।"
"हाँ।" विक्रम ने बेटी की ओर देखकर मुस्कुराया। "इकतालीसवें दिन मैंने जान लिया कि मेरे जागते रहने से मेरी हर सोच, हर याद, हर सपना केवट की पकड़ में आ सकता है। इसलिए मैंने शरर से कहा कि मुझे सुला दे। गहरी नींद में, जहाँ कोई नहीं पहुँचता, कोई आवाज़ नहीं, कोई सपना नहीं। और जब मेरी बेटी आए, तब ही जगाए।"
"मैंने वादा किया था," शरर ने धीमे से कहा। "मैंने बाईस साल उस वादे को निभाया।"
मल्हार ने एक लंबी साँस ली और धीरे से सिर हिलाया। "तुम मुझसे बहुत चतुर निकले, विक्रम।"
"नहीं, भाई। मैं बस तुमसे कम थका हुआ था।" विक्रम ने कहा, और वे दोनों एक पल के लिए एक-दूसरे को देखते रहे, दो ऐसे आदमी जो दुश्मन हो सकते थे और जिन्होंने दोस्त बनना चुना था।
"चाँद नीचे उतर रहा है," शरर ने कहा। उसकी आवाज़ में अब बेचैनी थी। "और द्वार की दरार चौड़ी होने लगी है।"
सबने मुड़कर देखा। लोहे की दरार, जो अब तक एक हथेली जितनी थी, धीरे-धीरे दो हथेली जितनी हो चुकी थी। उसके भीतर से आने वाली नीली रोशनी तेज़ हो गई थी, और उसके साथ एक ठंडी, सूखी हवा उठ रही थी, जो कक्ष के प्रेतों के घुटने टेकने वाले कंधों को हिला रही थी।
"तो अब कैसे?" भंवर ने पूछा।
"तीन कंठ," विक्रम ने कहा। "मैं हर शब्द पर नहीं जाऊँगा। जो लिखा है, वही करना है। एक कंठ राजा के घाट का। एक केवट के घाट का। और एक वह जो साथ जाए।" उन्होंने कबीर और मीरा को देखा। "तुम दोनों दोनों घाटों के हो। तुम्हें लोरी की धुन विरासत में मिली है। कबीर, तू सुर संभालेगा, जिसे तेरी परछाईं पहले ही जानती है। मीरा, तू शब्द देगी। क्योंकि तुझे नाम पुकारना आता है। तख़्ती ने तुझे इसलिए चुना।"
"और तीसरा?" मीरा ने पूछा।
"तीसरा मैं हूँ," मल्हार ने कहा। उसने अपनी हरी चादर कंधों से उतारी और पानी में खड़ा हो गया, सीधा, सिर ऊँचा। "यह मेरा काम है। मैं अपनी बहन से मिलने जा रहा हूँ।"
"और छठा स्वर कौन गाएगा?" विक्रम ने पूछा। "सातवाँ मेरे पास है। मैं उसे आख़िर में गाऊँगा।"
"मैं सँभाल लूँगा," कबीर ने कहा। उसकी आवाज़ में कमज़ोरी थी, पर साथ ही एक ऐसी स्थिरता भी जो उसने पहले कभी नहीं दिखाई थी। उसने खड़ा होने की कोशिश की, और मीरा ने उसे सहारा दिया। "मुझे धुन याद है, पापा। परछाईं ने सब बता दिया है।"
"तो शुरू करें।"
चारों ने एक गोल घेरा बनाया, द्वार के सामने। कबीर बीच में था, उसके दोनों ओर मीरा और विक्रम, पीछे मल्हार। भंवर ने रेत का घेरा उनके चारों ओर और पक्का कर दिया। हकीम ज़ैनब का हाथ थामे एक किनारे खड़े थे, और विजय और शरर द्वार के दोनों ओर पहरे पर।
कबीर ने आँखें बंद कीं।
पहला स्वर उसके गले से निकला, कमज़ोर, काँपता, पर साफ़। वही पालने जैसी धुन, झूलती हुई, धीमी। मीरा के होंठ शब्दों के लिए खुले:
"सो जा रे सो जा, नदिया किनारे नाव..."
कक्ष में हवा बदल गई।
हज़ारों घुटनों पर बैठे प्रेतों के चेहरे धीरे-धीरे ऊपर उठे। उनकी आँखों में पहली बार कुछ दिखा, सिर्फ़ प्यास नहीं, पहचान। एक बहुत पुरानी, बहुत भूली हुई पहचान, जैसे बहुत दूर की किसी याद की गूँज उनके कानों तक पहुँच रही हो।
"चुपके-चुपके चंदा उतरे, धीमे-धीमे पाँव..."
उसी पल प्रेतों ने गुनगुनाना शुरू किया।
पहले एक, फिर दो, फिर दस, फिर सैकड़ों, फिर हज़ारों, सूखे, फटे होंठों से, बिना शब्दों के, एक धीमी, गूँजती हुई, किसी पालने जैसी धुन। हूँ... हूँ... हूँ... हज़ारों कंठ एक साथ, एक ही स्वर में, और कक्ष की दीवारें उस गुनगुनाहट को लौटाने लगीं। मीरा के रोंगटे खड़े हो गए। वह कभी इतनी डरावनी और इतनी सुंदर आवाज़ नहीं सुनी थी, जैसे हज़ारों मरे हुए लोग किसी बच्चे को सुला रहे हों।
पहला स्वर। दूसरा। तीसरा।
हर स्वर के साथ द्वार की दरार थोड़ी चौड़ी होती गई, और हर स्वर के साथ कक्ष की ठंड बढ़ती गई। मीरा की साँस सफ़ेद भाप बनने लगी। दीयों की नीली लौ तेज़ी से नाचने लगी।
चौथा स्वर।
अचानक भंवर लड़खड़ाया। उसके हाथ गले पर चले गए। "पानी..." उसके मुँह से टूटा हुआ शब्द निकला। उसके होंठ चटखकर फटने लगे थे, और उनसे ख़ून की पतली धार बह निकली। "गला... जल रहा है..."
"प्यास की लहर," शरर ने चिल्लाकर कहा। "वह जाग रही है! गाते रहो! रुको मत!"
पाँचवाँ स्वर।
हकीम घुटनों पर गिर गए, उनकी दाढ़ी सूखी, चटखी हुई, मुँह के भीतर की जीभ ज़बरदस्ती निगलने की कोशिश में फिसल रही थी। ज़ैनब ने उनके गाल को थपथपाया। "अब्बा, गाइए... वह सुन रही है..." हकीम ने किसी तरह होंठ हिलाए और गुनगुनाहट में शामिल हो गए। विजय का चेहरा सूखकर सफ़ेद पड़ रहा था, पर उसने दाँत भींचे हुए अपनी जगह नहीं छोड़ी। उसकी परछाईं उसके पैरों के पास सिमटकर काँप रही थी।
छठा स्वर।
कबीर की आवाज़ फट गई।
वह पूरी तरह टूटकर काँप रहा था। उसका गला सूखकर ख़ून से सना था, उसकी आँखें ऊपर चढ़ गई थीं। पर मीरा ने उसका हाथ कसकर थामा और वह गाता रहा। उसके होंठों से अंतिम धुन निकली, जो छठे स्वर पर रुकने के लिए बनी थी, एक सीधी, ऊँची, कसी हुई तान।
और सब कुछ एकदम थम गया।
कक्ष की हवा, प्रेतों की गुनगुनाहट, दीयों की लौ, पानी की लहरें। सब एक पल के लिए मूर्ति हो गए। द्वार की दरार अब पूरे डेढ़ हाथ चौड़ी थी, और उसके भीतर की नीली रोशनी इतनी तेज़ थी कि उसकी ओर देखा नहीं जाता था।
छह स्वर पूरे हो चुके थे।
"अब मेरी बारी," विक्रम ने कहा, और उनकी आवाज़ बहुत शांत थी।
उन्होंने आँखें बंद कीं, गहरी साँस ली, और मुँह खोला। उनके गले की नसें उभरीं। उनके होंठ सातवें स्वर के लिए आकार लेने लगे।
कोई आवाज़ नहीं निकली।
विक्रम ने फिर कोशिश की। उनके चेहरे पर पसीना बह निकला। उन्होंने ज़ोर लगाया, उनके कंधे अकड़ गए, पर गले से कोई स्वर बाहर नहीं आया। उनके होंठ हिलते रहे, जैसे कोई मछली पानी के बाहर हाँफ रही हो।
"पापा?" मीरा ने घबराकर पूछा।
विक्रम ने आँखें खोलीं। उनके चेहरे पर पहली बार वह भाव आया जो उन्होंने बाईस साल में कभी नहीं दिखाया था: आश्चर्य और भय, मिला-जुला।
"मैं नहीं गा सकता," उन्होंने कहा। "यह स्वर मेरे गले से बाहर नहीं निकल रहा।"
"क्यों?"
"क्योंकि..." विक्रम ने द्वार की ओर देखा, और उनकी आँखें फैल गईं, जैसे उन्हें कोई बात अचानक समझ आ गई हो, जिसे वे इतने साल से अधूरा छोड़ आए थे। "क्योंकि यह स्वर उस तरफ़ से गाया जाना है। इस तरफ़ से नहीं।"
कक्ष में सन्नाटा छा गया।
"मैंने अपनी हर यात्रा में यही अधूरा छोड़ा था," विक्रम ने काँपती आवाज़ में कहा। "मुझे लगता था कि मैं बस इसे गाऊँगा। पर नाम के आख़िरी स्वर को जगाने के लिए पुकारने वाले का द्वार के भीतर खड़ा होना ज़रूरी है। नदी के बिस्तर में, उसके सामने। जैसे कोई बच्चा अपनी माँ को उसके कमरे के भीतर जाकर जगाता है। बाहर से नहीं।"
सबकी नज़रें, एक-एक करके, मीरा पर आकर टिक गईं।
कोई एक, जो अंदर आए।
ज़ैनब ने यही कहा था। मल्हार का लॉकेट कहता था कि जो उसके साथ गाएगा, वह उसके साथ रहेगा। पर आख़िरी स्वर के लिए जिसे अंदर जाना था, वह नदी के साथ रहने वाला नहीं था। वह वही था जिसे नाम देना था।
"नहीं," विक्रम ने तुरंत कहा, मीरा के चेहरे का भाव पढ़कर। "नहीं, मीरा। मैं तुझे नहीं जाने दूँगा।"
"पापा..."
"तू मेरी बेटी है। मैं बाईस साल इसलिए सोया कि तू सुरक्षित रहे।"
"और अब मैं यहाँ हूँ।" मीरा ने उनके दोनों हाथ थाम लिए, और उसके आँसू बह रहे थे, पर उसकी आवाज़ शांत थी। "आपने ही कहा था। ज़िंदगी भर आपने मुझे सिखाया कि फ़ैसला मुझे ख़ुद करना है। यही तो आपने नदी से भी कहा था, मल्हार को भी, शरर को भी। तो आज यह फ़ैसला मुझे करने दीजिए।"
"दी," कबीर ने कहा। वह लगभग गिरते-गिरते खड़ा था, और उसकी आवाज़ बहुत कमज़ोर थी। "मैं भी चलूँगा।"
"नहीं। तू यहीं रुकेगा। तेरे बिना बाहर सुर कौन थामेगा? छह स्वर इसलिए खड़े हैं कि तू उन्हें रोके हुए है। अगर तू गिरा, तो सब टूट जाएगा।" मीरा ने भाई का माथा चूमा। "मैं लौटूँगी। यह वादा नहीं है। यह मेरा इरादा है।"
कबीर ने हँसने की कोशिश की, और वह हँसी रुलाई में बदल गई।
मीरा ने मल्हार की ओर देखा। वह चुपचाप, कुछ बोले बिना, एक क़दम पीछे हट गया था।
"तुम अंदर नहीं आ सकते," मीरा ने कहा। "नदी तुम्हें अब तक नहीं बुलाती थी। इसलिए जब मैं उसे सातवाँ स्वर दूँगी और वह नाम को पहचानेगी, तब तुम्हें बुलाएगी। तब आना।"
"और अगर वह मुझे न बुलाए?"
"वह बुलाएगी," मीरा ने कहा। उसने सीधे द्वार की ओर क़दम बढ़ाया।
प्रेतों की क़तार, जो घुटनों पर बैठी थी, चुपचाप दो हिस्सों में बँटने लगी। सूखे शरीर धीरे-धीरे एक ओर हटे, और मीरा के सामने कक्ष के बीच से द्वार तक एक चौड़ा रास्ता खुल गया। हर क़तार में वे सिर झुकाए, हाथ जोड़े, उसे जाते देख रहे थे।
विक्रम की आँखों से आँसू बह रहे थे। हकीम ने ज़ैनब को सीने से लगा लिया। भंवर ने रेत की मुट्ठी पोटली से निकालकर मीरा के पैरों के पास की ज़मीन पर रख दी, और बुदबुदाया, "जगत, मैडम का ध्यान रखना।"
मीरा द्वार के सामने रुकी। दरार अब इतनी चौड़ी थी कि एक आदमी आराम से भीतर जा सकता था, और भीतर से नीली रोशनी के साथ ठंडी, सूखी, रेत जैसी हवा निकल रही थी।
उसने पीछे मुड़कर एक आख़िरी बार सबको देखा। पापा, कबीर, हकीम, भंवर, विजय, शरर, मल्हार, और हज़ारों सिर झुकाए प्रेत। फिर उसने सीधा देखा, और एक क़दम आगे बढ़ाया।
दहलीज़ पार करते ही कक्ष की सारी आवाज़ें एकदम कट गईं, जैसे किसी ने कान पर हाथ रख दिए हों। उसके पीछे लोहे की दरार धीरे-धीरे बंद हुई, एक भारी, ख़ामोश, अंतिम क्लिक के साथ।
उसके सामने एक विशाल, सपाट, सूखा हुआ नदी का बिस्तर दूर तक फैला था, ऊपर किसी छत के बजाय सितारों से भरे आसमान जैसी कोई चीज़ थी, नीली, बहुत धीमी रोशनी में टिमटिमाती हुई। बिस्तर की ज़मीन फटी हुई थी, चटखी हुई, और उसके बीचोंबीच, बहुत दूर, एक पुरानी, लंबी, काली लकड़ी की नाव रेत में धँसी खड़ी थी।
नाव के पास कोई बैठा था।
मीरा सँभल-सँभलकर उसकी ओर बढ़ी। पास पहुँचते-पहुँचते उसने देखा कि वह एक छोटी सी बच्ची थी, छह साल की, दो चोटियों वाली, मटमैले, घिसे हुए कुर्ते में, नाव के तख़्ते से टिककर पैर हिलाते हुए। उसने मीरा को आते देखा और उठकर खड़ी हो गई। उसके चेहरे पर कोई डर नहीं था, सिर्फ़ एक गहरी, पुरानी, थकी हुई उम्मीद।
"तुम मेरी माँ की बेटी हो?" बच्ची ने पूछा।
मीरा की साँस रुक गई। "तुम्हारी माँ?"
"नहीं, मेरी बहन की," बच्ची ने कहा, और फिर मुस्कुराई, एक छोटी, टूटी हुई, बहुत मीठी मुस्कान। "मेरा नाम जमुना है।" उसने मीरा के पीछे बंद दरवाज़े की ओर देखा, और उसकी आँखों में आँसू भर आए। "और भैया कहाँ है? वह इतनी देर क्यों कर रहा है?"
- Writer
- firoj saifi
- Story
- रेत का क़ैदी
- Chapter
- 23 of 30
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 16 min
- Words
- 3137
- Language
- Hindi (हिंदी)
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