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एपिसोड 24: नदी का बिस्तर
firoj saifi · Jinn & Spirits · 17 मिनट
मीरा को सबसे पहले अपनी साँस की आवाज़ सुनाई दी।
बाहर के कक्ष में हज़ारों प्रेतों की गुनगुनाहट थी, पानी की छपछप थी, दीयों की चटख थी। यहाँ कुछ नहीं था। न हवा की सरसराहट, न दूर की कोई गूँज। उसकी अपनी धौंकनी जैसी साँस और उसके दिल की धक-धक ही इस विशाल ख़ामोशी में गूँज रही थी, जैसे वह किसी बहुत बड़े खाली घड़े के भीतर खड़ी हो।
उसने ऊपर देखा, और ऊपर कुछ ऐसा था जिसे उसकी बीस साल की खुदाई की आदत भी कोई नाम नहीं दे पाई।
छत नहीं थी। आसमान भी नहीं था। बहुत ऊँचाई पर, उसके सिर के ठीक ऊपर, एक नदी बह रही थी। उलटी, हवा में तैरती हुई, चौड़ी, नीली-हरी, जिसकी सतह पर रोशनी की लकीरें धीरे-धीरे आगे सरक रही थीं। उसमें लहरें थीं, भँवर थे, कहीं-कहीं पानी की सतह पर पत्ते और फूल तैरते दिखते थे, और बहुत दूर, बहुत धुँधले, किसी नाव का सिल्हूट। पर उसका एक भी क़तरा नीचे नहीं गिर रहा था। वह अपने ही उद्गम और अपने ही अंत के बीच हमेशा के लिए अटकी हुई थी, एक तस्वीर की तरह, जिसे किसी ने इतना सँभालकर रखा हो कि वह कभी बहना भूल ही न सके।
नीचे सूखी, फटी हुई ज़मीन थी।
दूर तक, जहाँ तक नज़र जाती थी, नदी का बिस्तर फैला था। मिट्टी इतनी सूखी थी कि उसकी हर परत उखड़कर मुड़ चुकी थी, और उन परतों के बीच दरारें थीं, गहरी, काली, कहीं-कहीं हाथ भर चौड़ी। उन दरारों में से हल्की, गर्म, पुरानी बारिश जैसी महक उठ रही थी, उस मिट्टी की महक जो बरसों बाद पहली बूँद पाकर साँस लेती है। पर बूँद कहीं नहीं थी।
सबसे अजीब बात यह थी कि यह सब सुंदर था। डरावना भी, पर सुंदर।
"आप चल सकती हैं, दीदी?" बच्ची ने पूछा।
मीरा ने नीचे देखा। वह उसके सामने खड़ी थी, सिर्फ़ उसकी कमर तक पहुँचती हुई, दो चोटियाँ, घिसा हुआ कुर्ता, नंगे पैर। उसके पैरों के नीचे की फटी ज़मीन उसके चलने से कहीं भी चटक नहीं रही थी, जैसे उसका वज़न इतना कम हो कि मिट्टी को उसकी आहट ही न मिलती हो।
"चल सकती हूँ," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ बाहर के मुक़ाबले यहाँ बहुत छोटी लगी। "तुम... तुम सच में जमुना हो? मल्हार की बहन?"
"हाँ।" बच्ची ने बिना किसी झिझक के सिर हिलाया। "भैया ने मेरा नाम जमुना इसलिए रखा था कि जब मैं पैदा हुई तो उसने कहा था कि यह लड़की नदी की तरह बहेगी। पर माँ कहती है कि मैं तो इतनी चुप रहती हूँ कि मुझसे बहा ही नहीं जाता।"
"माँ?"
"नदी माँ।" जमुना ने ऊपर की उलटी नदी की ओर इशारा किया। "सब उसे माँ ही कहते थे। मैं भी।" उसने मीरा का हाथ पकड़ लिया। उसका हाथ छोटा था और बहुत गर्म, एक बच्चे का जो अभी-अभी धूप में खेलकर आया हो। "आइए। मैं आपको दिखाती हूँ। माँ ने कहा था कि जब कोई अपना आए तो उसे सब दिखाना।"
"तुम्हें सब पता है?"
"मुझे सब पता है, दीदी। माँ मुझे सब बताती है। वह किसी से बोलती नहीं, पर मुझसे बोलती है, क्योंकि मैं छोटी हूँ और छोटों से डर नहीं लगता।" वह मीरा को खींचती हुई चल पड़ी। "और भैया की बात भी। मुझे पता है भैया ने बहुत बुरे काम किए हैं।"
मीरा के पैर ठिठक गए।
"माँ ने बताया," जमुना ने बड़ी सहजता से कहा। "कि भैया ने एक आदमी को मारा था, और बहुत लोगों को डराया था। माँ रोती है जब बताती है। पर मैं भैया से नाराज़ नहीं हूँ।" उसने मीरा की ओर देखा, उसकी गोल आँखों में बिल्कुल साफ़ सच्चाई थी। "वह थक गया था न? उस दिन भी, जब मैं मरी, वह बहुत थका हुआ था। मैंने माँ से कहा था कि भैया को मत डाँटना।"
मीरा का गला भर आया। उसने कुछ कहना चाहा, पर कुछ भी कहने के लिए शब्द नहीं मिले। उसने बच्ची का हाथ थोड़ा और कसकर पकड़ लिया।
वे सूखे बिस्तर पर चलने लगे।
ज़मीन की हर दरार के भीतर कोई न कोई चीज़ रखी थी। मीरा को पहले लगा कि वे पत्थर हैं, पर पास जाने पर दिखा कि वे नन्ही, पुरानी, सँभालकर रखी गई चीज़ें थीं। एक दरार में काँच की एक टूटी चूड़ी, जिसके किनारे सुनहरे थे। दूसरी में मिट्टी का एक छोटा सा कटोरा, जिसकी दीवारों पर किसी के होंठों के निशान जमे हुए थे। तीसरी में किसी बच्चे का लकड़ी का घोड़ा। चौथी में बाँसुरी का एक टुकड़ा, पाँचवीं में काजल की एक सूखी डिबिया।
"यह गौरी की चूड़ी है," जमुना ने रुककर कहा। "वह नदी के किनारे कपड़े धोती थी। उसकी शादी होने वाली थी। जब नदी सूख गई, तो वह सबसे आख़िर तक पानी ढूँढती रही। माँ कहती है कि उसने आख़िरी साँस में कहा था कि चूड़ी का रंग फीका पड़ गया।"
उसने अगली दरार की ओर इशारा किया। "यह रामदेव का लोटा है। वह रोज़ सुबह सूरज को जल चढ़ाता था। जब पानी नहीं बचा, वह ख़ाली लोटे से जल चढ़ाता रहा, हर सुबह, सात महीने तक।"
"यह सब तुम्हें याद है?"
"मुझे सबका नाम याद है," जमुना ने कहा। "माँ भूल जाती है। उसके पास बहुत सारे लोग हैं, बहुत सारी यादें, और वह थक जाती है। मैं बस छोटी चीज़ें याद रखती हूँ। जो माँ के पास आईं, पर किसी ने जिनके बारे में पूछा नहीं।" वह एक और दरार पर रुकी। "यह किसी का नाम नहीं है, दीदी। इसे कोई नहीं जानता। एक बच्चे का खिलौना है, पर मुझे उसका नाम पता नहीं चला। मैं रोज़ इसे देखती हूँ और सोचती हूँ कि इसे कौन ढूँढ रहा होगा।"
मीरा ने झुककर देखा। दरार के भीतर एक मिट्टी की छोटी सी नाव थी, जिसका एक किनारा टूटा हुआ था, और उसके पास रेत पर किसी बहुत छोटी उँगली का निशान जमा हुआ था।
उसके भीतर कुछ हिला। वह इन चीज़ों का मतलब जानती थी। खुदाई के हर मौसम में उसने ऐसी चीज़ें पाई थीं और उन्हें सावधानी से झाड़-पोंछकर रजिस्टर में दर्ज किया था: वस्तु संख्या 114, मिट्टी का कटोरा, संभवतः घरेलू उपयोग। कितनी बार उसने सोचा था कि यह कटोरा किसी के होंठों तक पहुँचा होगा, कि किसी ने इसमें आख़िरी बार पानी पिया होगा, और कितनी बार उसने उस सोच को रजिस्टर की सूखी भाषा के नीचे दबा दिया था।
"तुम्हारी माँ इन सबको क्यों रखती है?" उसने धीमे से पूछा।
"क्योंकि इनके बिना वह बह नहीं सकती," जमुना ने कहा। "नदी का मतलब सिर्फ़ पानी नहीं होता, दीदी। नदी का मतलब है कि कोई उसके किनारे आया, कुछ छोड़ा, कुछ ले गया। माँ ने बहुत कुछ लिया था, और बहुत कुछ छोड़ा था। यही सब उसे नदी बनाते हैं।"
पहली बार मीरा को महसूस हुआ कि कुछ गड़बड़ है, जब उसने उस नन्ही मिट्टी की नाव को छूने के लिए हाथ बढ़ाया।
हाथ बढ़ाते-बढ़ाते उसे लगा कि वह कुछ भूल रही है।
एक नाम। वह नाम जो उसने कुछ ही देर पहले अपने मन में दोहराया था। वह जिसने कबीर को कंधे पर उठाया था, जिसकी कमीज़ में रेत की पोटली बँधी थी, जिसकी आँखों में हमेशा एक पुराना ग़ुस्सा सुलगता रहता था। वह कौन था? उसकी शक्ल उसे साफ़ याद थी, मूँछें, भारी कंधे, माथे पर पसीना। पर नाम...
भ... भ...
नाम का पहला अक्षर उसकी ज़ुबान की नोक पर था, और जैसे ही वह उसे पकड़ने की कोशिश करती, वह फिसल जाता था। उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा। उसने बाक़ी नाम टटोलने की कोशिश की। पापा, उसने मन में दोहराया। कबीर। हकीम साहब। विजय। शरर। मल्हार। सब वहाँ थे, पर उनके नाम किसी धुँध के पीछे से झाँकते लग रहे थे, जैसे किसी ने उन पर पतली भाप जमा दी हो।
"दीदी," जमुना ने उसका हाथ ज़ोर से खींचा। "आपने नाम बोले?"
"क्या?"
"आपके होंठ हिले। आप नाम बोल रही थीं।"
मीरा को पता ही नहीं था कि उसके होंठ हिल रहे थे। उसने जल्दी से अपने मुँह पर हाथ रख लिया।
"यहाँ नाम बाहर नहीं बोलते, दीदी," जमुना ने फुसफुसाकर कहा, और उसकी आँखों में पहली बार घबराहट दौड़ गई। "माँ बहुत प्यासी है। वह आवाज़ में बँधे नाम पी जाती है। जो नाम आप ज़ोर से बोलती हैं, वह माँ के पास चला जाता है। अंदर रखिए, बस अंदर। बोलिए नहीं।"
"मैंने तो..."
"आपने बोला। आपने उन सबके नाम बोले। मैंने सुना।" जमुना ने उसकी हथेली अपनी दोनों छोटी हथेलियों में दबा ली। "कौन सा नाम खोया है आपका? जल्दी बताइए।"
"मुझे... मुझे नहीं पता।" मीरा की आवाज़ घबराहट से टूटने लगी। "वह आदमी जो... जिसकी पोटली... जिसने मुझे बचाया..."
"भंवर काका," जमुना ने कहा।
मीरा की आँखें फैल गईं।
भंवर। नाम उसके भीतर लौट आया, एक पल में, पूरा, साफ़, उसकी जगह पर, जैसे किसी ने गिरा हुआ चिराग़ उठाकर रख दिया हो। उसके साथ उसका भारी चेहरा, उसकी पुरानी वफ़ादारी, उसकी मुट्ठी में भिंची रेत लौट आई।
"तुम्हें उनका नाम..."
"मैंने आपकी साँसों में सुना," जमुना ने कहा। "जब आप अंदर आईं, तो आपके साथ कई नाम आए थे। मैंने सब सँभाल लिए। माँ को पता ही नहीं चला।" उसने मीरा की आँखों में सीधे देखा। "अब आप एक काम करो। जब भी लगे कि कोई नाम जा रहा है, तो उसे चुपचाप अपने भीतर गाओ। लोरी में। माँ को लोरी पसंद है। वह उसे नहीं छूती।"
मीरा ने काँपती साँस भीतर खींची और होंठ बंद करके अपने गले में वह धुन गुनगुनाई, बिना किसी आवाज़ के। हूँ-हूँ-हूँ... पापा। कबीर। भंवर। हकीम साहब। जगत। माँ। जमुना, उसकी माँ, जिसने उसे यह धुन सिखाई थी। हर नाम धुन की एक कड़ी पर बैठता चला गया, और उसकी पकड़ मज़बूत होती गई।
"ऐसे ही," जमुना ने सिर हिलाया। उसके चेहरे का तनाव ढीला पड़ा। "अब चलिए। माँ आपका इंतज़ार कर रही है।"
वे और आगे बढ़े। ऊपर की उलटी नदी की रोशनी अब थोड़ी मंद होने लगी थी, उसकी लहरें धीमी पड़ रही थीं। मीरा ने जान लिया कि बाहर चाँद नीचे उतर रहा है, और भीतर की हर चीज़ उसकी चाल में बँधी है।
"जमुना," उसने बहुत धीमे, फुसफुसाती हुई आवाज़ में, लगभग गाते हुए पूछा, ताकि नाम बाहर न जाए। "तुम्हारा भाई एक गीत गाता था, है न? हर सुबह। नदी को जगाने के लिए।"
जमुना की आँखें चमक उठीं। "आपको कैसे पता?"
"पन्नी पर लिखा था। उस पर लिखा था कि नाम सात स्वरों में बँटा है, छह लोरी में, और सातवाँ अंतिम ताले में बंद।"
"सातवाँ स्वर मेरा है," जमुना ने कहा।
मीरा की साँस रुक गई।
"मेरा है," बच्ची ने दोहराया, और उसके चेहरे पर एक बहुत पुराना गर्व था, जो किसी बहुत छोटी लड़की में कभी-कभी चमकता है जब बड़ों ने उसे पहली बार कोई ज़िम्मेदारी दी हो। "हम दोनों रोज़ सुबह घाट पर जाते थे। भैया पहले गाता था, फिर मैं। जैसे कोई पुकारे और कोई जवाब दे। भैया गाता था, 'माँ, जागो', और मैं गाती थी..." उसने सुर में कुछ गुनगुनाया, बहुत छोटी, बहुत मीठी, एक ऊँची तान जो किसी चिड़िया की पुकार जैसी थी, और उसी पल मीरा के रोंगटे खड़े हो गए।
वह शब्द नहीं था। वह एक खुला स्वर था, एक बच्चे की सीधी पुकार, जिसमें न कोई चालाकी थी, न कोई माँग। बस बुलाना।
पर जमुना की तान बीच में ही अटक गई। उसके होंठ हिलते रहे, पर आवाज़ नहीं निकली। वह मुँह खोलकर कोशिश करती रही और उसके चेहरे पर निराशा उतरती गई।
"फिर यही होता है," उसने भर्राई आवाज़ में कहा। "जब भी मैं पूरा गाना चाहती हूँ, मेरे गले में कुछ अटक जाता है।"
"क्यों?"
"क्योंकि माँ ने कहा है कि भैया के आए बिना मैं नहीं गाऊँगी।" जमुना की आँखें डबडबा आईं। "वह कहती है कि अगर मैं अकेले गाऊँगी तो दरवाज़ा खुल जाएगा, और भैया अंदर आ जाएगा। और वह नहीं चाहती कि भैया अंदर आए।"
मीरा ने आख़िरी बात को पूरी तरह सुना, और उसके भीतर एक सिहरन दौड़ गई।
"तुम्हारी माँ नहीं चाहती कि मल्हार अंदर आए?"
"नहीं।" जमुना ने मुँह फेर लिया। "वह कहती है कि भैया बहुत सह चुका है। कि अब अगर वह अंदर आया तो फिर कभी बाहर नहीं जाएगा। वह मुझसे कहती है, 'जमुना, बेटी, तेरे भैया को आज़ाद रहने दे।' और मैं कहती हूँ, पर माँ, भैया मुझे लेने आएगा। नाव अभी तक नहीं चली है।"
उसके आँसू गाल पर लुढ़क पड़े, और जहाँ वे गिरे वहाँ सूखी ज़मीन पर एक नन्हा सा काला धब्बा उभर आया, पल भर के लिए, फिर सूख गया।
"मैं भी भैया से मिलना चाहती हूँ, दीदी। मैं तीन हज़ार साल से यहाँ बैठी हूँ। मुझे अब नहीं पता कि माँ मुझे क्यों रोक रही है।"
मीरा ने कुछ नहीं कहा। उसने बच्ची को अपनी बाँहों में खींचकर सीने से लगा लिया। जमुना का छोटा सा शरीर उसकी बाँहों में काँप रहा था, और उसके रोने में बिल्कुल वही बेआवाज़ सिसकियाँ थीं जो विजय की थीं, उन बच्चों की जिन्होंने बहुत छोटी उम्र में रोना सीख लिया हो, पर यह भी सीख लिया हो कि रोने से कोई नहीं आता।
कोई एक, जो अंदर आए। ज़ैनब की बात मीरा के कान में गूँजी। वह बात नदी की नहीं थी। वह जमुना की ख़ुद की पुकार थी, जिसे उसने अपनी माँ की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ किसी तरह बाहर पहुँचाया था।
"तुम बहुत बोलती हो, केवट की बहन की बेटी।"
आवाज़ आसमान की उलटी नदी से नहीं आई। वह उसके पैरों के नीचे से आई, ज़मीन की सबसे गहरी दरारों से, एक ऐसी आवाज़ जो पत्थर के खिसकने और बहुत दूर के पानी के बहने के बीच कहीं बैठी थी।
मीरा ने जमुना को अपनी बाँहों में थामे हुए सिर उठाया।
बिस्तर के बीचोंबीच, नाव के पास, ज़मीन उठ रही थी।
पहले एक टीला जैसा उभार, जिसकी सतह की सूखी परतें चटककर इधर-उधर झरने लगीं। फिर उस उभार के दोनों ओर दो और, फैले हुए, किसी लेटी हुई औरत के कंधों जैसे। फिर एक लंबा, ढलवाँ हिस्सा, जिसके सिरे पर एक गोल, चपटा उभार था, चेहरे की तरह। और उस चेहरे पर, जहाँ आँखें होनी चाहिए थीं, दो गहरे, सूखे, गोल कुएँ थे, जिनकी तलहटी में नमी की एक बहुत पतली, मंद चमक काँप रही थी।
वह एक पूरी नदी का बिस्तर थी, और वह बिस्तर एक औरत के आकार में लेटा हुआ था, करवट बदलकर, घुटने सिकोड़कर, जैसे कोई बहुत थका हुआ आदमी सोते हुए अपने आपको ही गले लगा लेता है। उसका एक हाथ, जो मीलों लंबी सूखी धारा थी, नाव के पास पसरा हुआ था, और उसकी उँगलियों के बीच से दरारों में वे सब चीज़ें झाँक रही थीं जिन्हें जमुना ने गिनाया था।
मीरा के पैर जम गए। डर नहीं था। वह एक अलग तरह का सन्नाटा था, जिसमें सिर्फ़ यह एहसास था कि वह किसी बहुत पुरानी, बहुत बड़ी चीज़ के सामने खड़ी है, जो उसकी हर साँस को सुन सकती है।
"तुम अंदर आ गईं," नदी ने कहा। उसकी आवाज़ में न ग़ुस्सा था, न स्वागत, सिर्फ़ एक विशाल थकान। "राजा के घाट की बेटी। केवट के घाट की संतान। दो नावों में सवार।"
"मैं आपको पहचानती हूँ," मीरा ने अपने गले की धुन को थामे हुए कहा, ताकि उसकी आवाज़ में किसी का नाम न घुल जाए। "मैंने आपको देखा था। उस बूँद में।"
"तुमने बहुत कुछ देखा। पर सब कुछ नहीं।" सूखे कुओं जैसी आँखें धीरे-धीरे मीरा की ओर घूमीं। "जमुना ने तुम्हें बताया होगा कि मैंने क्या कहा था। मैं उसके भाई को अंदर नहीं बुलाऊँगी।"
"उसने बताया।"
"तो फिर तुम यहाँ क्यों खड़ी हो? सातवाँ स्वर गाने के लिए जमुना को उसके भाई की ज़रूरत है, और मैं उसे नहीं बुलाऊँगी। यह तुम्हारी लड़ाई यहीं ख़त्म होती है।"
मीरा ने साँस ली। उसके पैरों के नीचे ज़मीन हल्के-हल्के काँप रही थी, और जमुना ने उसका हाथ पहले से ज़्यादा कसकर थाम लिया था। उसके भीतर बहुत कुछ चल रहा था, पिता की कही बात, माँ की लोरी, हकीम की बाईस साल पुरानी शर्म, भंवर का पंद्रह साल का दर्द, और तीन हज़ार साल का एक आदमी जो अभी-अभी अपना चेहरा पाकर रोया था।
उसने बहुत धीमे, पर साफ़, कहा:
"नहीं।"
नदी के चेहरे की दरारें एक पल को रुक गईं।
"नहीं?"
"नहीं," मीरा ने दोहराया। "आप उसे रोक नहीं सकतीं, क्योंकि यह फ़ैसला आपका नहीं है। आप तीन हज़ार साल से उसकी हर चीज़ का फ़ैसला करती आई हैं। उसे अमर बनाया, उसे अकेला रखा, उसे हर बार वापस भेजा। अब बस। उसे ख़ुद चुनने दीजिए कि वह अंदर आना चाहता है या नहीं।"
ज़मीन ज़ोर से हिली। ऊपर की उलटी नदी में एक लहर उठी और उसकी रोशनी एक पल को बुझ गई, फिर लौटी। मीरा के पैरों के आसपास की दरारें चौड़ी होने लगीं, काली, गहरी, उसकी ओर फैलती हुईं, जैसे पेड़ की जड़ें पानी की ओर बढ़ती हैं।
"तुम नहीं समझतीं," नदी ने कहा, और अब उसकी आवाज़ में डर था, एक बहुत पुराना, भीतर दबा हुआ डर, जो किसी बड़ी चीज़ के भीतर सबसे छोटी जगह में बसता है। "मैं उसे इसलिए नहीं रोक रही कि मैं उसे अपने पास रखना चाहती हूँ। मैं उसे इसलिए रोक रही हूँ कि मैं उससे डरती हूँ।"
मीरा के क़दम ठिठक गए।
"किससे?"
"उस दिन से जब वह अंदर आएगा, और मैं पूरी तरह जाग जाऊँगी।"
नदी की आँखों के सूखे कुएँ बहुत धीमे से गहरे होते गए, और उनके भीतर वह मंद चमक काँपी, जैसे किसी बहुत थके हुए आदमी की आँख में आख़िरी आँसू रुका हो।
"मैं प्यास हूँ, बेटी। हज़ारों की प्यास। जब मेरा नाम लौटेगा तो मैं जागूँगी, और जागने पर मेरी पहली चीज़ यही होगी कि मैं पीना चाहूँगी। और जब मैं पीना चाहूँगी, तो मेरे सबसे पास जो होगा, वह मेरी बाढ़ में सबसे पहले डूबेगा।" दरारों का फैलना रुक गया, पर उनकी साँसें मीरा की त्वचा पर महसूस हो रही थीं, गर्म, खिंची हुई। "मैंने एक बार अपने सबसे प्यारे को खो दिया था, उस दिन जब मल्हार ने गुरु का गला दबाया। मैं उसे नहीं रोक पाई। और आज मैं नहीं चाहती कि वह फिर मेरी वजह से किसी ऐसी चीज़ में फँसे जिससे वह कभी बाहर नहीं निकलेगा।"
मीरा ने अपने सीने की भीतर की धुन को काँपते देखा, पर उसे थामे रखा। उसने जमुना की ओर देखा, जो अपनी माँ की आँखों में टकटकी लगाए हुए थी, और उसके नन्हे चेहरे पर एक ऐसा भाव था जो किसी बड़ी बेटी का होता है जब वह पहली बार अपनी माँ की कमज़ोरी देखती है।
"माँ," जमुना ने बहुत धीमे से कहा। उसकी आवाज़ बिल्कुल बच्चों जैसी थी, पर उसमें अजीब सी स्थिरता थी। "आप डर रही हैं?"
"हाँ, मेरी चिड़िया।"
"भैया ने तो कभी आपसे डर नहीं खाया।"
नदी चुप रही।
मीरा ने उस चुप्पी में एक बात देखी, एक छोटी, पतली, पर असली बात, जिसे उसके पिता ने सिखाया था। जो सब कुछ कहता है, वह नहीं कहता जो सबसे ज़रूरी है। और जो सबसे ज़रूरी है, वह अक्सर एक छोटी सी बात होती है।
"आपने कहा कि आप उससे डरती हैं," उसने कहा, "पर यह पूरा सच नहीं है।"
नदी की आँखों के कुएँ मीरा पर ठहर गए।
"आप उससे नहीं डरतीं। आप अपने आपसे डरती हैं।"
“...”
"और आप सही हैं। आप ख़तरनाक हैं। जब आप जागेंगी तो आप सब कुछ पी सकती हैं। मैं यह जानती हूँ। पर आप एक और बात जानती हैं, जो आपने अब तक किसी से नहीं कही।"
मीरा ने एक क़दम आगे बढ़ाया। ज़मीन की दरारें उसके पैर के नीचे चरमराईं, पर उसने नहीं रुककर देखा। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, लगभग एक फुसफुसाहट, पर उसमें इतना भार था कि पूरे बिस्तर में उसकी गूँज उठी।
"आप जानती हैं कि जिसे आप सबसे ज़्यादा चाहती हैं, वही आपकी सबसे बड़ी बाढ़ को रोक सकता है।"
नदी के चेहरे पर एक लंबी, धीमी, मिट्टी के खिसकने जैसी कंपकंपी दौड़ी, और उसके कंधों की सूखी परतें झरकर बिखर गईं।
ऊपर आसमान की उलटी नदी की रोशनी एक पल को पूरी तरह बुझ गई। और पूरे बिस्तर पर, मीलों तक, हर दरार एक साथ चटखकर खुल गई।
- Writer
- firoj saifi
- Story
- रेत का क़ैदी
- Chapter
- 24 of 30
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 17 min
- Words
- 3258
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
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