Pretika › Jinn & Spirits › रेत का क़ैदी
एपिसोड 25: जो बाहर रह गए
firoj saifi · Jinn & Spirits · 15 मिनट
नदी का जवाब देर तक नहीं आया।
मीरा बिस्तर के बीचोंबीच खड़ी थी, उसके चारों ओर दरारें साँप की तरह फैलती हुई। जमुना ने उसकी कमर को दोनों बाँहों से जकड़ रखा था, और दोनों के पैरों के पास की ज़मीन इतनी हिल रही थी कि मीरा को लगा कि वह किसी जहाज़ के डेक पर खड़ी है। ऊपर की उलटी नदी की रोशनी बुझ चुकी थी, और अँधेरे में सिर्फ़ दरारों की भीतर की मंद नमी चमक रही थी।
फिर एक आवाज़ आई, बहुत धीमी, बहुत टूटी हुई।
"वह दोनों काम करेगा, तो मैं उसे खो दूँगी।"
मीरा ने जमुना के सिर पर हाथ रखा और बहुत शांत स्वर में पूछा, "किस तरह खो देंगी?"
"जो मुझे थामेगा, वह मेरे साथ बहेगा। जब तक मैं बहूँगी, वह रुकेगा नहीं। उसे सूरज नहीं दिखेगा, न कोई घर, न कोई किनारा। सिर्फ़ मैं।" नदी का चेहरा ज़रा सा झुका, और दरारों के बीच से एक गहरी, कराहती साँस निकली। "मैंने उसे तीन हज़ार साल क़ैद रखा। मैं उसे कोई और क़ैद नहीं देना चाहती।"
"क्या बहना क़ैद है?"
"जब आप बहने के सिवा कुछ और नहीं कर सकते, तो हाँ।"
मीरा देर तक कुछ नहीं बोली। उसने उन सब बातों को टटोला जो उसने मल्हार के साथ बिताए कुछ घंटों में सुनी थीं। उसकी बातें, उसकी आँखें, जिस तरह उसने अपने चेहरे को हथेली से छूकर देखा था। उसे अचानक वह बात याद आई जो उसने विक्रम के बारे में कही थी।
"मेरे पिता ने इकतालीस दिन तक एक आदमी के साथ चाय पी," उसने कहा, "जिसने उन्हें डराया, फुसलाया और बार-बार धोखा दिया। और उन्होंने कभी उससे नफ़रत नहीं की। जानती हैं क्यों?"
"क्यों?"
"क्योंकि उन्होंने उसकी थकान देखी थी। तीन हज़ार साल तक वह एक ऐसी चीज़ को पकड़े रहा जो उसे छोड़ने को नहीं कहती थी, और उसने हर बार सोचा कि पकड़ना ही उसका धर्म है। आप उसे बहने से बचाना चाहती हैं, पर वह पहले से ही बह रहा है। वह तीन हज़ार साल से आपके साथ बह रहा है, चाहे आप उसे अंदर बुलाएँ या नहीं। फ़र्क़ बस इतना है कि अब तक वह अँधेरे में बह रहा था। अकेला। बिना किसी नाम, बिना किसी चेहरे के।"
मीरा ने अपने हाथ फैलाए, खाली, जैसे कोई दरवाज़ा खोलता है।
"उसे अपने घर बुलाइए। किसी जेलर की तरह नहीं, माँ की तरह।"
उधर, लोहे के द्वार के बाहर, कक्ष की घड़ी थम गई थी।
मीरा के भीतर जाते ही दरार बंद हो गई थी, और उसके साथ हवा की दिशा बदल गई थी। कक्ष में अब पानी का बहना बंद था। सतह कसकर जमे काँच की तरह स्थिर थी, और उसके ऊपर हज़ारों सूखे प्रेत घुटनों के बल बैठे थे, मौन, सिर झुकाए, जैसे किसी इबादत के बीच हों। नीली लौ वाले सातों दीयों की रोशनी धीमी पड़ गई थी।
कबीर वहीं था जहाँ मीरा उसे छोड़ गई थी, द्वार के सामने, पाँव फैलाकर खड़ा, दोनों हाथ आगे की ओर किए, जैसे किसी भारी चीज़ को थाम रहा हो। उसके होंठों से लगातार वही छह स्वर निकल रहे थे, धीमे, कमज़ोर, एक ही चक्र में घूमते हुए। हर बार जब धुन छठे स्वर पर पहुँचकर रुकने को होती, कबीर उसे फिर पहले स्वर से शुरू कर देता, ताकि नाम की डोर कहीं टूट न जाए।
उसका गला सूख चुका था, और होंठों की दरारों से ख़ून की पतली धारें रिसकर ठोड़ी तक उतर आई थीं। पर उसके पास ही विक्रम खड़े थे, एक हाथ उसकी पीठ पर, दूसरा उसके कंधे पर, और हर बार जब कबीर के घुटने काँपते, वे बहुत हल्के से अपना वज़न उसके नीचे सरका देते।
"थोड़ा और, शेर," वे उसके कान में कहते। "मैं हूँ।"
"पापा, मुझे लगता है मैं..."
"तू कर सकता है। तू बचपन में रात भर तारे गिनता था, याद है? सात पर रुककर फिर शुरू कर देता था। यह भी वैसा ही है। बस सात पर रुकना नहीं है।"
कबीर ने काँपती हँसी हँसी, और उसकी धुन फिर थम गई। विक्रम ने उसे संभाला और गुनगुनाहट में अपनी आवाज़ मिला दी, धीमी, गहरी, उसी सुर में जिसे जमुना घर की हर रात गाती थी।
हकीम रुस्तम ज़ैनब को गोद में उठाए किनारे बैठे थे। बच्ची उनके कंधे पर सिर टिकाए आधी सोई आधी जागी थी, और बीच-बीच में बहुत महीन आवाज़ में बुदबुदाती थी, कभी अपनी गुड़िया से बात करती, कभी अब्बा से कुछ पूछती। हकीम हर बार धीरे से जवाब देते, और हर जवाब के साथ उनकी आँखें भीग जाती थीं।
भंवर लकीर के बाहरी किनारे पर पहरेदार की तरह खड़ा था, उसकी पोटली खुली हुई, मुट्ठी में रेत भरी। उसकी नज़र प्रेतों की क़तार पर थी, पर उसकी आँखों में कोई डर नहीं था, एक अजीब सा सम्मान था।
विजय और शरर द्वार के दोनों ओर पहरे पर थे, जैसे किसी महल के दो द्वारपाल। विजय की परछाईं उसके पैरों के पास सिमटी हुई थी, और वह बार-बार उसे देखता था।
मल्हार सबसे अलग, कक्ष के एक कोने में, घुटने सीने से लगाए बैठा था। हरी चादर उसके कंधों पर पड़ी थी, और उसकी नज़र द्वार पर जमी थी, जहाँ कुछ पल पहले मीरा ग़ायब हुई थी।
"अम्मा?"
यह आवाज़ विजय की थी, बहुत धीमी, बहुत हैरान। सब ने सिर घुमाया।
विजय अपनी जगह छोड़कर क़तार की ओर बढ़ रहा था, एक-एक क़दम सावधानी से रखता हुआ, जैसे डर रहा हो कि ज़ोर से चलने पर कोई चीज़ टूट जाएगी। उसकी आँखें प्रेतों के चेहरों पर घूम रही थीं, एक के बाद एक, और अचानक एक चेहरे पर आकर ठहर गईं।
वह एक औरत थी, बाक़ी सबकी तरह सूखी, पर बाक़ियों से अलग। उसके कपड़े कभी बहुत क़ीमती रहे होंगे, मोटे ज़री की किनारी वाली चूनर, भारी बाजूबंद, माथे पर बोरला। सब अब पुराने, काले, गलकर चटखे हुए। उसके बाल लंबे और सफ़ेद थे, कमर तक लटकते हुए। उसकी आँखें बंद थीं, और उसके सूखे होंठ बहुत हल्के हिल रहे थे, बिना आवाज़ के, किसी पुरानी प्रार्थना के शब्दों में।
"अम्मा," विजय ने फिर कहा। वह उसके सामने जाकर घुटनों के बल बैठ गया। "अम्मा, मैं विजय हूँ।"
औरत ने आँखें नहीं खोलीं।
"आपने दरवाज़े के पीछे से मुझे बुलाया था," विजय ने कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर उसने उसे थामे रखा। "मैंने आपकी बात सुनी, पर मैं नहीं आ पाया। मुझे डर था कि वह आप नहीं हैं। माफ़ कर दीजिए, अम्मा। अगर वह आप थीं, तो मुझे माफ़ कर दीजिए।"
औरत के होंठ अब भी हिल रहे थे। विजय ने आगे झुककर कान लगाया, और बहुत देर तक कुछ नहीं सुन पाया। फिर शब्द उभरे, जैसे गहरे कुएँ की तली से भाप उठती है, एक के बाद एक, इतने धीमे कि हर शब्द के बीच में अनंत ठहराव था।
“...मेरे... लाल... इधर आ...”
विजय का चेहरा पिघल गया। उसने सिर हिलाया, बार-बार, जैसे किसी बात को पक्का कर रहा हो। फिर उसने काँपते हाथ आगे बढ़ाए और औरत का दाहिना हाथ अपनी दोनों हथेलियों में थाम लिया। वह हाथ बर्फ़ की तरह ठंडा और काग़ज़ की तरह सूखा था।
"अम्मा, मुझे बाबा ने सुलाया था," उसने भर्राई आवाज़ में कहा। "आपको कुछ नहीं पता था। बाबा ने किसी से कुछ नहीं कहा। आपने मेरे बारे में कभी नहीं जाना, है न? आप मुझे बीमारी से गया हुआ समझती रहीं।"
औरत के सूखे गाल पर एक तिरछी लकीर बनी, जैसे कोई बहुत पुराना आँसू आँख के कोने से निकलना चाहता हो पर उसे रास्ता न मिल रहा हो।
“...तू... बीमार... था...”
"हाँ, अम्मा।"
“...मैंने... कुएँ पर... तेरी... चादर... धोई...”
विजय की आँखों से आँसू बहने लगे। "आपने मेरी चादर धोई थी?"
“...सात... बरस... तक... रोज़...”
यह वह बात थी जो डायरी में कहीं नहीं थी। रानी चंद्रावती ने बेटे की मौत के बाद सात बरस हर रोज़ उसकी चादर को बावड़ी की सीढ़ियों पर धोया था, पानी में डुबोकर, निचोड़कर, फिर धूप में सुखाकर, बिना किसी को बताए, बिना किसी से कुछ कहे। राजा ने उसे कभी रोका नहीं, क्योंकि वह जानता था कि वह चादर सातवीं सीढ़ी के ठीक ऊपर सुखाई जाती है, और रानी को पता नहीं था कि उसका बेटा उसके नीचे सो रहा है।
विजय का पूरा शरीर काँपने लगा। उसने रानी का हाथ अपने गाल से लगा लिया।
"मुझे वह चादर याद है, अम्मा," उसने कहा। "तीन सौ साल जब मैं नीचे जागा रहा, तो हर सुबह मुझे लगता था कि ऊपर किसी की परछाईं पड़ती है, और ठंडे पानी की बूँदें मेरे चेहरे पर आती हैं। मुझे लगता था कि कोई मुझे नहला रहा है। मैं नहीं जानता था कि वह आप थीं।"
उसकी आवाज़ टूट गई। उसने कुछ नहीं कहा, बस रानी के हाथ को चूम लिया और उसके घुटनों पर सिर टिका दिया, बिल्कुल वैसे जैसे कोई तेरह साल का बच्चा अपनी माँ की गोद में सिर रखता है जब वह थककर घर लौटा हो।
रानी का एक हाथ, जो बाक़ी प्रेतों की तरह पत्थर बना बैठा था, धीरे-धीरे उठा। उँगलियाँ काँपीं, फिर बहुत सावधानी से विजय के भीगे हुए बालों पर आकर ठहर गईं।
“...मेरा... लाल...”
और तभी, बिना किसी के छुए, बिना किसी इशारे के, रानी की बंद पलकों के नीचे से एक बूँद निकली।
पानी की एक सच्ची, गोल, साफ़ बूँद। उसने सूखी त्वचा को चीरकर रास्ता बनाया और रानी के गाल पर लुढ़कती हुई विजय के बालों में समा गई।
पूरे कक्ष में हज़ारों प्रेतों के सिर एक साथ उठे।
पानी की बूँद मल्हार ने भी देखी।
वह कोने से उठा, धीरे-धीरे, जैसे किसी नींद से जाग रहा हो, और रानी की ओर देखता रहा। उसकी आँखों में कुछ हिला।
"प्यासे को पानी नहीं चाहिए था," उसने बहुत धीमे से कहा। उसकी आवाज़ किसी बहुत बड़ी बात को पहली बार समझने वाले की थी। "तीन हज़ार साल मैं सोचता रहा कि इनकी प्यास पानी से बुझेगी। ग़लत था। इन्हें पहचान चाहिए थी।"
"जब किसी को उसके नाम से पुकारा जाए," शरर ने कहा, "तो वह थोड़ा सा भर जाता है।"
"इसीलिए नदी मुझे बार-बार रोकती थी जब मैं उसे पानी देने की बात करता था।" मल्हार का गला भर आया। "वह जानती थी। वह जानती थी कि मैं ग़लत रास्ते पर हूँ, पर वह मुझे बता नहीं सकती थी, क्योंकि उसके पास कहने के लिए शब्द नहीं थे।"
उसने रानी से नज़र हटाई और क़तार के बाक़ी चेहरों को देखा, एक-एक करके, इस बार पहली बार, जैसे उन्हें पहली बार देख रहा हो। उसके भीतर एक नई बात उठ रही थी, जो ग्लानि नहीं थी, पर उसके बहुत पास थी।
"मैंने इनमें से बहुतों को देखा था," उसने कहा। "इनके मरने के बाद। मैं इनकी आवाज़ें सुनकर आगे बढ़ जाता था। मुझे लगता था कि अगर मैं रुका तो मैं टूट जाऊँगा।" उसने अपने हाथ देखे। "अब मुझे लगता है कि मैं टूटने से डरता था, पर इनके पास रुकना इतना मुश्किल नहीं था।"
शरर उसके बगल में आ खड़ा हुआ, और बहुत धीमे से कहा, "तुम अब भी टूट सकते हो।"
"हाँ।" मल्हार ने मुस्कुराकर कहा। "पर अब मैं अकेला नहीं टूटूँगा।"
भंवर ने मल्हार को देखा।
उसने अपनी मुट्ठी की रेत पोटली में वापस डाल दी। फिर बहुत धीमे, किसी ऐसे आदमी की चाल से जिसने कोई बड़ा फ़ैसला कर लिया हो, वह मल्हार के पास गया। उसकी जेब से एक छोटी, मटमैली, मुड़ी हुई चीज़ बाहर आई।
वह एक टोपी थी। जगत की भीगी हुई टोपी, जो पंद्रह साल पहले ऊँट पर लौटी थी, जिसे भंवर ने बीस साल अपने सीने से लगाकर रखा था। टोपी अब भी गीली थी, उसके किनारों से पानी की बूँदें टपक रही थीं, और उसकी सिलाई के पास की जगह पर, जहाँ से पीतल की चाबी निकली थी, एक छोटा सा फटा हुआ छेद था।
"यह ले," भंवर ने कहा।
मल्हार ने हैरानी से टोपी को देखा। "यह तुम्हारे भाई की है।"
"हाँ। और इसमें जो पानी है, वह तुम्हारी नदी का है।" भंवर की आवाज़ भारी थी, पर उसमें अब कोई ग़ुस्सा नहीं था। "पंद्रह साल यह मेरे पास रही, और एक बूँद भी नहीं सूखी। पहले मैंने सोचा कि यह कोई जादू है। अब समझता हूँ कि यह उसकी निशानी थी। वह कहता था, 'भाई, पानी लौटाना होता है।'"
"वह यह कहता था?"
"जब हम छोटे थे। हम कुएँ से पानी भरते, तो वह हर बार थोड़ा सा वापस उँडेल देता। मैंने पूछा, क्यों। उसने कहा, 'कुआँ भी तो प्यासा होता है, भाई।'" भंवर के गाल पर एक आँसू लुढ़का और उसने उसे रोकने की कोशिश नहीं की। "मैं तुझे माफ़ नहीं करता। मैंने कहा था। पर मैं तेरे हाथ में अपने भाई की याद देता हूँ, क्योंकि जिस आदमी ने मेरे भाई की यह बात सच कर दिखाई, मैं उसे नदी के पास ख़ाली हाथ नहीं भेज सकता। यह उसे लौटा देना। कहना कि जगत का भाई उसकी ओर से अपना हिस्सा लौटा रहा है।"
मल्हार ने टोपी को दोनों हाथों में लिया। वह पानी से भारी थी, पर कुछ अजीब बात थी। वह गीली होते हुए भी उसकी हथेलियों को गीला नहीं कर रही थी। वह जैसे किसी जीवित चीज़ की त्वचा हो, जो पानी को बाहर नहीं रिसने देती, बस अपने भीतर रखती है।
"मैं इसे सँभालकर ले जाऊँगा," उसने कहा।
"सँभालकर ले जाने की ज़रूरत नहीं है," भंवर ने कहा। "बस पहुँचा देना।"
उसी वक़्त पूरे कक्ष में एक भारी, गहरी थरथराहट दौड़ी।
लोहे का द्वार, जो बंद पड़ा था, अपनी जगह पर काँपने लगा। उसकी सतह की सातों नीली रेखाएँ एक साथ चमकीं, और दरार, जो पूरी तरह भिंच चुकी थी, धीरे-धीरे फिर से उभरने लगी, बाल जितनी पतली, फिर उँगली जितनी, फिर हथेली जितनी। उसके भीतर से अँधेरा नहीं आ रहा था। एक बहुत धुँधली, गर्म, सुनहरी रोशनी आ रही थी, किसी सुबह की पहली किरण जैसी।
"द्वार खुल रहा है," शरर ने कहा। उसकी आवाज़ में अविश्वास था। "चाँद क्षितिज को छू चुका होगा। पर यह वह नहीं है।"
"क्या मतलब?" हकीम ने उठते हुए पूछा।
"यह चाँद की वजह से नहीं खुल रहा। द्वार को किसी ने भीतर से खोला है।"
सबके चेहरे एक साथ मल्हार की ओर घूमे।
मल्हार वहीं खड़ा था, टोपी हाथ में थामे, और उसकी आँखें द्वार के भीतर की सुनहरी रोशनी पर जमी थीं। उसके होंठ काँप रहे थे, और उसके चेहरे पर वह भाव उतर आया था जो बहुत लंबे समय के बाद घर लौटने से ठीक पहले आता है, जब आप दरवाज़ा देखते हैं और समझ नहीं पाते कि हँसें या रोएँ।
विक्रम ने कबीर को सहारा देकर पास के पत्थर पर बिठाया और ख़ुद उठकर मल्हार के पास आए। उन्होंने उसका कंधा थामा।
"जाओ," उन्होंने कहा।
"और अगर वह मुझे वापस न आने दे?"
"तो तुम अपनी बहन के पास रहोगे।" विक्रम मुस्कुराए, और उस मुस्कान में बाईस साल की थकान और एक पुराने दोस्त की गर्मजोशी दोनों थीं। "तुम्हारी चाय अभी भी उधार है, मल्हार। मैं इंतज़ार करूँगा।"
"तुम सबको छोड़कर..."
"हम तुम्हें छोड़ नहीं रहे हैं। तुम घर जा रहे हो।"
मल्हार ने गला साफ़ किया और बहुत धीमे से कहा, "तुम बहुत बुरे आदमी नहीं हो, विक्रम।"
"और तुम," विक्रम ने कहा, "कभी उतने बुरे नहीं थे।"
उसकी आँखें भर आईं। उसने सिर हिलाया, एक बार, गहरा, और फिर सीधा द्वार की ओर मुड़ गया।
प्रेतों की क़तार बिना किसी इशारे के दो हिस्सों में बँट गई। हज़ारों सूखे घुटनों के बीच से एक संकरा रास्ता बना, और उसके दोनों ओर सिर झुकाए, हाथ जोड़े, हज़ारों चेहरे एक साथ मल्हार को जाते देख रहे थे। वह उनके बीच से गुज़रा, पानी की सतह पर, और जहाँ-जहाँ उसके पैर पड़े, सतह पर कोई लहर नहीं उठी।
द्वार तक पहुँचकर वह रुका। उसने मुड़कर आख़िरी बार देखा।
विजय हाथ हिला रहा था। शरर सिर झुकाए खड़ा था। भंवर ने मुट्ठी भींचकर सीने से लगाई। हकीम ने ज़ैनब को गोद में उठाए सिर हिलाया। कबीर आधी खुली आँखों से देख रहा था। और विक्रम, अपनी जगह पर सीधे खड़े, एक हाथ उठाकर बिल्कुल वैसे ही अलविदा कह रहे थे जैसे सर्वे पर जाते वक़्त छत पर खड़ी बेटी को कहा करते थे।
मल्हार ने सुनहरी रोशनी की ओर क़दम बढ़ाया, और उसके भीतर अदृश्य हो गया।
उसके पैर सूखी मिट्टी पर पड़े और मिट्टी ने उसे पहचान लिया।
यह कोई जादू नहीं था। बस वह जान गया था, जैसे कोई कुत्ता बरसों बाद अपने पुराने घर की देहरी पहचान लेता है। यह ज़मीन उसके पैरों की भाषा जानती थी। यह वही बिस्तर था जिस पर कभी उसकी नाव खड़ी रहती थी, और जिस पर आज भी, इतनी दूर, काली लकड़ी की वह पुरानी नाव उसी जगह धँसी हुई खड़ी थी।
ऊपर की उलटी नदी में रोशनी लौट आई थी। उसकी लहरें अब थोड़ी तेज़ थीं, और मल्हार को लगा कि वे उसके स्वागत में हिल रही हैं।
उसने दो क़दम बढ़ाए, फिर रुक गया।
बहुत दूर, नाव के पास, एक छोटी सी आकृति खड़ी थी। दो चोटियाँ, घिसा हुआ कुर्ता, नंगे पैर। उसके पास एक और आकृति थी, जिसे उसने आज के दिन के बाद कभी न देखने की उम्मीद छोड़ दी थी: मीरा, जिसके बाल बिखरे थे और जिसकी आँखों में सब कुछ था, डर, उम्मीद, और एक बहुत बड़ा, बहुत गहरा विश्वास।
और उन दोनों के बीच, ज़मीन के ऊपर, एक विशाल, लेटी हुई औरत की आकृति थी, मिट्टी की बनी, मीलों लंबी, जिसकी दो सूखी आँखें उसकी ओर घूम रही थीं।
मल्हार के घुटने मुड़ गए।
वह गिरा नहीं। वह धीरे-धीरे बैठा, पूरी तरह, सूखी ज़मीन पर, और सिर झुकाकर वैसे ही रहा जैसे कोई बच्चा अपनी माँ के सामने बैठता है जब उसे डर हो कि माँ ने उसे माफ़ नहीं किया।
"मल्हार," नदी ने कहा।
"माँ।"
वह पहली बार था जब उसने तीन हज़ार साल में उसे यह शब्द कहा था। कहा नहीं था, पुकारा नहीं था। बस उसके होंठों से फिसल गया, जैसे साँस निकलती है।
बिस्तर की सारी दरारें एक साथ काँपीं, और नदी की आँखों के सूखे कुओं की तली में, पहली बार, बहुत पतली, बहुत चमकदार, पानी की एक रेखा उभरी।
तभी एक नन्ही आवाज़ ने पूरे बिस्तर की ख़ामोशी को चीर दिया।
"भैया!"
जमुना मीरा के हाथ से छूटकर दौड़ पड़ी। उसके नंगे पैर सूखी मिट्टी पर पड़ रहे थे, और हर क़दम पर बिस्तर की दरार के भीतर छिपी एक नन्ही चीज़ चमक रही थी, जैसे हर खिलौना, हर चूड़ी, हर कटोरा उसके साथ दौड़ रहा हो।
- Writer
- firoj saifi
- Story
- रेत का क़ैदी
- Chapter
- 25 of 30
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 15 min
- Words
- 2983
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
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