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एपिसोड 26: नाम

firoj saifi · Jinn & Spirits · 14 मिनट

जमुना उसके सीने से टकराई तो मल्हार की साँस रुक गई।

वह इतनी हल्की थी कि उसे लगा जैसे हवा का एक झोंका उसकी बाँहों में समा गया हो। पर उसकी पकड़ असली थी। दो नन्ही बाँहें उसकी गर्दन के चारों ओर कसकर लिपट गई थीं, और उसके गर्म गाल उसके खुरदरे चेहरे से सटे हुए थे। वह उसे अपनी हथेलियों में भर नहीं पा रहा था। उसने बस बाँहें फैलाकर उसे अपने भीतर समेट लिया, बहुत धीरे, जैसे कोई बहुत नाज़ुक चीज़ को उठाता है जो अभी-अभी जोड़ी गई हो।

"जमुना," उसने कहा। उसके मुँह से बस वही निकला, एक बार, फिर दोबारा, फिर तिबारा, जैसे उस नाम को दोहराते रहने के अलावा उसे कोई शब्द सूझ ही न रहा हो।

"भैया, तुम बहुत देर से आए।"
"मुझे पता है।"

"मैं गिनती भूल गई। दस के बाद मुझे नहीं आती।" वह उसके कंधे में मुँह छिपाए बोल रही थी, और उसकी आवाज़ भीगी हुई थी। "माँ कहती है कि बहुत साल हो गए। पर मैं तो रोज़ सुबह तुम्हारा इंतज़ार करती थी।"
"मैं आया हूँ।"
"तुम्हारी दाढ़ी बढ़ गई है।"

मल्हार हँस पड़ा, और उस हँसी में आँसू साफ़ सुनाई दे रहे थे। "हाँ।"
"और तुम बहुत थके हुए लगते हो।"
"हाँ, चिड़िया।"

"माँ ने कहा था कि तुम थके हो।" जमुना ने सिर उठाकर उसकी आँखों में देखा, और उसके नन्हे चेहरे पर एक बहुत पुरानी, बहुत गंभीर बात थी। "मैंने कहा था कि तुम्हें मत डाँटना। माँ ने नहीं डाँटा न?"

मल्हार ने बहन के चेहरे को देखा, उन गोल, गहरी आँखों को जो उसके माथे के उस पुराने निशान को ढूँढ रही थीं, और उसके भीतर तीन हज़ार साल की सारी दीवारें एक साथ गिर गईं।

"नहीं," उसने कहा। "माँ ने कभी नहीं डाँटा।"

"तो फिर तुम रो क्यों रहे हो?"
"मैं ख़ुश हूँ।"
"ख़ुश होने पर लोग हँसते हैं, भैया।"
"मैं दोनों कर रहा हूँ।"

जमुना खिलखिलाकर हँस पड़ी। वह पहली बार था जब तीन हज़ार साल पुरानी इस ख़ामोशी में किसी बच्ची की हँसी गूँजी थी। ऊपर की उलटी नदी में लहरें ज़ोर से उठीं, और बिस्तर की हर दरार से एक हल्की, गर्म, नमी भरी हवा उठकर उन दोनों के चारों ओर घूमने लगी।

मीरा दूर खड़ी देख रही थी। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे और उसने उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की। उसने अपने भीतर की धुन को थामे रखा था, पर अब उसे लगा कि उसकी ज़रूरत नहीं है। इस पल में किसी का नाम खो नहीं सकता था।
"मल्हार," नदी ने कहा।

इस बार उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, और उसमें वह कठोरता नहीं थी जो मीरा ने कुछ देर पहले सुनी थी। मल्हार ने जमुना को गोद में उठाए हुए सिर घुमाया।

"तुम क्यों आए? मैंने तुम्हें नहीं बुलाया था।"
"आपने द्वार खोला, माँ।"

"मैं..." नदी रुकी। उसके चेहरे की दरारों में हल्की सी हरकत हुई, जैसे कोई थका हुआ आदमी मुस्कुराने की कोशिश कर रहा हो। "हाँ। मैंने खोला। मैं रोक नहीं पाई।"

"आपने क्यों रोका था?"

"मैं तुम्हें बचाना चाहती थी।"
"किससे?"

"मुझसे।"
मल्हार ने बहन को ज़मीन पर उतारा, उसके सिर पर हाथ फेरा, और फिर सीधा खड़ा हुआ। वह नदी के विशाल चेहरे की ओर बढ़ा, जिसकी सूखी आँखें उसे देख रही थीं, और उसके सामने आकर रुक गया। उसने वह भीगी टोपी हाथ में थामी हुई थी।

"माँ," उसने कहा। "मैं आपको कुछ बताने आया हूँ। जो सब मैंने इतने साल में नहीं कहा।"
"बोलो।"

"मैंने ग़लती की," उसने कहा, और उसकी आवाज़ किसी बच्चे की तरह सीधी थी, जो अपना गुनाह मान रहा हो। "मैंने गुरु को मारा। मैंने तीन हज़ार साल लोगों को धोखा दिया। मैंने जगत को मार दिया, भले ही अनजाने में। मैं आपके नाम पर यह सब करता रहा, और आपने मुझे कभी नहीं रोका, क्योंकि आप बोल नहीं सकती थीं। पर मैं जानता हूँ कि आप चाहतीं तो रोक सकती थीं। आपने मुझे रोका नहीं क्योंकि आप डरती थीं कि मैं भी चला जाऊँगा।"

नदी ने कुछ नहीं कहा।
"मैं कहीं नहीं जाऊँगा, माँ।"
"मल्हार..."

"मैं यहीं हूँ।" वह घुटनों के बल बैठा, और भीगी टोपी को नदी के सूखे हाथ पर रख दिया, जो उसके सामने फैला पड़ा था। "यह जगत की टोपी है। आपके पानी की। उसके भाई ने लौटाई है।"

टोपी नदी की उँगलियों की दरारों में रखी गई, और उसमें से पानी की एक धार बहने लगी, बहुत पतली, बहुत साफ़। वह मिट्टी पर गिरी, और जहाँ गिरी वहाँ ज़मीन तुरंत गहरे भूरे रंग की हो गई, मुलायम, सजीव, जैसे किसी ने उस जगह को छूकर जगा दिया हो। वह धार आगे बढ़ी, दरारों में उतरी, और एक-एक करके उसके पास की सारी सूखी चीज़ें, गौरी की चूड़ी, रामदेव का लोटा, बच्चे का खिलौना, ज़रा सी नम हो गईं।

"यह... यह मेरा..."
"यह आपका है, माँ।"

नदी की आँखों के कुओं में पानी की रेखा ऊपर उठी, और एक बूँद, बहुत धीरे, उसकी पलक के किनारे से निकली और सूखी ज़मीन पर गिरी। उसके गिरते ही बिस्तर की एक दरार, बस एक, हल्की हरी हो गई। उसमें से घास की एक नन्ही सी कोंपल बाहर झाँकने लगी।

मीरा ने साँस रोक ली।

"माँ," जमुना ने कहा। वह अपने भाई के पास आकर खड़ी हो गई, उसकी कमीज़ का किनारा पकड़कर। "अब गाऊँ?"
नदी कुछ पल चुप रही। उसकी दरारें हल्के-हल्के काँप रही थीं, और उनके भीतर से एक बहुत धीमी, गहरी साँस निकल रही थी, जो किसी बहुत बड़ी चीज़ के हार मानने की नहीं, बल्कि खुलने की थी।

"गाओ, मेरी चिड़िया," उसने कहा।
"पूरा?"
"पूरा।"

जमुना ने ख़ुशी से मीरा की ओर देखा। "दीदी, आपको पता है न? आपको भी गाना है। भैया के पास कोई सुर नहीं है। वह बस हिम्मत देगा। शब्द आप देंगी, और सातवाँ स्वर मैं।"

मीरा ने सिर हिलाया। उसके हाथ काँप रहे थे। वह नदी की विशाल आकृति के सामने खड़ी थी, जिसकी मिट्टी की देह बिस्तर में मिल चुकी थी, और जिसके चेहरे पर हज़ार साल की थकान के पीछे वह सबसे पुरानी चीज़ झलक रही थी: उम्मीद।

उसने साँस ली, और पहली बार अपने गले की भीतरी धुन को बाहर आने दिया।
"सो जा रे सो जा, नदिया किनारे नाव,"

उसकी आवाज़ पहले काँपी। फिर उसने उसे थामा। उसे लगा कि दूर कहीं, लोहे की दीवार के उस पार, कबीर की आवाज़ उसके साथ जुड़ रही है, वही छह स्वर, उसी ताल में, दो अलग जगहों से एक साथ उठते हुए।

"चुपके-चुपके चंदा उतरे, धीमे-धीमे पाँव।"

मल्हार ने उसके पीछे गुनगुनाना शुरू किया। उसकी आवाज़ भारी, पुरानी, खुरदरी थी, उस आदमी की जिसने तीन हज़ार साल किसी को लोरी नहीं सुनाई। पर वह धुन उसकी हड्डियों में थी। उसे इसे सीखने की ज़रूरत नहीं थी। वह उसकी बहन की सबसे प्रिय धुन थी, जो वह उसे हर रात सुनाता था, जब वह छोटी थी और रात में डर जाती थी।

"हूँ-हूँ, हूँ-हूँ-हूँ... हूँ-हूँ..."

जमुना ने आँखें बंद कर लीं। उसके होंठ हल्के-हल्के हिल रहे थे।
"सो जा, कल फिर लौटेगी वह, लेकर ठंडी छाँव।"
उसी पल बिस्तर की ज़मीन गाने लगी।

मीरा को पहले लगा कि यह भ्रम है। पर नहीं। हर दरार के भीतर से, हर टूटी हुई परत के नीचे से, एक बहुत धीमी, बहुत गहरी गुनगुनाहट उठ रही थी। हज़ारों आवाज़ें, मर्दों, औरतों, बच्चों की, जिनकी साँसें इस ज़मीन में सोई पड़ी थीं। वे सब उसी धुन में जाग रहे थे, एक के बाद एक, छह स्वरों में, एक नाम को थामे हुए जो उनकी ज़ुबान से बहुत पहले छिन गया था।

ऊपर की उलटी नदी तेज़ बहने लगी।

उसकी लहरें अब सिर्फ़ चलती नहीं थीं, वे नाच रही थीं। हर लहर के ऊपर रोशनी की एक पतली किरण उठती, एक सुर पर, और नीचे गिरती, दूसरे सुर पर। पानी में नावें दिखने लगीं, एक नहीं, सैकड़ों, पाल खोले हुए, केवट अपनी पतवारों पर झुके, किनारे पर औरतें और बच्चे हाथ हिलाते। वह पूरी दुनिया जो बहुत पहले मर चुकी थी, एक पल के लिए अपने पूरे रंग में लौट आई थी।

छह स्वर पूरे हुए।
और अब सब ख़ामोश हो गए।
मीरा ने जमुना की ओर देखा।

बच्ची अपनी जगह पर खड़ी थी, आँखें बंद, मुँह खुला हुआ, पर कोई आवाज़ नहीं निकल रही थी। उसके माथे पर बारीक पसीने की बूँदें उभर आई थीं, और उसके नन्हे हाथ मुट्ठी में भिंचे थे।

"जमुना?" मल्हार ने झुककर धीमे से कहा। "चिड़िया?"
"मैं... मैं नहीं निकाल पा रही, भैया।"

"क्यों?"
"गला बंद है।" जमुना की आँखों में आँसू आ गए। "माँ ने कहा था कि तुम आओगे तो मैं गा सकती हूँ। तुम आ गए। फिर भी..."
नदी की विशाल आँखों ने जमुना को देखा, और उनमें एक गहरी, लज्जित, अपराधी सी नरमी उभरी।

"यह मेरी वजह से है, चिड़िया," उसने कहा। "मैंने तुम्हारे गले पर ताला लगा रखा था। तीन हज़ार साल से। मैं उसे खोल रही हूँ।"
पर कुछ नहीं हुआ। जमुना ने मुँह खोला, और सिर्फ़ हवा निकली।

मीरा के भीतर कोई ठंडी चीज़ उतर गई। उसने पूरी ताक़त से सोचा। पापा की बात, पन्नी की पंक्तियाँ, नाम की बनावट। तीन कंठ मिलकर गाएँ। एक वह जो राजा के घाट का हो। एक वह जो केवट के घाट का हो। और एक वह जो उसके साथ जाए।
राजा के घाट की वह थी। केवट के घाट का मल्हार, या शायद वह भी। और तीसरा, जो उसके साथ जाए...

"भैया," जमुना ने कहा। "मैंने हमेशा तुम्हारे साथ गाया है। पहले तुम, फिर मैं। तुम बिना शुरू किए मैं कैसे गाऊँ?"
मल्हार की साँस रुक गई। "मुझे शुरू करना है?"

"तुम हमेशा पहले गाते थे। 'माँ, जागो।' और मैं जवाब देती थी। तुमने आज तक वह पुकार नहीं की।"
मल्हार ने नदी की ओर देखा। उसके चेहरे पर एक गहरा, पुराना, कच्चा डर उतर आया।

"मैंने बहुत सालों से नहीं गाया।"
"गाओ, भैया।"

"अगर आवाज़ न निकली तो?"
"तो मैं निकालूँगी," जमुना ने कहा, और उसका नन्हा हाथ उसके खुरदरे हाथ में आ गया। "मैं हमेशा तुम्हारे साथ थी।"

मल्हार ने आँखें बंद कीं। उसके कंधे ढीले पड़े। उसने तीन हज़ार साल की सारी थकान को एक गहरी साँस में भीतर खींचा, और फिर उसे बहुत धीरे, बहुत सँभालकर, बाहर छोड़ा।
और उसके गले से एक आवाज़ निकली।

बहुत धीमी, बहुत टूटी हुई, पर साफ़। वह कोई गीत नहीं था। वह एक सादा पुकार थी, जिसे हर केवट सुबह-सुबह घाट पर खड़े होकर अपनी नदी को देता है, जैसे कोई बच्चा सोती माँ का माथा चूमकर उसे जगाए।
"माँ... जागो..."

बिस्तर थरथराया।
ऊपर की उलटी नदी में एक विशाल लहर उठी और फिर थम गई, जैसे साँस रोके खड़ी हो।

जमुना ने आँखें खोलीं, और उसके नन्हे होंठ खुले।
जो स्वर निकला, वह किसी को सुनकर भूल नहीं सकता था।

वह शब्द नहीं था। वह एक ऊँची, साफ़, खुली तान थी, किसी बहुत छोटी चिड़िया की, जो सुबह की पहली किरण के साथ उठती है और अपनी माँ को बुलाती है। उसमें कोई माँग नहीं थी, कोई चालाकी नहीं। बस पुकार, कच्ची, मासूम, सीधी। वही स्वर जिसे हर बच्चा पैदा होते ही सीख जाता है, और जिसे बड़े होकर भूल जाता है।

वह तान बिस्तर के हर कोने में गूँजी, और ऊपर की उलटी नदी से टकराई और लौट आई।
और उसी पल, मीरा को लगा कि उसके भीतर कुछ घट रहा है।

सात स्वर एक साथ हवा में ठहर गए। छह लोरी के, एक पुकार का। और वे अलग-अलग नहीं रहे। वे मिल गए, एक में घुल गए, बिना किसी जोड़ के, जैसे सात धाराएँ एक नदी में मिलती हैं।
वह एक नाम बन गया।

वह कोई शब्द नहीं था, जिसे लिखा जा सके, या ज़ुबान पर रखा जा सके। वह बहता हुआ, उठता-गिरता, सात रंगों वाला एक स्वर था, जिसके हर हिस्से में एक पूरा अर्थ बैठा था। मीरा ने उसे सुना और अपने भीतर समझ लिया, बिना किसी भाषा के: बहना। उठाना। सुलाना। जगाना। लौटाना। माफ़ करना। पुकारना।
वह जो सबको अपनी गोद में उठाती है।
नदी का नाम।

बिस्तर की सारी दरारें एक साथ चटखकर खुल गईं, पर इस बार उनमें से अँधेरा नहीं आया। उनमें से पानी उठा। पहले नमी, फिर बूँदें, फिर पतली, चमकती धाराएँ, जो एक-दूसरे में मिलती हुई आगे बढ़ रही थीं। नदी की विशाल, लेटी हुई देह की सूखी परतें गलने लगीं, मिट्टी पानी बन रही थी, और जहाँ कभी आँखों के कुएँ थे, वहाँ अब दो गहरी, शांत, साफ़ झीलें खुल रही थीं, जिनमें ऊपर की उलटी नदी का पूरा आसमान परावर्तित हो रहा था।
"मेरा नाम..." नदी ने कहा।

उसकी आवाज़ बदल चुकी थी। उसमें अब सूखापन नहीं था, कोई दरार नहीं थी। वह एक भरी हुई, गहरी, गर्म आवाज़ थी, जिसमें पूरे देश की सुबहें बसी हुई थीं।

"मेरा नाम। मुझे याद आ गया।"
वह रो रही थी, और उसके आँसू नदी बनकर बह रहे थे।
पहले-पहले किसी को समझ नहीं आया कि क्या हो रहा है।

बिस्तर का पानी तेज़ी से ऊपर उठ रहा था। घुटनों तक, फिर कमर तक, पर वह ठंडा नहीं था। वह उस पुरानी बारिश की महक वाला, गर्म, जीवित पानी था, जो शरीर को छूता तो लगता कि कोई बहुत बड़ी, बहुत कोमल माँ अपनी गोद में उठा रही है।

ऊपर की उलटी नदी में दरार पड़ी। एक लकीर उसकी सतह पर उभरी, फिर चौड़ी हुई, और अचानक पूरी की पूरी उलटी नदी नीचे उतरने लगी। तीन हज़ार साल की सारी रुकी हुई बारिश एक साथ गिर पड़ी, रोशनी की पर्दों जैसी, नीली, सुनहरी, हरी, और पूरे बिस्तर पर बरसने लगी।

मल्हार नाव की ओर दौड़ा। जमुना को गोद में उठाकर उसने उसे नाव के भीतर बिठाया, और ख़ुद पतवार थामी। पानी उसकी कमर तक आ चुका था, और नाव, जो तीन हज़ार साल से रेत में धँसी थी, अचानक हल्के से हिली।

वह उठी। धीरे-धीरे, एक बहुत पुराने ख़ुशी भरे चरमराने के साथ, काली लकड़ी की वह नाव पानी की सतह पर तैर गई।

"माँ!" जमुना ने नाव के किनारे से झुककर चिल्लाया। "माँ, देखो! नाव चल पड़ी!"
"मैं देख रही हूँ, मेरी चिड़िया।"

मल्हार ने पतवार थामी थी, और उसके चेहरे पर पहली बार वह भाव था जो मीरा ने नदी की याद में देखा था, धूप में पका, खुला, मुस्कुराता हुआ, वह मल्लाह जो हर सुबह अपनी नदी को नमस्कार करके नाव उतारता था। उसने बहन को देखा, और दोनों हँस पड़े, एक साथ, एक ही हँसी में।

मीरा पानी में खड़ी थी, उसकी आँखों में बारिश और आँसू मिल गए थे। उसने पिता को याद किया, कबीर को, भंवर को, हकीम को। उसके चेहरे पर एक अजीब सी राहत थी। हो गया, उसने सोचा। हमने कर दिखाया।

और तभी उसके पैरों के नीचे ज़मीन खिसकी।

वह पानी की सतह के नीचे धँस रही थी। उसके पैर घुटनों तक दलदल में उतर गए, फिर जाँघों तक। उसने हाथ बढ़ाकर कुछ पकड़ने की कोशिश की, पर पानी के नीचे की ज़मीन नरम, चिपचिपी, मुलायम थी, और हर कोशिश के साथ और गहराती जा रही थी।
"नहीं..." नदी की आवाज़ गूँजी। उसमें पहली बार घबराहट थी। "नहीं, यह मैं नहीं कर रही..."

"मैडम... मीरा!" शरर की आवाज़ कहीं बहुत दूर से आई, लोहे के द्वार के पार से, जैसे कोई चिल्ला रहा हो। मीरा ने नहीं देखा कि द्वार अब पूरा खुल चुका था, और उसके उस पार कक्ष में हज़ारों प्रेत उठ खड़े हुए थे, और विक्रम कबीर को पकड़े हुए दौड़कर आ रहे थे।

"दीदी!" जमुना नाव के किनारे से चिल्लाई। "आप भी गाई थीं! आपने गाया था!"
"हाँ," मीरा ने साँस लेते हुए कहा। उसके जबड़े भिंचे हुए थे। "हमने सबने गाया..."

उसके दिमाग़ में पन्नी की वह आख़िरी पंक्ति कौंध गई, जिसे उसने पढ़ा ज़रूर था पर पूरी तरह समझा नहीं था।
'जो उसके साथ गाएगा, वह उसके साथ रहेगा।'

मीरा की साँस रुक गई।

मल्हार ने नाव से कूदकर उसकी ओर हाथ बढ़ाया, पर पानी अब इतना ऊँचा था कि वह उस तक पहुँच नहीं पा रहा था। "मैं सँभालता हूँ!" वह चिल्लाया। "वह मेरी ज़िम्मेदारी है! मैं केवट हूँ! जो भी बँधा है, उसका बोझ मैं उठाऊँगा!"

"मल्हार, नहीं!" नदी की गर्जना पूरे बिस्तर में गूँजी। "तुम मुझे वह दोबारा नहीं करवाओगे! मैंने तुम्हें एक बार खोया है!"

और पीछे, लोहे के द्वार में, एक भयानक, भारी, घिसटती हुई आवाज़ आई। वह आठवें रक्षक की थकान से काँपते हुए एक हाथ की आवाज़ थी, जो कह रहा था कि दरवाज़ा अब ज़्यादा देर नहीं टिक पाएगा।

मीरा ने पीछे मुड़कर देखा।

उसके और द्वार के बीच, पानी का एक काला, घूमता हुआ पर्दा उठ चुका था, और उसके पार, बहुत दूर, कबीर के भागते हुए क़दमों की आहट थी, और विक्रम की चीख़ पुकारती हुई, "मीरा! मीरा, हाथ दे!"

Writer
firoj saifi
Story
रेत का क़ैदी
Chapter
26 of 30
Category
Jinn & Spirits
Reading time
14 min
Words
2705
Language
Hindi (हिंदी)
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