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एपिसोड 27: बाढ़

firoj saifi · Jinn & Spirits · 17 मिनट

मीरा की कमर तक कीचड़ आ चुका था, और वह ठंडा नहीं था।

यही सबसे अजीब बात थी। वह किसी दलदल की तरह घिन पैदा करने वाला नहीं था। वह गर्म था, नरम था, किसी जीवित शरीर की तरह धड़कता हुआ। उसकी पकड़ में ज़बरदस्ती नहीं थी। वह उस तरह थामता था जैसे कोई बहुत डरा हुआ बच्चा किसी का हाथ पकड़ लेता है और छोड़ना भूल जाता है। हर बार जब मीरा ने पैर निकालने की कोशिश की, कीचड़ ने धीरे से और कसकर पकड़ लिया, और हर कसाव के साथ उसके भीतर से एक बहुत धीमी, बहुत घबराई हुई आवाज़ उठी: "नहीं... नहीं... मैं नहीं... रुको..."

यह नदी की आवाज़ थी। वह चाहती नहीं थी कि मीरा धँसे। फिर भी धँस रही थी।

ऊपर से रोशनी के परदों जैसी बारिश गिर रही थी। उलटी नदी अब सीधी हो चुकी थी और तीन हज़ार साल की हर रुकी बूँद एक साथ बिस्तर पर बरस रही थी। पानी कमर से ऊपर उठकर सीने तक आ गया था। मीरा ने अपनी कलाई को देखा, और उसकी साँस थम गई।

चाँदी की वह धार, जो पूरे एक दिन से उसकी नब्ज़ पर बह रही थी, अब त्वचा पर नहीं थी। वह ऊपर उठकर हवा में तन गई थी, एक बहुत महीन, चमकती हुई डोर बनकर, और वह डोर पानी के ऊपर से सीधी नदी की ओर जा रही थी, जहाँ उसकी मिट्टी की देह गल-गलकर पानी बन रही थी और जिसकी झीलों जैसी आँखें घबराहट में फैली हुई थीं।

उसने नज़र घुमाई। एक नहीं, और भी डोरें थीं। मल्हार की छाती से निकलती हुई एक, जो बहन को पुकारते हुए नाव से कूदने के बाद उसके सीने में गड़ी हुई थी। जमुना की नन्ही कलाई से एक, जो नाव के किनारे से झुकी हुई थी। और द्वार के काले, घूमते पानी के परदे के पार, कहीं बहुत दूर से आती हुई तीन और, जो उसी परदे में धँसकर ग़ायब हो रही थीं।

छह डोरें। छह गायक। मीरा, मल्हार, जमुना, और परदे के पार कबीर, विक्रम और हकीम, जिन्होंने गुनगुनाया था।

तो यही है ताला, उसने सोचा। गुरु का आख़िरी ताला। गाने वाला बँध जाए।

"मीरा!"

मल्हार पानी में कूद पड़ा था। नाव अपनी जगह पर हिलती रही और जमुना किनारे से झुककर चिल्लाती रही, "भैया, मत जाओ!" पर वह नहीं रुका। छाती तक पानी को चीरता हुआ वह मीरा तक पहुँचा, और दोनों हाथों से उसकी बाँहें पकड़कर ऊपर की ओर खींचा।

कीचड़ ने उसे छोड़ा नहीं। उल्टे, जैसे ही मल्हार ने उसे छुआ, ज़मीन ने दोनों को एक साथ थाम लिया। मल्हार के पैर घुटनों तक धँस गए।

"मल्हार, छोड़ो!" नदी की गर्जना कानों के पर्दे हिला गई। "हट जाओ! वापस नाव में जाओ!"

"नहीं!" मल्हार ने दाँत भींचकर कहा। "आपने कहा था कि मैं केवट हूँ। केवट डूबते को छोड़कर नहीं जाता।"

"मैं नहीं कर रही हूँ, मल्हार! मेरे हाथ मेरी बात नहीं मान रहे!" नदी की आवाज़ में कच्ची, नंगी घबराहट थी। "मैं पकड़ना नहीं चाहती, पर मैं पकड़ रही हूँ! मैं तीन हज़ार साल से यही करती आई हूँ, जो पास आता है उसे खींच लेती हूँ, मुझे रोकना नहीं आता!"

मीरा ने यह वाक्य सुना, और उसके भीतर कुछ हिला।

मैं पकड़ना नहीं चाहती, पर मैं पकड़ रही हूँ।

उसे तैराकी का अपना पहला पाठ याद आया। यूनिवर्सिटी के दिनों में एक बार वह जयपुर के पास एक झील में डूबते हुए एक लड़के को निकालने कूदी थी। वह लड़का इतनी घबराहट में था कि जो भी हाथ में आया, उसी से लिपट गया, और मीरा को भी नीचे खींचने लगा। तब उसके कोच ने उसे सिखाया था कि डूबता हुआ आदमी दुश्मन नहीं होता। वह बस डरा हुआ होता है, और डर में जो भी पकड़ में आए उसे साथ डुबो देता है। उसे बचाने का तरीक़ा उससे लड़ना नहीं है। उसे कुछ ऐसा पकड़ा देना है जो डूबता न हो।

"आप डूब रही हैं," मीरा ने कहा।

उसकी आवाज़ नदी की गर्जना के बीच भी साफ़ निकली, क्योंकि वह चीख़ी नहीं। उसने बहुत शांति से कहा, जैसे किसी बच्चे को रात में डर लगने पर समझाया जाता है।

"क्या?"

"आप डूब रही हैं। तीन हज़ार साल से आप अपने ही पानी में डूबी हैं, और अब जब आप सतह तक आ रही हैं तो डर के मारे जो भी सामने है, उसे पकड़ रही हैं। यह आपकी ग़लती नहीं है। यह हर डूबने वाले के साथ होता है।" उसने मल्हार की ओर देखा, जिसके कंधों तक कीचड़ चढ़ आया था। "इसलिए हमें आपको रोकना नहीं है। हमें आपको कुछ पकड़ाना है।"

उधर लोहे के द्वार के बाहर कक्ष में घड़ी टूट चुकी थी।

जिस पल मीरा की चीख़ और जमुना की पुकार भीतर से गूँजी, उसी पल काले, घूमते पानी का वह परदा, जो भीतर और बाहर के बीच खिंच गया था, द्वार की दहलीज़ पर उमड़ने लगा। उसमें से पानी बाहर आ रहा था, तेज़, गर्म, ऊपर की ओर उठता हुआ, और कक्ष का फ़र्श, जो अब तक सपाट काँच की तरह जमा हुआ था, उसकी चोट से टूटकर बिखर गया।

विक्रम ने कबीर की बाँह पकड़कर उसे अपने पीछे खींचा। "रुक, शेर। एक सेकंड।"

"पापा, दी अंदर है!"

"मुझे पता है।" विक्रम की आँखें द्वार पर टिकी थीं, और उनके चेहरे पर वह सख़्ती आ गई थी जो उन्होंने बाईस साल की नींद में कहीं सँभालकर रखी थी। "पर आँख मूँदकर नहीं कूदते। रुस्तम भाई, भंवर, तुम दोनों मेरे पीछे आओ। विजय, तू द्वार को पकड़कर रख। शरर, तू..."

"मैं आगे जाऊँगा," शरर ने कहा। उसके सीने के दोनों अंगारे इस पानी के सामने बहुत छोटे लग रहे थे, पर वह पीछे नहीं हटा। "मैं पहली लहर को चीर सकता हूँ।"

"तू बुझ जाएगा।"

"तो बुझ जाऊँगा। मैं पहले भी तीन हज़ार साल जला हूँ।"

कक्ष के बीच उसी समय कुछ और हो रहा था, जिसे इन सब में से सिर्फ़ विजय देख पा रहा था, क्योंकि वह पहली रानी के पास खड़ा था।

हज़ारों प्रेतों की क़तार, जो घुटनों के बल बैठी थी, एक-एक करके हल्की होती जा रही थी।

नाम गूँज चुका था। सात स्वर मिलकर एक हो गए थे, और उसकी गूँज अब भी हर प्रेत के सीने में थरथरा रही थी। पहले एक बूढ़े प्रेत के पैर ज़मीन से ऊपर उठे, फिर उसका पूरा शरीर हवा में तैरने लगा। उसकी सूखी, चटखी त्वचा की दरारों से भाप की पतली-पतली लकीरें निकलने लगीं, किसी सुबह की झील की सतह से उठती धुंध जैसी। वह लकीरें गाढ़ी होती गईं, उसका बदन पारदर्शी होता गया, और कुछ ही पल में वह पूरी तरह एक छोटा, सफ़ेद बादल बन गया, जो धीरे-धीरे ऊपर की ओर बहने लगा।

फिर दूसरा। फिर तीसरा। फिर क़तार की क़तार।

कक्ष में हज़ारों छोटे-छोटे बादल उठे, एक-दूसरे में मिलते हुए, चाँदी जैसी रोशनी में चमकते हुए, और ऊपर, पत्थर की छत की ओर, उस पतली सर्पिल सुरंग की ओर बढ़ने लगे जो कुएँ की चालीस सीढ़ियों से होकर सतह तक जाती थी। उनके पीछे कोई चीख़ नहीं थी, कोई रोना नहीं। हर बादल बहुत हल्के, लगभग मुस्कुराते हुए ऊपर उठ रहा था, जैसे बरसों से किसी ने कोई बोझ उतार दिया हो।

"बाबा के पास जाओ," उनमें से एक छोटे बादल ने जाते हुए विजय से कहा। वह किसी बच्चे की आवाज़ थी, जो शायद पाँच-छह साल का रहा होगा, बिना नाम के, बिना याद के। "तुम्हारे बाबा बहुत रोते थे।"

विजय का गला भर आया। "तुम्हें कैसे पता?"

"हम सब सुनते थे," बादल ने कहा और ऊपर बह गया।

विजय ने रानी चंद्रावती की ओर देखा। वह अब भी अपनी जगह पर बैठी थीं, पर उनके पैर भी ज़मीन से उठने लगे थे, और उनकी चूनर के किनारे भाप बन रहे थे। उन्होंने बेटे के सिर पर हाथ रखा।

“...जा... मैं... पीछे... आती हूँ...” रानी ने कहा। उनकी आवाज़ अब सूखी नहीं थी। उसमें नमी लौट रही थी, एक माँ की, जो बहुत देर बाद गला खोलकर बोल रही हो। “...पहले... तेरा... काम...”

"अम्मा, आप मुझे छोड़कर मत जाइए।"

“...नहीं... जाऊँगी... मैं... बरसूँगी... तेरे... ऊपर...”

विजय हँस पड़ा। रोते-रोते हँसा। "यह कोई वादा है, अम्मा?"

“...माँ... का... वादा... है...”

पानी का परदा द्वार से फूट पड़ा।

विक्रम, कबीर, हकीम और भंवर ने एक साथ एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया। शरर उनके आगे अंगारे की मशाल की तरह कूदा, और पानी में घुसते ही एक भयानक फुफकार उठी, भाप का एक पूरा गुबार, जिसमें उसकी आकृति कुछ पल को ग़ायब हो गई। पर उसकी रोशनी बुझी नहीं। वह पानी को चीरता हुआ आगे बढ़ा, और उसके पीछे एक सँकरा रास्ता बनता गया, जिसमें पानी भाप बनकर किनारों पर सिमटा हुआ था।

"चलो!" विक्रम ने चिल्लाकर कहा।

वे दौड़ पड़े। पानी कमर तक था, तेज़, खींचता हुआ। हर क़दम पर लगता था कि कोई उनके टखनों को पकड़कर नीचे खींच रहा है। हकीम ने ज़ैनब को अपने कंधे पर चढ़ाया, और ज़ैनब ने गुड़िया को कसकर पकड़ा और खिलखिलाकर कहा, "अब्बा, हम नाव में जा रहे हैं?" हकीम ने भर्राई आवाज़ में कहा, "हाँ, बेटी।"

द्वार की दहलीज़ पार करते ही उनके कान सुन्न हो गए। भीतर की दुनिया उनके सामने खुली: नदी का बिस्तर, बारिश की चादरें, पानी का समंदर, और उसके बीचोंबीच, सीने तक कीचड़ में धँसी हुई मीरा।

"दी!" कबीर की चीख़ पूरे बिस्तर में गूँज गई।

मीरा ने मुड़कर देखा। उसके चेहरे पर कीचड़ और पानी की धारियाँ थीं, पर उसकी आँखों में एक तेज़ चमक थी। "कबीर! पापा! पास मत आना, पहले सुनो!"

"क्या?"

"नदी डूब रही है! उसे कुछ पकड़ाना है, हमें नहीं! समझे? उसकी पकड़ से लड़ो मत!"

विक्रम उसकी बात एक क्षण में समझ गए। उनके चेहरे पर बाईस साल की सारी बुद्धि कौंध गई, एक पुराने शिक्षक की, जिसकी बेटी ने कोई ऐसी बात कही हो जो उसे ख़ुद नहीं सूझी थी। "रस्सी!" उन्होंने चिल्लाया। "भंवर! तेरे पास रस्सी है?"

भंवर ने कमर से बँधी उस पुरानी रस्सी को उतारा, जिसे वे सब पिछले चार दिन से अपनी कमर पर बाँधकर चल रहे थे, और जो अब तक पानी में भीगकर कई गुना भारी हो चुकी थी। "यह रही!"

"इसे नाव से बाँध। फिर नाव को नदी के सीने के पास ले जा!"

"नदी के सीने के पास?"

"हाँ! उसे दिखाना है कि उसके पास कुछ ऐसा है जो उसे डुबोता नहीं, बल्कि उठाता है! नाव!"

नाव धीरे-धीरे उनकी ओर आ रही थी।

जमुना किनारे पर खड़ी होकर एक छोटी पतवार से पानी को धकेल रही थी। वह पतवार उसके हाथ से बड़ी थी, पर उसके नन्हे हाथों की पकड़ में कोई डर नहीं था। उसके पीछे मल्हार ने मीरा को छोड़कर नाव की ओर पलटने की कोशिश की, और कीचड़ ने उसे और कसकर थामा।

"भैया!" जमुना की आवाज़ ऊँची हुई। "रस्सी पकड़ो!"

भंवर ने रस्सी का एक सिरा हवा में उछाला। रस्सी साँप की तरह लहराती हुई नाव के किनारे से टकराई, और जमुना ने उसे दोनों हाथों से पकड़कर कसकर नाव की रेलिंग से बाँध दिया। फिर उसने मल्हार की ओर रस्सी का दूसरा सिरा फेंका, जो भंवर के हाथ में था।

"खींचो!" विक्रम ने आदेश दिया।

भंवर, कबीर, हकीम और विक्रम ने एक साथ रस्सी पकड़ी। चारों ने ज़ोर लगाया। नाव आगे सरकी, और कीचड़ की पकड़ ढीली पड़ने लगी। पर उसी पल मीरा को महसूस हुआ कि नीचे की ज़मीन कुछ और ही कर रही है।

कीचड़ ने उन्हें छोड़ा नहीं, उसने रस्सी को पकड़ लिया।

वह मीरा की कमर से सरककर रस्सी की ओर बढ़ा, उसके चारों ओर लिपट गया, और रस्सी पर चढ़ने लगा, हाथ-दर-हाथ, चारों आदमियों की ओर। रस्सी तनकर थरथराई। भंवर की कलाइयाँ खिंच गईं, और उसके पैर पानी में फिसलने लगे।

"यह काम नहीं कर रहा!" कबीर चिल्लाया।

"रुको!" मीरा ने चीखकर कहा। "रुको, वह रस्सी को भी पकड़ रही है। हम उसे खींच रहे हैं, वह हमें खींच रही है। यह उसकी ग़लती नहीं है। उसे पकड़ाने का मतलब यह नहीं कि हम रस्सी खींचें। उसे ख़ुद पकड़ने दो!"

"मतलब?"

"रस्सी छोड़ दो!"

"पागल हो गई है?" हकीम ने चिल्लाकर कहा।

पर विक्रम ने बिना एक पल सोचे रस्सी छोड़ दी। "सब छोड़ दो!" उन्होंने कहा। "मीरा जानती है!"

चारों ने एक साथ रस्सी छोड़ दी।

रस्सी पानी में गिर पड़ी, और कीचड़ उसे एक क्षण के लिए पूरी तरह निगलने को बढ़ा। पर तभी नाव, जिसके किनारे से रस्सी बँधी थी, धीरे से आगे बह गई, और रस्सी का दूसरा सिरा, जो कीचड़ में उलझा था, ख़ुद-ब-ख़ुद खिंचकर ऊपर आया। कीचड़ ने उसे पकड़ा, और पकड़कर पाया कि वह कुछ पकड़ रहा है जो उसके साथ-साथ बह रहा है। वह खींच नहीं रहा था, वह खिंच रहा था।

और जिस वज़न से उसने रस्सी को थामा था, उसी वज़न से अब नाव ने उसे थाम लिया। पहली बार नदी की पकड़ किसी डूबने वाली की पकड़ नहीं थी। वह किसी तैरने वाली की पकड़ थी, जिसे किसी ने तिनका दिया हो।

मीरा की कमर पर से कीचड़ की गर्मी ढीली पड़ी। उसके पैर धीरे-धीरे ऊपर उठे। मल्हार उसे थामे रहा, और जब उनके पैर ज़मीन से छूटे, तो दोनों एक साथ पानी में तैरते हुए नाव की ओर बह गए।

"यह... यह तो..." नदी की आवाज़ कंपकंपा रही थी। उसकी झीलों जैसी आँखें नाव पर टिकी थीं, जिसके किनारे से रस्सी बंधी थी और उस रस्सी का एक सिरा उसकी अपनी उँगलियों में था। "मैं पकड़ रही हूँ, पर कोई नहीं डूब रहा।"

"क्योंकि आप डूब नहीं रही हैं," मीरा ने नाव के किनारे पर चढ़ते हुए कहा। उसकी साँस उखड़ी हुई थी, और वह नाव की तली में घुटनों के बल गिर पड़ी, पर उसकी आवाज़ टूटी नहीं। "आपके पास अब नाम है, माँ। आपके पास केवट है। आपके पास यह नाव है। डूबने वाला तब तक डूबता है जब तक उसके पास कुछ नहीं होता। अब आपके पास सब कुछ है।"

"पर मैं... मैं तुम सबको..."

"आप हमें बाँध नहीं रहीं। आप हमें थाम रही हैं।" मीरा ने नाव की रस्सी को छुआ, जिसकी दूसरी ओर उसकी कलाई की चाँदी की डोर बँधी थी। "यह वह रस्सी है जो नाव को किनारे से बाँधती है। गुरु ने इसे जंजीर समझकर बनाया था, पर मल्हार ने इसे लोरी में छिपाकर रखा। जो आपके साथ गाए, वह आपके साथ रहे। साथ रहने का मतलब क़ैद नहीं होता, माँ। साथ रहने का मतलब किनारा होना होता है।"

नदी की आँखों में बहती झीलें एक क्षण के लिए बिल्कुल स्थिर हो गईं।

"किनारा..."

"हर नदी को किनारे चाहिए। बिना किनारे के नदी बाढ़ है। आपको तीन हज़ार साल किनारा नहीं मिला, इसलिए आप प्यास बन गईं। आज आपके पास छह किनारे हैं।"

नदी चुप रही। पर उसके चेहरे की सारी लकीरें, जो अब तक घबराहट से तनी हुई थीं, पहली बार ढीली पड़ीं।

पानी तेज़ी से ऊपर उठ रहा था।

नदी की देह पूरी तरह पानी में गल चुकी थी। उसके विशाल, लेटे हुए रूप का कुछ भी बाक़ी नहीं था। अब वह बस एक विशाल जल-राशि थी, जो बिस्तर पर चारों ओर फैली हुई थी, और नाव उसकी सतह पर तैर रही थी। नाव के भीतर मीरा, मल्हार, जमुना बैठे थे, और अब उसमें विक्रम, कबीर, हकीम, ज़ैनब, भंवर, विजय और शरर की चिंगारी भी चढ़ आई थी। इतनी लंबी नाव सबको ढो सकती थी।

"हम जा कहाँ रहे हैं?" कबीर ने नाव की रेलिंग पकड़कर पूछा। वह पानी के इतने पास बैठकर काँप रहा था, पर उसकी आँखें खुली थीं।

"ऊपर," मल्हार ने पतवार पकड़ी थी, और उसके कंधे तनी हुई मांसपेशियों से भरे थे। "पानी ऊपर जा रहा है। और हम उसके साथ जाएँगे।"

द्वार की ओर नाव मुड़ी, और जैसे ही उसकी नाक काले परदे को छूई, पानी ने उन्हें एक झटके से कक्ष में उछाल दिया। कक्ष का पानी, जो अब तक कमर तक था, छत तक पहुँचने को था। प्रेतों के जाने के बाद ख़ाली हुई जगह में पानी ऊँचे-ऊँचे चक्कर काट रहा था, और बीच से कुएँ की सर्पिल सुरंग का मुँह खुला दिख रहा था, चालीस सीढ़ियों की वह घुमावदार सुरंग जिससे वे नीचे उतरे थे।

अब वही सुरंग नाव को निगलने को तैयार थी।

"पकड़ लो!" भंवर ने चीखकर कहा।

पानी का एक विशाल स्तंभ सुरंग से ऊपर उठा, और नाव उसके साथ घूमती हुई ऊपर चढ़ने लगी। जैसे कोई विशाल पेंचदार सीढ़ी उन्हें सतह की ओर उठा रही हो। दीवारों पर वही पुराने अक्षर दौड़ रहे थे, आलों में रखे सूखे दीये एक-एक करके भड़ककर जलते जा रहे थे, और कबीर ने महसूस किया कि उसका सिर घूम रहा है।

उनके चारों ओर बादल थे।

वे हज़ारों प्रेत, जो अब नन्हे, सफ़ेद, गर्म बादलों में बदल चुके थे, उसी सुरंग में ऊपर की ओर उठ रहे थे। नाव उनके बीच से गुज़र रही थी, और हर बादल जाते-जाते उसे छू लेता। मीरा के गाल पर एक नन्ही, गर्म बूँद ने चुंबन जैसा स्पर्श किया। विक्रम के कंधे पर एक सूखी हँसी की गूँज रुकी। ज़ैनब ने हाथ बढ़ाकर एक बादल को पकड़ना चाहा, और बादल ने उसकी हथेली को हल्के से सहलाया और आगे उड़ गया।

"शुक्रिया..." हज़ारों बादलों में से हज़ारों आवाज़ें आईं, एक के बाद एक, बहुत धीमे, बहुत कृतज्ञ। "शुक्रिया... शुक्रिया..."

मीरा की मुट्ठी भिंच गई। उसे याद आया कि हकीम ने उसे आगाह किया था कि जिन्न के यहाँ शुक्रिया एक क़र्ज़ की रसीद है। पर यह शुक्रिया किसी क़र्ज़ का नहीं था। यह उन लोगों का था जिन्हें तीन हज़ार साल बाद पहली बार किसी ने नाम से पुकारा था।

सतह तक का रास्ता कितना लंबा था, किसी को याद नहीं रहा।

नाव ऊपर उठती गई, और हर चक्कर के साथ पानी तेज़ होता गया। मीरा के कानों में सिर्फ़ एक ही आवाज़ थी, बाढ़ की भारी, गरजती, घूमती हुई गर्जना। पर उस गर्जना के नीचे कहीं, बहुत धीमे, वही लोरी गूँज रही थी। नदी ख़ुद गा रही थी। अपना नाम, अपनी लोरी, पहली बार तीन हज़ार साल में अपनी ही आवाज़ में।

और फिर ऊपर से रोशनी दिखी।

पहले एक धुँधला, भूरा-सुनहरा धब्बा, जैसे गहरे कुएँ की तली से आसमान दिखता है। फिर वह चौड़ा होता गया, चमकता गया, और उसके किनारों पर नीला रंग उतरने लगा। मीरा की आँखें चौंधिया गईं।

"पकड़ो!" मल्हार चिल्लाया। "आख़िरी मोड़!"

नाव एक आख़िरी बार घूमी, और पानी का वह स्तंभ, जिसने उसे चालीस सीढ़ियाँ चढ़ाई थीं, उत्तर के कुएँ के मुहाने से किसी विशाल फ़व्वारे की तरह फट पड़ा।

पूरी नाव हवा में उछली।

मीरा ने आसमान देखा। पूरा, खुला, नीला-बैंगनी, जिस पर भोर की पहली लाली फैल रही थी। उसने पाँच दिन से खुला आसमान नहीं देखा था, और उसे लगा कि वह सीधा किसी बहुत बड़ी, गर्म हथेली में उछाली जा रही है। नाव कुएँ के ऊपर कुछ क्षण तैरती रही, हवा में रुकी हुई, और उसके चारों ओर पानी की बूँदें सुनहरी रोशनी में चमक रही थीं, हज़ारों, लाखों, जैसे पूरी रात की सारी रोशनी एक साथ बरस रही हो।

फिर नाव नीचे उतरी, और रेत पर एक भारी, गहरी छपाक के साथ गिरी।

रेत नहीं। पानी पर। उत्तर के कुएँ के चारों ओर की ज़मीन पहले ही पानी से भर चुकी थी, और नाव उसी पर टिक गई, हिलती-डुलती, सँभलती हुई।

सबने साँस ली।

किसी ने कुछ नहीं कहा। सब अपनी-अपनी जगह पर बैठे थे, भीगे, हाँफते, काँपते, और सूरज के पहले किनारे को क्षितिज से झाँकते देख रहे थे। उस रोशनी में पानी की सतह सोने की तरह चमक रही थी, और उस सतह पर बादलों के हज़ारों साये धीरे-धीरे आसमान की ओर उठ रहे थे।

"हम बाहर हैं," शरर ने कहा। उसके अंगारे बहुत धीमे जल रहे थे, पर वे जल रहे थे। "हम सब बाहर हैं।"

"हाँ," कबीर ने फुसफुसाया। उसकी आवाज़ में एक अविश्वास था। "मैं ज़िंदा हूँ। मैं पानी पर हूँ, और मैं ज़िंदा हूँ।"

पर हकीम रुस्तम का चेहरा सफ़ेद पड़ चुका था। वे नाव के किनारे खड़े होकर चारों ओर देख रहे थे, और उनकी नज़र एक चीज़ पर टिकी हुई थी, जिसे बाक़ी अब तक नहीं देख पाए थे।

"बेटी," उन्होंने धीमे से कहा। "यह पानी जा कहाँ रहा है?"

मीरा ने उनकी नज़र का पीछा किया।

उत्तर के कुएँ से फूटा पानी रेत पर फैल रहा था। हर पल, हर क्षण, चारों ओर, गोल घेरे में, किले की ओर, उन सात-सात पत्थरों के ढेरों की ओर, जो रेत के घेरे की सीमा बनाते थे। पानी अब टखनों से घुटनों तक पहुँच चुका था। और सूरज की पहली रोशनी में, किले की टूटी हुई प्राचीर के नीचे, जो दीवार कल तक सूखी थी, वह अब पानी में डूब रही थी।

उसके पीछे, पूरब की ओर, रेतीले टीलों की लहर के पार, बहुत दूर, दस-बारह कोस दूर, बस्तियों की पहली धुँधली लकीरें दिखाई दे रही थीं, जहाँ अब भी लोग सो रहे थे।

Writer
firoj saifi
Story
रेत का क़ैदी
Chapter
27 of 30
Category
Jinn & Spirits
Reading time
17 min
Words
3367
Language
Hindi (हिंदी)
Price
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