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एपिसोड 28: सात मुहाने

firoj saifi · Jinn & Spirits · 21 मिनट

सूरज का पहला किनारा रेत के क्षितिज के ऊपर आ चुका था, और उसकी रोशनी में पानी का सैलाब सोने की चादर जैसा लग रहा था।

नाव उसी चादर पर हल्के-हल्के हिल रही थी। मीरा नाव के किनारे पर खड़ी थी, घुटनों तक भीगी, और उसकी आँखें उस मंज़र को नाप रही थीं जिसे उसने बीस साल की खुदाई में कई बार नापा था, पर कभी जीवित नहीं देखा था।

उसका मन पहले एक पुरातत्वविद की तरह चला, और उसके बाद एक बेटी की तरह।

रेत का वह घेरा, जो पहले दिन उसे अजीब लगा था, अब साफ़ दिख रहा था। लगभग एक कोस चौड़ा, पूरी तरह गोल, और उसकी ज़मीन आसपास के टीलों से कई हाथ नीची। एक कटोरा। एक विशाल, हाथ से तराशा हुआ कटोरा, जिसके किनारे पर सात-सात पत्थरों के ढेर कुछ ही गज की दूरी पर बराबर खड़े थे, जैसे किसी ने उसे नापकर बनाया हो।

"यह बाँध है," उसने धीमे से कहा।

"क्या?" विक्रम ने पूछा।

"यह घेरा। ये ढेर। सब कुछ पानी को रोकने के लिए बना था। या पानी को बाँटने के लिए।" उसकी नज़र दूर तक फैले उस विशाल कटोरे पर घूम रही थी, और उसके मन के भीतर बीस साल के सैकड़ों पुराने नक़्शे एक-दूसरे पर चढ़ रहे थे। "पापा, आपने इसे देखा था। यह किसी पुराने नदी-तल का मुहाना है। जहाँ नदी का मुख चौड़ा होकर सात धाराओं में टूटता है। जैसे कोई हथेली खुलती है।"

विक्रम ने बेटी को देखा, और उनके चेहरे पर एक बहुत धीमी, बहुत भारी मुस्कान आई, जिसमें गर्व और पीड़ा दोनों थे।

"तूने वही देखा जो मैंने नोटबुक के आख़िरी पन्ने पर लिखा था," उन्होंने कहा।

पानी घुटनों से ऊपर चढ़ रहा था।

भंवर ने रेत की पोटली अपने कंधे पर बाँध ली थी और किनारे की ओर देख रहा था, जहाँ सात-सात पत्थरों के ढेर घेरे की रेखा बनाते थे। "मैडम, यह पानी इस घेरे को कब तक पार करेगा?"

"मेरे अंदाज़े से तीन घंटे," मीरा ने कहा। "शायद कम। किनारे सब जगह बराबर ऊँचे नहीं हैं। एक जगह दरार पड़ी तो पूरा पानी उधर बह निकलेगा।"

"और उसके बाद?"

"उसके बाद वह सीधा पूरब की ढलान पर जाएगा। वहाँ दस कोस पर रेतवाला गाँव है। उसके बाद सात और।"

कबीर के चेहरे का रंग उड़ गया। "तो हम इसे रोक नहीं सकते?"

"नहीं रोक सकते," विक्रम ने कहा। उन्होंने नाव की रेलिंग पर हाथ टिकाए, और उनकी आवाज़ बहुत धीमी और बहुत साफ़ थी, जैसे किसी कक्षा में आख़िरी और सबसे कठिन पाठ पढ़ाने जा रहे हों। "हमें रोकना नहीं है। हमें इसे रास्ता देना है। और रास्ता मैंने ही बंद किया था।"

सब चुप हो गए।

"इकतालीसवें दिन से पहले," विक्रम ने कहा, "मैंने एक बड़ी भूल की थी। पूरे चालीस दिन तक मैं यह मानता रहा कि सात कुओं का पानी उस चीज़ तक पहुँच रहा है जो द्वार के पीछे है, और जब तक पानी पहुँचेगा, वह भूखी नहीं मरेगी, यानी मरेगी भी नहीं। इसलिए मैंने सोचा कि अगर मैं कुओं का रास्ता बंद कर दूँ तो उसकी भूख बढ़ेगी, वह कमज़ोर होगी, और मैं उसे सुला सकूँगा।"

"आपने छह कुएँ पाट दिए," मीरा ने कहा।

"हाँ। ऊपर से चौड़े पत्थर के ढक्कन रखे, नीचे गारे में नमक और सीसा पिघलाकर भरा। इतना पक्का कि कोई जिन्न-भूत न खोल सके। इसमें मेरे बीस दिन लगे। शरर ने मदद की थी।"

"मैंने मना किया था," शरर ने धीमे से कहा।

"तूने मना किया था, मैंने नहीं माना।" विक्रम ने सिर झुका लिया। "फिर चालीसवें दिन, जब मैं तहख़ाने के भीतर नाली का पुराना शिलालेख पढ़ रहा था, तब मुझे अपनी भूल समझ आई। वे कुएँ पानी देने के लिए नहीं थे। वे उसके मुहाने थे। सात मुहाने। नदी सात धाराओं में बहती थी, हर धारा एक दिशा में, और जब नदी सूखी, तो हर धारा का मुँह कुआँ बनकर रह गया। उत्तर का कुआँ सबसे बड़ी धारा का था। बाक़ी छह छोटी धाराओं के।" उनकी आवाज़ टूट गई। "मैंने उनके मुँह बंद कर दिए, और सोचा कि मैं उसे भूखा रख रहा हूँ। असल में मैं उसकी साँस बंद कर रहा था। वह इसीलिए जाग नहीं पाई। इसीलिए वह इतनी बेचैन थी।"

"और आपने यह सब नोटबुक के आख़िरी पन्ने पर लिखा," मीरा ने कहा।

"चालीसवीं रात। कि अगर कभी कोई यह पढ़े, तो छह मुहाने फिर खोले। पर मैं ख़ुद कुछ नहीं कर सकता था। उसी रात मैंने तय कर लिया कि सो जाऊँगा, ताकि वह मेरे सिर से सातवाँ स्वर न चुरा सके।" उन्होंने बेटी की ओर देखा। "मैंने तुझे एक काम छोड़ा था, गुड़िया। मुझे नहीं पता था कि तू इतनी जल्दी वहाँ तक पहुँच जाएगी।"

मीरा ने पिता का हाथ थाम लिया। "हम दोनों मिलकर करेंगे, पापा।"

योजना बनाने में एक मिनट लगा।

"छह कुएँ," मीरा ने कहा। उसने पानी की सतह पर तैरती एक सूखी लकड़ी उठाकर नाव की तख़्ती पर लकीरें खींचीं। "घेरे के किनारे पर, हर पत्थरों के ढेर के पास, एक कुआँ। उत्तर पूरा खुला है। पूर्वोत्तर, पूरब, दक्षिण-पूर्व, दक्षिण, दक्षिण-पश्चिम, पश्चिम। अगर हम सबको दो-दो की टोली में बाँट लें..."

"हमारे पास छह टोलियाँ नहीं हैं," हकीम ने कहा। "हम सात हैं, और उनमें से एक बच्चा है।"

"दो बच्चे," ज़ैनब ने गुड़िया को सीने से लगाकर कहा।

"तीन," जमुना बोली। "मैं नाव में भैया की मदद करूँगी।"

मीरा ने सबको देखा। उसके भीतर एक पुरानी योजनाकार की ठंडक उतर आई। "नाव एक ही है। पर पानी सारे घेरे में फैला है। इसलिए नाव सबको एक-एक कुएँ तक ले जाएगी, क्रम से। हर कुएँ पर तीन-चार लोग उतरेंगे, ढक्कन खोलेंगे, और नाव अगली ओर चलेगी। मल्हार नाव चलाएगा। जमुना और ज़ैनब उसके साथ रहेंगी। हकीम साहब आपको..."

"मैं नाव में नहीं रुकूँगा," हकीम ने कहा। "मेरे उस्ताद ने सीसे पर नमक डालकर कई बार ताले बाँधे हैं। मैं जानता हूँ कैसे खुलते हैं।"

"सीसा गलाना पड़ेगा," विक्रम ने कहा। "वह पत्थर के ढक्कन की दरारों में भरा है। हथौड़े से नहीं टूटेगा।"

"मैं गलाऊँगा," शरर ने कहा।

सब उसकी ओर मुड़े। वह नाव की रेलिंग पर बैठा था, उसका क़द अब एक छोटे बच्चे जितना रह गया था, और उसके सीने के दोनों अंगारे नन्हे, लाल, काँपते हुए जल रहे थे।

"तू बुझ जाएगा," मीरा ने कहा। "तू पानी के बीच..."

"मैं आग हूँ," शरर ने कहा। उसकी आवाज़ बहुत शांत थी। "जब तक जल सकता हूँ, जलूँगा। मैं माँ का पहला आँसू हूँ, मीरा। आँसू आग क्यों बना था, यह मुझे आज समझ आया है। इसलिए कि जब पानी को किसी चीज़ से लड़ना हो, तो उसके पास अपनी आग होनी चाहिए।"

कोई कुछ नहीं बोला। मीरा ने बस हाथ बढ़ाकर उसकी नन्ही चिंगारी को अपनी हथेली पर बैठाया। वह उसकी त्वचा को जलाती नहीं थी, बस हल्की सी गर्म थी, किसी बच्चे की साँस जैसी।

पहला कुआँ पूरब में था।

नाव पानी के बीच से सरकती हुई पहुँची। घेरे के किनारे का पत्थरों का ढेर सामने उभर आया। उसके ठीक पास, पानी की सतह से बस एक हाथ नीचे, एक गोल, भारी, बलुआ पत्थर का ढक्कन दिख रहा था, जिसके चारों ओर की दरार में कुछ धूसर, सख़्त, चमकदार धातु जमी हुई थी।

भंवर सबसे पहले पानी में उतरा। उसकी कमर तक पानी था, और उसने बिना कुछ कहे ढक्कन के किनारे पर हाथ फेरे, जैसे कोई कुओं का बेटा अपने पुराने साथी को छूता है।

"सीसा है," उसने कहा। "नमक भी मिला है। पर ज़्यादा गहरा नहीं। मैंने ऐसे बहुत ढक्कन देखे हैं।"

शरर नाव से उछलकर ढक्कन के किनारे पर उतरा, पानी के ठीक ऊपर, और अपनी चिंगारी को फैलाया। वह एक पल को दीये की लौ की तरह जला, फिर एक मोमबत्ती की तरह, फिर एक छोटी मशाल की तरह। भाप की एक पतली दीवार उसके चारों ओर उठी। धातु की दरार काली पड़ी, फिर लाल, फिर पिघलकर बूँदों में टपकने लगी।

"अब!" हकीम ने कहा।

भंवर, विक्रम और हकीम ने ढक्कन के किनारे पर पीठ टिकाई और एक साथ ज़ोर लगाया। पत्थर चरमराया। एक बार, दो बार, तीन बार। पानी के भीतर कुछ चटखा, और ढक्कन एक ओर खिसकने लगा, इंच-दर-इंच।

कुएँ का मुँह खुला।

और उसी क्षण हवा में एक आवाज़ फूटी, एक नाद, गहरा, भरा हुआ, किसी बहुत बड़ी घंटी का, जिसकी गूँज ज़मीन के नीचे से उठकर आसमान तक गई। पहला स्वर। पूरब का।

पानी कुएँ की ओर मुड़ा। पहले एक पतली लकीर, फिर एक भँवर, फिर एक चमकती हुई, घूमती हुई धार जो कुएँ के मुहाने में उतरने लगी। घेरे के भीतर का पानी, जो अब तक चारों ओर बेचैन होकर फैल रहा था, पहली बार उस दिशा में एक राह पा गया।

"बहने लगा!" कबीर ने चिल्लाया। उसकी आँखों में पहली बार आशा चमक रही थी।

पर शरर, जो ढक्कन के पास झुका हुआ था, अपनी जगह पर हिल नहीं रहा था। उसके सीने की चिंगारी पहले से छोटी हो चुकी थी, कबूतर के अंडे जितनी। उसने मीरा की ओर देखा, और बहुत धीमे से कहा, "पहला हुआ। पाँच बाक़ी हैं।"

"तू ठीक है?"

"मैं जल रहा हूँ।"

मीरा ने उसे फिर अपनी हथेली पर बिठा लिया। वह पहले से हल्का था।

दूसरा कुआँ दक्षिण-पूर्व में था, और उसका ढक्कन पानी के तीन हाथ नीचे था।

नाव किनारे रुकी। भंवर ने पानी में झाँका, और उसके चेहरे पर पहली बार चिंता उतरी। "यहाँ ज़मीन ढलान पर है। पानी गहरा है। ढक्कन सीधा नीचे है, और उसे किसी को नीचे जाकर धकेलना होगा।"

"मैं जाता हूँ," विक्रम ने कहा।

"आप नहीं तैर सकते, पापा। आपके फेफड़े अभी बाईस साल की नींद से जागे हैं।" मीरा ने उन्हें रोका। "मैं जाऊँगी।"

"दी, तुम बहुत थकी हो।"

"मैं..." मीरा रुकी। उसकी नज़र अनायास कबीर पर चली गई।

कबीर नाव के बीचों-बीच बैठा था, घुटनों में सिर दिए, और उसकी आँखों में वही पुराना सहमा हुआ रंग था। वह पानी की ओर देख नहीं रहा था। उसकी उँगलियाँ नाव की लकड़ी में गड़ी हुई थीं।

"कबीर?"

"मैं ठीक हूँ।"

"तू तैरना नहीं जानता।"

"मुझे पता है।" उसने सिर उठाया, और उसकी आँखों में एक तरह की उलझन थी। "दी, माँ मुझे कभी पानी के पास नहीं जाने देती थी। अब मुझे पता है क्यों। पर कल रात, जब मेरी परछाईं पानी में थी, मैंने महसूस किया कि पानी मुझे जानता है।" उसने धीरे से अपने हाथ को देखा, जैसे उसमें कोई ऐसी चीज़ ढूँढ रहा हो जो अब तक छिपी थी। "मुझे नहीं पता कि मैं क्या कर रहा हूँ। पर शायद मुझे वहाँ जाना चाहिए।"

"नहीं," विक्रम ने तुरंत कहा। "कबीर, तू नहीं..."

"पापा," कबीर ने कहा, और उसकी आवाज़ में वह स्थिरता थी जो उसने पूरी रात की थकान के बाद पाई थी। "आपने मुझे बचपन में कंधे पर बैठाकर तारे गिनाए थे। आपने कहा था कि सात के बाद कुछ नहीं है, और मैंने सात पर रुकना सीख लिया था। मैं आज पहली बार सात के आगे जाना चाहता हूँ।"

विक्रम ने बेटे को देखा। फिर बहुत धीरे से अपना हाथ उसके कंधे पर रखा।

"रस्सी बाँध लो," उन्होंने कहा।

कबीर ने काँपते हाथों से कमर पर रस्सी बाँधी। भंवर ने उसका दूसरा सिरा नाव से कसा। कबीर किनारे पर खड़ा हुआ, पानी की ओर देखता रहा, और एक बार गहरी साँस ली।

"दी," उसने कहा।

"हाँ?"

"अगर मैं डूब जाऊँ तो..."

"तू नहीं डूबेगा," मीरा ने कहा। "तू नदी का बेटा है।"

कबीर ने आँखें बंद कीं और पानी में कूद गया।

पानी ने उसे सँभाल लिया।

यह मीरा ने साफ़ देखा। उसके गिरते ही पानी की सतह फैल गई, और उसके चारों ओर एक पतली, चमकदार परत बन गई, जो उसके शरीर को ऊपर की ओर धकेल रही थी। वह उछलता नहीं था, डूबता नहीं था, बस जैसे कोई बच्चा माँ की गोद में बैठा हो। पानी उसके पैरों को सहारा दे रहा था, उसके हाथों को राह दिखा रहा था।

वह नीचे गया। तीन हाथ। चार हाथ। उसकी नज़र ढक्कन पर थी, और उसके नीचे रोशनी में सीसे की वह धूसर रेखा चमक रही थी।

ऊपर शरर ने अपनी चिंगारी को पानी की सतह के ठीक ऊपर टिकाया, और उसकी गर्मी पानी की गहराई तक उतरी। सीसा पिघलने लगा। कबीर ने दोनों हाथ पत्थर पर टिकाए और धक्का दिया।

पत्थर हिला नहीं।

उसने फिर ज़ोर लगाया। उसके सीने में हवा कम होने लगी, और उसे महसूस हुआ कि उसकी ताक़त कम पड़ रही है। उसकी आँखों के सामने पापा का चेहरा आया, दी का, माँ का। उसने सोचा कि माँ ने उसे इस पानी से इसीलिए दूर रखा होगा।

तभी कोई उसके पास आया।

पानी की तली में, उसके पास, एक नन्ही सी आकृति उभरी। वह जमुना की तरह छोटी थी, पर बिल्कुल पारदर्शी, जैसे पानी से ही बनी हो। उसके बाल दो चोटियों में बँधे थे। उसने कबीर की ओर देखा, मुस्कुराई, और अपने नन्हे हाथ उसके हाथों के बगल में टिका दिए।

एक साथ धक्का दिया।

पत्थर खिसका। एक हाथ, दो हाथ, फिर पूरा। कुएँ का मुँह खुला, और उसकी गहराई से पानी की एक गर्म, चौड़ी धारा ऊपर उठकर कबीर को पकड़कर सतह की ओर ले गई।

जब वह ऊपर आया तो हाँफ रहा था, खाँस रहा था, पर उसके चेहरे पर एक ऐसी चौड़ी, खुली मुस्कान थी जो मीरा ने उसके बचपन के बाद कभी नहीं देखी थी।

"दी!" वह चिल्लाया। "मैं तैर रहा हूँ! मैं तैर रहा हूँ!"

विक्रम ने उसे बाँहों में खींच लिया, और उसकी हँसी और रुलाई एक साथ पानी की सतह पर फैल गई। दूसरे स्वर का नाद ऊपर से गूँजा, ज़मीन के नीचे से, पूरे घेरे में।

तीसरा कुआँ दक्षिण में था, और उसके ढक्कन पर विक्रम के हाथ से खुरचा हुआ एक नाम था।

'विक्रम'। पत्थर की सतह पर, सीसे की काली रेखा के ठीक ऊपर, चाकू से कुरेदे हुए अक्षर, जैसे किसी क़ैदी ने अपनी कोठरी की दीवार पर अपना नाम लिख दिया हो।

विक्रम उसे देखकर काफ़ी देर तक खड़े रहे। फिर उन्होंने धीरे से हाथ बढ़ाकर उन अक्षरों को छुआ।

"मैंने इसे इसलिए लिखा था कि अगर कोई मुझे ढूँढे, तो समझे कि मैं यहाँ था," उन्होंने कहा। "मैं उस वक़्त बहुत डरा हुआ था।"

"आप डरे हुए थे," मीरा ने कहा, "पर आपने फिर भी लिखा था। मैं पढ़ रही हूँ, पापा।"

विक्रम ने बेटी की ओर देखा। और फिर, बिना कुछ और कहे, ढक्कन के किनारे पर पीठ टिकाई। भंवर और हकीम उनके दोनों ओर आए। शरर ने अपनी चिंगारी की आख़िरी ताक़त सीसे पर उँडेली।

इस बार चिंगारी एक नन्हे जुगनू की तरह रह गई।

ढक्कन खिसका। तीसरा स्वर गूँजा।

मीरा की हथेली में शरर अब इतना हल्का था कि उसे महसूस ही नहीं हो रहा था। उसने उसे अपने सीने के पास लाया, और बहुत धीमे से फुसफुसाया, "बस दो और।"

"तीन," शरर ने सुधारा। उसकी आवाज़ बहुत पतली थी। "पश्चिम, दक्षिण-पश्चिम, और पूर्वोत्तर।"

"तू गिन रहा है?"

"मैं तीन हज़ार साल से गिन रहा हूँ।"

चौथे कुएँ तक पहुँचने से पहले ही आसमान ने रंग बदला।

पूर्व से उगता सूरज अब आधा ऊपर आ चुका था, और उसकी रोशनी रेत के ऊपर सुनहरी पड़ रही थी। पर उसी रोशनी में दक्षिण-पश्चिम की ओर एक और चीज़ चमक रही थी, एक पतली, तिरछी लकीर, पानी की, जो किनारे के पत्थरों के बीच से रेत पर बह रही थी।

"दरार!" भंवर ने चिल्लाकर कहा।

घेरे की दीवार, जो रेत की बनी थी और जिसे सदियों की हवा ने नरम कर दिया था, एक जगह से टूटने लगी थी। पानी उसमें से बाहर बह रहा था, पहले एक धार की तरह, फिर चौड़ी होती हुई, और उसके पीछे की रेत ढहती जा रही थी।

"यह घेरा टूट जाएगा!" मीरा ने कहा। "नाव को उधर ले जाओ! जल्दी!"

मल्हार ने पतवार झटके से घुमाई। नाव पानी पर फिसली, और दक्षिण-पश्चिम का कुआँ दरार से कुछ ही दूरी पर दिखाई दिया। पर वहाँ तक पहुँचने से पहले ही पानी एक बड़े टुकड़े में टूट गया। रेत की दीवार का एक पूरा हिस्सा ढह पड़ा, और पानी का एक विशाल, भूरा, चौड़ा सैलाब घेरे के बाहर की ओर बह निकला, पूरब की बस्तियों की ओर।

"नहीं!" कबीर चीख़ा।

पर किसी ने कुछ करने से पहले एक और आवाज़ गूँज उठी।

"रुक!"

वह एक बच्चे की आवाज़ थी, पर उसमें इतनी शक्ति थी कि पानी के भी कान खड़े हो गए। सबने सिर घुमाया।

विजय नाव के अगले हिस्से पर खड़ा था। उसका चेहरा सफ़ेद था, और उसके दोनों हाथ आगे की ओर फैले हुए थे। उसकी आँखों की भूरी पुतलियाँ चमक रही थीं, और उसके नन्हे पैर पानी की सतह पर बिना डूबे टिके थे।

"मैं विजयसिंह हूँ," उसने कहा। उसकी आवाज़ तेरह साल के बच्चे की थी, और उसके पीछे तीन सौ साल का भारी वज़न था। "मैं इस द्वार का आठवाँ रक्षक हूँ। और मैं इस पानी को आदेश देता हूँ, इस पल, इस जगह, रुक जा।"

पानी रुका।

पूरे का पूरा नहीं। पर दरार की जगह, जहाँ वह सैलाब बाहर बहने लगा था, पानी की गति धीमी पड़ने लगी, किसी बहुत बड़े जानवर की तरह जो बच्चे की पुकार सुनकर ठिठक गया हो। विजय के हाथ काँप रहे थे, और उसके माथे से पसीना बह रहा था।

"जल्दी," उसने दाँत भींचकर कहा। "मैं बहुत देर नहीं रोक सकता।"

उसके कंधे पर एक नन्हा सफ़ेद बादल उतरा। वह किसी स्त्री की आकृति का था, चूनर लहराती हुई, और उसने अपने हाथ विजय के हाथों पर टिका दिए। "मैं हूँ, बेटा," रानी चंद्रावती की आवाज़ बहुत धीमे आई, नमी से भरी हुई। "मैं तुझे थामे हूँ।"

विजय के गाल पर एक आँसू लुढ़का, पर उसके हाथ नहीं झुके।

चौथे कुएँ पर सबसे मुश्किल काम आया। ढक्कन के नीचे का सीसा बाक़ी से भी मोटा था, और शरर की चिंगारी अब इतनी छोटी थी कि वह पानी की सतह पर लगभग दिख नहीं रही थी।

"मैं नहीं कर पाऊँगा," उसकी आवाज़ पानी से भी धीमी थी। "मैं बुझ रहा हूँ।"

"तू नहीं बुझ सकता," मीरा ने कहा।

"माँ को मेरी ज़रूरत नहीं है," शरर ने कहा। उसकी आवाज़ में कोई दुख नहीं था, बस एक सरल, बहुत पुराना सच। "उसके पास नाम है। उसके पास नाव है। उसके पास तुम सब हो। मैं चिंगारी हूँ। चिंगारी का काम जलाना है, और जब सब जल जाए तो बुझना।"

"कुछ और रास्ता है," जमुना ने कहा।

सब उसकी ओर मुड़े।

वह नाव के किनारे पर बैठी थी, पतवार हाथ में लिए, और उसके नन्हे चेहरे पर एक बहुत गंभीर, बहुत सीधा भाव था। "भैया मुझे बताता था कि केवट कभी किसी का दीया नहीं बुझने देता। दीये में तेल डालता है।" उसने सिर घुमाया। "दीदी, आप शरर को अपने सीने से लगाइए।"

"क्या?"

"आप राजा के घाट की हैं। आपके भीतर वह ताक़त है जो बाप-दादा से आई है। शरर माँ का आँसू है, और माँ ने आपको अपना नाम दिया है। आप उसे नाम दे सकती हैं। अपने नाम का एक टुकड़ा। जो उसे जलाए रखे।"

मीरा ने चिंगारी को अपने सीने के पास उठाया। वह इतनी छोटी थी कि वह उसकी हथेली में लगभग दिख नहीं रही थी, बस एक बहुत धीमी, काँपती हुई रोशनी।

"मैं क्या करूँ?"

"गाइए।"

मीरा ने आँखें बंद कीं, और बहुत धीमे, अपनी साँस के सहारे, वही धुन गुनगुनाई। हूँ-हूँ-हूँ... पर इस बार उसने उस जगह पर, जहाँ नाम आना था, जहाँ उसकी माँ हमेशा रुक जाती थीं, अपनी साँस की एक बूँद छोड़ दी। एक अनकहा स्वर, एक वादा, एक नाम जो ज़ुबान पर नहीं, सिर्फ़ दिल में आता है।

चिंगारी ने उसकी हथेली पर साँस ली।

वह एक पल को पूरी तरह बुझी हुई लगी। फिर उसके भीतर कहीं बहुत गहरे एक नन्ही सी चमक उभरी, पहले एक बिंदु, फिर एक दीया, फिर एक छोटी लौ। वह लौ उसकी हथेली पर बैठकर बढ़ने लगी, और जैसे-जैसे बढ़ी, उसके रंग में बदलाव आया। लाल से नारंगी, नारंगी से सुनहरा।

"यह... यह क्या है?" शरर ने पूछा।

"यह तुम्हारा नाम है," मीरा ने आँखें खोलकर कहा। "तुम सिर्फ़ चिंगारी नहीं हो। तुम सूरज की पहली किरण हो।"

शरर की लौ सुनहरी हो उठी, और उसने सीसे की ओर छलाँग लगाई।

सीसा पिघला नहीं, सुलगकर बह गया। चौथा ढक्कन एक ही धक्के में खिसका। पाँचवाँ कुआँ भी, जो पास ही था, उसी रोशनी में खुल गया। चौथा और पाँचवाँ स्वर एक साथ गूँजे। पश्चिम का और दक्षिण-पश्चिम का।

पानी, जो अब तक एक ही दिशा में बह रहा था, पाँच दिशाओं में बँट गया। पूरे घेरे में पाँच विशाल भँवर बने, घूमते हुए, पानी को अपने भीतर खींचते हुए, और दरार की जगह, जहाँ विजय पानी को थामे खड़ा था, उसका दबाव धीमा होने लगा।

"अब छोड़ दे, बेटा," रानी ने कहा। "अब हो गया।"

विजय ने हाथ नीचे किए, और घुटनों के बल नाव पर गिर पड़ा, हाँफता हुआ। उसके चारों ओर बादल का वह नन्हा सफ़ेद टुकड़ा उसके कंधों पर लिपट गया, जैसे एक माँ बच्चे को चादर ओढ़ाती है।

आख़िरी कुआँ पूर्वोत्तर में था, ठीक सूरज की ओर।

नाव जब वहाँ पहुँची, सूरज पूरा क्षितिज के ऊपर आ चुका था। उसकी सीधी रोशनी पानी पर पड़ रही थी, और पूरा घेरा पिघले सोने की झील जैसा चमक रहा था। पर आख़िरी ढक्कन के पास पानी शांत था, और उसकी सतह पर कुछ अजीब हो रहा था।

पानी में सात लकीरें उभर रही थीं।

सीधी, गहरी, पारदर्शी, पानी की सतह के नीचे उतरती हुई। सात धाराएँ, जो घेरे के केंद्र से निकलकर सात दिशाओं में जा रही थीं, और उनमें से एक के मुहाने पर वह आख़िरी ढक्कन था। छह खुल चुकी थीं। सातवीं वही थी जो उत्तर के कुएँ से पहले ही खुली थी। पर आख़िरी ढक्कन, जो पूर्वोत्तर का था, सबसे मोटा, सबसे भारी, सबसे पुराना था।

उसके ऊपर कोई चीज़ खुदी थी, जिसे सब पहचान गए।

वह एक नाव का चिह्न था। एक लंबी, पतली नाव, जिसके पाल की जगह एक हाथ की आकृति थी, और उसके नीचे सात बिंदु।

"यह केवटों का निशान है," मल्हार ने धीमे से कहा। उसने पतवार रखी और नाव के किनारे से उतरकर घुटनों तक पानी में खड़ा हो गया। "मेरे गाँव का। यह मुहाना हमारा था। जहाँ से हम घाट पर नाव उतारते थे।"

"तो यह तुम्हारा है," मीरा ने कहा।

"यह जमुना का है।"

सबकी नज़र जमुना पर गई। वह नाव के सिरे पर खड़ी थी, अपनी माँ की झील जैसी आँखों से टकराती हुई सुबह की रोशनी में, और उसके नन्हे चेहरे पर पहली बार एक बहुत बड़ी, बहुत गंभीर ज़िम्मेदारी उतरी।

"सातवाँ स्वर अब," उसने कहा।

वह ढक्कन के पास गई और अपने नन्हे हाथ उस पर टिका दिए। उसने आँखें बंद कीं और गाया। वही ऊँची, खुली, कच्ची, मासूम तान, जो नाम के अंत में थी। जो बच्चे की पुकार थी।

"माँ... जागो..."

ढक्कन काँपा। उसके चारों ओर की सीसे की रेखा चमकी, और अपने आप पिघलकर बह गई। पत्थर धीरे-धीरे, किसी साँस की तरह, एक ओर खिसकने लगा, और कुएँ का मुँह खुल गया।

सातवाँ स्वर आसमान से फूटा, बहुत ऊपर से, जैसे सूरज की पहली किरण के साथ।

पूरी रेत हिल उठी।

सात दिशाओं में, सात मुहानों से, पानी की सात धाराएँ एक साथ फूट पड़ीं। पहले पतली, फिर चौड़ी, फिर चमकती हुई, घेरे की दीवार तोड़कर नहीं, उसके भीतर बने रास्तों से, रेत के नीचे के पुराने बिस्तरों में, जो सदियों से अपनी नदी का इंतज़ार कर रहे थे।

पानी का भँवर ढीला पड़ा। घेरे का सैलाब पीछे हटने लगा। पूरब की ओर जो दरार पड़ी थी, उसमें पानी की गति धीमी हुई, और एक पतली धारा बनकर उस दिशा में एक नई, सँकरी, चमकती नहर की तरह चलने लगी।

सबने एक साथ साँस ली।

मल्हार ने पानी में खड़े-खड़े सूरज की ओर देखा। उसके चेहरे पर आँसू बह रहे थे, और होंठों पर वह हँसी थी जिसे उसने तीन हज़ार साल में पहली बार रोका नहीं।

"हो गया," उसने कहा। "माँ, हो गया।"

पर नदी चुप थी।

वह उनके चारों ओर के पानी में बह रही थी, उनके नीचे, उनके ऊपर, पर उसने जवाब नहीं दिया। और तभी, बहुत धीमे, पूरे घेरे के बीच में, उत्तर के कुएँ के ठीक सामने, पानी की सतह ऊपर उठने लगी।

वह एक ऊँचा, गोल, चमकदार स्तंभ था, जो धीरे-धीरे आकार ले रहा था। पहले एक सिर, फिर कंधे, फिर पूरा बदन। एक स्त्री की आकृति, पानी की बनी, पारदर्शी, ऊँची, जिसके केश धाराओं की तरह बह रहे थे और जिसकी देह में सूरज की रोशनी इंद्रधनुष बनकर टूट रही थी।

उसके चेहरे पर आँखें थीं। असली, गहरी, नदी जैसी आँखें, जिनमें हज़ारों साल की बारिश थी।

वह धीरे-धीरे नाव की ओर घूमी और मीरा की तरफ़ अपना हाथ बढ़ाया।

"अब," नदी ने कहा। उसकी आवाज़ में न डर था, न ग़ुस्सा, सिर्फ़ एक गहरी, ठोस, अटल सच्चाई। "अब मेरे साथ चलो।"

Writer
firoj saifi
Story
रेत का क़ैदी
Chapter
28 of 30
Category
Jinn & Spirits
Reading time
21 min
Words
4017
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

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